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Adultery Adventure of sam and neha
#21
हम दोनों खिड़की से अभी भी देख रहे थे।


सैंडी अंदर चली गई—अलोक की कलाई पकड़े हुए, उसकी चाल अभी भी लहराती हुई, जैसे कोई फूल हवा में तैर रहा हो।

अब सिर्फ़ डेविड और विशाल खड़े थे—हमारी तरफ पीठ करके।

उनकी पीठ चौड़ी, कंधे भारी।

दोनों की गांड बड़ी, मोटी—एक काली, दूसरी भूरी।

बालों से भरी हुई—घने, काले, घुंघराले।

उनकी टाँगें थोड़ी खुली हुईं—जैसे कोई पावर पोज़ में खड़े हों।

और बीच में... गैप से... दोनों के लुंड का सिर झाँक रहा था।

डेविड का—मोटा, भारी, पर्पल हेड, नीचे लटकता हुआ, लेकिन अभी भी हाफ हार्ड।

विशाल का—लंबा, मोटा, हेड गोल, लेकिन वजन से नीचे की तरफ झुका हुआ।

दोनों के लुंड इतने भारी लग रहे थे कि कपड़े के बिना भी नीचे लटक रहे थे—जैसे कोई भारी फल डाल पर लटका हो।

हर छोटी हरकत में हल्का सा हिल रहे थे—भारी, वजनदार, असली।

मेरा लुंड... पीछे से कभी कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता।

मेरा छोटा, हल्का, फोरस्किन वाला—पीछे से देखने पर कोई नहीं कहेगा कि ये है।

कोई ग्लिम्प्स भी नहीं।

कोई वजन नहीं।

डी के अंदर चले जाने के बाद बालकनी में मेरा मन अब वहाँ नहीं था।

मेरा पूरा ध्यान नेहा पर था।

मैंने उसके कंधे पकड़े—हल्के से, लेकिन फर्म।

उसे बिस्तर की तरफ घुमाने की कोशिश की—एक छोटा सा इशारा, "चलो... बिस्तर पर..."

लेकिन नेहा हिली नहीं।

वो खड़ी रही—जैसे जम गई हो।

उसकी साँसें अभी भी तेज़, लेकिन अब रुक-रुक कर।

उसकी आँखें अभी भी बालकनी पर टिकी हुईं—अलोक के जाने के बाद भी।

वो शॉक में थी।

मेरा लुंड पहले से ही बाहर था—हार्ड, फड़कता हुआ, सीधा खड़ा।

उसकी आँखें अभी भी बालकनी की तरफ थीं

मैंने उसके कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया—आवाज़ भारी, गर्म, लेकिन बहुत धीमी।

"क्या हुआ बेबी... चलो... बिस्तर पर।

देख... मेरा लुंड... कितना सख्त हो गया है।

मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ... अभी... अभी।"

उसका चेहरा थोड़ा लाल, होंठ कटे हुए, आँखें आधी बंद—जैसे वो अभी भी उस सीन को दिमाग में दोहरा रही हो।

वो इतनी देर तक मेरे साथ थी—सैंडी को देखते हुए, मेरे लुंड को पकड़े हुए, मेरी उँगलियाँ उसकी चूत पर।

वो कभी नहीं रुकी।

वो कभी नहीं बोली—"बस करो"।

वो मेरे साथ थी—पूरी तरह।

क्यूरियॉसिटी थी—लेकिन वो मेरे साथ थी।

अगर मैं अब उसे जबरदस्ती बिस्तर पर ले जाता... या उसकी नज़र खिड़की से हटाता... तो वो सोचेगी कि मैं वहाँ सिर्फ़ सैंडी के लिए था।

सैंडी की बॉडी के लिए।

सैंडी के खेल के लिए।

न कि उसके लिए।

न कि हम दोनों के लिए।

अब दोनों—डेविड और विशाल—रेलिंग पर झुके हुए थे, ठीक वैसे ही जैसे पहले सैंडी झुकी थी।

डेविड पूरी तरह नंगा था—उसका लुंड अभी भी हाफ हार्ड, लटकता हुआ

विशाल की टी-शर्ट थी, लेकिन नीचे कुछ नहीं—उसका लुंड भी बाहर, भारी, लटकता हुआ।

दोनों की टाँगें थोड़ी खुली

एक पल सन्नाटा रहा।

फिर... दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
फिर ज़ोर से हँसे—एक गहरी, भारी, दोस्ताना हँसी।

डेविड ने अपना हाथ ऊपर उठाया—हाई फाइव।

विशाल ने भी।

दोनों के हाथ जोर से टकराए—एक तेज़, गूंजता हुआ आवाज़।

"हाई-फाइव!"

विशाल ने रेलिंग पर हाथ रखकर सिर झटका और ज़ोर से हँसा—एक गहरी, भारी हँसी जो कमरे तक गूंज गई।

"भेनचोद... KLPD हो गया... कितना मज़ा आ रहा था यार!"

डेविड ने भी हँसा—उसकी हँसी में वो गंदी, संतुष्ट वाली धुन थी।

उसने अपना लुंड अभी भी हाफ हार्ड पकड़ा, हल्के से हिलाया और पीले दाँत चमकाते हुए बोला—

"हाहाहा... हाँ यार... कोई बात नहीं... 1-2 घंटे बाद... वो सब हमारी होगी।

"अरे टेक हर सम रेस्ट भेनचोद... भेन की लोड़ी कल रात से जागी हुई है।"

"हम्म... और अब अलोक भाई उसे रियल थका देंगे... लेकिन यार... सच में... ऐसी माल... कमाल की है।"

डेविड और विशाल अब रेलिंग पर पीठ टिकाकर खड़े थे—लेकिन अब हमारी तरफ मुंह करके।

विशाल ने पहले बोलना शुरू किया—आवाज़ में अभी भी हँसी, लेकिन गंदी, भारी।

"भेनचोद... कल रात का सीन याद है?

सैंडी को चारों तरफ से भरा हुआ... तूने उसके मुँह में डाला, मैंने चूत में... अलोक भाई गांड में।

तीन लुंड एक साथ... वो रंडी चीख रही थी, लेकिन आहें भर रही थी 'और... और जोर से'।"

डेविड ने हँसा—

उसने अपना लुंड हल्के से पकड़ा, ऊपर-नीचे किया—जैसे याद करके फिर हार्ड हो रहा हो।

"हाँ यार... उसके स्तन... कितने परफेक्ट थे।

मैंने दोनों हाथों से पकड़े थे—गोल, भारी, लेकिन इतने सॉफ्ट कि हाथ में फिसल रहे थे।

निप्पल्स सख्त... मैंने पिंच किए तो वो चीखी 'आह्ह... हाँ...'।

फिर मैंने एक को मुँह में लिया—चूसा, काटा... वो काँप गई।

तूने देखा नहीं?

उसकी चूत मेरे लुंड पर सिकुड़ रही थी... जैसे कह रही हो 'और अंदर... और जोर से'।"

विशाल ने फिर हँसा—अब और जोर से।

"और तेरा लुंड उसके चेहरे पर... कितना सेक्सी लग रहा था यार।

नेहा अभी भी खिड़की की तरफ मुड़ी हुई थी—उसकी आँखें बालकनी पर जमी हुईं, पलक झपकाना भूल गई लगती थी।

वो हर मूवमेंट देख रही थी—डेविड और विशाल के लुंड को, कैसे वो हल्के-हल्के हिल रहे थे जब वो सैंडी की बात कर रहे थे।

उनकी बातें उसके कानों में गूंज रही थीं—कल रात के सीन, सैंडी के स्तनों का एहसास, डेविड के लुंड का उसके चेहरे पर टैप करना, तीन लुंड एक साथ।

मैं उसके सामने था—उसकी आँखें अभी भी बालकनी पर, लेकिन उसका बदन मेरे सामने।

मैंने उसके गले पर होंठ रख दिए—धीरे से, गर्म साँसें उसकी स्किन पर।

उसकी गर्दन पर किस किया—एक के बाद एक, जीभ से हल्का सा चाटा।

उसकी साँस रुक गई।

उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी—तेज़, अनियमित।

मैंने धीरे से नीचे जाना शुरू किया।

उसके स्तन बाहर—गोरे, गोल, निप्पल्स सख्त, हवा से ठिठुरे हुए।

मैंने एक स्तन मुँह में लिया—चूसा, जीभ घुमाई, निप्पल को हल्के से दाँतों से दबाया।

नेहा की आह निकली—बहुत धीमी, लेकिन गहरी।

"आह्ह... सैम..."

लेकिन अब नेहा का ध्यान सिर्फ़ उन दो लुंडों पर था

वो सुन रही थी।

"कल रात... उसके मुँह में... तीन लुंड... वो चीख रही थी..."

"उसकी चूत... कितनी टाइट... रस बह रहा था..."

वो दुनिया—जो उसने कभी नहीं सोची थी कि अस्तित्व में है।

गंदी, बेशर्म, आज़ाद।

मेरा मुँह अब उसके नाभि पर आ गया।

मैंने नाभि को जीभ से चाटा—गोल-गोल, हल्के से दबाव।

उसकी नाभि गहरी थी, गर्म, नरम।

मैंने उसे अच्छा ध्यान दिया—जीभ अंदर डाली, चाटा, चूसा।

धीरे से... मैंने उसकी पैंटी के इलास्टिक पर हाथ रखा।

उसे नीचे सरकाया—धीमे, लेकिन लगातार।

उसकी पैंटी जांघों से सरकती हुई नीचे गई—उसकी चूत अब पूरी बाहर।

गीली, सूजी हुई, क्लिट चमकती हुई।

मैं घुटनों पर बैठ गया—उसके सामने, उसकी चूत ठीक मेरे मुँह के सामने।

नेहा की जांघें अभी भी हल्की-हल्की काँप रही थीं।

उसने खुद ही जांघें थोड़ी और चौड़ी कीं—बिना कुछ कहे, बस एक छोटा सा मूवमेंट।

उसकी चूत अब पूरी तरह मेरे सामने थी—गीली, सूजी हुई, क्लिट चमकती हुई।

उसकी खुशबू मेरे नाक में घुसी—गर्म, मीठी, उसकी अपनी।

उसकी आँखें अभी भी बालकनी पर टिकी हुई थीं—वो देख रही थी, सुन रही थी।

विशाल ने अपना हाथ डेविड के चेहरे पर ले जाकर वो महिला वाला फैंसी गॉगल उतारने की कोशिश की।

"भेनचोद... ये गॉगल उतार... चूतिया लग रहा है।"

डेविड ने हँसते हुए हाथ हटाया—गॉगल अभी भी आँखों पर था।

कितने दिनों बाद मिला है ऐसा ताज़ा माल... याद है ना?"

"हाँ यार... लेकिन... याद है ना... पिछली बार वाला... वो कश्मीरी कपल?"

विशाल ने जोर से हँसा—उसकी हँसी गूंज गई।
"आह्ह... वो कश्मीरी... समीर और उसकी नई-नई बीवी।

हमारे कुक की नई बहू... अलोक भाई ने कैसे पकड़ा था उन्हें।

दोनों चिकने... दोनों की आँखें बड़ी-बड़ी... जैसे कभी किसी ने छुआ ही नहीं हो।"

डेविड ने अपना लुंड हल्के से पकड़ा—फड़क उठा।

"हाँ... और दोनों ने साथ में... लुंड चूसा।

पति-पत्नी... एक साथ... मेरे लुंड पर जीभ फेर रहे थे।

वो बीवी... गोरी, नाजुक... और समीर... उसका पति... नीचे से चूस रहा था... बॉल्स पर जीभ।

भेनचोद... वो सीन... कभी नहीं भूलता।

"हाँ भाई... पति-पत्नी दोनों जब एक लुंड चूसते हैं... मज़ा दोगुना हो जाता है।

"भेनचोद... अलोक भाई जानता है... औरत को कैसे यूज़ करना है।

विशाल ने दोस्ताना अंदाज़ में डेविड के कंधे पर एक हल्का-सा मुक्का मारा—जोर से नहीं, लेकिन इतना कि डेविड का शरीर हिल गया।

"मादरचोद मोटे... तेरी वजह से वो दोनों हमारे घर से निकल गए... तूने उन्हें शादी के बाद एक रात भी नहीं छोड़ा... हर रात वहाँ था जब वो घर में थे... अब वो भोली बीवी सोचती होगी... बड़े शहर में ऐसे ही चलता है।"

नेहा की उँगलियाँ मेरे बालों में उलझी हुईं—धीरे-धीरे, लेकिन कसकर।

वो मुझे और नीचे खींच रही थी—बिना एक शब्द बोले, बस इशारे से।

उसकी जांघें मेरे कंधों पर दब रही थीं

मैं घुटनों पर था—उसकी चूत ठीक मेरे मुँह के सामने।

मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं—गीली, गर्म, आसानी से अंदर चली गईं।

उँगलियाँ अंदर-बाहर—धीमे से तेज़, गहरे से और गहरे।

उसकी चूत मेरी उँगलियों पर सिकुड़ रही थी—रस बह रहा था, मेरी हथेली पर गिर रहा था।

मैंने जीभ निकाली—क्लिट पर रखी, गोल-गोल, हल्का सा चूसते हुए।

"भेनचोद... लेकिन ये सैंडी तो फॉर्च्यून है... भेन की लोड़ी से मन नहीं भरता।
क्या वो अभी रूम में है?

चल... देखते हैं... अलोक भाई कैसे चोदता है उसे।"

डेविड ने दाँत चमकाते हुए हँसा।

वो तो चले गये होंगे। ... भेनचोद अपना बेड पूरा पसीने, कम, पेशाब से भीगा हुआ है... पूरा गीला।

वो लोग... शायद सूट में चले गए होंगे।


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#22
नेहा अभी भी खिड़की की तरफ मुड़ी हुई थी—उसकी आँखें बालकनी पर जमी हुईं, लेकिन अब उसकी साँसें मेरे हर स्पर्श के साथ और तेज़ हो रही थीं।


मैं घुटनों पर था—उसकी चूत मेरे मुँह के सामने, जीभ क्लिट पर गोल-गोल, दो उँगलियाँ अंदर-बाहर।

उसकी जांघें मेरे कंधों पर दब रही थीं—काँपती हुई, गर्म।

उसका रस मेरी जीभ पर बह रहा था—मीठा, गाढ़ा।

तभी... मेरे दिमाग में वो शब्द गूंजे।

सूट 502।

अलोक ने जाते-जाते कहा था—"सूट नंबर 502"।

और अब... विशाल और डेविड की बातें सुनकर... सब साफ़ हो गया।

वो लोग... सैंडी को तैयार कर रहे थे... अलोक के लिए।

और अलोक... सूट 502 में... इंतज़ार कर रहा था।

मेरा लुंड फड़क उठा।

मैंने नेहा की चूत पर जीभ और तेज़ की—क्लिट को चूसते हुए, उँगलियाँ गहरे धक्के दे रहे थे।

नेहा की आह निकली—"आह्ह... सैम..."

बालकनी से बातें अभी भी आ रही थीं।

विशाल ने हँसते हुए कहा—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत।

"यार... वो रिसेप्शन वाली भी मस्त थी।"

डेविड ने पीले दाँत चमकाते हुए हँसा।

"हाँ यार... देखते ही खड़ा हो गया था... लेकिन नखरे करती थी वो... सैंडी की तरह नहीं।

नखरे वाली को तो पालतू कुत्ती बनाने का अलग ही मज़ा है... पता है ना... जो नखरे करती है... उसे कैसे लाइन पर लाते हैं अलोक भाई।"

नेहाहा की साँसें अब और तेज़ हो गईं।

उसका हाथ मेरे बालों में और कस गया—वो मुझे और नीचे खींच रही थी।

उसकी आह ऊँची हो गई—"आह्ह... सैम... हाँ..."

उसकी चूत अब पूरी तरह भिगो चुकी थी—रस मेरी जीभ पर बह रहा था।

वो सुन रही थी—हर शब्द।

"नखरे वाली को पालतू कुत्ती बनाने का मज़ा..."

"अलोक भाई का तरीका..."

मैंने जीभ को और तेज़ किया—क्लिट पर चूसते हुए, उँगलियाँ गहरे धक्के दे रहे थे।

उसकी आह अब और ऊँची—"सैम... हाँ... मैं... मैं आने वाली हूँ..."

उसका रस मेरी उँगलियों और जीभ पर बहा—गर्म, चिपचिपा।

विशाल ने रेलिंग पर हाथ मारकर हँसा—उसकी हँसी अभी भी गूंज रही थी।

"मादरचोद... तब तक अलोक भाई सैंडी को कुत्ती बना रहे होंगे... चल... बिस्तर बदलते हैं।"

डेविड ने भी हँसा

"हाँ... हमारी आदत हो गई है... ऐसे गंदे जगह में रहने की... लेकिन सैंडी... वो मुँह बनाती है... जैसे उसे गंदगी से परेशानी हो।"

विशाल ने फिर जोर से हँसा—उसकी आवाज़ कमरे तक गूंज गई।

"भेनचोद... वो अमीर लोगों से महंगे होटल और कारों में चुदवाती है... और तू उसे गंदे गद्दे पर सिर दबाकर चोदता है।

उसकी वो शक्ल... जब गंदगी महसूस करती है... कमाल की लगती है।"

डेविड ने सिर हिलाया—उसकी मुस्कान अब और गंदी हो गई।

"मुझे यही मज़ा आता है यार... जब मैं ऐसे खेलता हूँ।

गंदा गद्दा... पसीना... कम... पेशाब... सब मिलाकर... और वो रंडी... मुँह बनाती है... लेकिन चुदवाती है।

मज़ा दोगुना हो जाता है।"

नेहा अब पूरी तरह थक चुकी थी।

उसकी चूत मेरी जीभ और उँगलियों पर बार-बार सिकुड़ रही थी—एक के बाद एक ऑर्गेज़्म, गहरा, लंबा, लगातार।

उसका रस मेरे मुँह में बह रहा था—इतना ज़्यादा कि मेरी जीभ और गले तक पहुँच रहा था।

पहली बार... मेरे मुँह में इतना रस आया कि मैं सब नहीं संभाल पाया।

कुछ मेरे होंठों से बहकर मेरी ठोड़ी पर गिर गया—गर्म, चिपचिपा, उसकी खुशबू से भरा।

उसकी जांघें मेरे कंधों पर ढीली पड़ गईं—वो अब मेरे ऊपर पूरी तरह झुक चुकी थी।

उसकी साँसें धीमी, काँपती हुईं।

बालकनी अब खाली थी।

डेविड और विशाल अंदर चले गए थे—उनकी हँसी, उनकी गंदी बातें अब बंद हो चुकी थीं।

सैंडी भी अलोक के साथ अंदर थी—शायद सूट 502 में।

नेहा का बदन अब ढीला पड़ चुका था।

वो खड़ी नहीं रह पा रही थी।

उसकी टाँगें काँप रही थीं—जैसे इतनी देर खड़े रहने से, और उन सारे ऑर्गेज़्म से कमज़ोर हो गई हों।

मैंने उसे उठाया—कमर से पकड़कर, धीरे से बिस्तर पर ले जाया।

उसे लिटाया।

उसकी आँखें आधी बंद थीं—थकान से, लेकिन अभी भी वो चमक थी।

वो चुप थी।

एक शब्द नहीं बोला।

बस... साँस ले रही थी—धीमी, गहरी।

उसका चेहरा लाल था, होंठ सूजे हुए, बाल मेरे हाथों से बिखरे हुए।

मैं उसके ऊपर था—मेरा लुंड अभी भी हार्ड, फड़कता हुआ, उसके पेट से छू रहा था।

मैं उसे चोदना चाहता था—तेज़, गहरा, अभी।

लेकिन... मेरे दिमाग में वो बातें गूंज रही थीं।

"रिसेप्शन वाली भी मस्त थी..."

"नखरे वाली को पालतू कुत्ती बनाने का मज़ा..."

"अलोक भाई जानता है कैसे लाइन पर लाते हैं..."

नेहा ने सुना था।

सब सुना था।

और वो "रिसेप्शन वाली" का मतलब... वो समझ गई होगी।

वो जानती होगी कि वो बातें... उसके लिए भी हो सकती थीं।

अगर अलोक जी चाहें।

अगर वो नखरे करे।

मेरा लुंड हार्ड था—बहुत हार्ड।

लेकिन अब... अब मेरा दिमाग साफ़ नहीं था।

खून नीचे जा रहा था—दिमाग में नहीं।

मुझे लगा... मुझे यहाँ से निकलना चाहिए।

कुछ देर के लिए।

कुछ सोचने के लिए।

कोई बहाना।

कोई झूठ।

मैंने उसके माथे पर किस किया।

फिर धीरे से बोला—आवाज़ में थोड़ी सी हिचकिचाहट।

"बेबी... मैं... थोड़ी देर में आता हूँ।

नीचे... रिसेप्शन पर... चेकआउट का कुछ काम है।

बिल... और कुछ।

तुम... आराम कर लो।

मैं जल्दी आता हूँ।"

नेहा ने मेरी तरफ देखा—आँखें आधी बंद, थकी हुई, लेकिन प्यार भरी।

उसने हल्के से सिर हिलाया।

मैं बाथरूम में गया।

दरवाज़ा बंद किया।

शीशे के सामने खड़ा हुआ।

मेरा चेहरा... पूरी तरह चमक रहा था।

नेहा का रस—गाढ़ा, गर्म, चिपचिपा—मेरी ठोड़ी पर, गालों पर, होंठों पर फैला हुआ।

मेरी नाक पर भी—उसकी खुशबू अभी भी मेरे नाक में थी।

मैंने पानी खोला—ठंडा, तेज़।

चेहरा धोया—जोर-जोर से, जैसे सब कुछ धुल जाए।

लेकिन वो खुशबू... वो गर्माहट... वो एहसास... सब मेरे अंदर था।

मैंने शीशे में खुद को देखा।

आँखें लाल, चेहरा गीला, लुंड अभी भी हार्ड—पैंट में दबाव।

मैंने चेहरा पोंछा।

पैंट ठीक की।

दरवाज़ा खोला।

नेहा बिस्तर पर लेटी थी—पूरी तरह नंगी।

उसकी जांघें हल्की सी खुली हुईं, चूत अभी भी गीली

मैं कमरे से निकला।

दरवाज़ा बंद किया।

कॉरिडोर में खड़ा हुआ।

मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि कान में गूंज रहा था।

मेरा लुंड अभी भी हार्ड था—पैंट में दबाव।

मैं चौथी मंज़िल पर था।

सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।

पैर तेज़-तेज़ उठ रहे थे—लगभग भाग रहा था।

पाँचवीं मंज़िल पर पहुँचा।

साँसें फूल रही थीं।

कॉरिडोर में नंबर देखने लगा—501... 502...

मैं 501 के दरवाज़े के सामने पहुँच गया—पैनिक में।

हाथ बेल की तरफ बढ़ा—लेकिन रुक गया।

साँस ली।

खुद को शांत किया।

एक कदम पीछे।

फिर 502 के सामने खड़ा हुआ।

दरवाज़ा—सादा, ब्राउन, नंबर 502 चमकता हुआ।

मैंने बेल दबाई।

रिंग... रिंग...

15 सेकंड।

20 सेकंड।

हर सेकंड इतना लंबा लग रहा था जैसे घंटा बीत रहा हो।

मेरा दिल कान में गूंज रहा था।

मेरा लुंड अभी भी हार्ड—पैंट में दर्द।

मैंने फिर बेल दबाई—जोर से।

रिंग... रिंग...

मैंने दरवाज़ा धीरे से धकेला।

क्लिक की आवाज़ के साथ वो खुल गया—हल्का सा, लेकिन मेरे कानों में गूंज गया।

मेरा हाथ काँप रहा था—दरवाज़े का हैंडल पकड़े हुए।

अंदर एक लंबा गलियारा था—सूट का, लग्ज़री

हवा में खुशबू— सैंडी की।

दूर से आवाज़ें आ रही थीं—एक औरत की आहें, दर्द भरी लेकिन मज़े वाली।

"आआह्ह... आह्ह..."

सैंडी।

और साथ में... एक आदमी की गुर्राहट—जानवर जैसी, गहरी, भारी।

अलोक।

मैं आगे बढ़ा—पैर काँप रहे थे, लेकिन रुक नहीं पा रहा था।

गलियारे के आखिर में बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था।

सैंडी बिस्तर पर पीठ के बल लेटी हुई थी—पूरी तरह नंगी, सिर्फ़ शर्ट कंधों पर लटकी हुई, बटन फटे हुए, जैसे किसी ने जल्दबाज़ी में खींचकर तोड़ दिए हों।

उसके हाथ बिस्तर पर फैले हुए थे—दोनों कलाइयाँ अलोक ने पकड़ रखी थीं, ऊपर की तरफ दबाकर बिस्तर पर दबा रखी थीं।

उसका चेहरा लाल था—गालों पर प्रीकम की पुरानी बूँदें अब सूखकर चमक रही थीं, लेकिन अब कोई मुस्कान नहीं थी।

भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, दाँत भींचे हुए।

पहले वाली वो शरारती, हँसती हुई सैंडी अब नहीं थी।

अब सिर्फ़ दर्द और एक गहरी, बेबस आहें।

उसकी जांघें बिस्तर के किनारे पर लटक रही थीं—पूरी तरह खुली हुईं, चूत पूरी बाहर, गीली, लाल, सूजी हुई।

अलोक उसके ऊपर था—एक जानवर की तरह।

उसकी शर्ट उतरी हुई, पैंट घुटनों तक नीचे, लुंड—मोटा, काला, पूरी तरह अंदर—हर धक्के पर बाहर तक निकल रहा था, फिर जोर से अंदर धकेल रहा था।

हर धक्का इतना जोरदार कि बिस्तर हिल रहा था, चादर गीली, बिखरी हुई।

अलोक की साँसें गुर्राहट जैसी—कोई मज़ाक नहीं, कोई खेल नहीं।

बस... क्रूर, बेरहम, लगातार।


"ले... ले रंडी... पूरी तरह ले..."

उसकी आवाज़ गहरी, जानवर जैसी।

सैंडी की आहें अब दर्द भरी थीं—"आह्ह... अलोक जी... धीरे... आह्ह..."

लेकिन अलोक रुका नहीं।

उसने उसकी कलाइयाँ और जोर से दबाईं—उसके हाथ बिस्तर में धँस गए।

हर धक्के पर सैंडी का शरीर हिलता—स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे, निप्पल्स सख्त, लाल।

उसकी चूत से रस बह रहा था—बिस्तर पर गिर रहा था, गीला पैच और फैल रहा था।

अलोक और सैंडी ने मुझे देखा।

कोई "हैलो" नहीं।

कोई मुस्कान नहीं।

बस... एक ठंडी, लंबी नज़र।

अलोक की आँखें मेरी तरफ उठीं—एक पल के लिए।

फिर वापस सैंडी पर।

उसने धक्का नहीं रोका।

उसका लुंड अभी भी अंदर-बाहर हो रहा था—जोरदार, बेरहम, जैसे कल रात का सारा गुस्सा, सारा टेंशन, सारी भूख एक साथ निकाल रहा हो।

हर धक्के पर बिस्तर हिल रहा था।

चादर गीली, बिखरी हुई, पसीने और रस से सनी हुई।

सैंडी की आँखें मेरी तरफ उठीं—एक पल।

पहली बार... उसके चेहरे पर वो शरारती, हँसती हुई मुस्कान नहीं थी।

कोई गुदगुदी, कोई खेल नहीं।

उसका चेहरा लाल था—दर्द से, थकान से।

भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, दाँत भींचे हुए।

उसकी आँखों में... एक छोटा सा पछतावा।

जैसे वो सोच रही हो—ये डील... शायद गलती थी।

लेकिन वो रुकी नहीं।

उसकी जांघें अभी भी खुली थीं—अलोक के धक्कों के साथ हिल रही थीं।

उसकी चूत लाल, सूजी हुई, रस बह रहा था—बिस्तर पर गिर रहा था।

वो ले रही थी—बेरहमी से, लेकिन चुपचाप।

मैं साइड में खड़ा था—दरवाज़े के पास, दीवार से सटा हुआ।

मेरा लुंड पैंट में फड़क रहा था—दर्द करने लगा।

मैंने सोचा—अगर मैं आगे बढ़ूँ... अलोक को धक्का देकर हटा दूँ... उसकी जगह ले लूँ...

उसकी चूत की गर्मी... उसकी आहें... सब मेरा हो जाए।

लेकिन मैं रुका।

मैं जानता था—ये उसका "माल" है।

अलोक का।

वो इसे यूज़ कर रहा था—जैसे चाहे।

जितना चाहे।

जितने जोर से चाहे।

और मैं... मैं डेविड और विशाल की तरह हूँ।

बस... बचा हुआ।

लेफ्टओवर।

जब अलोक भाई खत्म कर लेंगे... तब हमारी बारी।

मैं इंतज़ार करता रहा।

मैंने सोचा—शायद अलोक जी मुझे देखकर पुरानी तरह से इशारा करेंगे।

जैसे कल रात... वो मुस्कुराए थे।

"ले लो... मैंने उसे पूरे दिन के लिए रखा है... तुम उसकी चूत ले लो।"

शायद वो मुझे जगह दें।

शायद वो मुझे भी हिस्सा दें।

लेकिन नहीं।

अलोक ने मुझे देखा—एक पल के लिए।

फिर वापस सैंडी पर।

उसने धक्का नहीं रोका।

वो अपनी जगह दिखा रहा था—कुत्ती को।

कुत्ती को।

मेरा समय कम था।

चेकआउट का टाइम नज़दीक था।

नेहा बिस्तर पर लेटी थी—नंगी, जांघें खुली, चूत गीली, इंतज़ार में।

मैंने उसे जल्दबाज़ी में छोड़ा था।

लेकिन अब... अब मुझे लगा—अगर अलोक जी जगह नहीं दे रहे... तो मुझे कुछ तो लेना चाहिए।

आखिरी मौका था।

सैंडी को छूने का।

उसके बदन को महसूस करने का।

मैं बिस्तर पर चढ़ गया।

सैंडी की आँखें खुलीं—एक पल के लिए।

उसने मुझे देखा।

कोई मुस्कान नहीं।

बस... एक थकी हुई नज़र।

मैंने उसके स्तनों की तरफ हाथ बढ़ाया।

उन्हें छुआ—गोल, भारी, गर्म।

मसलने लगा—धीमे, लेकिन जल्दबाज़ी में।

निप्पल्स सख्त थे—मैंने उन्हें पिंच किया, खींचा।

सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."

दर्द भरी।

मैंने उसके स्तनों को चूमा—एक को मुँह में लिया, चूसा, जीभ घुमाई।

दूसरे को हाथ से मसलता रहा।

फिर नीचे—उसकी गहरी नाभि पर जीभ रखी।

उसकी पेट की मांसपेशियाँ सिकुड़ गईं।

मैंने उँगली उसकी नाभि में डाली—हल्के से खेला।

अलोक ने मुझे देखा—एक पल।

उसने धक्का नहीं रोका।

बस... जारी रखा।

उसकी गुर्राहट—"ले... ले रंडी..."

सैंडी की आँखें बंद हो गईं।

उसने कुछ नहीं कहा।

बस... ले रही थी।

मैं जल्दबाज़ी में था।

हर हिस्से पर समय कम था।

मैंने उसके स्तनों पर फिर से चूसा—जोर से।

मैंने सैंडी के बदन के साथ खेलना जारी रखा—जैसे वो कोई गुड़िया हो।

उसके स्तनों को मसलता रहा—नरम, भारी, गर्म।

निप्पल्स को पिंच किया, खींचा, चूसा।

उसकी नाभि में जीभ डाली, गहरी नाभि को चाटा।

उसकी चूत पर उँगली रखी—अलोक के लुंड के साथ, बाहर से रगड़ते हुए।

उसकी क्लिट पर हल्का दबाव।

लेकिन... सैंडी ने कोई जवाब नहीं दिया।

कोई आह नहीं।

कोई हल्की सी सिसकारी नहीं।

कोई मुस्कान नहीं।

उसका चेहरा लाल था—दर्द से, थकान से।

उसकी आँखें बंद थीं—भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए।

उसके बदन में कोई हरकत नहीं—बस... ले रही थी।

जैसे कोई गुड़िया।

जैसे कोई चीज़।

अलोक अभी भी धक्के दे रहा था—जोरदार, बेरहम।

उसकी गुर्राहट—"ले... ले रंडी..."


मैं बिस्तर पर घुटनों पर था।

मैंने अपना पजामा और अंडरवियर नीचे सरकाया।

मेरा लुंड बाहर आया—हार्ड, फड़कता हुआ।

मैंने सैंडी का सिर पकड़ा—उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए।

उसे अपनी तरफ खींचा—मेरे लुंड की तरफ।

"सैंडी... ले... मुँह में ले..."

लेकिन वो मुड़ी नहीं।

उसने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

उसकी आँखें बंद रहीं।

उसके होंठ बंद।

कोई जवाब नहीं।

मैंने जोर लगाया—उसके सिर को अपनी तरफ खींचा।

उसके होंठ मेरे लुंड से छू गए।

लेकिन वो रुकी नहीं।

उसने चेहरा और दूर किया।

उसकी आँखें खुलीं—एक पल के लिए।

उसकी नज़र में... अब कोई शरारत नहीं थी।

कोई खेल नहीं।

और एक छोटा सा... इनकार।

मैंने समझ लिया।

ये सैंडी... कल रात वाली सैंडी नहीं थी।

कल रात वो हँस रही थी।

खेल रही थी।

मज़े ले रही थी।

आज... वो बदल गई थी।

शायद अलोक जी ने उसे कुछ कहा था।

शायद उसे ब्रिफ किया था।

शायद उसे साफ़ कर दिया था—कौन मालिक है।

कौन फैसला करता है।

कौन कब... और कैसे।

मैंने उसका सिर फिर खींचने की कोशिश की।

लेकिन वो नहीं मानी।

उसने चेहरा और दूर किया।

उसकी आँखें बंद हो गईं।

मैंने हार मान ली।

मैं उसके चेहरे के पास झुका।

उसके होंठों के पास।

मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर रखने की कोशिश की।

किस करना चाहता था।

एक छोटा सा... स्पर्श।

मेरे होंठ उसके होंठों से छू गए।

लेकिन वो... स्थिर थी।

कोई जवाब नहीं।

उसके होंठ बंद।

उसकी साँसें तेज़, लेकिन कोई हरकत नहीं।

वो बस... ले रही थी।

अलोक ने मुझे देखा—एक पल।

उसने मुस्कुराया—वो पुरानी वाली मुस्कान।

फिर धक्का दिया—और गहरा।

सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."

अलोक का बदन पसीने से तर था—उसकी शर्ट पूरी तरह भीगी हुई, चिपकी हुई, सीने पर लगी हुई।

उसकी साँसें तेज़ थीं—जोर-जोर से, जानवर जैसी।

वो रुका—अचानक।

लेकिन अभी भी अंदर था।

उसका लुंड सैंडी की चूत में पूरी तरह दबा हुआ—नहीं हिल रहा था, बस... मौजूद था।

उसकी कलाइयाँ अब छोड़ दी थीं—सैंडी के हाथ बिस्तर पर फैले हुए थे, काँपते हुए, बेजान।

सैंडी का पूरा बदन थरथरा रहा था।

उसकी जांघें काँप रही थीं—एक हल्का सा, लगातार झटका।

उसकी चूत सिकुड़ रही थी—एक गहरा, लंबा ऑर्गेज़्म अभी-अभी आया था।

उसकी आँखें बंद थीं—भौंहें सिकुड़ी हुईं, होंठ कटे हुए, चेहरा लाल, पसीने से तर।

उसकी साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं—जैसे वो अभी भी उस धक्के के असर में हो।

पहली बार... उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी।

कोई शरारत नहीं।

बस... थकान।

और एक गहरी, बेबस संतुष्टि।

अलोक ने धीरे से खड़े होने की कोशिश की।

वो ऊपर उठा, लेकिन अभी भी अंदर था।

फिर... एक जोरदार थप्पड़।

उसने सैंडी के स्तन पर—बाएँ वाले पर—जोर से थप्पड़ मारा।

एक तेज़, गूंजता हुआ आवाज़।

सैंडी की आह निकली—"आह्ह..."

उसका स्तन लाल हो गया—हाथ का निशान साफ़।

ये थप्पड़... कोई प्यार नहीं था।

ये... एक रफ़, क्रूर तारीफ थी।

"अच्छा लिया... रंडी... इतना मोटा लुंड... पूरी तरह अंदर लिया।"

अलोक ने धीरे से बाहर निकाला।

उसका लुंड बाहर आया—चमकता हुआ, सैंडी के रस से भीगा हुआ, अभी भी हार्ड।

वो बिस्तर के किनारे पर खड़ा हो गया—साँसें तेज़, बदन पसीने से तर।

मैं उठा—जल्दबाज़ी में।

बिस्तर पर चढ़ गया।

अलोक की जगह ले ली—जैसे कोई जानवर मरे हुए शिकार पर झपटता है, जब शेर खा चुका हो।

मेरा लुंड बाहर

मैंने सैंडी की जांघें थोड़ी और चौड़ी कीं।

उसकी चूत अभी भी खुली थी—अलोक के बड़े, मोटे लुंड से फैली हुई, गर्म, गीली।

मैंने अपना लुंड उसके छेद पर रखा।

एक धक्का—सीधा, गहरा।

मेरा लुंड अंदर चला गया—जैसे चाकू मक्खन में।

उसकी चूत अभी भी कंपकंपा रही थी—अलोक के ऑर्गेज़्म का असर।

छेद अभी भी फैला हुआ था—सिकुड़ नहीं पाया था।

लेकिन... गर्मी।

एक गहरी, गर्म, नरम गर्मी।

मैंने धक्का नहीं दिया।

बस... अंदर रह गया।

महसूस करने लगा—उसकी चूत की गर्मी, उसकी नमी, उसकी सिकुड़न।

सैंडी ने आँखें खोलीं।

उसकी नज़र मेरी तरफ उठी।

उसके चेहरे पर... कोई मुस्कान नहीं थी।

लेकिन... एक छोटी, थकी हुई हँसी।

जैसे वो हँसना चाह रही हो, लेकिन हँस नहीं पा रही हो।

फिर... उसने एक जांघ ऊपर उठाई।

उसका पैर मेरी छाती पर रखा।

उसके पैर की उँगलियाँ—नाजुक, लेकिन मजबूत—मेरी छाती पर दब गईं।

उसने अंगूठे और तर्जनी से मेरी छाती की चमड़ी पकड़ी—जोर से पिंच किया।

"आआह्ह..."

मैंने आह भरी—दर्द से।

सैंडी ने जोर से धक्का दिया।

उसके पैर ने मुझे पीछे धकेला—जोर से, लगभग एक थप्पड़ जैसा।

मेरा लुंड बाहर निकल गया।

मैं पीछे की दीवार से टकराया—पीठ दीवार पर।

मेरा लुंड हार्ड, फड़कता हुआ, बाहर लटका हुआ।
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#23
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#24
सैंडी ने मुझे पैर से धक्का दिया—एक जोरदार, ठंडा धक्का।

उसका पैर मेरी छाती पर पड़ा—अंगूठा और तर्जनी ने मेरी स्किन पिंच की, फिर पूरी ताकत से धकेला।

मैं पीछे की दीवार से टकराया—पीठ दीवार पर, लुंड अभी भी बाहर, हार्ड, लेकिन अब बेजान लग रहा था।

वो धक्का... किसी भिखारी को भगाने जैसा था।

जैसे कोई अमीर बच्चा भिखारी को भगा रहा हो—नफरत से, हिकारत से।

मुझे भी भिखारी की तरह फील हो रहा था

सैंडी बिस्तर पर लेटी रही—जांघें अभी भी खुली, चूत लाल, सूजी हुई, रस बहता हुआ।

उसने मुझे देखा।

उसके चेहरे पर मुस्कान थी—वही मुस्कान जो कल रात थी, जो बालकनी में थी।

लेकिन अब... वो मुस्कान अलग थी।

अब उसमें कोई शरारत नहीं थी।

कोई खेल नहीं।

बस... एक ठंडी, घमंडी, तिरस्कार भरी मुस्कान।

वो उठी—धीरे से, लेकिन ग्रेस से।

उसकी शर्ट अभी भी कंधों पर लटकी हुई थी—बटन फटे हुए, स्तन आधे बाहर।

"चूत का भिखारी..."

कल रात वो मेरे पास आई थी। .. अपने आप से। .. जब वेटर ने उससे चाटा था। .. मगर अब

उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई।

मेरी हालत जैसे ... अमीर बच्चा महंगा खिलौना दिखाता है... फिर कहता है—तू अच्छा नहीं है... ये तेरे लिए नहीं।"

मैं खड़ा रहा।
मेरा लुंड हार्ड था

मेरा दिल धड़क रहा था—शर्म से, अपमान से।
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस... खड़ा रहा।

मैं खड़ा रहा—दीवार से टिका हुआ

अपमान... मेरे अंदर घुस चुका था।

एक गहरा, चुभता हुआ अपमान।

37 साल का आदमी हूँ—शादीशुदा, नेहा जैसी औरत के साथ, जो मुझ पर जान छिड़कती है।

फिर भी... आज... मैं एक भिखारी जैसा महसूस कर रहा था।

मुझे रोना आ रहा था।

नहीं... रोया नहीं।

लेकिन आँखें जल रही थीं।

गला रुँध रहा था।

मैंने सोचा—बस... चल पड़ूँ।

फिर भी... मैं हिला नहीं।

मैं जानता था—ये अपमान... ये 10-15 मिनट का अपमान... मुझे सैंडी को छूने का मौका देगा।

उसके बदन को महसूस करने का।

उसकी गर्मी को।

उसकी चूत की गर्मी को।

ये... इस पल में... मेरे लिए सेल्फ रिस्पेक्ट से ज़्यादा कीमती लग रहा था।

सैंडी ने बिस्तर पर बैठ गई।

उसके पैर ज़मीन पर थे—जांघें हल्की सी खुली हुईं।

उसकी चूत साफ़ दिख रही थी—लाइन साफ़, गीली, चमकती हुई।

उसका बदन पसीने से तर था—स्तन लटकते हुए, निप्पल्स लाल, सख्त।

शर्ट अभी भी कंधों पर लटकी हुई—बटन फटे हुए, आधा खुला।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सिर्फ़ साँसों की हल्की-हल्की आवाज़

वो मेरी तरफ देख रही थी।

फिर... धीरे से... उसने अपनी तर्जनी उँगली उठाई।

मेरी तरफ इशारा किया—एक छोटा, लेकिन साफ़ आदेश।

"इधर आ।"

उसके चेहरे पर मुस्कान थी—वही घमंडी, ठंडी मुस्कान।

मैंने कुछ नहीं कहा।

मेरा दिमाग खाली था।

मेरा दिल धड़क रहा था।

मैं... जैसे कोई जादू में फँसा हुआ... उसके पास चला गया।

धीरे-धीरे।

उसके बाईं तरफ खड़ा हो गया।

अलोक दाईं तरफ था—अभी भी हार्ड, लुंड बाहर, चमकता हुआ।

सैंडी ने अपना बायाँ हाथ बढ़ाया।

मेरी क्रॉच की तरफ।

उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर गईं—अंगूठा और तर्जनी के बीच में पकड़ लिया।

हल्का सा—जैसे कोई छोटी चीज़ हो।

फिर... हल्की सी हँसी निकली—एक छोटी, ठंडी, गुदगुदी वाली हँसी।

उसने अपना दायाँ हाथ बढ़ाया।

अलोक की तरफ।

उसका लुंड—मोटा, भारी—उसकी पूरी मुट्ठी में आ गया।

कसकर पकड़ा।

अंगूठा ऊपर से दबाव देता हुआ।

वो हमें दोनों तरफ से पकड़े हुए थी।

मेरा लुंड—उसकी दो उँगलियों में।

छोटा, हल्का, फड़कता हुआ।

अलोक का लुंड—उसकी पूरी मुट्ठी में।

मोटा, भारी, गहरा।

वो हमें करीब लाई।

मैं और अलोक—दोनों उसके इतने करीब कि हमारी साँसें एक-दूसरे से मिल रही थीं।

वो हमें देख रही थी—एक-एक करके।

मेरा लुंड... अलोक का लुंड।

तुलना कर रही थी।


उसकी मुस्कान गहरी हो गई।

उसने धीरे से कहा—आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं, बस... एक हल्की सी सच्चाई।

जैसे "देख... कितना फर्क है।

"कितना छोटा है.. " उसने धीरे से कहा—आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं, बस... एक ठंडी, घमंडी सच्चाई।

सैंडी ने दोनों लुंड पकड़े हुए थे—अलोक का पूरी मुट्ठी में, मेरी दो उँगलियों में।

वो धीरे-धीरे स्ट्रोक कर रही थी—अलोक के लुंड पर पूरी हथेली से, ऊपर-नीचे, गहरा दबाव, जैसे कोई भारी चीज़ को संभाल रही हो।

मेरे लुंड पर... बस अंगूठा और तर्जनी—हल्का सा, जैसे कोई छोटी चीज़ को छू रही हो।

उसकी उँगलियाँ मेरे लुंड पर सरक रही थीं—धीमे, लेकिन जानबूझकर।

फिर... उसने अलोक के फोरस्किन को पीछे धकेला।

उसका हेड बाहर आया—गहरा गुलाबी, मोटा, भारी, चमकता हुआ।

प्रीकम की एक मोटी बूँद टिप पर लटक रही थी—गाढ़ी, सफेद।

उसने मुझे दिखाया—उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं, बिना पलक झपकाए।

"देख... कितना बड़ा... कितना गहरा।"

फिर... उसने मेरे फोरस्किन को पीछे सरकाया।

मेरा हेड बाहर आया—हल्का भूरा, छोटा, पिंक।

वो मुस्कुराई—एक छोटी, ठंडी मुस्कान।


दोनों लुंड अब प्रीकम से चमक रहे थे—अलोक का पी हॉल गहरा, मोटा, जैसे कोई गड्ढा।

मेरा... छोटा, मुश्किल से दिखता हुआ।

सैंडी ने झुककर अलोक के लुंड की तरफ मुँह ले जाया—उसकी आँखें अभी भी मेरी आँखों में टिकी हुईं, बिना पलक झपकाए।

उसने जीभ निकाली—धीरे से, अलोक के हेड पर प्रीकम को चाटा।

फिर जीभ की नोक से उसके पी हॉल को रगड़ा—साफ करते हुए, गहराई से।

उसकी जीभ अंदर तक गई—एक छोटा सा चूसने जैसा।

अलोक की साँस भारी हो गई।

फिर... वो मेरी तरफ मुड़ी।

उसने मेरे लुंड को मेरी शर्ट के किनारे से रगड़ा—प्रीकम साफ करने के लिए।

उसकी उँगली पर लगी बूँद शर्ट पर फैल गई।

उसकी आँखें मेरी तरफ टिकी हुई थीं—ठंडी, घमंडी, लेकिन अब एक गहरी, जानबूझकर वाली क्रूरता के साथ।

कल रात... मैंने उसके चेहरे पर कम किया था।

मेरा सफेद, गाढ़ा कम उसके गालों पर, होंठों पर, नाक पर फैला था।

वो खुश थी—उसने जीभ निकालकर चाटा था, मुस्कुराई थी, "आह्ह... कितना गर्म... कितना ज़्यादा..." कहा था।

उसने मेरे कम को अपने चेहरे पर मल लिया था—जैसे कोई ट्रॉफी हो।

उसकी आँखें चमक रही थीं—खुशी से, मज़े से।

और आज... वो मेरे लुंड को छूने से भी इनकार कर रही थी।

उसने मेरे लुंड को दो उँगलियों से पकड़ा था—बस इतना कि मैं महसूस करूँ कि वो छू रही है।

फिर... हल्के से छोड़ दिया।

उसकी उँगली पर मेरा प्रीकम लगा था—एक पतली, लगभग अदृश्य बूँद।

उसने अपनी शर्ट के किनारे से रगड़कर साफ किया

मे जानत थी—वो मुझे अपमानित करना चाहती थी।

और अलोक... वो चाहता था कि मैं यहाँ आऊँ।

वो चाहता था कि मैं ये सब देखूँ—उसका "माल" कैसे यूज़ होता है, कैसे वो उसे बेरहमी से लेता है, कैसे वो उसे कंट्रोल करता है।

और मैं... मैं आ गया था।

खुद-ब-खुद।

जैसे कोई मक्खी शहद की तरफ खिंची चली आती है।

मेरा लुंड... अभी भी हार्ड था।

मुझे अपमान से जलन हो रही थी—एक गहरी, चुभती हुई जलन।

फिर भी... मैं हिला नहीं।

मैं कमरे से बाहर नहीं गया।
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#25
अभी भी बिस्तर के किनारे पर बैठी थी—उसकी जांघें हल्की-सी खुलीं,


मैं खड़ा था—दिल में एक गहरा दर्द, जैसे कोई चाकू चुभ गया हो।

कल रात... वो मेरे साथ हँसी थी।

मेरे लुंड को छुआ था।

मेरे कम को चाटा था।

मेरे चेहरे पर मुस्कुराई थी।

मुझे लगा था... शायद कुछ कनेक्शन है।

शायद कुछ स्पेशल।

शायद वो... मुझे थोड़ा-सा भी पसंद करती है।

लेकिन आज... उसका व्यवहार बता रहा था—ये सब प्रोफेशनल था।

बस काम।

बस डील।

मैं... बस एक क्लाइंट था।

एक और आदमी।


उसने अपना दायाँ हाथ बढ़ाया—अलोक की तरफ।

उसकी उँगलियाँ अलोक के बॉल्स पर गईं।

अलोक के बॉल्स... बड़े, भारी, जैसे दो गुलाब जामुन।

ट्रिम्ड बाल—काले, लेकिन सफेद बाल भी साफ़ दिख रहे थे।

उसने उन्हें कप किया—पूरी हथेली से, कसकर।

उसकी उँगलियाँ अलोक के बॉल्स पर सरक रही थीं—धीमे, लेकिन गहराई से।

अलोक की साँस भारी हो गई—एक छोटी सी गुर्राहट।

फिर... सैंडी ने मेरी तरफ देखा।

उसने इशारा किया—उँगली से—अलोक के बॉल्स की तरफ।

जैसे "देख... ये असली हैं।"

फिर... उसने अपना बायाँ हाथ मेरी तरफ बढ़ाया।

मेरे बॉल्स पर।

उसकी उँगलियाँ मेरे बॉल्स को कप कर रही थीं—टाइट ग्रिप।

मेरे बॉल्स छोटे थे—उसकी हथेली में आसानी से आ गए।

उसने दबाया—जोर से।

दर्द हुआ—एक तेज़, चुभता हुआ दर्द।

मैंने आह भरी—"आह्ह..."


उसने मेरे बॉल्स को और जोर से दबाया—एक पल के लिए।

फिर छोड़ दिया।

मेरा लुंड हिल गया—दर्द से।

वो हँसी—एक छोटी, ठंडी हँसी।

सैंडी ने मेरे बॉल्स को और जोर से दबाया—उसकी उँगलियाँ अब पूरी तरह कस गईं, जैसे कोई वाइस हो।

"आआह्ह..."

मेरे मुँह से एक तेज़, दर्द भरी आह निकली।

दर्द इतना तेज़ था कि मेरी आँखें झपक गईं।

मेरी टाँगें काँपने लगीं—मैं पीछे हटने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि मैं हिल नहीं पा रहा था।

वो मेरी तरफ देख रही थी—उसकी आँखें चमक रही थीं, मुस्कान अब और गहरी, और क्रूर हो गई।

उसने दबाव और बढ़ाया—धीरे-धीरे, जानबूझकर।

मेरा चेहरा लाल हो गया—दर्द से, शर्म से।

"प्लीज़... प्लीज़... नो... नो... नो..."

मैंने बड़बड़ाया—आवाज़ काँप रही थी, लगभग रोने वाली।


मेरा लुंड अब पूरी तरह ढीला था—दर्द ने सब कुछ खत्म कर दिया।

मेरी आँखें गीली हो गईं—शर्म से, अपमान से।

तभी... सैंडी ने ग्रिप ढीला किया।

उसकी उँगलियाँ अब हल्की-हल्की रगड़ रही थीं—दर्द कम हो गया, लेकिन जलन अभी भी बाकी थी।

वो हँसी—एक छोटी, ठंडी, कड़वी हँसी।

फिर... अलोक भी हँसा।

पहली बार... अलोक ने हँसा।

उसकी हँसी भारी, गहरी, जानवर जैसी।

दोनों एक साथ हँस रहे थे—मेरी तरफ देखकर, जैसे कोई मज़ाक हो।

जैसे मैं कोई जोक हूँ।

अलोक ने सिगरेट सुलगाई।

पहली कश ली—गहराई से, धुआँ फेफड़ों में भरते हुए।

फिर धीरे से बाहर छोड़ा—धुआँ मेरे चेहरे पर आया, गाढ़ा, कड़वा।

वो मेरी तरफ देख रहा था—आँखें सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं, बस एक ठंडी, जानबूझकर वाली नज़र।

पहली बार... उसने मेरी तरफ मुड़कर कुछ कहा।

"तो तूने सोचा था... सैंडी कल रात की तरह करेगी... तुझे चोदने देगी?"

उसने सिगरेट होंठों से हटाई, धुआँ फिर छोड़ा।

"वो मेरी कुत्ती है... और वो जानती है... कब चाटना है... और कब काटना है, भेनचोद।"

वो हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।

वो चुप थी—बस साँस ले रही थी, थकी हुई, लेकिन अब कोई मुस्कान नहीं।

अलोक ने सिगरेट फिर कश ली।


फिर बोला—आवाज़ में अब कोई मज़ाक नहीं, बस... सच्चाई।

"कल रात वो इसलिए सब कर रही थी... क्योंकि मुझे पता था तू उसका पति है।

मुझे पता था... तू मुझे नेहा से मिलवा सकता है।

तू... एक रास्ता था।

एक टूल था।

लेकिन अब... तू मेरे लिए कोई काम का नहीं रहा।

तू... बेकार हो गया।

तो अब... सैंडी तुझे छुएगी नहीं।

तेरा लुंड... वो देखेगी भी नहीं।

क्योंकि... तू अब... मेरे लिए कुछ नहीं है।

"कुत्ती" शब्द कमरे में गूंजा—एक छोटा, तेज़, कड़वा शब्द।

सैंडी ने आँखें उठाईं।

उसके चेहरे पर... एक मुस्कान फैल गई।

नहीं... कोई शर्म नहीं।

न कोई गुस्सा।

बस... एक गहरी, प्यार भरी, संतुष्ट मुस्कान।

जैसे किसी ने उसे कोई इनाम दिया हो।

जैसे किसी ने उसे उसकी असली जगह याद दिलाई हो—और वो उस जगह पर गर्व महसूस कर रही हो।

वो धीरे से झुकी।

अलोक की छाती की तरफ।

उसने होंठ अलोक के सीने पर रख दिए—एक गहरा, प्यार भरा किस।

उसकी जीभ हल्के से छू गई—जैसे कोई पुरस्कार स्वीकार कर रही हो।

"My master ..." उसने धीरे से फुसफुसाया—आवाज़ में कोई शर्म नहीं, बस... एक गहरी, आज्ञाकारी खुशी।

उसने अलोक की छाती पर फिर किस किया—इस बार और गहरा, और लंबा।

उसकी आँखें बंद हो गईं—जैसे वो इस पल में खो गई हो।

अलोक ने हल्के से हँसा—एक संतुष्ट, जानवर जैसी हँसी।

उसने सैंडी के बालों में हाथ फेरा—प्यार से, लेकिन मालिक की तरह।

"good Bitch ..."

"क्या देख रहा है भोसड़ीके... वो तेरी कभी नहीं हो सकती... चाहे तू कितना भी पैसे दे दे?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस... खड़ा रहा।

फिर मेरी तरफ देखा—उसकी आँखें सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं।

"जानता है क्यों?"

मैंने धीरे से पूछा—आवाज़ काँप रही थी।

"क्यों?"

अलोक ने मेरे लुंड की तरफ देखा—एक पल।

फिर हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।

"क्योंकि... ये।"

उसने मेरे छोटे लुंड की तरफ इशारा किया—जैसे कोई बेकार चीज़ हो।

"औरत असली कुत्ती तब बनती है... जब उसे कुत्ती की तरह चोदा जाए।

असली मर्द से।

असली लुंड से।

न कि... इस नन्हू से।"

सैंडी ने "नन्हू" सुनकर हल्की-सी गुदगुदी वाली हँसी निकाली—एक छोटी, ठंडी हँसी।

फिर चुप हो गई।

उसकी आँखें मेरी तरफ टिकी हुईं—बिना पलक झपकाए।

उसकी मुस्कान अब और गहरी हो गई—एक घमंडी, तिरस्कार भरी मुस्कान।

अलोक ने सिगरेट की एक और कश ली—धीरे से, जैसे वो मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा हो।

फिर... उसने फिर पूछा—आवाज़ में वही ठंडी, क्रूर धमकी।

"कितना समय हो गया तेरी शादी को... फिर से बता।"

मैं चुप रहा।

मेरा मुँह सूख गया था।

मैं कुछ नहीं बोल पा रहा था।

तभी... सैंडी का हाथ फिर मेरे बॉल्स पर गया।

उसकी उँगलियाँ कस गईं—धीरे-धीरे, लेकिन जानबूझकर।

दर्द फिर से शुरू हो गया—एक तेज़, चुभता हुआ दर्द।

मैं तुरंत बोल पड़ा—आवाज़ काँप रही थी, लगभग रोने वाली।

"छह महीने..."

अलोक ने जोर से हँसा—उसकी हँसी भारी, गंदी, संतुष्ट।

"हाहा... फ्रेश चूत... अभी तो हनीमून पीरियड है... वो अभी शिकायत नहीं करेगी।

लेकिन कुछ समय बाद... जब उसे बड़े लुंड दिखेंगे... तब वो अपने एक्स-बॉयफ्रेंड को याद करेगी... या अपने बॉस को... जिससे ब्लोजॉब देकर नौकरी ली होगी।"

उसकी बातें मेरे दिमाग में चाकू की तरह उतर रही थीं।

मैं सोच रहा था—ये आदमी अमीर है... ये सब उसके पास है...।

या... ये बस एक पोर्नो मूवी का सीन बना रहा है... सब कुछ झूठ... सब कुछ बनावटी।

लेकिन... एक बात मेरी नज़र से नहीं छुपी।

नेहा।

वो बालकनी में देख रही थी।

सैंडी के जाने के बाद भी

उसकी आँखें... डेविड और विशाल के लुंड पर टिकी हुई थीं।

बड़े लुंड पर।

मोटे, भारी, लटकते हुए।

उसने देखा था—बिना पलक झपकाए।

उसकी साँसें तेज़ थीं।

उसकी जांघें काँप रही थीं।

और अब... वो मेरे दिमाग में थी।

नेहा।

मेरी नेहा।

क्या वो भी... कभी... सोचेगी... कि मैं... काफी नहीं हूँ?

क्या वो भी... बड़े लुंड को देखकर... याद करेगी... किसी और को?

वो धीरे से बोला—आवाज़ में कोई मज़ाक नहीं, बस... एक साफ़, बेरहम फैसला।

"मैं देखना चाहता था... कि तू अपनी बीवी को कुतिया बना सकता है कि नहीं।

पहले तू चोदे... फिर तेरे दोस्त शामिल हों... फिर और... फिर और।

ये सब... मैंने इसलिए किया।

इसलिए तुझे दोस्त बनाना चाहा था।

ताकि नेहा... मेरे सामने आए।

ताकि मैं उसे... सिखाऊँ... असली मज़ा क्या होता है।"

वो हँसा—एक छोटी, कड़वी हँसी।

"लेकिन... तेरे लुंड को देखकर... सब साफ़ हो गया।

तू कभी नहीं बना सकता उसे अपनी कुतिया ।

वो कभी तेरी आज्ञा नहीं मानेगी।

अलोक ने सिगरेट की आखिरी कश ली—फिर उसे राखदान में ठोक दिया।

धुआँ अभी भी हवा में लहरा रहा था, मेरे चेहरे पर चिपक रहा था।

वो मेरी तरफ देख रहा था—उसकी आँखें अब और सिकुड़ी हुईं, मुस्कान नहीं, बस एक ठंडी, जानबूझकर वाली सच्चाई।

वो धीरे से बोला—आवाज़ में कोई जल्दबाज़ी नहीं, बस... एक गहरा, बेरहम फैसला।

"हालाँकि... तेरी बीवी में... अच्छी कुतिया बनने की पूरी काबिलियत है।

मुझे शायद तेरी ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी उसे ट्रेन करने की।"

वो रुका—एक पल के लिए।

फिर मुस्कुराया—एक छोटी, कड़वी मुस्कान।

"वो नेचुरल कुतिया है।

तूने खुद देखा था... ब्रेकफास्ट टेबल पर।

जब मैंने कहा था... कि मैं उसे होटल शूट के लिए सुपरमॉडल समझ बैठा था... वो कैसे हँस रही थी... शरमा रही थी... उसके गाल लाल हो गए थे।

और उसने... मेरे हाथ को छुआ था।

हल्के से... लेकिन जानबूझकर।

उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों पर रुकी थीं... एक सेकंड ज़्यादा।

वो... पहले से ही तैयार थी।

बस... एक छोटा सा झूठ... एक छोटा सा फेक शूट... थोड़ा सा समय... और थोड़ा सा ट्रेनिंग... इस मॉन्स्टर से।"

उसने अपना लुंड पकड़ा—जो अभी भी हार्ड था, मोटा, भारी, चमकता हुआ।

उसने उसे हल्के से हिलाया—मेरी तरफ इशारा करते हुए।

"ये... ये उसे सिखाएगा।

कैसे आज्ञा माननी है।

कैसे घुटनों पर बैठना है।

कैसे चाटना है।

कैसे काटना है।

तेरी नेहा... वो भी... कुछ ही दिनों में... मेरे सामने घुटनों पर बैठेगी।

"फिर... तेरी नेहा को... मेरे लुंड की ताकत का पता चलेगा।

वो सुख... जो तूने कभी उसे नहीं दिया... वो उसे मिलेगा।

वो मेरे लुंड के लिए तरसेगी।

वो तुझसे गिड़गिड़ाएगी... कि मुझे अलोक भाई के फार्महाउस ले चलो।

वहाँ... उसे और लुंड मिलेंगे।

डेविड का... विशाल का... और भी।

वो... अच्छी गुलाम बनेगी।

हमारे लिए खाना बनाएगी... और किचन में मेरे कुक से चुदेगी।

गार्डन में... मेरे माली से... खुली हवा में... चुदेगी।

सर्वेंट क्वार्टर में... उनके गंदे बिस्तर पर... सोएगी।

और तू... बस... देखता रहेगा।


वो तुझे... तभी चाहिएगी... जब वो रंडी की तरह बेरहमी से चुदकर थक जाएगी।

तब... वो तुझसे... अपनी चूत चटवाएगी।

तेरी जीभ... उसकी चूत पर।

बस... इतना ही।

तेरा काम... बस इतना ही रहेगा।"

सैंडी ने अलोक की छाती पर सिर रखा—उसकी जीभ अलोक के निप्पल पर थी, धीरे-धीरे चाट रही थी।

उसका दायाँ हाथ अलोक के लुंड पर था—ऊपर-नीचे, कसकर।

उसका बायाँ हाथ... मेरे बॉल्स पर था—हल्का-सा छू रहा था, लेकिन कोई दबाव नहीं।

बस... एक हल्की सी छुअन—जैसे वो कह रही हो—"देख... मैं छू सकती हूँ... लेकिन तुझे कुछ नहीं दूँगी।"

मैं नहीं समझ पा रहा था—ये अपमान... ये शर्म... ये सब... फिर भी मुझे उत्तेजित कर रहा था।

मेरा लुंड... अब पूरी तरह हार्ड था।

फड़क रहा था।

अलोक के शब्दों में "चूत चटवाएगी" आया।

सैंडी के शरीर में एक झटका लगा।

जैसे कोई कोड एक्टिवेट हो गया हो।

उसकी जीभ अलोक के निप्पल से हट गई।

उसने धीरे से एक पैर ज़मीन से उठाया—बिस्तर पर रख दिया।

दूसरा पैर अभी भी ज़मीन पर था।

उसकी जांघें अब पूरी तरह खुल गईं—चूत अब साफ़, खुली, मेरे सामने।

पहले सिर्फ़ एक लाइन दिख रही थी... अब पूरी चूत—लाल, सूजी हुई, गीली, चमकती हुई।

उसने अपना बायाँ हाथ मेरे बॉल्स से हटाया।

फिर मेरे सिर पर ले आई।

उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में उलझ गईं—कसकर।

उसने मेरा सिर नीचे खींचा—एक आदेश की तरह।

"चाट..."

उसकी आवाज़ में अब कोई हँसी नहीं थी।

बस... एक साफ़, ठंडा आदेश।

मेरा सिर उसकी चूत के सामने था।

उसकी खुशबू—गर्म, मीठी।

मैंने जीभ निकाली—धीरे से।

उसकी चूत पर रखी।

उसका रस मेरी जीभ पर लगा—गाढ़ा, नमकीन, गर्म।

मैं अब लगभग घुटनों पर था... मेरा चेहरा सैंडी की चूत के ठीक सामने।
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#26
उसकी जांघें पूरी तरह फैली हुईं ।

मेरी जीभ पहले से ही काम कर रही थी—क्लिट पर गोल-गोल, फिर अंदर तक... उसका रस मेरी जीभ पर फैल रहा था—नमकीन, गर्म, चिपचिपा।

हर चाट के साथ वो और ज़्यादा रस दे रही थी।

उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में कसी हुई थीं—मेरा सिर नीचे दबा रही थीं, ठीक जहाँ वो चाहती थीं।

उसकी आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं—बस एक गहरी, भूखी हल्की गुर्राहट।

मेरा एक हाथ मेरे लुंड पर था—रॉक हार्ड, फड़कता हुआ।

मैं उसे सहला रहा था—धीमे-धीमे ऊपर-नीचे, हर स्ट्रोक के साथ और सख्त होता जा रहा था।

अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और उत्तेजित कर रहा था।

तभी सैंडी ने एक लंबी, गहरी आह भरी—"आआह्ह्ह्ह..."

उसने अपना दूसरा हाथ बढ़ाया—अलोक जी के लुंड की तरफ।

उसने उसे पकड़ा—कसकर, पूरी मुट्ठी में।

फिर धीरे से खींचा—अलोक जी को और करीब लाया।

अलोक जी की जांघें मेरी जांघों से छू गईं—गर्म, बालों वाली, भारी।

उनका लुंड अब मेरे सिर के ठीक ऊपर था—मोटा, भारी, चमकता हुआ।

सैंडी ने अपना मुँह खोला।


उसने अलोक जी का लुंड अंदर लिया—धीरे से, होंठ फैलाकर, गले तक।


उसकी जीभ हेड पर घूम रही थी—चाट रही थी, चूस रही थी।

ऊपर से... गीली चूसने की आवाज़ें आ रही थीं—चक... चक... चक...

और नीचे... मेरा मुँह अभी भी उसकी चूत पर था।

मैं चाटता रहा—क्लिट पर जीभ, अंदर उँगलियाँ, रस पीता रहा।

लोक जी ने सैंडी के बाल पकड़ लिए—मुट्ठी भर बाल, कसकर।

उन्होंने उसका सिर पीछे खींचा—फिर जोर से आगे धकेला।

उनका मोटा, भारी लुंड उसके मुँह में पूरी तरह घुस गया—गले तक।

घोक... घोल... घोक...

मुँह से वो गीली, चिपचिपी आवाज़ें आ रही थीं—हर धक्के के साथ।

सैंडी का मुँह खुला हुआ था—होंठ फैले हुए, लार बह रही थी।


उसकी लार... मेरे चेहरे पर गिर रही थी।

गर्म, चिपचिपी, मेरी ठोड़ी पर, गालों पर, मेरी जीभ पर—जो अभी भी उसकी चूत पर थी।

मैं चाटता रहा—क्लिट पर जीभ घुमाता रहा, अंदर उँगलियाँ डालता रहा, अलोक जी का रस चाटता रहा।

सैंडी की साँसें रुक-रुक कर आ रही थीं।

उसकी उँगलियाँ मेरे बालों में ढीली पड़ गईं—वो दम घुट रहा था।


अलोक जी ने एक और गहरा धक्का दिया—लुंड गले तक, नाक उसके पेट से लग गई।

फिर... उन्होंने सिर छोड़ा।

सैंडी पीछे हटी—लुंड बाहर निकला।

उसने जोर से खाँसा—खाँसी, साँस लेने की कोशिश।

लार उसके होंठों से, ठोड़ी से बह रही थी—मेरे चेहरे पर गिर रही थी।

वो साँस ले रही थी—जोर-जोर से।

फिर... मुस्कुराई।

एक थकी हुई, लेकिन संतुष्ट मुस्कान।

अलोक जी ने पूछा—आवाज़ में मालिक वाली ठंडक।

"कैसा लगा कुतिया ?"

सैंडी ने सिर हिलाया—हाँ में।

उसकी आवाज़ अभी भी काँप रही थी—खाँसी के बाद।

"हम्म्म..."

अलोक जी ने मेरी तरफ देखा।

फिर सैंडी से पूछा—मेरे बारे में।

"और ये?"

सैंडी ने मेरी तरफ देखा—एक पल।

फिर धीरे से बोली—आवाज़ में अब कोई ठंडक नहीं, बस... एक सच्चाई।

"अच्छा काम कर रहा है... बहुत अच्छा।"

अलोक जी ने जोर से हँसा—उसकी हँसी भारी, गंदी, संतुष्ट।

"हाँ... ये चूतिए... चूत चाटने में ही बेहतर होते हैं।

चोदने में नहीं... बस... चाटने में।"

सैंडी भी हँसी—एक छोटी

मैं चाटता रहा।

मेरा लुंड... मेरे हाथ में... फड़क रहा था।

मैं सहला रहा था—तेज़-तेज़।

अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और उत्तेजित कर रहा था।

अलोक ने अपना लुंड—प्रीकम और सैंडी की लार से चमकता हुआ—उसके चेहरे पर रगड़ा।

धीरे-धीरे, जानबूझकर, जैसे कोई मालिक अपनी कुत्ती को सहला रहा हो।

फिर प्लेफुल अंदाज़ में बोले—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत, लेकिन नीचे से गहरी धमकी।

"बता... क्या पसंद करेगी?

मैं तुझे चोदूँ... या ये चूतिया तुझे चाटे?"

सैंडी ने हल्के से हँसी—एक छोटी, शरारती हँसी।

फिर अलोक जी की आँखों में देखकर बोली—आवाज़ में नखरे।

"ये..."

हम सब जानते थे वो क्या चुनेगी।

लेकिन वो जानबूझकर अलोक जी को चिढ़ा रही थी।

अलोक जी की आँखें सिकुड़ गईं।

"अच्छा... भेन की लोड़ी..."

उन्होंने सैंडी के बाल पकड़े—जोर से, आक्रामक तरीके से।

उसका सिर पीछे खींचा।

फिर अपना लुंड उसके चेहरे पर जोर से टैप किया—एक... दो... तीन बार।

फिर बिना रुके... फिर से उसके मुँह में घुसा दिया।

घोक... घोल... घोक...

रफ़... बेरहम।

उसका लुंड गले तक जा रहा था।

सैंडी की आँखें पानी से भर गईं—लेकिन वो रुकी नहीं।

उसकी लार बह रही थी—जोर-जोर से, मेरे चेहरे पर गिर रही थी।

मेरा चेहरा अब पूरी तरह गीला था—उसकी लार, अलोक जी का प्रीकम, सब मिलकर।

मैं चाटता रहा।

मेरी जीभ उसकी क्लिट पर तेज़ हो गई—गोल-गोल, चूसते हुए।

उँगलियाँ अंदर-बाहर—गहरे, तेज़।

उसकी चूत सिकुड़ रही थी—एक बड़ा ऑर्गेज़्म आने वाला था।

मेरा हाथ मेरे लुंड पर था—तेज़-तेज़ सहला रहा था।

अपमान... शर्म... सब कुछ... मुझे और सख्त कर रहा था।

सैंडी की आहें अब ऊँची हो गईं—मुँह में लुंड होने के बावजूद।

"हम्म्म... आह्ह..."

फिर... वो पहले झड़ी।

उसकी चूत सिकुड़ गई—एक गहरा, लंबा ऑर्गेज़्म।

उसका रस मेरी जीभ पर बहा—जोर से, गाढ़ा, गर्म।

मैं चाटता रहा—हर बूँद, हर ड्रॉप।

उसकी जांघें मेरे कंधों पर काँप रही थीं।

दूसरा... मैं था।

मेरा हाथ तेज़ हो गया—लुंड फड़क रहा था।

मैंने आखिरी स्ट्रोक दिया—जोर से।

मेरा कम फर्श पर गिरा—गाढ़ा, सफेद, चमकता हुआ।

मैं थककर पीछे झुक गया—साँसें तेज़।

तीसरा... अलोक जी।

उन्होंने सैंडी के बाल और कस लिए।

एक आखिरी, गहरा धक्का—गले तक।

फिर... रुक गए।

उनका लुंड फड़का—जोर से।

उन्होंने सब उसके मुँह में छोड़ दिया—गाढ़ा, भरपूर।

सैंडी ने सब लिया... बिना छोड़े।

उसकी गाल फूल गए

अलोक जी ने बाहर निकाला।

सैंडी ने साँस ली—खाँसी, फिर मुस्कुराई।

उसकी ठोड़ी पर थोड़ा सा कम था—वो जीभ से चाट लिया।

अलोक जी ने मेरी तरफ देखा—फिर सैंडी की तरफ।

मैं उठ खड़ा हुआ।

कम से कम 45 मिनट हो चुके थे।

नेहा को बोला था—15 मिनट में आता हूँ।

और अब... ये सब...

मेरा लुंड अभी भी हल्का सा फड़क रहा था—कम करने के बाद भी।

मैंने जल्दी से पजामा ऊपर किया।

चेहरा अभी भी सैंडी के रस से गीला था—उसकी चूत का रस, अलोक जी का रस, लार—सब मिलकर मेरी ठोड़ी, गाल, होंठों पर चिपका हुआ।

मैंने हाथ से पोंछा—लेकिन ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।

अलोक जी ने मुझे देखा।

बिना कुछ बोले... अपना पर्स निकाला।

एक कार्ड निकाला—काला, मोटा, सिर्फ़ एक नंबर और नाम।

उन्होंने वो कार्ड मेरी जेब में सरका दिया—बिना एक शब्द बोले।

फिर... बस... मुस्कुराए।

वो पुरानी वाली मुस्कान।

मैं सैंडी की तरफ झुका।

उसका मुँह अभी भी बंद था—अलोक जी का कम अभी भी उसके मुँह में था।

वो निगल नहीं रही थी।

उसकी साँसें तेज़ थीं।

मैंने उसे गले लगाया—एक आखिरी बार।


उसका बदन गर्म था—पसीने से तर।

मैंने उसके होंठों पर हल्का-सा किस किया—बस होंठ छुए।

वो स्थिर रही—कोई जवाब नहीं।

लेकिन उसकी साँस मेरे चेहरे पर लगी।

मैं पीछे हटा।

तभी... अलोक जी की आवाज़ आई—ठंडी, लेकिन मज़ाक वाली।

"भेनचोद... ये कौन साफ़ करेगा?"

उन्होंने फर्श पर इशारा किया—मेरा कम।

सफेद, चमकता हुआ, फर्श पर फैला हुआ।

मैंने एक सेकंड रुका।

फिर... कमरे में पड़ा हुआ हैंड टॉवल उठाया।

घुटनों पर बैठ गया।

अपना कम साफ़ करने लगा—धीरे-धीरे, शर्म से।

तभी... सैंडी ने अपना मुँह खोला।

अलोक जी का कम उसके मुँह से बाहर गिरा—गाढ़ा, सफेद, फर्श पर।

वो हँसी—एक छोटी, थकी हुई हँसी।

अलोक जी ने फिर कहा—आदेश की तरह।

"इसे भी साफ़ कर।"

मैंने साफ़ किया।

उनका कम... मेरा कम... सब।

फर्श अब साफ़ था।

अलोक जी ने फिर हँसा।

"गुड बॉय... ये तेरी ड्यूटी होगी... अगर तू मेरे फार्महाउस आएगा।"

सैंडी भी हँसी—उसकी हँसी थकी हुई, लेकिन संतुष्ट।

मैं उठा।

एक आखिरी बार सैंडी की तरफ देखा—उसका नंगा बदन, गोरी स्किन, लाल निशान, गीली चूत।

फिर अलोक जी के लुंड की तरफ—अभी भी आधा सख्त, मोटा, भारी।

मेरा... छोटा, ढीला।

मैंने कुछ नहीं कहा।

पीछे मुड़ा।

दरवाज़ा खोला।

बाहर निकला।
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#27
Very very erotic story please update more
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#28
मैं जल्दी से कमरे से बाहर निकला।

दरवाज़ा बंद करते ही सीढ़ियाँ उतरने लगा—लिफ्ट का इंतज़ार करने का समय नहीं था।

दिल धड़क रहा था—जोर-जोर से।

चेहरा अभी भी गीला था—सैंडी के रस, अलोक जी के रस, लार—सब मिलकर।

मैंने शर्ट के आस्तीन से पोंछा—लेकिन वो खुशबू... वो एहसास... सब मेरे अंदर था।

कमरे के दरवाज़े पर पहुँचा।

कार्ड लगाया।

दरवाज़ा खुला।

नेहा अंदर थी—पूरी तरह तैयार।

बाल बाँधे हुए, मेकअप हल्का सा, बैग पैक करके तैयार।

वो सोफे पर बैठी थी—हाथ गोद में, नज़र नीचे।

मैंने उसे देखा।

वो चुप थी।

कोई सवाल नहीं।

कोई गुस्सा नहीं।

बस... चुप।

मैंने हल्के से मुस्कुराने की कोशिश की।

"सॉरी... देर हो गई।

रिसेप्शन पर बहुत टाइम लगा... फिर लोकल मार्केट गया... चेरी पिकिंग के बारे में पूछने।"

नेहा ने सिर ऊपर किया।

उसकी आँखें... थोड़ी लाल थीं।

जैसे रोई हो।

उसने धीरे से कहा—आवाज़ में कोई भावना नहीं।

"कोई बात नहीं।

मुझे घर जाना है।

अब... बस घर।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस... सिर हिलाया।

फोन उठाया।

रूम सर्विस को कॉल किया—लगेज़ लेने के लिए।

वही लड़का आया—जिसने कल नेहा को टॉपलेस देखा था।

उसने मुस्कुराया—एक छोटी, जानकार वाली मुस्कान।

नेहा ने नज़र नहीं मिलाई।

वो सोफे पर बैठी रही—नज़र नीचे।

मैं चेकआउट के फॉर्म भरने लगा।

नेहा चुपचाप बैठी रही।

लड़के ने लगेज़ उठाया।

हम बाहर निकले।

लिफ्ट में नेहा मेरे बगल में खड़ी थी।

उसकी पायल हल्की-सी बज रही थी।

मैंने उसका हाथ पकड़ा।

वो हाथ नहीं छुड़ाया।

लेकिन... कोई जवाब भी नहीं दिया।

लॉबी में पहुँचे।

बिल सेटल किया।

कार बाहर थी।

लॉबी में नेहा सोफे पर बैठी थी—जींस और टी-शर्ट में, साधारण लेकिन खूबसूरत।

बाल खुले हुए, चेहरा थोड़ा थका हुआ, लेकिन आँखें साफ़, चुपचाप फोन स्क्रॉल कर रही थी।

डेविड और विशाल लॉबी के दूसरे कोने में बैठे थे—कॉफी के कप हाथ में, लेकिन नज़रें नेहा पर।

वे धीमे-धीमे बात कर रहे थे—विस्परिंग, लेकिन इतना कि पास बैठे लोग सुन न सकें।

उनकी हँसी छोटी-छोटी, गंदी, जानकार वाली।

विशाल ने पहले बोला—आवाज़ में वो पुरानी वाली शरारत।


"यार... जो कल हमने बम फोड़ा था... अब जो बम हमारे पास है... वो तो और ज़्यादा आवाज़ करेगा।"

डेविड ने

नेहा सुन रही थी।

उसकी आँखें फोन पर थीं—लेकिन कान उन पर थे।

वो सब समझ रही थी—हर शब्द।

बालकनी में... वो सब देखा था।

डेविड और विशाल के नंगे लुंड—मोटे, भारी, लटकते हुए।

सैंडी के चेहरे पर तपतपाते हुए।

दी-गंदी गालियाँ देते हुए।

वो सब... नेहा ने देखा था।

उसकी साँसें तेज़ हुई थीं।

उसकी जांघें काँपी थीं।

और... ये दोनों... उसकी तुलना सैंडी से कर रहे थे।

"बम फोड़ा था"... "अब ये और ज़्यादा आवाज़ करेगा"।

नेहा का चेहरा स्ट्रेट था।

कोई एक्सप्रेशन नहीं।

न गुस्सा।

न शर्म।

न मुस्कान।

बस... एक खाली, शांत चेहरा।

उसकी आँखें फोन पर टिकी हुईं—लेकिन वो सब सुन रही थी।

डेविड ने फिर धीमे से कहा—आवाज़ में वो पुरानी वाली भूख।

अब... सोच... अगर ये... हमारे सामने घुटनों पर बैठ जाए... हम दोनों... एक साथ।

सैंडी से भी ज़्यादा... आवाज़ आएगी।"

नेहा ने फोन बंद किया।

धीरे से उठी।

उसकी पायल हल्की-सी बजी।

वो दोनों की तरफ नहीं देखी।

बस... चुपचाप बाहर की तरफ चल पड़ी।

नेहा लॉबी में खड़ी थी—जींस और टी-शर्ट में, बैग कंधे पर, बाहर जाने की तैयारी में।

उसकी कमर सीधी, लेकिन चलते वक्त उसकी गांड हल्की-सी लहरा रही थी—साधारण, लेकिन आकर्षक।

डेविड और विशाल लॉबी के कोने में बैठे थे—कॉफी के कप हाथ में, लेकिन नज़रें नेहा पर।

उनकी आँखें उसकी गांड पर टिकी हुई थीं—भूखी, गंदी, जैसे वो उसे निगल जाना चाहते हों।

डेविड ने विशाल के कान में फुसफुसाया—आवाज़ इतनी धीमी कि सिर्फ़ पास वाले सुन सकें।

"यार... अगर अलोक भाई ने रात भर इसके साथ बिताई... तो ये ठीक से चल भी नहीं पाएगी।"

दोनों ने एक साथ हँसी—छोटी, गंदी, जानकार वाली हँसी।

नेहा ने आखिरी शब्द सुने—"ठीक से चल भी नहीं पाएगी"।

उसका कदम एक पल के लिए रुक गया।

उसकी पीठ सीधी हो गई—कोई एक्सप्रेशन नहीं, बस एक छोटा सा झटका।

वो मुड़ी नहीं।

बस... बाहर की तरफ बढ़ गई।

मैं पीछे-पीछे आया—उसके साथ।

डेविड और विशाल ने मुझे देखा।

दोनों ने हाथ हिलाया—एक मज़ाकिया, "बाय" वाला जेस्चर।

जैसे कह रहे हों—"अभी तो जा... लेकिन जल्दी ही मिलेंगे।"

मैंने भी हल्का सा हाथ हिलाया—बिना मुस्कुराए।

फिर नेहा के साथ बाहर निकला।

कार के पास पहुँचे।

नेहा ने दरवाज़ा खोला—पीछे की सीट पर बैठ गई।

मैं ड्राइवर सीट पर।

इंजन स्टार्ट किया।

कार चल पड़ी।

कार में सन्नाटा था।

केवल इंजन की हल्की गड़गड़ाहट, एसी की सिसकारी, और कभी-कभी नेहा की साड़ी की सरसराहट जब वो खिड़की की तरफ मुड़ती।

मैं ड्राइव कर रहा था—आँखें सड़क पर, लेकिन दिमाग कहीं और।

पिछले 24 घंटे... जैसे कोई सपना हो... या कोई बुरा मजाक।

वेटर ने नेहा को टॉपलेस देखा था।

मैंने देखा था... और मुझे अच्छा लगा था।

उसकी नजरें नेहा के स्तनों पर टिकीं... और मैंने उसे रोका नहीं।

बल्कि... मैंने एंजॉय किया।

फिर... ऑर्गी में शामिल हो गया।

डेविड, विशाल, अलोक ... सैंडी के साथ।

मैंने लगभग सैंडी को चोदा था—इंस्टा मॉडल, जिसे देखकर कल्पना करता था।

लेकिन... कभी सच में नहीं छुआ।

फिर... अपनी ही पत्नी के साथ... लाइव सेक्स सीन देखा।

नेहा... मेरी मासूम नेहा... बालकनी

डेविड और विशाल के नंगे लुंड देख रही थी।

उसकी साँसें तेज़ थीं... जांघें काँप रही थीं।

वो सब... मैंने देखा था।

फिर... अपमान।

सैंडी ने मुझे "चूत का भिखारी" कहा।

अलोक जी ने कहा—"नन्हू"।

मैंने चाटा—उनका कम, उसकी चूत से।

मेरा कम फर्श पर... और मैंने साफ़ किया।

उनके हँसने की आवाज़ अभी भी कानों में गूंज रही थी।

नेहा खिड़की की तरफ देख रही थी।

बाहर की सड़कें धुंधली हो रही थीं—कार की स्पीड से, या आँखों में आते पानी से।
वो चुप थी।

बहुत चुप।

उसके मन में... एक तूफान चल रहा था।

नेहा के मन की बातें...

वो बूढ़ा आदमी... अलोक।

रिसेप्शन पर... ब्रेकफास्ट पर... वो मुझे देखकर मुस्कुराया था।

"क्या आप किसी एजेंसी से आई हैं?"

उसने पूछा था।

उसकी आँखों में वो भूख... वो लालच... जैसे मैं कोई चीज़ हूँ... कोई सामान।

उसे लगा... मैं वो लड़की हूँ... जो पैसे लेकर आती है।

प्रॉस्टिट्यूट।

उसे लगा... मैं सैंडी हूँ।

उसने सोचा... मैं उसके साथ रूम में... बालकनी में... उसके दोस्तों के साथ... चुदूँगी।

चीप ... बहुत चीप आदमी।

और मैं... मैंने उसकी उँगलियों को छुआ था।

उसके हाथ पर... हल्का-सा स्पर्श।

मैंने शरमाई थी।

हँसी थी।

क्यों?

क्यों मैंने उसे रोका नहीं?

क्यों मैंने उसकी बातों पर हँसकर जवाब दिया?

अब... वो लोग मेरे बारे में बात कर रहे थे।

"बम फोड़ा था..."

"ये और ज़्यादा आवाज़ करेगा..."

"अगर अलोक भाई ने रात भर इसके साथ बिताई... तो कल ये ठीक से चल भी नहीं पाएगी।"

मैंने सुना।

हर शब्द सुना।

मेरी गांड पर उनकी नज़रें... जैसे वो मुझे निगल जाना चाहते हों।

मुझे... सैंडी समझ रहे थे।

मुझे... चीप ... नखरे वाली... लेकिन अलोक जी से लाइन पर लाई जा सकती हूँ।

मैंने सोचा... अगर मैं सैंडी होती... तो क्या होता?

उनके सामने घुटनों पर... उनके लुंड... मेरे मुँह में... चेहरे पर...

और मैं... खुश होती?

मैं... हँसती?

मैं... आहें भरती?

मुझे... अच्छा लग रहा था।

सोचते हुए... मेरी साँसें तेज़ हो रही थीं।

मेरी जांघें काँप रही थीं।

मैं... खुद को रोक नहीं पा रही थी।

लेकिन... सैम... मेरे मासूम सैम।

वो क्या सोचेंगे?

अगर उन्हें पता चले... कि मैंने क्या सुना... क्या सोचा...

वो... क्या सोचेंगे मेरे बारे में?

कि मैं... सस्ती हूँ?

कि मैं... किसी और के लिए तरस रही हूँ?

कि मैं... उनकी बीवी नहीं... बस... एक औरत हूँ... जो बड़े लुंड देखकर शरमा जाती है?

कार चलती रही।

सन्नाटा अब इतना गहरा हो चुका था कि बाहर की हवा की आवाज़ भी कम लग रही थी।

मैंने दाएँ हाथ से शर्ट की जेब टटोली।

कार्ड अभी भी वहाँ था—काला, मोटा, चिकना।

अलोक

केवल एक नंबर।

फार्महाउस इन्विटेशन्स ओनली।

ये कार्ड... ये एकमात्र चीज़ थी जो साबित कर रही थी कि जो हुआ... वो सपना नहीं था।

वरना सब... एक भयानक, गंदा, उत्तेजक सपना लगता।

बाकी सब... धुंधले, असली लगने वाले सपने जैसे।

मेरे पास अब क्या बचा था?

सैंडी की याद—उसकी ठंडी मुस्कान, उसकी कड़वी हँसी, उसकी चूत की गर्मी मेरी जीभ पर, उसका "चूत का भिखारी" कहना।

ये कार्ड—जो मेरी जेब में जल रहा था।

होटल की लॉन्ड्री बैग—जिसमें नेहा की लाल लेस वाली ब्रा और पैंटी थीं।

उन पर अब 5-6 अलग-अलग आदमियों का कम था अभी भी ट्रॉली में था, पीछे की सीट पर।

नेहा को पता नहीं था।

या शायद... पता था।

और ये लंबा सन्नाटा सड़क पर।

जैसे तूफ़ान आने से पहले की शांति।

Chapter 2 – समाप्त।

अगला अध्याय – हमारा अतीत

( मेरा अतीत... नेहा का अतीत... हमारी ट्रेनिंग... इस अलग दुनिया से पहली मुलाकात... थोड़ा बाई-क्यूरियस... थोड़ा इनसेस्ट... और आखिर में... पति का अंत )
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#29
Please update bro waiting for next part
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#30
Please update jldi kre or big update we all are waiting
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#31
Bhai khani ko sahi trike se likho aadi hi samj me aa rhi h kya bakwas trike se likh rhe ho
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#32
Chapter 3 – Past & Present



शाम के 8 बज रहे थे।

शुक्रवार।

मैं ऑफिस से लौटा था—थका हुआ, लेकिन दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।

किचन में कॉफी बना रहा था।

नेहा अभी तक घर नहीं आई थी।

फोन पर मैसेज आया।

नेहा: बेबी... मैं लेट हो जाऊँगी।

ऐप लॉन्च कल है।

ऑर्डर कर लेना।

इंतज़ार मत करना।

मैंने तुरंत रिप्लाई किया—हँसी-मज़ाक वाला।

मैं: ठीक है बेबी... कोई तो कमाएगा घर चलाने के लिए... हाहा

उसने देखा।

दो ब्लू टिक।

फिर... कुछ नहीं।

मैंने कॉफी का कप उठाया।

एक घूँट लिया।

फिर... कप सिंक में रख दिया।

किचन से निकला।

सिंगल माल्ट की बॉटल निकाली।

ग्लास में डाला—बड़ी-सी पेग।

सिगरेट पैकेट उठाया।

सोफे पर बैठ गया।

टीवी ऑन किया।

कोई मूवी डाल ली—बिना ध्यान दिए।

क्योंकि... मूवी देखने का मन नहीं था।

मैं बस... टाइम काट रहा था।

अपने आप से भाग रहा था।

एक घूँट लिया।

सिगरेट सुलगाई।

धुआँ छोड़ा।

फिर... फोन की तरफ देखा।

चार्जिंग पर रखा हुआ।

कोई मैसेज नहीं।

नेहा व्यस्त होगी।

मैंने फोन उठाया।

क्रोम खोला।

इनकॉग्निटो मोड।

टाइप किया:

japanese cuckold video

मैं वो खास वीडियो ढूँढ रहा था।

जिस पर मैंने कई बार हस्तमैथुन किया था।

एक जापानी पति... अपनी पत्नी को दो बूढ़े मर्दों के साथ... सौंप देता है।

कॉन्ट्रैक्ट साइन करता है—पत्नी अब उनकी "ब्रीदिंग सेक्स डॉल" है।

जैसे चाहें... वैसा यूज़ करें।

पत्नी पहले मना करती है... रोती है... शर्माती है...

फिर... धीरे-धीरे... बदल जाती है।

पति बस... देखता रहता है।

उसकी आँखें... पहले दुखी... फिर... उत्तेजित।

वीडियो लोड हुआ।

मैंने प्ले किया।

साउंड कम कर दिया।

ग्लास उठाया।

एक और घूँट।

सिगरेट का एक और कश।

पहले... मैं इन वीडियोज़ से लड़ता था।

सोचता था—ये गलत है।

फिर... वाइफ स्वैपिंग वीडियो देखे।

फिर... वाइफ शेयरिंग।

फिर... ब्लैक्ड।

फिर... जापानी।

ये जापानी वाले... सबसे रियल लगते हैं।

कम से कम पत्नी पहले मना करती है।

रोती है।

शर्माती है।

फिर... धीरे-धीरे... मान जाती है।

मैंने कभी खुद को उस दूसरे मर्द की जगह नहीं सोचा।

न ही किसी और की बीवी को चोदते हुए।

मैं हमेशा... पति की जगह पर था।

देखने वाला।

अपमानित होने वाला।

फिर भी... उत्तेजित होने वाला।

और पत्नी... हमेशा नेहा।

मेरी फेवरेट पोर्न स्टार... नेहा।

उसका नाम... मेरी नेहा जैसा।

उसका चेहरा... मेरी नेहा जैसा।

उसकी शर्म... मेरी नेहा जैसी।

मैंने सोचा... अगर मैं उस पति की जगह होता...

और नेहा मेरी पत्नी होती...

और मैं उसे... दो बूढ़े मर्दों के सामने... सौंप देता...

कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करता...

वो पहले मना करती... रोती...

15 मिनट हो चुके थे।


वीडियो प्ले हो रहा था—मैंने कितनी बार देखा था ये, फिर भी हर बार पहली बार जैसा लगता था।

मुझे पता नहीं कब जींस उतर गई।

अंडरवियर टखनों पर लटक रहा था।

लुंड मेरे हाथ में था—सख्त, फड़कता हुआ।

मैंने धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया—बिना जल्दबाज़ी के।

क्योंकि... ये वीडियो जल्दबाज़ी के लिए नहीं था।

ये... दर्द देखने के लिए था।

शर्म देखने के लिए था।

और... उत्तेजना... उसी से मिलती थी।

स्क्रीन पर... सब कुछ वैसा ही था।

दो बूढ़े मर्द—सफेद बाल, मोटे शरीर, भूखी आँखें।

पति ने कॉन्ट्रैक्ट पर साइन किया।

पत्नी ने मना किया—रोई, गिड़गिड़ाई।

"नहीं... प्लीज़... मैं तुम्हारी पत्नी हूँ..."

लेकिन पति ने कुछ नहीं कहा।

बस... सिर झुका लिया।

फिर... उन्होंने पत्नी को उठाया।

उसके स्तनों को मसलना शुरू किया—जोर-जोर से।

वो चीखी—"नहीं... छोड़ दो..."

लेकिन वो नहीं रुके।

एक ने उसका मुँह पकड़ा—लुंड अंदर डाला।

फेस फक।

गला तक।

घोक... घोल... घोक...

पत्नी की आँखें पति पर टिकी हुईं थीं।

उसकी आँखों में उम्मीद थी—कि पति उसे बचा लेगा।

पति बस... देखता रहा।

उसका चेहरा लाल था—शर्म से, दर्द से।

लेकिन... उसका लुंड... पैंट में सख्त हो रहा था।

फिर... सीन बदलते गए।

किचन में—उसे काउंटर पर चढ़ाकर चोदा।

डाइनिंग टेबल पर—उसके ऊपर लेटकर, जोर-जोर से।

बाथरूम में—शावर के नीचे, साबुन लगाकर, फिर अंदर।

और आखिर में... पति के बिस्तर पर।

दोनों बूढ़े... एक साथ।

एक नीचे... एक ऊपर।

पत्नी चीख रही थी—दर्द से... फिर मज़े से।

उसकी आँखें अब पति पर नहीं... बस... खाली थीं।

पति... बस... कोने में खड़ा था।

देखता रहा।

उसका लुंड हाथ में... सहलाता रहा।

मैंने वीडियो रोका।

साँसें तेज़ थीं।

मेरा लुंड... मेरे हाथ में... फड़क रहा था।

मैंने तेज़ किया।

एक... दो... तीन...

कम निकला—जोर से।

फर्श पर गिरा।

मैं थककर सोफे पर गिर पड़ा।

मैं सोफे पर लेटा रहा... लुंड अभी भी हाथ में था, लेकिन अब हल्का-सा ढीला पड़ रहा था।

कम फर्श पर फैला हुआ था—सफेद, चमकता हुआ।

मैंने उसे देखा।

पहले... हर बार... कम करने के बाद... एक गहरा अफसोस आता था।

शर्म आती थी।

खुद से नफरत होती थी।

"ये क्या कर रहा हूँ मैं?"

"ये गलत है... "

फिर... फिर वही।

लेकिन अब... महीनों से... वो अफसोस नहीं आता।

पोस्ट-नट क्लैरिटी... वो नहीं आती।

मूवी चल रही थी—कोई पुरानी बॉलीवुड फिल्म।

हीरोइन हँस रही थी।

हीरो उसे गले लगा रहा था।

सब कुछ... नॉर्मल।

सब कुछ... साफ़।

लेकिन मेरे दिमाग में... सब कुछ गंदा था।

घड़ी में 9 बज गए थे।

समय जैसे पलक झपकते निकल गया।

मैं वीडियो में इतना डूबा था कि पता ही नहीं चला।

मैं उठा।

पैर काँप रहे थे—थकान से, या उत्तेजना से।

किचन गया।

एक और पेग बनाया—इस बार और बड़ा।

ग्लास में बर्फ डाली, माल्ट डाला, पानी डाला।

फिर... फर्श पर फैला अपना कम देखा।

सफेद, सूखता हुआ।

मैंने गंदे कपड़े उठाए—कल की टी-शर्ट, नेहा की पुरानी पैंटी जो लॉन्ड्री से आई थी।

उस पर भी... कुछ निशान थे।

मैंने घुटनों पर बैठकर साफ़ करना शुरू किया।

फिर... वो दिन याद आया।

सूट 502।

अलोक जी का कम... फर्श पर।

मेरा कम... फर्श पर।

मैंने हैंड टॉवल से साफ़ किया था।

सैंडी हँस रही थी।

अलोक जी हँस रहे थे।

"गुड बॉय... ये तेरी ड्यूटी होगी..."

एक साल से ज़्यादा हो गया।

लेकिन... आज भी... वो पल मेरे दिमाग में ताज़ा है।

जैसे कल की बात हो।

मैंने सोचा... अगर कोई मुझे बहुत सारा पैसा दे...

या... मुझे वही पल फिर से जीने का मौका दे...

तो मैं... पैसा नहीं लूँगा।

मैं... वो पल चुनूँगा।

क्योंकि... वो पल... मेरी ज़िंदगी का सबसे नीचे का... और सबसे ऊँचा पल था।

अपमान... शर्म... दर्द... उत्तेजना... सब एक साथ।

और मैं... वो सब महसूस करना चाहता हूँ... फिर से।

फर्श साफ़ हो गया।

मैं उठा।

ग्लास उठाया।

एक घूँट लिया।

उस छुट्टी ने... मेरी ज़िंदगी बदल दी।

हमारा सेक्स लाइफ... कभी वैसा नहीं रहा।

मैं... अब कभी खुद को नेहा को चोदते हुए नहीं सोचता।

हर रात... जब हम बिस्तर पर होते हैं... मेरे दिमाग में... कोई और होता है।

अलोक जी।

डेविड।

विशाल।

वेटर—जिसने नेहा को टॉपलेस देखा था।

मैं... बस... चोदता हूँ।

फिर... नीचे जाता हूँ।

जीभ से... उसकी चूत चाटता हूँ।

उसे ऑर्गेज़्म देता हूँ।

हमेशा।

कभी नहीं छोड़ता... बिना उसे झड़ाए।

क्योंकि... मेरे कानों में... वो आवाज़ गूंजती रहती है।

"ये चूतिए... चूत चाटने में ही बेहतर होते हैं।"

अलोक जी की वो बात... सैंडी की हँसी... सब मेरे दिमाग में बस गया।

और अब... नेहा भी... कभी-कभी... हल्के से... यही कह देती है।

कल रात... हम बिस्तर पर थे।

मैंने उसे चोदा—धीमा, गहरा।

फिर... नीचे गया।

जीभ से चाटा।

उसकी चूत मेरी जीभ पर सिकुड़ रही थी।

वो झड़ गई—जोर से।

फिर... वो मेरी तरफ मुड़ी।

उसने मेरे कान में फुसफुसाया—बहुत धीरे, लेकिन साफ़।

"बेबी... तुम... बहुत स्किल्ड हो।

तुम्हें... सेक्स से बेहतर... चाटना आता है।"

मैं रुक गया।

उसकी बात... मेरे कानों में गूंजी।

"ये चूतिए... चूत चाटने में ही बेहतर होते हैं।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस... चाटता रहा।

उसकी चूत पर।

उसकी आहें सुनता रहा।

नेहा कभी लालची नहीं थी।

वो कभी नहीं कहती थी—"और चोदो..."

"और जोर से..."

लेकिन... मैं... हमेशा करता हूँ।

क्योंकि... मैं जानता हूँ।

मैं... बस... इतना ही हूँ।

उस छुट्टी के बाद... पहले एक महीना तो हम रोज़ सेक्स करते थे।

रात को घर लौटते ही... नेहा को बिस्तर पर धकेल देता।

उसकी साड़ी उतारता, जींस उतारता, टी-शर्ट फाड़ता।

वो हँसती—शरमाती—फिर आह भरती।

"सैम... आज फिर?"

"हाँ... आज फिर।"

हम रोज़ एक-दूसरे को चोदते।

कभी किचन में, कभी बालकनी में, कभी बाथरूम में।

उसकी चूत मेरे लुंड पर कसती।

मैं उसे झड़ाता—बार-बार।

वो मेरे ऊपर चढ़ती, नीचे आती, पीठ करके बैठती।

हम थककर सो जाते।

फिर... ज़िंदगी ने पकड़ लिया।

पुणे महंगा शहर है।

हम दोनों ऊपरी मिडिल क्लास।

दोनों की जॉब्स—लंबी, थकाने वाली।

फ्लैट लिया—EMI शुरू।

हाउस पार्टीज़—दोस्तों के साथ।

ऑफिस, मीटिंग्स, डेडलाइन्स।

धीरे-धीरे... सेक्स हफ्ते में एक बार हो गया।

कभी-कभी... दस दिन में एक बार।

लेकिन... मैं खुश था।

दूसरे दिनों... मैं खुद को खुश करता।

हाथ से... वीडियोज़ से... यादों से।

कभी सैंडी की इंस्टा पर जाता।

एक्सोटिक लोकेशन में... बिकिनी में... मुस्कुराती हुई।

सोचता... वो अब किसके साथ है?

किसके लुंड पर है?

फिर... बंद कर देता।

कभी-कभी... उसी सोच में झड़ जाता।

अलोक जी का कार्ड... अभी भी मेरी वॉलेट में था।

कभी हाथ लगता... तो दिल धड़क जाता।

फिर... वापस रख देता।

सोचता... ये सब... एक सपना था।

अच्छा हुआ... मैंने संपर्क नहीं किया।

अच्छा हुआ... वो दिन... बस एक बार के लिए थे।

कभी-कभी... अनजान नंबर आता।

डर लगता—क्या कोई वीडियो... ब्लैकमेल?

क्या कोई... पैसे माँगेगा?

लेकिन... कभी कुछ नहीं हुआ।

अलोक जी ने कहा था—"ये मेरी स्टाइल नहीं।"

मैंने यकीन कर लिया।

अब... सब शांत था।

ये सब सोचते हुए... मैंने एक गहरी साँस ली।

ग्लास खत्म हो चुका था।

मैंने पेग बनाया—इस बार थोड़ा कम।

सोफे पर लेट गया।

फोन साइलेंट।

टीवी पर वही पुरानी फिल्म चल रही थी

सब कुछ... बहुत नॉर्मल।

लेकिन मेरे अंदर... एक अजीब सी शांति थी।

उस छुट्टी के बाद... मेरे अंदर का डर... जलन... असुरक्षा... सब खत्म हो गया।

पहले... नेहा को किसी लड़के ने देखा होता... या कोई पार्टी में उसके साथ ज़्यादा बात की होती... तो मैं जल जाता।

गुस्सा आता।

रात भर नींद नहीं आती।

सोचता... वो क्या सोच रही होगी?

क्या वो किसी और को पसंद करती है?

क्या वो... मुझे छोड़ देगी?

अब... वो सारी फीलिंग्स... गायब।

नेहा आज लेट है।

शायद कल भी लेट आए।

शायद कभी रात भर न आए।

शायद उसके ऑफिस में... कोई अफेयर हो।

पुणे में... ऑफिस अफेयर्स बहुत कॉमन हैं।

मेरी टीम में भी... दो-तीन लोग... अपनी-अपनी वाइफ के अलावा किसी और के साथ।

मैं जानता हूँ।

लेकिन... मुझे अब कोई जलन नहीं होती।

कोई डर नहीं।

कोई इनसिक्योरिटी नहीं।

अगर नेहा किसी के साथ... सो जाए।

किसी से चुद जाए।

मुझे... गुस्सा नहीं आएगा।

बल्कि... सोचते ही... लुंड सख्त हो जाता है।

पहले... सड़क पर, मॉल में, हाउस पार्टी में... कोई नेहा को देखता... तो मैं गुस्से से भर जाता।

उसकी कमर पर हाथ रखकर खींच लेता—जैसे कह रहा होँ—"ये मेरी है।"

अब... अगर कोई देखे... तो मुझे अच्छा लगता है।

उसकी नज़रें नेहा की गांड पर... उसके स्तनों पर... उसके होंठों पर...

मुझे... उत्तेजित करता है।

मैं सोचता हूँ—अगर वो नेहा को छू ले... अगर वो नेहा को चोद ले... तो क्या होगा?

और मेरा लुंड... फड़क उठता है।

और असल ज़िंदगी में... मुझे अब किसी और औरत में इंटरेस्ट नहीं।

न किसी ऑफिस की लड़की में।

न किसी दोस्त की वाइफ में।

न किसी रैंडम इंस्टा प्रोफाइल में।

सिर्फ़... इनकॉग्निटो मोड।

जापानी वीडियोज़।

कॉकॉल्ड स्टोरीज़।

सैंडी की पुरानी इंस्टा पिक्स।

वो सब... मेरी ज़रूरत पूरी कर देते हैं।

और नेहा... वो अभी भी अच्छी बीवी है।

कभी कोई चांस नहीं दिया... कि वो बेवफा है।

कभी कोई संदेह नहीं हुआ।
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#33
Super duper hit story bro please update fast waiting for next
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#34
पुरुष कभी उस चीज़ की कदर नहीं करता जो उसके पास है।

सड़क पर... मॉल में... हाउस पार्टी में... 35 + की शादीशुदा औरत दिखती है।

हॉट माल।

कर्व्स वाला शरीर।

साड़ी का पल्लू सरकता है... जींस टाइट लगती है... ब्लाउज़ से स्तन उभरे हुए।

तुरंत दिमाग में फिल्म शुरू हो जाती है।

कितने नरम होंगे वो स्तन?

निप्पल्स कितने बड़े होंगे... कितने गुलाबी?

जब चोदूँगा... कैसे चीखेगी?

कैसे कराहेगी?

क्या अच्छी ब्लोजॉब देगी?

क्या गले तक लेगी... या सिर्फ़ हेड चूसेगी?


सोचते ही लुंड खड़ा हो जाता है।

और हकीकत ये है... कि उसके साथ ये सब... कोई न कोई पहले से कर चुका है।

उसका पति...

और वो पति... अब बोर हो चुका है।

उस हॉट माल को चोद-चोद कर अब उसकी कदर नहीं करता।

ये "पति" अब मेरी ज़िंदगी।

और ये हकीकत है—कड़वी, सच्ची, और मेरे लिए अब नॉर्मल हो चुकी।

हमारा बेडरूम।

सुबह की रोशनी खिड़की से आ रही है।

नेहा तैयार हो रही है—ऑफिस जाने के लिए।

वो अपनी साड़ी का ब्लाउज़ उतारती है।

ब्रा बाहर आती है—काली, लेस वाली।

फिर ब्रा भी उतारती है।

उसके स्तन बाहर—गोरे, भरे हुए, निप्पल्स हल्के गुलाबी।

वो मुड़ती है—मेरी तरफ देखती है।

"सैम... तुम्हें देखना है?"

वो हल्के से हँसती है—मासूम, प्यारी हँसी।

मैं बिस्तर पर बैठा हूँ।

उसकी तरफ देख रहा हूँ।

उसके स्तन... जो कभी मेरे लुंड को एक सेकंड में खड़ा कर देते थे।

अब... कुछ नहीं।

बिल्कुल कुछ नहीं।

कोई हलचल नहीं।

कोई उत्तेजना नहीं।

मेरा लुंड... शांत।

सोया हुआ।

जैसे कोई पुरानी याद हो... जो अब महसूस ही न हो।

वो आगे बढ़ती है—नंगी कमर, सिर्फ़ पेटीकोट।

उसकी चूत... हल्की-सी झाँक रही है पेटीकोट के नीचे से।

वो मेरे सामने खड़ी हो जाती है।


वो मेरे लुंड पर हाथ रखती है—हल्के से।

मैं मुस्कुराता हूँ।

वो हँसती है।

फिर तैयार हो जाती है।

साड़ी पहनती है।

ब्लाउज़।

पल्लू सेट करती है।

और बाहर चली जाती है।

मैं अकेला रह जाता हूँ।

और सोचता हूँ...

सोसाइटी की फंक्शन में... जब वो स्लीवलेस, बैकलेस ब्लाउज़ पहनकर आती है।

उसकी पीठ नंगी—गोरी, चिकनी।

उसके स्तन ब्लाउज़ से बाहर झाँकते हुए।

और वो लोग... सब देखते हैं।

राही—18-19 साल का लड़का।

उसकी आँखें नेहा की गांड पर।

गुप्ता जी—राही के पिता।

50+ उम्र, लेकिन नज़रें नेहा के स्तनों पर।

गेटकीपर—जो रोज़ सलाम करता है।

उसकी आँखें नीचे—नेहा की कमर पर।

ऑर्गनाइज़र—जो फंक्शन चलाता है।

उसकी नज़रें नेहा की जांघों पर।

उसका लेबर—मज़दूर... जो सामान ढोता है।

उसकी आँखें... नेहा की छाती पर।

और वो सब... अपनी क्रॉच एडजस्ट करते हैं।

कभी-कभी... पैंट के ऊपर से दबाते हैं।

कभी... जेब में हाथ डालकर।

टीनएजर से 60-70 साल तक।

ऑटो ड्राइवर से ऑडी ड्राइवर तक।

सब क्लास... सब उम्र।

और मैं... वो सब देखता हूँ।

और मेरा लुंड... सख्त हो जाता है।

उनकी भूख देखकर।

उनकी नज़रें देखकर।

उनके हाथ देखकर।

लेकिन... जब हम अकेले होते हैं...

जब नेहा मेरे सामने बदलती है...

उसके स्तन बाहर... चूत झाँकती हुई...

मेरा लुंड... सोया रहता है।

कोई हलचल नहीं।

कोई उत्तेजना नहीं।

हम दोनों जानते हैं कि अब हमारा इंटीमेसी कम हो रहा है।

नेहा को लगता है—काम का बोझ, थकान, मीटिंग्स, डेडलाइन्स।

मुझे भी लगता है... शायद यही वजह है।

लेकिन... असल वजह मेरे अंदर है।

मैं अब उसके साथ वो नहीं महसूस करता जो पहले महसूस करता था।

उसकी चूत... उसके स्तन... उसकी आहें... सब कुछ... पहले से कम उत्तेजक लगता है।

क्योंकि... मेरे दिमाग में... वो सब पहले से ही हो चुका है।

मेरे हाथ से... मेरी कल्पना में... नेहा को हजार बार चोदा है।

अलोक जी के साथ... डेविड के साथ... विशाल के साथ... वेटर के साथ।

उसकी चूत फैली हुई... रस बहता हुआ... वो चीखती हुई—"और जोर से..."

और मैं... बस... देखता हुआ।

झड़ता हुआ।

तो अब... असल में जब वो मेरे सामने नंगी होती है...

जब वो मेरे ऊपर चढ़ती है...

जब मैं उसके अंदर जाता हूँ...

तो कुछ नया नहीं लगता।

जैसे... कोई पुरानी फिल्म दोबारा देख रहा हूँ।

वही सीन... वही डायलॉग... वही एंडिंग।

तो अब... रेगुलर सेक्स मुझे भाता नहीं।

मुझे... कुछ और चाहिए।

कुछ गहरा... कुछ गंदा... कुछ अपमानजनक।

कुछ... जो मेरे हाथ से नहीं मिलता।

और मैं खुद से नाराज़ भी हूँ।

क्योंकि... मेरी बीवी मेरे सामने है।

गोरी... सुंदर... कर्व्स वाली... मेरी नेहा।

और मैं... उसे पूरी तरह महसूस नहीं कर पा रहा।

हम अक्सर बात करते हैं।

कल रात... हम बिस्तर पर थे।

सेक्स के बाद... वो मेरी छाती पर सिर रखे लेटी थी।

उसने धीरे से कहा—

"सैम... अब हमारा सेक्स... पहले जैसा नहीं रहा।

मुझे लगता है... हम दोनों थक जाते हैं।

काम... जिम्मेदारियाँ... सब कुछ।

क्या... हमें किसी काउंसलर से मिलना चाहिए?

कोई थेरेपिस्ट... जो हमें समझा सके?"

मैंने हँसने की कोशिश की।

"अरे... ये सब अमीरों के चोंचले हैं।

हम जैसे लोग... ऐसे में क्या करते हैं?

हमारे ऑफिस का अनपढ़ चपरासी... वो बेहतर सलाह देगा।

'भेनचोद... तेरे पास सेक्सी बीवी है... डॉगी स्टाइल में कर ले... क्या प्रॉब्लम है?'

'और तुझसे नहीं चुदती तो रात को मेरे पास बेज दे। .. में भोसड़ा बना दूंगा चूत का '

उसके लिए तो बस इतना ही है—चूत है... सेक्सी है... चोद दो।

शायद इसलिए गरीबों का सेक्स लाइफ हमसे बेहतर होता है।

वो ज़्यादा नहीं सोचते।

बस... करते हैं।"

XXXXXXXXXXXXXXX


रविवार था, छुट्टी का दिन।

सुबह-सुबह दोनों कॉफी पी रहे थे, मैं न्यूज़पेपर पढ़ रहा था, नेहा अपने फोन में स्क्रॉल कर रही थी।

अचानक वो बोली,

"हनी, ये देखो ना..."

उसने न्यूज़पेपर मेरी तरफ सरका दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया का आर्टिकल था—फोन और स्क्रीन टाइम जोड़ों की अंतरंगता को बर्बाद कर रहे हैं वाला।

नेहा ने जोर से पढ़ना शुरू किया, जैसे कोई कॉलेज की लड़की हो रही हो—

"डॉक्टर कह रहे हैं कि आजकल कपल्स कम बात करते हैं, कम टच करते हैं, कम सेक्स करते हैं... फोन बीच में आ जाता है। सुझाव दे रहे हैं कि कुछ नया ट्राई करें—रोल प्ले, अपनी फीलिंग्स ओपनली शेयर करना, पास्ट के बारे में खुलकर बताना, सेक्स टॉयज़ यूज़
करना वगैरह।"

उसकी उँगली "रोल प्ले" पर रुक गई।

वो मेरी तरफ मुड़ी, आँखों में एक छोटी-सी चमक।

"क्या हम ये ट्राई करें?"

मेरा दिल एकदम धड़क गया।

लुंड तुरंत खड़ा हो गया—पैंट में दर्द करने लगा।

मैंने तो पहले भी सोचा था... कई बार।

सोचता था—अगर नेहा से कहूँ... रोल प्ले... वो किसी और आदमी की तरह बने, मैं देखूँ... तो क्या होगा?

पर हिम्मत नहीं हुई।

डर लगता था—क्या पता वो गुस्सा हो जाए, मुझे गंदा समझ ले, या सोचे कि मैं बीमार हूँ?

और अब... वो खुद कह रही है।

मैंने कॉफी का घूँट लिया—गले में अटक गया।

फिर धीरे से बोला,

"हाँ... ट्राई कर सकते हैं।

तुम्हें क्या ट्राई करना है?"

नेहा ने मुस्कुराया—थोड़ा शरमाकर, थोड़ा शरारती अंदाज़ में।

"पता नहीं... कुछ स्पाइसी।

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#35
मेरा दिमाग तेज़ी से चलने लगा।

मैं जानता था कि मुझे नेहा से क्या चाहिए।

मैं चाहता था कि वो किसी और की तरह बने... किसी और आदमी के साथ... और मैं देखूँ।

लेकिन... मैं नहीं चाहता था कि वो मेरे गंदे दिमाग के बारे में जाने।

मुझे डर था—अगर एकदम से बहुत हेवी कर दिया तो ६ महीने में मज़ा खत्म हो जाएगा।

ये आइडिया अभी मेरे लुंड के लिए बहुत काम कर रहा है।

हर बार सोचते ही खड़ा हो जाता है।

तो मैंने सोचा—धीरे-धीरे शुरू करेंगे।

पहले कुछ लाइट... कुछ रोमांटिक... फिर धीरे-धीरे गंदा।

दिन भर नॉर्मल गुज़रा।

शाम हुई।

नेहा ऑफिस से मैसेज कर रही थी।

नेहा: बेबी... आज रात रोल प्ले ट्राई करेंगे? 

मैंने तुरंत रिप्लाई किया।

मैं: हाँ... आज रात।

तुम तैयार रहना।

पहले... तुम बताओ... आज रात तुम किसके साथ होना चाहती हो?

किसका रोल प्ले करोगी?

नेहा ने थोड़ी देर में रिप्लाई किया।

एक ब्लश इमोजी के साथ।

नेहा: हृतिक रोशन

मेरा फेवरेट हीरो।

फिर एक और मैसेज—

नेहा: मैं तो ऑफिस में बैठी हूँ... और पहले से ही गीली हो गई हूँ

मेरा लुंड एकदम सख्त हो गया।

ऑफिस में बैठी नेहा... मेरे मैसेज पढ़कर... गीली हो रही है।

मैंने सोचा—ये तो शुरुआत है।

मैं: अच्छा... तो आज रात... हृतिक रोशन तुम्हें चोदेगा।

तुम तैयार रहना... मेरी जान।

नेहा: हाँ... तैयार हूँ 

घर आकर बताऊँगी... क्या करना है।

मैंने फोन साइड में रखा।

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

लुंड पैंट में फड़क रहा था।

रात आने वाली थी।

और आज रात... नेहा हृतिक रोशन के साथ सोएगी।

मेरे सामने।

और मैं... बस... देखूँगा।

दरवाज़ा खुलते ही नेहा अंदर आई।

वो साड़ी में थी—वही लाल वाली, जो उसके कर्व्स को और हाईलाइट करती है।

पल्लू थोड़ा सरका हुआ था, कमर नंगी दिख रही थी।

उसने मुझे देखा—एक सेकंड के लिए रुकी, फिर मुस्कुराई।

उसकी आँखों में वो शरारत थी, जो मुझे पागल कर देती है।

"ओह्ह... हृतिक... आप यहाँ... कैसे?"

वो पूरी तरह कैरेक्टर में थी।

मैं भी।

मैंने दरवाज़ा बंद किया।

धीरे से उसकी तरफ बढ़ा।

गहरी, भारी आवाज़ में बोला—हृतिक वाला टोन।

"मैं यहाँ तुम्हारे हसबैंड की कंपनी के ऐड शूट के लिए आया था।

वो मुझे घर पर बुलाया... कहा कि उनकी वाइफ मेरा बहुत बड़ा फैन है।

तुम्हारी फोटोज़ भी दिखाईं... और बोले कि तुम मेरे लिए कुछ भी कर सकती हो।"


नेहा ने आँखें नीची कीं—शरमाते हुए।

फिर धीरे से मेरे करीब आई।

उसने मुझे हग कर लिया।

उसके स्तन मेरी छाती से दबे।

मैंने उसकी कमर पकड़ी—फिर धीरे से नीचे हाथ सरकाया।

उसकी गांड पर।

नरम, गोल, गरम।

वो एकदम अलग हुई।

हाथ से मेरी छाती धकेली—नाटकीय तरीके से।

"क्या कर रहे हो... मैं शादीशुदा हूँ!"

उसकी आवाज़ में वो नखरे थे—लेकिन आँखों में शरारत।

मैंने मुस्कुराया—हृतिक वाला कॉन्फिडेंट स्माइल।

उसके करीब आया।

उसकी कमर फिर से पकड़ी।

"लेकिन तुम्हारा हसबैंड ने कहा... तुम मेरे लिए कुछ भी कर सकती हो।

और मैं... तुम्हारी गांड को छूना चाहता हूँ।

अगर मैं चाहूँ तो... और भी ज़्यादा।"

नेहा ने होंठ काटे।

शरमाते हुए बोली—

"ओह्ह... आप बहुत नॉटी हैं हृतिक..."

मैंने उसके कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाया—

"तुमने अभी कुछ भी नहीं देखा... मेरी जान।"

फिर... मैंने झुककर उसके होंठों पर किस किया।

धीरे से।

पहले सिर्फ़ होंठ छुए।

फिर जीभ अंदर डाली।

वो मेरे साथ बह गई—उसने मेरी गर्दन पकड़ी, मुझे और करीब खींचा।

हमारे किस में वो भूख थी—जैसे महीनों से रुकी हुई हो।
मैंने उसकी साड़ी का पल्लू खींचा।

वो सरककर गिर गया।

उसकी ब्लाउज़ में उसके स्तन उभरे हुए।

मैंने एक हाथ से उसके स्तन पकड़े—जोर से।

दूसरे हाथ से उसकी गांड दबाई।

वो कराही—"आह्ह... हृतिक... धीरे..."

मैंने उसके कान में कहा—

"धीरे नहीं... आज रात... मैं तुम्हें वैसा चोदूँगा... जैसा तुमने कभी सोचा भी नहीं।

तुम्हारा हसबैंड... बस... देखेगा।"

नेहा ने मेरी आँखों में देखा।

उसकी साँसें तेज़ थीं।

वो धीरे से बोली—

"तो... देखने दो...

आज रात... मैं सिर्फ़ तुम्हारी हूँ।"

मैंने उसे गोद में उठाया।

बेडरूम की तरफ ले गया।

बिस्तर पर पटक दिया।

वो हँसी—शरारती हँसी।

"अब... हृतिक... दिखाओ... कितने अच्छे हो तुम।"

मैंने उसकी साड़ी पूरी उतारी।

ब्लाउज़ खोला।

ब्रा उतारी।

उसके स्तन बाहर—गोरे, भरे हुए।

मैंने चूसा—एक को मुँह में लिया, दूसरे को हाथ से मसला।

वो कराही—"आह्ह... हाँ... और जोर से..."

मैंने उसकी पेटीकोट ऊपर की।

पैंटी सरकाई।

उसकी चूत—गीली, तैयार।

मैंने जीभ रखी।

चाटा।

उसकी क्लिट पर जीभ घुमाई।

वो चीखी—"आह्ह... हृतिक... हाँ... चाटो..."

मैं चाटता रहा।

उसकी चूत मेरी जीभ पर सिकुड़ रही थी।

फिर... मैंने अपना लुंड निकाला।

उसके मुँह के पास ले गया।

"चूसो... मेरी जान।"

वो मुस्कुराई।


उसने मुँह खोला।

मेरा लुंड अंदर लिया।

धीरे-धीरे... गले तक।

मैंने उसके बाल पकड़े।

जोर से धक्का दिया।

घोक... घोल... घोक...

वो चूसती रही।

उसकी लार बह रही थी।

फिर... मैंने उसे पलटा।

डॉगी स्टाइल में।

उसकी गांड ऊपर।

मैंने लुंड उसके छेद पर रखा।

एक झटके में अंदर।

वो चीखी—"आह्ह... हृतिक... हाँ... और जोर से..."

मैंने धक्के मारे—तेज़, गहरे।

उसकी चूत मेरे लुंड पर कस रही थी।

वो कराही—"हाँ... चोदो मुझे... फाड़ दो..."

मैंने उसके बाल पकड़े।

और जोर से।

वो झड़ गई—जोर से।

उसकी चूत सिकुड़ रही थी।

मैंने भी झड़ दिया—उसके अंदर।

हम दोनों थककर लेट गए।

नेहा मेरी तरफ मुड़ी।

उसने मेरे कान में फुसफुसाया—

"सैम... ये... बहुत अच्छा था।

अगली बार... में रोले करुँगी ?"

मैंने मुस्कुराया।

"हाँ... अगली बार... "

रात गहरी हो गई।

और हम... सो गए।

अगले दिन ऑफिस से लौटते ही मैंने नेहा को मैसेज किया—

मैं: आज रात... तुम प्रीति ज़िंटा बनोगी।

मेरी फेवरेट।

तुम्हें... वैसा चोदूँगा... जैसा मैंने हमेशा सोचा है।

नेहा: ओके... प्रीति ज़िंटा तैयार है 

तुम... बस... अपना काम करो।

टी-शर्ट और शॉर्ट्स में थी—बिल्कुल वैसी जैसी प्रीति ज़िंटा अपनी कुछ फिल्मों में दिखती है।

टाइट टी-शर्ट से उसके स्तन उभरे हुए, शॉर्ट्स से उसकी जांघें चमक रही थीं।

वो मुस्कुराई—प्रीति वाली क्यूट, शरारती स्माइल।

"हाय फैन बॉय... प्रीति ज़िंटा को देखने आए हो?"

मैंने उसे बिस्तर पर पटका।

उसकी टी-शर्ट ऊपर की।

ब्रा नहीं थी—सीधे उसके स्तन मेरे सामने।

मैंने चूसा—जोर से।

वो कराही—"आह्ह... फैन बॉय... धीरे... प्रीति ज़िंटा को... ऐसे नहीं छूते..."

मैंने उसके शॉर्ट्स उतारे।

उसकी चूत—गीली, तैयार।

मैंने लुंड निकाला।

उसके मुँह के पास ले गया।

"प्रीति जी... चूसो ना... मेरे लिए... एक बार।"

वो मुस्कुराई।

उसने मुँह खोला।

मेरा लुंड अंदर लिया।

फिर... मैंने उसे पलटा।

डॉगी में।

वो मेरी आँखों में देख रही थी—प्रीति वाली वो इंटेंस नज़र।

"प्रीति जी... तुम्हारी चूत... कितनी टाइट है..."

वो कराही—"हाँ... चोदो... और जोर से... मैं तुम्हारी हूँ..."

मैंने उसे पलटा।

उसके चेहरे के सामने लुंड।

वो मेरी आँखों में देख रही थी—उम्मीद और भूख से।

मैंने झड़ दिया—उसके चेहरे पर।

गाढ़ा, सफेद।

उसके गालों पर, होंठों पर, नाक पर।

वो मुस्कुराई—कैरेक्टर में।

"फैन बॉय... प्रीति ज़िंटा... बहुत खुश है।"

हम दोनों थककर लेट गए।

कैरेक्टर कभी नहीं टूटा।

रात गहरी हो गई।

और हम... सो गए।

xxxxxxxxxxxxxxxx


हमने काफी कुछ ट्राई कर लिया।

पहले तो बस हल्के-फुल्के रोल प्ले थे, लेकिन अब नेहा भी उतनी ही एक्साइटेड हो गई थी जितना मैं।

हम दोनों पढ़ते थे—इंटरनेट पर "रोल प्ले आइडियाज़" सर्च करते, फोरम्स पढ़ते, और हँसते-हँसते नई-नई चीजें प्लान करते।

एक रात नेहा ने कहा—

"आज... हॉर्नी प्रीस्ट और नॉटी कॉलेज गर्ल?"

वो तैयार होकर आई—कॉलेज यूनिफॉर्म में।

छोटी स्कर्ट, टाइट शर्ट, टाई, और दो चोटियाँ।

वो मेरे सामने खड़ी हुई, होंठ काटते हुए—

"फादर... मैंने बहुत गुनाह किए हैं... मुझे सजा दो..."

मैंने प्रीस्ट वाला रोल लिया—काला कुर्ता, क्रॉस वाला चेन।

उसे घुटनों पर बिठाया।

उसकी स्कर्ट ऊपर की।

उसकी गांड पर हाथ फेरा।

फिर... जोर से थप्पड़ मारा।

चटाक!

वो चीखी—"आह्ह... फादर... और सजा दो..."

मैंने 4-5 थप्पड़ मारे—उसकी गांड लाल हो गई।

फिर... मैंने उसे बिस्तर पर पटका।

उसकी स्कर्ट ऊपर, पैंटी सरकाई।

लुंड अंदर डाला।

वो कराही—"हाँ फादर... मेरी चूत...."

हम दोनों इतने एक्साइटेड थे कि कैरेक्टर नहीं टूटा।

मैंने उसे जोर-जोर से चोदा।

वो झड़ गई—दो बार।

फिर... अगली रात।

नेहा ने कॉस्ट्यूम खरीदा था—छोटी कॉलेज गर्ल वाली।

वो बोली—

"आज... नॉटी कॉलेज गर्ल और स्ट्रिक्ट टीचर?"

मैंने टीचर रोल लिया।

उसे डेस्क पर बिठाया।

उसकी स्कर्ट ऊपर की।

पढ़ाई का बहाना बनाकर थप्पड़ मारे।

फिर... डेस्क पर ही चोदा।

अगली रात—उबर ड्राइवर और पैसेंजर।

नेहा ने शॉर्ट ड्रेस पहनी।

मैंने उबर वाला रोल लिया।

कार में ही—उसकी जांघों पर हाथ फेरा।

फिर... घर लाकर बेडरूम में चोदा।

फिर... बॉय नेक्स्ट डोर।

नेहा ने कहा—"मेरा हसबैंड कमजोर है... घर का काम नहीं करता।

तुम... मेरी मदद करोगे?"

मैंने हेल्प करने का बहाना बनाया।

फिर... उसे किचन में पटका।

उसकी साड़ी ऊपर की।

चोदा।
हर रात... नया कैरेक्टर।

हर रात... वो इंटेंस।

हम कैरेक्टर कभी नहीं तोड़ते।

कभी हँसते, कभी चीखते, कभी फुसफुसाते।

और हर बार... मेरा लुंड पहले से ज़्यादा सख्त।

नेहा की आहें पहले से ज़्यादा तेज़।

ये सब... धीरे-धीरे... और गहरा हो रहा था।
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#36
Hot story please update fast
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#37
सुबह देर से उठा।

शरीर पर सब कुछ सूखकर चिपक गया था—रस, पसीना, सब क्रस्टी और स्टिकी।

सोचा, पहले शावर ले लूँ।

गर्म पानी के नीचे खड़ा हो गया।

बहुत देर तक खड़ा रहा—सब धुल गया।

पुरानी शॉर्ट्स पहनी, नेहा के लिए एक आउटफिट निकाला—काला शीयर स्टॉकिंग, 5 इंच की हाई हील्स वाली सैंडल, और छोटा-सा ब्लैक टॉप जो उसके स्तनों को मुश्किल से कवर करता था।

कॉफी बनाई।

लाउंजर पर बैठ गया।

तभी नेहा किचन में आई।

उसने वो आउटफिट पहन रखा था—लंबी, शीयर ब्लैक स्टॉकिंग्स, जो उसकी जांघों तक पहुँच रही थीं।

हील्स में चलती हुई वो मेरे पास आई।

उसकी आवाज़ में वो नौकरानी वाली मीठी-मीठी टोन—

"सर... आपको कुछ और चाहिए?"

मैंने एक सेकंड में समझ लिया—वो अभी भी कैरेक्टर में है।

हमने रविवार को स्लेव-मास्टर रोल प्ले करने का फैसला किया था।

मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

वो खड़ी थी—सीधी, आज्ञाकारी, जैसे कोई परफेक्ट सर्वेंट।

स्टॉकिंग्स उसकी जांघों को चमका रही थीं, टॉप से उसके स्तन झूल रहे थे।

मैंने कॉफी का कप उसकी तरफ इशारा किया।

"और कॉफी लाओ।"

"जी सर।"

वो झुकी—धीरे-धीरे, जानबूझकर।

उसके स्तन मेरे चेहरे के सामने झूल गए—बड़े, नरम, निप्पल्स सख्त।

मैंने देखा, महसूस किया—उसकी खुशबू, उसकी गर्मी।

वो कॉफी लेकर आई।

फिर बोली—

"सर... और कोई तरीका जिसमें मैं आपकी सेवा करूँ?"

मैंने शॉर्ट्स का इलास्टिक पकड़ा।

धीरे से नीचे सरकाया।

मेरा लुंड बाहर आया—सख्त, फड़कता हुआ।

बॉल्स नीचे लटक रहे थे।

नेहा ने देखा।

उसकी आँखें चमकीं।

"हाँ सर... ओरली... या वैजाइनली?"

मैंने थोड़ा सोचने का नाटक किया।

फिर बोला—

"मुँह से... हाँ... तुम्हारा मुँह।

बाकी बाद में।"

"बहुत अच्छा सर।"

वो मेरी जांघों के बीच घुटनों पर बैठ गई।

उसने मेरा लुंड हाथ में लिया।

धीरे से जीभ लगाई—हेड पर।

फिर मुँह में लिया।

धीरे-धीरे... गले तक।

वो चूसने लगी—वर्ल्ड क्लास ब्लोजॉब।

मैंने उसके बाल पकड़े।

धीरे से धक्का दिया।

वो गैग कर रही थी—लेकिन रुकी नहीं।

उसकी लार बह रही थी—मेरे लुंड पर, मेरी जांघों पर।

फिर उसने मुँह निकाला।

मेरी आँखों में देखा।

"सर... क्या मैं आपको टिटफक भी करूँ?"

मैंने हामी भरी।

वो मुस्कुराई।

अपने स्तन मेरे लुंड के दोनों तरफ दबाए।

उन्हें कसकर पकड़ा।

ऊपर-नीचे किया।

हर बार हेड उसके होंठों से छूता—वो चूस लेती।

मैंने झड़ दिया—उसके स्तनों पर, उसके चेहरे पर।

वो जीभ से चाटती रही।

उसकी उँगलियाँ कम उठाकर चाट रही थीं।

फिर... वो उठी।

मेरे सामने खड़ी हुई।

"सर... अब क्या सजा देंगे?"

मैंने मुस्कुराया।

"आज पूरा दिन... तुम मेरी हो।

और मैं... तुम्हारा मालिक।"

वो मुस्कुराई।

"जी सर।"

दिन भर... वो मेरी सेवा करती रही।

कभी कॉफी लाई।

कभी मसाज दी।

कभी बिस्तर पर चुदाई।

कभी किचन में।

कभी लिविंग रूम में।

और मैं... हर बार उसे झड़ाता।

हर बार... उसे सजा देता।

6 महीने हो गए थे।

हमने रोल प्ले में बहुत कुछ ट्राई किया।

मैंने कई बार मास्टर बनकर नेहा को "कुत्ती" बनाया।

उसे स्पैंक किया, बाल खींचे, आदेश दिए, चोदा।

नेहा को मज़ा आता था—वो चीखती, कराहती, झड़ती।

हर बार कैरेक्टर में रहती, लेकिन... मुझे लगता था कि मैं सच में मास्टर नहीं बन पा रहा।

मैं हमेशा अंदर से सबमिसिव फील करता था।

मेरा दिमाग... बचपन से... किसी के नीचे रहने का, आज्ञा मानने का...

डॉमिनेट करने में... वो फील नहीं आती।

मैं बस... नेहा को खुश करने के लिए करता था।

एक दिन मैंने नेहा से कहा—

"नेहा... अब तुम मास्टर बनो।

मैं... तुम्हारा स्लेव बनूँगा।

तुम... मुझे जो चाहो... वो करो।"

नेहा ने पहले मना किया।

"नहीं सैम... अगर मैं कैरेक्टर में गई... तो कहीं तुम्हें बुरा न लगे।

मैं... तुम्हें ऑफेंड नहीं करना चाहती।"

मैंने बहुत मनाया।

कई दिन बात की।

कहा—"ये सिर्फ़ खेल है।

मैं चाहता हूँ... तुम्हारी आज्ञा मानना... तुम्हारे नीचे रहना।

मुझे अच्छा लगेगा।"

आखिरकार... वो मान गई।
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#38
नेहा पूरे दिन एक्साइटेड थी।

सुबह से ही वो मेरे कंधे मसाज कर रही थी, मेरे लिए कॉफी बना रही थी, और बीच-बीच में फोन पर आर्टिकल्स शेयर कर रही थी।

"ये देखो... सेफ वर्ड का क्या मतलब होता है।"

"ये पढ़ो... डोमिनेशन में कैसे सेफ्टी रखनी है।"

लेकिन आज... वो मालकिन बनने वाली थी।

मुझे डर था... और एक्साइटमेंट भी था।)

रात हुई।

नेहा ने पहले ही ऑर्डर दे दिया था—

"तुम सिर्फ़ अंडरवियर में रहना... दरवाज़ा खोलने के लिए तैयार रहना।

और... सॉरी इन एडवांस।"

"हमारा सेफ वर्ड... नेगी जी।"

(हमने साथ में पढ़ा था—अगर कुछ एक्सट्रीम हो जाए, या कोई चीज़ हमें असहज लगे, तो बस सेफ वर्ड बोलना।

प्ले रुक जाएगा।

पहले जब मैं मास्टर होता था... हमने ये शब्द कभी यूज़ नहीं किया।

मैं अंडरवियर में ही था—वही काला, टाइट वाला जो उसने चुना था।

दरवाज़े के पास खड़ा था।

दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

मुझे डर था—कहीं पड़ोसी ने देख लिया तो?

कहीं कोई आ गया तो?

मैं जल्दी-जल्दी दरवाज़ा खोलकर बंद करना चाहता था।

फिर... नॉक हुई।

मैंने दरवाज़ा खोला।

नेहा अंदर आई।

उसने लंबी हाई हील्स पहनी थीं—काली, चमकती हुईं।

जींस टाइट थी—उसकी जांघें और गांड उभरी हुईं।

टी-शर्ट साधारण लेकिन टाइट—उसके स्तन साफ़ नज़र आ रहे थे।

बाल खुले, होंठों पर डार्क लिपस्टिक।

वो मुझे देखकर मुस्कुराई।

फिर... धीरे से, फुसफुसाहट में कहा—

"गुड बॉय..."

मैं दरवाज़ा बंद करने के लिए मुड़ा।

तभी उसकी आवाज़ आई—एकदम सख्त, तेज़, जैसे कोई असली मालकिन डाँट रही हो।

"क्या मैंने तुम्हें दरवाज़ा बंद करने को कहा था, भेनचोद?"

शब्द मेरे कानों में बिजली की तरह गिरे।

"भेनचोद"।

वो शब्द... इतना कड़वा, इतना अपमानजनक।

मैं स्तब्ध रह गया।

मेरा शरीर फ्रीज हो गया।

दरवाज़ा अभी भी खुला था।

मैं सिर्फ़ अंडरवियर में खड़ा था—लगभग नंगा।

अगर कोई बाहर से देख लेता... पड़ोसी... कोई भी...

मैंने सोचा था—नेहा मालकिन बनेगी... लेकिन इतना हार्श?

इतना गंदा?

ये... मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा था।

मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

शर्म से चेहरा जल रहा था।

लेकिन... साथ ही... मेरा लुंड... पहले से ज़्यादा सख्त हो गया।

दर्द करने लगा।

नेहा मेरी तरफ मुड़ी।

उसकी आँखों में अब वो मासूमियत नहीं थी।

बस... एक ठंडी, क्रूर कमांडिंग लुक।

वो बोली—आवाज़ में कोई दया नहीं।

"घुटनों पर बैठ...

और पैर फैला... अच्छे से।"

मैं घुटनों पर बैठ गया।

दरवाज़ा अभी भी खुला था।

मेरा शरीर काँप रहा था—शर्म से, डर से, और उत्तेजना से।

मैं लगभग नंगा था—सिर्फ़ वो छोटा अंडरवियर, जो अब मेरे सख्त लुंड की वजह से तन गया था।

अगर कोई बाहर से देख ले... पड़ोसी... कोई भी...

मैंने हल्के से कहा—आवाज़ काँप रही थी—

"बेबी... दरवाज़ा खुला है... कोई देख लेगा..."

चटाक!

एक जोरदार थप्पड़ मेरे गाल पर पड़ा।

दर्द इतना तेज़ था कि मेरी आँखों में पानी आ गया।

मेरा गाल जलने लगा।

उसकी उँगलियों का निशान साफ़ महसूस हो रहा था।

नेहा ने मेरे बाल पकड़े।

मेरा सिर ऊपर खींचा।

उसकी आँखों में अब कोई मासूमियत नहीं थी।

बस... गुस्सा, कमांड, और एक गहरी भूख।

"कौन बेबी???

मुझे मास्टर बोलो, भेनचोद!"

उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि मेरे कानों में गूंज गई।

मैं डर गया।

सच में डर गया।

मैंने पहले नेहा को स्लेव बनाया था।

वो अक्सर कहती थी—"मुझे गाल पर थप्पड़ मारो..."

मैं मारता था... लेकिन कभी इतना जोर से नहीं।

हमेशा सोचता था—कहीं उसे चोट न लग जाए।

कहीं दर्द न हो।

लेकिन आज... नेहा ने नहीं सोचा।

उसने जोर से मारा।

मेरा गाल लाल हो गया।

उसकी उँगलियों का निशान साफ़।

और दरवाज़ा खुला था।

अगर कोई बाहर से देख ले... मेरे लाल गाल को... उसकी उँगलियों का निशान...

और मैं... सिर्फ़ अंडरवियर में... घुटनों पर...

मैंने सोचा—उसकी हथेली को भी दर्द हुआ होगा।

लेकिन वो... बिल्कुल नहीं रुकी।

वो मेरे बाल और कसकर पकड़कर बोली—

"अब... फिर से... मास्टर बोलो।

और घुटनों पर... पैर फैलाओ।

अगर कोई देख लेगा... तो देख लेगा।

मैं घुटनों पर बैठा था... पैर फैले हुए... नेहा के सामने।

मेरा पूरा शरीर काँप रहा था—शर्म से, डर से, और एक अजीब सी उत्तेजना से।

दरवाज़ा अभी भी खुला था।

नेहा की पीठ दरवाज़े की तरफ थी—उसकी टाइट जींस में उसकी गांड साफ़ नज़र आ रही थी।

और मैं... लगभग नंगा... सिर्फ़ वो छोटा अंडरवियर... जो मेरे सख्त लुंड की वजह से तन गया था।

अगर कोई बाहर से देख ले... तो सीधा 60 डिग्री एंगल से... सब कुछ दिख जाएगा।

तभी... बाहर से एक आवाज़ आई।

पैरों की आहट।

हमारे फ्लोर पर 8 फ्लैट हैं।

ज्यादातर लोग लिफ्ट यूज़ करते हैं... लेकिन वही फ्लोर वाले कभी-कभी गलियारे में घूमते हैं।

मैंने सिर थोड़ा उठाया।

और... गुप्ता जी।

हमारे बगल वाले फ्लैट वाले।

50 - 55 साल के... हमेशा हेलो-हाय करने वाले।

उनकी नज़र मुझ पर पड़ी।

फिर... नेहा की पीठ पर... उसकी टाइट जींस में उभरी गांड पर।

हमारी आँखें मिलीं—एक सेकंड के लिए।

उनकी आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं।

मैं... घुटनों पर... लगभग नंगा... नेहा के सामने।

और नेहा... दरवाज़े की तरफ पीठ करके... मालकिन बनकर खड़ी।

गुप्ता जी ने कुछ नहीं कहा।

बस... गुज़र गए।

3 - 4 सेकंड का वक्त था।

पता नहीं... उन्होंने कितना समझा।

पता नहीं... कितना देखा।

लेकिन... शुक्र है... वो रुके नहीं।

"हाय" कहने भी नहीं रुके।

बस... चले गए।

मेरा चेहरा जल रहा था।

गाल पर नेहा का थप्पड़ का निशान अभी भी दर्द कर रहा था।

मेरा लुंड... फिर भी सख्त था।
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#39
[color=#384764][size=small][font=-apple-system, BlinkMacSystemFont,][size=large][color=#2c82c9]नेहा मेरे सामने खड़ी थी—टाइट ब्लैक जींस में।

जींस इतनी टाइट थी कि उसकी गांड का शेप पूरी तरह उभर आया था—गोल, भरी हुई, जैसे कोई मूर्ति हो।

उसकी कमर पतली, जांघें मजबूत, और वो हाई हील्स में और लंबी लग रही थी।

बाल पोनी में बाँधे हुए थे—पीछे की तरफ खींचकर, जो उसके चेहरे को और सख्त, और डोमिनेंट बना रहा था।

डार्क लिपस्टिक—गहरी लाल, लगभग काली।

वो क्रूर दिखने की पूरी कोशिश कर रही थी—आँखें सिकोड़ी हुईं, होंठ कसे हुए।

लेकिन... वो अभी भी क्यूट लग रही थी।

उसकी बड़ी-बड़ी आँखें... वो मासूमियत... वो क्लासी, रिच लुक... सब कुछ परफेक्ट।

उसकी खूबसूरती... घरेलू और नॉटी का परफेक्ट मिक्स।
अगर कोई पूछे कि नेहा में सबसे अच्छी चीज़ क्या है... तो मैं बिना सोचे कहूँगा—उसका चेहरा।

उसकी खूबसूरती।

मैं घुटनों पर था—पैर फैले हुए।

दरवाज़ा अभी भी खुला था।

मैंने नेहा की तरफ देखा।

आँखों से इशारा किया—जैसे कह रहा हो—"गुप्ता जी... उन्होंने देख लिया... दरवाज़ा बंद कर दो..."

लेकिन नेहा ने कुछ नहीं किया।

उसने बस... मेरी आँखों में देखा।

उसकी मुस्कान और गहरी हो गई—एक क्रूर, मालकिन वाली मुस्कान।

वो सच में कैरेक्टर में थी।

उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।

वो जानती थी—दरवाज़ा खुला है।

कोई भी देख सकता है।

नेहा का थप्पड़ अभी भी मेरे गाल पर जल रहा था।

जलन... दर्द... और एक अजीब सी गर्मी।

मेरा चेहरा लाल हो गया था—उसकी उँगलियों का निशान साफ़ महसूस हो रहा था।

मैंने मुंह खोला—गुप्ता जी का नाम लेने वाला था।

"गुप्ता जी... उन्होंने..."

लेकिन शब्द गले में अटक गए।

मैं डर गया।

सच में डर गया।

पहली बार... अपनी नेहा से डर लगा।

वो मासूम, प्यारी नेहा... जो कभी मेरे सामने शरमाती थी... अब मेरी आँखों में देखकर सख्ती से बोल रही थी।

मैंने सोचा—सेफ वर्ड बोल दूँ?

"नेगी जी"।

बस इतना बोलना था... और सब रुक जाता।

रोल प्ले खत्म।

लेकिन... मैं नहीं बोल पाया।

मैंने खुद से कहा—

मैंने नेहा को कितनी बार स्लेव बनाया था।

उसे स्पैंक किया था—जोर से।

उसके बाल खींचे थे।

उसके गाल पर थप्पड़ मारे थे।

वो कभी नहीं बोली—"नहीं"।

वो कभी नहीं बोली—"रुक जाओ"।

वो हमेशा कहती थी—"और जोर से..."

और अब... वो मेरे साथ वैसा ही कर रही थी।

और मैं... 5 मिनट में ही पीछे हटना नहीं चाहता था।

खेल अभी शुरू भी नहीं हुआ था।

मैं कमिट होना चाहता था।

पूरी तरह।

नेहा ने नीचे देखा।

उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं।

वो समझ गई कि मैं कुछ कहना चाहता हूँ।

वो बोली—आवाज़ में वो ठंडी, क्रूर धमकी—

"बोल ना चूतिए... क्या हुआ??"

मैं डर रहा था... शर्म से मर रहा था... लेकिन साथ ही... मेरा लुंड फड़क रहा था।

मुझे समझ नहीं आ रहा था—मुझे नेहा से डर लग रहा है... या ये सब मुझे एक्साइट कर रहा है?

मैंने फुसफुसाया—बहुत धीरे—

"गुप्ता जी..."

नेहा ने मेरे बाल पकड़े।

मेरा सिर ऊपर खींचा।

उसकी आँखें सिकुड़ गईं।

"जोर से बोल भोसड़ीके..."

मैंने हिम्मत करके आवाज़ थोड़ी ऊँची की—इतनी कि बाहर न कोई सुन ले।

"गुप्ता जी... अभी-अभी दरवाज़े से गुज़रे... और उन्होंने मुझे ऐसे देखा..."

मैंने सोचा—अब वो शरमाएगी।

अब वो दरवाज़ा बंद कर देगी।

अब वो कहेगी—"ओह नहीं... कोई देख लेगा..."

लेकिन... उसके चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं आया।

न शर्म... न डर... न हँसी।

बस... एक ठंडी, क्रूर मुस्कान।

वो बोली—आवाज़ में कोई भावना नहीं—

"तो क्या?"

मैं स्तब्ध रह गया।

नेहा ने मेरे बाल और ज़ोर से पकड़े।

मेरा सिर पीछे खींचा—जोर से।

उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं थीं।

उसकी आवाज़ में अब वो ठंडी, क्रूर हँसी थी।

"शर्म आ रही है तुम्हें, भेनचोद?

बोल... शर्म आ रही है?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस... हल्का-सा "हम्म..." निकला।

वो हँसी—एक छोटी ।

फिर मेरे कान के पास मुँह ले जाकर बोली

"तुम्हें शर्म आ रही है... क्योंकि गुप्ता जी ने देख लिया?

तुम्हें शर्म आ रही है... क्योंकि वो तुम्हें ऐसे देख रहे हैं—घुटनों पर... मेरे सामने...

वो रुकी।

फिर... मेरी ही आवाज़ में मिमिक्री करने लगी—वो पुरानी वाली मेरी आवाज़...

"बेबी... ये बैकलेस पहनो... ये डीप नेक पहनो...

बेबी... गुप्ता जी के पैर छूओ... साड़ी में...

तुम जानत हो... अगर मैं झुकोगी... तो उन्हें तुम्हारी बीवी की पूरी चेस्ट दिख जाएगी

वो मेरे बाल और कसकर पकड़कर बोली—

"तब तुम्हें कभी शर्म नहीं आई?

तब तुम्हें कभी डर नहीं लगा?

तब तुम मुझे सबके सामने डिस्प्ले करते थे... और तुम्हें अच्छा लगता था।

अब... क्या हो गया?

ये सब समय... नेहा ने जो भी किया... वो सब मेरे कहने पर किया।

मैंने कभी उसे नहीं बताया कि मैं सच में क्या चाहता हूँ।

मैंने हमेशा सोचा कि मैं बहुत स्मार्ट हूँ—बस इतना कह दूँगा, "बेबी... ये बैकलेस बहुत अच्छा लग रहा है... तुम इसमें कमाल लगती हो..."

"ये डीप नेक पहनो... तुम्हारी खूबसूरती और निकलेगी..."

मैंने सोचा... वो नहीं समझेगी।

मैंने सोचा... मैंने बहुत अच्छे से छुपा लिया है कि मैं उसे सबके सामने डिस्प्ले करना चाहता हूँ।

गुप्ता जी जैसे लोगों के सामने... उनकी भूखी नज़रों के सामने... मेरी नेहा... थोड़ी कम कपड़ों में... थोड़ी झुकती हुई... थोड़ी शरमाती हुई...

लेकिन अब... सब साफ़ हो गया।

नेहा बेवकूफ नहीं थी।

वो हमेशा समझती थी।

हर बार समझती थी।

जब मैं कहता था—"ये पहनो... अच्छा लगेगा..."

वो जानती थी कि मैं क्या चाहता हूँ।

वो जानती थी कि मैं उसे उन नज़रों के सामने लाना चाहता हूँ।

फिर भी... वो कभी नहीं मना करती थी।

वो पहन लेती थी।

झुक जाती थी।

पल्लू सरकने देती थी।

क्योंकि... उसे भी अच्छा लगता था।

उनकी भूख... उनकी नज़रें... वो सब उसे भी एक्साइट करता था।

और मैं... कभी नहीं समझ पाया।

मैंने सोचा... मैं बहुत स्मार्ट हूँ।

लेकिन... वो मुझसे कहीं ज़्यादा स्मार्ट थी।


नेहा मेरे सामने खड़ी थी—उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं, चेहरा बिल्कुल स्ट्रेट, कोई एक्सप्रेशन नहीं।

जैसे वो जानबूझकर मुझे सोचने दे रही हो—सारे वो पुराने स्टेटमेंट्स, सारे वो बहाने, सारे वो "तुम इसमें बहुत अच्छी लगती हो" वाले लाइन।

वो सब मेरे दिमाग में घूम रहे थे।

मैं घुटनों पर बैठा था... पैर फैले हुए... दरवाज़ा अभी भी खुला... और मेरा लुंड सख्त होकर फड़क रहा था।

फिर वो बोली—आवाज़ में अब कोई क्रूरता नहीं, बस एक शांत, कमांडिंग टोन।

"ओके... अब उठो।

दरवाज़ा बंद करो।

फिर अंडरवियर उतारो।

और अंदर आओ।"

मैंने जल्दी से उठा।

दरवाज़ा बंद किया—जल्दी से, धड़ाम से।

शुक्र है... गुप्ता जी के अलावा किसी ने नहीं देखा।

या... शायद देखा भी हो... लेकिन अब क्या फर्क पड़ता है।

मैं अंदर आया।

नेहा सोफे पर बैठ गई—रिलैक्स्ड, पैर क्रॉस करके, जैसे कोई क्वीन बैठी हो।

उसकी जींस अभी भी टाइट थी—उसकी गांड सोफे पर दबी हुई।

टी-शर्ट से उसके स्तन उभरे हुए।

वो मेरी तरफ देख रही थी।

मैंने अंडरवियर उतारा।

पूरी तरह नंगा खड़ा हो गया।

मेरा लुंड सख्त था—फड़क रहा था, प्रीकम टिप पर चमक रहा था।

नेहा ने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा।

फिर... हल्के से मुस्कुराई।

नेहा मेरे सामने खड़ी थी—उसकी आँखें सीधे मेरे लुंड पर टिकी हुईं।

वो धीरे से मुस्कुराई—एक ठंडी, जानकार वाली मुस्कान।

"देखो... तुम मेरी बातों में इतना खोए हुए थे... फिर भी इतना सख्त।

तेरा लुंड तो अपनी ही ज़िंदगी जी रहा है..."

वो मेरे करीब आई।

उसकी उँगली मेरे लुंड की टिप पर हल्के से लगी—बस छूकर।

मैं काँप गया।

"चलो अब, सैम... उस लुंड को सहलाओ।

मैं देखना चाहती हूँ... तुम कितने पर्व हो... कैसे मज़ा लेते हो... जब दूसरे मेरी तरफ देखते हैं।

अच्छा शो दो... स्लेव।"

मेरा चेहरा अब जल रहा था—गाल लाल, सीना धड़क रहा था।

शर्म से मर रहा था... लेकिन लुंड पहले से ज़्यादा सख्त।

लगभग दर्द कर रहा था।

मैंने हाथ नीचे किया।

लुंड पकड़ा।

धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया।

नेहा सोफे पर बैठ गई—पैर क्रॉस करके, जैसे कोई क्वीन बैठी हो।

वो मुझे घूर रही थी—आँखें नहीं हटा रही थी।

"धीरे... चूतिए।

जल्दी मत करना।

मैं चाहती हूँ... तुम टाइम लो।

और... बिना मेरी इजाज़त के... झड़ने की हिम्मत मत करना।"

मैंने स्पीड कम की।

धीरे-धीरे... ऊपर-नीचे।

प्रीकम टिप पर आ रहा था—चमक रहा था।

नेहा ने हँसी—एक छोटी, क्रूर हँसी।

"देखो... कितना एक्साइटेड हो।

सोच रहे हो... गुप्ता जी ने देख लिया... पड़ोसी ने देख लिया...

कितना पर्व हो तुम... सैम।

मेरा पर्व स्लेव।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस... सहलाता रहा।

धीरे-धीरे।

नेहा ने अपना एक पैर आगे बढ़ाया।

उसकी हाई हील की नोक मेरे बॉल्स से छू गई।

हल्का-सा, जानबूझकर।

मैं अभी भी घुटनों पर था... लुंड हाथ में... धीरे-धीरे सहला रहा था।

उसकी हील मेरे बॉल्स पर रगड़ रही थी—धीमी, तड़पाने वाली हरकत।

दर्द और मज़ा एक साथ।

मैं काँप रहा था।

वो मेरी आँखों में देखकर बोली—आवाज़ में वो ठंडी, कमांडिंग टोन—

"तुम पोर्न देखते हो ना... सैम... जब अकेले होते हो?"

मैंने काँपते हुए कहा—

"हाँ.. ज्यादा नहीं..."

वो हँसी—एक छोटी, क्रूर हँसी।

फिर अचानक बोली—

"मेरी हील्स को किस करो।"

मैंने उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी हुईं।

मैंने झुककर उसकी बायीं हील की नोक पर होंठ रख दिए।

धीरे से... ऊपरी हिस्से पर।

धीमे-धीमे किस करने लगा।

हर किस में थोड़ा सा दबाव... थोड़ा सा चूसना।

तभी... उसने दूसरा पैर बढ़ाया।

उसकी हील की तलवा—वो गंदी, धूल वाली तलवा—मेरे चेहरे पर रगड़ने लगी।

गाल पर... नाक पर... होंठों पर।

धूल... गंदगी... सब मेरे चेहरे पर।

लेकिन मैं रुका नहीं।

मैंने बायीं हील को किस करना जारी रखा।

धीमे-धीमे... ऊपर से नीचे।

"अच्छा... तो बताओ... तुम और किस तरह का पोर्न देखते हो?"

मैं उसके हील्स की टिप को किस कर रहा था—धीमे-धीमे, ऊपरी हिस्से पर।

मेरा चेहरा जल रहा था—शर्म से।

मैंने कुछ नहीं कहा।

बस... किस करता रहा।

वो फिर बोली—आवाज़ में अब वो क्रूर शरारत—

"बोलो ना... क्या इतना शर्म आ रहा है?

ट्रांस वुमन?

बॉय ऑन बॉय?

या... क्योंकि तुम सिसी बॉय जैसे लगते हो?"

वो हँसी—एक छोटी, कड़वी हँसी।

उसने अपना होमवर्क अच्छे से किया था।

वो जानती थी... कैसे अपमान करना है।

कैसे मेरे दिमाग में घुसना है।

मैंने किस करना बंद कर दिया।

मेरा चेहरा और जलने लगा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

वो झुकी।

मेरे बाल पकड़े।

मेरा सिर ऊपर खींचा।

"मैंने तुम्हें रुकने को कहा, भेनचोद?"

मैंने सिर हिलाया—नहीं में।

फिर... धीरे से हील्स की टिप पर किस करना शुरू किया।

वो बोली—

"जब मैं पूछूँ... तो जवाब दो।

हमेशा।

समझे?"

मैंने काँपते हुए कहा—

"जी..."

वो मेरी आँखों में देखकर बोली—आवाज़ में वो ठंडी, कमांडिंग टोन—

"तो बताओ... तुम कौन सा पोर्न देखते हो... जब अकेले होते हो?"

मैं उसके हील्स की टिप को किस कर रहा था—धीमे-धीमे।

मेरा चेहरा जल रहा था—शर्म से।

मैंने हकलाते हुए कहा—

"मैं... रेगुलर पोर्न देखता हूँ..."

मैंने सच नहीं बताया।

कॉकॉल्ड वीडियोज़... वो सब... अभी नहीं बताना चाहता था।

बहुत जल्दी।

नेहा ने हँसी—एक छोटी, कड़वी हँसी।

फिर अपना पैर और आगे बढ़ाया।

उसकी हील की तलवा अब मेरे होंठों पर थी।

"ओके... तो तुम दूसरी लड़कियों को देखकर झड़ते हो... सही?"

वो अपना पैर थोड़ा और दबा रही थी—ताकि मुझे उसकी गंदी तलवा चाटनी पड़े।

मैंने जीभ निकाली।

उसकी तलवा चाटी—धीरे-धीरे... पूरी तरह साफ़ करने की कोशिश में।

उसकी हील अब चमक रही थी।

वो बोली—

"अच्छा बॉय।

अब... बताओ... तुम्हें किस तरह की लड़कियों को देखकर मज़ा आता है?

कौन सी स्लटी, गंदी वीडियोज़... जो तुम्हें झड़ने पर मजबूर कर देती हैं?

और अगर तुम मुझे काफी गर्म कर दोगे... तो शायद... मैं तुम्हें रिवॉर्ड दूँ।"

मैंने हकलाते हुए कहा—

"मैडम... मैं... हमेशा आपको इमेजिन करता हूँ... जब मैं ये वीडियोज़ देखता हूँ।"

नेहा ने एक पल के लिए रुककर मुझे देखा।

उसके चेहरे पर पहली बार... एक सच्ची, प्यारी मुस्कान आई।

कैरेक्टर थोड़ा टूटा।

वो बोली—

"गुड... गुड बॉय।

ये... बहुत हॉट था मेरे लिए।

मतलब... तुम सच में मुझे ही सोचते हो... जब तुम झड़ते हो?"

मैंने सिर हिलाया।

वो मुस्कुराई।

फिर... कैरेक्टर में वापस आई।

"अच्छा... तो अब... तुम्हें रिवॉर्ड मिलेगा।

हील्स चाटना बंद करो... अभी।"

मैंने तुरंत रुक गया।

वो बोली—

"अब... ज़मीन पर... हाथों और घुटनों के बल।

अब।"

मैं ज़मीन पर गिर गया।

हाथों और घुटनों पर।

मेरा लुंड मेरी जांघों के बीच लटक रहा था—सख्त, फड़कता हुआ।

नेहा ने कहा—

"अब... कुत्ते की तरह क्रॉल करो... और मेरी जांघों के बीच आओ।"

मैंने क्रॉल किया।

मेरा लुंड मेरी जांघों से टकरा रहा था।

अजीब... शर्मनाक... लेकिन एक्साइटिंग।

वो बोली—

"गुड बॉय... क्या मेरी स्लेव को... इस परफेक्ट चूत का स्वाद चखने का मन है?"

मैंने कराहा।

उसकी चूत की तरफ नाक ले जाकर सूंघा।

तेज़ी से क्रॉल किया।

तभी... उसने मेरे चिन को पकड़ा।

मेरा चेहरा ऊपर खींचा।

मुझे उसकी आँखों में देखना पड़ा।

और उसके चेहरे पर... गुस्सा था।

मेरा सिर पीछे खींचा—जोर से।

"व्हाट द फक डिड आई टेल यू अर्लियर?"

सकी आवाज़ तेज़ थी—जैसे कोई असली मालकिन अपने स्लेव को डाँट रही हो।

मैंने काँपते हुए कहा—

"आपने कहा था... घुटनों पर बैठो...

वो हँसी—एक छोटी, कड़वी हँसी।

फिर मेरे चेहरे पर हल्का-सा थप्पड़ मारा—इस बार भी दर्द हुआ।

"और?"

मैंने हकलाते हुए कहा—

"और... कुत्ते की तरह क्रॉल करके... आपकी जांघों के बीच आओ..."

"और मैंने तुम्हें मेरी चूत पर अपना मुँह रगड़ने को कहा था?"

मैंने सिर हिलाया—नहीं में।

वो बोली—आवाज़ में अब कोई दया नहीं—

"तो फिर... क्या कर रहे हो?


वो मेरे चेहरे के ठीक सामने झुकी हुई थी—उसकी साँस मेरे गाल पर लग रही थी।
मैंने काँपते हुए, शर्म से जलते हुए चेहरे के साथ कहा—
"सॉरी... मैं बस एक डंब लिटिल स्लट हूँ... एक हॉर्नी पर्व... ।
मैं... बहुत एक्साइटेड हूँ... आपकी परफेक्ट चूत का स्वाद चखने के लिए... अगर आप अभी भी मुझे इजाज़त देंगी, मैडम।"

नेहा ने एक पल के लिए रुककर मुझे देखा।

फिर... हल्के से "हम्म..." कहा।

उसकी आवाज़ में अब वो ठंडी संतुष्टि थी।

"शिफ़ इट वेल..."

कुछ देर बाद... वो बोली—

"अब... मेरी टाइट जींस खोलो।"

मैंने दाँतों से उसकी जींस की बटन खोली।

ज़िप नीचे की।

उसने अपना एक पैर उठाया।

मैंने उसकी हाई हील उतारी—धीरे से।

फिर दूसरी।

उसके नंगे पैर मेरे सामने।

उसके टो नेल्स—लाल पॉलिश लगे हुए।

मैंने झुककर उसके टो नेल्स चूसे।

एक-एक करके।

सकते हुए... चूसते हुए... जीभ से खेलते हुए।

मैं... सच में एक रियल बिच बन गया था।

कोई सेल्फ रिस्पेक्ट नहीं बचा था।

मैं एंजॉय कर रहा था।

नेहा इस बीच सिगरेट पी रही थी।

वो सोफे पर बैठी थी—एक हाथ में सिगरेट... दूसरा मेरे बालों में।

धुआँ मेरे चेहरे पर आ रहा था।

वो सेक्सी लग रही थी—बहुत सेक्सी।

उसकी टी-शर्ट से स्तन उभरे हुए... जींस अभी भी टाइट... लेकिन अब वो धीरे-धीरे उतार रही थी।

वो जींस पूरी उतारकर मेरे सामने।

बॉटमलेस।

उसकी पैंटी गीली थी—पसीने और उसके रस से।

उसकी चूत की खुशबू... पसीने की मिली हुई... मीठी, मस्की, गर्म।

मैं उसके सामने हंच्ड था—घुटनों पर... घुटनों में फ्लोर बर्न हो रहा था।

उसकी चूत मेरे मुँह से सिर्फ़ कुछ इंच दूर।

तभी... उसने मेरे सिर के पीछे हाथ रखा।

मेरा चेहरा अपनी चूत की तरफ खींच लिया।

मुझे और इंट्रोडक्शन की ज़रूरत नहीं थी।

मैंने जीभ निकाली।

उसकी सुंदर, नरम जांघों पर जीभ फेरी।

उसकी जांघें काँप रही थीं—उसकी डोमिनेशन की इंपल्स अब धीरे-धीरे कम हो रही थी।

उसकी भूख अब बढ़ रही थी—मेरी जीभ को अपनी क्लिट पर... अपनी चूत पर महसूस करने की।

वो ग्लिस्टनिंग थी।

उसकी चूत की मस्की, स्वीट खुशबू ने मेरे सारे होश उड़ा दिए।

मैंने जीभ को सीधा अंदर डाला—जितना गहरा हो सके।

धीरे-धीरे... उसे फक करने लगा जीभ से।

फिर... उसकी लेबिया पर जीभ फेरी।

जीभ को फ्लैट करके... छोटे-छोटे लिक्स... फिर लंबे, गहरे स्ट्रोक्स।

मेरा पूरा चेहरा अब उसके रस में भीगा हुआ था।

उसकी खुशबू... इतनी ओवरवेल्मिंग... कि मैं पूरी तरह सबमिसिव हो गया।

सिर्फ़ एक ही चीज़ चाहिए थी—उसकी चूत खाना... अपनी बीवी की सेवा करना... उसका पर्सनल पुसी-ईटिंग सेक्स स्लेव बनना।

क्या हो गया था मुझे?

क्या सच में ये सब... इतना अच्छा लग रहा था?

नेहा कराह रही थी—अब उसकी आवाज़ में वो क्रूरता नहीं थी।

बस... भूख।

नेहा की जांघें मेरे सिर के दोनों तरफ कस गईं थीं।

उसकी साँसें तेज़... कराहें अब और ऊँची।

"मम्म्म्ह्ह्ह... गुड बॉय..." वो प्यार से गुर्राई, लेकिन उसकी आवाज़ में अब वो डोमिनेंट एज वापस आ गई थी।

मैंने जीभ ऊपर की तरफ खींची—उसकी क्लिट पर तेज़ी से फ्लिक करने लगा।

उसकी चूत गीली थी—रस बह रहा था मेरे होंठों पर, मेरी ठोड़ी पर।

वो चीखी—"उग्ग्ग्ग्ग... येस... राइट देयर... ओह फक... डोन्ट स्टॉप... ओह फक डोन्ट स्टॉप..."

उसकी जांघें मेरे कनपटियों पर दबाव डाल रही थीं—इनवॉलंटरी, जैसे वो खुद को कंट्रोल नहीं कर पा रही हो।

मैंने एक हाथ नीचे किया।

मिडिल फिंगर उसकी चूत के छेद पर रखा।

धीरे से अंदर डाला—गर्म, गीली, टाइट।

"ओह फक..." वो आधी चीखी, आधी कराही।

मैंने फिंगर को अंदर-बाहर करना शुरू किया—धीमे से तेज़।

जीभ अभी भी उसकी क्लिट पर—तेज़, लगातार फ्लिक्स।

"ओह येस... ओह गॉड... ओह येस... ओह गॉड्ड्ड्ड..."

उसकी आवाज़ अब टूट रही थी।

उसने अपना हाथ नीचे किया—मेरे सिर को पकड़कर और ज़ोर से अपनी चूत पर दबाया।

उसकी जांघें काँप रही थीं।

फिर... वो टेंस हुई।

एक छोटा सा रश—उसका रस मेरे मुँह में भर गया।

मैंने जीभ तेज़ की—जितना तेज़ कर सकता था।

फिंगर को जैकहैमर की तरह अंदर-बाहर।

वो दूसरी बार झड़ गई—कुछ ही मिनटों में।

"ओह्ह्ह्ह्ह... फक..."

उसने मेरे सिर को पकड़कर धक्का देने की कोशिश की—जैसे अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा हो।

लेकिन मैं पीछे नहीं हटा।

मैंने जीभ चलानी जारी रखी—धीमी, गहरी स्ट्रोक्स।

उसका रस मेरे पूरे चेहरे पर था।

ठोड़ी, गाल, होंठ—सब गीले।

उसकी मस्की, स्वीट खुशबू मेरे नाक में घुस गई थी।

मैं पूरी तरह सबमिसिव हो गया था।

सिर्फ़ एक ही चीज़ चाहिए थी—उसकी चूत खाना... अपनी बीवी की सेवा करना... उसका पर्सनल पुसी-ईटिंग सेक्स स्लेव बनना।

क्या हो गया था मुझे?
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#40
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