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Incest खेल ससुर बहु का
बेहद मजेदार प्रस्तुति
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चलो दोस्तों कहानी में आगे बढ़ते है
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(11-04-2026, 06:25 PM)@@004 Wrote: बेहद मजेदार प्रस्तुति

शुक्रिया दोस्त

बने रहिये
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राजासाहब उसके सामने आकर बैठ गये और सिगरेट मुँह से निकल कर उसके अंडो पे लगा दी। कल्लन दर्द से चिल्ला उठा।

"अब मैं तुम्हे भौंकने के लिए नही कहूँगा। बस ऐसे ही बहुत धीरे-धीरे तुम्हे मौत के पास पहुचाऊंगा। एक बात अच्छी तरह से समझ लो,अगर तुमने अपना मुँह नही खोला तो मैं तुम्हे मार दूँगा पर वो मौत इतनी आसान नही होगी। मैं तुम्हे इतना तडपा के मारूँगा कि मौत भी घबरा जाएगी।" और सिगरेट उसके आंडो पे दबा के बुझा दी। फिर वो उठे और बगल की टेबल से एक चाकू उठा कर फिर उसके सामने बैठ गये।

करीब आधे घंटे के बाद कल्लन एक पालतू तोता की तरह राजासाहब के सामने गा रहा था। राजासाहब को अब सारी बात पता चल गयी थी,उनके दिल मे बस एक ही ख़याल था-जब्बार की मौत। वो चाहते थे कि अभी जाकर उसे और मलिका को मौत की नींद सुला दे,पर उनके बाद उनकी मेनका का क्या होता। उन्हे बदला लेना था पर ये सब बड़ी चालाकी से करना होगा ताकि उनपे कोई शक़ भी ना करे और वो मेनका के साथ ज़िंदगी का लुत्फ़ उठा सके। पूरी रात वो यही सोचते रहे और सवेरा होने तक उनके दिमाग़ मे एक प्लान तैयार हो चुका था। मैत्री की पेशकश.

उन्होने कल्लन को बेहोश कर उसे कपड़े पहनाए और बाँध कर कार मे डाला। 4:30 बज रहे थे। वो 6 बजे तक मेनका के जागने से पहले महल पहुँच जाना चाहते थे। उन्होने कार अपने शहर के एक मकान से निकली और दौड़ा दी राजपुरा की ओर।

ड्राइव करते वक़्त उनके दिमाग़ मे विश्वा का ख़याल आ रहा था। इन दरिंदो ने उसकी कमज़ोरी का फ़ायदा उठा कर उनसे बदला लेने के लिए उसकी जान ले ली। वो इन तीनो का बहुत बुरा हाल करेंगे।
 
**************
 
उनकी कार अब राजपुरा के पहले पड़ने वाली पहाड़ी चढ़ रही थी।इसी रास्ते पे यूधवीर का आक्सिडेंट हुआ था। क्या उसमे भी इन लोगो का हाथ था? यही अगले मोड़ पे उसकी कार नीचे खाई मे जा गिरी थी। जब्बार को मारने से पहले वो इस सवाल का जवाब माँगेंगे।

कल्लन को होश आ गया था। उसने देखा कि वो एक कार मे है। उसे रात की बात याद आई। राजा अभी भी उसे मार देगा। उसे यहा से निकलना ही होगा। उसके हाथ पीछे ले जाकर रस्सी से बाँधे गये थे और वो बॅक्सीट पे औंधे मुँह पड़ा था। मौत के ख़याल से वो काँप उठा और उचक कर उसने आगे की सीट पे अपने सर से धक्का मारा। राजासाहब अचानक मारे इस धक्के से हिल गये और कार उनके कंट्रोल से थोड़ा बाहर हुई और पहाड़ी के किनारे उतर गयी। कल्लन ने एक और धक्का मारा तो राजासाहब फिर से हिल गये और कार पहाड़ी से नीचे उतरने लगी। राजासाहब कार कंट्रोल करने की नाकाम कोशिश कर रहे थे कि तभी कार एक चट्टान से टकराई और मूड कर खाई मे गिर गयी, गिरती कार का पीछे का दरवाज़ा खुला और उसमे से बँधा कल्लन भी कार के साथ नीचे हवा मे गिरने लगा।

थोड़ी देर तक उस पहाड़ी पे सन्नाटा छाया रहा, बस चिड़ियो के चहकने की आवाज़ थी और फिर एक ज़ोर का धमाका हुआ,नीचे खाई मे राजासाहब की कार धू-धू करके जल रही थी। धीरे-धीरे सवेरा हो रहा था पर राजकुल का सूर्या अस्त हो चुका था। मैत्री की रचना.

मेनका बुत बनी अपने कमरे मे बैठी हुई थी। आज राजासाहब की मौत को एक महीना हो गया था। दुनिया की नज़रो मे तो वो उस दिन विधवा हो गयी थी जब विश्वा मरा था पर उसके लिए तो उसका वैधव्य राजासाहब की मौत से शुरू हुआ था। उस मनहूस सुबह जब पोलीस राजासाहब की कार के खाई मे बुरी तरह जाली हालत मे मिलने के बाद महल आई और उसे ये बताया कि कार मे एक जली लाश भी है जिसकी शिनाख्त के लिए उसे चलना पड़ेगा तो वो बेहोश हो गयी थी।
होश आने पे वो हॉस्पिटल पहुँची और जब उस लाश को देखा तो उसकी चीख निकल गयी। चेहरा पूरी तरह जल कर खाक हो चुका था और बाकी बदन भी,बस दाएँ हाथ और कलाई का कुछ हिस्सा अधजला सा रह गया था जिसपे उसका दिया ब्रेस्लेट अभी भी चमक रहा था। उसी से उसने राजासाहब की लाश को पहचाना था। उसके बाद क्या हुआ उसे कुछ होश नही। उसके माता-पिता फ़ौरन उसके पास पहुँच गये थे और उसकी माँ तो अभी भी उसके साथ थी। लोग जो कहते वो बस चुप-चाप करती जाती। किसी ज़िंदा लाश की तरह।

वो एक हाथ मे राजासाहब का ब्रेस्लेट लिए,कुछ काग़ज़ों को देख रही थी,ये वसीयत थी जिसमे राजासाहब ने सारी जायदाद उसके नाम कर दी थी और आज से वो कुँवारानी नही रानी साहिबा हो गयी थी। उसने उन काग़ज़ों को देखा और आज राजासाहब की मौत के बाद पहली बार ऑफीस जाने का फ़ैसला किया।

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बने रहिये दोस्तों..............
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राजासाहब की मौत की खबर सुनकर तो जब्बार खुशी से पागल हो गया था। उसने सोचा भी ना था कि बिना उसके कुछ किए तक़दीर उसे ऐसा तोहफा देगी। इस वक़्त वो मलिका के साथ कार ड्राइव करता हुआ शंकारगर्ह नाम की जगह से शहर आ रहा था। शंकारगर्ह से शहर का रास्त एक जंगल से होकर गुज़रता था। आमतौर पे लोग शाम ढलने के बाद उस रास्ते का इस्तेमाल नही करते थे बल्कि थोड़ा घूम कर हाइवे से शहर जाते थे। पर जब्बार को इन सब बातों की कोई फ़िक्र नही थी। ठीक भी था,गुंडे कब से गुंडों से डरने लगे! इस वक़्त शाम के 8 बज रहे थे।


तभी ज़ोर की आवाज़ हुई और जब्बार ने ब्रेक लगाया। उसकी कार का कोई टाइयर पंक्चर हुआ था। "धत्त तेरे की, भेन्चोद!",वो कार से नीचे उतरा और उसके उतरते ही दो नक़ाबपोश किनारे की झाड़ियो से निकल कर आ खड़े हुए। उनमे से एक ने जब्बार को पीछे से पकड़ कर उसकी गर्दन पे चाकू रख दिया और दूसरे ने मलिका को कार से खींच कर उतार दिया।

"सालो,,क्या चाहिए तुम्हे?पैसे? तो लो और निकलो, चुतियो।"

"चुप बहनचोद!पहले हम इस माल को लूटेंगे फिर तेरे पैसों के बारे मे सोचेंगे। चल!",उसने मलिका की तरफ इशारा किया और दोनो लुटेरे जब्बार और मलिका को झाड़ियो मे खींच जंगल मे ले गये। एक मलिका को गिरा उस पर सवार हो उसके कपड़े नोचने लगा तो मलिका चिल्लाने लगी। दूसरे ने एक रस्सी से जब्बार को बाँध दिया और अपने दोस्त के साथ मलिका को नंगी करने मे जुट गया।


तभी झाड़ियों को चीर वहा एक और इंसान पहुँचा। उसने दोनो गुंडों को एक-एक हाथ से पकड़ा और मलिका के उपर से खींच लिया। वो एक सरदार था और उसने उनसे अकेले ही लड़ना शुरू कर दिया। मलिका जैसे ही गुंडों के चंगुल से छूटी तो वो  भाग कर जब्बार के पास पहुँची और उसके बंधन खोल दिए। अब जब्बार भी उस सरदार के साथ मिल उन गुंडों की पिटाई करने लगा। थोड़ी ही देर मे गुंडे वहा से रफूचक्कर हो गये।

"शुक्रिया।",जब्बार हाँफ रहा था।

"ये तो मेरा फ़र्ज़ था। बंदे को रविजितसिंग सोढी कहते हैं।",उस सरदार ने अपनी साँस संभालते हुए जब्बार से हाथ मिलाया। वो कोई 50 साल के आसपास की उम्र वाला लंबी कद-काठी का इंसान था।

"मैं जब्बारसिंग हूँ।"

"आप दोनो मेरे साथ चलिए। शहर से पहले मेरा फार्महाउस है। रात वही गुज़ारिए।",उसने अपने कोट से मलिका के फटे कपड़ो से नुमाया हो रहे जिस्म को ढँक दिया।

"आपको खामखा तकलीफ़ होगी।"

"बिल्कुल भी नही। आइए,बैठिए। और अपनी कार की चिंता मत करिए। अभी थोड़ी देर मे अपने ड्राइवर और नौकरों से इसे मंगवा लेंगे।"


कोई एक घंटे बाद दोनो रविजितसिंग सोढी के साथ उसके फार्महाउस के ड्रॉयिंग रूम मे बैठे थे,मलिका एक कमरे मे आराम कर रही थी।

"तो आप क्या करते हैं,जब्बार साहब?",उसने विस्की का एक ग्लास बढ़ाया।

"मैं प्रॉपर्टी डीलर हू।और आप?",जब्बार ने ग्लास लेते हुए पूछा।

"मैं तो एनआरआइ हू। जमैका मे मेरा बिज़नेस है।",पेग ख़त्म कर वो दुबारा अपना ग्लास भर रहा था।


थोड़ी ही देर मे दोनो शराब के नशे मे खुल कर बातें करने लगे।
 
***************

आज के लिए बस यही तक दोस्तों. फिर मिलेंगे एक नए अध्याय के साथ.

तब तक के लिए मैत्री तरफ से जय भारत.
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दोस्तों ऊपर 2 अपडेट्स दिए है आपके जानकारी के लिए.


पढ़िए और आनंदित हो............
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बेहद रोचक प्रस्तुति लेकिन राजा साहब की मौत अप्रत्याशित लगी
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(13-04-2026, 04:13 AM)@@004 Wrote: बेहद रोचक प्रस्तुति लेकिन राजा साहब की मौत अप्रत्याशित लगी

शुक्रिया दोस्त.............


राजा साहब की मौत अप्रत्याशित लगी



अच्छा!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


कैसे?????????????????????
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(13-04-2026, 01:53 PM)maitripatel Wrote: शुक्रिया दोस्त.............


राजा साहब की मौत अप्रत्याशित लगी



अच्छा!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


कैसे?????????????????????

अरे जब ससुर की मौत हो गई है तो फिर ये ससुर बहु का खेल खत्म हो गया है ना ।
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(13-04-2026, 09:18 PM)@@004 Wrote: अरे जब ससुर की मौत हो गई है तो फिर ये ससुर बहु का खेल खत्म हो गया है ना ।

ओह्ह हां आप की बात सही है......................

लेकिन कोई जाता है तो कोई आता भी तो है!!!!!!!!!!!!!!!!!

राजा साहेब गए पर सोढ़ी साब आये है देखते वह क्या गुल खिला रहे है....................


बने रहिये..............................
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चलिए दोस्तों अब कहानी में आगे बढ़ते है......................

राजासाब तो गए................

आगे जानते है यह नए केरेक्टर क्या जलवे दिखता है..........................


शायद वह राजा साब का साम्राज्य लूंट ना ले........................ और मेनका भी अकेली है......
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"उपरवाले का भी अजीब ढंग है,जब्बार साहब। पहले तो इंसान के दिल मे किसी चीज़ की चाह जगाता है और जब इंसान मेहनत-मशक्कत के बाद उस चीज़ को पाने के काबिल हो जाता है तो उपरवाला उस चीज़ का वजूद ही मिटा देता है। पिछले 26 सालों से मैं बस एक ही मक़सद के लिए काम कर रहा था और आज जब उसे पूरा करने आया तो.... ।"

"
तो क्या,सोढी साहब?
मैत्री की पेशकश.

"
छोडिये। आप राजपुरा से हैं ना?"

"
जी।"

"
तो आपको मेरी बात बुरी लग सकती है।"

"
क्यू?"

"
क्यूकी जिस ख़ानदान की बात मे कर रहा हू, उसे आपके गाव मे भगवान की तरह पूजा जाता है।"

"
आप राजकुल की बात कर रहे हैं?"

"
जी,हाँ। राजकुल! जिसने मेरी ज़िंदगी का रुख़ मोड़ दिया।"

"
सोढी साहब,यकीन मानिए,जितनी नफ़रत आपके दिल मे उस परिवार के लिए है,उस से कही ज़्यादा मेरे सीने मे है।"

"
क्या?"

"
जी,हाँ। सोढी साहब और अगर आप मुझे इतने भरोसे के काबिल समझते हैं कि आपका दर्द बाँट साकु तो मैं आपको अभी भी उस परिवार से बदला लेने की तरकीब बता सकता हू।"

"
ठीक है,जब्बार साहब। वैसे भी ये कोई बहुत गहरा राज़ नही है। आज से 26 साल पहले मैं राजपुरा आया था। मैं एक बहुत ग़रीब परिवार से हू। पॉलिटेक्निक से पढ़ने के बाद मेरी नौकरी राजकुल शुगर मिल मे लगी। रहने के लिए वही गाव मे एक फ़ौजी के घर मे एक कमरा ले लिया। फ़ौजी कभी-कभार ही घर आता था और यहा केवल उसकी बीवी रहती थी। वो बला की खूबसूरत थी। मैं नौजवान था और वो भी मर्द के जिस्म के लिए तड़पति रहती थी। थोड़े ही दीनो मे हुमारे ताल्लुक़ात बन गये। बात केवल जिस्मो की आग बुझाने से शुरू हुई थी पर जल्द ही हम एक दूसरे को दिल-ओ-जान से चाहने लगे।",उसने ग्लास खाली कर दिया।
मैत्री रचित कहानी.

"
..कहते हैं ना कि इश्क़ और मुश्क छुपाये नही छुपते। हमारे इश्क़ की खबर भी फैल गयी और जब फ़ौजी आया तो उसने हंगमा शुरू कर दिया। उसकी बीवी मेरे साथ जाना चाहती थी और मैं भी उसे ले जाने को तैयार था। पर बात फ़ौजी की आन की थी,वो सीधा राजा यशवीर के बाप राजा सूर्यप्रताप के पास फ़रियाद लेकर पहुँच गया और उसने अपना हुक्म सुना दिया। मुझे नौकरी से निकाल कर गाव से बाहर फिकवा दिया। इतना ही नही,मुझे आवारा घोषित कर दिया और इस वजह से मुझे कही और नौकरी नही मिली।"

"
काई महीनो तक मैं खाक छानता रहा और फिर किसी ने मुझे जमैका मे एक नौकरी दिलवाई। वहा पहुँच कर मैने अपने आप को हर तरह से मज़बूत कर लिया केवल एक बात के लिए,मुझे सूर्यपरताप के बेटे यशवीर को उसके बाप के किए की सज़ा देनी थी,पर आया तो पता चला कि वो कार आक्सिडेंट मे मारा गया।"

"
अब बताइए अपनी तरकीब?"

"
सोढी साहब, आप राजकुल की मिल्स क्यू नही खरीद लेते? आप पैसे लगाइए मैं उसे यहा चलाऊँगा। पार्ट्नरशिप कर लेते हैं और हर महीने आपको मुनाफ़े की रकम मिलती जाएगी। मेरे दिल को तो इसी बात से सुकून मिलता रहेगा कि राजा की मिल्स मेरे हाथों मे हैं।"

"
पर क्या मिल्स बिकाउ हैं?"

"
अगर नही हैं तो हो जाएँगी। उसकी आप फ़िक्र मत करो।"

"
जब्बार भाई,आपने अभी तक अपनी कहानी नही सुनाई।"

"
सुनाऊंगा,सोढी साहब,ज़रूर सुनाऊंगा, वक़्त आने दीजिए। आपने हमे अपना राज़दार बनाया है तो मैं भी वादा निभाऊँगा।"

"
ठीक है। मैं भी आप पे भरोसा करता हू।",दोनो ने हाथ मिलाया।

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बने रहिये दोस्तों..................


कहानी अभी जारी है......
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देखते है उधर मेनका क्या कर रही है.................

मेनका का दिल अब कही भी नही लगता था। ऑफीस मे उसने मन लगाने की बहुत कोशिश की पर उसमे कामयाब नही हुई। ऑफीस आते हुए 15-20 दिन गुज़र गये थे पर उसे सब बोझ जैसा लगता था। वो ऐसे ही कुर्सी पे बैठी काग़ज़ उलट-पलट रही थी और बीते दीनो को याद कर रही थी। वो जब डील साइन करने उनके साथ गयी थी तो उनकी बहू बनकर और लौटी उनके दिल की रानी बनकर। वो होटेल के कमरे मे दोनो की पहली रात....फिर यहा....और तभी उसके दिमाग़ मे एरपोर्ट पे सपरू साहब से हुई मुलाकात का ख़याल आया।


सपरू साहब! हाँ! क्यू ना वो मिल्स मे अपना हिस्सा उन्हे बेच दे। फिर वो यहा से शहर रहने चली जाएगी। राजपुरा तो अब उसे काटने को दौड़ता था। उसने तुरंत सेशाद्री साहब से बात की। उन्हे भी ख़याल अच्छा लगा। मेनका काम पे ठीक से ध्यान दे नही रही थी और इस से अभी तक तो नुकसान नही हुआ पर आगे हो सकता था। दोनो ने जर्मन पार्ट्नर्स से बात की तो वो भी राज़ी हो गये। मैत्री रचित.

मेनका फ़ौरन अपनी माँ के साथ देल्ही रवाना हो गयी। वहा सपरू साहब के सामने जब उसने अपना प्रपोज़ल रखा तो मानो उन्हे मुँह माँगी मुराद मिल गयी। देल्ही से वापस आते हुए मेनका की माँ अपने घर चली गयी और मेनका शाम ढले राजपुरा पहुँची।

**********************************
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पार्ट 15


गतान्क से आगे..............................

मेनका महल पहुँची तो देखा की सेशाद्री उसका इंतेज़ार कर रहे हैं,"नमस्ते!अंकल,आइए हॉल मे चलिए।" उसने एक नौकर को चाइ का इंतेज़ाम करने को कहा।

"रानी साहिबा,एक बुरी खबर है।"

"और भी कुछ बुरा होने को बाकी है अंकल!",उसने चाइ का कप उन्हे बढ़ाया।

"मिल वर्कर्स ने हड़ताल कर दी है।"

"पर क्यूँ?"

"उन्हे पता चला कि आप अपना हिस्सा बेच रही हैं तो उनका कहना है कि इसमे उनके हितों का ख़याल नही रखा जाएगा।"

"अंकल,हम तो हमेशा उनका अच्छा सोच कर ही सारे फ़ैसले लेते हैं,फिर अचानक हड़ताल?"
मैत्री की पेशकश.

"रानी साहिबा,इन सब के पीछे जब्बार का हाथ है। वो मज़दूरो के नेता को अपनी उंगलियो पे नचाता है। वो ये चाहता है कि खरीदार उसका आदमी हो। ऐसी कोशिश उसने पिछली बार भी की थी पर तब उसे मुँह की खानी पड़ी थी।"

"ह्म्म्म.....ठीक है,अंकल, आप मज़दूरो को कह दीजिए कि हम बिना उनके सपोर्ट के कोई फ़ैसला नही लेंगे। बस वो कल से काम पे आ जाएँ।"

"पर रानी साहिबा, ये तो उनके सामने घुटने टेकना हुआ।"

"अंकल,एक इंसान की वजह से कितने मज़दूरो को नुकसान उठना पड़ रहा है। एक बार हम पीछे हट रहे हैं, इसका मतलब ये नही है कि हर बार ऐसा होगा। प्लीज़,आप हमारी तरफ से मज़दूरो को समझा दीजिए।"

"जैसा आप कहें।",सेशाद्री साहब ने चाइ ख़त्म की और चले गये।


उस रात मेनका राजासाहब की मौत के बाद पहली बार अकेली अपने बिस्तर पे लेटी थी। उनकी मौत के बाद से उसकी मा ने अपनी बेटी को एक पल के लिए भी अकेला नही छोडा था।

उसने एक स्लिप पहनी हुई थी जोकि उसके घुटनो के उपर तक आ रही थी। वो करवटे बदल रही थी पर उसकी आँखो मे नींद आ ही नही रही थी। उसे राजासाहब की याद आ रही थी। काफ़ी देर तक करवटे बदलने के बाद सफ़र की थकान ने असर दिखाया और उसकी पलके भारी हो गयी और थोड़ी ही देर मे वो सो गयी।

रात के एक बज रहे थे। चारो तरफ सन्नाटा छाया था पर वो क्या है.....वो कौन है जो महल के चौकीदारो से छुपता हुआ, लॉन पार कर महल तक आ पहुँचा है! थोड़ी ही देर मे वो साया एक खिड़की खोल अंदर दाखिल हो चुका था। ये भी हैरत की बात है कि उसने सेक्यूरिटी अलार्म्स को कैसे चकमा दिया! अब वो उपरी मंज़िल की सीढ़िया चढ़ रहा था। पहले उसने राजासाहब का कमरा खोला और अंदर झाँका पर वहा किसी को ना पाके आगे बढ़ा और मेनका के कमरे का दरवाज़ा खोला। मैत्री की रचना है.


खिड़की से आती चाँदनी सोती हुई मेनका के उस छोटी स्लिप मे क़ैद गोरे बदन को नहला रही थी। वो अजनबी थोड़ी देर तक उसके हुस्न को निहारता रहा और फिर बिस्तर पे चढ़ उसके उपर झुक गया। मेनका को अपने चेहरे पे उसकी गरम साँसे महसूस हुई तो उसकी आँख खुली। वो डर के मारे चीखने वाली थी कि उस अजनबी ने अपना हाथ उसके मुँह पे दबा दिया।

मेनका की ख़ौफ़ और हैरत से फैली आँखो मे अचानक पहचान की झलक आई तो उस अजनबी ने अपना हाथ उसके मुँह से हटा दिया,"...तुम!!"

"हां,मैं।",उस अजनबी ने रानी साहिबा के होंठो पे अपने होठ रख दिए। मेनका भी उसे चूमने लगी और अपनी बाहों मे भर लिया।

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दोस्तों आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ. तब तक के लिए मैत्री की तरफ से जय भारत.
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दोस्तों आपके मनोरंजन के लिए ऊपर कुछ अपडेट्स देये है

कृपया पढ़े और अपने मंतव्यो लिखे.................
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उत्तम प्रस्तुति लेकिन ये कौन है
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(14-04-2026, 07:05 PM)@@004 Wrote: उत्तम प्रस्तुति लेकिन ये कौन है

शुक्रिया दोस्त

आपकी इंतेजारी लगभग अगले पोस्ट में ख़तम हो जायेगी..................

बने रहिये दोस्त............
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चलो दोस्तों कहानी में थोडा आगे बढ़ते है....................




आशा है की आप को पसंद आएगा.................
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"..ऊओ....ऊउउउछ्ह्ह्ह....!",मलिका बिस्तर पे पीठ के बल लेटी थी, उसकी गांड के नीचे एक कुशन लगा था और अभी जब्बार ने उसकी टांगो के बीच बैठकर उसकी गांड के छेद मे अपना लंड पेला था।

"...एयेए....अहह...क्या फायदा होगा...उस सरदार का नौकर बनके?...आ...ईइय्य्य...ययईए"

"नौकर कौन बन रहा है,मेरी जान।",उसने उसकी गांड मारते हुए चूत मे दो उंगलिया घुसा दी और अंदर-बाहर करने लगा,"ये तो बस उसको बोतल मे उतारने के लिए मैने कहा है पर कुछ ही दीनो मे मैं मालिक बन जाऊँगा और वो सरदार अपना लंड थामे खड़ा रह जाएगा।",उसने दूसरे हाथ से उसके एक निपल को मसल दिया।

"....हा....अनन्न..और ज़ोर से मार ...फाड़ दे मेरी गा....आंदड़ड़....सा....आले...आआ...आहह....मज़ा आ .....गा...याअ....याअ...अहह...!",जब्बार के धक्के तेज़ हो गये,मलिका की बातें उसे मस्त किए जा रही थी और वो उसके बदन पे झुक उसकी चूचिया चूमने-चूसने लगा।
मैत्री की पेशकश.

"मुझे लग ही रहा था कि सा....आअला....तू तो पैदाइशी ह...रा...अमि है। उस सरदार की भी ज़रूर लेगा...एयाया....आअहह...,छोड़ दरिंदे।"


जब्बार ने अपने दाँत उसकी चूची मे गाड़ा दिए थे और मलिका ने उसके बाल पकड़ उसका सर अपने सीने से अलग कर दिया।

"साली,रांड़ तुझे कितनी बार कहा है कि मेरी पैदाइश या मा के बारे मे कुछ मत बोला कर।ये ले।",उसने उसकी चूत के दाने पे चिकोटी काट ली।

"ऊओ.... उऊउककच...!",जवाब ने उसने भी अपने दाँत जब्बार की कलाई पे गाड़ा दिए और दोनो जंगलियो की तरह अपनी हवस मिटाने लगे।

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मेनका पूरी नंगी अपने बिस्तर पे पड़ी थी और वो अजनबी उसकी खुली टांगो के बीच उसकी चिकनी चूत को चाट रहा था और उसके हाथ उसकी चूचियो को दबा रहे थे।

"...आ....आह...",मेनका के बदन को इस तरह का मज़ा मिले एक महीने से भी ज़्यादा हो गया था। उसने उसका सर अपनी भारी जाँघो मे भींच लिया और अपने हाथो से उसके मुँह को चूत पे और दबाने लगी। उसकी आँहे और उस अजनबी की जीभ की लपलपहट की आवाज़े कमरे के सन्नाटे को दूर कर रही थी।
मैत्री रचित कहानी.

मेनका का बदन उस अजनबी की जीभ की हरकतों को बर्दाश्त नही कर पाया और वो झड़ गयी। वो इंसान उसकी चूत से बहते सारे पानी को चाट गया। अब उसकी बारी थी,वो उठा और अपना लंड अपने हाथ मे ले मेनका के सीने के दोनो तरफ अपने घुटनो को बेड पे टीका कर बैठ गया,उसका लंड बिल्कुल मेनका की आँखों के सामने था। उसने एक और तकिया अपने सर के नीचे लगाया और उस अजनबी के झांटो से घिरे लंड को अपने मुँह मे लेकर चूसने लगी। और उस लंड के पसीनोवाली स्मेल क अपने फेफ्सा में भरने लगी।

उसके हाथ उसके बालो भरे अंडो को हौले-हौले दबा रहे थे। उस इंसान की आँखे बंद हो गयी और उसने अपने हाथों से उसका सर पकड़ लिया और उसके मुँह को चोदने लगा। थोड़ी देर तक वो ऐसे ही उसके मुँह का मज़ा लेता रहा पर जैसे ही उसके अंडो मे उबलता हुआ सैलाब बाहर आने को हुआ उसने अपना लंड बाहर खींच लिया। मेनका ने ऐसे देखा जैसे कह रही हो कि ये बात उसे बिल्कुल पसंद नही आई।


बने रहिये.........................
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वो उसकी टांगो के बीच बैठ गया और अपना लंड उसकी चूत पे लगा कर एक धक्का मारा," आ....हह..हा,अन्न्‍णणन्!",मेनका की आँखे खुशी से बंद हो गयी और वो लेटी,आँहे भरती हुई उसके धक्को का मज़ा लेने लगी। वो वैसे ही घुटनो पे बैठा कभी उसकी चूचियो को मसलता,कभी उसके खूबसूरत चेहरे को सहलाता तो कभी उसकी जांघे सहलाता उसे चोद्ता रहा।


फिर उसने मेनका की दाई जाँघ को पकड़ कर उसे उसकी बाई जाँघ पे इस तरह कर दिया कि अब उसका उपरी बदन तो सीधा था पर निचला हिस्सा मानो करवट लिए था और उसका लंड उसकी चूत चोद्ते हुए उसकी भारी गांड से भी टकरा रहा था। वो लंड पूरा बाहर निकलता और फिर जड़ तक अंदर घुसेड देता। मैत्री द्वारा रचित.

मेनका अब तक दो बार झड़ चुकी थी और उसकी पानी से सराबोर चूत मे लंड फूच-फूच करता अंदर-बाहर हो रहा था। वो अजनबी झुक कर उसके होठ चूमने लगा और उसकी छातिया दबाने लगा। मेनका का जोश दुगुना हो गया था। वो उसके होंठो को छोड़ कर उठा और बिना लंड निकाले उसके बदन को घुमा कर उसे डॉगी पोज़िशन मे ले आया और उसके उपर इस तरह झुक गया कि उसका पेट और सीना मेनका की पीठ और कमर से पूरा चिपक गया।
अब  मेनका घुटनो के बल थी और उसका चेहरा तकिये मे छुपा था और वो अजनबी पीछे से उस से चिपक उसकी मस्त चूचियो को दबाते हुए और उसके गालों और कानो मे जीभ फिराते हुए उसे चोद रहा था। उसने थोड़ी देर तक उसे ऐसे ही चोदा,फिर एक हाथ उसकी बोबले से अलग किया और उसकी चूत के दाने पे लगा रगड़ने लगा। मेनका अपनी चूत पे इस दोहरे हमले से पागल हो गयी और आँहे भरते हुए अपनी कमर हिलाने लगी और झड़ गयी। उसके झड़ते ही उस इंसान ने भी ज़ोरदार धक्के लगा लगा कर उसकी चूत मे अपना पानी छोड़ दिया।

झड़ते ही मेनका बिस्तर पर निढाल हो गिर पड़ी और वो भी वैसे ही उसकी पीठ पे गिर उसकी गर्दन मे मुँह छुपाये अपनी साँसे संभालने लगा।

अगले करीब 2 घंटो तक दोनो ऐसे ही अलग-अलग तरीक़ो से एक दूसरे के बदन से खेलते रहे।आख़िर कौन है ये अजनबी जिस से मेनका इतनी बेताकल्लूफ़ी से चुद रही है? अरे वो क्या,मेनका बिस्तर से उठ गयी है और कही जा रही है। चलिए देखे कहा जा रही है!

ये तो राजासाहब की स्टडी रूम मे जा रही है,और,और ये क्या,वो तिजोरी खोल रही है! सारे इल्लीगल प्रॉपर्टीस वाले पेपर्स निकाल लिए है उसने और अब वापस अपने कमरे मे आ गयी है जहा वो अजनबी कपड़े पहन रहा है।,"ये लो।।"

"सारे हैं ना?"

"हां।"


क्या कर रही है मेनका? क्या इसके चेहरे के पीछे भी कोई नया चेहरा है? क्या वो उतनी शरीफ सच मे है या एक बहुत गहरा नाटक खेल रही है? उफ़फ! मेरा तो सर चकरा रहा है! पर परेशान ना हो दोस्तो,कहानी के अंत तक ये राज़ भी खुल जाएगा।

उसने पेपर्स लेकर नंगी मेनका को बाहों मे भर लिया और उसे कुछ बहुत धीमी आवाज़ मे समझाने लगा जिसे मेनका पूरे ध्यान से सुनती रही। इसके बाद दोनो करीब 5 मिनिट तक एक दूसरे को सहलाते हुए चूमते रहे। फिर वो अजनबी जैसे आया था वैसे ही चला गया।

"सेशाद्री अंकल,मुझे जब्बार सिंग से मिलना है?"
मैत्री की रचना है.

"ये आप क्या कह रही है? रानी साहिबा!"

"जी,अंकल,मुझे उस से मिलना ही है।"

"आख़िर क्यों?"

"वो मैं आपको बाद मे बताउंगी। पहले आप उस से मेरी मुलाकात करवाईए।"

"ठीक है,जैसा आप कहें।"

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आज के लिए बस यही तक दोस्तों.

फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ. तब तक के लिए मैत्री की ओर से जय भारत.
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