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Incest खेल ससुर बहु का
#21
"मुझे नामर्द कहती है। ये ले!", थोड़ी देर मे लंड खड़ा हो गया और उसने उसे मलिका की चूत मे पेल दिया और ज़ोरदार धक्के मारने लगा। उसने अपने दाँत उसकी बड़ी, गोल धइले मे गढ़ा दिए। मलिका को और क्या चाहिए था!


मलिका पागलों की तरह हँसने लगी और अपनी टांगे उसकी कमर पे लपेट दी और नीचे से अपनी कमर हिलाने लगी और फिर जब्बार के कंधे पे इतनी ज़ोर से काटा की उसके खून निकल आया।

यहाँ से आगे....................

मेनका अपने मायके से वापस राजपुरा आ गयी थी।सवेरे उठ कर वो नीचे रसोई मे खानसमे से बात करने पहुचि।

"नमस्कार, कुँवरनी जी।"

"नमस्कार, खानसमा साहेब। आज का मेनू डिसाइड कर ले।"

"कुँवरनी जी, नाश्ते का हुक्म तो राजासाहेब ने कल रात आपके वापस आने के पहले ही दे दिया था। आप दिन के बाकी खाने का मेनू के बारे में हमे हुक्म कर दें।"


मेनका ने बाकी मेनू डिसाइड कर के जब नाश्ते का मेनू देखा तो उसे प्लीजेंट सरप्राइज़ हुआ। उसके ससुर ने केवल उसकी पसंद की चीज़ें बनाने का हुक्म दिया था। तभी उसके दिमाग़ मे एक ख़याल आया।

"खानसमा साहब, हमे पिताजी की पसंद-नापसंद के बारे मे दिटेइल से बताएँ  और  साथ-साथ ये भी कि मेडिकल रीज़न्स की वजह से तो उन्हे कोई परहेज़ तो नही करना पड़ता!"


थोड़ी देर बाद मेनू रिवाइज़ किया गया। मैत्री पटेल रचित[b][/b]

नाश्ते के बाद दोनो बाप-बेटे ऑफीस चले गये और मेनका महल का सारा सिस्टम समझने लगी। हर काम के लिए नौकर-नौकरानी थे। उन्हे पता भी था कि उन्हे क्या करना है। शाम तक मेनका ने पूरा सिस्टम समझ लिया और पूरे स्टाफ को कुछ  नयी बातें भी समझा दी।

रात के खाने पे राजासाहब खुशी से उछल पड़े। केवल उनके पसंद की चीज़ें थी टेबल पर।

"खानसमा साहब, आज आप हम पर इतने मेहेरबान कैसे हो गये, भाई?"

"महाराज। ये सब हमने कुँवरनीसाहिबा के कहने पे बनाया है।"

"दुल्हन, आपको हुमारी पसंद के बारे मे कैसे पता चला?"

"जैसे आपको हुमारी पसंद के बारे मे पता चला।", मेनका ने जवाब दिया और दोनो हंस पड़े।


शाम के 7 बजे थे, अंधेरा गहरा रहा था जब राजपुरा से निकल कर वो ग्रे कलर की लेन्द्कृज़ ने 5 मिनट के बाद हाइवे छोड़ दिया ओर एक पतली सड़क पे चलने लगी  और  एक5 मिनट बाद कुछ झोपड़ियों के पास पहुच कर रुक गयी। ड्राइवरसाइड  का शीशा 4 इंच नीचे हुआ और  एक 50 का नोट बाहर निकला जिसे उस आदिवासी ने लपक के पकड़ लिया जो गाड़ी देख कर भागता हुआ आया था। बदले मे उसने एक छोटी बॉटल गाड़ी के अंदर दे दी।

उसके बाद वो ग्रे कलर की, गहरे काले शीशों वाली लेन्द्कृज़र वापस लौटने लगी। हाइवे से थोड़ा पहले कार रुक गयी। अंदर बैठे विश्वजीत ने बॉटल खोल के अपने मुँह से लगा ली। सस्ती शराब जब हलक से नीचे उतरी तो उसे जलन महसूस हुई पर इसी जलन मे उसे सुकून मिलता था।

राजा यशवीर का बेटा, भावी राजा, अखुट दौलत का मलिक जो चाहे, दुनिया की महँगी से महँगी शराब पी सकता था आदिवासियों द्वारा घर मे बनाई हुई 50 रुपये की शराब मे चैन पाता था। वाकाई इंसान भगवान की सबसे अजीबो-ग़रीब ईजाद है।

विश्वा को वो दिन याद आया जब वो अपने बड़े भाई के साथ घूमते हुए यहा आया था और  उन्होने इन आदिवासियों से जंगली खरगोश पकड़ना सीखा था। अपने गुज़रे हुए भाई की याद आते ही उसकी आँखो मे पानी आ गया। मैत्री पटेल की रचना[b][/b]

"क्यू चले गये तुम भाई? क्यू? तुम गये और मैं यहा अकेला रह गया इन झंझटों के बीच मे। तुम जानते थे मुझे ये बिज़नेस और राजाओं की तरह रहना कितना  नापसंद था। फिर भी मुझे छोड़ कर चले गये।", विश्वा बुदबुडाया और एक घूँट और भरी।

"मर्यादा,शान..डिग्निटी! बस यही रह गया है मेरी लाइफ मे। चलो तो ख्याल रहे कि हम किस ख़ानदान के हैं, बात करो तो ध्यान रहे कि हुमारी मर्यादा क्या है...यहा तक की शादी भी करो तो...हुन्ह।"


विश्वा हमेशा सोचता था कि यूधवीर राजा बनेगा और  वो आराम से जैसे मर्ज़ी विदेश मे रह सकता था। शादी मे तो उसे विश्वास ही नही था। उसका मानना था कि जब तक जी करे साथ रहो  और  जिस दिन डिफरेन्सस हो अलग हो जाओ। शादी तो बस मर्द-औरत के ऐसे सिंपल रिश्ते को कॉंप्लिकेट करती थी।

उसने बॉटल ख़तम करके बाहर फेंकी की तभी एक लंबा, गोरा छोटे  बालों वाला क्लीन शेवन इंसान उसके पास पहुचा, "सलाम,साब।"

उस अजनबी को देखते ही विश्वा के हाथ अपने कोट मे रखे पिस्टल पर चले गये।

"सलाम,साब। मेरा नाम विकी है। मुझे लगता है कि मेरे पास आपके काम की चीज़ है।"

"दफ़ा हो जाओ।", कहकर विश्वा गाड़ी गियर मे डालने लगा।

"साहब, बस एक बार मेरा सामान देख लीजिए। कसम से मैं आपका दुश्मन नही बस एक छोटा सा व्यापारी हू जिसे लगता है कि उसके माल के असल कदरदान आप ही है।"


विश्वा ने बिना कुछ बोले गाड़ी रोकी पर बंद नही की और उसका एक हाथ कोट के अंदर ही रहा।

विकी ने अपनी जेब से दो छोटे पॅकेट्स निकाले जिसमे एक मे सफेद पाउडर था और दूसरे मे छोटे-छोटे टॅब्लेट्स।

विश्वा समझ गया कि विकी एक ड्रग डीलर था  और  ये सिकैने  और  एकस्टसी थे।

"मैं ये सब नही लेता।"

"साहब, ना तो मैं पोलीस का आदमी हू ना तो आपको फँसाने की कोशिश कर रहा हूँ। आपके जैसे मैं भी इन लोगों से महुआ लेने आता हूँ। आज आपको देखा तो मेरे अंदर का बिज़नेसमॅन कहने लगा कि इतने मालदार आदमी को 50 रुपये की शराब क्यू चाहिए! इसीलिए ना कि वो कोई नया नशा चाहता है।"

विश्वा ने विकी की आँखों मे घूर के देखा। सच कह रहा था वो। वो नशे मे सुकून ही तो तलाश रहा था। मैत्री पटेल द्वारा रूपांतरित[b][/b]

"
..मैं यही नाथुपुरा का रहनेवाला हूँ। शहर मे मेरी मोबाइल शॉप है। थोड़ी एक्सट्रा इनकम के लिए ये धंधा करता हू। भरोसे का आदमी हू साहब। माल भी असली देता हूँ। एक बार ट्राइ करो साहब।"

"
कीमत क्या है?"

विकी के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी।

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आगे लिख रही हूँ कही जाइएगा नहीं...............
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#22
वो मोबाइल जिसमे बस एक ही नंबर सेव्ड था अचानक बजने लगा। जब्बार चौंक कर उठा, रात के एक2 बज रहे थे। मलिका एकदम नंगी बेसूध उसके बगल मे सोई पड़ी थी। उसके पैर फैले हुए थे और उसकी चूत के पंखुड़िया फैली हुई थी। मैत्री पटेल की रचना[b]।
[/b]

"हम्म", उसने फोन उठाया।

"चिड़िया ने आज दाना चुग लिया।"

"वेरी गुड। उसे जाल मे फँसा कर ही छोड़ना।"

"डोन्ट वरी।"


जब्बार ने फोन काट दिया। कल्लन ने पहली सीधी चढ़ ली थी। अब देखना था आगे क्या होता है।

राजा यशवीर ने महसूस किया कि मेनका के आने के बाद उनका शानदार महल फिर से उन्हे घर लगने लगा था वरना तो पिछले दो सालों से बस वो यहा जैसे बस सोने और खाने के लिए आते थे।

पर अब उन्हे घर पहुँचने का इंतेज़ार रहता था। मेनका से बातें करने के लिए। वो  भी उनसे हर मुद्दे पर बात कर लेती थी। उन्हे वो काफ़ी समझदार और सुलझी हुई लड़की लगती थी। राजासाहब उसे कंपनी के बारे मे भी बताते थे  और  उसके बिज़नेस के बारे मे ओपीनियन्स सुन कर प्रभावित हुए बिना नही रह सके थे। महल की ज़िम्मेदारी तो उसने बखूबी संभाल ली थी।

मेनका को भी अपने ससुर के साथ वक़्त बिताना अच्छा लगता था। उनके पास बताने को इतनी इंट्रेस्टिंग बातें थी और वो कितने नोलेजबल थे। पर सबसे अच्छा लगता था जैसे वो उसके बारे मे केअर करते थे।

धीरे-धीरे करके एक महीना गुज़र गया। जहा राजासाहब  और  मेनका एक  दूसरे से काफ़ी फ्री हो गये थे। वही मेनका महसूस कर रही थी कि उसका पति उससे दूर होता जा रहा है। वैसे तो अपना मन टटोलने पर वो भी पाती थी कि वहा विश्वा के लिए प्यार नही है- होता भी कैसे जिस इंसान ने उसे बस अपनी प्यास बुझाने का ज़रिया समझा हो, उसके लिए प्यार कहा से आता। पर था तो वो उसका पति और उसे हो ना हो मेनका को उसकी फ़िक्र ज़रूर थी।

पिछले एक महीने से वो रात मे देर से आता, पूछने पर काम का बहाना बना देता। मेनका को शक़ हुआ कि कही कोई दूसरी औरत का चक्कर तो नही पर ऐसा नही था कि विश्वा को उसमे दिलचस्पी नही थी। रोज़ रात वो उसे पहले जैसे ही चोद्ता था, पर अब वो और बेचैन और बेसबरा रहने लगा था। उसकी आँखों मे जैसे कोई नशा हर वक़्त दिखता था।

मेनका बिस्तर पर पड़ी हुई यही सब सोच रही थी, बगल मे विश्वा उसे चोदकर अभी-अभी सोया था। उसका ध्यान अपने ससुर की ओर गया, कितना फ़र्क था बाप-बेटे मे। राजासाहब उसकी कितनी चिंता करते थे। अगर विश्वा की जगह उसकी शादी राजासाहब से हुई होती तो? ख़याल आते ही मेनका को अपने बचपने पर हँसी भी आई  और थोड़ी शर्म भी। आख़िर वो उसके ससुर थे।। उसने करवट लेकर विश्वा की तरफ पीठ की और  सोने लगी।

वही राजासाहब विश्वा के बारे मे सोच रहे थे। उन्हे आजकल वो थोड़ा अजीब लगने लगा था। नयी शादी थी पर बहू मे उसे कोई खास दिलचस्पी नही थी। एक  बार उन्होने उसे बहू को घुमाने के लिए शहर ले जाने कहा था पर उसने काम का बहाना कर बात टाल दी। इतनी अच्छी बीवी पाकर तो लोग निहाल हो जाते हैं। उन्होने सोच लिया था कि विश्वा से खुल कर बात करेंगे। मेनका जैसी लड़की किस्मत वालों को मिलती है। उन्हे भी तो ऐसी ही बीवी चाहिए थी जो सिर्फ़ पत्नी ही नही दोस्त  भी हो, उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने का हौसला रखती थी। सरिता देवी एक बहुत अच्छी स्त्री, अच्छी मा थी पर राजासाहब की मित्र बनने की कोशिश उन्होने कभी नही की। इसीलिए तो वो शहर मे उन रखेलो को रखने लगे थे, "कितनी पुरानी बात है।", उन्होने सोचा। बेटे की मौत के बाद तो सेक्स की तरफ उनका ध्यान भी नही गया।

और फिर उन्हे भी ख़याल आया, "अगर मेनका हमारी बीवी होती तो?  और उनके होटो पे मुस्कान आ गयी। "छी छीए! अपनी बहू के बारे मे ऐसे ख़याल! पर गैर होती तो! शायद अब तक मेरे लंड से खेलती होती"! सोचते हुए वो भी सो गये।

अगले दिन वो सुबह होनी थी जो दोनो की ज़िंदगी का रुख़ बदलने का आगाज़ करने वाली थी।

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आज के लिए बस यही तक[b]।[/b]


आपके कोमेंट्स की प्रतीक्षा में ..............


मैत्री पटेल के ओर से .....

[b]। जय भारत [/b]
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#23
कोई कोमेंट ही नहीं अच्छी या बुरी...........
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