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"मुझे नामर्द कहती है। ये ले!", थोड़ी देर मे लंड खड़ा हो गया और उसने उसे मलिका की चूत मे पेल दिया और ज़ोरदार धक्के मारने लगा। उसने अपने दाँत उसकी बड़ी, गोल धइले मे गढ़ा दिए। मलिका को और क्या चाहिए था!
मलिका पागलों की तरह हँसने लगी और अपनी टांगे उसकी कमर पे लपेट दी और नीचे से अपनी कमर हिलाने लगी और फिर जब्बार के कंधे पे इतनी ज़ोर से काटा की उसके खून निकल आया।
यहाँ से आगे....................
मेनका अपने मायके से वापस राजपुरा आ गयी थी।सवेरे उठ कर वो नीचे रसोई मे खानसमे से बात करने पहुचि।
"नमस्कार, कुँवरनी जी।"
"नमस्कार, खानसमा साहेब। आज का मेनू डिसाइड कर ले।"
"कुँवरनी जी, नाश्ते का हुक्म तो राजासाहेब ने कल रात आपके वापस आने के पहले ही दे दिया था। आप दिन के बाकी खाने का मेनू के बारे में हमे हुक्म कर दें।"
मेनका ने बाकी मेनू डिसाइड कर के जब नाश्ते का मेनू देखा तो उसे प्लीजेंट सरप्राइज़ हुआ। उसके ससुर ने केवल उसकी पसंद की चीज़ें बनाने का हुक्म दिया था। तभी उसके दिमाग़ मे एक ख़याल आया।
"खानसमा साहब, हमे पिताजी की पसंद-नापसंद के बारे मे दिटेइल से बताएँ और साथ-साथ ये भी कि मेडिकल रीज़न्स की वजह से तो उन्हे कोई परहेज़ तो नही करना पड़ता!"
थोड़ी देर बाद मेनू रिवाइज़ किया गया। मैत्री पटेल रचित[b]।[/b]
नाश्ते के बाद दोनो बाप-बेटे ऑफीस चले गये और मेनका महल का सारा सिस्टम समझने लगी। हर काम के लिए नौकर-नौकरानी थे। उन्हे पता भी था कि उन्हे क्या करना है। शाम तक मेनका ने पूरा सिस्टम समझ लिया और पूरे स्टाफ को कुछ नयी बातें भी समझा दी।
रात के खाने पे राजासाहब खुशी से उछल पड़े। केवल उनके पसंद की चीज़ें थी टेबल पर।
"खानसमा साहब, आज आप हम पर इतने मेहेरबान कैसे हो गये, भाई?"
"महाराज। ये सब हमने कुँवरनीसाहिबा के कहने पे बनाया है।"
"दुल्हन, आपको हुमारी पसंद के बारे मे कैसे पता चला?"
"जैसे आपको हुमारी पसंद के बारे मे पता चला।", मेनका ने जवाब दिया और दोनो हंस पड़े।
शाम के 7 बजे थे, अंधेरा गहरा रहा था जब राजपुरा से निकल कर वो ग्रे कलर की लेन्द्कृज़ ने 5 मिनट के बाद हाइवे छोड़ दिया ओर एक पतली सड़क पे चलने लगी और एक5 मिनट बाद कुछ झोपड़ियों के पास पहुच कर रुक गयी। ड्राइवरसाइड का शीशा 4 इंच नीचे हुआ और एक 50 का नोट बाहर निकला जिसे उस आदिवासी ने लपक के पकड़ लिया जो गाड़ी देख कर भागता हुआ आया था। बदले मे उसने एक छोटी बॉटल गाड़ी के अंदर दे दी।
उसके बाद वो ग्रे कलर की, गहरे काले शीशों वाली लेन्द्कृज़र वापस लौटने लगी। हाइवे से थोड़ा पहले कार रुक गयी। अंदर बैठे विश्वजीत ने बॉटल खोल के अपने मुँह से लगा ली। सस्ती शराब जब हलक से नीचे उतरी तो उसे जलन महसूस हुई पर इसी जलन मे उसे सुकून मिलता था।
राजा यशवीर का बेटा, भावी राजा, अखुट दौलत का मलिक जो चाहे, दुनिया की महँगी से महँगी शराब पी सकता था आदिवासियों द्वारा घर मे बनाई हुई 50 रुपये की शराब मे चैन पाता था। वाकाई इंसान भगवान की सबसे अजीबो-ग़रीब ईजाद है।
विश्वा को वो दिन याद आया जब वो अपने बड़े भाई के साथ घूमते हुए यहा आया था और उन्होने इन आदिवासियों से जंगली खरगोश पकड़ना सीखा था। अपने गुज़रे हुए भाई की याद आते ही उसकी आँखो मे पानी आ गया। मैत्री पटेल की रचना[b]।[/b]
"क्यू चले गये तुम भाई? क्यू? तुम गये और मैं यहा अकेला रह गया इन झंझटों के बीच मे। तुम जानते थे मुझे ये बिज़नेस और राजाओं की तरह रहना कितना नापसंद था। फिर भी मुझे छोड़ कर चले गये।", विश्वा बुदबुडाया और एक घूँट और भरी।
"मर्यादा,शान..डिग्निटी! बस यही रह गया है मेरी लाइफ मे। चलो तो ख्याल रहे कि हम किस ख़ानदान के हैं, बात करो तो ध्यान रहे कि हुमारी मर्यादा क्या है...यहा तक की शादी भी करो तो...हुन्ह।"
विश्वा हमेशा सोचता था कि यूधवीर राजा बनेगा और वो आराम से जैसे मर्ज़ी विदेश मे रह सकता था। शादी मे तो उसे विश्वास ही नही था। उसका मानना था कि जब तक जी करे साथ रहो और जिस दिन डिफरेन्सस हो अलग हो जाओ। शादी तो बस मर्द-औरत के ऐसे सिंपल रिश्ते को कॉंप्लिकेट करती थी।
उसने बॉटल ख़तम करके बाहर फेंकी की तभी एक लंबा, गोरा छोटे बालों वाला क्लीन शेवन इंसान उसके पास पहुचा, "सलाम,साब।"
उस अजनबी को देखते ही विश्वा के हाथ अपने कोट मे रखे पिस्टल पर चले गये।
"सलाम,साब। मेरा नाम विकी है। मुझे लगता है कि मेरे पास आपके काम की चीज़ है।"
"दफ़ा हो जाओ।", कहकर विश्वा गाड़ी गियर मे डालने लगा।
"साहब, बस एक बार मेरा सामान देख लीजिए। कसम से मैं आपका दुश्मन नही बस एक छोटा सा व्यापारी हू जिसे लगता है कि उसके माल के असल कदरदान आप ही है।"
विश्वा ने बिना कुछ बोले गाड़ी रोकी पर बंद नही की और उसका एक हाथ कोट के अंदर ही रहा।
विकी ने अपनी जेब से दो छोटे पॅकेट्स निकाले जिसमे एक मे सफेद पाउडर था और दूसरे मे छोटे-छोटे टॅब्लेट्स।
विश्वा समझ गया कि विकी एक ड्रग डीलर था और ये सिकैने और एकस्टसी थे।
"मैं ये सब नही लेता।"
"साहब, ना तो मैं पोलीस का आदमी हू ना तो आपको फँसाने की कोशिश कर रहा हूँ। आपके जैसे मैं भी इन लोगों से महुआ लेने आता हूँ। आज आपको देखा तो मेरे अंदर का बिज़नेसमॅन कहने लगा कि इतने मालदार आदमी को 50 रुपये की शराब क्यू चाहिए! इसीलिए ना कि वो कोई नया नशा चाहता है।"
विश्वा ने विकी की आँखों मे घूर के देखा। सच कह रहा था वो। वो नशे मे सुकून ही तो तलाश रहा था। मैत्री पटेल द्वारा रूपांतरित[b]।[/b]
"..मैं यही नाथुपुरा का रहनेवाला हूँ। शहर मे मेरी मोबाइल शॉप है। थोड़ी एक्सट्रा इनकम के लिए ये धंधा करता हू। भरोसे का आदमी हू साहब। माल भी असली देता हूँ। एक बार ट्राइ करो साहब।"
"कीमत क्या है?"
विकी के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी।
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आगे लिख रही हूँ कही जाइएगा नहीं...............
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03-01-2026, 02:47 PM
(This post was last modified: 03-01-2026, 02:49 PM by maitripatel. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
वो मोबाइल जिसमे बस एक ही नंबर सेव्ड था अचानक बजने लगा। जब्बार चौंक कर उठा, रात के एक2 बज रहे थे। मलिका एकदम नंगी बेसूध उसके बगल मे सोई पड़ी थी। उसके पैर फैले हुए थे और उसकी चूत के पंखुड़िया फैली हुई थी। मैत्री पटेल की रचना[b]।
[/b]
"हम्म", उसने फोन उठाया।
"चिड़िया ने आज दाना चुग लिया।"
"वेरी गुड। उसे जाल मे फँसा कर ही छोड़ना।"
"डोन्ट वरी।"
जब्बार ने फोन काट दिया। कल्लन ने पहली सीधी चढ़ ली थी। अब देखना था आगे क्या होता है।
राजा यशवीर ने महसूस किया कि मेनका के आने के बाद उनका शानदार महल फिर से उन्हे घर लगने लगा था वरना तो पिछले दो सालों से बस वो यहा जैसे बस सोने और खाने के लिए आते थे।
पर अब उन्हे घर पहुँचने का इंतेज़ार रहता था। मेनका से बातें करने के लिए। वो भी उनसे हर मुद्दे पर बात कर लेती थी। उन्हे वो काफ़ी समझदार और सुलझी हुई लड़की लगती थी। राजासाहब उसे कंपनी के बारे मे भी बताते थे और उसके बिज़नेस के बारे मे ओपीनियन्स सुन कर प्रभावित हुए बिना नही रह सके थे। महल की ज़िम्मेदारी तो उसने बखूबी संभाल ली थी।
मेनका को भी अपने ससुर के साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता था। उनके पास बताने को इतनी इंट्रेस्टिंग बातें थी और वो कितने नोलेजबल थे। पर सबसे अच्छा लगता था जैसे वो उसके बारे मे केअर करते थे।
धीरे-धीरे करके एक महीना गुज़र गया। जहा राजासाहब और मेनका एक दूसरे से काफ़ी फ्री हो गये थे। वही मेनका महसूस कर रही थी कि उसका पति उससे दूर होता जा रहा है। वैसे तो अपना मन टटोलने पर वो भी पाती थी कि वहा विश्वा के लिए प्यार नही है- होता भी कैसे जिस इंसान ने उसे बस अपनी प्यास बुझाने का ज़रिया समझा हो, उसके लिए प्यार कहा से आता। पर था तो वो उसका पति और उसे हो ना हो मेनका को उसकी फ़िक्र ज़रूर थी।
पिछले एक महीने से वो रात मे देर से आता, पूछने पर काम का बहाना बना देता। मेनका को शक़ हुआ कि कही कोई दूसरी औरत का चक्कर तो नही पर ऐसा नही था कि विश्वा को उसमे दिलचस्पी नही थी। रोज़ रात वो उसे पहले जैसे ही चोद्ता था, पर अब वो और बेचैन और बेसबरा रहने लगा था। उसकी आँखों मे जैसे कोई नशा हर वक़्त दिखता था।
मेनका बिस्तर पर पड़ी हुई यही सब सोच रही थी, बगल मे विश्वा उसे चोदकर अभी-अभी सोया था। उसका ध्यान अपने ससुर की ओर गया, कितना फ़र्क था बाप-बेटे मे। राजासाहब उसकी कितनी चिंता करते थे। अगर विश्वा की जगह उसकी शादी राजासाहब से हुई होती तो? ख़याल आते ही मेनका को अपने बचपने पर हँसी भी आई और थोड़ी शर्म भी। आख़िर वो उसके ससुर थे।। उसने करवट लेकर विश्वा की तरफ पीठ की और सोने लगी।
वही राजासाहब विश्वा के बारे मे सोच रहे थे। उन्हे आजकल वो थोड़ा अजीब लगने लगा था। नयी शादी थी पर बहू मे उसे कोई खास दिलचस्पी नही थी। एक बार उन्होने उसे बहू को घुमाने के लिए शहर ले जाने कहा था पर उसने काम का बहाना कर बात टाल दी। इतनी अच्छी बीवी पाकर तो लोग निहाल हो जाते हैं। उन्होने सोच लिया था कि विश्वा से खुल कर बात करेंगे। मेनका जैसी लड़की किस्मत वालों को मिलती है। उन्हे भी तो ऐसी ही बीवी चाहिए थी जो सिर्फ़ पत्नी ही नही दोस्त भी हो, उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने का हौसला रखती थी। सरिता देवी एक बहुत अच्छी स्त्री, अच्छी मा थी पर राजासाहब की मित्र बनने की कोशिश उन्होने कभी नही की। इसीलिए तो वो शहर मे उन रखेलो को रखने लगे थे, "कितनी पुरानी बात है।", उन्होने सोचा। बेटे की मौत के बाद तो सेक्स की तरफ उनका ध्यान भी नही गया।
और फिर उन्हे भी ख़याल आया, "अगर मेनका हमारी बीवी होती तो? और उनके होटो पे मुस्कान आ गयी। "छी छीए! अपनी बहू के बारे मे ऐसे ख़याल! पर गैर होती तो! शायद अब तक मेरे लंड से खेलती होती"! सोचते हुए वो भी सो गये।
अगले दिन वो सुबह होनी थी जो दोनो की ज़िंदगी का रुख़ बदलने का आगाज़ करने वाली थी।
==========================
आज के लिए बस यही तक[b]।[/b]
आपके कोमेंट्स की प्रतीक्षा में ..............
मैत्री पटेल के ओर से .....
[b]।। जय भारत ।।[/b]
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कोई कोमेंट ही नहीं अच्छी या बुरी...........
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मुझे लगता है की यह कहानी पाठको को आकर्षित नहीं कर सकी
खेद है....................
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चलिए कहानी में थोडा आगे बढ़ते है
आशा रखती हूँ की यह कहानी आपको पसंद आएगी
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अब आगे...............
सुबह राजासाहब लॉन मे चाइ पीते हुए अख़बार पढ़ रहे थे। मेनका वही उनसे कुछ 24 फीट की दूरी पर मालियों को कुछ समझा रही थी। राजासाहब ने अख़बार के कोने से उसे देखा, पीले रंग की साडी मे वो बहुत सुंदर लग रही थी। राजासाहब उसका साइड प्रोफाइल देख रहे थे जिस वजह से उसके बड़ी छातियो और गांड के उभार का पूरा पता चल रहा था। आज पहली बार राजासाहब ने उसके फिगर को ढंग से देखा और रीयलाइज़ किया की खूबसूरत होने के साथ-साथ मेनका बहुत सेक्सी भी है।
तभी मेनका का हाथ अपने माथे पर गया, माली उसके आदेशानुसार लॉन के दूसरे कोने पर चले गये थे। आस-पास कोई नौकर नही था, सभी किसी ना किसी काम मे लगे थे। मेनका को चक्कर आ रहा था, अचानक उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
राजासाहब ने उसे गिरते देखा और बिजली की फुर्ती से उसे ज़मीन पर गिरने से पहले ही सामने से अपनी बाहों मे थाम लिया, "क्या हुआ, दुल्हन?" वो उसे इस तरह से पकड़े थे कि दूर से कोई देखता तो समझता कि दोनो गले लग रहे हैं। उन्होने नीचे उसके चेहरे को थपथपाया। मेनका ने आँखें खोली तो देखा कि उसके ससुर ने उसे गिरने से रोक लिया था।कितना आराम लग रहा था उसे इन मज़बूत बाहों मे, हिफ़ाज़त महसूस हो रही थी, उसने सहारे के लिए राजासाहब के कंधों को पकड़ लिया। उसका दिल किया कि बस ऐसे ही उन बाहों के सहारे खड़ी रहे, राजासाहब की शर्ट के उपर के दो बटन खुले थे और उनके चौड़े, बालों भरे सीने का कुछ हिस्सा नज़र आ रहा था। मेनका ने सिर झुकाया और उनके सीने मे अपना मुँह छुपा लिया। उनकी मर्दाना खुसबु उसे मदहोश करने लगी।
राजासाहब की नज़र नीचे पड़ी तो पारदर्शी आँचल मे से उन्हे ब्लाउस के गले से झँकता मेनका का मस्त क्लीवेज नज़र आया जो कि उनके सीने से दबने के कारण और उभर के ऊपर आ गया था। उनके हाथ ब्लाउस के नीचे से उसकी नंगी पीठ और कमर पर थे और उसकी कोमलता महसूस कर रहे थे। राजासाहब का लंड खड़ा हो गया था जिसे सटे होने के कारण मेनका ने भी अपने पेट पे महसूस किया और वो अपने ससुर से थोड़ा और सॅट गयी। दोनो का दिल कर रहा था कि ऐसे ही पूरी उम्र खड़े रहे पर तब तक नौकर-नौकरानी भागते हुए वहा आने लगे थे। राजासाहब ने एक हाथ अपनी बहू की कमर से हटा कर उसके चेहरे को उपर उठाया, "होश मे आओ दुल्हन।"
नौकरानियों की मदद से मेनका को उन्होने उसके कमरे तक पहुचाया और विश्वा को डॉक्टर बुलाने को कहा। राजासाहब ने अपने मिल स्टाफ की सुविधा के लिए जो हॉस्पिटल बनाया था उसकी देख-रेख की ज़िम्मेदारी डॉक्टर,सिन्हा की थी। उनकी बीवी डॉक्टर लता भी उसी हॉस्पिटल गायनेकोलोजी डिपार्टमेंट देखती थी। विश्वा का फोन मिलते ही वो तुरंत महल पहुचि और मेनका का चेक-अप करने लगी। थोड़ी देर बाद वो राजासाहब और विश्वा के पास आई, "बधाई हो राजासाहब, आप दादा बनाने वाले हैं।"
"क्या...?सच! डॉक्टर साहिबा आपने तो हमारा मन खुश कर दिया। दुल्हन बिल्कुल ठीक तो हैं ना?"
"हा, राजासाहब। आपकी इजाज़त हो तो मैं कुंवर-कुँवारानी से ज़रा एक साथ बात कर लूँ?"
"हा,हा। ज़रूर। जाइए कुंवर।"
मेनका के बेडरूम मे पहुच कर उन्होने कहा,"कुँवरनी बिल्कुल ठीक हैं,कुंवर। बस आप इनका रेग्युलर चेक-अप करवाते रहिए। बस एक बात का ख़याल रखे। अभी कमसे कम 45 डेज़ तक आप दोनो फिज़िकल रिलेशन्स मत बनाइएगा।ये होने वाली मा के लिए बहुत ज़रूरी है। एक डॉक्टर होने के नाते मेरा फ़र्ज़ था कि मैं आपको ये बता दूं होप यू डिड्न'ट माइंड इट।"
"नो नोट ऐट ऑल, डो. आंटी। आपने बचपन से हमे देखा है, आप इतना फॉर्मल होकर हमे शर्मिंदा कर रही हैं।"
विश्वा राजासाहब के कहने पर डॉक्टर को छोड़ने बाहर तक आया।
"कुंवर, आपकी तबीयत तो बिल्कुल ठीक है ना?", विश्वा की आँखें देख कर डॉक्टर लता को कुछ शक़ हुआ था।
"हा,आंटी ऐसा क्यू लगा आपको?"
"बस ऐसे ही कोई परेशानी हो तो आप जानते हैं कि आपके डॉक्टर अंकल और मैं हमेशा मौजूद हैं।"
"हा, आंटी। आप फ़िक्र ना करें।"
जब से मेनका प्रेग्नेंट हुई थी राजासाहब तो उसका और ख़याल रखने लगे थे। अगर उसे एक फूल भी उठाकर यहा से वहा रखते देखते तो नौकरों को डाँटने लगते। उसे अपने हाथों से काम तो पहले भी नही करना पड़ता था और अब तो लगता था कि राजासाहब का बस चलता तो उसे हर वक़्त बिठा कर ही रखते। पर विश्वा वैसे का वैसा था बस अब उसे चोद नही सकता था। पर मेनका को उसकी चिंता होती थी, इधर वो उसे और अजीब लगने लगा था। राजासाहब जर्मन कंपनी से डील मे बिज़ी थे। अब पेपर और शुगर दोनो मिल्स मे हिस्सेदारी अकेली वो जर्मन कंपनी खरीद रही थी।
ऐसे मेनका की प्रेग्नेन्सी को एक महीना पूरा हो गया।
"दुल्हन, जर्मन डील के लिए हमे 2-3 दिनों के लिए शहर जाना पड़ेगा? पीछे आप अपना ख़याल रखिएगा। और हाँ कोई भी काम बिल्कुल नही करना है, बस हुक्म देना है। सारे नौकरों को भी हमने ताकीद कर दी है।"
"आप हुमारी चिंता मत करिए, पिताजी। आप बस डील के टर्म्स ध्यान से फाइनलाइज करिएगा। वो क्लॉज़ ज़रूर डलवाइएगा जिसमे मेन्षंड है कि उनके स्टाफ के ग्रूप मे आने के बाद भी हमारे एग्ज़िस्टिंग एंप्लायीस को 6 महीने तक नही हटाया जा सकता, केवल हटाने के लिए शॉर्टलिस्ट किया जा सकता है। और हा, उनकी कॉंपेन्सेशन अमाउंट भी अभी ही फाइनल कर लीजिएगा।", राजासाहब के कार मे बैठते मेनका बोली।
"ओके, दुल्हन। अब अंदर जाकर आराम कीजिए।"
"कार मे बैठे-बैठे राजासाहब सोच रहे थे कि वो कितने किस्मतवाले हैं कि मेनका जैसी बहू मिली। और फिर वोही ख़याल आया उन्हे, "अगर वो उनकी पत्नी होती तो?"
पर उन्होने अपना सर झटका और कुछ पेपर्स देखने लगे।
-------------------------------------------------------------------------------
"कैसा चल रहा है? चिड़िया को दाने की आदत लग गयी?"
"हा, अब तो पंछी एक दिन भी बिना दाने के नही रह पाता। इतने ही दीनो मे ऐसा आदि हो जाएगा मैने तो सोचा ही नही था।"
"तो अब उसे थोड़ा तड़पाओ। कुछ दीनो के लिए दानो की सप्लाइ रोक दो। थोड़ा तडपेगा तो जो हम कहेंगे वो करेगा।"
"ओके।"
और जब्बार और कल्लन उर्फ विकी की बात ख़तम हो गयी।
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चलिए मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ
तब तक के लिए मैत्री की ओर से
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दोस्तों आशा रखती हूँ की आपको एपिसोड पसंद आया होगा
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और फिर वो दिन आया जिसने इन तीनो किरदारों की ज़िंदगी पूरी की पूरी बदल दी।
उस दिन मेनका अकेली ही डॉक्टर लता से मिलने गयी थी। चेक अप मे सब कुछ नॉर्मल था बस उन्होने अभी भी चुदाई से परहेज़ करने को कहा।
रात के एक बज रहे थे। मेनका ने कपड़े बदल कर नाइटी पहन ली थी। विश्वा का कही पता नही था। वो मोबाइल भी नही उठा रहा था। सारे नौकर महल के नियमानुसार महल से बाहर अपने क्वॉर्टर्स मे चले गये थे। मेनका को अब बहुत चिंता होने लगी। राजासाहब भी आज वापस नही आए थे ना ही उनका फोन आया था। ऐसे तो दिन मे कम से कम 4-5 बार फोन पे उससे उसका हाल लेते थे। मेनका को घबराहट होने लगी।
और विश्वा, वो देखिए वहा राजपुरा के बाहर हाइवे पे अपनी लेन्द्कृज़र दौड़ाता हुआ सेल पे किसी का नंबर ट्राइ कर रहा है। आइए ज़रा करीब से देखें चलें कार के अंदर।।।।
"डॅम इट! ये हरामजादा, मादरचोद विकी कहा मर गया। अपनी हालत खराब हो रही है और ये साला पता नही कहा अपनी गांड मरवा रहा है!", और अपनी गाड़ी आदिवासियों के गाव की ओर मोड़ दी।
"क्या साहब आजकल आप आते नही।", आदिवासी बंद काले शीशे के अंदर विश्वा से बोला। जवाब मे 3 इंच खिड़की नीचे हुई और 200 रुपये बाहर आए। आदिवासी की भोचे खिल गयी और उसने 4 बॉटल्स अंदर दे दी।
इंतेज़ार करते-करते कब मेनका की आँख लग गई, उसे पता भी नही चला। जब धड़ाक से कमरे का दरवाज़ा खुला तो वो चौंक कर उठी।
"कहा थे आप? मैं कितना परेशान थी।" मैत्री की पेशकश.
विश्वा नशे मे चूर लड़खडाता हुआ अंदर आया। महुआ पूरी तरह उसके दिमाग़ पर हावी थी। उसे मेनका की कोई बात नही सुनाई दे रही थी बस उसका कातिल जिस्म नज़र आ रहा था। वो आगे बढ़ा और उसे खीच कर चूमने लगा, अपने हाथ उसकी स्तनों पर रख दिए।
"नही डॉक्टर ने मना किया है।"
"चुप। मादरचोद साली", और उसकी नाइटी उतारने लगा।
"नही, अभी आप होश मे नही हैं, जाइए आज से पहले तो आप कभी पी कर नही आए।", वो अपने को छुड़ाते हुए बोली।
"चुप,साली",विश्वा पागल हो गया" मैं जो मर्ज़ी करूँगा और अभी तुझे चोदुंगा। भाड़ मे जाए डॉक्टर।"
"नही”, मेनका उससे बचने के लिए भागी पर विश्वा ने उसे ज़बरदस्ती पकड़ कर उसकी नाइटी फाड़ दी।
"प्लीज़, अपने बच्चे के बारे मे तो सोचिए।" मेनका रोने लगी।
पर विश्वा ने पूरी नाइटी फाड़ कर फेक दी। नाइटी के नीचे कुछ नही था। मेनका भागते हुए कुछ ढूँदने लगी जिससे अपना नंगापन छुपा सके।
पर तभी विश्वा आगे बढ़ा और पीछे से उसे दबोच लिया और पेंट से अपना लंड निकाल कर वैसे ही घुसाना चाहा पर मेनका उसकी पकड़ से निकल भागी। विश्वा इस हरकत से बौखला गया और लपक कर उसे फिर पकड़ा। इस बार मेनका ने उसके हाथ पे काट लिया।
अब तो वो गुस्से से पगला हो गया। उसने मेनका के बाल पकड़ कर उसे दो थप्पड़ लगाए और फिर उसे बेड पे धकेल दिया। मेनका पेट के बल पलंग के साइड पे इस तरह गिरी कि उसका पूरा पेट पलंग से ज़ोर से टकराया और उसके बदन मे दर्द की तेज़ लहर दौड़ गयी।
"ओ मा...एयेए!" वो दर्द से चीखी "बचाओ," वो बस इतना ही कह पाई और फिर दर्द से वो बेहोश होने लगी। उसकी टांगो के बीच से खून की एक पतली धार उसकी जांघों पर फैलने लगी। ओर इस सबसे बेपरवाह नशे मे धुत विश्वा पीछे से उसकी चूत मे लंड डालने लगा, "ना..ही..प्लीज़..ईयीज़ी", मेनका कराही और जैसे ही लंड उसके अंदर गया और उसे लगा कि जैसे उसका बदन कोई चीर रहा है। मैत्री की पेशकश.
"बचाओ", वो चीखी और उसी वक़्त भागते हुए राजा यशवीर कमरे मे दाखिल हुए। उन्होने विश्वा का कॉलर पकड़ कर उसे मेनका से अलग किया और एक ज़ोरदार थप्पड़ लगाया। विश्वा वही कोने मे बेहोश होकर ढेर हो गया।
"दुल्हन, आँखें खोलो?", मेनका को उठाते हुए बोले।
"आ..प..आ..ग...ये।", कह कर मेनका उन्हे पकड़ कर बेहोश हो गयी।
क्रमशः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।
END of episode 12
चलिए फिर मिलते है एपिसोड 13 में तब तक के लिए
मैत्री की ओर से
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Kya ye kisi old kahani se inspire hai or Kisi aur language me hai aur Aap iska hindi anuvaad karke likh rahi hai ?
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(17-01-2026, 07:05 PM)rajeev13 Wrote: Kya ye kisi old kahani se inspire hai or Kisi aur language me hai aur Aap iska hindi anuvaad karke likh rahi hai ?
जी बिलकुल .............
बने रहिये
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(26-01-2026, 09:33 AM)SonuBeta Wrote: Bahut Khooob !!
बहोत बहोत शुक्रिया दोस्त
बने रहिये मेरे साथ इस कहानी में.
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मुझे लगता है की कहानी पाठको को आकर्ष ने में असफल रही है
बहोत दुःख के साथ...........
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चलिए कहानी में कुछ नया जानने की कोशिश करते है
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अब आगे.....
गतान्क से आगे।।।।।।।।।।।।।।।।
मेनका की आँखें खुली तो उसने अपने को हॉस्पिटल के कमरे मे पाया।डॉक्टर।लता उसके बगल मे चेर पे बैठी थी।
"हाउ आर यू फीलिंग नाउ?",उन्होने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूचछा।
मेनका अब पूरी तरह होश मे आई और उसका हाथ अपने पेट पर चला गया।
"सॉरी,बेटा।",डॉक्टर लता इतना ही कह पाई।मेनका की आँखों से आँसू बहने लगे तो डॉक्टर।लता ने प्यार से उसे गले लगा लिया।थोड़ी देर मे जब वो चुप हुई तो डॉक्टर।लता बोली,"मैं राजासाहब को भेजती हू,कल रात से वो एक मिनिट भी नही सोए हैं।तुम्हारे होश मे आने का इंतेज़र कर रहे थे।"कह के वो बाहर चली गयी।
मेनका को याद आया,कल रात राजासाहब ने ही उसे बचाया था। उस वक़्त वो पूरी नंगी थी। तो क्या राजासाहब ने उसे वैसे देखा।शर्म से उसकी आँखें बंद हो गयी। उसका पति ऐसा दरिन्दा बन जाएगा,उसको तो अभी भी यकीन नही आ रहा था।आँखें खोल कर उसने कमरे मे नज़र घुमाई तो एक तरफ एक डस्टबिन मे उसे अपनी एक नाइटी नज़र आई।।"यानी राजासाहब ने उसके कपड़े बदले।" मैत्री की पेशकश.
तभी दरवाज़ा खुला और राजा यशवीर दाखिल हुए।मेनका ने अपनी नज़ारे नीची कर ली और उसका गला फिर भरने लगा।थोड़ी देर तक कमरे मे खामोशी च्छाई रही।
"हम क्या कहें,दुल्हन और कैसे कहें?हमारा अपना खून हमे अपनी ही नज़रों मे इस कदर गिरा देगा!हम आपसे माफी माँगते हैं।"
मेनका वैसे ही खामोश रही।
"दुल्हन,चुकी आपकी शादी को ज़्यादा वक़्त नही हुआ है तो क़ानून के मुताबिक हॉस्पिटल वालों को पोलीस को खबर करनी पड़ी है कि आपका मिसकॅरियेज हो गया है।"राजासाहब कांपति आवाज़ मे बोले,"हम चाहते हैं कि-।"
"-मैं पोलीस को आपके बेटे की हैवानियत के बारे मे ना बताऊं ना,नही बताऊंगी, प्लीज़ लीव मी अलोन!",मेनका चीखी और फूट- फूट कर रोने लगी। उसका दबा गुस्सा फॅट कर बाहर आ गया था।
राजासाहब भागते हुए उसके पास पहुँचे और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,"नही,दुल्हन, आप हमे ग़लत समझ रही हैं। हम ये कह रहे थे कि आप पोलीस को पूरी सच्चाई बता दें। विश्वा ने महपाप किया है और उसकी सज़ा उसे ज़रूर मिलनी चाहिए।अगर पोलीस नही देगी तो हम देंगे अपने हाथों से।",राजासाहब की आवाज़ा कठोर हो गयी।
मेनका ने चौंक कर अपने ससुर की ओर देखा।वो कितना ग़लत समझ रही थी।राजासाहब का इलाक़े मे इतना प्रभाव था।अगर वो चाहते तो पोलीस को यहा कभी नही आने देते।बल्कि उनकी जगह कोई और होता तो बात महल की दीवारों के बीच ही दब कर रह जाती।
तभी दरवाज़ा खुला और मेनका के माता-पिता अंदर आए।मेनका की मा अपनी बेटी से लिपट गयी,मेनका की रुलाई फिर शुरू हो गयी पर मा की गोद मे उसे बहुत सहारा मिल रहा था।उसके पिता की भी आँखें नम हो चली थी।
थोड़ी देर मे जब सब थोड़े शांत हुए तो मेनका के पिता राजा अर्जन सिंग ने सारे वाकये के बारे मे पूचछा,"आख़िर ये सब हुआ कैसे,राजासाहब?"
राजासाहब के बोलने से पहले मेनका बोली,"हमारे पैर कार्पेट मे फँस गया और हम गिर गये जिसकी वजह से हम ऐसे गिरे की हमारा-।"
"-दुल्हन हमे शर्मिंदा होने से बचाना चाहती हैं और इसीलिए झूठ बोल रही हैं।",राजासाहब उसकी बात बीच मे ही काटते हुए बोले और फिर उन्होने सारी बात राजा अर्जन और उनकी पत्नी को बता दी।
दोनो गुस्से से उबाल पड़े,"हम अपनी बेटी को यहा एक पल भी नही रहने देंगे।ठीक होती है मेनका वापस जाएगी हुमारे साथ।और आपके बेटे-।"
"बस डॅडी, मैं कोई गाय-बकरी हूँ जब जी चाहा शादी कर दी ,जब चाहा वापस ले जाएँगे।",फिर वो अपनी माँ की तरफ घूमी,"मा,आपने कहा था कि हम राजघराने वालों के यहा शादी बस एक बार होती है और हम स्त्रियाँ अपनी ससुराल अर्थी पर ही छोड़ती हैं।"
"पर बेटी,यहा इन हालत मे कैसे छोड़ दे तुम्हे?"
"डॅडी,मैं इतनी भी कमज़ोर नही हू।"
ये बहस चल रही थी कि दरवाज़े पे किसी ने नॉक किया।डॉक्टर सिन्हा और उनकी वाइफ डॉक्टर लता आए थे,"राजासाहब हम आप सबसे कुछ ज़रूरी बात करना चाहते हैं।",डॉक्टर सिन्हा राजा अर्जन और उनकी पत्नी को नमस्कार करते हुए राजा यशवीर से मुखातिब होकर बोले।
"जी,ज़रूर डॉक्टरसाब बैठिए।"
"राजासाहब।आपके कहे मुताबिक कल से कुंवर हमारे हॉस्पिटल मे हैं।हमने उनका पूरे चेक-अप करलिया है।वो अडिक्षन के शिकार हैं।"
"क्या?"
"जी वो ड्रगअडिक्ट हो गये हैं और कल रात की उनकी हरकत ड्रग्स ना मिलने पर उनका रिक्षन था।उनका अपने उपर कोई कंट्रोल नही रह गया है।"
"राजासाहब,हम ये कहने आए हैं कि जल्द से जल्द उन्हे रीहॅबिलिटेशन सेंटर मे भरती करवा दे।बस यही एक रास्ता है।
"डॉक्टर लता अपने पति की बात पूरी करते हुए बोली।
राजासाहब के माथे पे चिंता की लकीरें और गहरा गयी,
अभी लिख रही हूँ बने रहिये
। जय भारत ।
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थोडा और आगे.......
"डॉक्टर साहब,आप ही हमे रास्ता दिखाएँ।"
"राजासाहब,हमे एक वीक का समय दीजिए। हम आपको बेस्ट सेंटर्स की लिस्ट दे देंगे।
"कह कर दोनो पति-पत्नी जाने के लिए उठ गये,
"कुंवर को अपनी ग़लती का एहसास है कि नही पता नही।राजासाहब आपको उनसे बात करके थेरपी के लिए तैय्यर करना होगा और अगर इस बीच आप उन्हे ड्रग्स लेते पाए तो रोके मत वरना कहीं वो फिर वाय्लेंट होकर किसिको या खुद को नुकसान ना पहुँचा ले।"
शाम को मेनका अपने हॉस्पिटल रूम मे अकेली थी।वो उठी और बाथरूम मे गयी,अपना चेहरा धोया और शीशे मे देखा,एक रात मे ही उसकी दुनिया उथल-पुथल हो गयी थी,
"आख़िर क्यू हुआ ऐसा? उसकी अपनी कमज़ोरी की वजह से।
"जवाब उसके अंदर से ही आया,
"नही अब वो ऐसे नही रहेगी।अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले वो खुद लेगी।उसकी मर्ज़ी के बिना अब उस से कोई भी कुछ भी नही करवा सकता।"
उसने कमरे मे लौटकर डॉक्टर लता को बुलाया।
"बोलिए,कुँवारानी।"
"डॉक्टर आंटी,हमे कॉंट्रॅसेप्टिव पिल्स के बारे मे बताएँ।"
"कुँवारानी।"
"जी आंटी,हम नही चाहते कि हमारे पति की ग़लतियों का खामियाज़ा हमे भुगतना पड़े।"
"जी,कुँवारानी।",और वो उसे समझने लगी।
पर मेनक को उन गोलियों की ज़रूरत नही पड़ी क्यूकी इसके बाद सब कुछ बड़ी तेज़ी से हुआ। डॉक्टर साहब ने बॅंगलुर के पास देवनहल्ली मे डॉक्टर पुरन्दारे के रिहेब सेंटर को रेकमेंड किया। राजा यशवीर और राजा अर्जन विश्वा को वाहा अड्मिट करा आए।इस पूरे समय मे मेनका अपनी मा के साथ महल मे थी।पता नही राजासाहब ने विश्वा को जाने के लिए कैसे मनाया।बिज़नेस पे कोई बुरा असर ना पड़े इसके लिए पहले जर्मन पार्ट्नर्स को पूरी बात बताई गयी और फिर एक प्रेस रिलीस दी गयी।राजासाहब ने इस मुसीबत का भी बड़ी समझदारी से सामना किया था।
पर बात पूरी दुनिया के सामने खुलने से पहले उनके दुश्मन को पता चल गयी थी।
जब्बार सोफे पे नंगा बैठा था और उसकी गोद मे मलिका भी।मलिका के हाथ मे बियर की बॉटल थी जिस से उसने एक घूँट भरा और फिर जब्बार को पिलाया।उसके दूसरे हाथ मे जब्बार का लंड था जिसे वो हिला रही थी।थोड़ी ही देर मे लंड पूरा खड़ा हो गया,तब मलिका जब्बार की तरफ पीठ करके उसकी गोद मे उसके लंड पर बैठ गयी।उसने अपनी दाई बाँह उसके गले मे इस तरह डाल दी कि जब्बार का मुँह उसकी दाई चूची से आ लगा।जब्बार ने उसका निपल मुँह मे लेकर काट लिया। मैत्री की पेशकश.
"ऊओ...व्व",मलिका ने बाल पकड़ कर उसका सिर अपने सीने से अलग किया और मुँह मे बची हुई बियर उडेल दी और फिर बॉटल को दूसरे सोफे पर फेक दिया।जब्बार ने बियर अपने हलाक से नीचे उतरी और फिर अपना मुँह मलिका की छाती से चिपका दिया।उसका बाया हाथ उसकी रखैल के बाए उरोज़ को बेरहमी से मसल रहा था तो दाया हाथ उसकी लंड भरी चूत के दाने को।मलिका जोश से पागल होकर लंड पे ज़ोर-2 से कूद रही थी।
"एयेए आहह आअहह अहहह!",वो मज़े से चिल्ला रही थी,"ऊ...ईईई....",ज़ोर की चीख के साथ वो जब्बार के उपर लेट गयी और उसके कान मे अपनी जीभ फिराने लगी।वो झड़ने के बहुत करीब थी।।और 5-6 धक्कों के बाद एक और आह के साथ उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया।जब्बार ने भी नीचे से 3-4 धक्के लगाए और मलिका की चूत को अपने वीर्या से भर दिया।दोनो सोफे की पीठ पे उसी पोज़िशन मे टिक कर अपनी साँस संभालने लगे कि तभी मलिका का सेल बज उठा।मलिका ने वैसे ही टेबल से फ़ोन उठा कर अपने कान से लगाया,"हेलो,बोलिए बत्रा साब।"
थोड़ी देर के बाद उसने फ़ोन रखा और वैसे ही जब्बार की गोद मे बैठे हुए उसे सारी बात बताई।
"क्या?",जब्बार ने उसे सोफे पर एक तरफ धकेला और अपना सिकुदा लंड उसकी चूत मे से निकाल कर खड़ा हो गया।
उसने उस एक नंबर वाले मोबाइल से कल्लन को फ़ोन कर के सारी बात बताई,"सुनो,राजा ज़रूर पता लगाएगा कि उसके बेटे को ये लत लगी कैसे और इसके लिए सबसे पहले उस इंसान को ढूंदेगा जो उसके बेटे तक ड्रग्स पहुँचाता था।इसलिए तुम अब उंड़र-ग्राउंड हो जाओ। फ़िक्र मत करना,तुम्हारे पैसे तुम्हे मिल जाएँगे।",
औरउसने फोन बंद कर के वापस लेटी हुई मलिका की टाँगों के बीच बैठ कर अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ने लगा। मैत्री द्वारा निर्मित.
जब पोलीस हॉस्पिटल मे मेनका का बयान लेने आई तो राजासाहब की बात ना मानते हुए मेनका ने वही फिसल कर गिरने वाली कहानी बताई।राजासाहब के पूच्छने पर उसने कहा कि विश्वा को उसके किए की सज़ा मिल रही है फिर दुनिया को सच बताकर परिवार को और बेइज़्ज़त क्यू करें।
जहाँ इस बात ने राजासाहब के दिल मे मेनका के लिए और इज़्ज़त भर दी वही मेनका भी राजासाहब की ईमानदारी से प्रभावित हुए बिना नही रह सकी।पूरे मामले मे उन्हे सिर्फ़ मेनका की चिंता थी,उनका बेटा गुनेहगर था और उसे बचाने के लिए वो बिल्कुल तैय्यार नही थे-उनका बस चलता तो विश्वा जैल मे होता।उसके पिता और डॉक्टर्स के समझने पर ही वो उसे जैल के बजाय रिहेब मे भेजने को तैय्यार हुए थे।
आज के लिए बस यही तक फिर मिलेंगे एक नए एपिसोड के साथ तब तक के लिए मैत्री की तरफ से......
।। जय भारत ।।
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क्या..........इस कहानी को कोई आगे पढ़ना चाहता भी है ???????????????????
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(04-02-2026, 02:34 PM)maitripatel Wrote: क्या..........इस कहानी को कोई आगे पढ़ना चाहता भी है ???????????????????
जी हां। ओर आप बहुत अच्छी तरह से लिख रहे हो
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(05-02-2026, 01:04 PM)@@004 Wrote: जी हां। ओर आप बहुत अच्छी तरह से लिख रहे हो
शुक्रिया दोस्त
अगर पढनेवाले है तो आगे म्हणत करू वरना "जय श्री कृष्ण" कर के दूसरी कहानी में शामिल हो जाऊ.
शुक्रिया दोस्त आपने मेरी इस कहानी में रस लिया.
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