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सम्मान से बँधे – सीमाओं से परे प्यार
#1
सम्मान से बँधे – सीमाओं से परे प्यार

Innocent Beauty – Recap-- This is fourth book of this series

प्रेम, वफ़ादारी और त्याग के साए में, मीरा और सरताज सिंह की जिंदगी कुछ इस तरह उलझ चुकी है जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। कभी एक चालाक ड्राइवर, शंकर की साज़िशों में फंसी मीरा को अपनी मुक्ति अपने परिवार में नहीं, बल्कि अपने कॉलेज के दोस्त सरताज की खामोश ताकत में मिलती है। 

एक अफ़सर के तौर पर, सरताज अपने कर्तव्य की सीमाओं से आगे बढ़कर, मीरा और उसकी ननद रिया पर शंकर के नियंत्रण को खत्म करने के लिए सब कुछ दांव पर लगा देता है। लेकिन इस जीत के बाद भी, सरताज मीरा की बेबसी का फ़ायदा उठाने से साफ़ इंकार कर देता है। अपने गुरु की शिक्षाओं पर चलते हुए, वह धर्म और सच्चाई के योद्धा के रूप में खड़ा रहता है।
सरताज के लिए मीरा का प्यार और गहरा हो जाता है, और वह उसमें एक ऐसा रक्षक देखती है जो अपनी इच्छाओं से ऊपर उसकी सुरक्षा को रखता है। वह पहला ऐसा मर्द है जो उसे हासिल कर सकता था, लेकिन उसने हवस के ऊपर सम्मान और मर्यादा को चुना, और अपने निस्वार्थ भाव व सत्यनिष्ठा से अपने प्यार को साबित किया। अपने दिल में मीरा के लिए जज़्बात होने के बावजूद, सरताज अनुशासन के रास्ते पर चलता है, ताकि मीरा किसी एहसान या मजबूरी के साए के बिना आज़ादी से जी सके।

शंकर के अंत को छह महीने बीत चुके हैं। मीरा, जो अब पहले से कहीं ज़्यादा निडर और मजबूत हो चुकी है, उसने सरताज के लिए अपने असीम प्यार को स्वीकार कर लिया है।

दूसरी ओर, सरताज अधूरे प्यार का खामोश दर्द सीने में छिपाए, अपने काम और अपने बनाए उसूलों में ही सुकून तलाशता है। जैसे-जैसे वे अपनी अलग-अलग जिंदगियों में आगे बढ़ते हैं, दोनों अपने उस अनकहे रिश्ते की ओर खिंचे चले आते हैं। यह मोड़ एक नए अध्याय की शुरुआत करता है, जहाँ उनके सम्मान और मोहब्बत की एक बार फिर परीक्षा होगी।

कहानी के इस नए दौर में, मीरा और सरताज का सामना नई चुनौतियों—बाहरी खतरों और अंदरूनी कशमकश—से होगा, जो उन्हें अपने प्यार की हदों और दी जाने वाली कुर्बानियों का अहसास कराएंगी। 

उनकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। आगे आने वाला सफ़र उनके प्यार, फर्ज और उनके अंदर छिपे एक योद्धा की रूह की गहराइयों को टटोलेगा, जहाँ वे सीखेंगे कि कुछ जंग सिर्फ बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि अपने दिल की ख्वाहिशों और फैसलों से भी लड़ी जाती हैं।
Deepak Kapoor
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  1. An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
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#2
Prem, wafadari aur tyaag ke saaye mein, Meera aur Sartaj Singh ki zindagi kuch iss tarah ulajh chuki hai jiski unhone kabhi kalpana bhi nahi ki thi. Kabhi ek chaalak driver, Shankar ki saazishon mein fansi Meera ko apni mukti apne parivaar mein nahi, balki apne college ke dost Sartaj ki khamosh taakat mein milti hai.

Ek officer ke taur par, Sartaj apne kartavya ki seemaon se aage badhkar, Meera aur uski nanad Riya par Shankar ke niyantran ko khatam karne ke liye sab kuch daanv par laga deta hai. Lekin iss jeet ke baad bhi, Sartaj Meera ki bebasi ka fayda uthane se saaf inkaar kar deta hai. Apne Guru ki shikshaon par chalte hue, woh dharm aur sachai ke yoddha ke roop mein khada rehta hai.

Sartaj ke liye Meera ka pyaar aur gehra ho jata hai, aur woh usmein ek aisa rakshak dekhti hai jo apni ichhaon se upar uski suraksha ko rakhta hai. Woh pehla aisa mard hai jo use haasil kar sakta tha, lekin usne hawas ke upar sammaan aur maryada ko chuna, aur apne niswaarth bhaav va satyanishtha se apne pyaar ko saabit kiya. Apne dil mein Meera ke liye jazbaat hone ke baavajood, Sartaj anushasan ke raaste par chalta hai, taaki Meera kisi ehsaan ya majboori ke saaye ke bina aazaadi se jee sake.

Shankar ke ant ko chhah mahine beet chuke hain. Meera, jo ab pehle se kahin zyada nidar aur majboot ho chuki hai, usne Sartaj ke liye apne aseem pyaar ko sweekar kar liya hai.

Doosri aur, Sartaj adhoore pyaar ka khamosh dard seene mein chhipaye, apne kaam aur apne banaye usoolon mein hi sukoon talashta hai. Jaise-jaise woh apni alag-alag zindagiyon mein aage badhte hain, dono apne us ankahe rishte ki aur khinche chale aate hain. Yeh mod ek naye adhyay ki shuruaat karta hai, jahan unke sammaan aur mohabbat ki ek baar phir pareeksha hogi.

Kahaani ke iss naye daur mein, Meera aur Sartaj ka saamna nayi chunautiyon—baahari khatron aur andaruni kashmakash—se hoga, jo unhein apne pyaar ki hadon aur di jaane wali kurbaaniyon ka ehsaas karayengi.

Unki kahaani abhi khatam nahi hui hai. Aage aane wala safar unke pyaar, farz aur unke andar chhipe ek yoddha ki rooh ki gehraiyon ko tatolega, jahan woh sekhenge ki kuch jang sirf baahari dushmanon se nahi, balki apne dil ki khwahishon aur faislon se bhi ladi jaati hain.
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#3
Hi Guys,

I am translating the fourth book in the series into Hindi and Hinglish. This Story is going to be more of a romantic Story.

I hope you'll love it as much as you've loved my other stories.  
Deepak Kapoor
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#4
Very nice start
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#5
रिया की शादी
 
उन उथल-पुथल और संघर्षों के तीन साल बीत चुके हैं, जिन्होंने कभी उनकी जिंदगी को जकड़ रखा था। रिया, जो अब एक बेहद खूबसूरत युवती के रूप में निखर चुकी है, तुषार नाम के एक आकर्षक नवयुवक से शादी कर रही है, जिसका कद 5 फीट 9 इंच है। शादी की तैयारियाँ जोरों पर हैं, और घर का हर कोना चहल-पहल, हँसी-खुशी और नई शुरुआत के उत्साह से गूँज रहा है।
 
मीरा, जो पहले से कहीं अधिक निखरी, कामुक और बेहद खूबसूरत लग रही थी, उसने शादी की हर छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी खुद संभाल रखी थी। आज उसने लाल रंग की झीनी शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी, जिसके साथ सफ़ेद रंग का स्लीवलेस ब्लाउज़ उसके सुडौल बदन पर कसकर बैठा हुआ था।
 
साड़ी के पल्लू को उसने अपनी पतली कमर में इस तरह ठूँस रखा था कि उसकी गोरी, चिकनी कमर और नाभि का कातिलाना हिस्सा पूरी तरह उघड़ा हुआ नज़र आ रहा था। वहाँ मौजूद मर्दों की निगाहें अनजाने में ही उसके उस गोरे, नंगे पेट और पतली कमर की सुराहीदार लचक पर बार-बार जाकर टिक जाती थीं। इस ख़ूबसूरती और देह की मादकता से बेखबर, मीरा सजावट चुनने से लेकर मेहमानों की ख़ातिरदारी सुनिश्चित करने तक, खुद को रिया के इस खास दिन की खुशियों में पूरी तरह डुबो चुकी थी।
 
इन तैयारियों के बीच, मीरा ने अपने तमाम अज़ीज़ों और करीबियों को शादी के न्योते भेजे थे—उन सभी को, जिन्होंने कभी न कभी उनकी ज़िंदगी की राहों में अपना निशान छोड़ा था।
और उन्हीं ख़ास लिफ़ाफ़ों में से एक लिफ़ाफ़ा सरताज सिंह के नाम भी गया था। सरताज की मौजूदगी उसके दिलों में एक अलग ही मुक़ाम रखती थी—फ़क़त इसलिए नहीं कि उन्होंने कभी रिया की जान बचाकर हमेशा के लिए उस घर के रक्षक का दर्जा हासिल कर लिया था, बल्कि इसलिए भी कि मीरा की हर साँस, उसकी देह की हर हरक़त में सरताज का एक अनकहा, गहरा अहसास बसा हुआ था।
 
निमंत्रण भेजे हफ़्तों बीत चुके थे, मगर सरताज की तरफ़ से आने या न आने की कोई ख़बर नहीं आई थी।
 
मीरा लाल शिफॉन की साड़ी का पल्लू अपनी उँगलियों में लपेटते हुए, एक गहरी और बेचैन साँस भरकर अपने दिल से फुसफुसाई, "तुम जानते हो न सरताज... तुम्हारी यह ख़ामोशी मुझे अंदर तक तोड़ देती है। अपने उन उसूलों, अपनी उन मर्यादाओं की दीवारों के पीछे कब तक छिपोगे तुम?"
 
वह जानती थी कि अपने फ़र्ज़ और अनुशासन से बँधा उसका सीना शायद उसे इस महफ़िल में आने से रोके। मगर अपने झीने लिबास के नीचे धड़कते हुए अपने गरम-गरम जिस्म की हर थरथराहट में, वह सिर्फ़ उसी की मौजूदगी की प्यासी थी।
 
आज सुबह जब वह आईने के सामने खड़ी होकर ख़ुद को देख रही थी, तब अपनी गोरी उघड़ी कमर पर मखमली उँगलियाँ फेरते हुए उसने अपने रसीले होंठों को धीरे से भींचा। उसकी साँसों में एक अजीब सी तपन थी। उसने आहिस्ता से बड़बड़ाते हुए कहा, "चाहे तुम्हारे उसूल तुमको कितना भी रोकें... पर मैं जानती हूँ, तुम्हारा दिल भी इस तड़प से अछूता नहीं है। क्या सिर्फ़ एक बार... बस एक बार मुझे इस रूप में देखने नहीं आओगे तुम? तीन साल हो गए हैं तुम्हें देखे..."
 
अपने काम निपटाते हुए, मीरा का ध्यान बार-बार सरताज की ओर भटक जाता है। वह जानती है कि उसकी ज़िंदगी में उनका स्थान अतुलनीय है, जो सम्मान और ख़ामोश मोहब्बत के सबसे ऊँचे पायदान पर है।
 
जबकि वह शादी के हर इंतज़ाम पर नज़र रखे हुए है, उसके दिल का एक हिस्सा खामोशी से यह दुआ कर रहा है कि वे बस एक बार चौखट पार करके अंदर आ जाएँ—रिया की खुशी में शामिल होने के लिए, और यह देखने के लिए कि मीरा अब कितनी बदल चुकी है।
 
तभी उसका पति आरव उसकी तरफ़ आता है और मीरा की नंगी, नाज़ुक कमर पर अपना हाथ डालते हुए धीरे से उसके कान में फुसफुसाता है, "आज बहुत प्यारी लग रही हो, मीरा..."
 
मीरा ने शोख़ी से अपनी पलकें मटकाते हुए कहा, "क्या मतलब है तुम्हारा? क्या मैं वैसे प्यारी नहीं लगती?"
 
आरव ने हँसते हुए उसे और क़रीब खींचा और कहा, "मुझे अपने शब्दजाल में मत फँसाओ... मैं तो पहली नज़र में ही तुम्हारे प्यार में घायल हो गया था।"
 
आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, "थैंक्स मीरा..."
 
मीरा ने हैरान होकर पूछा, "किसलिए?"
 
आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "इस पूरी शादी की ज़िम्मेदारी को इतनी ख़ूबसूरती से संभालने के लिए।"
 
मीरा ने अपना नाज़ुक हाथ उसके सीने पर रखा और धीरे से कहा, "अपनों को थैंक्स नहीं कहते आरव... वैसे भी रिया मेरी ननद कम और बहन ज़्यादा है।"
 
फिर उसकी निगाहें सामने खड़ी रिया की तरफ़ घूम गईं, जो गुलाबी शादी के जोड़े में परी जैसी सज-धजकर खड़ी थी। मीरा के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई और उसने फुसफुसाते हुए कहा, "देखो तो... कितनी प्यारी लग रही है न!"
 
इस चकाचौंध और चहल-पहल से भरे माहौल के बीच, अचानक एक तीखी आवाज़ ने जश्न की हर गूँज को चीर दिया— सिक्युरिटी के सायरन की सनसनाती घंटी। जैसे-जैसे वह आवाज़ नज़दीक आती गई, महफ़िल में मौजूद हर शख्स के कदम थम गए। भीड़ के चेहरे पर उत्सुकता, हैरानी और एक अनजाने खौफ़ की लहर दौड़ गई।
 
तभी घर के मुहाने पर, चमकती हुई लाल-नीली बत्तियों वाली तीन चमचमाती सिक्युरिटी गाड़ियाँ आकर रुकीं।
 
मीरा जहाँ खड़ी थी, वहीं की वहीं ठिठक कर रह गई। उसकी साँसें अटक गईं और सीने के भीतर दिल बेकाबू होकर धड़कने लगा।
 
क्या... क्या यह सचमुच हो सकता है? क्या सरताज आ गए हैं?
 
उसका मन अब भी इस बात पर यक़ीन करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, लेकिन जिस्म की रग-रग में दौड़ी एक तीखी, अनजानी उतावली ने उसके सारे सब्र के बाँध तोड़ दिए। उसका उघड़ा हुआ पेट और नाज़ुक कमर हर गहरी साँस के साथ तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगी, मानो उसका पूरा वजूद सिर्फ़ उसी एक इंसान के दीदार की तड़प में पिघल रहा हो।
 
आरव के मुँह से अचानक निकला, "कौन हो सकता है... शायद पापा के कोई क़रीबी मंत्री या बड़े अफ़सर होंगे। तुम रुको, मैं ख़ुद जा कर चेक करता हूँ।"
 
यह कहते हुए आरव तेज़ क़दमों से पोर्टिको की तरफ़ बढ़ गया, जबकि मीरा वहीं बेसुध सी खड़ी रही। उसका हाथ अनायास ही अपनी साड़ी के लाल शिफॉन के आँचल को ज़ोर से भींच चुका था।
 
उसकी बेकाबू धड़कनें और उतावली साँसें साफ़ चुगली कर रही थीं कि उसके दिल को अच्छी तरह मालूम था कि गाड़ियों के दरवाज़े खुलते ही कौन बाहर आने वाला है।
 
आगे और पीछे की गाड़ियों के दरवाज़े खुले, और उनमें से चार वर्दीवाले सिक्युरिटीकर्मी बाहर निकलकर बीच वाली कार की तरफ़ बढ़े।
 
उनमें से एक ने आगे बढ़कर बीच वाली गाड़ी का दरवाज़ा खोला, और फिर मीरा की नज़रें सीधे उसी इंसान पर जाकर टिक गईं। सरताज सिंह—उसकी नज़रों में दुनिया के सबसे सम्मानीय इंसान—गाड़ी से बाहर निकले। ६ फ़ीट २ इंच लंबे, वे उतने ही प्रभावशाली, गंभीर और शांत दिख रहे थे, जितने वे हमेशा हुआ करते थे।
 
अपनी उस रोबीली वर्दी में उनके चेहरे से अदम्य ताकत, अनुशासन और गरिमा का अहसास साफ़ झलक रहा था। मगर इस बार माहौल में कुछ अलग था, सरताज ने अपने मज़बूत हाथ में एक नन्ही सी बच्ची की नाज़ुक उँगलियाँ थाम रखी थीं, जिसकी उम्र 7 या 8 साल से ज़्यादा नहीं लग रही थी। सामने दुल्हन की तरह सजे घर के भव्य नज़ारे और जगमगाती रोशनियों को देखकर, उस बच्ची की मासूम आँखें बेइंतहा उत्सुकता और घबराहट से चौड़ी हो गई थीं।
 
यह नज़ारा देखते ही मीरा की धड़कनें एक पल के लिए मानो थम सी गईं। भावनाओं का एक बेकाबू बवंडर उसके सीने में उमड़ पड़ा—राहत, बेइंतहा ख़ुशी, और साथ ही उलझन की एक गहरी लकीर।
 
वे अपने साथ इस बच्ची को क्यों लाए हैं? यह कौन है? सरताज के साथ इसका क्या रिश्ता हो सकता है... जहाँ तक मैं जानती हूँ, सरताज ने तो अभी तक शादी ही नहीं की है?
 
सवालों का बवंडर उसके ज़हन में घुमड़ ही रहा था कि तभी सरताज ने चारों ओर निगाहें दौड़ाईं। उनकी रोबीली नज़रें आखिरकार लाल शिफॉन की साड़ी में सजी मीरा पर जाकर ठहर गईं।
 
उस एक पल के लिए मानो आस-पास का सारा शोर, जमावड़ा और पूरी दुनिया वहीं थम गई। सरताज की उन संजीदा आँखों में एक अनजानी नरमी उतर आई—दोनों के बीच बरसते उस ख़ामोश प्यार का एक गहरा, अनकहा इकरार।
 
सरताज जैसे ही आगे बढ़े, वह नन्ही बच्ची उनके पहलू से चिपकी हुई साथ-साथ चलने लगी। उनकी मर्दाना शख्सियत और वर्दी के रोब को देखकर भीड़ ने ख़ुद-ब-ख़ुद सिमटकर उन्हें रास्ता दे दिया।
 
मीरा के कदम अपने आप उनकी ओर उठने लगे। उसने अपने अंदर एक अजीब सी गर्मजोशी और बेकरारी महसूस की; उसका दिल उम्मीद, प्यार और असमंजस के मिले-जुले अहसास से ज़ोरों से धड़क रहा था।
 
सरताज बेहद शालीनता और ग्रेस के साथ मीरा के परिवार की ओर बढ़े। दरवाज़े पर मीरा के ससुर जी खड़े थे, और तब तक आरव भी अपने पिता के पास पहुँच चुका था। मीरा उनके पीछे थोड़ी दूरी पर खड़ी थी। उसका दिल अब भी सीने में बेकाबू होकर धड़क रहा था, और उसकी नज़रें सरताज के हर कदम को नाप रही थीं।
 
सरताज को उस नन्ही बच्ची के साथ इस तरह आते देखना मीरा के भीतर भावनाओं का एक ऐसा बवंडर उठा रहा था जिसे वह कोई नाम नहीं दे पा रही थी। उसने सरताज के आने की कल्पना न जाने कितनी बार की थी, लेकिन कभी इस रूप में नहीं—एक बच्ची का हाथ थामे हुए, एक ऐसा मोड़ जिसकी उसने दूर-दूर तक उम्मीद नहीं की थी।
 
जब सरताज उस परिवार के पास पहुँचे, तो उन्होंने बेहद विनम्र और सम्मानजनक अंदाज़ में अपना सिर झुकाया। अपने उसी शांत और गंभीर लहजे में उन्होंने बात शुरू की, "गुड इवनिंग... मैं सरताज सिंह, मीरा का सहपाठी और पुराना दोस्त।" उनके शब्द बेहद सादे थे। उसमें उनके बड़े पद या वर्दी का कोई दंभ या दिखावा नहीं था।
 
मीरा के ससुर जी ने बड़ी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया; आरव ने भी आगे बढ़कर उनका इस्तकबाल किया और अपना परिचय देते हुए कहा, "मैं आरव... मीरा का पति।"
 
सरताज ने बेहद गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया और कहा, "जी, मैं जानता हूँ।"
 
सरताज की रोबीली शख्सियत, उनके चेहरे के तेज़ और वर्दी के रोब को देखकर हर कोई उनकी ओर आकर्षित था और उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक था।
 
फिर, अपने होंठों पर एक हल्की सी सादगी भरी मुस्कान लाते हुए, उन्होंने अपने साथ खड़ी उस नन्ही बच्ची का परिचय कराया। "यह मेरी बेटी है, ज्योति," उन्होंने बड़े प्यार से बच्ची के कंधे को सहलाते हुए कहा। ज्योति ने ऊपर उठाकर उन सभी को देखा, उसकी चमकती हुई मासूम आँखें उस भीड़ और अजनबी चेहरों को थोड़ी शर्म और बेहद उत्सुकता से निहार रही थीं।
 
मीरा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई जब यह सच सामने आया कि ज्योति सरताज की बेटी है। इस अप्रत्याशित मोड़ ने सरताज के आने के बाद से उसकी सारी भावनाओं को झकझोर कर रख दिया था। उसकी निगाहें अब सरताज और उसके परिवार के बीच हो रही हर बात को और ज़्यादा गहराई से नापने लगी थीं।
 
आख़िरकार, सरताज मीरा के ठीक सामने आ खड़े हुए। दोनों के बीच की फ़ज़ा हज़ारों अनकहे अलफ़ाज़ों, गुज़रे ज़माने की सुलगती यादों और हवा में तैरते अनसुलझे सवालों से भारी हो चुकी थी। एक पल के लिए, मीरा की कजरारी आँखों ने सरताज की गहरी निगाहों में झाँका—उस मासूम बच्ची की हक़ीक़त को तलाशने के लिए जो अब भी सरताज के पहलू से चिपकी हुई थी।
 
सरताज एक कदम आगे बढ़े और मीरा को अपनी मर्मस्पर्शी, दोस्ताना आगोश में भर लिया। वह आलिंगन बेहद सादा और छोटा सा था, मगर उसमें एक ऐसी गहरी आत्मीयता और गर्माहट थी जिसे सिर्फ़ वे दोनों ही महसूस कर सकते थे।
 
मीरा की लाल शिफॉन की साड़ी के पार सरताज के फौलादी सीने की तपन साफ़ महसूस हो रही थी। मीरा को पीछे हटाते हुए, सरताज थोड़ा सा झुके और उसके कानों के पास अपने होंठ लाकर धीरे से फुसफुसाए, "ज्योति के बारे में तुम्हें बाद में सब बताऊंगा..." उनकी आवाज़ शांत थी—मीरा के चेहरे पर उतरी हैरानी का एक-एक जवाब देने का वादा।
 
सीधे खड़े होकर, सरताज ने नन्ही बच्ची के नाज़ुक कंधे पर हाथ रखकर उसे हल्के से आगे बढ़ाया।
 
"ज्योति," उन्होंने एक ख़ामोश फ़ख़्र के साथ कहा, "मैं तुम्हें एक बहुत ही ख़ास इंसान से मिलाना चाहता हूँ। यह मीरा है... मेरी सबसे अज़ीज़ दोस्त।"
 
सरताज ने मीरा की ओर ऐसी नरमी से देखा कि मीरा की धड़कनें बेकाबू हो गईं, और उसके जिस्म में एक मीठी सी सिहरन दौड़ गई।
 
ज्योति ने अपनी बड़ी-बड़ी, उत्सुक आँखों से मीरा को देखा, जिसके चेहरे पर हल्की सी हया और झिझक थी। मीरा अपनी लाल साड़ी की सिलवटों को समेटते हुए नीचे झुकी। उसकी निगाहें सरताज के रौबदार चेहरे से हटकर उस मासूम बच्ची पर आ टिकीं।
 
उसने एक बेहद दिलकश और गरमजोशी भरी मुस्कान के साथ कहा, "हेलो ज्योति... तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।"
 
मीरा ने एक पल के लिए सरताज की तरफ़ देखा—उसकी आँखों में सवालों का समंदर था, मगर साथ ही एक गहरा इकरार भी। वह जानती थी कि ज्योति की मौजूदगी के पीछे चाहे जो भी कहानी हो, वक्त आने पर वह सरताज के मुख से ही उसे सुनेगी।
 
मीरा ने ज्योति की नन्ही, कोमल उँगलियों को अपनी गोरी हथेली में थाम लिया। उस मासूम सी छुअन को महसूस करते हुए, वह सरताज और उसकी बेटी को मेहमानों की भीड़ के बीच से आगे ले जाने लगी।
 
दिल में उठे तूफ़ान के बावजूद, मीरा के हर कदम में एक ग़ज़ब की नज़ाकत थी—वह पूरी शिद्दत से उन दोनों को अपने परिवार की इन खुशियों में शामिल करने के लिए तैयार थी।
 
सबसे पहले मीरा ने सरताज और उनकी बेटी को अपने पति आरव से दुबारा औपचारिक रूप से मिलवाया। आरव ने एक बार फिर बेहद सम्मान और गर्माहट के साथ सरताज से हाथ मिलाया।
 
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आरव... सरताज कॉलेज में मेरे क्लासमेट हुआ करते थे और बाद में इन्होंने IPS जॉइन कर लिया। कॉलेज के दिनों में यह बहुत रिज़र्व्ड और कम बोलने वाले इंसान हुआ करते थे।"
 
मगर मीरा के दिल के भीतर एक अलग ही कसक उठी। उसने मन ही मन सोचा, 'इतने रिज़र्व्ड... कि पूरे कॉलेज में कभी यह हिम्मत ही नहीं जुटा पाए कि मुझे बता सकें कि यह मुझसे कितना प्यार करते हैं...'
 
आरव ने उत्सुकता से पूछा, "तो फिर कॉलेज के बाद आप दोनों की मुलाकात कब हुई?"
 
सरताज ने बेहद संजीदगी और समझदारी से बात संभालते हुए कहा, "आई थिंक, करीब तीन साल पहले हम किसी कॉमन फ्रेंड की पार्टी में मिले थे।"
 
मीरा ने सिर हिलाया, "हाँ आरव, वहीं हमारी दोबारा बात शुरू हुई थी।"
 
सरताज ने आगे जोड़ा, "लेकिन उसके बाद मेरी सर्विस की व्यस्तताओं की वजह से हमारा संपर्क नहीं हो सका। फिर जब मुझे शादी का कार्ड मिला, तो लगा कि मिलने का इससे बेहतर मौका और कोई नहीं हो सकता।"
 
सरताज के इन संभले हुए शब्दों को सुनकर मीरा का दिल भीतर तक सिहर उठा। उसकी लाल शिफॉन की साड़ी के नीचे छिपा सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगा।
 
वह मन ही मन आरव की ओर देखते हुए सोचने लगी:
'आरव... तुम्हें कैसे समझाऊँ कि यह इंसान मेरे और तुम्हारे परिवार के लिए क्या मायने रखता है? जब तुम्हारी पत्नी और तुम्हारी बहन को वह दरिंदा शंकर ब्लैकमेल कर रहा था... जब हमारी ज़िंदगी नीलाम होने की कगार पर थी...'
 
'तब अपनी इज़्ज़त और परिवार को बचाने का कोई रास्ता न पाकर मैंने आखिरी उम्मीद की तरह इन्हें ही पुकारा था। और इन्होंने क्या किया? अपनी जान, अपना करियर, अपना सब कुछ दांव पर लगाकर तुम्हारी बीवी और बहन को उस नरक की आग से सही-सलामत बाहर निकाला...'
 
'और बदले में? कभी एक लफ़्ज़ या एक अहसान तक का दावा नहीं किया...यह वह इंसान है, जिसे उस अहसान के बदले मैं अपना पूरा शरीर सौंपने के लिए राज़ी थी...'
 
'लेकिन इन्होंने साफ़ इंकार कर दिया... जबकि मैं अच्छी तरह जानती थी कि यह मुझे कॉलेज के दिनों से बेइंतहा चाहते थे।'
 
तभी आरव का फोन बज उठा। शोरगुल से बचते हुए उसने कहा, "एक्सक्यूज मी," और कॉल अटेंड करने के लिए बाहर की तरफ बढ़ गया।
 
जाते-जाते उसने मीरा की तरफ देखकर प्यार से मुस्कुराते हुए कहा, "मीरा, अपने दोस्त का ख्याल रखना... मैं बस पांच मिनट में आता हूँ।"
 
मीरा ने जब आरव के मुँह से 'दोस्त' शब्द सुना, तो उसके मन के भीतर से एक तड़पती हुई आवाज़ निकली:
 
'दोस्त? तुम्हें कैसे बताऊँ आरव कि सरताज का मेरी ज़िंदगी में क्या दर्जा है...'
 
'बस उसी दिन के बाद इस इंसान का दर्जा मेरे दिल में सबसे ऊपर हो गया... शायद तुमसे भी ऊपर, आरव! क्योंकि तुम मेरे लिए जो कुछ भी करोगे, वह सिर्फ़ इसलिए करोगे क्योंकि मैं तुम्हारी पत्नी हूँ... यह तुम्हारा फर्ज़ है।'
 
'लेकिन सरताज? रिश्ता न होते हुए भी उन्होंने मेरे लिए जो किया, उसने मुझे हमेशा-हमेशा के लिए उनका बना दिया...'
 
जैसे ही आरव दूर गया, मीरा और सरताज के बीच का फासला अचानक और गहरा, और ज़्यादा सुलगता हुआ महसूस होने लगा।
 
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आइए सरताज, मैं आपको परिवार के बाकी लोगों से मिलवाती हूँ।"
 
सरताज बेहद शांत, शालीन और संजीदा अंदाज़ में मीरा के साथ आगे बढ़े। जैसे-जैसे वे एक-एक करके घर के बड़ों और रिश्तेदारों से मिल रहे थे, नन्ही ज्योति मीरा के पास ही रही।
 
माहौल की गर्माहट और अपनों के प्यार को देखकर वह धीरे-धीरे घुलने-मिलने लगी थी और उत्सुकता से इस ज़श्न का नज़ाकत भरा मज़ा ले रही थी। हर किसी ने सरताज और ज्योति का स्वागत बेहद प्यार और सम्मान के साथ किया, जिससे वे दोनों पल भर में ही उस पारिवारिक उत्सव का अहम हिस्सा बन गए।
 
आख़िरकार, मीरा उन्हें लेकर सीधे रिया की तरफ़ बढ़ी, जो महफ़िल के बीचों-बीच खड़ी आँखों में उत्सुकता और बेकरारी लिए इंतज़ार कर रही थी। रिया ने सरताज के बारे में कहानियाँ सुन रखी थीं—वह बहादुर इंसान, जिसने उसकी ज़िंदगी के सबसे खौफ़नाक और काले दौर में ढाल बनकर उसकी आबरू और जान बचाई थी। आज उन्हें अपने सामने खड़ा देखना उसके लिए बेहद भावुक और किसी ख़्वाब जैसा महसूस हो रहा था।
 
मीरा ने एक ख़ास नज़ाकत, फ़ख़्र और अपनायत भरे लहजे में कहा, "रिया... ये सरताज हैं। जिनके बारे में मैंने तुम्हें बताया था।"
 
रिया ने एक गहरी साँस ली और सरताज के रौबदार चेहरे की ओर देखा। उसकी आँखें आदर और बेइंतहा एहसानमंदी से छलक आई थीं। उसने बेहद धीमे और काँपते स्वर में कहा, "मैंने आपके बारे में बहुत कुछ सुना है... आपने हमारे लिए जो कुछ भी किया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।"
 
सरताज ने अपनी संजीदा मुस्कान के साथ धीरे से अपना सिर हिलाया।
 
वे एक कदम आगे आए और बेहद भारी आवाज़ में बोले, "उन दिनों को याद करने की कोई ज़रूरत नहीं है, रिया। वह दौर बहुत पीछे छूट चुका है। अब तुम्हें सिर्फ़ आगे देखना है और अपनी नई ज़िंदगी को गले लगाना है... बहन।"
 
रिया की आँखों से आंसुओं की दो नम बूंदे छलककर उसकी गुलाबी गालों पर ढलक गईं। उसने भारी दिल से अपना सिर झुका लिया।
 
वह मन ही मन सोच रही थी, 'सरताज जी को हमारी हक़ीक़त पता है... वे जानते हैं कि हम किस भयानक दलदल में फँसे थे, हमारी आबरू पर क्या गुज़री थी... फिर भी वे मुझे इतना पवित्र, इतना बड़ा 'बहन' का दर्जा दे रहे हैं! अगर आज मेरे अपने भाई को हमारा अतीत पता चल जाता, तो शायद वह अपने परिवार की तथाकथित इज़्ज़त बचाने के लिए हमें गोली ही मार देता...'
 
रिया ने अपनी रोती हुई, डबडबाई आँखों से सरताज की तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे। उसने बेहद भावुक होकर कहा, "आज मैं शादी करने जा रही हूँ सरताज जी... और यह सब सिर्फ़ और सिर्फ़ आपकी वजह से मुमकिन हो पाया है।"
 
रिया का दिल कर रहा था कि वह सब कुछ भूलकर, भरी महफ़िल के सामने सरताज के चौड़े सीने से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े।
 
शायद सरताज को उसकी आँखों की तड़प और दिल के इस उबाल का इल्म पल भर में हो गया था। माहौल को ज़्यादा भावुक होने से बचाते हुए, सरताज ने तुरंत बात का रुख पलटा।
 
उन्होंने मीरा की तरफ़ देखते हुए एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "मीरा, ज़रा अपनी ननद का चेहरा साफ़ करो... और इसे समझाओ कि शादी के दिन रोना बिल्कुल मना है, वरना सारा मेकअप बिगड़ जाएगा और दुल्हन का निखार ख़राब हो जाएगा!"
 
फिर जल्दी से रिया के सर पर अपना हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, और ज्योति का नन्हा हाथ थामकर दूसरी तरफ़ बढ़ गए।
 
मीरा ने तुरंत आगे बढ़कर रोती हुई रिया को संभाला, अपने लाल शिफॉन के पल्लू से उसके आँसू पोंछे और बड़े लाड़ से कहा, "मैं उन्हें तुम्हारे पास यहाँ रुलाने के लिए नहीं लाई थी, रिया... और देख रही हो न तुम? जब भी कोई उनका शुक्रिया अदा करना चाहता है, या उनके आगे अपना दिल खोलना चाहता है, तो वे कैसे बड़ी खामोशी से दूर चले जाते हैं... बिना कोई अहसान जताए।"
 
मीरा वहीं खड़ी सरताज को दूर जाते हुए देख रही थी। उसकी लाल शिफॉन की साड़ी के पार तेज़ी से धड़कता हुआ उसका सीना और उघड़ी कमर पर आती-जाती उतावली साँसें साफ़ गवाही दे रही थीं कि वह सरताज के इस निष्काम व्यक्तित्व को देखकर एक बार फिर उनकी मोहब्बत में और गहरी उतरने लगी थी।
 
वह मन ही मन सोच रही थी, 'क्या इंसान हैं यह... लोग छोटी सी मदद करके सौ बार अहसान जताते हैं, और एक यह हैं जो अपनी जान पर खेलकर भी एक बार शुक्रिया तक सुनना नहीं चाहते...'
Deepak Kapoor
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#6
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#7
Riya ki shadi

Un uthal-puthal aur sangharshon ke teen saal beet chuke hain, jinone kabhi unki zindagi ko jakad rakha tha. Riya, jo ab ek behad khoobsurat yuvati ke roop mein nikhar chuki hai, Tushar naam ke ek aakarsak nav-yuvak se shadi kar rahi hai, jiska kad 5 feet 9 inch hai. Shadi ki taiyariyan joron par hain, aur ghar ka har kona chahal-pahal, hansi-khushi aur nai shuruaat ke utsah se goonj raha hai.

Meera, jo pehle se kahin adhik nikhari, kaamuk aur behad khoobsurat lag rahi thi, usne shadi ki har chhoti-badi zimmedari khud sambhal rakhi thi. Aaj usne laal rang ki jheeni chiffon ki saree pehan rakhi thi, jiske saath safed rang ka sleeveless blouse uske sudaul badan par kaskar baitha hua tha.

Saree ke pallu ko usne apni patli kamar mein is tarah thoons rakha tha ki uski gori, chikni kamar aur naabhi ka kaatilaana hissa poori tarah ughda hua nazar aa raha tha. Wahan maujood mardon ki nigahen anjaane mein hi uske us gore, nange pet aur patli kamar ki surahidhaar lachak par baar-baar jaakar tik jaati thi. Is khoobsurati aur deh ki maadakta se bekhabar, Meera sajaawat chunne se lekar mehmaanon ki khaatirdaari sunishchit karne tak, khud ko Riya ki is khaas din ki khushiyon mein poori tarah dooba chuki thi.

In taiyariyon ke beech, Meera ne apne tamaam azeezon aur kareebiyon ko shadi ke nyote bheje the—un sabhi ko, jinone kabhi na kabhi unki zindagi ki raahon mein apna nishaan chhoda tha. Aur unhi khaas lifafon mein se ek lifafa Sartaj Singh ke naam bhi gaya tha. Sartaj ki maujoodgi uske dilon mein ek alag hi muqaam rakhti thi—faqat isliye nahi ki unhone kabhi Riya ki jaan bachakar hamesha ke liye us ghar ke rakshak ka darja haasil kar liya tha, balki isliye bhi ki Meera ki har saans, uski deh ki har harakat mein Sartaj ka ek anakha, gahra ahsaas basa hua tha.

Nimantran bheje hafton beet chuke the, magar Sartaj ki taraf se aane ya na aane ki koi khabar nahi aai thi.

Meera laal chiffon ki saree ka pallu apni ungaliyon mein lapet-te hue, ek gahri aur bechain saans bharkar apne dil se fusfusaai, "Tum jaante ho na Sartaj... tumhari yeh khamoshi mujhe andar tak tod deti hai. Apne un usoolon, apni un maryaadaon ki deewaron ke peeche kab tak chhipoge tum?"

Wah jaanti thi ki apne farz aur anushaasan se bandha uska seena shayad use is mahfil mein aane se roke. Magar apne jheene libaas ke neeche dhadakte hue apne garam-garam jism ki har thartharaahat mein, wah sirf usi ki maujoodgi ki pyaasi thi.

Aaj subah jab wah aaine ke saamne khadi hokar khud ko dekh rahi thi, tab apni gori ughdi kamar par makhmali ungaliyan ferte hue usne apne raseele hontohn ko dheere se bheincha. Uski saanson mein ek ajeeb si tapan thi. Usne aahista se badbadaate hue kaha, "Chaahe tumhare usool tumko kitna bhi roken... par main jaanti hoon, tumhara dil bhi is tadap se achhoota nahi hai. Kya sirf ek baar... bas ek baar mujhe is roop mein dekhne nahi aaoge tum? Teen saal ho gaye hain tumhe dekhe..."

Apne kaam nipataate hue, Meera ka dhyaan baar-baar Sartaj ki aur bhatak jaata hai. Wah jaanti hai ki uski zindagi mein unka sthaan atulneeya hai, jo sammaan aur khamosh mohabbat ke sabse oonche paidaan par hai.

Jabki wah shadi ke har intazaam par nazar rakhe hue hai, uske dil ka ek hissa khamoshi se yeh dua kar raha hai ki ve bas ek baar chaukhat paar karke andar aa jaen—Riya ki khushi mein shamil hone ke liye, aur yeh dekhne ke liye ki Meera ab kitni badal chuki hai.

Tabhi uska pati Aarav uski taraf aata hai aur Meera ki nangi, naazuk kamar par apna hath daalte hue dheere se uske kaan mein fusfusaata hai, "Aaj bahut pyaari lag rahi ho, Meera..."

Meera ne shokhi se apni palken matkaate hue kaha, "Kya matlab hai tumhara? Kya main waise pyaari nahi lagti?"

Aarav ne hanste hue use aur kareeb kheencha aur kaha, "Mujhe apne shabdjaal mein mat fansao... main toh pehli nazar mein hi tumhare pyaar mein ghaayal ho gaya tha."

Aarav ne muskuraate hue kaha, "Thanks Meera..."

Meera ne hairaan hokar poochha, "Kisliye?"

Aarav ne uski aankhon mein dekhte hue kaha, "Is poori shadi ki zimmedari ko itni khoobsurati se sambhalne ke liye."

Meera ne apna naazuk hath uske seene par rakha aur dheere se kaha, "Apnon ko thanks nahi kehte Aarav... waise bhi Riya meri nanad kam aur behen zyada hai."

Phir uski nigahen saamne khadi Riya ki taraf ghoom gayi, jo gulaabi shadi ke jode mein pari jaisi saj-dhajkar khadi thi. Meera ke chehre par ek meethi si muskaan aa gayi aur usne fusfusaate hue kaha, "Dekho toh... kitni pyaari lag rahi hai na!"

Is chakachondh aur chahal-pahal se bhare mahaul ke beech, achanak ek teekhi aawaaz ne jashn ki har goonj ko cheer diya—security officer ke siren ki sanasnaati ghanti. Jaise-jaise wah aawaaz nazdeek aati gayi, mahfil mein maujood har shakhs ke kadam tham gaye. Bheed ke chehre par utsukta, hairani aur ek anjaane khauf ki lahar daud gayi.

Tabhi ghar ke muhaane par, chamakti hui laal-neeli battiyon waali teen chamchamaati security officer gaadiyaan aakar ruki.

Meera jahan khadi thi, wahi ki wahi thithak kar reh gayi. Uski saansen atak gayi aur seene ke bheetar dil bekaabu hokar dhadakne laga.

Kya... kya yeh sachmuch ho sakta hai? Kya Sartaj aa gaye hain?

Uska man ab bhi is baat par yaqeen karne ki himmat nahi juta paa raha tha, lekin jism ki rag-rag mein daudi ek teekhi, anjaani utaavali ne uske saare sabr ke baandh tod diye. Uska ughda hua pet aur naazuk kamar har gahri saans ke saath tezi se upar-neeche hone lagi, maano uska poora wajoood sirf usi ek insaan ke deedaar ki tadap mein pighal raha ho.

Aarav ke munh se achanak nikla, "Kaun ho sakta hai... shayad papa ke koi kareebi mantri ya bade afsar honge. Tum ruko, main khud ja kar check karta hoon."

Yeh kehte hue Aarav tez qadmon se portico ki taraf badh gaya, jabki Meera wahi besudh si khadi rahi. Uska hath anaayas hi apni saree ke laal chiffon ke aanchal ko zor se bheench chuka tha.

Uski bekaabu dhadkanen aur utaavali saansen saaf chugli kar rahi thi ki uske dil ko achhi tarah maalum tha ki gaadiyon ke darwaaze khulte hi kaun bahar aane wala hai.

Aage aur peeche ki gaadiyon ke darwaaze khule, aur unmein se chaar wardiwaale security officerkarmi bahar nikal kar beech waali car ki taraf badhe.

Unmein se ek ne aage badhkar beech waali gaadi ka darwaaza khola, aur phir Meera ki nazaren seedhe usi insaan par jaakar tik gayi. Sartaj Singh—uski nazaron mein duniya ke sabse sammaanit insaan—gaadi se bahar nikle. 6 feet 2 inch lambe, ve utne hi prabhavshaali, gambhir aur shaant dikh rahe the, jitne ve hamesha hua karte the.

Apni us robeeli wardi mein unke chehre se adamya taakat, anushaasan aur garima ka ahsaas saaf jhalak raha tha. Magar is baar mahaul mein kuch alag tha, Sartaj ne apne majboot hath mein ek nanhi si bachhi ki naazuk ungaliyan thaam rakhi thi, jiski umar 7 ya 8 saal se zyada nahi lag rahi thi. Saamne dulhan ki tarah saje ghar ke bhavya nazaare aur jagmagaati roshniyon ko dekhkar, us bachhi ki maasoom aankhen beinteha utsukta aur ghabraahat se chaudi ho gayi thi.

Yeh nazaara dekhte hi Meera ki dhadkanen ek pal ke liye maano tham si gayi. Bhaavnaon ka ek bekaabu bavandar uske seene mein umad pada—raahat, beinteha khushi, aur saath hi ulhan ki ek gahri lakeer.

Ve apne saath is bachhi ko kyon laaye hain? Yeh kaun hai? Sartaj ke saath iska kya rishta ho sakta hai... jahan tak main jaanti hoon, Sartaj ne toh abhi tak shadi hi nahi ki hai?

Sawaalon ka bavandar uske zahan mein ghumad hi raha tha ki tabhi Sartaj ne chaaron aur nigahen daudaayi. Unki robeeli nazaren aakhirkaar laal chiffon ki saree mein saji Meera par jaakar thehar gayi.

Us ek pal ke liye maano aas-paas ka saara shor, jamaavda aur poori duniya wahi tham gayi. Sartaj ki un sanjeeda aankhon mein ek anjaani narmi utar aai—donon ke beech baraste us khamosh pyaar ka ek gahra, anakha ikraar.

Sartaj jaise hi aage badhe, wah nanhi bachhi unke pehlu se chipki hui saath-saath chalne lagi. Unki mardaana shakhsiyat aur wardi ke roab ko dekhkar bheed ne khud-ba-khud simatkar unhe raasta de diya.

Meera ke kadam apne aap unki aur uthne lage. Usne apne andar ek ajeeb si garmjoshi aur bekaraari mehsus ki; uska dil ummeed, pyaar aur asamanjas ke mile-jule ahsaas se zoron se dhadak raha tha.

Sartaj behad shaleenta aur grace ke saath Meera ke parivaar ki aur badhe. Darwaaze par Meera ke sasur ji khade the, aur tab tak Aarav bhi apne pita ke paas pahunch chuka tha. Meera unke peeche thodi doori par khadi thi. Uska dil ab bhi seene mein bekaabu hokar dhadak raha tha, aur uski nazaren Sartaj ke har kadam ko naap rahi thi.

Sartaj ko us nanhi bachhi ke saath is tarah aate dekhna Meera ke bheetar bhaavnaon ka ek aisa bavandar utha raha tha jise wah koi naam nahi de paa rahi thi. Usne Sartaj ke aane ki kalpana na jaane kitni baar ki thi, lekin kabhi is roop mein nahi—ek bachhi ka hath thaame hue, ek aisa mod jiski usne door-door tak ummeed nahi ki thi.

Jab Sartaj us parivaar ke paas pahunche, toh unhone behad vinamra aur sammaan-janak andaaz mein apna sir jhukaaya. Apne usi shaant aur gambhir lehje mein unhone baat shuru ki, "Good evening... main Sartaj Singh, Meera ka sahpaathi aur puraana dost." Unke shabd behad saade the. Usmein unke bade pad ya wardi ka koi dambh ya dikhaawa nahi tha.

Meera ke sasur ji ne badi garmjoshi se unka swaagat kiya; Aarav ne bhi aage badhkar unka istakbaal kiya aur apna parichay dete hue kaha, "Main Aarav... Meera ka pati."

Sartaj ne behad garmjoshi se usse hath milaaya aur kaha, "Ji, main jaanta hoon."

Sartaj ki robeeli shakhsiyat, unke chehre ke tez aur wardi ke roab ko dekhkar har koi unki aur aakarshit tha aur unke baare mein jaane ke liye utsuk tha.

Phir, apne hontohn par ek halki si saadgi bhari muskaan laate hue, unhone apne saath khadi us nanhi bachhi ka parichay karaaya. "Yeh meri beti hai, Jyoti," unhone bade pyaar se bachhi ke kandhe ko sahlaate hue kaha. Jyoti ne upar uthakar un sabhi ko dekha, uski chamakti hui maasoom aankhen us bheed aur anjaane chehron ko thodi sharm aur behad utsukta se nihar rahi thi.

Meera ke pairon tale zameen khisak gayi jab yeh sach saamne aaya ki Jyoti Sartaj ki beti hai. Is apratyaashit mod ne Sartaj ke aane ke baad se uski saari bhaavnaon ko jhakjhor kar rakh diya tha. Uski nigahen ab Sartaj aur uske parivaar ke beech ho rahi har baat ko aur zyada gahrai se naapne lagi thi.

Aakhirkaar, Sartaj Meera ke theek saamne aa khade hue. Donon ke beech ki faza hazaaron anakhe alfaazon, guzre zamaane ki sulagti yaadon aur hawa mein tairte ansuljhe sawaalon se bhaari ho chuki thi. Ek pal ke liye, Meera ki kajraari aankhon ne Sartaj ki gahri nigahon mein jhaanka—us maasoom bachhi ki haqeeqat ko talaashne ke liye jo ab bhi Sartaj ke pehlu se chipki hui thi.

Sartaj ek kadam aage badhe aur Meera ko apni marmsparshi, dostana aagosh mein bhar liya. Wah aalingan behad saada aur chhota sa tha, magar usmein ek aisi gahri aatmiyata aur garmaahat thi jise sirf ve donon hi mehsus kar sakte the.

Meera ki laal chiffon ki saree ke paar Sartaj ke faulaadi seene ki tapan saaf mehsus ho rahi thi. Meera ko peeche hataate hue, Sartaj thoda sa jhuke aur uske kaanon ke paas apne hont laakar dheere se fusfusaaye, "Jyoti ke baare mein tumhe baad mein sab bataunga..." Unki aawaaz shaant thi—Meera ke chehre par utri hairani ka ek-ek jawaab dene ka waada.

Seedhe khade hokar, Sartaj ne nanhi bachhi ke naazuk kandhe par hath rakhkar use halkes se aage badhaaya.

"Jyoti," unhone ek khamosh fakhr ke saath kaha, "main tumhe ek bahut hi khaas insaan se milaana chahta hoon. Yeh Meera hai... meri sabse azeez dost."

Sartaj ne Meera ki aur aisi narmi se dekha ki Meera ki dhadkanen bekaabu ho gayi, aur uske jism mein ek meethi si siharan daud gayi.

Jyoti ne apni badi-badi, utsuk aankhon se Meera ko dekha, jiske chehre par halki si haya aur jhijhak thi. Meera apni laal saree ki silwaton ko samette hue neeche jhuki. Uski nigahen Sartaj ke raubdaor chehre se hatkar us maasoom bachhi par aa tiki.

Usne ek behad dilkash aur garmjoshi bhari muskaan ke saath kaha, "Hello Jyoti... tumse milkar bahut achha laga."

Meera ne ek pal ke liye Sartaj ki taraf dekha—uski aankhon mein sawaalon ka samandar tha, magar saath hi ek gahra ikraar bhi. Wah jaanti thi ki Jyoti ki maujoodgi ke peeche chaahe jo bhi kahaani ho, waqt aane par wah Sartaj ke mukh se hi use sunegi.

Meera ne Jyoti ki nanhi, komal ungaliyon ko apni gori hatheli mein thaam liya. Us maasoom si chhuan ko mehsus karte hue, wah Sartaj aur uski beti ko mehmaanon ki bheed ke beech se aage le jaane lagi.

Dil mein uthe toofan ke baavjoood, Meera ke har kadam mein ek gazab ki nazaakat thi—wah poori shiddat se un donon ko apne parivaar ki in khushiyon mein shamil karne ke liye taiyaar thi.

Sabse pehle Meera ne Sartaj aur unki beti ko apne pati Aarav se dubaara aupchaarik roop se milwaaya. Aarav ne ek baar phir behad sammaan aur garmaahat ke saath Sartaj se hath milaaya.

Meera ne muskuraate hue kaha, "Aarav... Sartaj college mein mere classmate hua karte the aur baad mein inhone IPS join kar liya. College ke dinon mein yeh bahut reserved aur kam बोलने wale insaan hua karte the."

Magar Meera ke dil ke bheetar ek alag hi kasak uthi. Usne man hi man sochha, 'Itne reserved... ki poore college mein kabhi yeh himmat hi nahi juta paaye ki mujhe bata sakein ki yeh mujhse kitna pyaar karte hain...'

Aarav ne utsukta se poochha, "Toh phir college ke baad aap donon ki mulaqaat kab hui?"

Sartaj ne behad sanjeedgi aur samajhdaari se baat sambhalte hue kaha, "I think, kareeb teen saal pehle hum kisi common friend ki party mein mile the."

Meera ne sir hilaaya, "Haan Aarav, wahi hamari doobaara baat shuru hui thi."

Sartaj ne aage joda, "Lekin uske baad meri service ki vyasttaon ki wajah se hamara sampark nahi ho saka. Phir jab mujhe shadi ka card mila, toh laga ki milne ka isse behtar mauka aur koi nahi ho sakta."

Sartaj ke in sambhle hue shabdon ko sunkar Meera ka dil bheetar tak sihar utha. Uski laal chiffon ki saree ke neeche chhipa seena tezi se upar-neeche hone laga.

Wah man hi man Aarav ki aur dekhte hue sochne lagi:
'Aarav... tumhe kaise samjhaoon ki yeh insaan mere aur tumhare parivaar ke liye kya maayne rakhta hai? Jab tumhari patni aur tumhari behen ko wah darinda Shankar blackmail kar raha tha... jab hamari zindagi neelaam hone ki kagaar par thi...'

'Tab apni izzat aur parivaar ko bachane ka koi raasta na paakar maine aakhiri ummeed ki tarah inhein hi pukaara tha. Aur inhone kya kiya? Apni jaan, apna career, apna sab kuch daanv par lagaakar tumhari beewi aur behen ko us narak ki aag se sahi-salaamat bahar nikaala...'

'Aur badle mein? Kabhi ek lafz ya ek ahsaan tak ka daawa nahi kiya... yeh wah insaan hai, jise us ahsaan ke badle main apna poora shareer saumpne ke liye raazi thi...'

'Lekin inhone saaf inkaar kar diya... jabki main achhi tarah jaanti thi ki yeh mujhe college ke dinon se beinteha chahte the.'

Tabhi Aarav ka phone baj utha. Shorgul se bachte hue usne kaha, "Excuse me," aur call attend karne ke liye bahar ki taraf badh gaya.

Jaate-jaate usne Meera ki taraf dekhkar pyaar se muskuraate hue kaha, "Meera, apne dost ka khyaal rakhna... main bas paanch minute mein aata hoon."

Meera ne jab Aarav ke munh se 'dost' shabd suna, toh uske man ke bheetar se ek tadapti hui aawaaz nikli:

'Dost? Tumhe kaise bataoon Aarav ki Sartaj ka meri zindagi mein kya darja hai...'

'Bas usi din ke baad is insaan ka darja mere dil mein sabse upar ho gaya... shayad tumse bhi upar, Aarav! Kyunki tum mere liye jo kuch bhi karoge, wah sirf isliye karoge kyunki main tumhari patni hoon... yeh tumhara farz hai.'

'Lekin Sartaj? Rishta na hote hue bhi unhone mere liye jo kiya, usne mujhe hamesha-hamesha ke liye unka bana diya...'

Jaise hi Aarav door gaya, Meera aur Sartaj ke beech ka faasla achanak aur gahra, aur zyada sulagta hua mehsus hone laga.

Meera ne muskuraate hue kaha, "Aaiye Sartaj, main aapko parivaar ke baaki logon se milwaati hoon."

Sartaj behad shaant, shaleen aur sanjeeda andaaz mein Meera ke saath aage badhe. Jaise-jaise ve ek-ek karke ghar ke badon aur rishtedaaron se mil rahe the, nanhi Jyoti Meera ke paas hi rahi.

Mahaul ki garmaahat aur apnon ke pyaar ko dekhkar wah dheere-dheere ghulne-milne lagi thi aur utsukta se is jashn ka nazaakat bhara maza le rahi thi. Har kisi ne Sartaj aur Jyoti ka swaagat behad pyaar aur sammaan ke saath kiya, jisse ve donon pal bhar mein hi us paarivaarik utsav ka aham hissa ban gaye.

Aakhirkaar, Meera unhein lekar seedhe Riya ki taraf badhi, jo mahfil ke beechon-beech khadi aankhon mein utsukta aur bekaraari liye intazaar kar rahi thi. Riya ne Sartaj ke baare mein kahaaniyan sun rakhi thi—wah bahadur insaan, jisne uski zindagi ke sabse khaufnaak aur kaale daur mein dhaal bankar uski aabroo aur jaan bachai thi. Aaj unhein apne saamne khada dekhna uske liye behad bhaavuk aur kisi khwaab jaisa mehsus ho raha tha.

Meera ne ek khaas nazaakat, fakhr aur apnaayat bhare lehje mein kaha, "Riya... ye Sartaj hain. Jinke baare mein maine tumhe bataaya tha."

Riya ne ek gahri saans li aur Sartaj ke raubdaor chehre ki aur dekha. Uski aankhen aadar aur beinteha ahsaanmandi se chhalak aai thi. Usne behad dheeme aur kaampte swar mein kaha, "Maine aapke baare mein bahut kuch suna hai... aapne hamare liye jo kuch bhi kiya, uske liye aapka bahut-bahut shukriya."

Sartaj ne apni sanjeeda muskaan ke saath dheere se apna sir hilaaya.

Ve ek kadam aage aaye aur behad bhaari aawaaz mein bole, "Un dinon ko yaad karne ki koi zaroorat nahi hai, Riya. Wah daur bahut peeche chhoot chuka hai. Ab tumhe sirf aage dekhna hai aur apni nai zindagi ko gale lagaana hai... behen."

Riya ki aankhon se aansuon ki do nam boondein chhalakkar uski gulaabi gaalon par dhalak gayi. Usne bhaari dil se apna sir jhukaa liya.

Wah man hi man soch rahi thi, 'Sartaj ji ko hamari haqeeqat pata hai... ve jaante hain ki hum kis bhayaanak daldal mein fanse the, hamari aabroo par kya guzri thi... phir bhi ve mujhe itna pavitra, itna bada 'behen' ka darja de rahe hain! Agar aaj mere apne bhai ko hamara ateet pata chal jaata, toh shayad wah apne parivaar ki tathaakathit izzat bachane ke liye humein goli hi maar deta...'

Riya ne apni roti hui, dabdabaai aankhon se Sartaj ki taraf dekha. Uske hont kaamp rahe the. Usne behad bhaavuk hokar kaha, "Aaj main shadi karne ja rahi hoon Sartaj ji... aur yeh sab sirf aur sirf aapki वजह se mumkin ho paaya hai."

Riya ka dil kar raha tha ki wah sab kuch bhoolkar, bhari mahfil ke saamne Sartaj ke chaude seene se lipatkar foot-footkar ro pade.

Shayad Sartaj ko uski aankhon ki tadap aur dil ke is ubaal ka ilm pal bhar mein ho gaya tha. Mahaul ko zyada bhaavuk hone se bachate hue, Sartaj ne turant baat ka rukh palta.

Unhone Meera ki taraf dekhte hue ek halki si muskaan ke saath kaha, "Meera, zara apni nanad ka chehra saaf karo... aur ise samjhaao ki shadi ke din rona bilkul mana hai, warna saara makeup bigad jaayega aur dulhan ka nikhaar kharaab ho jaayega!"

Phir jaldi se Riya ke sar par apna hath rakhkar aasheervaad diya, aur Jyoti ka nanha hath thaamkar doosri taraf badh gaye.

Meera ne turant aage badhkar roti hui Riya ko sambhala, apne laal chiffon ke pallu se uske aansu ponchhe aur bade laad se kaha, "Main unhein tumhare paas yahan rulaane ke liye nahi laai thi, Riya... aur dekh rahi ho na tum? Jab bhi koi unka shukriya ada karna chahta hai, ya unke aage apna dil kholna chahta hai, toh ve kaise badi khamoshi se door chale jaate hain... bina koi ahsaan jataaye."

Meera wahi khadi Sartaj ko door jaate hue dekh rahi thi. Uski laal chiffon ki saree ke paar tezi se dhadakta hua uska seena aur ughdi kamar par aati-jaati utaavali saansen saaf gawaahi de rahi thi ki wah Sartaj ke is nishkaam vyaktitva ko dekhkar ek baar phir unki mohabbat mein aur gahri utarne lagi thi.

Wah man hi man soch rahi thi, 'Kya insaan hain yeh... log chhoti si madad karke sau baar ahsaan jataate hain, aur ek yeh hain jo apni jaan par khelkar bhi ek baar shukriya tak sunna nahi chahte...'
Deepak Kapoor
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#8
Hi,

I have posted an update on this story. Please leave a comment, rating, and like if you are enjoying the story so far.
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#9
Wow congratulations for new story bilkul bollywood ki kisi movie ki trah lag rahi ek dam super hit
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