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Incest खेल ससुर बहु का
बेहतरीन अपडेट
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(02-04-2026, 04:52 PM)@@004 Wrote: बेहतरीन अपडेट

शुक्रिया दोस्त

बने रहिये
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मुझे लगता है कहानी उतनी आकर्षक नहीं जितनी होनी चाहिए थी तभी तो सिर्फ इस कहानी ओ एक ही कोममेंट मिल रहा है

अफसोस की बात है
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चलिए दोस्तों अब कहानी को हाथ में ली ही है और अब हम कहानी के अंत के नजदीक है तो यह कहानी को ओउर करने की कोशिश करते है


आगे बढ़ते है दोस्तों
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अगली सुबह दोनो मेनका के मायके के लिए रवाना हो गये। राजासाहब ने उसे वहा छोडा और वहा से कार से शहर आकर बॅंगलुर की फ्लाइट पकड़ ली। शाम 7 बजे वो बॅंगलुर मे थे। पहुँचते ही उन्होने डॉक्टर पुरन्दारे से अगले दिन का अपायंटमेंट ले लिया। मैत्री की पेशकश.


अगले दिन सुबह दस बजे राजासाहब डॉक्टर पुरन्दारे के कॅबिन मे उनके सामने बैठे थे।

"राजासाहब,जो भी हुआ उसके लिए मैं आपसे माफी चाहता हू।"

"डॉक्टर साहब आप हमे शर्मिंदा कर रहे हैं। जो भी हुआ उसमे आपकी कोई ग़लती नही थी। प्लीज़ अब आप खुद को दोष देना छोड़ दीजिए।"

"पर राजासाहब विश्वजीत मेरा पेशेंट था। मेरी ज़िम्मेदारी था। मुझे तो समझ नही आता ये सब आख़िर हुआ कैसे!"

"डॉक्टर साहब आपका मानना है कि विश्वा काफ़ी हद तक ठीक हो गया था, इसीलिए वो यहा से ड्रग्स लेने के लिए भागने जैसी हरकत नही कर सकता। राइट?"

"राइट, मैने अपनी पूरी ज़िंदगी लोगो को ये लत छुडवाते बिता दी और मैं दावे के साथ कह सकता हू कि विश्वा ऐसा काम नही कर सकता था।"

"तो फिर वो किसी और कारण से यहा से निकला होगा....ऐसा कौन सा कारण हो सकता है..?"

"यकीन मानिए,राजासाहब यही सवाल मुझे भी परेशान कर रहा है और एक दिन भी ऐसा नही गुज़रा होगा जब मैने इसका जवाब तलाशने की कोशिश ना की हो।"

"डॉक्टर साहब, मुझे भी इस सवाल का जवाब मिलता नज़र नही आता। अच्छा उस रात यहा कौन-कौन था?"

"जी,मरीज़ो के अलावा नाइट ड्यूटी के 2 डॉक्टर्स और गेट पे गार्ड।"

"आपकी इजाज़त हो तो मैं उनसे बात कर सकता हू?"

"ज़रूर राजासाहब। आप इस सेंटर मे जिस से चाहे, जो चाहे पूछ सकते हैं और जब जी चाहे आ-जा सकते हैं।"

"थॅंक यु वेरी मच,डॉक्टर। तो प्लीज़ मुझे उन डॉक्टर्स और गार्ड से मिलवा दीजिए।"

"अभी लीजिए।",कह के डॉक्टर पुरन्दारे ने इंटरकोम का रिसीवर अपने कान से लगा लिया।
मैत्री की प्रस्तुति.

डॉक्टर्स से राजासाहब को कुछ खास बात नही पता चली। इस वक़्त वो सेंटर के लॉन मे एक चेर पे बैठे थे और उनके सामने उस रात की ड्यूटी वाला गार्ड खड़ा था,"हुज़ूर, हमने सचमुच विश्वजीत साहब को बाहर जाते हुए नही देखा था और ना ही हम गेट से हीले थे या सोए थे।"

"देखो,हम तुम पे कोई इल्ज़ाम लगाने नही आए हैं,हम तो बस ये जानना चाहते हैं कि उस रात क्या हुआ था।"


गार्ड ने उन्हे वही सब बातें बताई जो डॉक्टर पुरन्दारे,उनका स्टाफ और पोलिसेवाले कह रहे थे।

"...तो उस रात कुछ भी ऐसा नही घटा था जिस से की किसी अनहोनी की आशंका होती।"

"जी नही,साहब। बस थोड़ी देर के लिए बिजली गयी थी जिसे बेस्कॉम वाले ठीक कर गये थे।"

"क्या? बिजली गयी थी! पूरी बात बताओ।"


गार्ड ने उन्हे पूरा किस्सा सुना दिया।

"
तुमने ये बात पोलीस को बताई थी।?"

"
जी,साहब।"

"
ह्म्म। अच्छा,जेनरेटर ठीक करने जो आदमी बेसमेंट मे गया था,क्या तुम भी उस के साथ गये थे?"
मैत्री ने आप तक पहुचाया.

"
नही,साहब। उसने हमे माना कर दिया। कहने लगा कि हम परेशान ना हो,वो काम कर देगा बस छोटी सी गड़बड़ है। साहब, हमने उस वक़्त भी गेट नही छोडा था,और बिजली ठीक करने भी वॅन के साथ बस एक आदमी आया था और दस मिनिट मे चला भी गया था..और जाते वक़्त वो अकेला ही था।"

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एक ओर एपिसोड दिया है दोस्तों......

पढ़े और अपने मतव्यो दे.....................
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"तुमने उसकी शक्ल देखी थी?"

"कुछ ठीक से याद नही साहब।बहुत अंधेरा था...नाटा,काला सा आदमी था।"


राजासाहब पूरी तैयारी के साथ आए थे,"क्या ये था?",अपना ब्रीफकेस खोल जब्बार की तस्वीर निकाल गार्ड के सामने कर उन्होने पूछा।

"पक्का नही कह सकते,साहब...पर हां इसी तरह का था।"
मैत्री की पेशकश.

राजासाहब के लिए इतना काफ़ी था। थोड़ी देर बाद वो पोलीस स्टेशन मे विश्वा के केस के इन्वेस्टिगेशन ऑफीसर के सामने बैठे थे," उस रात शायद बिजली भी गयी थी उस इलाक़े की?"

"जी,ऐसा बहुत कामन है उस एरिया मे। नया बसा है ना! होते रहते हैं पावरकट्स और वैसे भी उस रात बिजली ठीक करने वाला आदमी बेस्कॉम की यूनिफॉर्म और वन के साथ था। मैने सारे रेकॉर्ड्स चेक किए थे बेस्कॉम की कोई भी वॅन गायब या चोरी की रिपोर्ट नही थी। सो,मुझे लगता है कि वो आंगल नही है। मुझे पक्का यकीन है गार्ड सो रहा था और आपका बेटा निकल गया और उसकी बदक़िस्मती की ग़लत लोगो के हथ्थे चढ़ गया।"

"ह्म्म,एनीवे,थॅंक यू ऑफीसर। आपने जो भी किया है उसके लिए मैं ज़िंदगी भर आपका आभारी रहूँगा।",राजासाहब ने अपना हाथ ऑफीसर की ओर बढ़ाया।

"जस्ट डूयिंग माइ जॉब,राजासाहब। मेरा भरोसा करिए,मुजरिम को तो मैं पकड़ कर रहूँगा।",उसने राजासाहब से हाथ मिलाया।
मैत्री की प्रस्तुति.

राजासाहब उस से विदा ले एरपोर्ट चल पड़े, उनका काम हो गया था। गार्ड से बात करके उन्हे यकीन हो गया था कि जब्बार ही उनके बेटे का कातिल है। उन्होने जानबूझ कर ऑफीसर को जब्बार का फोटो या उस पे शक़ होने की बात नही बताई थी। अब वो जब्बार को अपने हाथो से सज़ा देने की ठान चुके थे। एरपोर्ट पहुँच कर उन्होने मेनका को फोन मिलाया,"हमारा काम हो गया है।हम अगली फ्लाइट से आ रहे हैं।"

"सीधा हमे लेने आना।"

"ठीक है,मेरी जान।"


मेनका के माता-पिता चाहते तो नही थे कि उनकी बेटी इतनी जल्दी वापस जाए पर मेनका ने ऑफीस मे ज़रूरी काम का बहाना बना दिया था। उसके माता-पिता को भी लगा कि उनकी विधवा बेटी का मन काम के बहाने ही सही बहल तो रहा है,सो उन्होने ने भी उसे रोकने के लिए ज़्यादा ज़िद नही की। अब मेनका अपने मायके मे बेसब्री से राजासाहब का इंतेज़ार कर रही थी।

क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ. तब तक के लिए
मैत्री की ओर से.

जय भारत.
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अति उत्तम प्रस्तुति।

अब राजा साहब असली लय में आए हैं
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(03-04-2026, 05:49 PM)@@004 Wrote: अति उत्तम प्रस्तुति।

अब राजा साहब असली लय में आए हैं

जी हां दोस्त


अब राजा साहब को बच्चे की मौत का बदला तो लेना ही है .......आखिर राजा साहब है ...............

सवाल यह है की कैसे???????????????

जान ने के लिए आगे की कहानी पढनी ही होगी................

शुक्रिया दोस्त
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चलिए दोस्तों कहानी में थोडा आगे बढ़ते है........................


आशा है की सब को पसंद आएगा........
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पार्ट--12


गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।

रात 9 बजे राजासाहब मेनका और उसके माता-पिता के साथ उनके महल मे बैठे खाना खा रहे थे। उनलोगो ने ज़िद करके राजासाहब को आज रात महल मे रुक कल सुबह राजपुरा जाने के लिए तैयार कर लिया था।

खाने के बाद राजासाहब को एक नौकर उनके लिए तैयार किए गये कमरे मे ले आया। थोड़ी ही देर बाद मेनका भी वहा एक नौकर के साथ आई,"लाओ ग्लास हमे दो,शंभू।",ग्लास थामा वो नौकर कमरे से बाहर चला गया।

"
ये लीजिए दूध पीकर सो जाइए।"


राजासाहब ने एक हाथ बढ़ा ग्लास लिया और दूसरा उसकी कमर मे डाल उसे अपने पास खींच लिया,"हमे ये नही वो दूध चाहिए।",उनका इशारा उसकी छातियो की तरफ था।

"
क्या कर रहे हो?कोई आ जाएगा,छोडो ना!",मेनका घबरा के उनकी गिरफ़्त से छूटने की नाकाम कोशिश करने लगी।
मैत्री की प्रस्तुति.

"
कोई नही आएगा,चलो हमे अपना दूध पिलाओ।",उन्होने उसके एक गाल पे चूम लिया।

"
प्लीज़ यश! कोई देख लेगा ना!"

"
जब तक नही पिलाओगी,नही छोड़ेंगे।",उन्होने उसके होंठ चूम लिए।

"
अच्छा बाबा,पहले ये ग्लास ख़तम करो।।जल्दी!",उसने उनके हाथ से ग्लास ले उनके मुँह से लगा दिया। राजासाहब ने एक घूँट मे ही उसे ख़तम कर दिया।,"चलो अब अपना दूध पिलाओ।"

"
शंभू!",मेनका ने नौकर को पुकारा।

"
जी!राजकुमारी।",नौकर की आवाज़ सुनते ही राजासाहब अपनी बहू से अलग हो गये।

"
ये ग्लास ले जाओ।",और उसके पीछे-पीछे वो भी कमरे से बाहर जाने लगी,दरवाज़े पे रुक के मूड के उसने शरारत से राजासाहब की तरफ देखा और जीभ निकाल कर चिढ़ते हुए अंगूठा दिखाया और चली गयी। राजासाहब मन मसोस कर रह गये। उनका खड़ा लंड उन्हे बहुत परेशान कर रहा था।उसे शांत करने की गाराज़ से वो कमरे से बाहर आ टहलने लगे। तभी उन्हे रानी साहिबा,मेनका की मा आती दिखाई दी।

"
क्या हुआ राजासाहब? कोई तकलीफ़ तो नही?"

"
जी बिल्कुल नही। सोने के पहले थोड़ा टहलने की आदत है बस इसीलिए यहा घूम रहे हैं, बुरा मत मानीएगा पर ये दवा! किसी की तबीयत खराब है क्या?",उन्होने उनके हाथों की तरफ इशारा किया।

"
अरे नही,राजासाहब बुरा क्यू मानेंगे। हमारी नींद की गोलिया हैं,कभी-कभार लेनी पड़ जाती हैं।"
मैत्री की रचना.

इसके बाद थोड़ी सी और बातें हुई और फिर दोनो अपने-अपने कमरो मे चले गये पर राजासाहब के आँखों मे नींद कहा थी। जब तक अपनी बहू के अंदर वो 2-3 बार अपना पानी नही गिरा देते थे,उन्हे नींद कहा आती थी। मेनका के जिस्म की चाह कुछ ज़्यादा भड़कने लगी तो उन्होने उस पे से ध्यान हटाने के लिए दूसरी बातें सोचना शुरू किया।


बने रहिये दोस्तों..............
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वो जब्बार से बदला लेने के बारे मे सोचने लगे। उनका दिल तो कर रहा था की उस नीच इंसान को अपने हाथो से चीर के रख दे पर ऐसा करने से वो क़ानून की नज़रो मे गुनेहगार बन जाते। अगर वो क़ानून का सहारा लेते तो जब्बार शर्तिया बच जाता क्यूकी कोई भी सबूत नही था जोकि उसे विश्वा का कातिल साबित करता। उसे सज़ा देने के लिए उन्हे उसी के जैसी चालाकी से काम लेना होगा,ये उन्हे अच्छी तरह से समझ मे आ गया था। मगर कैसे! वो ऐसी चाल चलना चाहते थे जिस से साँप भी मार जाए और लाठी भी ना टूटे। पहले की बात होती तब शायद वो इतना नही सोचते और अभी तक जब्बार उनके हाथो मर भी चुका होता पर अब मेनका की ज़िंदगी भी उनके साथ जुड़ी थी और वो कोई ऐसा कदम नही उठना चाहते थे जिस से उसे कोई परेशानी उतनी पड़े। उसका ख़याल आते ही उनका लंड फिर से खड़ा होने लगा।


वो फिर से बेचैन हो उठे। एक बार तो उन्होने सोचा कि लंड को हाथ से ही शांत कर दे पर फिर उनके दिल ने कहा कि लानत है राजा यशवीर सिंग! तुम्हारी दिलरुबा बस चंद कदमो के फ़ासले पे है और तुम खुद को मूठ मार कर शांत करोगे! वो तुरंत उठ खड़े हुए और कमरे से निकल गये। बाहर अंधेरा था,वो दबे पाँव मेनका के कमरे की ओर गये और धीरे से दरवाज़े पे हाथ रखा।

मेनका को भी कहा नींद आ रही थी। उसे अपने ससुर के लंड की ऐसी लत लगी थी की रात होते ही बस वो उनकी मज़बूत बाहों मे क़ैद हो उनसे जम कर चुदवाना चाहती थी। वो बिस्तर पे करवते बदल रही थी और उसकी बगल मे उसकी मा गहरी नींद मे सो रही थी। उसकी चूत राजासाहब के लंड के लिए बावली होने लगी तो वो नाइटी के उपर से ही उसे दबाने लगी। तभी उसकी नज़र दरवाज़े पे गयी जोकि आहिस्ते से खुला और उसे उसमे उसके ससुर नज़र आए।

बने रहिये दोस्तों .........
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वो जल्दी से उठ दबे पाँव भागते हुई दरवाज़े पे आई,"क्या कर रहे हो?तुम बिल्कुल पागल हो! जाओ यहा से! मा सो रही हैं यहा।",वो फुसफुसा।

"चले जाएँगे पर तुम भी साथ चले।"

"ऑफ..ओह! तुम सच मे पागल हो गये हो रात मे माँ उठ गयी तो क्या होगा?!"

"ठीक है तो हम ही यहा आ जाते हैं।",राजासाहब अंदर आए और दरवाज़ा बंद कर दिया।

"यश...यहा....जाओ ना...मा उठ जाएँगी!"
मैत्री की पेशकश.

"नही उठेंगी! नींद की गोलिया उन्हे उठने नही देंगी।",उन्होने उसे बाहों मे भर के चूम लिया।

"नही...प्लीज़!",मेनका कसमसाई पर राजासाहब ने उसे पागलो की तरह चूमना शुरू कर दिया था। चाहिए तो उसे भी यही था पर उसकी मा के कमरे मे होने की वजह से उसे बहुत डर लग रहा था। राजासाहब भी जानते थे कि सब कुछ जल्दी करना होगा। उन्होने उसकी नाइटी नीचे से उठा अपने हाथ अंदर घुसा दिए। मेनका ने नाइटी के नीचे कुछ भी नही पहना था और अब राजासाहब के हाथों मे उसकी भरी-भरी गांड मसली जा रही थी।


उसकी आँखे बंद हो गयी,"...ना...ही...यश...मा...जाग जा...एँ....गी...!"

राजासाहब उसे चूमते हुए दीवार से लगे एक छोटे शेल्फ के पास ले गये और उसे उसपे बिठा दिया। उनका एक हाथ उसकी छातिया दबा रहा था और दूसरा चूत मे घुसने था। मेनका हवा मे उड़ने लगी। उसने अपनी आँखें खोल अपनी मा की तरफ देखा,वो बेख़बर सो रही थी,उसे बहुत डर लग रहा था पर साथ ही मज़ा भी बहुत आ रहा था। पकड़े जाने का डर उसे एक अलग तरह का मज़ा दे रहा था।

राजासाहब की उंगलिया उसके चूत के दाने को छेड़ने लगी तो उसकी चूत बस पानी पे पानी छोड़ने लगी। बड़ी मुश्किल से उसने अपनी आहों पे काबू रखा था। उसने भी अपने हाथ राजासाहब के कुर्ते मे घुसा उनकी पीठ नोचना शुरू कर दिया। राजासाहब ने जैसे ही महसूस किया कि मेनका उनके चूत रगड़ने से झड़ कर पूरी तरह गीली हो चुकी है,उन्होने हाथ पीछे ले जाके उसकी नाइटी का ज़िप खोल उसे नीचे कर दिया। अब नाइटी उसकी कमर पे थी और उसकी चुचियाँ और चूत नंगे थे। मैत्री की प्रस्तुति.

बने रहिये दोस्तों ...........
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दोस्तों आपके मनोरंजन के लिए कुछ अपडेट्स दिए है.............

पढ़िए और पाने मंतव्यो दीजिये
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राजासाहब झुके और उसकी छातिया चूसने लगे,उनका एक हाथ अभी भी उसकी चूत पे लगा हुआ था। मेनका ने दीवार से टिकाते हुए अपना बदन कमान की तरह मोड़ अपनी छातिया अपने ससुर की तरफ और उभार दी और उनके सर को पकड़ उनपे दबा दिया। उसकी कमर भी हिलने लगी और वो उनके हाथ को चोदने लगी। मैत्री की पेशकश.


तभी उसकी मा ने करवट ली तो मेनका और राजासाहब जहा थे वही रुक गये। मेनका का कलेजा तो उसके मुँह को आ गया और सारा नशा हवा हो गया। दोनो सांस रोके उसकी मा को देख रहे थे। उन्होने फिर करवट ली और इस बार उनकी पीठ उन दोनो की तरफ थी। राजासाहब ने फिर से धीरे-धीरे अपनी बहू की चूत कुरेदना शुरू कर दिया। मेनका तो शेल्फ से उतर कर वापस सोने की सोच रही थी पर उसके ससुर की इस हरकत ने उसकी चूत की प्यास को फिर से जगा दिया। एक बार फिर राजासाहब उसकी छाती पे झुक उसके निपल्स चूसने लगे।

मेनका फिर से गरम हो गयी तो उसने उनके पायजामा मे हाथ डाला तो पाया की राजासाहब ने अपनी झांटे साफ कर ली थी। उसे उनपे बहुत प्यार आया और वो लंड को मुट्ठी मे भर हिलाने लगी। राजासाहब के लिए ये इशारा काफ़ी था,उन्होने अपना पायजामा उतार दिया और शेल्फ पे बैठी मेनका की जांघे खोल उनके बीच आए और अपना लंड उसकी चूत मे पेल दिया। मेनका ने अपनी आ उनके कंधे मे दाँत गाड़ा के ज़ब्त की और अपनी टांगे और बाँहे उनके बदन से लिपटा कर अपनी कमर हिला कर उनके साथ चुदाई करने लगी। राजासाहब उसके उरज़ो को दबाते हुए उसके निपल्स अपनी उंगलियो के बीच ले मसल्ते हुए उसे चूमने लगे।

उनका हर धक्का उनके लोडे को मेनका की कोख पे मार रहा था और वो बस झडे  चले जा रही थी। राजासाहब का जोश भी अब बहुत बढ़ गया था, सांस जो सामने सोई हुई थी,वो अब बहुत ज़ोर के धक्के मार रहे थे। चोद्ते-चोदते उन्होने अपने हाथ नीचे ले जा उसकी गांड को थामा और उसे शेल्फ से उठा लिया। अब मेनका शेल्फ से कुछ इंच उपर हवा मे अपने ससुर से चिपकी उनसे चुद रही थी। राजासाहब का लंड उसकी चूत के दाने को रगड़ता हुआ सीधा उसकी कोख पे ऐसे वार कर रहा थी की थोड़ी ही देर मे मेनका झड़ गयी और अपने ससुर की गर्दन मे मुँह छुपा के सुबकने लगी। राजासाहब ने उसे उठाए हुए ही अपनी कमर हिला उसकी चूत को अपने विर्य से भर दिया।

उन्होने उसे वापस शेल्फ पे बिठाया और उसके बालों को सहलाते हुए उसके सर को हौले- चूमने लगे। जब मेनका थोडा शांत हुई तो उसने भी उनके सीने पे हल्के से चूम लिया। राजासाहब ने एक नज़र उसकी सोई हुई मा पे डाली और फिर उसे बाहों मे भर कर उसके होंठो को चूम लिया। धीरे से अपना सिकुदा लंड उसकी चूत मे से निकाला और फिर उसकी नाइटी उसे वापस पहना दी,फिर अपना पायजामा बाँध लिया और उसे गोद मे उठा कर उसे उसकी मा की बगल मे लिटा दिया। मैत्री की प्रस्तुति.

जैसे ही वो जाने लगे मेनका ने उनके गले मे बाहें डाला अपने उपर खींच कर चूमा और फिर कान मे फुसफुसा,"आइ लव यू।"

"आइ लव यू टू।",राजासाहब ने उसके होठों को चूमा और कमरे से बाहर चले गये।


******

आज के लिए बस यही तक दोस्तों. फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ, तब तक के लिए मैत्री की ओर से जय भारत.
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दोस्तों आप सब के लिए कुछ अपडेट्स दिए है


आशा है की आप सब को पसनद आएगा.....................


कहानी कहातम होने में अब कुछ ही पार्ट्स बाकी है

कृपया कहानी के बारे में अपनी राय दीजिये .......................

मैत्री.
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अति कामुक प्रस्तुति।
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(05-04-2026, 01:49 PM)@@004 Wrote: अति कामुक प्रस्तुति।

शुक्रिया दोस्त

बने रहिये
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चले कहानी थोडा आगे बढ़ते है.............
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मलिका कमरे मे लेटी अपनी चूत मे उंगली कर रही थी,जब्बार 2 दीनो से बाहर गया हुआ था और वो 2 दीनो से चुदी नही थी। तभी उसका फोन बजा,"हेलो।"

"
हा,मैं देल्ही मे हू। कल सवेरे 10 बजे तक वापस आऊंगा।",ये जब्बार था।


थोड़ी देर तक बात करने के बाद मलिका ने फोन किनारे रखा और फिर से चूत रगड़ने लगी। वो लंड के लिए पागल हो रही थी। तभी उसे कल्लन का ख़याल आया तो उसने फोन उठा कर उसका नंबर डायल किया।

"
हेलो!",कल्लन ने फोन उठाया।

"
क्या कर रहा है,ज़ालिम?"
मैत्री की पेशकश है.

"
बस यहा से जाने की तैयारी मे हू।",जब्बार ने कल ही कल्लन के अकाउंट मे उसके हिस्से के बाकी पैसे जमा कराए थे। कल्लन का काम हो गया था और अब वो किसी और चक्कर मे 2-3 महीनो के लिए बाहर जा रहा था।

"
मुझे यहा तड़पता छोड़ कहा जा रहा है? मादरचोद साला, जब्बार देल्ही मे है,यहा आ के मेरी आग बुझा दे ना।"

"
मैं वहा आने का चान्स नही ले सकता। अगर किसी ने देख लिया तो सारा भंडा  फूटने मे देर नही लगेगी,वैसे तू चाहती है तो तू यहा आ जा,मैं कल चला जाऊँगा।",कल्लन भी मलिका को चोदने का लालच हो आया था।

"
अच्छा ठीक है, भोसदीके,मैं ही आती हू। वो कमीना तो कल सुबह आएगा। मैं आती हू पर कहा आना है?"

"
शहर के चोवोक बाज़ार मे वो 'फियेस्टा' केफे है ना,वही पहुँच जाना। मैं वहा से तुम्हे अपने घर ले चलूँगा। कितने बजे आओगी?"

"
मैं 3 बजे तक 'फियेस्टा' पहुँच जाऊंगी।",उसने दीवार-घड़ी की तरफ देखा।



बने रहिये दोस्तों.................
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