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"ठीक है।"
कहते हैं कि शातिर से शातिर मुजरिम से भी एक ग़लती कर देता है और यहा तो कल्लन ने 3-3 ग़लतिया कर दी थी। पहली ग़लती उसने उस दिन की थी जब बॅंगलुर से आने के बाद मलिका ने उसे फोन किया और उसने उसे अपना शहर का ठिकाना बताया। वो कुछ दीनो मे अपने ठिकाने बदल देता था,पर मलिका उस से चुद ने के लिए लगभग उसके हर ठिकाने पे आ चुकी थी। दूसरी ग़लती उसने ये की,कि अपना जाना कल पे टाल दिया।
इन दोनो ग़लतियो का उसे खामियाज़ा नही भुगतना पड़ता अगर वो तीसरी ग़लती नही करता और तीसरी ग़लती थी कि वो चोवोक बाज़ार के मल्टिपलेक्स मे 11:30 बजे का फिल्म शो देखने चला गया। आपको लग रहा होगा कि कल्लन कोई कॉलेज स्टूडेंट तो नही है जो बंक मार कर फिल्म देखना उसकी ग़लती हो गयी। पर नही दोस्तो,देखिए कैसे उस फिल्म के चलते कल्लन अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुश्किल मे फँसता है।
दुष्यंत वर्मा का जासूस मनीष अपनी गर्लफ्रेंड पूजा के साथ फिल्म देख रहा था या यू कहें पूजा को चूमने-चाटने के बीच वो फिल्म भी देख रहा था। "आहह...इंटर्वल होने वाला है,लाइट्स जल जाएँगी,अब छोडो ना!",पूजा ने उसे परे धकेल दिया। मैत्री की रचना.
"अच्छा बाबा!",तभी लाइट्स जल गयी,"क्या लॉगी कोल्ड ड्रिंक या कॉफी?",मनीष खड़ा होकर नीचे उतरने लगा।उनकी सीट्स सबसे आख़िरी रो की कॉर्नर मे थी।
"कोल्ड ड्रिंक ले आना और साथ में पॉपकॉर्न भी।"
"ओके।"
शो हाउसफुल जा रहा था और रेफ्रेशमेंट काउंटर्स पे भी काफ़ी भीड़ थी। मनीष एक लाइन मे खड़ा अपनी बारी आने का इंतेज़ार करता हुआ इधर-उधर देख रहा था कि तभी उसकी नज़र साथ वाली लाइन मे खड़े एक लंबे शख्स पे पड़ी। ये तो वही आदिवासी के मोबाइल की फोटो वाला इंसान लग रहा था जिसकी उसे तलाश थी। इसने अपना हुलिया बदला हुआ है। ये फ्रेंच कट दाढ़ी रख ली है....ये वही है। मैत्री की पेशकश.
पर फिर उसे लगा कि पहले बात कन्फर्म करनी चाहिये। उसने तुरंत दुष्यंत वर्मा को फोन लगाया,इस केस के बारे मे एजेन्सी मे बस यही दोनो इस केस के बारे मे जानते थे,"सर,मैं मनीष।।"और उसने पूरी बात बता दी।
"मनीष,किसी भी तरह उस आदमी का फोटो अपने मोबाइल केमरे से ले के मुझे भेजो। मैं यहा मुबई के ऑफीस मे हू। यही से दोनो फोटोस चेक कर के तुम्हे बताता हू।"
"मनीष पूजा के साथ फिर से फिल्म देखने लगा। वो शख्स उनसे 3 रो नीचे साथ वाले सीट्स के ब्लॉक की सेंटर कॉर्नर सीट पे बैठा था। मनीष पूजा को बाहों मे भर प्यार कर रहा था पर उसकी नज़र लगातार उस शख्स पे बनी हुई थी। उसका फोन बजा,"एस सर?"
"तुम सही हो मनीष,ये वही इंसान है। अब तुम एक काम करो। मैं तो वहा हू नही। अब तुम्हे ही सब संभालना है। मैं अभी यशवीर को खबर करता हू कि वो शहर पहुँचे और तुम साए की तरह इस आदमी के पीछे लगे रहो। मैं यश को तुम्हारा नंबर भी दे देता हू। ऑफीस फोन करता हू,एक आदमी हॉल के बाहर शो ख़त्म होने के बाद वो किट तुम्हे दे जाएगा,ठीक है? सब काफ़ी सावधानी से संभालना बेटा। इस आदमी को हमे अपनी पकड़ मे लेना है। पोलीस के पास नही जा सकते क्यूकी हमारे पास एक भी पुख़्ता सबूत नही है। इसीलिए पहले हमे ही इस से सब उगलवाना होगा,ओके,बेटा,बेस्ट ऑफ लक!"
"थॅंक्स,सर।" मैत्री की प्रस्तुति.
"क्या यहा भी काम की बातें कर रहे हो?"
"सॉरी,डार्लिंग।",मनीष ने नाराज़ पूजा को बाहों मे भर के चूमा और उसके टॉप के उपर से ही उसकी चूचिया दबा दी।
"अफ....बदमाश....चुतिया",पूजा मज़े मे फुसफुसा,दोनो इसी तरह फिल्म ख़त्म होने तक एक दूसरे से चिपते रहे।
क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।
आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ.
तब तक के लिए मैत्री की तरफ से जय भारत.
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दोस्तों आपके मनोरंजन के लिए दो अपडेट्स दिए है............
पढ़े और अपने मंतव्यो दे......................
शुक्रिया दोस्तों..................
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(07-04-2026, 05:23 PM)@@004 Wrote: उत्तम अपडेट
शुक्रिया दोस्त
बने रहिये
कहानी को ख़तम होने के लिए कुछ ही एपिसोड्स बाकी है..................
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चलिए कहानी में आगे बढ़ते है
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पार्ट--13
गतान्क से आगे.....................
पिक्चर ख़त्म होने ही वाली थी,"पूजा!",मनीष अपनी गर्लफ्रेंड को बाहों मे भरे हुए उसके कान मे फुसफुसाया।
"ह्म्म!"
"वो 3 रो नीचे सेंटर कॉर्नर वाली सीट पे ब्लॅक शर्ट वाला इंसान दिख रहा है?"
"कौन? वो जो हस रहा है?",पूजा ने मनीष के आगोश मे ही गर्दन घुमा कर देखा।
"हा,वही।"
"कौन है वो?" मैत्री की प्रस्तुति है.
"एक क्रिमिनल जिसकी मैं तलाश कर रहा था। आज इसे पकड़ने मे मेरी हेल्प करोगी?"
"ये भी कोई पुच्छने की बात है। क्या करना है?"
"मैं अभी निकल कर पार्किंग से बाइक निकलता हू वरना बाद मे बहुत भीड़ हो जाएगी और ये कही हमसे बच के ना निकल जाए। तुम उस से कुछ दूरी पे रह उसके पीछे-पीछे निकलना और देखना कि वो किस तरफ जाता है। अगर पार्किंग की ओर आता है तो मुझे फोन करना, नही तो बस इसके पीछे सावधानी से चलती जाना। मैं बाइक लेकर बाहर मैं गेट पे मिलूँगा।"
"ठीक है।"
मनीष हॉल से निकल भागता हुआ पार्किंग की ओर जा रहा था कि उसका मोबाइल बजा,"हेलो।"
"मनीष, मैं अमीन। किट लाया हू।"
"वेरी गुड यार। इधर पार्किंग मे आजा।"
थोड़ी ही देर बाद एक बेल्ट-बॅग जिसमे एक नाइलॉन की रस्सी,एक हथकड़ी,एक क्लॉथ नॅपकिन और ई क्लॉरोफॉर्म की शीशी उसके हाथों मे थी। यही वो किट थी जिसे मनीष ने अपने गले मे लटका लिया और बाइक स्टार्ट कर तुरंत मैं गेट पे पहुँचा। इतनी देर मे शो ख़त्म हो गया था और सारी भीड़ हलके से बाहर जा रही थी। गेट पे उसे पूजा दिखी,"मनीष,वो देखो उधर। वो उस ऑटो मे बैठ रहा है।", वो उसके पीछे बैठ गयी और मनीष ने बाइक कल्लन के ऑटो के पीछे लगा दी।
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राजासाहब मेनका के साथ उसके मायके से ग्यारह बजे राजपुरा पहुँचे और सीधा ऑफीस गये। अपने चेंबर मे उन्होने अपनी बहू को हमेशा की तरह बाहों मे भर कर चूमना शुरू कर दिया और उसने भी हमेशा की तरह घबरा कर उनसे छूटने की कोशिश।
"अफ...तुम बिल्कुल पागल हो! किसी दिन कोई हमे ज़रूर देख लेगा।",उसने उनके बाल पकड़ उनका चेहरा अपनी गर्दन से अलग किया।
"तुम बेकार मे इतना डरती हो। कुछ नही होगा।",उनके हाथ उसकी नंगी कमर को सहला रहे थे। "घबराव मत। अभी हमारे पास वक़्त नही है,शहर जाना है अपने वकील से मिलने। कुछ ज़रूरी काम है।"
"क्या...? फिर से जा रहे हो।",मेनका ने गुस्से से पूछा।
"लो,अभी तो हमे अलग कर रही थी और अब जा रहे हैं तो नाराज़ हो रही हो।"
"हम तो यहा ऑफीस मे मना करते हैं। घर पे थोड़े ही ना रोकते हैं।",उसने उनके सीने पे सर रख दिया।
राजासाहब हँसे और उसका चेहरा अपने हाथों मे ले उसके रसीले होंठ चूमने लगे। थोड़ी देर तक दोनो एक दूसरे को चूमते रहे, फिर राजासाहब ने उसके होठो को आज़ाद किया,"अच्छा,अब चलते हैं।"
"जल्दी आना।" मैत्री रचित.
"ओके।"
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बने रहिये कहानी जारी है...........................
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जब दुष्यंत वर्मा का फोन राजासाहब के पास आया तो वो अपने वकील को अपनी नयी वसीयत जिसमे उन्होने अपना सब कुछ मेनका के नाम कर दिया था,लिखवा रहे थे। मैत्री की प्रस्तुति.
"यार,यश! तेरे कहे मुताबिक केवल मनीष उसके पीछे है। मैं उसकी मदद के लिए किसी और को नही भेज रहा हू। ऐसे काम मे बहुत ख़तरा होता है। तुम कहो तो मैं कुछ और लोगो को भी इस काम पे लगा देता हू।"
"नही,दुष्यंत,ऐसा नही करना। फ़िक्र मत करो,मनीष को मैं किसी भी तरह के ख़तरे मे नही पड़ने दूँगा। तुम मुझे उसका नंबर दो, मैं उस से बात कर के आगे की प्लॅनिंग करता हूँ।"
"ओके,यश,ये ले उसका नंबर।"
कल्लन का ऑटो एक ट्रॅफिक सिग्नल पर खड़ा था। उसके दो गाड़ियाँ पीछे मनीष और पूजा भी बाइक पे थे,"पूजा,तुम यहा से ऑटो लेकर घर चली जाओ। पता नही ये आदमी कहा जा रहा है।आगे ख़तरा भी हो सकता है।"
"मनीष,मुझे बहुत डर लग रहा है। मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी।"
"बात समझो,पूजा,मुझे कुछ नही होगा। तुम घर जाओ। मैं तुम्हे फोन करूँगा। चलो, वो देखो वो ऑटो खाली है...जाओ।"
"मनीष।"
"मुझे कुछ नही होगा,डार्लिंग,फ़िक्र मत करो,देखो बत्ती हरी होने वाली है। चलो जल्दी से वो ऑटो पकड़ो।"
"ठीक है। मैं तुम्हारे फोन का इंतेज़ार करूँगी।"
मनीष अब अकेला ही कल्लन का पीछा करने लगा। मोबाइल बजा तो उसने हेंड्सस्फ्री ऑन कर दिया,"हेलो।"
"हम,यशवीरसिंग बोल रहे हैं,मनीष,तुम इस वक़्त कहा हो?"
"नमस्ते,सर, लगता है ये आदमी चोवोक बाज़ार की ओर जा रहा है। मैं बाइक से उसके ऑटो का पीछा कर रहा हू।"
"ठीक है,हम भी वही पहुँचते हैं।",और फोन काट गया।
थोड़ी देर बाद मनीष राजासाहब के साथ उनकी स्कॉर्पियो मे बैठा था, गाड़ी 'फियेस्टा' केफे केसाम्ने खड़ी थी जहा थोड़ी देर पहले कल्लन गया था। थोड़ी देर बाद एक कार रुकी और मलिका उसमे से उतर कर केफे के अंदर चली गयी।
"सर,ये तो..मादरचोद-" मैत्री की रचना.
"हा,मनीष। अब तो शक़ नही पक्का यकीन है कि ये इंसान जब्बार का साथी है और हमारे बेटे की मौत मे इसका हाथ है।",तभी दोनो केफे से बाहर आकर मलिका की कार मे बैठ के कही जाने लगे। मनीष दौड़ कर अपनी बाइक पे चला गया और वो और राजासाहब एक बार फिर कल्लन का पीछा करने लगे। मलिका ने कार एक सस्ते से होटेल के सामने रोक दी और कल्लन के साथ होटल के अंदर चली गयी।
होटेल के कमरे के अंदर मलिका और कल्लन एक दूसरे के कपड़े उतारते हुए पागलों की तरह चूम रहे थे। कितना तड़पी हू ज़ालिम तेरे लिए।",मलिका ने कल्लन की पॅंट एक झटके मे उतार दी और झुक कर उसका लंड अपने मुँह मे भर लिया। कल्लन खड़े-खड़े ही उसके सर को पकड़ उसका मुँह चोदने लगा। मलिका ने लंड चूस्ते हुए उसकी कमर को अपनी बाहों मे कस लिया और अपनी एक उंगली उसकी गांड के छेद मे डाल दी।
बने रहिये आगे जारी है...................
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"एयेए,आहह।",कल्लन जोश मे कराहा। उसने अपनी कमर और तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया। मलिका ने उसका लंड छोड़ दिया और उसे बिस्तर पे धकेल दिया और फिर उसकी छाती पे चढ़ अपनी चूत उसके मुँह पर रख दी और एक बार फिर उसका लंड अपने मुँह मे ले चूसने लगी। कल्लन ने उसकी गांड को मसल्ते हुए अपनी जीभ उसकी चूत मे डाल दी और लगा उसके दाने को चाटने।
मलिका जोश मे अपनी कमर हिलाने लगी और मस्त होकर आहें भरने लगी। कल्लन ने उसे मज़बूती से थाम रखा था और अपनी जीभ तेज़ी से उसकी चूत मे फिरा रहा था। अचानक मलिका ने अपनी चूत उसके चेहरे पे दबा दी अपने मुँह से लंड निकाल अपना चेहरा उसकी झांटो मे छुपा लिया,वो झड़ गयी थी। कल्लन उसकी चूत के छोड़े हुए पानी को चाट रहा था। मलिका थोड़ा होश मे आई तो उसने उसके लंड को पकड़ ज़ोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया और लंड के सुपारे को अपनी जीभ से छेदने लगी। अब कल्लन की बारी थी,उसकी कमर अपने आप हिलने लगी। मलिका ने उसके अंडो को हाथो मे भर कर दबाया और उसका पूरा लंड अपने मुँह मे भर लिया। लंड उसके मुँह से होता हुआ उसके कंठ तक चला गया तो वो मुँह उपर-नीचे कर अपने मुँह को चोदने लगी।
मलिका के हाथो का अंडो पे दबाव और उसके मुँह की हरकतों ने तुरंत ही कल्लन का पानी निकाल दिया,जिसे मलिका ने खुशी से निगल लिया। थोड़ी देर तक दोनो वैसे ही पड़े रहे,कल्लन उसकी गांड सहलाता रहा और मलिका उसके लंड को हौले से चाटती रही। कुछ ही देर मे लंड फिर से खड़ा होने लगा तो मलिका घूम कर अब कल्लन के उपर लेट गयी और उसे चूमने लगी। कल्लन ने उसकी नंगी पीठ और कमर को सहलाने लगा।
उसने उसे बाहों मे भरा और करवट ले उसके उपर चढ़ गया। उसकी गर्दन चूमते हुए उसने अपने हाथों मे उसकी चूचिया भर ली और दबाने लगा। उसने उनके निपल्स को अपनी उंगलियो मे भर कर मसला औरफिर एक चूची को अपने मुँह मे भर लिया साथ दूसरे से उसकी दूसरी चूची मसलने लगा।
"..ऊ..ऊओह...और दबा ज़ालिम...और ज़ोर से...अब इसवाली को चूस ना।",उसने अपने हाथो से अपनी एक चूची उसके मुँह मे डाल दी।
"आनन्न...आनन्नह...हान्न्न...ऐसे ही ...",मलिका ने अपना हाथ नीचे ले जाकर उसके लंड को पकड़ कर अपनी चूत पे लगा लिया और घुसाने लगी। कल्लन ने एक धक्का मारा और लंड आधा अंदर चला गया।,"आईईयईी।।।",मलिका चीखी। मैत्री की पेशकश.
दूसरे धक्के मे लंड पूरा अंदर चला गया और फिर कल्लन ने उसकी चुदाई शुरू कर दी। दोनो एक दूसरे से चिपटे एक दूसरे को चूम रहे थे। कल्लन कभी उसके चेहरे तो कभी उसकी चूचियो को चूमता और दबाता और मलिका भी अपने नाखूनओ को उसकी पीठ और गांड मे गाडती हुई उसकी किस का जवाब देती। मलिका कल्लन की गांड जोरो से मार रही थी। उसने अपनी टांगे उसकी कमर पे लपेट ली थी और कमर हिलाकर उसके धक्कों की ताल से ताल मिलाते हुए चुद रही थी।
धक्कों की रफ़्तार बढ़ने लगी और थोड़ी ही देर मे मलिका की चूत ने पानी छोड़ दिया। कल्लन ने जोश मे उसकी एक चूची पे अपने होंठ कस दिए और उसकी कमर झटके खाने लगी और उसका लंड मलिका की चूत को अपने पानी से भरने लगा।
क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
दोस्तों आज के लीये बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ.
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दोस्तों आपके मनोरंजन के लिए मैंने 3 अपडेट्स दिए है.
कृपया पढ़े और आनंद लीजिये अगर कोमेंट करने जैसा लगे तो कोमेंट करे...............
मैत्री..........
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(09-04-2026, 04:23 PM)@@004 Wrote: सुहावना अपडेट
शुक्रिया दोस्त
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चलिए दोस्तों अब थोडा आगे बढ़ा जाये..............
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गतान्क से आगे.....................
पिक्चर ख़त्म होने ही वाली थी,"पूजा!",मनीष अपनी गर्लफ्रेंड को बाहों मे भरे हुए उसके कान मे फुसफुसाया।
"ह्म्म!"
"वो 3 रो नीचे सेंटर कॉर्नर वाली सीट पे ब्लॅक शर्ट वाला इंसान दिख रहा है?"
"कौन? वो जो हस रहा है?",पूजा ने मनीष के आगोश मे ही गर्दन घुमा कर देखा।
"हा,वही।"
"कौन है वो?"
"एक क्रिमिनल जिसकी मैं तलाश कर रहा था। आज इसे पकड़ने मे मेरी हेल्प करोगी?"
"ये भी कोई पुच्छने की बात है। क्या करना है?"
"मैं अभी निकल कर पार्किंग से बाइक निकलता हू वरना बाद मे बहुत भीड़ हो जाएगी और ये कही हमसे बच के ना निकल जाए। तुम उस से कुछ दूरी पे रह उसके पीछे-पीछे निकलना और देखना कि वो किस तरफ जाता है। अगर पार्किंग की ओर आता है तो मुझे फोन करना, नही तो बस इसके पीछे सावधानी से चलती जाना। मैं बाइक लेकर बाहर मैं गेट पे मिलूँगा।"
"ठीक है।"
मनीष हॉल से निकल भागता हुआ पार्किंग की ओर जा रहा था कि उसका मोबाइल बजा,"हेलो।"
"मनीष, मैं अमीन। किट लाया हू।"
"वेरी गुड यार। इधर पार्किंग मे आजा।" मैत्री की पेशकश.
थोड़ी ही देर बाद एक बेल्ट-बॅग जिसमे एक नाइलॉन की रस्सी,एक हथकड़ी,एक क्लॉथ नॅपकिन और ई क्लॉरोफॉर्म की शीशी उसके हाथों मे थी। यही वो किट थी जिसे मनीष ने अपने गले मे लटका लिया और बाइक स्टार्ट कर तुरंत मैं गेट पे पहुँचा। इतनी देर मे शो ख़त्म हो गया था और सारी भीड़ हलके से बाहर जा रही थी। गेट पे उसे पूजा दिखी,"मनीष,वो देखो उधर। वो उस ऑटो मे बैठ रहा है।", वो उसके पीछे बैठ गयी और मनीष ने बाइक कल्लन के ऑटो के पीछे लगा दी।
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राजासाहब मेनका के साथ उसके मायके से ग्यारह बजे राजपुरा पहुँचे और सीधा ऑफीस गये। अपने चेंबर मे उन्होने अपनी बहू को हमेशा की तरह बाहों मे भर कर चूमना शुरू कर दिया और उसने भी हमेशा की तरह घबरा कर उनसे छूटने की कोशिश।
"अफ...तुम बिल्कुल पागल हो! किसी दिन कोई हमे ज़रूर देख लेगा।",उसने उनके बाल पकड़ उनका चेहरा अपनी गर्दन से अलग किया।
"तुम बेकार मे इतना डरती हो। कुछ नही होगा।",उनके हाथ उसकी नंगी कमर को सहला रहे थे। "घबराव मत। अभी हमारे पास वक़्त नही है,शहर जाना है अपने वकील से मिलने। कुछ ज़रूरी काम है।"
"क्या...? फिर से जा रहे हो।",मेनका ने गुस्से से पूछा।
"लो,अभी तो हमे अलग कर रही थी और अब जा रहे हैं तो नाराज़ हो रही हो।"
"हम तो यहा ऑफीस मे मना करते हैं। घर पे थोड़े ही ना रोकते हैं।",उसने उनके सीने पे सर रख दिया।
राजासाहब हँसे और उसका चेहरा अपने हाथों मे ले उसके रसीले होंठ चूमने लगे। थोड़ी देर तक दोनो एक दूसरे को चूमते रहे, फिर राजासाहब ने उसके होठो को आज़ाद किया,"अच्छा,अब चलते हैं।"
"जल्दी आना।"
"ओके।"
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जब दुष्यंत वर्मा का फोन राजासाहब के पास आया तो वो अपने वकील को अपनी नयी वसीयत जिसमे उन्होने अपना सब कुछ मेनका के नाम कर दिया था,लिखवा रहे थे।
"यार,यश! तेरे कहे मुताबिक केवल मनीष उसके पीछे है। मैं उसकी मदद के लिए किसी और को नही भेज रहा हू। ऐसे काम मे बहुत ख़तरा होता है। तुम कहो तो मैं कुछ और लोगो को भी इस काम पे लगा देता हू।"
"नही,दुष्यंत,ऐसा नही करना। फ़िक्र मत करो,मनीष को मैं किसी भी तरह के ख़तरे मे नही पड़ने दूँगा। तुम मुझे उसका नंबर दो, मैं उस से बात कर के आगे की प्लॅनिंग करता हूँ।" मैत्री की रचना.
"ओके,यश,ये ले उसका नंबर।"
कल्लन का ऑटो एक ट्रॅफिक सिग्नल पर खड़ा था। उसके दो गाड़ियाँ पीछे मनीष और पूजा भी बाइक पे थे,"पूजा,तुम यहा से ऑटो लेकर घर चली जाओ। पता नही ये आदमी कहा जा रहा है।आगे ख़तरा भी हो सकता है।"
"मनीष,मुझे बहुत डर लग रहा है। मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी।"
"बात समझो,पूजा,मुझे कुछ नही होगा। तुम घर जाओ। मैं तुम्हे फोन करूँगा। चलो, वो देखो वो ऑटो खाली है...जाओ।"
"मनीष।"
"मुझे कुछ नही होगा,डार्लिंग,फ़िक्र मत करो,देखो बत्ती हरी होने वाली है। चलो जल्दी से वो ऑटो पकड़ो।"
"ठीक है। मैं तुम्हारे फोन का इंतेज़ार करूँगी।"
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बने रहिये........................
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मनीष अब अकेला ही कल्लन का पीछा करने लगा। मोबाइल बजा तो उसने हेंड्सस्फ्री ऑन कर दिया,"हेलो।"
"हम,यशवीरसिंग बोल रहे हैं,मनीष,तुम इस वक़्त कहा हो?"
"नमस्ते,सर, लगता है ये आदमी चोवोक बाज़ार की ओर जा रहा है। मैं बाइक से उसके ऑटो का पीछा कर रहा हू।"
"ठीक है,हम भी वही पहुँचते हैं।",और फोन काट गया।
थोड़ी देर बाद मनीष राजासाहब के साथ उनकी स्कॉर्पियो मे बैठा था, गाड़ी 'फियेस्टा' केफे केसाम्ने खड़ी थी जहा थोड़ी देर पहले कल्लन गया था। थोड़ी देर बाद एक कार रुकी और मलिका उसमे से उतर कर केफे के अंदर चली गयी।
"सर,ये तो..मादरचोद-" मैत्री की रचना.
"हा,मनीष। अब तो शक़ नही पक्का यकीन है कि ये इंसान जब्बार का साथी है और हमारे बेटे की मौत मे इसका हाथ है।",तभी दोनो केफे से बाहर आकर मलिका की कार मे बैठ के कही जाने लगे। मनीष दौड़ कर अपनी बाइक पे चला गया और वो और राजासाहब एक बार फिर कल्लन का पीछा करने लगे। मलिका ने कार एक सस्ते से होटेल के सामने रोक दी और कल्लन के साथ होटल के अंदर चली गयी।
होटेल के कमरे के अंदर मलिका और कल्लन एक दूसरे के कपड़े उतारते हुए पागलों की तरह चूम रहे थे। कितना तड़पी हू ज़ालिम तेरे लिए।",मलिका ने कल्लन की पॅंट एक झटके मे उतार दी और झुक कर उसका लंड अपने मुँह मे भर लिया। कल्लन खड़े-खड़े ही उसके सर को पकड़ उसका मुँह चोदने लगा। मलिका ने लंड चूस्ते हुए उसकी कमर को अपनी बाहों मे कस लिया और अपनी एक उंगली उसकी गांड के छेद मे डाल दी।
"एयेए,आहह।",कल्लन जोश मे कराहा। उसने अपनी कमर और तेज़ी से हिलाना शुरू कर दिया। मलिका ने उसका लंड छोड़ दिया और उसे बिस्तर पे धकेल दिया और फिर उसकी छाती पे चढ़ अपनी चूत उसके मुँह पर रख दी और एक बार फिर उसका लंड अपने मुँह मे ले चूसने लगी। कल्लन ने उसकी गांड को मसल्ते हुए अपनी जीभ उसकी चूत मे डाल दी और लगा उसके दाने को चाटने। मैत्री की प्रस्तुति.
मलिका जोश मे अपनी कमर हिलाने लगी और मस्त होकर आहें भरने लगी। कल्लन ने उसे मज़बूती से थाम रखा था और अपनी जीभ तेज़ी से उसकी चूत मे फिरा रहा था। अचानक मलिका ने अपनी चूत उसके चेहरे पे दबा दी अपने मुँह से लंड निकाल अपना चेहरा उसकी झांटो मे छुपा लिया,वो झड़ गयी थी। कल्लन उसकी चूत के छोड़े हुए पानी को चाट रहा था। मलिका थोड़ा होश मे आई तो उसने उसके लंड को पकड़ ज़ोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया और लंड के सुपारे को अपनी जीभ से छेदने लगी। अब कल्लन की बारी थी,उसकी कमर अपने आप हिलने लगी। मलिका ने उसके अंडो को हाथो मे भर कर दबाया और उसका पूरा लंड अपने मुँह मे भर लिया। लंड उसके मुँह से होता हुआ उसके कंठ तक चला गया तो वो मुँह उपर-नीचे कर अपने मुँह को चोदने लगी।
मलिका के हाथो का अंडो पे दबाव और उसके मुँह की हरकतों ने तुरंत ही कल्लन का पानी निकाल दिया,जिसे मलिका ने खुशी से निगल लिया। थोड़ी देर तक दोनो वैसे ही पड़े रहे,कल्लन उसकी गांड सहलाता रहा और मलिका उसके लंड को हौले से चाटती रही। कुछ ही देर मे लंड फिर से खड़ा होने लगा तो मलिका घूम कर अब कल्लन के उपर लेट गयी और उसे चूमने लगी। कल्लन ने उसकी नंगी पीठ और कमर को सहलाने लगा।
उसने उसे बाहों मे भरा और करवट ले उसके उपर चढ़ गया। उसकी गर्दन चूमते हुए उसने अपने हाथों मे उसकी चूचिया भर ली और दबाने लगा। उसने उनके निपल्स को अपनी उंगलियो मे भर कर मसला औरफिर एक चूची को अपने मुँह मे भर लिया साथ दूसरे से उसकी दूसरी चूची मसलने लगा।
"..ऊ..ऊओह...और दबा ज़ालिम...और ज़ोर से...अब इसवाली को चूस ना।",उसने अपने हाथो से अपनी एक चूची उसके मुँह मे डाल दी।
"आनन्न...आनन्नह...हान्न्न...ऐसे ही ...",मलिका ने अपना हाथ नीचे ले जाकर उसके लंड को पकड़ कर अपनी चूत पे लगा लिया और घुसाने लगी। कल्लन ने एक धक्का मारा और लंड आधा अंदर चला गया।,"आईईयईी।।।",मलिका चीखी। फनलवर रचित.
दूसरे धक्के मे लंड पूरा अंदर चला गया और फिर कल्लन ने उसकी चुदाई शुरू कर दी। दोनो एक दूसरे से चिपटे एक दूसरे को चूम रहे थे। कल्लन कभी उसके चेहरे तो कभी उसकी चूचियो को चूमता और दबाता और मलिका भी अपने नाखूनओ को उसकी पीठ और गांड मे गाडती हुई उसकी किस का जवाब देती। मलिका कल्लन की गांड जोरो से मार रही थी। उसने अपनी टांगे उसकी कमर पे लपेट ली थी और कमर हिलाकर उसके धक्कों की ताल से ताल मिलाते हुए चुद रही थी।
धक्कों की रफ़्तार बढ़ने लगी और थोड़ी ही देर मे मलिका की चूत ने पानी छोड़ दिया। कल्लन ने जोश मे उसकी एक चूची पे अपने होंठ कस दिए और उसकी कमर झटके खाने लगी और उसका लंड मलिका की चूत को अपने पानी से भरने लगा।
क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
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दोस्तों आज के लिए बस यही तक. फिर मिलेंगे एक नए अध्याय के साथ. तब तक के लिए मैत्री की ओर से...................
जय भारत.
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ये भाग तो कल ही पढ़ लिया था।।
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(10-04-2026, 04:34 PM)@@004 Wrote: ये भाग तो कल ही पढ़ लिया था।।
ओह्ह्ह्ह सो सोरी दोस्तों.....................
यही होता है जब दो कहानीया एक साथ चलते है तो इंग्लिश और हिंदी पता नहीं रहता कहा तक लिखा था एक का इधर डुप्लीकेट ही जाता है ..................
माफ़ी चाहूंगी आप सब की ..............................
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चलिए दोस्तों कहानी में आगे बढ़ते है...............
आप लोगो की माफ़ी चाहती हूँ की कल मैंने पूरा अपडेट्स डुप्लीकेट कर दिया जिसकी वजह से आप सब का समय बर्बाद हुआ होगा....................
शुक्रिया दोस्तों बने रहने के लिए
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पार्ट--14
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
होटेल के बाहर मनीष राजासाहब के साथ उनकी कार मे बैठा उन्हे अपनी किट दिखा रहा था। "और ये क्लॉरोफॉर्म है सर जिसके सहारे हम टारगेट को बेहोश कर अपने क़ब्ज़े मे ले सकते हैं।"
"तुम लोगो को ये सब इस्तेमाल करने की क़ानूनी इजाज़त है या नही?"
"नही,सर,पर इस जैसे लोगो को पकड़ने के लिए ये सब उसे करना पड़ता है।",मनीष मुस्कुराया। मैत्री की पेशकश[b]।[/b]
"वो देखिए सर,दोनो बाहर आ रहे हैं, मैं अपनी बाइक पे जाता हू।",मनीष दरवाज़ा खोल कर तेज़ी से अपनी बाइक पे चला गया,उसकी किट वही कार मे छूट गयी थी।
कल्लन और मलिका फिर से उसकी कार मे बैठ कर चल पड़े और उनके पीछे-पीछे राजासाहब और मनीष। अब उनकी कार शहर से बाहर जाने वाले रास्ते पे भाग रही थी। राजासाहब ने ड्राइव करते हुए मेनका को फोन लगाया,शाम हो चुकी थी और वो उनका इंतेज़ार कर रही होगी। उन्हे पता नही था कि इस आदमी को पकड़ने मे उन्हे कितना समय लगेगा, "हेलो, हम यशवीर बोल रहे हैं। आज रात हम वापस नही आएँगे।"
"ये क्या बात हुई! मैं यहा तुम्हारा इंतेज़ार कर रही हूँ और तुम हो कि...बस! आख़िर ऐसा कौन सा काम है वकील साहब से?"
"अरे बाबा, आ गया है ऐसा कुछ काम। नाराज़ मत हो, कल सवेरे हम तुम्हारे पास पहुँच जाएँगे। ठीक है! चलो बाइ!"
उन्होने बात करते हुए भी अपनी निगाह उस कार से नही हटाई थी। एक लेफ्ट टर्न लेते ही वो एक धार्मिक जुलूस मे जा फँसे। मलिका की कार उस जुलूस के रोड पे आने से पहले ही निकल चुकी थी। राजासाहब ने फुर्ती से अपनी कार एक साइड की गली मे घुसा दी पर मनीष इतना फुर्तीला नही था। थोड़ी ही देर मे राजासाहब गलियो से होते हुए वापस मैं रोड पे थे। उन्होने कार तेज़ी से आगे बढ़ाते हुए उस कार को ढूँढना शुरू किया। करीब 3-4 मिनिट के बाद उन्हे वो कार नज़र आ गयी और वो उसके पीछे लग गये।
मनीष ने जैसे-तैसे उस जाम से बाइक निकली पर जैसे ही स्पीड बढाई,बाइक झटके खा के रुक गयी,"शिट! बहनचोद,अब इसे क्या हुआ?",उसने झट से उतर कर बाइक चेक की पर वो फिर भी स्टार्ट नही हुई। उसने तुरंत राजासाहब को फोन मिलाया,"सर,पहले तो जाम मे फँस गया और अब मेरी बाइक खराब हो गयी है। आप कहा पहुँच गये?"
राजासाहब के दिमाग़ ने तेज़ी से काम किया,आज जब्बार का ये आदमी उनके हाथ मरने वाला था और वो नही चाहते थे कि इस बात का कोई गवाह हो।
"मनीष,लगता है वो हमारे हाथ से निकल गया। उस जुलूस की वजह से हमने उन्हे खो दिया। तुम परेशान मत हो,अपनी बाइक ठीक करवा के वापस लौट जाओ। हम भी वापस जा रहे हैं,पर तुम्हारी जितनी भी तारीफ की जाए कम है,बेटे। तुमने कमाल का काम किया था पर शायद उसकी किस्मत उसके साथ है जो वो आज हमारे हाथ नही लगा।" मैत्री की रचना[b]।[/b]
"थॅंक्स,सर,पर अगर वो पकड़ मे आ जाता तब मुझे चैन मिलता।"
"कोई बात नही। चलो,अब फोन काट ते हैं। हम ड्राइव कर रहे हैं।"
"ओके,सर।"
मलिका की कार अब शहर से बाहर एक ऐसे इलाक़े मे आ गयी थी जो बहुत कम बसा हुआ था। वहा बस इक्का-दुक्का मकान थे और कुछ तो अभी बन ही रहे थे। कोई भी ऐसा घर नही लग रहा था जहा कि पूरा परिवार रहता हो। कार जिस रास्ते पे जा रही थी उसके एक तरफ बस खाली मैदान था और दूसरी तरफ बस 2 मकान थे और दोनो के बीच करीब 1/2 किमी का फासला था। मलिका की कार अब रोड के आख़िर मे दूसरे मकान के सामने रुक गयी,यही कल्लन का ठिकाना था।
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बने रहिये दोस्तों.......................
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राजासाहब ने एक किमी पीछे अपनी कर रोड से उतार कर लगाई,किट उठाई और कार से उतर कर पहले मकान के पीछे चले गये और दौड़ते हुए कल्लन के मकान के पिछवाड़े पहुँच गये। कार रुकी थी और कल्लन कार से उतर कर ड्राइवर साइड पे आ ड्राइविंग सीट पे बैठी मलिका से बात कर रहा था। राजासाहब मकान की बगल मे आ खड़े हो उन्हे छिप कर देखने लगे। मैत्री की पेशकश।
"आज तो बिल्कुल मन नही भरा, तू क्यू जा रहा है? रुक जा ना, सारी रात मज़ा करते हैं।"
"फिर कभी,बस 1-2 महीनो की बात है। अभी जाना ज़रूरी है।", उसने झुक कर मलिका को चूमा और एक हाथ उसके टॉप मे डाल कर उसकी छातियो को दबा दिया,"चल अब निकल।"
"तू बहुत ज़ालिम है।",उसने कल्लन का लंड पॅंट के उपर से ही दबाया और कार स्टार्ट कर घुमा दी। उसके जाते ही कल्लन घूम कर अपने घर के दरवाज़े पे आया और ताला खोलने लगा।
"एक्सक्यूस मी,सर।",आवाज़ सुन कर जैसे ही वो घुमा एक मज़बूत हाथ ने उसकी नाक पे एक कपड़ा दबा दिया। वो उस आदमी को परे धकेलने लगा पर उसे लग रहा था कि जैसे उसके बदन मे ताकत ही नही है,फिर भी उसने अपना पूरा ज़ोर लगा कर उस आदमी को धकेल दिया।
कल्लन का दिल दहल गया, राजासाहब जैसा ही था और वो उन्ही की तरह ताकतवर भी था। उसके धक्के से राजासाहब गिर पड़े। कल्लन ने पास पड़ी एक ईंट उठा कर उन पर फेंकी पर वो उसका वार बचा गये और अपनी एक लात उसकी टांगो पे मारी,कल्लन चारो खाने चित हो गया तो राजासाहब उसकी छाती पे चढ़ बैठे और क्लॉरोफॉर्म से भीगा नॅपकिन उसकी नाक पे लगा दिया। कल्लन अब पूरी तरह से बेहोश था।
राजा सहब ने उठ कर चारो तरफ देखा-कोई नही था। उन्होने अपनी कमर पे बँधी किट से हथकड़ी निकली और कल्लां को पेट के बल लिटा कर उसके हाथ पीछे लाकर उस से बाँध दिए। फिर वो दौस कर गये और अपनी कार ले आए और कल्लन को उसमे डाल कर वहा से निकल गये। मैत्री की प्रस्तुति।
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रात के 12 बज रहे थे और मेनका अपने बिस्तर पे पड़ी हुई थी,नींद उसकी आँखो से कोसो दूर थी। उसे राजासाहब की याद सता रही थी। उसने करवट लेकर आँखे बंद कर सोने की कोशिश की तो उसे कल रात की अपने माएके मे हुई उसकी चुदाई याद आ गयी। कैसे उसके ससुर ने उसकी मा के होते हुए उसे पूरी तरह से चोदा था। उनकी चुदाई याद करते ही उसकी चूत मचल उठी और उसने अपनी उंगली उस मे डाल दी। अपनी जांघे एक साथ रगड़ते हुए वो अपनी चूत मे उंगली अंदर-बाहर करने लगी। उसे अपने बदन पे अब ये नाइटी भी भारी लग रही थी। वो उठी और उसे उतार दिया,फिर एक बड़े से तकिये से चिपक कर उस पे अपनी छातिया दबाते हुए अपनी चूत के दाने को अपनी उंगली से रगड़ते हुए अपने जिस्म की आग को ठंडा करने लगी।
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जब कल्लन को होश आया तो उसने खुद को एक कमरे मे रस्सियों से बँधा हुआ और पूरा नंगा पाया। उसके सामने एक कुर्सी पे राजा यशवीर बैठे थे।
"आ गया होश! जब्बार के कुत्ते। चल अब भौंकना शुरू कर दे वरना तेरा बहुत बुरा हश्र करूँगा।"
"ये धमकी कही और देना राजा। मुझ पे ये सब खोखली बातें असर नही करती।"
"अच्छा! ठीक है।",राजासाहब उठे और एक सिगरेट जला ली।
कल्लन हँसने लगा,"कही भी इस से दाग दो राजा पर मैं अपना मुँह नही खोलूँगा।"
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बने रहिये दोस्तों...............
आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ तब तक के लिए मैत्री की तरफ से जय भारत।।
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दोस्तों ऊपर दो अपडेट्स दिए है
कृपया अपने मंतव्यो दे....................
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