Thread Rating:
  • 1 Vote(s) - 1 Average
  • 1
  • 2
  • 3
  • 4
  • 5
Incest बाँझ बेटी की गलतफहमी ने बेटा दिया
#1
बाँझ बेटी की गलतफहमी ने बेटा दिया

मेरा नाम राजिंदर है. हम पुणे में रहते हैं. हमारे घर में 4 लोग हैं. मैं मेरी पत्नी सुषमा मेरा बेटा सफल और मेरी बेटी सपना।
 मैं 52 साल का हूँ और मेरी पत्नी 50 साल की है.
मैं एक सरकारी विभाग में उच्च पद पर कार्यरत हूँ, मेरे रिटायर होने में बस 
अब कुछ ही वर्ष शेष हैं। मैंने अपना सारा जीवन सादगी और कर्मठता से जिया है, अपनी पत्नी के अलावा कभी भी किसी दूसरी के साथ इसके पहले सम्भोग नहीं किया था और न ही मैं इन चक्करों में कभी पड़ा।
हाँ, कभी कभी अपने इस दोस्त के साथ महीने दो महीने में पीने पिलाने का 
दौर चल जाता है बस!
मेरी और मेरी पत्नी की सेक्स लाइफ बहुत अच्छी है. हम दोनों सेक्स के बहुत शौकीन हैं. दारू पीने के बाद तो मेरा लौड़ा काबू से बाहर हो जाता है और हम बहुत जोर शोर से चुदाई करते हैं. मेरा सेक्स स्टैमिना भी बहुत अच्छा है. मैं आधे घंटे से पहले डिस्चार्ज नहीं होता। मेरा लौड़ा भी लगभग 8 इंच लम्बा और 4 इंच मोटा है. मेरी बीवी की चूत पहले पहले तो इतने मोटे लॅंड को नहीं ले पाती थी पर अब खूब मजे से उछल उछल कर चुदवाती है.
मेरा बेटा सफल मुंबई में रह कर नौकरी रहा है और 32 साल का है. और शादीशुदा है. उसकी पत्नी भी उसके साथ वहीँ रहती है.
मेरी बेटी की शादी नागपुर में हुई है. मेरे दामाद का नाम शुभम है.
यह कहानी मेरी बेटी के बारे में है. मेरी बेटी बहुत सुन्दर है. उसका शरीर बहुत भरा भरा सा है. उसके मुम्मे और चूतड काफी मोटे मोटे हैं. आप कह सकते हैं की वो एक सेक्स की देवी लगती है.
शादी के पहले उस पर बहुत लड़के मरते थे. मुझे पता है कि वो भी सेक्स की बहुत शौकीन है. उसका पति बहुत अच्छा है. दोनों की सेक्स लाइफ बहुत अच्छी थी. (मैंने कई बार उन्हें चुदाई करते देखा है, जब वो हमारे घर में आते थे).
मैं उनके लिए बहुत खुश था. मेरा अपनी बेटी के प्रति कोई सेक्स के विचार नहीं थे.
पर बेटी की जिंदगी में एक कमी थी जिस के कारण वो सदा दुखी रहती थी.
मेरी बेटी की जीवन में दुःख का कारण था उसके बच्चा न होना।
मेरी बेटी और उसका पति बच्चा चाहते थे. असल में मेरा दामाद भी घर में अकेला बेटा था. उनका काफी बिज़नेस था इसलिए मेरी बेटी की सास चाहती थी कि उसका पोता हो ताकि उनका खानदान चलता रहे और घर में कोई छोटा बच्चा भी हो. मेरा दामाद और बेटी भी चाहते थे, पर बच्चा नहीं हो रहा था.
उसकी सास मेरी बेटी से बहुत नाराज़ रहती थी.
बेटी और दामाद ने डॉक्टर से भी टेस्ट करवाया पर दोनों में कोई भी कमी नहीं थी. शायद भगवान् को ही अभी उनके बच्चा होना मंजूर नहीं था.
पर बेटी की सास के लिए तो इतना काफी था की उसके बेटे में कोई कमी नहीं थी. तो सारा दोष मेरी बेटी पर ही डाल देती थी. वो उसे अक्सर बाँझ कहती थी.
वो मेरी बेटी तो तलाक देकर अपने बेटे की दूसरी शादी करवाना चाहती थी.
पर मेरा दामाद मेरी बेटी को बहुत प्यार करता था तो वो तलाक नहीं चाहता था पर बच्चा न होने से परेशान तो था ही. मुझे भी डर था की कभी ना कभी वो अपनी माँ के दवाब में मेरी बेटी को बच्चे के लिए तलाक न दे दे.
अक्सर मेरी बेटी अपनी माँ यानि मेरी पत्नी से फ़ोन पर यही दुःख ब्यान करती थी. और अक्सर रोती रहती थी.
पर हम भी क्या कर सकते थे.
बस भगवान् से प्रार्थना ही कर सकते थे, पर हर आने वाले दिन के साथ यह समस्या बढ़ती ही जा रही थी.
पर शायद भगवान् को कुछ और ही मंजूर था.
बात ऐसी हुई की मेरे छोटे भाई के बेटे की शादी थी. वो हमारे ही पास के मोहल्ले में रहते हैं. हमारा आपस में बहुत प्यार है. अब घर की शादी थी. बहुत से रीति रिवाज थे. फिर शादी के बाद में रिसेप्शन थी. और मेरी बेटी ही घर में एकमात्र लड़की थी तो मेरी बेटी और दामाद को लगभग 10 दिन के लिए बुला लिया था.
मेरे बेटे को छुट्टी की समस्या थी तो वो तो कोई 2- 3 दिन के लिए ही आने वाला था.
कई रिश्तेदार भी मेरे घर में ही रुकने वाले थे क्योंकि भाई के घर में इतनी जगह नहीं थी.
मेरी बेटी उसी दिन आयी थी.
शाम को हम सब मेरे भाई के घर गए थे. वहां पर पीने पिलाने का दौर खूब चला. मेरा दामाद भी शराब का शौकीन है. उसने भी खूब पी ली. मेरी बेटी ने भी लड़कियों के साथ मिल कर तीन चार पेग लगा लिए थे. पर आज कल के दौर में यह नार्मल चीज है. मुझे पता था की मेरी बेटी और दामाद पहले भी पी लेते थे.
आप सब तो जानते ही हैं कि शादी ब्याह में इंसान चकरघिन्नी बन के रह जाता है। मैं और पत्नी वापिस अपने घर में आ गए, बेटी और दामाद अभी भाई के घर ही थे, थोड़ी देर में आने वाले थे.
खाना पीना काफी कुछ निपट चुका था लेकिन अभी भी बहुत काम बाकी था।  इस उधेड़बुन में उलझा था कि रानी, मेरी पत्नी, की आवाज ने मेरी तन्द्रा भंग की।
‘चाय पियोगे जी?’ वो पूछ रही थी।
चाय पीने का मन तो हो ही रहा था, मैंने उसकी तरफ देख के सहमति दे दी।
‘अभी लाई!’ वो बोली।
कुछ ही देर में वो दो कप चाय लिये आई और मेरे बगल में कुर्सी डाल कर बैठ गई।
मैंने देखा थकान के चिह्न उसके चेहरे पर भी झलक रहे थे।
मैंने चाय की चुस्की ली फिर मुस्कुरा के उसकी तरफ देखा।
‘ऐसे क्यों देख रहे हो? चाय अच्छी नहीं लगी क्या?’
‘चाय तो अच्छी है, लेकिन आज तो मेरा मन हो रहा है एक महीने से ऊपर हो गया!’ मैंने कहा और धीरे से उसकी जांघ पर हाथ रखा।
‘हटो जी, आप को तो एक ही बात सूझती है हमेशा! बच्चे बड़े हो गये, शादियाँ हो गईं लेकिन आप को तो बस एक ही चीज दिखाई देती है!’
‘अब क्या करूं… तुम हो ही ऐसी प्यारी प्यारी!’ मैंने उसे मक्खन लगाया।
‘सब समझती हूँ इस चापलूसी का मतलब!’ कहते हुए उसने मेरा हाथ अपनी जांघ पर से हटा दिया।
‘अरे मान भी जा न। आज बहुत मूड बन रहा है मेरा, मेरा यह छोटू बेचैन है तेरी मुनिया से मिलने को!’
‘कोई चान्स नहीं है, घर मेहमानों से भरा पड़ा है! कुछ दिन और सब्र कर लो, फिर मिल लेना अपनी मुनिया से!’ वो बोली और उठ कर निकल ली।
मैंने भी वक़्त की नजाकत को समझते हुए अपना ध्यान दूसरी जरूरी बातों पे लगाया और घर के कुछ काम करने में व्यस्त हो गया।
सब कुछ निपटने के बाद आधी रात से ऊपर ही हो चुकी थी, सब लोग जहाँ तहाँ सोये पड़े थे, मेरा मन भी सोने का हो रहा था, इसी चक्कर में मैंने सारे घर का चक्कर लगा लिया लेकिन कहीं भी कोई गुंजाइश नहीं मिली।
Like Reply
Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
#2
तभी मुझे छत पर बनी कोठरी का खयाल आया। वो कोठरी कोई आठ बाई दस का कमरा था, जिसमें बेकार का सामान पड़ा रहता था जिसे न हम इस्तेमाल में लाते हैं और न ही फेंकते बनता है, जैसे कि सभी के घरों में कोई ऐसी जगह होती है।

उस स्टोर के कमरे में एक दीवान (छोटा बेड) रखा था. उस पर एक गद्दा भी पड़ा था.
मैंने वहीं सोने का सोच के ऊपर छत पर चला गया।
वहाँ कोठरी में भी सब अस्त व्यस्त सा पड़ा था और मुसीबत यह कि वहाँ का बल्ब पता नहीं कब फ्यूज हो चुका था तो रोशनी का कोई इंतजाम नहीं था।
मैंने जैसे तैसे करके वहाँ बिखरे सामान को खिसका कर इतनी जगह बना ली कि दीवान पर लेटा जा सके।
मैंने अपना बिस्तर बिछा लिया और सोने की तैयारी की।
दरवाजा बंद करने को हुआ तो देखा कि अन्दर से बंद करने को कोई कुंडी चिटकनी वहैरह थी ही नहीं, अतः मैंने किवाड़ यूं ही भिड़ा दिये और लेट गया।
उस दिन पता नहीं क्यों, पूरे बदन में अजीब से मस्ती छाई हुई थी। हालांकि थकान भी काफी थी लेकिन मन कुछ करने का बहुत कर रहा था।
बीवी ने तो पल्ला झाड़ ही लिया था लेकिन अपना हाथ जगन्नाथ तो हमेशा से है ही!
सब लोग नीचे सो रहे थे मैं ऊपर की मंजिल पर उस एकान्त कोठरी में जहाँ किसी के आने की कोई संभावना नहीं थी, टाइम भी रात के बारह बजे से ऊपर का ही हो रहा था।
अतः सब तरफ से निश्चिन्त होकर मैं लेट गया और अपने कसमसाते लिंग को कपड़ों के ऊपर से ही सहलाने लगा।
मेरे छोटू जी भी जल्दी ही तन के खड़े हो गये, मैंने भी उन्हें अपनी मुट्ठी में ले लिया और हौले हौले सहलाने लगा।
धीरे धीरे आहिस्ता आहिस्ता कुछ सोचते हुए तीन उँगलियों से लिंग मुंड की त्वचा को ऊपर नीचे करना मुझे बहुत अच्छा लगता है, हस्त मैथुन करने के लिये मैं शुरुआत ऐसे ही करता रहा हूँ। जब लगता है कि अब मामला बस के बाहर हो गया है, तभी मैं पूरे लिंग को मुट्ठी में जकड़ कर पूरी स्पीड से हस्तमैथुन करता हुआ स्खलित होना पसन्द करता हूँ।
ऐसे में समय भी बहुत ज्यादा लगता है और छूट भी बहुत तेज और आनन्द दायक होती है।
वैसे ही करते करते मैं सारे कपड़े उतार कर पूरी तरह से निर्वस्त्र हो गया और बड़े आराम से धीरे धीरे मुठ मारने लगा।
ऐसे करते करते कुछ ही मिनट हुए होंगे कि तभी कोठरी का दरवाजा धीरे से खुलने की चरमराहट जैसी आवाज आई और साथ में खुशबू का एक झोंका सा अन्दर घुसा।
मैं सन्न रह गया और मेरे हाथ लिंग को पकड़े हुए जहाँ के तहाँ रह गये।
दरवाजे पर कोई साया सा खड़ा था।
तभी उस साए ने भीतर कदम रखा और अपने पीछे दरवाजा वापिस भिड़ा दिया और मेरे पहलू में आ के लेट गया। उसके बदन से उठती भीनी भीनी महक से पूरी कोठरी रच बस गई।
अचानक उस साये ने मेरी तरफ करवट ली और मुझे अपने बाहुपाश में जकड़ लिया।
‘सॉरी शुभम जानू, देर हो गई आने में! गुस्सा तो नहीं हो ना?’ कहते हुए वो मेरे नंगे बदन पर चूम चूम के हाथ फिराने लगी।
उसकी आवाज को पहचान कर जैसे मेरे ऊपर वज्रपात हुआ और दिमाग सुन्न सा हो गया।
मेरी इकलौती बेटी सपना मेरे नंगे जिस्म को सहलाते हुए बोल रही थी।
मेरी बेटी के उरोज मुझसे चिपके हुए थे और वो मुझे गलती से अपना पति समझ कर मुझसे चूमा चाटी करने लगी थी।
कुछेक पल के लिये मैं जड़वत हो गया, साँसें बेतरतीब हो गईं और पसीना आने लगा और लगा कि हार्ट अटैक आ जाएगा।
सपना लगातार मुझे अपने अंक में समेट रही थी और मेरे सीने पर फिरतीं उसकी हथेलियाँ मुझे जहाँ तहाँ जकड़ने लगीं थीं।
फिर उसने अपना एक पैर उठा के मेरे ऊपर रखा, उसकी मांसल जांघ का उष्ण स्पर्श मुझे अपने सीने पर महसूस हुआ और फिर उसने मेरी कमर के पास अपनी एड़ी अड़ा कर मुझे और कस लिया।
‘पता है गुस्सा हो मुझसे! ग्यारह बजे का बोला था न आपने, अब तो शायद एक बजने वाला होगा। क्या करती वो जबलपुर वाली इंदौर वाली और झांसी वाली भाभियाँ उठने ही नहीं दे रहीं थीं। सब अपने अपने रात के किस्से सुना रहीं थी कि उनके वो कैसे कैसे क्या क्या करते हैं!’
‘हेल्लो पतिदेव जी, कुछ तो कहिये… सच में सो गये क्या.. उठो न पूरे दो दिन होने वाले हैं जब हमने वो किया था। आ भी जाओ अब!’कहते कहते मेरी बेटी सपना ने अपनी बाहों में मुझे कस लिया और चूमने लगी।
‘हे ईश्वर यह कैसी घड़ी आन पड़ी मुझ पे!?!’ मैंने मन ही मन भगवान् का स्मरण किया। अपने जीवन में कभी किसी पर स्त्री को छूना तो दूर, कभी कुदृष्टि से भी नहीं देखा और आज मेरी बेटी  जिसे मैंने अपने ही लौड़े से पैदा किया है, मेरी बेटी जिसका विवाह अभी कुछ महीने  पहले ही हुआ है, मेरे साथ चुदाई करने की कोशिश कर रही है. हे भगवान् क्या करूँ मैं?
‘क्या करूँ मैं? सपना को डांट दूँ? बता दूँ उसको कि मैं उसका पति नहीं पिता हूँ?… नहीं नहीं.. अगर ऐसा किया तो वो शर्म से जीवन भर मुझसे आँख नहीं मिला पाएगी और क्या पता वो लज्जावश और कोई घातक कदम उठा ले तो?’
ये सब सोच के मैंने चुपचाप और निष्क्रिय रहना ही ठीक समझा। मन ही मन भगवान से प्रार्थना भी कर रहा था कि मैं बेक़सूर हूँ, विवश हूँ, मुझे क्षमा करना और जो इस अँधेरी कोठरी में घट रहा है वह सदैव अँधेरे में ही रहे… इसी में हम सबका, इस घर का कल्याण है।
उधर सपना कामातुरा होकर मुझे अपने से चिपटाए हुए मुझे चूम रही थी।
अचानक उसका हाथ मुझे सहलाते हुए नीचे की तरफ फिसल गया और मेरा तना हुआ कठोर लिंग उसके हाथ से छू गया।
मेरा मन तो बुझा हुआ था और छटपटा रहा था कि इस विवशता से कैसे मुक्ति मिले… लेकिन मेरा लिंग अविचल खड़ा था उस पर मेरा कोई वश नहीं रह गया था।
‘अच्छा जी, आप तो बोल नहीं रहे लेकिन आपके ये लण्ड महाराज जी तो कुछ और ही कह रहे हैं। देखो, मेरे आते ही ये कैसे तन खड़े होकर सैल्यूट मार रहा है मुझे! आखिर पहचानता है न मुझे!’ कहते हुए सपना ने मेरा लिंग अपनी मुटठी में जकड़ लिया और चमड़ी को ऊपर नीचे करते हुए उसे सहलाने लगी, कभी मेरे अन्डकोषों को सहलाती, कभी लिंग के ऊपर उगे हुए बालों में अपनी उंगलियाँ फिराती। उसके कोमल हाथों का स्पर्श और महकते हुए जवान जिस्म की तपिश मुझे बेचैन किये दे रही थी, मैं बस जैसे तैसे खुद पर कंट्रोल रख पा रहा था।
‘सुनो जी, आपका ये लण्ड महाराज जी आज कुछ बदला बदला सा क्यों लग रहा है मुझे? जैसे खूब मोटा और लम्बा हो गया हो पहले से?’ वो मुझे चिकोटी काटते हुए बोली।
Like Reply
#3
मैं क्या जवाब देता उसे… मैं तो बस उस पर से ध्यान हटाने की कोशिश में अपनी साँसों पर ध्यान लगाए था।

अचानक वह मुझसे अलग हुई और उसके कपड़ों की सरसराहट मुझे सुनाई दी, मैं समझ गया कि उसने अपने कपड़े उतार दिये हैं।
और फिर उसका नंगा बदन मुझसे लिपट गया।
‘अब आ भी जाओ राजा, और मत तरसाओ मुझे… समा जाओ मुझमें! देखो आपकी ये चूत महारानी कैसे रसीली हो हो के बह रही है।’ वो बोली और मेरा हाथ पकड़ कर अपनी योनि पर रख कर दबा दिया।
उसकी गुदगुदी पाव रोटी जैसी फूली और योनि रस से भीगे केशों का स्पर्श मुझे भीतर तक हिला गया।
फिर सपना मेरा हाथ दबाते हुए अपनी गीली योनि पर फिराने लगी, मक्खन सी मुलायम उष्ण योनि ने मेरा स्पर्श पाते ही अपनी फांकें स्वतः ही खोल दीं और मेरी उंगलियाँ बह रहे रस से गीलीं हो गई।
मैं अभी भी क्रियाहीन और अविचल पड़ा था। हालांकि मेरे संस्कारों पर वासना हावी होने लगी थी, रूपसी कामिनी सम्पूर्ण नग्न हो कर मुझसे लिपटी हुई मुझे सम्भोग करने के लिये उकसा रही थी, मचल रही थी, आमंत्रित कर रही थी, झिंझोड़ रही थी।
उसकी गर्म साँसें और परफ्यूम से महकता हुआ बदन मेरे भीतर आग भरने लगा था, मेरी कनपटियाँ तपने लगीं और मेरा बदन भी जैसे विद्रोह करने पर उतारू हो गया।
उधर सपना अभी भी मेरा हाथ पकड़े हुए अपनी योनि पर फिरा रही थी और मेरी उंगलियाँ योनि रस से भीगी हुईं केशों को ऊपर तक गीला किये दे रहीं थीं।
मैंने अपने मन को फिर पक्का किया और अपना हाथ उससे छुड़ाते हुए अलग कर लिया।
लेकिन बेटी  तो बुरी तरह से जैसे कामाग्नि में जल रही थी, उसने मेरा हाथ पुनः पकड़ लिया और अपने बाएं नग्न स्तन पर रख दिया।
मेरी हथेली में उसकी कड़क घुंडी और मुलायम रुई के फाहे जैसे मृदु कोमल उरोज का मादक स्पर्श हुआ। एक बार तो मन किया कि दबोच लूं उसे और चूस लूं।
लेकिन बेटी  के रिश्ते का ख्याल आते ही मैं रुक गया।
मेरा हाथ अभी भी बेटी के स्तन पर रखा था और उसकी सांसों, धड़कन का स्पंदन मैं अपनी हथेली पर महसूस कर रहा था।
मैंने एक बार फिर अपने जी कड़ा करके सम्बन्धों की मर्यादा तार तार होने से बचाने की कोशिश कि और सपना से खुद को छुडाया और दूसरी तरफ करवट ले ली।
लेकिन होनी तो प्रबल थी।
बेटी  पर तो जैसे साक्षात् रति देवी सवार थी उस रात! उस ने भी शराब पी रखी थी. शायद यह उसी का असर था.
मेरे करवट लेते ही बेटी मेरे ऊपर से लुढ़क कर मेरे सामने की तरफ आ गई।
‘आज क्या हो गया आपको? अब ऐसा भी क्या गुस्सा जी, ऐसे तो कभी भी नहीं किया आपने!’
मैं चुप रहा, बस इसी सोच में था कि जैसे तैसे इस पाप के कुएं से बाहर निकल पाऊं बस!
‘अच्छा ये लो, आज मुंह में लेकर चूसती चूमती हूँ इसे। आप हमेशा कहते थे न कि एक बार मुंह में ले के प्यार कर दो इसे। लेकिन मैंने कभी नहीं मानी आपकी बात…’ बेटी बोली और मेरा लंड पकड़ कर उस पर झुक गई और अपनी जीभ की नोक से उसे छुआ, फिर फोरस्किन को नीचे खिसका के सुपारा अपने मुंह में ले लिया।
उस अँधेरी कोठरी में मैं विवश था पर लंड नहीं, वह तो बेटी के मुंह में प्रवेश करते ही फूल के कुप्पा हो गया।
बेटी ने पूरा सुपारा अपने मुंह में भर लिया और एक बार चूसा जैसे पाइप से कोल्ड ड्रिंक चूसते हैं। एक बार चूस के उसने तुरन्त मुंह हटा लिया, शायद पहली बार होने की वजह से।
बेटी ने फिर मेरे लंड की चमड़ी को चार छः बार ऊपर नीचे किया जैसे मुठ मारते हैं और फिर लंड को फिर से अपने मुंह में भर लिया, इस बार उसने पूरा सुपारा मुंह में ले लिया, मुंह को ऊपर नीचे करने लगी जिससे लगभग एक तिहाई लंड उसके मुंह में आने जाने लगा।
कुछ देर ऐसे ही करने में बाद सपना बेटी  मेरे ऊपर आ गई और लंड को मेरे पेट पर लिटा दिया और अपनी चूत से लंड को दबा दबा के रगड़ा मारने लगी।
बेटी के इस तरह रगड़ने से उसकी चूत के होंठ स्वतः ही खुल गये और मेरा लंड उसकी चूत के खांचे में फिट सा हो गया।
सपना जल्दी जल्दी अपनी चूत को मेरे लंड पे घिसने लगी, उसकी बुर से रस बहता हुआ मेरे पेट तक को भिगो रहा था।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि करूँ तो क्या करूँ। वो आखिर मेरी अपनी सगी बेटी थी. मैं कुछ करना नहीं चाहता था पर लगता था की दारू के नशे में उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.
अचानक उसकी रगड़ने की स्पीड बहुत तेज हो गई और उसके मुंह से सिसकारियाँ निकलने लगीं ‘आह, जानू, कितना अच्छा लग रहा है इस तरह! आपके लण्ड महाराज पर अपनी चूत महारानी ऐसे रगड़ने का मज़ा आज पहली बार मिल रहा है… आह ओह… उई माँ… बस मैं आने ही वाली हूँ मेरे राजा… जानू। इसे एक बार घुसा दो न प्लीज, उम्म्ह… अहह… हय… याह… फिर मैं अच्छे से आ जाऊँगी!
ऐसा कहते हुए सपना अपनी चूत को कुछ ऐसे एंगल से लंड पर रगड़ने लगी कि वो उसकी चूत में चला जाए।
लेकिन मैंने वैसा होने नहीं दिया इस पर सपना खिसिया कर पागलों की तरह अपनी चूत को मेरे लंड पर पटक पटक कर रगड़ते हुए मज़ा लेने लगी।
इधर मेरा हाल भी बुरा था और मैं जैसे किसी अग्नि परीक्षा से गुजर रहा था, मैं मन को बार बार आ रहे मज़े से भटकाने की कोशिश कर रहा था पर लंड पर मेरा कोई वश नहीं था, वो तो जवान कसी हुई नर्म गर्म चूत के लगातार हो रहे वार से आनन्दित होता हुआ मस्त था।
मैंने इस बार अपना ध्यान पूरी ताकत से हटाया और इधर उधर की बातें सोचने लगा।
उधर सपना की चूत मेरे लंड पे रगड़ती हुई संघर्षरत थी और झड़ जाने की भरपूर कोशिश कर रही थी।
यहाँ वहाँ की बातें सोचते सोचते मेरे मन में आया कि मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस बेटी को मैंने सिर्फ बेटी की तरह ही प्यार दिया उसकी चूत में कभी मेरा लंड जाएगा।
वो सब सोचते सोचते मेरा ध्यान भंग हुआ क्योंकि सपना के नाखून मेरे कन्धों में गड़ रहे थे और वो लगातार अपनी चूत मेरे बिछे हुए लंड पर रगड़ती हुई अपनी मंजिल की तरफ पहुँच रही थी।
मेरा बदन भी किसी रिफ्लेक्स एक्शन की तरह अनचाहे ही सपना का साथ देने लगा था और मैं अपनी कमर उठा उठा कर बेटी को सहयोग दे रहा था।
Like Reply
#4
मेरा दिमाग जैसे कुंद हो गया था, कुछ भी सोचने समझने की हालत में नहीं था और शरीर तो जैसे विद्रोह पर उतारू हो गया था।

मेरे से अपने आप को संभाल पाना बहुत ही मुश्किल हो रहा था. मुझे लग रहा था कि मैं ज्यादा देर तक अपने पर काबू नहीं रख पाउँगा।
अचानक अनचाहे ही मैंने सपना को अपनी बाहों में जोर से भींच लिया, उसके सुकोमल स्तन मेरे कठोर सीने से पिस गये। फिर मैंने पलटी मारी, अगले ही क्षण सपना मेरे नीचे थी, मैंने झुक कर उसके फूल से गालों को चूमा और उसका निचला होंठ अपने होंठों में कैद करके चूसने लगा।
सपना ने भी अपनी बाहें मेरे गले में लपेट दीं और मुझे चुम्बन देने लगी।
सब कुछ जैसे अनायास ही हो रहा था, पता नहीं कब मेरी जीभ बेटी के मुंह में चली गई और वो उसे चूसने लगी। फिर अपनी जीभ निकाल के मेरे मुख में धकेल दी।
नवयौवना के चुम्बन का आनन्द ही अलग होता है, मुझे अपनी शादी की शुरुआत के दिन याद हो आये।
अब मैं सपना की गर्दन चूम रहा था, कभी कान की लौ यूं ही चुभला देता और वो मेरे नीचे मचल रही थी चुदने के लिये… बार बार अपनी कमर उठा उठा कर मुझे जैसे उलाहना दे रही थी कि अब जल्दी से पेल दो लंड को!
लेकिन मैं अपने अनुभव से जानता था कि खुद पर काबू कैसे रखना है और अपनी संगिनी को कैसे चुदाई का स्वर्गिक आनन्द देना है।
मैं बेटी  को चूमता हुआ नीचे की तरफ उतर चला और उसका दायां मम्मा अपने मुंह में भर के पीने लगा, साथ ही बाएं मम्मे को मुट्ठी में ले के धीरे धीरे खेलने लगा उससे!
मेरी हरकतें बेटी  को कामोन्माद से भर रहीं थीं और अब वो मुझे अपने से लिपटाने लगी थी।
मैं भी अत्यंत उत्तेजित हो चुका था, बढ़ती उत्तेजना में मैंने बेटी  के दोनों स्तन मुट्ठियों में जकड़ कर उसके गाल काटना शुरू कर दिया।
‘जानू, गाल मत काटो ना जोर से! निशान पड़ जायेंगे तो सवेरे मैं जानू मम्मी को कैसे मुंह दिखा पाऊँगी?’ बेटी  बहुत भोलेपन से बोली।
मुझे उसकी बात सुन मन ही मन हंसी आई कि तेरे जानू ही तो तेरे गाल काट रहे हैं और अब तेरी चूत भी मारेंगे!
फिर मैंने बेटी  के गाल काटना छोड़ के उसके स्तनों को ताकत से गूंथते हुए पीना शुरू कर दिया।
‘जानू, अब सब्र नहीं होता… समा जाओ मुझमें! अब और मत सताओ राजा!’ बेटी  की शहद सी मीठी कामुक थरथराती हुई आवाज मेरे कानों में गूंजी।
पर मैं तो अपनी ही धुन में मग्न था, मैं उसे पेट पर से चूमते हुए उसकी नाभि में जीभ से हलचल मचाते हुए उसकी चूत को अपनी मुट्ठी में ले लिया।
बेटी की पाव रोटी सी फूली गुदाज, नर्म चूत पर हल्की हल्की झांटें थीं और चूत से जैसे रस का झरना सा धीरे धीरे बह रहा था।
मुझसे भी सब्र नहीं हुआ और मैं चोदने की मुद्रा में उसकी टांगों के बीच बैठ गया।
सपना ने तुरन्त अपनी टाँगें उठा कर अपने हाथों में पकड़ लीं, कोठरी के उस अँधेरे में दिख तो कुछ रहा नहीं था, मैंने अंदाज से अपने लंड को उसकी चूत से भिड़ाया और उसकी रसीली दरार में ऊपर से नीचे तक रगड़ने लगा।
‘अब घुसा भी दो जल्दी से… क्यों पागल बना रहे हो मुझे?’ बेटी मिसमिसाती हुई सी बोली।
मैंने उस अँधेरे में बेटी  की चूत का छेद अपनी उंगली से तलाशा और फिर सुपाड़े को की चूत के छेद पर टिकाया और फिर धकेल दिया आगे की तरफ!
चूत की चिकनाई की वजह से सुपारा गप्प से समा गया उसकी चूत में!
‘उई माँ… धीरे से डालो, कितना मोटा लग रहा है यह आपका आज!’ बेटी  थोड़े दर्द भरे स्वर में विचलित होकर बोली।
लेकिन मैंने उसके दर्द की परवाह किये बगैर लंड को थोड़ा और आगे हांक दिया।
‘उफ्फ जानू, आपका यह लण्ड महाराज कितना मोटा लग रहा है आज! मेरी चूत महारानी की नसें खिंच गईं पूरी!’ बेटी  बोली और फिर अपने हाथ चूत पे ले जाकर टटोलने लगी।
अभी मेरा सिर्फ सुपारा और जरा सा और ही घुसा था उसकी चूत में, अभी भी कोई सात आठ अंगुल बाहर था चूत से!
मैं इसी स्थिति में कुछ देर रुका रहा, फिर जब बेटी  की चूत ने मेरा लंड ठीक से एडजस्ट कर लिया तो मैंने लंड को जरा सा पीछे खींच कर एक करार शॉट लगा दिया।
पूरा लंड फचाक से उसकी चूत में समा गया और मेरी झांटें बेटी  की झांटों से जा मिलीं।
‘हाय राम… लगता है फट गई! उफ्फ.. आज पहली बार इतनी चौड़ी कर दी आपने! भीतर की नसें टूट सी गईं हैं।’ बेटी कराहते हुए बोली।
मैं चुपचाप रहा और शांत लेटा रहा उसके ऊपर!
मेरा लंड बेटी  की चूत में फंस सा गया था, जैसे किसी ने ताकत से मुट्ठी में जकड़ रखा हो।
मैंने एक बार लंड को पीछे खींचना चाहा तो लंड के साथ चूत भी खिंचती सी लगी मुझे!
मैं रुक गया, फिर मुझे लगा कि बेटी  अपनी चूत को ढीला और शिथिल करने का प्रयास कर रही थी।
उस रात कोई पच्चीस छब्बीस साल बाद मेरे लंड को कसी हुई जवान चूत नसीब हुई थी। मुझे ठीक वैसा ही अनुभव हो रहा था जैसा कि मेरी शादी की शुरू के दिनों में मेरी पत्नी रानी की चूत देती थी।
कुछ ही देर बाद बेटी  ने गहरी सुख की सांस ली और मेरी पीठ को सहलाते हुए अपनी कमर को हल्के से उचकाया जैसे उलाहना दे रही थी कि अब चोदो भी या ऐसे ही पड़े रहोगे?
बेटी  का संकेत पाकर मैंने लंड को पीछे लिया और फिर से धकेल दिया गहराई तक!
बदले में बेटी  के नाखून मेरी पीठ में गड़ गये और उसने अपनी चूत को उछाल कर जवाबी कार्यवाही की।
फिर तो यह सिलसिला चल पड़ा.. तेज और तेज! मैं लंड को खींच खींच कर फिर फिर उसकी चूत में पेलता और बेटी  पूरी लय ताल के साथ साथ निभाती हुई अपनी कमर उठा उठा के अपनी चूत देती जाती!
जब मैंने अपनी झांटों से बेटी  के भागंकुर को रगड़ना शुरू किया तो जैसे वो उत्तेजना के मारे पगला सी गई और किलकारी मार कर मेरे कंधे में अपने दांत जोर से गड़ा दिए और मेरे बाल अपनी मुट्ठियों में कस लिए और किसी हिस्टीरिया के मरीज की तरह पगला के अपनी चूत उछाल उछाल के मेरा लंड सटासट लीलने लगी अपनी चूत में… और उसकी चूत से रस का झरना सा बहते हुए मेरी झांटों को भिगोने लगा।
मैंने भी अपने धक्कों की स्पीड और बढ़ा दी, अब उस अँधेरी कोठरी में चुदाई की फचफच और बेटी  की कामुक कराहें और किलकारियां गूँज रही थी-
‘राजा, बहुत मज़ा आ रहा आज तो और जोर से करो न …फाड़ डालो इसे आज. ऐसे ही रोज चोदते तो मैं तो अब तक कभी की माँ बन गयी होती। आपकी माँ यानि मेरी सास की भी इच्छा कभी की पूरी हो गयी होती।"
यह सुनते ही मेरे दिमाग ने एक जोर का झटका खाया।
Like Reply
#5
"अरे यह सपना मेरी बेटी क्या कह रही है? कहीं आज मेरी चुदाई से यह गर्भवती न हो जाये।"

फिर मेरे मन ने कहा. शायद भगवान जो करता है वो किसी अच्छे के लिए ही करता है. पता नहीं उसे क्या मंजूर है.
यह सोचते ही मेरा लौड़ा और भी तन गया और अकड़ कर मोटा हो गया.
इधर बेटी  सटासट चलते लंड का मज़ा लेती हुई मुग्ध स्वर में बोली।
"आह आह।  चोद दो जी. चोद दो मुझे। आज तो मजा ही आ गया. आज से आप रोज मुझे इसी तरह दारू पी कर चोदना, फिर देखना मैं इसी महीने पेट से हो जाउंगी। आज तो आपका लौड़ा पहले से दुगना मोटा और लम्बा लग रहा है."
दारू पिए होने के कारण उसे पता नहीं चल पा रहा था कि उसके पति से उसकी चुदाई नहीं हो रही है.
मेरी उत्तेजना भी अब चरम पर थी, मैं झड़ने की कगार पर था, मैंने बेटी  के दोनों मम्मे कस के अपनी मुट्ठियों में जकड़ लिए और पूरी बेरहमी से उसकी चूत चुदाई करने लगा।
बेटी  भी तरह तरह की सेक्सी आवाजें निकालती हुई अपनी चूत मुझे परोसने लगी।
मेरी भोली भाली सौम्य सी लगने वाली बेटी सपना कितनी कामुक और चुदाई में सिद्धहस्त थी मुझे उस रात साक्षात अनुभव हुआ।अपनी चूत को सिकोड़ सिकोड़ के कैसे लंड लेना है उसे बहुत अच्छे से पता था, वो मज़ा लेना जानती थी और मज़ा देना भी जानती थी।
मेरा दामाद सच में भाग्यशाली था जो उसे ऐसी प्यारी बीवी मिली थी।
इसके पहले तो मैं सिर्फ यही जानता था की सपना पढ़ाई में इंटेलिजेंट और खाना बनाने में ही कुशल है बस!
‘जानू, निहाल हो गई आज मैं… ऐसा मज़ा पहले क्यों नहीं दिया आपने? बस चार छः करारे करारे शॉट और लगा दो, मैं आने ही वाली हूँ।’ बेटी  मेरा गाल चूमते हुए बोली।
मैं भी झड़ जाने को बेचैन था, मैंने कुछ आखिरी धक्के बेटी  के मनमाफिक लगा कर उसे अपने सीने से लिपटा लिया और मेरे लंड से वीर्य की पिचकारियाँ निकल निकल के चूत में भरने लगीं।
मेरे झड़ते ही बेटी  ने मुझे कस के पूरी ताकत से भींच लिया और अपनी टाँगें मेरी कमर में लॉक कर दीं। वो भी झड रही थी लगातार और उसका बदन धीरे धीरे कंप कंपा रहा था।
जब बेटी की चूत से स्पंदन आने शुरू हुए तो उस जैसा अलौकिक सुख मुझे शायद ही कभी पत्नी  की चूत ने दिया हो।
बेटी रानी की चूत सिकुड़ सिकुड़ कर मेरे लंड को जकड़ती छोड़ती हुई सी वीर्य की एक एक बूँद निचोड़ रही थी।
बहुत देर तक हम दोनों इसी स्थिति में पड़े रहे, फिर बेटी  ने अपनी टाँगें फैला दीं, मेरा लंड भी झड़ कर ढीला हो सिकुड़ गया फिर चूत ने उसे बाहर धकेल दिया।
उधर बेटी  गहरी गहरी साँसें भरती हुई खुद को संभाल रही थी, वो मुझसे एक बार फिर से लिपटी और मुझे होंठों पर चूम लिया। मैंने उसके मुंह से अपने वीर्य की गंध महसूस की जो संभोग के उपरान्त कुछ ही स्त्रियों के मुंह से आती है।
ऐसा कहीं पढ़ा था मैंने पहले… उस रात यह खुद अनुभव किया।
जल्दी ही बेटी  का बाहुपाश शिथिल होने लगा और वो जम्हाई लेने लगी।
रात के तीन पहर लगभग बीत चुके थे, शायद तीन तो बज ही गये होंगे!
‘जानू, मैं तो सोऊँगी अब… आप भी सो जाओ, सुबह जल्दी उठ कर मेहमानों की चाय बनवाना मेरे जिम्मे है न!’ वो बोली और जल्दी से उसने अपने पूरे कपड़े पहन लिए और मुझसे लिपट कर सोने लगी।
वासना का तूफ़ान निकल जाने के बाद मुझे आत्मग्लानि होने लगी कि ये सब कैसे क्या हो गया!
मन को सांत्वना इस बात की जरूर रही कि मैंने अपनी बेटी  का नग्न शरीर नहीं देखा, उसके स्तन, योनि इत्यादि अंग जिन्हें स्त्रियां हमेशा जतन से छुपा के रखती हैं, उन पर मेरी नज़र नहीं पड़ी।
कोठरी के उस अँधेरे में काम वासना का एक तूफ़ान उठा और चुपचाप से गुजर गया।
बेटी  मुझसे लिपटी हुई किसी अबोध बालिका की तरह मीठी नींद सोने लगी थी। कुछ ही देर में उसकी साँसों के उतार चढ़ाव से मुझे स्पष्ट अनुभव हुआ कि वह थक कर चूर हुई गहरी नींद में सो चुकी थी।
अब मैं क्या करूं?
यह यक्ष प्रश्न भी मुझे बार बार कचोट रहा था और मुझे सपना पर आश्चर्य भी हो रहा था कि कोई स्त्री ऐसी कैसे हो सकती है कि चुद जाए और यह भी न पहचान सके कि चोदने वाला उसका पति ही है या कोई और!!
बहरहाल जो भी हो, जो होना था, वो चुका था।
सपना के गहरी नींद में सो जाने के बाद मैंने उसे धीरे से अपने से छुड़ाया और अपने कपड़े पहन दबे पांव कोठरी से निकल कर नीचे चला गया।
पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था, हर कोई गहरी नींद में था। घड़ी में देखा तो साढ़े तीन हो चुके थे।
बाहर पंडाल लगा था,
मैं चोरों की तरह दबे पांव नीचे उतरा और गद्दों के ढेर में से गद्दा तकिया निकाल मेहमानों के बीच बिछा कर लेट गया। मन में तरह तरह की आशंकाएँ और तनाव था। बेटी  को चोदने के बाद मुझे कोई पछतावा तो नहीं था क्योंकि मैंने वैसा कभी नहीं चाहा था जो कुछ हुआ वो परिस्थितिवश ही हुआ था, हाँ मुझे अफ़सोस जरूर हो रहा था उस बात पर!
सोने के प्रयास में उनींदा सा जाग रहा था, कभी नींद का झोंका सा आता लेकिन नींद उड़ जाती।
रात की चुदाई ने मुझे भरपूर मज़ा दिया था, बेटी  के जवान जिस्म का वो आलिंगन, उसके भरे भरे मुलायम से मम्मे और उसकी वो कचोरी सी फूली हुई नर्म गर्म टाइट चूत और उसका वो कमर उठा उठा के मेरा लंड लीलना सब कुछ मुझमें मादक उत्तेजना फिर से भरने लगा।
लेकिन मैंने उन विचारों से जैसे तैसे ध्यान हटाया और अपने दामाद  शुभम के बारे में सोचने लगा।
मेरा दामाद शुभम कहाँ था? बेटी  के साथ चूत चुदाई का प्रोग्राम फिक्स करने के बाद वो क्यों नहीं गया ऊपर कोठरी में?
इतना मुझे विश्वास था कि शुभम ऊपर कोठरी में नहीं गया था क्योंकि अंधेरी कोठरी में मैंने बिखरे सामन को खिसका के लेटने लायक जगह बनाई थी और वहाँ कोई ऐसा चिह्न नहीं था कि कोई वहाँ गया था!
फिर कहाँ था शुभम?
दूसरा टेंशन मेरे दिमाग में यह था कि बेटी  को क्या सचमुच पता नहीं चल पाया था कि वो किस से चुद गई थी?
और अगर सपना ने शुभम से रात की चुदाई के आनन्द के बारे में बात छेड़ी तो भेद खुल ही जायेगा। तब क्या होगा?
Like Reply
#6
अगर शुभम ही पहले सपना को यह बता दे कि वो किसी कारणवश नहीं मिल पाया था तो सपना भी कुछ नहीं बताने वाली शुभम को!

लेकिन फिर सपना के मन में यह चिंता सताएगी कि उसके पति ने नहीं तो फिर उसे अंधेरे में किसने चोद डाला? और उससे ज्यादा चिन्ता उसे इस बात की हो जायेगी कि चोदने वाला तो उसे पहचानता है कि वो किसे चोद रहा है लेकिन वह चोदने वाले को नहीं पहचान सकी!
आखिर वो चुदाई में इतना बोल जो रही थी. तो चोदने वाले आदमी को तो पता चल ही गया होगा कि उसने सपना की चुदाई करी है.
अब मेहमानों से भरे घर में कई सारे आदमी हैं कौन होगा वो… और अब वो उसे दिन में देख के कैसे मन ही मन खुश हो रहा होगा… वो कैसे सबके सामने आँख  उठा कर चल पाएगी??
इत्यादि इत्यादि…
इन्ही चिंताओं के कारण सो जाना संभव ही नहीं हो पाया, मैं सुबह जल्दी ही पांच बजे उठ गया और नित्य की तरह फ्रेश होकर मोर्निंग वाक को निकल गया।
लौटकर रोज की तरह स्नान ध्यान करते करते सात बज गये, फिर मैंने शुभम की तलाश करने का निश्चय किया कि वो कहाँ था।
तभी मुझे अपनी पत्नी आती दिखाई दी, उसे देखते ही मेरे मन में किसी चोर के जैसा डर लगा, आखिर मुझे ज़िन्दगी में पहली बार अपनी बीवी से बेवफाई करनी पड़ी थी।
‘अरे बेगम साहिबा, कुछ चाय वाय पिलवा दे यार, कब से इंतजार में बैठा हूँ।’ प्रत्यक्षतः मैंने मुस्कुराते हुए चाय की फरमाइश की।
‘चाय सपना बना रही है, अभी लाती ही होगी।’ रानी बोली।
‘अच्छा, और अपने साहबजादे कहाँ हैं? सोकर उठा या नहीं वो?’ मैंने शुभम के बारे में पूछा।
‘अभी नहीं उठा, रात को देर तक सबका पीना पिलाना होता रहा, फिर सब लोग खाना खा के मिश्रा जी के यहाँ सोने चले गये थे, वहीं सो रहा होगा अभी!’ बीवी  बोली।
‘हम्म्म्म…’ तो ये बात थी। शादी में शुभम की उमर के कई रिश्तेदार भी आये थे और ये सब ड्रिंक बियर वगैरह का शौक तो शादी ब्याह में चलता ही रहता है और जिन मिश्रा जी का जिक्र यहाँ हुआ वो मेरे पड़ोसी हैं, उनके यहाँ के दो कमरे हमने खाली करवा लिए थे मेहमानों के लिए!

तो अब तस्वीर कुछ साफ़ हो गई थी कि शुभम ने बेटी सपना से चुदाई का प्रोग्राम तो बनाया लेकिन वो रिश्तेदारों के साथ ड्रिंक पार्टी करने लगा और फिर बगल के मकान में जाकर सो गया।
अब ऐसे में उसका सपना से मिलने जाने का सवाल ही नहीं उठता।
तो क्या सपना को भी पता चल चुका होगा अब तक कि उसका पति अभी तक मिश्रा जी के यहाँ सो रहा है? यह स्वाभाविक सा प्रश्न मेरे भीतर से उठा।
लेकिन मैं निश्चिन्त नहीं हो पाया… पर मन कुछ हल्का हो गया था और स्वस्थ तरीके से सोचने लगा था।
तभी मन में विचार कौंधा कि अगर सपना को यह बात पता लग चुकी है कि शुभम रात में कहीं और सोया था तो उसके चेहरे पर भय और घबराहट झलकनी चाहिए क्योंकि वो अभी अपने चोदने वाले से अनजान है।
यह गुणा भाग दिमाग में आते ही मेरा मन हल्का हो गया; तभी सपना चाय लाती हुई दिखी।
नहाई धोई बेटी  बहुत उजली उजली सी, खिली खिली सी लग रही थी, ज़िन्दगी में पहली बार मैंने उसकी रूपराशि को, उसके मदमस्त यौवन को, उसके उत्तेजक कामुक सौन्दर्य को नज़र भर कर निहारा।
साढ़े पांच फुट की ऊँचाई लिए तना हुआ गोरा गुलाबी जिस्म, गोल मासूम सा मनमोहक चेहरा, भरा भरा निचला होंठ जिससे शहद जैसा रस टपकने को ही था; यही होंठ तो कल मेरे लंड को प्यार से चूम रहे थे, चूस रहे थे।
चटख हरे रंग की साड़ी और मैचिंग ब्लाउज में उसका गोरा गुलाबी तन अलग ही छटा बिखेर रहा था, तिस पर उसके हाथों में रची सुर्ख लाल मेहंदी, कलाई गले कानों में झिलमिलाते सोने के गहनें; उसके ब्लाउज पर उभरे हुए उसके स्तनों के मदमस्त उभार, गले में पड़ा मंगलसूत्र गले के नीचे बनी स्तनों की घाटी में जा छुपा था।
हाथों में चाय की ट्रे थामे वो गजगामिनी अपने कजरारे नयन झुकाये धीरे धीरे मेरी ओर चली आ रही थी, मेरी नज़र रह रह कर उसके वक्ष के उभार निहारती और फिर उसकी जांघों के मध्य जा कर ठहर जाती; वहीं तो उसकी वो टाइट कसी हुई चूत छिपी थी जहाँ अब से कोई पांच छः घंटे पहले मेरा लंड अन्दर बाहर हो रहा था और वो उछल उछल कर उसे फाड़ डालने की जिद कर रही थी।
वो चुदाई याद आते ही मेरे लंड ने कड़क होकर ठुमका सा लगाया उम्म्ह… अहह… हय… याह… जैसे फिर से वही चूत दिलवाने की जिद कर रहा हो।
क्या वो ही आनन्द फिर से मिल सकता है मुझे? औरत जब एक बार किसी परपुरुष से चुद जाए और चरमसुख भोग ले तो दुबारा उसी पुरुष से चुदवाने की चाह उसके मन में हमेशा बनी रहती है,।
और लंड के मुंह से जब एक बार पराई चूत का रस लग जाए तो वो उसी चूत में बार बार डुबकी लगाना चाहता है।
जीवन भर की तपस्या जब एक बार भंग हो ही गई तो अब क्या आदर्शवादी बने रहना? क्यों न नई चूत का मज़ा बार बार लिया जाए! आखिर घर में ही तो है!
ऐसे न जाने कितने कुत्सित कामुक विचार बेटी  का रूप देखते ही मेरे मन में घिर आये।
छीः… कैसे गन्दे ख्याल मेरे मन में आने लगे थे, मैंने उन्हें तुरन्त झटक दिया।
बेटी  के माथे पर पड़ीं चिन्ता की लकीरें भी मैंने देखीं तो मुझे लगा कि वो किसी न किसी टेंशन में जरूर है, हो सकता है उसे रात की चुदाई की बातें याद आते आते कुछ शक हुआ हो, वैसे भी मेरे लंड का आकार प्रकार उसे चकित तो कर ही रहा था। शायद उत्तेजना वश वो मुझे अपना पति ही समझती रही होगी और बाद में स्वस्थ चिन्तन करने पर उसका शक मजबूत हुआ हो?
जो भी कारण रहा हो, पर मुझे वो थोड़ी सी एब्नार्मल / असामान्य लग रही थी।
‘नमस्ते, लीजिये आपकी चाय!’ बेटी हमेशा की तरह आत्मीयता से बोली।
‘सदा खुश रहो सपना बेटा!’ मैंने भी सदा की तरह उसे आशीर्वाद दिया और चाय सिप करने लगा।
जल्दी ही मुझे यह ख्याल आया कि अभी कुछ देर बाद ही सपना को यह बात पता चलनी ही है कि शुभम रात भर कहाँ था, फिर उसके मन मस्तिष्क पर क्या क्या गुजरेगी… उसे तो सारे के सारे पुरुष रिश्तेदार अपने चोदू ही नज़र आयेंगे कि ना जाने पिछली रात को किसका लंड उसकी चूत में आ जा रहा था।
कितना तनाव होगा बेचारी को! वो तो किसी से भी नज़र नहीं मिला पाएगी।
ऐसे विचार आते आते मैं खुद टेंशन में आ गया क्योंकि उस बदहवास हालत में अपनी बेटी  को देखना मुझे कतई गंवारा नहीं था; ऐसे तो बेचारी का न जाने क्या हाल हो जाएगा।
Like Reply
#7
अब जल्द से जल्द मुझे ही कोई निर्णय लेना था तो चाय पीकर मैंने सपना को आवाज लगाई।

‘आई जानू!’ वो बोली और मेरे सामने आ खड़ी हुई।
‘देखो बेटा, जरा शुभम को फोन तो लगा और बुला उसे, कुछ काम है उससे; वो कल रातभर से बगल वाले मिश्रा जी के यहाँ और रिश्तेदारों के साथ सो रहा है।’
मैंने ‘रात भर’ शब्द थोड़ा जोर देकर बोला।
मेरी बात सुनते ही सपना बेटी के चेहरे का रंग उड़ गया और अब वो चिंतित और घबराई सी लगने लगी।
‘अभी बुलाती हूँ।’ वो बोली और तेज तेज क़दमों से चलती हुई दूसरे कमरे में चली गई।
मेरा उद्देश्य पूरा हो गया था। देर सवेर तो उसे यह बात पता चलना ही थी कि उसका पति रात को कहीं और सो रहा था। फिर यह समझने में उसे क्या देर लगती कि वो कल रात किसी और से ही चुद गई है।
मैं दोपहर लंच तक उस पर निगाह रखता रहा, बेटी के चेहरे पर भय, चिन्ता और घबराहट स्पष्ट झलक रही थी, उसकी मनःस्थिति को मैं अच्छे से समझ रहा था, उसे सिर्फ यही चिन्ता सताये जा रही होगी कि इतने सारे रिश्तेदारों में वो कौन था जिससे वो कल रात चुदी थी।
अब उसे यही डर हमेशा सताता रहेगा कि ज़िन्दगी के किस मोड़ पर कोई उसे उस रात की चुदाई याद दिला देगा और कहेगा कि उस रात तेरे साथ वो सब करने वाला मैं ही था।
वो तो यह सुन कर जीते जी मर जायेगी।
बेटी  की ऐसी दशा देखना मेरे लिए भी असह्य हो चला था, अगर उसके यह चिन्ता दूर न हुई तो यह तनाव उसका सुख चैन छीन के उसके जीवन में जहर सा भर देगा।
ये सब बातें विचार करके मैंने सपना को सब कुछ बताने का निश्चय कर लिया।
गलती न मेरी थी न उसकी… जो हुआ वो परिस्थितिवश ही हुआ!
यही सब बातें मैंने उसे बताने समझाने का सोच लिया।
पर वो मेरी अपनी बेटी थी. अब मैं उसे कुछ कहूं भी तो कैसे कहूं। उसने तो दारू पी रखी थी और उसे कुछ पता नहीं चला था कि वो अपने पति की जगह किसी दुसरे से चुद रही है. पर मैं तो उसका अपना बाप था. मुझे तो कुछ शर्म करनी चाहिए थी. मैंने तो जान बूझ कर अपनी ही बेटी को चोद दिया था. मुझे तो शर्म से मर जाना चाहिए था. कितना बेशर्म बाप हूँ मैं.
यह सब सोच कर मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं सपना को यह सब बोल सकूँ। पर उसे बताना भी तो जरुरी था. मुझे कोई रास्ता ढूंढना ही होगा।
लंच के बाद सभी लोग आराम के मूड में आ गये और यहाँ वहाँ लुढ़क गये। फिर मैं भी अपने कमरे में चला गया, वहाँ और कोई भी नहीं था,
मुझे तो नींद नहीं आ रही थी. मैं सोच रहा था कि ठीक है मेरे से गलती हो गयी और मैंने अपनी ही बेटी को चोद दिया, पर बेटी को इतना तो पता चल गया है कि वो ग़लतफ़हमी में अपने पति की जगह किसी दुसरे से चुद गयी. पर वो चोदने वाला कौन है यह सोच सोच कर बेचारी का क्या हाल हो रहा होगा।
मुझे उसे यह बता देना चाहिए कि वो आदमी और कोई नहीं बल्कि मैं यानि उसका पिता ही था.
पर मैं अपनी ही बेटी से यह सब कैसे बोल सकता था. मेरी असलियत जान कर वो मुझसे कितनी नफरत करेगी।
पर बताना भी जरूरी था. करूँ तो क्या करूँ। कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.
मैंने सोचा की एक ढंग हो सकता है.
मैं उस से मिल कर तो यह सब बता नहीं सकता तो क्यों न अपनी बेटी को फ़ोन करके ही बता दूँ.
मुझे लगा कि यह सबसे सही रास्ता होगा।
यह सोच कर मैंने फ़ोन उठाया, पर पता नहीं उस दिन मेरी किस्मत ही खराब थी की फ़ोन में कोई सिग्नल ही नहीं आ रहा था. लगता है कोई नेटवर्क दिक्कत थी.
मैं अपने कमरे में बैठा सोच ही रहा थी, कि मुझे नीचे की मंजिल की बालकनी में अपनी बेटी सपना दिखाई दी. उसके हाथ में भी फ़ोन था शायद वो भी नेटवर्क के कारण बाहर आयी थी, की शायद बाहर कोई सिग्नल मिल जाये। मैं उसे देख सकता था पर उसने अभी मुझे नहीं देखा था.
मुझे एक आईडिया आया. फ़ोन को कान से लगाए हुए ही मैंने जोर से बोलना शुरू किया।
मुझे पक्का यकीन था कि सपना मेरी बात सुन लेगी।
मैंने जोर से बोला जैसे कि मैं अपनी पत्नी सुषमा से बात कर रहा होऊं।
"सुषमा! जानती हो रात क्या हुआ? रात मैंने थोड़ी दारु पी ली थी, मेरा तेरी चुदाई करने का बहुत मन था. मेरा 8 इंच का लौड़ा पूरी तरह से तन कर लोहे की तरह खड़ा था. पर मैं यह भी जानता था कि हमारा शादी वाला घर है. घर में बेटी दामाद आदि भी आये हुए हैं. तो चुदाई का तो कोई चांस नहीं होगा। तुम भी घर के काम में बिजी थी. तो मैंने सोचा कि ऊपर घर के स्टोर वाले कमरे में जा कर लेट जाता हूँ और तुम्हारी चूत की याद में मुठ्ठ ही मार लेता हूँ.तो मैं ऊपर जा कर स्टोर वाले कमरे में लेट गया और मुठ्ठ मारने लगा. पर जानती हो कि क्या हुआ? हुआ ऐसे की मैं अभी मुठ्ठ मार ही रहा था कि अपनी बेटी सपना कमरे में आ गयी."
यह बोलते हुए मैंने तिरछी नजर से खिड़की से अपनी बेटी सपना की तरफ देखा। मैंने देखा कि वो मेरी बात सुन रही थी. मरे स्टोर रूम में मुठ्ठ मारने की बात बोलते ही उसकी आँखें खुल गयी. फिर ज्यों ही मैंने उसके स्टोर में आने के बारे में बोला तो उसकी तो जैसे चीख ही निकल गयी. उसने तुरंत अपना हाथ अपने मुंह पर रख कर अपनी आवाज को रोक लिया और सांस रोके मेरी आगे की बात सुन ने लगी.
मैंने अपनी बात जारी रखते हुए बोलता रहा
"सपना ने भी दारु पी रखी थी. शायद उसने और उसके पति ने भी स्टोर रूम में चुदाई का प्रोग्राम बनाया था. पर उस दिन शुभम दारु के चक्कर में स्टोर में नहीं आ पाया पर सपने ने समझा कि मैं ही शुभम हूँ और वो मेरे कुछ समझ पाने या बोल पाने से पहले नंगी होकर मुझसे लिपट गयी. मैं तो एकदम हैरान ही हो गया कि यह क्या हो गया. सपना तो मेरी अपनी सगी बेटी थी. मैंने सोचा कि मैं बोल कर उसे उसकी ग़लतफहमी के बारे में बता देता हूँ पर तभी उस ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख कर चूसना शुरू कर दिया। मैं चाह कर भी कुछ नहीं बोल पाया। और उसने तुरंत मेरे लौड़े को अपने हाथ में पकड़ लिया और उसे ऊपर नीचे करने लगी.
मेरी तो मति ही मारी गयी थी. समझ नहीं आ रहा था की बेटी को उसकी गलती के बारे में कैसे बोलूं। ताकि उसे भी शर्म ना आये. जब तक मैं कुछ सोच पाता कि इस स्थिति से कैसे बचें तभी सपने ने मेरे लौड़े को अपनी चूत में ले लिया और मेरे ऊपर उछलने लगी. उसने दारु पी रखी थी तो शायद उसे मेरे शुभम न होने का पता नहीं चला. जब तक में उसे रोक पाता मेरा 8 इंच का पूरा लौड़ा उस ने अपनी चूत में ले लिया। मैं भी आखिर एक इंसान हूँ. और तुम तो जानती ही हो कि सपना कितनी सुन्दर है. मैं उसे जोर से रोकने वाला ही था की तभी उस ने एक ऐसी बात कह दी कि मेरा लौड़ा और टाइट हो गया। और मैं खुद को रोक नहीं पाया या समझो कि मैंने रोकना उचित नहीं समझा।"
Like Reply
#8
यह कह कर मैं चुप हो गया और टेढ़ी नजर से बाहर बालकनी में अपनी बेटी सपना को देखने लगा।

सपना तो चुपचाप ऐसे बैठी थी जैसे उसे पत्थर का बना दिया हो. वो हैरान बैठी थी उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे?
अब उसके सामने उसकी रात की चुदाई का राज खुल गया था. वो किसी गैर मर्द से जोरदार ढंग से चुद गयी थी और वो मर्द कोई और नहीं बल्कि उसका अपना सगा बाप ही था. जिसकी गोद में खेल खेल कर वो इतनी बड़ी हुई थी.
पर जब उसने मेरी यह बात सुनी कि "सपना ने कुछ ऐसा बोला की उसके पिता ने उसकी चुदाई करनी ठीक समझी तो वो हैरान हो गयी और मेरी बात ठीक से सुनने के लिए खिड़की के पास आ गयी.
मैं उसकी उत्सुकता बढ़ाने के लिए थोड़ी देर चुप रहा. सपना भी खिड़की से लगी खड़ी रही.
फिर मैंने आगे बोला
"सपना बोली कि ऐसे मोटे लौड़े से उसकी ऐसी चुदाई होती जैसे मैं उसे चोद रहा था तो वो कभी की माँ बन गयी होती और उसकी सास उसकी शादी तुड़वा कर अपने बेटे की दूसरी शादी के बारे में कभी भी ना सोचती।"
मैंने सोचा कि शायद शुभम सपना की अच्छे से चुदाई नहीं कर पाता। और तुम तो जानती हो कि मेरा लौड़ा तो 8 इंच लम्बा और 4 इंच मोटा है. मैंने सोचा कि शायद भगवान् ने खुद ही यह मौका बनाया है ताकि मेरी बेटी मेरे से ही गर्भवती हो जाये। फिर मैंने सोचा कि यदि मैं ही उसे चोद कर बच्चा दे दूँ तो किसी को शक भी नहीं होगा और वैसे भी यदि वो किसी गैर मर्द से चुदवा कर बच्चा पैदा करे तो वो आदमी आगे भी उसे ब्लैकमैल करके चुदाई के लिए मजबूर कर सकता है. और फिर यदि वो बच्चा की शक्ल अपने बाप पर गयी तो सपना की ससुराल में उन्हें शक हो सकता है. और यदि सपना के पेट में मेरा बीज हो तो बच्चे की शक्ल मेरे से भी मिलती हो तो भी कोई चिंता नहीं है. बस यह सोच कर मैं चुप रहा और सपना ने मेरे से चुदवा लिया। वो तो बेचारी जानती भी नहीं कि क्या हुआ है. वो तो मुझे शुभम समझ कर मुझसे ही चुद गयी.."
इतना बोल कर मैं सांस लेने के लिए रुका वो सपना की तरफ देखा तो वो खिड़की से कान लगाए बहुत गौर से मेरी बात सुन रही थी.
इससे उत्साहित हो कर में अपना आईडिया आगे बढ़ाते बोला
"मैं अपनी बेटी कि नजरों में गिरना नहीं चाहता।  रात में जो भी हुआ वो एक हादसा था पर हम चाहें तो उस हादसे से भी अपनी बेटी की जिंदगी में बहार ला सकते हैं।  पर मैं अपनी बेटी के साथ बाप बेटी का ही रिश्ता बनाये रखना चाहता हूँ.रात में तो सपना ने मुझसे चुदवा लिया, पर अक्सर एक बार की चुदाई में बच्चा नहीं ठहरता। सपना शादी के कारण वो लगभग 10 दिन यहाँ हैं. यदि सपना की चुदाई हर रोज मेरे से हो तो पक्का वो ससुराल वापिस जाने तक गर्भवती हो जाएगी और किसी को कोई शक भी नहीं होगा और हमारी बेटी की आगे कि जिंदगी भी सुधर जाएगी। पर पता नहीं है कि वो मेरे यानि अपने पिता से यह रिश्ता बनाना चाहेगी भी या नहीं। मैं ऐसा करूँगा कि आज रात 11.30 बजे मैं अँधेरा करके उसी स्टोर रूम में उसका इन्तजार करूँगा। यदि उसे मंजूर हुआ तो वो आएगी, आगे उसकी जैसी मर्जी। मैं नींद की गोली के दो पत्ते ला कर फ्रिज के ऊपर रख दूंगा, दो गोली खाने के बाद इंसान को सुबह तक ऐसी नींद आएगी की जैसे बेहोश हो. मैं रात में दो गोली तुम्हे दे दूंगा और सपना का इन्तजार करूँगा। देखते हैं भगवान् को क्या मंजूर है."
यह कह कर मैंने फ़ोन काट दिया।
फिर मैंने खिड़की की तरफ देखा तो पाया की सपना मेरे फ़ोन काट देने को देख कर अपने कमरे में चली गयी.
उधर सपना के लिए तो जैसे भूचाल ही आ गया. उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो गया है. वो यह तो जान गयी थी कि वो किसी अनजान आदमी से चुद गयी है पर वो आदमी उसका अपना पिता ही है. यह तो उसके लिए एक भयानक सपने जैसा था.
वो सोच भी नहीं सकती थी कि जिस मर्द ने रात उसकी जिंदगी की सबसे जोरदार चुदाई करी है वो उसके पिता ही है.
और वो पिता भी अभी उसे और चोदना चाहते हैं. उसे समझ नहीं आया कि वो क्या करे.
फिर उसने सोचा कि पिता ने उसकी माँ को बोला है तो क्यों न माँ से ही कुछ पूछे।  यह सोच कर वो नीचे ड्राइंग रूम में माँ के पास आयी,
ज्यों ही सपना ने ड्राइंग रूम में कदम रखा तो देखा कि उसकी माँ के पास तो पड़ोस वाली कुमकुम ऑन्टी बैठी है और उनके पास चाय के दो खली कप रखे थे.
वो हैरान हो गयी कि मम्मी तो पापा से उसकी गलती वाली चुदाई की बात कर रहे थे और इधर मम्मी के पास तो आंटी बैठी है.
उसने हैरानी से पुछा
"आंटी नमस्ते। आप कब आयी?"
तो उसकी मम्मी ने जवाब दिया "अरे सपना बेटी आओ बैठो। तुम्हरी कुमकुम आंटी तो लगभग आधे घंटे से हैं."
सपना और भी हैरान हो गयी क्योंकि मम्मी के पास तो फ़ोन भी नहीं था. उसने बात बनाते हुए कहा
"मम्मी मुझे एक फ़ोन करना है. पर मेरे फ़ोन में सिग्नल नहीं आ रहा. आप अपना फ़ोन देंगे जरा."
तो मम्मी बोली
"बेटी आज तो मेरे फ़ोन में भी सिग्नल नहीं है. वो मेरे कमरे में ही पड़ा है. देख लो शायद अब सिग्नल आ रहा हो.
सपना उठ कर मम्मी के कमरे में गयी. वहां बेड पर उनका फ़ोन पड़ा था. उसमे भी कोई सिग्नल नहीं आ रहा था. मम्मी घरेलू औरत थी. उनके फ़ोन में कोई लॉक नहीं था. सपना ने फ़ोन हिस्ट्री देखी तो पाया कि उनके फ़ोन पर तो सुबह से कोई फ़ोन ही नहीं आया था.
सपना हैरान हो गयी कि तो फिर उसके पापा फ़ोन पर यह सब किसे बोल रहे थे?
अचानक उसके दिमाग में लाइट जली।
ओह तो यह बात है. पापा मम्मी से बात नहीं कर रहे थे बल्कि पापा को मालूम था कि मैं उनकी बात सुन रही हूँ तो वो फ़ोन करने का झूठमूठ बहाना करके मुझे सुना रहे थे.
तभी उसके दिमाग में आया कि तभी पापा बोल रहे थे कि वो मम्मी को भी नींद की गोली दे देंगे। क्योंकि यदि मम्मी इस चाल में शामिल हों तो उन्हें नींद की गोली देने की क्या जरूरत है.
वो समझ गयी की पापा ने उसे ही यह सब कहा है. बेचारी मम्मी को तो कुछ भी मालूम नहीं है.
वो अपने कमरे में आ कर बेड पर लेट गयी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे.
इधर मैं अपने बेड पर लेटा सोच रहा था की अब क्या होगा। मैंने सपना को अपना ऑफर बता दिया है. क्या सपना मेरी बात मानेगी? क्या वो रात में स्टोर में आएगी?
क्या मैं उसे दुबारा से चोद पाउँगा?
Like Reply
#9
यह सब सोच सोच कर मैं परेशान हो गया.

फिर मैं नीचे ड्राइंग रूम में आ गया. कुमकुम जा चुकी थी. मैं अपनी पत्नी के पास आ कर बैठ गया. थोड़ी देर में सपना भी नीचे आ गयी.
अब उसके सामने उसकी रात की चुदाई का राज खुल चूका था. वो मेरे से नजरे नहीं मिला पा रही थी, वो बेहद चुप थी. बेचारी को समझ नहीं आ रहा था की क्या करे और क्या बोले।
मैंने बात तो संभालते हुए सपना को बोला "सपना बेटा! चाय पीने का बहुत मन है. चाय मिलेगी क्या?"
सपना चुपचाप उठ कर किचन में चली गयी और दो कप चाय बना कर ले आयी. मैं उससे चाय ले कर पीने लगा और उस से आराम से बातें करता रहा जैसे कुछ हुआ ही ना हो, सपना चुप थी पर जब मुझे सामान्य रूप से बिहेव करते देखा तो वो भी थोड़ा थोड़ा बोलने लगी और थोड़ी देर में उस की भी घबराहट कम हो गयी.
मेरी बीवी को तो कुछ पता ही नहीं था.
मैं उठ कर बाजार गया और नींद की गोली के दो पत्ते ले आया.एक पत्ता तो मुझे भी चाहिए था न अपनी पत्नी के लिए.उसे भी तो रात में सुलाना था.
जब मेरी बीवी दुसरे कमरे में गयी तो मैंने दूसरा पत्ता आँख बचा कर फ्रिज पर रख दिया। सपना ने उसे देख लिया और शर्म से उस की नजरें झुक गयी. वो तो समझ रही थी की नींद की गोलियां उसके पति के लिए है.
वो मेरे से शर्मा रही थी.
रात तक मैंने ना जाने कितनी बार किसी न किसी बहाने से फ्रिज पर उन गोलियों को चेक किया कि क्या सपना ने वो उठा ली हैं या नहीं।
रात में जब खाना खाने के बाद सपने फ्रिज में पानी की बोतल रखने गयी. उसके थोड़ी देर जब मैंने फिर देखा तो नींद की गोलियों का पत्ता गायब था. सपना ने उसे उठा लिया था. अब मैं सोच रहा था कि क्या सपना मेरा ऑफर कबूल करेगी और रात में आएगी भी या नहीं।
रात में मैंने दूध में दो गोलियां मिला कर अपनी पत्नी को पिला दीं और वो बेचारी खूब गहरी नींद में सो गयी,
मेरे मन में इतना जोश था कि में रात में 11 बजे ही जा कर स्टोर रूम में लेट गया.
मेरा लौड़ा इतना टाइट हो चूका था कि लगता था कि जैसे फट ही जायेगा।
यह ठीक है कि सपना मेरी अपनी सगी बेटी थी और एक बाप होने के कारण मुझे उसके प्रति ऐसे विचार नहीं रखने चाहिए थे, पर भगवान् ने यह जो एक लौड़ा दिया है ना हम आदमियों को, इस साले का अपना ही दिमाग है. यह किसी रिश्ते को नहीं देखता।
देखता है तो बस एक गदराया सा स्त्री शरीर। और एक चूत. और वो मेरी बेटी के पास दुनिया की सबसे सुन्दर चूत थी.
मेरा मन भटक कर कल रात में हुई सपना की चुदाई की ओर चला गया. कितनी कसी हुई चूत थी मेरी बेटी की?
लगता था मेरा लौड़ा तो किसी आग की भट्टी में फंस गया हो. और किसी जोरदार चीज से कस कर पकड़ा हुआ हो. चूत तो इतनी टाइट थी कि क्या बोलूं।
बस यही सोच सोच कर लौड़ा अकड़ा जा रहा था. मैंने उसे बाहर निकल लिया और अपनी अंडरवियर और पजामा उतार कर नीचे फेंक दिया। अब मैं बिलकुल नंगा था. और धीरे धीरे अपने लौड़े को सेहला रहा था.
पर दूसरी तरफ यह भी तो चिंता थी कि बेटी चुदवाने के लिए आएगी भी या नहीं,
इसी उधेड़बुन में काफी टाइम निकल गया. साढ़े ग्यारह भी बज गए पर सपना का कोई नाम निशान भी नहीं था. मेरा मन भुज गया. शायद सपना अपने बाप से चुदवा कर बच्चा लेने को मानसिक तौर पर तैयार नहीं थी. लौड़ा भी बेचारा मायूस हो कर ठंडा हो गया.
मैं फिर भी काफी देर तक सपना की इन्तजार करता रहा.
जब 12 बज गए तो मैं समझ गया कि अब चलना चाहिए। लण्ड महाराज भी उदासी से ठन्डे हो गए थे. मैंने अपना पजामा उठाया और पहनने लगा.
तभी धीरे से स्टोर रूम का दरवाजा खुलने की आवाज़ आयी. कोई अंदर आ रहा था. खुले दरवाजे से मुझे सपना के शरीर की बनावट दिखी।
आखिर मेरी बेटी मुझसे चुदवाने के लिए आ ही गयी थी.
मेरा मन तो ख़ुशी से उछलने लगा. लौड़ा भी जैसे नींद से एकदम जाग गया और उठ कर सपना को .सलामी देने लगा.
सपना ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया और चुपचाप आ कर मेरे पास बेड पर बैठ गयी.
आज वो बहुत शर्मा रही थी. शर्माती भी क्यों न.  अपने  चुदवाने के लिए जो आयी थी.
कल की बात और थी. कल उसे शुभम की गलतफहमी थी कि वो अपने पिता नहीं बल्कि अपने पति से चुदवा रही थी. पर आज बात बिलकुल अलग थी.
आज हम दोनों जानते थे और कोई गलती नहीं थी.
सपना का सारा शरीर कांप रहा था. वो चुपचाप मेरे पास बैठी थी.
मुझे भी कुछ बोलने को नहीं सूझा। बोलता भी तो क्या? वैसे भी एक भर्म का पर्दा रखना था ना.
मेरा मन अब प्रफुल्लित हो गया था और सारी चिन्ताएं मिट गईं थी।
उस नीम अँधेरे में मैंने सपना को उसके जिस्म से उठती परफ्यूम की सुगंध से पहचाना! हाँ वही थी!
वो चुपके से आकर मेरे बगल में लेट गई।
सांसारिक रिश्तों के बंधनों से अलग स्त्री-पुरुष, नर-मादा जिस्मों का मिलन अपनी ही रागिनी छेड़ देता है, प्रकृति के अपने स्वतंत्र नियम हैं, युवा शुभम जानू बहन, पिता पुत्री इत्यादि को इसीलिए एकान्त में एक साथ रहने, सोने को मना किया गया है। उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों में परस्पर खिंचाव होता ही एक दूजे में समा जाने के लिए…
हमारे बीच भी वही हुआ, मेरे स्नेह प्यार का बंधन, आलिंगन बहुत जल्दी काम-पाश में बदलने लगा और अब मेरे बाहुपाश में जकड़ी हुई एक भरपूर जवान नारी देह थी जिसे मैंने कल रात पूर्ण नग्न रूप में भोगा था।
बेटी सपना के जिस्म की उष्णता, उसके गुदाज भरे भरे स्तनों का वो मादक स्पर्श मुझमें वासना की आग भरने लगा जिसके प्रत्युत्तर में मेरे लंड ने फुंफकार कर बेटी के जिस्म में टोहका लगा कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी।
जिसके जवाब में मुझे लगा कि जैसे सपना ने अपना बदन मेरे और नजदीक ला दिया हो!
आखिर अब तो वो जान ही गई थी पिछली रात वो मुझसे ही चुदी थी और उसका तन मन भी जरूर उसी सुख की लालसा फिर से करने लगा होगा।
हालांकि मेरे भीतर से आत्मा का एक क्षीण सा प्रतिवाद उठा, मेरे संस्कारों ने मुझे झिंझोड़ा, चेताया कि यह पाप मार्ग है, अब भी संभल जा लेकिन मन ने अपना ही तर्क दिया कि जब एक बार चोद लिया या चोदना पड़ा तो अब क्या आदर्शवादी बने रहना?
और मैं चाह कर भी सपना को अपने बाहुपाश से मुक्त न कर सका और न सपना ही मुझसे छूटने का कोई प्रयास कर रही थी जबकि मेरा खड़ा लंड उसके पेट पर दस्तक दे ही रहा था और यह भी संभव नहीं था कि वो लंड के स्पर्श से अनजान रही हो! वैसे भी वो आज मुझसे यह जानते हुए कि मैं  हूँ, चुदने  आयी थी, तो फिर चुदाई मैं अब सोचना  क्या?
Like Reply
#10
मैंने उसे जोर से चिपटा लिया और उसके होठों पर होंठ रख दिए. उसने कुछ देर अपने होंठ मुझे चूसने दिए फिर छिटक कर अलग हो गई- 

मैं अपने आप को कैसे रोक पाता।
मैं तो पहले से ही नंगा था. मैंने सपना के कमीज को ऊपर उठा दिया. सपना ने  करते हुए अपनी कमीज निकाल दी.  फिर वो बेड पर लेट गयी.
मैंने धीरे से उसकी सलवार  नाडा खोल  दिया.
सपना ने थोड़ी सी अपनी गांड ऊपर उठा कर मुझे सलवार निकालने का मौका दिया। अब वो भी चुदवाने के लिए बैचैन हो रही थी.
मैंने देर ना करते हुए उसकी सलवार और पैंटी एक साथ ही निकाल कर फेंक दी.
अब हम दोनों बाप बेटी नंगे थे. मैंने एक चुम्बन उसकी जाँघों पर ले ही लिया, फ़िर यौनोत्तेजना वश मैंने उसकी जांघें चाटी। अब मैंने उसके उरोज देखे। वह क्या गोल गोल अमरुद थे। मैंने एक चुम्बन उन पर भी ले लिया।
मैंने धीरे धीरे सपना के मुम्मे मसलने शुरू कर दिए। वो तो मस्त ही हो गई थी। मैंने एक हाथ उसकी पेंटी में भी डाल दिया।
उफ़… छोटी छोटी झांटों से ढकी उसकी बुर तो कमाल की थी, नीम गीली।
मैंने धीरे से एक अंगुली से उसके नर्म नाज़ुक छेद को टटोला।
वो तो चुदाई के नशे में इतनी मस्त थी कि उसे तो तब ध्यान आया जब मैंने गच्च से अपनी अंगुली उसकी बुर के छेद में पूरी घुसा दी।
‘उईई माँ…!!’ उसके मुँह से हौले से निकला- ओह… शुभम  यह क्या कर रहे हो?’
मैं समझ गया की चाहे वो अपने बाप से चुदवाने आयी थी पर आखिर एक बाप बेटी में कुछ शर्म तो होती ही है तो वो मुझे शुभम यानि अपना पति बोल कर एक भरम का पर्दा रख रही थी,
उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखें बोझिल सी थी और उनमें लाल डोरे तैर रहे थे। चाहे कमरे में अंदर था पर अब तक इतनी देर में हमारी आँखें अँधेरे में थोड़ा देख पा रही थी.
मैंने उसे बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूम लिया।
सपना के होंठ और जबान कांप रही थी। उसकी आँखों में एक नई चमक थी। आज से पहले मैंने कभी उसकी आँखों में ऐसी चमक नहीं देखी थी। मैंने फ़िर उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठ चूसने लगा। उसने भी बेतहाशा मुझे चूमना शुरू कर दिया।
मैंने धीरे धीरे उसके स्तन भी मसलने चालू कर दिए।
हम बाप बेटी चाहे थे पर लंड और चूत का रिश्ता तो कुदरत ने बनाया है। लंड और चूत का सिर्फ़ एक ही रिश्ता होता है और वो है चुदाई का। यह तो केवल तथाकथित सभ्य कहे जाने वाले समाज और धर्म के ठेकेदारों का बनाया हुआ ढकोसला है। असल में देखा जाए तो ये सारी कायनात ही इस कामरस में डूबी है जिसे लोग चुदाई कहते हैं।’
अब मैंने अपना हाथ उसकी चूत पर फ़िराना चालू कर दिया। उसने भी मेरे लंड को कस कर हाथ में पकड़ लिया और सहलाने लगी। लंड महाराज तो ठुमके ही लगाने लगे। मैंने जब उसके उरोज दबाये तो उसके मुँह से सीत्कार निकालने लगी।
ओह शुभम जानू कुछ करो ना? पता नहीं मुझे कुछ हो रहा है !’
उत्तेजना के मारे उसका शरीर कांपने लगा था, साँसें तेज होने लगी थी। इस नए अहसास और रोमांच से उसके शरीर के रोएँ खड़े हो गए थे। उसने कस कर मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया।
अब देर करना ठीक नहीं था।  मेरा 7 इंच का लंड 120 डिग्री पर खड़ा था। लोहे की रॉड की तरह बिल्कुल सख्त। उस पर प्री-कम की बूँद ऐसे चमक रही थी जैसे शबनम की बूँद हो या कोई मोती।
मैंने धीरे से सपने का मुंह अपने  झुका दिया  कह रहा होऊं कि  इसे मुँह में लेकर चूसो ना?’
सपना शर्माती सी बोली ‘मुझे शर्म आती है !’
मैं तो दिलो जान से इस अदा पर फ़िदा ही हो गया। उसने अपनी निगाहें झुका ली पर मैंने देखा था कि कनिखयों से वो अभी भी मेरे तप्त लंड को ही देखे जा रही थी बिना पलकें झपकाए।
मैंने उसे अपने पास खींच लिया और उसकी चूत के पास मुंह ले गया  रहा होऊं कि  मैं तुम्हारी बुर को पहले प्यार कर देता हूँ फ़िर तुम इसे प्यार कर लेना !’
 भला अब वो मना कैसे कर सकती थी।
और फ़िर मैंने धीरे से उसकी चूत की तरफ बढ़ा, गहरी नाभि के नीचे हल्का सा उभरा हुआ पेडू और उसके नीचे रेशम से मुलायम छोटे छोटे बाल नजर आने लगे। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगी। मेरा लंड तो सलामी ही बजाने लगा। एक बार तो मुझे लगा कि मैं बिना कुछ किये-धरे ही झड़ जाऊँगा।
उसकी चूत की फांकें तो कमाल की थी। मोटी मोटी संतरे की फांकों की तरह। गुलाबी चट्ट, दोनों आपस में चिपकी हुई। जैसे ही मैंने उसकी जाँघों पर हाथ फ़िराया तो वो सीत्कार करने लगी और अपनी जांघें कस कर भींच ली।
मैं जानता था कि यह उत्तेजना और रोमांच के कारण है। मैंने धीरे से अपनी अंगुली उसकी बुर की फांकों पर फ़िराई। वो तो मस्त ही हो गई। मैंने अपनी अंगुली ऊपर से नीचे और फ़िर नीचे से ऊपर फ़िराई। 3-4 बार ऐसा करने से उसकी जांघें अपने आप चौड़ी होती चली गई। अब मैंने अपने दोनों हाथों से उसकी बुर की दोनों फांकों को चौड़ा किया। एक हल्की सी पुट की आवाज के साथ उसकी चूत की फांकें खुल गई।
आह ! अन्दर से बिल्कुल लाल चुटर ! जैसे किसी पके तरबूज का गूदा हो। मैं अपने आप को कै से रोक पाता। मैंने अपने जलते होंठ उन पर रख दिए।
आह… नमकीन सा स्वाद मेरी जबान पर लगा और मेरी नाक में जवान जिस्म की एक मादक महक भर गई। मैंने अपनी जीभ को थोड़ा सा नुकीला बनाया और उसके छोटे से टींट पर टिका दिया। उसकी तो एक किलकारी ही निकल गई। अब मैंने ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर जीभ फ़िरानी चालू कर दी।
उसने कस कर मेरे सिर के बालों को पकड़ लिया। वो तो सीत्कार पर सीत्कार किये जा रही थी।
बुर के छेद के नीचे उसकी गांड का सुनहरा छेद उसके कामरज से पहले से ही गीला हो चुका था। अब तो वो भी खुलने और बंद होने लगा था।
सपना आह…उन्ह… कर रही थी, ऊईई… मा..आ एक मीठी सी सीत्कार निकल ही गई उसके मुँह से।
अब मैंने उसकी बुर को पूरा मुँह में ले लिया और जोर की चुस्की लगाई। अभी तो मुझे दो मिनट भी नहीं हुए होंगे कि उसका शरीर अकड़ने लगा और उसने अपने पैर ऊपर करके मेरी गदर्न के गिर्द लपेट लिए और मेरे बालों को कस कर पकड़ लिया। इतने में ही उसकी चूत से काम रस की कोई 4-5 बूँदें निकल कर मेरे मुँह में समां गई। आह क्या रसीला स्वाद था। मैंने तो इस रस को पहली बार चखा था। मैं उसे पूरा का पूरा पी गया।
अब उसकी पकड़ कुछ ढीली हो गई थी। पैर अपने आप नीचे आ गए। 2-3 चुस्कियाँ लेने के बाद मैंने उसके एक उरोज को मुँह में ले लिया और चूसना चालू कर दिया।
शायद उसे इन उरोजों को चुसवाना अच्छा नहीं लगा था। उसने मेरा सिर एक और धकेला और झट से मेरे खड़े लंड को अपने मुँह में ले लिया। मैं तो कब से यही चाह रहा था। उसने पहले सुपाड़े पर आई प्रीकम की बूँदें चाटी और फ़िर सुपारे को मुँह में भर कर चूसने लगी जैसे कोई रस भरी कुल्फी हो।
आह.. आज किसी ने पहली बार मेरे लंड को ढंग से मुँह में लिया था। सपना ने तो कमाल ही कर दिया। उसने मेरा लंड पूरा मुँह में भरने की कोशिश की पर भला सात इंच लम्बा लंड उसके छोटे से मुँह में पूरा कैसे जाता।
मैं चित्त लेटा था और वो उकडू सी हुई मेरे लंड को चूसे जा रही थी। मेरी नजर उसकी चूत की फांकों पर दौड़ गई। हल्के हल्के बालों से लदी चूत तो कमाल की थी। मैंने कई ब्ल्यू फ़िल्मों में देखा था कि चूत के अन्दर के होंठों की फांके 1.5 या 2 इंच तक लम्बी होती हैं पर सपना की तो बस छोटी छोटी सी थी, बिल्कुल लाल और गुलाबी रंगत लिए। मेरी पत्नी की तो बिल्कुल काली काली थी।
मैंने सपना की चूत पर हाथ फ़िराना चालू कर दिया। वो तो मस्त हुई मेरे लंड को बिना रुके चूसे जा रही थी। मुझे लगा अगर जल्दी ही मैंने उसे मना नहीं किया तो मेरा पानी उसके मुँह में ही निकल जाएगा और मैं आज की रात बिना चूत मारे ही रह जाऊँगा। जो की सबसे जरूरी काम था. आखिर हम कोई मजे के लिए तो चुदाई नहीं कर रहे थे बल्कि उस के पेट में बच्चा डालने के  उसे माँ बनाने के लिए यह .कर रहे थे .
मैंने उसकी चूत में अपनी अंगुली जोर से डाल दी। वो थोड़ी सी चिहुंकी और मेरे लंड को छोड़ कर एक और लुढ़क गई।
वो चित्त लेट गई थी। अब मैं उसके ऊपर आ गया और उसके होंठों को चूमने लगा।
Like Reply
#11
एक हाथ से उसके उरोज मसलने चालू कर दिए और एक हाथ से उसकी चूत की फांकों को मसलने लगा। उसने भी मेरे लंड को मसलना चालू कर दिया। अब लोहा पूरी तरह गर्म हो चुका था और हथौड़ा मारने का समय आ गया था। मैंने अपने उफनते हुए लंड को उसकी चूत के मुहाने पर रख दिया। अब मैंने उसे अपने बाहों में जकड़ लिया और उसके गाल चूमने लगा, एक हाथ से उसकी कमर पकड़ ली। इतने में मेरे लंड ने एक ठुमका लगाया और वो फ़िसल कर ऊपर खिसक गया।

सपना की हंसी निकल गई।
मैंने दोबारा अपने लंड को उसकी चूत पर सेट किया और उसके कमर पकड़ कर एक जोर का धक्का लगा दिया। मेरा लंड उसके थूक से पूरा गीला हो चुका था और पिछले आधे घंटे से उसकी चूत ने भी बेतहाशा कामरज बहाया था। मेरा आधा लंड उसकी कुंवारी चूत की सील को तोड़ता हुआ अन्दर घुस गया।
इसके साथ ही सपना की एक चीख हवा में गूंज गई। मैंने झट से उसका मुँह दबा दिया नहीं तो उसकी चीख नीचे तक चली जाती।
कोई 2-3 मिनट तक हम बिना कोई हरकत किये ऐसे ही पड़े रहे।
वो नीचे पड़ी कुनमुना रही थी, अपने हाथ पैर पटक रही थी पर मैंने उसकी कमर पकड़ रखी थी इस लिए मेरा लंड बाहर निकालने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था।
चलो अच्छा है, चाहे बेटी को दर्द हुआ था पर अब आगे का रास्ता दोनों के लिए ही साफ़ हो गया है। सपना को इतने मोटे लौड़े से चुदवाने की आदत जो नहीं थी तो उसे बहुत दर्द हो रहा था. पर इस नए स्वाद के आगे यह दर्द भला क्या माने रखता था।
‘ओह… शुभम जानू मैं तो मर गई रे…’ सपना के मुँह से निकला- ओह… बाहर निकालो मैं मर जाऊँगी !’
बेचारी लण्ड के दर्द से तड़प रही थी, पर मुझे पापा कह कर लौड़ा निकालने को भी नहीं बोल सकती थी, तो मुझे शुभम यानि अपने पति के नाम से ही बता रही थी.
मैं थोड़ा फुसफुसाते हुए, ताकि मेरी असली आवाज़ ना निकले, धीरे से शुभम बनते हुए बोला
‘अरे! बस अब जो होना था हो गया है। अब दर्द नहीं बस मजा ही मजा आएगा। तुम डरो नहीं ये दर्द तो बस 2-3 मिनट का और है उसके बाद तो बस जन्नत का ही मजा है !’
‘ओह… नहीं प्लीज… बाहर निका…लो… ओह… या… आ… उन्ह… या’
मैं जानता था उसका दर्द अब कम होने लगा है और उसे भी मजा आने लगा है। मैंने हौले से एक धक्का लगाया तो उसने भी अपनी चूत को अन्दर से सिकोड़ा। मेरा लंड तो निहाल ही हो गया जैसे। अब तो हालत यह थी कि सपना नीचे से धक्के लगा रही थी। अब तो मेरा लंड उसकी चूत में बिना किसी रुकावट अन्दर बाहर हो रहा था। उसके कामरज से सना मेरा लंड तो लाल और गुलाबी सा हो गया था।
‘उईई… मा.. आह… मजा आ रहा है शुभम जानू तेज करो ना.. आह ओर तेज या…’
सपना मस्त हुई बड़बड़ा रही थी।
अब उसने अपने पैर ऊपर उठा कर मेरी कमर के गिर्द लपेट लिए थे। मैंने भी उसका सिर अपने हाथों में पकड़ कर अपने सीने से लगा लिया और धीरे धीरे धक्के लगाने लगा। जैसे ही मैं ऊपर उठता तो वो भी मेरे साथ ही थोड़ी सी ऊपर हो जाती और जब हम दोनों नीचे आते तो पहले उसके नितम्ब गद्दे पर टिकते और फ़िर गच्च से मेरा लंड उसकी चूत की गहराई में समां जाता। वो तो मस्त हुई ‘आह उईई माँ’ ही करती जा रही थी। एक बार उसका शरीर फ़िर अकड़ा और उसकी चूत ने फ़िर पानी छोड़ दिया।
वो झड़ गई थी ! आह…! एक ठंडी सी आनंद की सीत्कार उसके मुँह से निकली तो लगा कि वो पूरी तरह मस्त और संतुष्ट हो गई है।
मैंने अपने धक्के लगाने चालू रखे। हमारी इस चुदाई को कोई 20 मिनट तो हो ही गए थे, अब मुझे लगाने लगा कि मेरा लावा फूटने वाला है,
मैंने अपने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी और फ़िर गर्म गाढ़े रस की ना जाने कितनी पिचकारियाँ निकलती चली गई और उसकी चूत को लबालब भरती चली गई।
उसने मुझे कस कर पकड़ लिया। जैसे वो उस अमृत का एक भी कतरा इधर उधर नहीं जाने देना चाहती थी। मैं झड़ने के बाद भी उसके ऊपर ही लेटा रहा।
मैंने कहीं पढ़ा था कि आदमी को झड़ने के बाद 3-4 मिनट अपना लंड चूत में ही डाले रखना चाहिए इस से उसके लंड को फ़िर से नई ताकत मिल जाती है और चूत में भी दर्द और सूजन नहीं आती।
थोड़ी देर बाद हम उठ कर बैठ गए।
मुझे तो अपनी बेटी की चूत मार कर स्वर्ग का आनंद  आ गया था. सपना चाहे मेरी अपनी बेटी थी पर आखिर थी तो एक औरत ही.
और कहाँ मेरी वो थुलथुल सी मोटी और बेडौल बीवी और कहाँ एक नौजवान लड़की।
इतनी टाइट चूत थी सपना की. मेरा मन उसे छोड़ने का कर ही नहीं रहा था. मन कर रहा थी कि उस के नंगे शरीर को अपने से चिपटा कर सारी रात ऐसे ही गुजार दूँ. मेरा लौड़ा  खड़ा होने लगा था.
सपने उठ कर जाने के के लिए. अपने कपडे उठाने को झुकी. उस के झुकने से उस के चूतड़  ऐसे खुल गए जैसे दरवाजे के पट खुलते हैं. उस के चूतड़ों के बीच से गांड की दरार दिखाई दे रही थी और साथ ही दिख रही थी उसकी वो प्यारी सी गांड। उसकी गांड का छेद बिलकुल गुलाबी था और उसके पास ही सपना की चूत दिख रही थी. जिस में से मेरे वीर्य की बूंदे अभी भी रिस रिस कर नीचे टपक रही थी,
उस प्यारी सी चूत  को देखते ही मेरा लौड़ा फनफनाने लगा.
मैंने सपना का हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया. सपना हैरान हो कर मेरी तरफ देखने लगी.
मैंने धीरे से उस का हाथ अपने तने हुए लौड़े पर रख दिया। सपने इतनी जल्दी मुझे टाइट देख कर हैरान हो गयी. शायद शुभम एक रात में एक ही बार चोद पाता था. जब मैंने उसका हाथ अपने लौड़े पर रखा तो अपने आप उसकी उँगलियाँ मेरे लण्ड पर कस गयी.
मैंने धीरे से फुसफुसाते हुए  पर हाथ फेरते कहा " प्लीज एक राउंड और"
आखिर मैं एक बाप था. ज्यादा बोल नहीं सकता था.
सपना भी मेरी चुदाई से शायद बहुत खुश थी. उसे  एक असली मर्द के लण्ड का मजा आया था जो उसके पति से कहीं अधिक था.
वो बिना बोले चुपचाप मेरे साथ लेट गयी. सपना को दुबारा चुदाई के लिए तैयार देख कर मैंने उसका मुंह अपने लौड़े पर झुका दिया और सपना ने देर न करते हुए मेरे लण्ड को मुंह में ले कर चूसना शुरू कर दिया।
फिर इसके बाद हम बाप बेटी की एक बार फिर से जोरदार चुदाई हुई,
दो बार की जोरदार चुदाई से सपना की चूत जड़ तक मेरे वीर्य से भर गयी थी, अब तक रात के 2 बज गए थे. सपना उठ कर जाने लगी तो मैंने उसे धीरे से अपने आलिंगन में लिया और फिर एक बार उसके कान में फुसफुसा कर कहा "रोज रात 11 बजे:
सपना ने हाँ में सर हिलाया और चली गयी.
मैं भी जा कर अपनी पत्नी के साथ लेट गया.
 
 
 
Like Reply
#12
सुबह सपना बड़ी खुश नजर आ रही थी. होती भी क्यों ना.

आखिर उसकी जोरदार चुदाई हो रही थी, माँ बनने का सपना पूरा हो रहा था और किसी तरह का बदनामी का भी कोई डर नहीं था.
सारा दिन हम दोनों बाप बेटी ऐसे बिहेव करते रहे जैसे कुछ हुआ ही ना हो.
 रोज रात को मैं अपनी पत्नी को नींद की गोली खिला कर स्टोर में आ जाता और 11 बजे सपना मेरे पास आ जाती।
हम दोनों बाप बेटी शुभम का नाम ले ले कर दो राउंड खूब चुदाई करते। सपना समय निकाल कर बीच बीच में अपने पति शुभम से भी चुदवा लेती ताकि उस को बच्चा ठहरने पर कोई शक न हो.
दस दिन मैंने अपनी बेटी की खूब चुदाई करी, अब सपना भी मेरे से खुल चुकी थी, स्टोर रूम के बाहर हम बाप बेटी की तरह ही रहते और बोलते। किसी को कोई शक हो ही नहीं सकता था.
मैंने इन दिनों में उसकी चूत में इतना वीर्य डाला था की शायद शुभम ने  भी नहीं डाला होगा।
इधर शादी हो चुकी थी, आज सपना का आखिरी दिन था, कल वो लोग चले जायेंगे।
कल के बाद में सपना को नहीं चोद पाउँगा,  सोच कर मेरा दिल बैठा जा रहा था.
मैंने उसकी चूत में तो इतनी चुदाई करी थी की निश्चय ही वो गर्भवती हो जाएगी। पर आज आखिरी दिन मेरा मन उसकी गांड मारने को कर रहा था।
पर मैं उसको कैसे कहूं या पूछूं। आज तक तो  देने के नाम पर उसे चोद रहा था. पर गांड मारने को कैसे पूछूं।
आखिर मेरे मन वो वही विचार आया वो पहले दिन वाला।
सपना अपने कमरे में थी, मैंने अपना मोबाइल उठाया, पर सपना को बालकनी में कैसे बुलाऊँ।
मैंने एक पत्थर उठा कर  बालकनी में फेंका। आवाज सुन कर सपना बाहर बालकनी में आयी.
मैंने झट से मौके का फायदा उठाते हुए, मोबाइल में बात करने का एक्टिंग करते हुए जोर से बोला, (ताकि सपना को सुनाई दे जाये)
"सुषमा! (मेरी पत्नी का नाम). मैंने अपनी बेटी को माँ बनाने के लिए पूरी मेहनत की है, मुझे आशा है की मेरी और सपना की तपस्या जरूर सफल होगी। आज हमारा आखिरी रात है चुदाई की. कल वो चली जाएगी। फिर ना जाने दोबारा उसे चोदने का मौका मिले या ना मिले। तो आज की रात को यादगार बनाने के लिए मैं उसकी गांड मारना चाहता हूँ. पर पता नहीं उसे मुझसे गांड मरवाने का मन है भी या नहीं। खैर मैं उसे मजबूर नहीं करना चाहता।  आखिर वो मेरी बेटी है, भगवान करे कुछ ऐसा हो जाये, की मुझे पता लगे कि मेरी बेटी मेरे से गांड मरवाने को राजी है. यदि आज रात को उसने हरे रंग की मैक्सी पहनी तो मैं समझ जाऊँगा की भगवान् चाहते हैं कि  बेटी की गांड मार सकूँ। यदि उसने कोई अलग रंग का कपडा पहना तो में समझ जाऊंगा की मेरी किस्मत में वो नहीं है जो मैं चाहता हूँ. तो मैं फिर रात में उसकी चूत में ही चोदुँगा। बाकी देखते हैं की भगवान् को क्या मंजूर है,"
मैंने खिड़की से देखा तो पाया की सपना मेरी बात सुन कर बहुत हैरान थी, उस का मुंह खुला रह गया था और वो ऐसे बैठी थी जैसे किसी गहरी सोच में डूबी हुई हो.
मैं उस की हालत समझ सकता था. वो आज तक समझ रही थी कि उस का पिता उस की चुदाई इस लिए कर रहा है क्योंकि वो चाहते हैं कि उनकी बेटी गर्भवती हो जाये और अपने ससुराल में खुश रहे. उसका विवाहिक जीवन बचाने के लिए उस के पिता उस की रोज दो दो बार चुदाई कर रहे हैं.
पर यह नई डिमांड से उस को पता चल गया कि उसके पिता को अपनी बेटी चोदने में आनंद भी मिल रहा था.
उसकी चुदाई केवल उसे बच्चा देने के लिए नहीं थी, बल्कि उस में वासना का भी समावेश था.
मेरी यह गांड मारने की इच्छा सिर्फ और सिर्फ वासना की मांग थी क्योंकि इस का उसे गर्भवती करने से कोई सम्बन्ध नहीं था.
अब जो गांड चुदाई होनी थी वो सिर्फ मजे के लिए थी.
इसलिए सपना चुप बैठी सोच रही थी कि यह उसके पापा की कैसी डिमांड है,
सारा दिन घर में सपना मेरे से दूर दूर ही रही. वो बेहद चुप थी, और किसी गहरी सोच में थी. मेरे से कोई बात भी नहीं कर रही थी.
मैं भी घबरा रहा था कि मैंने मजे में यह कैसी मांग रख दी. हम बाप बेटी का रिश्ता सदा के लिए खराब हो सकता था.
पर अब तो तीर कमान से निकल चूका था.
सपना ने नहा कर पीले रंग का सूट पहन लिया। मुझे समझ आ गया कि बात बनी नहीं। मैंने गलत मांग रख दी,
शाम हो गयी, हमने खाना भी खा लिया और अपने कमरों की और सोने जाने वाले थे. मैं बैठा टीवी देख रहा था. कि सपना ने बोला "पापा! आप बैठ कर टीवी देखो मैं जरा नहा कर आती हूँ."
मैं चुप रहा. सपना अपने कमरे में चली गयी. मैं और मेरी बीवी टीवी देखते रहे.
थोड़ी देर बाद सपना नहा कर आयी तो मेरी तो आँखें और मुंह खुला ही रह गया.
सपना ने हरे रंग की मैक्सी पहन रखी थी. मेरा दिल ख़ुशी से इतनी तेज धड़कने लगा कि मुझे डर लगने लगा की कहीं मुझे हार्ट अटैक ही ना आ जाये।
मेरी बीवी बेचारी को तो कुछ पता नहीं था. वो तो चुपचाप टीवी देख रही थी. असली बात तो हम बाप बेटी ही जानते थे.
मेरे चेहरे की ख़ुशी छुपाई नहीं छुप रही थी. सपना मेरी शक्ल देख कर शर्म से दुहरी हुई जा रही थी,
मुझे तो बस ईंतजार था तो 11 बजने का. आज मैं अपनी सगी बेटी की गांड मारने जा रहा था और वो भी उसकी रजामंदी से.
बस किसी तरह रात के 11 बजा और में अपनी पत्नी को नींद की दो गोली खिला कर स्टोर रूम में जा कर लेट गया। हम सदा स्टोर रूम में अँधेरा ही रखते थे. आखिर हम बाप बेटी थे. और समाज के भी कुछ कायदे कानून होते है.
थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और मेरी प्यारी बेटी सपना वही हरी मैक्सी पहने हुए अंदर आयी.
मेरा लौड़ा तो ख़ुशी के मारे ना जाने कब से उछल रहा था.
सपना आ कर मेरे पास बैठ गयी.
मेरा दिल इतनी जोर से धड़कने लगा की जैसे मेरा तो हार्ट अटैक ही आ जायेगा.
मेरी बेटी जिसने एक ढीला सी हरी मैक्सी पहन रखी थी मेरे पास गांड मरवाने आयी थी.
कमरे में खिड़की से बाहर से थोड़ी रौशनी आ रही थी जिस से सब कुछ धुंधला धुंधला सा  दिखाई दे रहा था.
बेटी ने मेरी तरफ देखा . मैं भी अपलक बेटी की तरफ ही देख रहा था.
Like Reply
#13
मैं बेटी की ओर देख रहा था मैने अपनी आँखें अपनी बेटी की आँखों की तरफ की और उनकी आँखों में देखा.

बेटी की आँखों में बेइंतेहा शर्मा की लाली थी. सपना ने शर्म से अपनी आँखें झुका ली. वो मेरी ओर ज्यादा देर तक न देख सकी.
मैं सपना को देखते हुए मुस्कुरा रहा था. और वो बहुत ही शर्मा रही थी.
मैंने फटाफट पीछे को हो कर सपना के लेटने के लिए जगह बनाई।
खाली जगह में सपना मेरे साथ लेट गयी.
मेरा दिल धड़क रहा था.
बेटी बिलकुल मेरे साथ ही लेटी थी. हमारे शरीरों के बीच में मुश्किल से 4 इंच का फासला था.
सपना का दिल भी इतने जोर से धड़क रहा था कि उनके दिल के धड़कने की आवाज मुझे साफ सुनाई दे रही थी. शायद मेरे तेज तेज धड़कते दिल की आवाज मेरी बेटी को भी सुनाई दे रही हो.
यह हमारे जीवन का एक बहुत ही नाजुक और महत्वपूर्ण क्षण था. उसकी गालें शर्म से लाल हो रही थी. शर्म से उससे कुछ कहा नहीं जा रहा था. बस उसने  आगे बढ़ कर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और उन्हें चूमने लगी.
मैंने भी अपने होंठ खोल दिए और सपना के होंठों को अपने होंठों के बीच दबा कर चूसने लगा.
सपना ने शर्म से अपना चेहरा मेरी छाती में छुपा लिया और मुझसे चिपकते हुए धीरे से अपना हाथ नीचे ले जा कर मेरी लुंगी में डाल दिया और मेरे तने हुए लौड़े को अपने हाथ में पकड़ लिया और मेरे लौड़े को अपने हाथ से आगे पीछे करते हुए, जैसे वो मेरा मुठ मार रही हो, मेरे लौड़े को जोर से दबा दिया. कि मेरी तो जैसे चीख ही निकल गयी.
सपना अब मेरे लौड़े पर अपने हाथ को तेज तेज आगे पीछे करते हुए मेरे लण्ड को प्यार से सहला रही थी.
मैंने अपना हाथ नीचे ले जा कर सपना की मैक्सी मैं घुसेड़ दिया. उसने कोई पैंटी नहीं पहनी थी. मेरा हाथ सीधा सपना की चूत पर पहुंच गया.
बेटी की चूत जिस पर कल तक झांटों का पूरा जंगल ऊगा हुआ था. अब बिलकुल क्लीन शेव थी. लगता था बेटी अपनी आखिरी चूत चुदाई और पहली गांड मरवाई के लिए झांटे साफ करके पूरी तयारी करके आयी थी.
मैंने बेटी की फूली हुई चूत को अपनी मुठी में भर लिया और उसे मुट्ठी में मसलने लगा.
सपना मेरे से लिपट गयी, पर उसने हाथ में पकड़ा हुआ मेरा लौड़ा नहीं छोड़ा और उसे धीरे धीरे मुठियाती रही. शायद बेटी को एक असली लौड़ा पकड़ने का मौका मिला था तो वो लण्ड को छोड़ना नहीं चाहती थी. मैंने भी बेटी की चूत को अपने हाथ में भरे रखा और धीरे से एक ऊँगली बेटी की चूत, जो की अब उसके बह रहे काम रस से गीली हो गयी थी, में घुसेड़ दी.
सपना ने एक आह की आवाज करी पर मेरी ऊँगली को अपनी चूत में से निकलने की कोशिश भी न करी . बल्कि आगे को खिसक कर ऊँगली को और पूरा अंदर तक लेने की कोशिश की।
मैं बहुत खुश था. मेरा मन ख़ुशी से झूम उठा.
मैंने बेटी को अपने से चिपकाया और अपनी ऊँगली को बेटी की चूत में आगे को धकेल कर पूरी तरह से उन की चूत में घुसा दिया।
मैं समझ गया की बेटी की वासना अब बहुत बढ़ गयी है और वो चुदवाने के लिए पूरी तैयार है.
वो  प्यार से मेरे से चिपक गयी पर इस सब में उसने मेरा लौड़ा अपने हाथ से न छोड़ा और उसे प्यार से सहलाती रही. बेटी को एक इतना मोटा  हाड़ मांस का लौड़ा हाथ में आया था. लगता था की सपना उसे मन भर के प्यार किये बिना नहीं छोड़ेगी.
मैंने उसके चेहरे के भावों को पढ़ते हुए महसूस किया कि वो कुछ ज्यादा ही गर्म होने लगी थी। उसके आँखों में लाल डोरे साफ़ दिखाई दे रहे थे। उसके होंठ कुछ कंपने से लगे थे.
मैंने थोड़ा हौले से फुसफुसाते हुए बोला- "वाह .. क्या महक है  तुम्हारी  चूत की.. इसे मैं हमेशा अपने जीवन में याद रखूँगा.. आई लव यू  "..
तो वो भी मन ही मन में मचल उठी और वो बोली- शुभम! (वो हमारा बाप बेटी का पर्दा रखते हुए और नाटक करते  हुए बोल रही थी ) मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो न.."
मैं बोला- ऐसा नहीं है.. फिर मैंने उसकी चूत को अपनी गदेली में भरते हुए कामुकता भरे अंदाज में एक और ऊँगली उसकी चूत में डाल दी।
मेरी इस हरकत से वो कुछ मदहोश सी हो गई और उसके मुख से 'आआ.. आआआह..' रूपी एक मादक सिसकारी निकल पड़ी।
मैंने उसकी चूत पर से हाथ हटा लिया इससे वो और बेहाल हो गई.. लेकिन वो ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती थी कि मैं उसकी चूत को छोड़ दूँ..
लेकिन स्त्री-धर्म.. लाज-धर्म पर चलता है.. इसलिए उस समय वो मुझसे कुछ कह न सकी और मुझसे धीरे से बोली- पतिदेव! .. क्या इतनी अच्छी खुश्बू आती है मेरी चू... से..
ये कहती हुई वो 'सॉरी' बोली.. तो मैं तपाक से बोला- " शर्माओ नहीं और खुल कर बोलो. चूत को चूत ही केहते है तो इसमें शर्माना क्या. सेंटेंस पूरा करो.. और वैसे भी अब..  तो अपनी बात खुल कर कहो।
तो बोली- नहीं.. फिर कभी..
शायद वो वासना के नशे में कुछ ज्यादा ही अंधी हो चली थी.. क्योंकि उसके चूचे अब मेरी छाती पर रगड़ खा रहे थे और वो मुझे अपनी बाँहों में जकड़े हुए थी। उसके सीने की धड़कन बता रही थी कि उसे अब क्या चाहिए था।
तो मैंने उसे छेड़ते हुए कहा- तो क्या कहा था.. अब बोल भी दो?
तो वो बोली- क्या मेरी चूत की सुगंध वाकयी में इतनी अच्छी है...
तो मैंने बोला- हाँ मेरी जान.. सच में ये बहुत ही अच्छी है।
Like Reply
#14
मुझे लग रहा था की बेटी अपनी चूत चटवाना चाहती है. पर शायद शर्मा रही है. या तो ये खुद ही मेरे साथ खेल कर रही है.. ताकि मैं ही अपनी तरफ से पहल करूँ।

एक जवान लड़की की चूत और एक जवान लड़के के लिंग में कितनी शक्ति होती है। दोनों में ही अपनी-अपनी अलग खुशबू होती है.. जो एक-दूसरे को दीवाना बना देती है।
मैं  देरी ना करते हुए बिस्तर से उठा,   अब बेटी बेटे का वासना का खेल शुरू होने ही वाला था. बेटी अभी भी थोड़ा शर्मा रही थी. पर मैंने घुटनों के बल बैठकर उसकी मुलायम चिकनी जांघों को अपने हाथों से पकड़ कर खोल दिया.. ताकि उसकी चूत ठीक से देख सकूँ।
मैंने उसकी चूत को दो उँगलियों से ऐसे खोला जैसे मोबाइल में फोटो ज़ूम करते हैं.
सपना के मुंह से आह निकल गयी. उसकी चूत अंदर से बिलकुल गुलाबी थी.
मैंने जैसे ही उसकी चूत का दीदार किया तो मुझे तो ऐसा लगा.. जैसे मैं जन्नत में पहुँच गया हूँ.. उसकी चूत बहुत ही प्यारी और कोमल सी दिख रही थी..
मेरी तो जैसे साँसें थम सी गई थीं.
उसकी चूत बिल्कुल कसी हुई थी.. कुछ फूली-फूली सी.. और उसके बीच में एक महीन सी दरार थी.. जो कि उसके छेद को काफ़ी संकरा किए हुए थी।
इतनी प्यारी संरचना को देखकर मैं तो मंत्रमुग्ध हो गया था.. जिससे मुझे कुछ होश ही नहीं था कि मैं कहाँ हूँ.. कैसा हूँ।
खैर.. जब मैं उसकी चूत को टकटकी लगाए कुछ देर यूँ ही देखता रहा.. तो उसने मेरे हाथ पर एक छोटी सी चिकोटी काटी.. जो कि उसकी जाँघ को मजबूती से कसे हुए था।
तो मेरा ध्यान उसकी चूत से टूटा और मैंने 'आउच..' बोलते हुए उसकी ओर देखा.. उसकी नजरों में लाज के साथ-साथ एक अजीब सी चमक भी दिख रही थी।
ऐसी नजरों को कुछ ज्ञानी बंधु.. वासना की लहर की संज्ञा भी देते हैं।
मैं उसकी चूत की कसावट को देखते सोच रहा था .. इसे चाट कर सूँघूं या सूंघ कर चाटूं."।
बेटी तो वासना में जली जा रही थी. वो मेरे लौड़े को पकड़ कर बोली " शुभम!  जो भी करना.. जल्दी करो.".
मैंने तुरंत ही उसके नितंबों को पकड़ कर बिस्तर के आगे की ओर खींचा ताकि उसकी चूत पर मुँह आराम से लगा सकूँ।
फिर मैंने बिना देर किए हुए उसे बिस्तर के किनारे लाया और सीधा उसकी चूत पर मुँह लगा कर उसके दाने को अपनी जुबान से छेड़ने लगा.. जिससे उसके मुँह से मादक सिसकारियाँ फूट पड़ीं- ओह्ह..शिइई..
मैंने जब उसकी ओर देखा तो वो अपने चेहरे को अपने दोनों हाथों से ढके हुए थी.. पर जब उसने अपनी चूत पर मेरा मुँह नहीं महसूस किया.. तो अपनी आँख खोल कर मुझसे बोली- "शुभम! जल्दी से चाटो ना. .. मुझे बहुत अच्छा लगा.. मुझे नहीं पता था कि इसमें इतना मज़ा आता है।"
तो मैं मन ही मन बोला- "परेशान मत हो... अभी तो खेल शुरू हुआ है.. देखती जाओ.. मैं क्या-क्या और कितना मजा देता हूँ। वैसे आज तो तुम्हारी गांड मारनी है."
वो बोली- शुभम!  मैं चाहती हूँ.. कि जो मज़ा तुम मुझे दे रहे हो.. वो मैं भी दूँ.. क्या ये एक साथ हो सकता है? मेरा मतलब तुम मेरी चूत को मुँह से प्यार करो और मैं तुम्हारे हथिआर को अपने मुँह से प्यार करूँ।
मैंने अपनी ख़ुशी दबाते हुएअपना शरीर गुमा कर उसके मुंह के पास अपना लौड़ा कर दिया।
वो शर्मा कर बोली- ठीक है.. चलो अब जल्दी से अपना ल..लण्ड मेरे मुँह में डालो और अपना मुँह मेरी च..चूत पर लगाओ.. अब मुझसे और इंतज़ार नहीं हो सकता।
लण्ड-चूत कहने में वो कुछ हिचक रही थी.. बेचारी.. सच में एक बेटी के लिए यह बहुत मुश्किल है की अपने ही पिता  के साथ सेक्स करना और फिर इस तरह खुले तौर से गुप्त अंगों के नाम लेना। पर अब यह सब तो करना ही था.
खैर.. मैंने उसे बिस्तर पर सही से लिटाया और हम 69 अवस्था में लेट गए। यह देख कर उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और बेटी खुश होते हुए बोली- "शुभम!  वाकयी में तुम स्मार्ट के साथ-साथ होशियार भी हो.. क्या जुगाड़ निकाला है.".
बेटी खुश हो गयी।
मैं तुरंत ही उसकी चूत के दाने को अपनी जुबान से छेड़ने लगा और वो मेरे लण्ड को पकड़ कर खेलने लगी और थोड़ी ही देर में उसने अपनी नरम जुबान मेरे लौड़े पर रखकर सुपाड़े को चाटने लगी.. जिससे मुझे असीम आनन्द की प्राप्ति होने लगी। बेटी मेरे लण्ड के सुपाडे को ऐसे चूस और चाट रही थी जैसे वो लण्ड न हो कर कोई आइसक्रीम हो. सपना को  इक हाड मांस का लौड़ा मुँह में लेने का मौका मिला था तो बेटी उस का पूरा फ़ायदा उठाने जा रही थी.
उसकी गीली जुबान की हरकत से मेरे अन्दर ऐसा वासना का सैलाब उमड़ा.. जिसे मैं शब्द देने में असमर्थ हूँ.. फिर मैंने भी प्रतिउत्तर में उसके दाने को अपने मुँह में भर-भर कर चूसना चालू कर दिया.. जिससे उसके मुँह से 'अह्ह्ह ह्ह.. हाआआह... आआआ..' की आवाज स्वतः ही निकलने लगी।
उसके शरीर में एक अजीब सा कम्पन हो रहा था.. जिसे मैं महसूस करने लगा।
चूत चुसवाने के थोड़ी ही देर में वो अपनी टाँगें खुद ही फ़ैलाने लगी और अपने चूतड़ों को उठा कर मेरे मुँह पर रगड़ने लगी।
अब मुझे एहसास हो गया कि बेटी को इस क्रिया में असीम आनन्द की प्राप्ति हो रही है। फिर मैंने उसके जोश को और बढ़ाने के लिए अपनी उँगलियों के माध्यम से उसकी चूत की दरार को थोड़ा फैलाया और देखता ही रह गया.. चूत के अन्दर का बिलकुल ऐसा नज़ारा था.. जैसे किसी ने तरबूज पर हल्का सा चीरा लगा कर फैलाया हो.. उसकी चूत से रिस रहा पानी उसकी और शोभा बढ़ा रहा था।
मैंने बिना कुछ सोचे अपनी जुबान उसकी दरार में डाल दी.. और उसे चाटने लगा।
Like Reply
#15
जिससे उत्तेजित होकर बेटी ने भी मेरे लण्ड के शिश्न-मुण्ड को और अन्दर ले कर चूसते हुए 'ओह.. शिइ... इइइइ.. शीईईई..' की सीत्कार के साथ 'अह्ह्ह.. अह्ह्ह्ह ह्ह..' करने लगी।

तो मैंने वक्त की नज़ाकत देखते हुए अपनी एक ऊँगली उसकी चूत के छेद में घुसेड़ दी.. जिससे उसकी एक और दर्द भरी 'आह्ह्ह्ह ह्ह..' छूट गई और दर्द से तड़पते हुए बोली (वो अभी भी हमारा बाप बेटी का भरम रखते हुए मुझे शुभम यानि अपने पति के नाम से ही बुला रही थी ताकि वो यह दिखा सके कि वो तो अपने पति से सेक्स कर रही है) - "शुभम! ..तुम्हारी ऊँगली मेरे अंदर लग रही है ये.. क्या कर दिया.. अब तो अन्दर जलन सी होने लगी है.".
मैंने बोला- बस थोड़ा रुको.. अभी सही किए देता हूँ।
फिर मैंने उंगली बाहर निकाली और उसकी चूत पर थूक लगाकर.. उसके छेद को चूसते हुए.. धीरे धीरे फिर से ऊँगली को अंदर करने लगा... जिससे उसका दर्द अपने आप ही ठीक होने लगा।
'अह्ह्ह्ह.. अह्ह्ह ह्ह्ह्ह.. शिइइ... शहअह...' की ध्वनि उसके मुँह से निकलने लगी।
सच में उस समय मेरी थूक ने उसके साथ बिल्कुल एंटी बायोटिक वाला काम किया और जब वो मस्ति के फिर से मेरा लण्ड चूसने लगी.. तो मैंने अपनी दूसरी ऊँगली भी अब बेटी की चूत में डाल दी।
इस बार वो थोड़ा कसमसाई तो.. पर कुछ बोली नहीं.. शायद वो और आगे का मज़ा लेना चाहती थी.. या फिर उसे दोबारा में दर्द कम हुआ होगा।
अब मैंने धीरे-धीरे उसकी चूत में उंगली करते हुए उसके दाने को अपनी जुबान से छेड़ने और मुँह से चूसने लगा। मेरी इस हरकत से उसने भी जोश में आकर मेरे लौड़े को अपने मुँह में और अन्दर ले जाते हुए तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगी।
उसके शरीर में हो रहे कम्पन को महसूस करते हुए मैं समझ गया कि अब बेटी झड़ने वाली है.. यही सही मौका है उंगली की स्पीड तेज कर दो..  ये विचार आते ही मेरा भी जोश बढ़ गया और मैं एक सधे हुए खिलाड़ी की तरह उसकी चूत में तेजी से उंगली अन्दर-बाहर करने लगा।
अब बेटी के मुँह से भी 'गु.. गगगग गु.. आह्ह..' की आवाज़ निकलने लगी.. क्योंकि वो भी मेरा लौड़ा फुल मस्ती में चूस रही थी.. जैसे सारा आज ही रस चूस-चूस कर खत्म कर देगी।
मैंने तुरंत ही अपनी उंगली अन्दर-बाहर करते हुए अचानक से पूरी बाहर निकाली और दोबारा तुरंत ही दो उँगलियों को मिलाकर एक ही बार में घुसेड़ दी..
बेटी को शायद थोड़ा दर्द हुआ, जिससे उसके दांत मेरे लौड़े पर भी गड़ गए और उसके साथ-साथ मेरे भी मुँह से भी 'अह्ह ह्ह्ह्ह..' की चीख निकल गई।
सच कहूँ, हम दोनों को इसमें बहुत मज़ा आया था।
आज भी  इस बात को याद करते ही मैं एक्साइटेड हो जाता हूँ.  मेरा लौड़ा तन कर आसमान छूने लगता है और उसकी चूत कामरस की धार छोड़ने लगती है।
खैर.. जब उसका दर्द कुछ कम हुआ तो फिर से वो लण्ड को चचोर-चचोर कर चूसने लगी और अपनी टांगों को मेरे सर पर बांधते हुए कसने लगी।
वो मेरे लौड़े को बुरी तरह चूसते हुए 'अह्ह्ह्ह ह्ह्ह्ह्ह ह्ह्ह..' के साथ ही झड़ गई। बेटी का पूरा शरीर कांप रहा था, और उसकी चूत से कम्पन मेरी जीभ पर भी अनुभव हो रहा था। बेटी की चूत से उसके काम रस का बाहर आ रहा था जिसे मैं फटाफट चाट रहा था ताकि बेटी के रस का एक भी कटरा बाहर न रह जाये. अपने बेटे से चूत चटवाने का बेटी का यह पहला अनुभव था..
मैंने इस तरह उसके रस को पूरा चाट लिया और छोड़ता भी कैसे.. आखिर मेरी मेहनत का फल था। और आप तो जानते ही हो की मेहनत का फल मीठा होता है। सचमुच बेटी की चूत का रस बहुत मीठा था.
उसकी तेज़ चलती सांसें.. मेरे लौड़े पर ऐसे लग रही थीं.. जैसे मेरे लौड़े में नई जान डाल रही हो.. और मैं भी पूरी मस्ती में उसकी बुर को चाट कर साफ करने लगा।
जब उसकी सांसें थोड़ा सधी.. तो वो एक लम्बी कराह 'अह्ह्ह ह्ह्ह्ह..' के साथ लेट गयी.
उसने बिना कुछ बोले- मेरे लण्ड को पकड़ा और दबा कर  मेरे लौड़े को पकड़ कर अपने मुँह में डालकर चूसने लगी।
बीच-बीच में वो अपनी नशीली आँखों से मुझे देख भी लेती थी.. जिससे मुझे भी जोश आने लगा।
और यह क्या.. तभी उसकी बालों की लटें उसके चेहरे को सताने लगी.. जिसे वो अपने हाथों से हटा देती।
तो मैंने खुद ही उसके सर के पीछे हाथ ले जाकर उसके बालों को एक हाथ से पकड़ लिया।
हाय.. क्या सेक्सी सीन लग रहा था.. ओह माय गॉड.. एक सुन्दर परी सी अप्सरा जैसी मेरी बेटी मेरे लण्ड के अधीन हो कर..आपका लण्ड चूसे.. तो आपको कैसा लगे.. बिलकुल मुझे भी ऐसा ही लग रहा था।
फिर मैंने दूसरे हाथ से उसकी ठोड़ी को ऊपर उठाकर उसकी आँखों में झांकते हुए.. उसके मुँह में धक्के देने लगा.. जिससे उसके मुँह से 'उम्म्म.. उम्म्म्म.. गगग.. गूँ.. गूँ..' की आवाजें आने लगीं।
इस तरह कुछ देर और चूसने से मेरा भी काम होने के पास आने लगा. मुझे मालूम था की किसी भी टाइम मेरा माल निकल सकता है तो मैंने बेटी को मुह को जोर जोर से चोदना शुरू कर दिया. फिर एक जोर की आअह्ह के साथ मेरा माल उसके मुँह में ही छूट गया और वो बिना किसी रुकावट के सारा का सारा माल गटक गई।
Like Reply
#16
हम दोनों बाप बेटी  अपने सेक्स से बहुत थक गए थे तो हम दोनों एक दुसरे के साथ लेट गए। हम दोनों ही बिलकुल नंगे थे.

तो मैं फुसफुसाते हुए  बोला- "तुम्हे मेरा  चूत को चूसना और चाटना कैसा लगा.?"
तो वो बोली- जैसे तुम अच्छे से बिना दांत गड़ाए मेरी चूत को अपने मुँह में भर भर कर चूस रहे थे तो मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, ऐसा लग रहा था कि तुम बस चूसते ही रहो... मुझे सच में बहुत अच्छा लगा और तुम्हारी उँगलियों ने तो कमाल कर दिया, जैसे तुमने अपनी उंगली नहीं बल्कि मेरे अंदर नई जान डाल दी हो! ठीक वैसे ही मैंने भी सोचा कि क्यों न तुम्हें भी तुम्हारी तरह मज़ा दिया जाये! बस मैंने तुम्हारी नक़ल करके वैसे ही किया और मुझे पता है कि तुम्हें भी बहुत मज़ा आया... पर तुमने मेरी हालत ही बिगाड़ दी थी, मेरी तो सांस ही फूल गई थी। तुम्हारा लौड़ा बहुत मोटा है.इसलिए मुझे उसे मुँह में लेने में समस्या हो रही थी। पर कोई बात नहीं। धीरे धीरे आदत हो जाएगी। अगली बार तुम्हे अधिक मजा आएगा. असली चीज है की तुम्हारी जीभ भी बहुत लम्बी है. तुमने तो मुझे स्वर्ग में ही पहुंचा दिया. तुम्हारी जीभ लम्बी होने के कारण इतनी अंदर तक जा रही थी की आज तक कभी इतने आगे तक चुसाई नहीं हुई. यह मेरे लिए एक बहुत ही अलग अनुभव था। मैं तो आज बहुत खुश हूँ. क्योंकि तुमने मुझे इतनी मज़ा दिया था जिसे मैं अपने जीवन में कभी नहीं भुला सकती!
अब मैं उसके होंठों को अपने होंठों में दबा कर उसके होंठों का रसपान करने लगा और वो भी मेरा पूर्ण सहयोग देते हुए मेरे निचले होंठ को पागलों की तरह बेतहाशा चूसे जा रही थी, मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे कि मैं जन्नत में हूँ,
सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात तो यह थी एक अब बेटी की शर्म पूरी तरह दूर हो चुकी थी और वो चूत लण्ड जैसे शब्द खुल कर बोल रही थी और पूरा मजा ले रही थी.
"....ओह्ह्ह्हह...ओह...." बेटी के होंठ धीरे धीरे बुदबुदा रहे थे.
होंठ को अच्छी तरह चूमने के पश्चात मैं जल्द ही अपनी बेटी के स्तन पर पहुँच गया.
यहाँ पर अभी भी बेटी के हाथ थे. मेरा चेहरा जैसे ही बेटी के स्तन के ऊपर रखे हाथों से टकराता है तो वो अपने हाथ हटा लेती है और मुझे अपने स्तन चूमने देती है. मैं फिर से बेटी के निप्पल बदल बदल कर चूस रहा था. बेटी मेरे बालों में उँगलियाँ घुमा रही थी.
अपनी चूत चटवाई के उस जबरदस्त सख्लन के पश्चात बिलकुल सुस्त पड चुकी बेटी अब अपने जिस्म में कुछ हरकत महसूस कर रही थी.
न जाने कितने सालो के बाद बेटी ने यह परम संतुष्टी प्राप्त की थी इतना मजा बेटी को पहली बार मिल रहा था इस आनंद को तो वह भूल ही चुकी थी मगर इतने सालों बाद उनके पिता ने यह सुख उसे दिया.
निप्पलों को चूसते चूसते मैंने अपनी नज़र अपनी बेटी पर डाली जो मेरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए मुझे बेहद प्यार, स्नेह और ममतामई नज़र से देख रही थी.
हम दोनों बाप बेटी की नज़रें मिलती हैं और मैं आगे अपनी बेटी के चेहरे की और बढ़ता हु.
बेटी भी मेरा चेहरा अपने हाथों में थाम अपने मुंह पर खींचती है. मेरा चेहरा सीधा अपनी बेटी के चेहरे पर झुक जाता है
और हम दोनों के होंठ आपस में जुड़ जाते हैं. दोनों प्रेमियों की तरह एक दुसरे को चूम रहे थे. कभी बेटी मेरे तो कभी मैं बेटी के होंठों को चूस रहा था.
उधर बेटी को अपनी जांघों पर मेरा लण्ड ठोकरें मारता महसूस होता है.
बेटे के लण्ड को अपनी योनि के इतने नजदीक पाकर उनके बदन में कामौत्तेजना लौटने लगती है
और उसकी साँसों की गहराई बढ़ने लगती है.
बेटी की जिव्हा मेरे होंठो को चाटने लगती है और वो उसे मेरे मुंह में धकेलती है. मैं अपना मुंह खोल देता हु और बेटी की जिव्हा मेरे मुख में प्रवेश कर जाती है.
बेटी मेरी जीभ को अपनी जीभ से सहलाती है.
मगर मैंने एकदम से उसकी जीभ को अपने होंठो में दबाकर उसे चूसने लगा क्या शहद के जैसा स्वाद था.
"उन्न्न्गग्घ्ह्ह......" बेटी मेरे मुंह में सिसकने लगी और वो अपनी कमर इधर उधर हिलाने लगी.
मैंने सोचा की अब गांड मारने का प्रोग्राम शुरू किया जाये. यह सोच कर मैंने एक ऊँगली उसकी गांड के छेद पर रख कर उसकी गांड को सहलाना शुरू कर दिया। बेटी सपना समझ गयी की वो समय आ गया है, जिसके लिए उसके प्यारे पिता ने आज उसे स्टोर रूम में बुलाया था.
सपना: शुभम (वो अभी भी मेरे अपने पति होने का दिखावा कर रही थी), मैंने आज तक कभी गांड नहीं मरवाई। यहां तक कि कई बार आप ने भी बहुत रिक्वेस्ट की, लेकिन फिर भी मैंने मना कर दिया। मैं आज पहली बार गांड में लंड लूंगी। इसलिए ध्यान से करना।
मै: (फुसफुसाते हुए) फिकर मत करो सपना, मैं आराम से और धीरे-धीरे करूंगा, तुम बिलकुल भी मत डरो.
फिर मैं और सपना एक-दूसरे को किस करने लग जाते है। मैं सपना के बड़े-बड़े बूब्स भी दबाता तो कभी चूत में उंगली करता। मेरी इस अदा से सपना गरम हो जाती, और मेरा लंड भी खड़ा हो जाता है।
मैं सपना को कंधे से पकड़ कर पीछे घुमाता हूँ, ताकि उसकी गांड मेरी तरफ आ जाये।
सपना मेरी तरफ अपनी पीठ कर लेती है, मेरा अकड़ा हुआ मोटा लौड़ा अपनी बेटी की नरम गांड में ठोकर मारता है.
बेटी गांड दरार में लण्ड के एहसास को पाकर ठिठक गई थी वो मेरे मोठे लौड़े से डर रही थी,  मैं सोच मैं पड गया इतनी छोटी गांड में मेरा लण्ड कैसे जाएगा जो ना सिर्फ नौ इंचलम्बा था बल्कि चार इंच मोटा भी था और उनका आगे का टोपा बहोत बडा किसी जंगली आलू की तरह.
वह इस संकरी जगह में कैसे जाएगा.
Like Reply
#17
बेटी को बहोत दर्द होगा क्या वह झेल पाएगी मैं अपनी बेटी को कोई दर्द नही देना चाहता. अब मैं गहरे सोच मैं पड़ गया

बेटी ने मेरी तरफ देखा मुझे किसी सोच में पड़ा देखकर मुझे हिलाकर नजरोसे कहा
"क्या हुआ"?
मैने उन्हें सब बताया तब वह हस पड़ी और उन्होंने कहा
"कुछ नही होता, कुछ मत सोचो, जो होता है वह हो जाने दो "
पर मैन कहा " बहुत दर्द होगा कैसे सह पाओगी तुम"
तब बेटी ने कहा "हर औरत यही चाहती है की उनका प्यार करने वाला उसे बहोत सारा प्यार करे, हर नारी को यह दर्द सहना ही पड़ता है, जीवन मे सिर्फ एक बार, कुछ नहीं होगा इसलिए तुम कोई चिंता मत करो "
अब बेटी की गांड मेरे सामने थी. बेटी की स्मॉल गांड जिसके बीच में भूरा सा छोटा सा छेड़ दिख रहा था. उसकी अनचुदी गांड  किसी छोटी बच्ची की गांड की तरह थी।  बहोत छोटा सा होल था इसमें मेरा इतना बड़ा लिंग कैसे जाएगा मेरा लिंग तो पूरी तबाही मचाएगा
बेटी की गांड चमक रही थी.
वो चमक मेरे आँखो को अपनी तरफ अट्रॅक्ट कर रही थी.
मैं ने अपनी जीभ से बेटी की गांड को चाटना शुरू किया.
मैं अपनी जीभ से बेटी की गांड चाटने लगा. बेटी बस एक काम कर रही थी वो था सिसकिया लेना.
एक पत्नी जैसे सुहागरात के दिन अपने पति के साथ चुदाई करते हुए शरमा कर खुल कर सिसकिया नही लेती उसी तरह बेटी भी मुझसे शरमा कर सिसकारियों पर कंट्रोल रख रही थी.
पर जो भी था उसमे मुझे एक अलग ही आनंद मिल रहा था.
बेटी की गुलाबी गांड अब मैं ने चाट कर साफ कर दी थी.
मैं ने हाथो से बेटी की गांड के छेद को खोल दिया .
फिर मैं आराम से अपनी जीभ बेटी की गांड मे डाल कर चाटने लगा खेलने लगा.
बेटी की गांड मे मैं जितनी ज़ोर से अपनी जीभ अंदर डालता उतनी ज़ोर से बेटी की गांड जीभ को बाहर फेक देती.
जैसे कह रही थी कि मुझे जीभ नही तुम्हारा लण्ड चाहिए. देना है तो लण्ड दो जीभ से मेरा क्या होगा.
जीभ से तो मेरी आग भड़क जाएगी. पर मैं भी कहा हार मानने वाला था,मैं ने भी उसकी गांड मे जीभ डालना जारी रखा.
उसकी टाइट गांड मेरी जीभ को बाहर धकेल देती इस खेल मे मुझे अपना ही आनंद मिल रहा था. साथ मे बेटी को भी.
बेटी इतनी गरम हो चुकी थी की उसको कुछ भी करना बर्दास्त नही हो रहा था.
फिर ज़्यादा देर करना ठीक नही होता.
मैं ने लण्ड को बेटी के हाथो मे दिया.
बेटी ने एक बार मेरी तरफ देखा और फिर लण्ड की तरफ. फिर लण्ड पे एक किस कर के लण्ड को छोड़ दिया और गर्दन हिला दी.
मतलब अब बस एक काम बाकी था. वो था...ढेर सारी चुदाई
फिर मैं ने बेटी के नितम्बो के नीचे पिल्लो रख दिया. इस से उसकी गांड उभर कर मेरे सामने आ गयी.
फिर मैं बेटी के टाँगो के बीच मे आ गया.
मैं ने लण्ड पे थूक लगा दी. और लण्ड को गांड पर रख दिया. मेरा लण्ड बेटी की गांड को प्यार करना चाहता था.
उसको फील करना चाहता था. मैं ने लण्ड वैसे ही रहने दिया. लण्ड और गांड का मिलन होने वाला था.
उस मिलन मे दर्द होने वाला था पर मेरा लण्ड गांड को दर्द देने से पहले उसको प्यार कर रहा था.
दर्द से पहले प्यार...
मुझे कुछ ना करते हुए देख कर बेटी ने आँखें खोल कर मुझे आगे बढ़ने को कहा.
इसका मतलब था की मेरे जीवन का वो स्वर्णिम क्षण आ गया था जिस की मैं न जाने कब से इन्तजार कर रहा था.
और बेटी के उपर आ गया.
मैं ने पहले बेटी के होंठो पर एक किस किया और फिर मैं ने एक झटका मारा पर कुछ नही हुआ, मेरा लण्ड फिसल गया. फिसलता भी क्यों नहीं. आखिर बेटी की गांड थी ही इतनी टाइट और बेटी की गांड को चोदे जाने का उसके जीवन का यह पहला ही मौका था.
मैं ने फिर से लण्ड को गांड पर रखा और एक ज़ोर का झटका मारा कि लण्ड का टोपा बेटी की गांड मे चला गया.
बेटी के मुँह से चीख निकल गयी.
बेटी की दर्द भरी चीख सुनकर मुझे ऐसा लग रहा था कि दर्द बेटी को नही बल्कि मुझे हो रहा हो.
दर्द बेटी को हो रहा था और मेरी आँखो मे पानी आ रहा था.
बेटी ने जब मेरी आँखो मे पानी देखा तो उन्होने चीखना बंद किया. और दर्द को बर्दास्त करना शुरू किया.
बेटी अपने होंठो को दबा कर अपनी चीख को रोकने लगी.
पर बेटी को दर्द हो रहा था.
बेटी का दर्द कम करने के लिए मैं अपने होंठ बेटी के होंठो पर रख कर चूसने लगा.
जिस से बेटी दर्द को भूल कर किस पर फोकस कर सके ताकि दर्द कम होज़ाये.
Like Reply
#18
अभी तो सिर्फ़ टोपा अंदर गया था.

मेरा टोपा बहुत बड़ा था किसी जंगली आलू की तरह और बेटी ने कभी गांड में सेक्स नही किया था,  इसलिए उनकी गांड किसी कुँवारी लड़की की तरह हो गई थी अभी तो सिर्फ टोपा अंदर गया था पूरा लण्ड अभी अंदर जाना बाकी था.
पर मुझे क्या हुआ था कि मैं बेटी को दर्द होता हुआ देख नही पा रहा था.
पर बेटी को प्यार भी करना था.
उपर से मेरा लण्ड बेटी की गांड मे जाने के लिए बेताब हो रहा था.
थोड़ी देर मे बेटी शांत हो गयी फिर भी मैं हाथो से स्तन को दबाने लगा. थोड़ी देर मे बेटी को पूरी तरह से अच्छा लगने लगा.
मैं ने बेटी को इशारे मे पूछा कि अंदर डालु उसने हाँ मे गर्दन हिला दी.
फिर मैं ने एक जोरदार झटका मारा,वो झटका जिसे कोई औरत अपनी ज़िंदगी भर भूल नही सकती, झटका मार कर लण्ड बेटी की गांड में अपना रास्ता बनाता हुआ पांच इंच तक अंदर चला गया.
बेटी ने बहुत कोशिस की चीख ना निकले पर ये ऐसा झटका था जिस के मारते ही हर औरत की चीख निकल जाती है.
बेटी की भी चीख निकल गयी.पर मेरे किस करने से उसकी दबी हुई चीख मेरे मुँह मे दब गयी.
बेटी और मेरे भी आँखो से पानी निकलने लगा क्यों कि मैं अपने बेटी को कोई भी तकलीफ होते हुए नही देख सकता
उसको सासे लेने की ज़्यादा ज़रूरत थी जिस से मैं ने उनके होंठो को अपने होंठो से आज़ाद किया. पर मैं स्तन को दबाता रहा.
बेटी के मुँह से दर्द भरे शब्द निकले. पर बेटी ने कंट्रोल करते हुए उन शब्दो को बीच मे रोक  दिया.
मुझे पता था कि सपना को दर्द हो रहा है. फिर भी उस  ने मुझे लण्ड बाहर निकालने को नही कहा और अंदर डालने को भी नही कहा.
वो बस मेरे नीचे लेटी हुई अपने दर्द को मुझ पर जाहिर नही होने देना चाहती थी.
सपना मुझसे इतना प्यार करती थी कि उसने अपने हाथ से रुकने इशारा करके थोड़ी देर रुकने को कहा.
मैं ऐसे ही रुका रहा. मुझे ऐसे रुका देख कर उसकी आँखो मे एक चमक आ गयी. वो मुझे लण्ड को बाहर निकलवाना नहीं चाहती थी. सपना  तो आज पहली बार अपनी गांड में चुदाई चाहती थी बस दिक्कत थी तो इतने मोठे लण्ड के दर्द की. सपना भी जानती थी की यह दर्द थोड़ी ही देर का है और थोड़ी ही देर में इसके पीछे पीछे मजा आने वाला है जिसके लिए मैं और मेरी बेटी तड़प रहे थे।
मैं ने अपने लण्ड को ऐसे ही रखा.और फिर से सपना के होंठो को चूसने लगा. स्तन को दबाने लगा.कुछ समय के बाद बेटी को अच्छा लगने लगा.
दर्द कम हो गया. मैं ने सपना के होंठो को छोड़ दिया.और स्तन को भी...
उस के चेहरे पर अब दर्द नही था बस प्यार ही प्यार दिख रहा था.
मैं लण्ड को धीरे से बाहर निकाल कर अंदर डालने लगा.धीरे धीरे लण्ड को अंदर बाहर करने लगा. अभी तक पांच इंच लण्ड अंदर था.मैं आराम से दो मिनट तक लण्ड को हिलाता रहा.
सपना बस बिना पलके झुकाए मुझे देख रही थी. क्या पता क्या देख रही थी. अँधेरे में हम बाप बेटी साफ़ साफ़ तो नहीं देख सकते थे पर हलके से एक दुसरे को समझ और देख पा रहे थे.
मैं जो प्यार से लण्ड अंदर बाहर कर रहा था.मैं उसे ज़्यादा दर्द नही होने दे रहा था. शायद बेटी यही देख रही थी.
मैं लण्ड को बड़े प्यार से सपना की गांड मे डाल रहा था. शायद बेटी मेरा यही प्यार देख रही थी.
फिर धीरे धीरे गति बढ़ाने लगा.अब बेटी का कुछ दर्द कम हुआ था. पर मैं ने अभी तक पूरा लण्ड अंदर नही डाला था.मैं इंतज़ार करने लगा कि कब बेटी की गांड नरम पड़ेगी और ढीली होगी .
पांच मिनट तक ऐसे ही चुदाई करने से बेटी की गांड ने ढीली हो गयी।  अब लौड़ा अंदर बाहर करने में इतनी दिक्क्त और उसे दर्द नहीं हो रहा था. .
लण्ड के लिए जगह बन रही थी. बेटी कुँवारी नही थी पर मेरा लण्ड ही बहोत बडा था नौ इंच लंबा और चार इंच चौड़ा और उसका सुपडा किसी जंगली आलू की तरह बडा था और बेटी की गांड बहुत छोटी थी किसी छोटी बच्ची की तरह, सपना की गांड और मेरे लिंग का कोई मेल ही नही था तो रिझल्ट तो ऐसे ही आना था मेरे लिंग ने बेटी की गांड का बहोत बुरा हाल कर दिया था
फिर मैं ने आख़िरी झटका मारा और पूरा लण्ड अंदर चला गया. बेटी की दबी हुई दर्द भरी चीख निकल गयी.
मैं बेटी का बचा हुआ दर्द स्तन को दबा कर कम करने लगा.
मैं ने फुसफुसाते हुए से कहा बस हो गया.अब दर्द नही होगा... जितना दर्द होना तो हो गया...पूरा लण्ड अंदर चला गया है..,बस थोड़ी देर रूको सब ठीक हो जाएगा
उस ने कहा., मुझे दर्द नही हो रहा है.
मुझे पता था कि वो  झूठ बोल रही थी.
मेरे लण्ड से दर्द ना हो ये हो ही नही सकता.
लण्ड अंदर जाने के बाद चीख निकली और दर्द ना हो ये हो ही नही सकता.
फिर भी बेटी ने मेरे लिए कहा कि उन्हें दर्द नही हो रहा.
बेटी की बात सुन ने के बाद मैं ने लण्ड को बाहर निकाल लिया. बेटी के चेहरे पर जो भाव था वो ये बता रहा था कि उस को कितना दर्द हो रहा है.
मैं समझ गया कि वो मेरे लिए,अपने प्यार के लिए दर्द बर्दास्त कर रही है.
मैं ने लण्ड को धीरे से फिर से अंदर डाल दिया और बेटी के स्तन दबाते हुए लण्ड को धीरे धीरे आगे पीछे करना शुरू किया.
लण्ड के हिलने से बेटी को दर्द हो रहा था.उन्होने अपने हाथ मेरी पीठ पे रख दिए. जैसे उनको दर्द होता वो अपने नाख़ून मेरे पीठ मे गाढ देती.और कहती कि मुझे दर्द नही हो रहा.
Like Reply
#19
एक तरफ दर्द के वजह से नाख़ून से मेरे पीठ को खरॉच रही थी और दूसरी तरफ कह रही थी कि मुझे दर्द नही हो रहा.

बेटी के साथ चुदाई करते हुए मुझे कोई जल्दी नही थी.
मैं हर एक धक्के को महसूस करना चाहता था. मैं ऐसा क्यू कर रहा था मुझे पता नही था.
पर हर एक धक्के के साथ मुझे एक अलग ही आनंद मिल रहा था.
बेटी भी अब मेरे धक्को को महसूस करके अपने दिलो दिमाग़ मे ये अपने सगे बाप से हो रही पहली गांड की  चुदाई फिट कर रही थी.
मैं बड़े प्यार से बेटी की गांड मार  रहा था. आज मुझे क्या हुआ था कुछ समझ नही आरहा था.
ना बेटी को जल्दी थी और ना मुझे जल्दी थी. ना बेटी मुझसे अलग होना चाहती थी. और ना मैं बेटी को अलग होने देना चाहता था
मैं लण्ड को बेटी की गांड की गहराई तक अंदर डाल कर धक्के मारता गया. फिर भी उनका दर्द कम नही हुआ.पर मुझे लग रहा था कि उनका प्यार बढ़ रहा है.
फिर मैंने अपना लौड़ा बाहर निकाल लिया और उसे घोड़ी बना दिया। सपना भी झट से घोड़ी बन गयी और अपना मुंह उसने तकिये में छुपा लिया।
चुदाई के बाद मैं बेटी को क्या कहूँगा,उनका सामना कैसे करूँगा,इसकी मुझे कोई फिकर नही थी.
बस मैं गांड में धक्के मार कर अपने जीवन को सफल कर रहा था.
मैं लण्ड को धीरे से पूरा बाहर निकाल लेता फिर अंदर कर लेता. ऐसा कुछ देर करने के बाद बेटी की गांड ने मेरे लण्ड के लिए जगह बना दी.और लण्ड आराम से अंदर जाने लगा.
गांड मे लण्ड के लिए जगह बनने से बेटी का दर्द ख़तम हो गया. मैं धक्के लगाता रहा.
अब बेटी भी अपने चूतड़ उपर करके मेरा साथ दे रही थी बेटी अब सिसकिया ले रही थी पर खुल कर नही ले रही थी. वो मुझसे शरमा रही थी.
बस बीच बीच मे आहह आहह कर रही थी.दस मिनट तक मैं ने दिमाग़ को सेक्स से अलग रख कर दिल को बेटी की चुदाई फील करने दे रहा था.
मैं बेटी की ऐसे ही चुदाई करता रहा. मैं ने बेटी के पैरो को थोड़ा ज़्यादा फैला दिया और धक्के बहुत धीमी गति से मैं बेटी की गांड मे धक्के मार रहा था.
मैं बेटी को हर धक्के का मज़ा दे रहा था और ले भी रहा था. मेरी कमर के उसके चूतड़ों पर टकराने से थप ठप की आवाज आ रही थी.  कमरे मे हमारे चुदाई का म्यूज़िक गूँज रहा था.
यह चुदाई का म्यूज़िक कब से बज रहा था ये ना बेटी को पता था और ना मुझे पता था.
बेटी ने ज़्यादा तर समय अपनी आँखो को बंद रखा था.पर बेटी बीच बीच मे अपनी आँखो खोल और पीछे मुड कर मुझे धक्के मारते हुए देख कर फिर से अपनी आँखो बंद कर लेती.
इस लंबी चुदाई मे मुझे भी लग रहा था कि अब मेरा भी होने वाला है.
अब मुझे अपनी धक्के मारने की गति बढ़ानी थी.पर बेटी को दर्द ना हो,इसके लिए दिल मुझे इसकी इजाज़त नही दे रहा था. अगर दिल की जगह दिमाग़ होता तो अब तक मैं ने अपनी गति बढ़ा दी होती और मेरा वीर्य बेटी की गांड मे होता.
मैं बड़े प्यार के साथ आख़िरी झटके भी धीरे धीरे मार रहा था.
आख़िरी झटके वो भी धीरे धीरे मारने के लिए मुझे मेरे दिल ने बहुत मदद की.
मेरे धक्के की गति अपने आप थोड़ी बढ़ गयी थी शायद उस से बेटी ने पता लगा लिया होगा कि मेरा होने वाला.
इस लिए वो अपने चूतड़ उठाकर मेरा साथ देने लगी.
वैसे तो मैं उसकी गांड में ही अपना माल निकालने वाला था. फिर अचानक मुझे ख्याल आया कि इस बार भी माल को उसकी चूत में ही निकाल दूँ तो उसको माँ बनने का चांस और बढ़ जायेगा। तो मैंने उसकी गांड में से लण्ड निकाल कर झट से उसकी चूत में घुसा दिया।
सपना के मुंह से आनद की सिसकारी निकल गयी.
उसका भी काम तमाम होने ही वाला था. वो अपनी चूतड़ पीछे कर कर के मेरे जांघों  पर मार रही थी ताकि अधिक से अधिक लौड़ा अंदर जा सके.
हम दोनो ही बाप बेटी पसीने से तर बतर हो रहे थे. पर दोनों में से कोई भी अपनी स्पीड कम नहीं कर रहा था.
अब क्योंकि मेरा लौड़ा उसकी चूत में था और उसकी चूत तो मैं कितने दिनों से मार रहा था और उसकी चूत अब तक मेरे मोठे लौड़े की आदि हो चुकी थी तो अब उसको चूत में कोई दिक्कत नहीं थी.
तो मैंने भी अपनी चुदाई की स्पीड बहुत तेज कर दी. सपना भी अपनी चूतड़ पीछे कर कर के मुझे खूब अंदर तक चोदने में मदद कर रही थी,
हम दोनों बाप बेटी के बदन पसीने से तर ब तर हो चुके थे पर दोनों में से कोई भी थक नहीं रहा था.
मेरी तेज होती स्पीड से सपना ने अंदाजा लगा लिया कि मेरा होने वाला है. उसका भी स्खलन पास ही था.
फिर एक आखरी धक्के के साथ मेरा वीर्य उसकी चूत में निकल गया.
ना जाने कितनी देर तक मेरे लण्ड से वीर्य की धार निकलती रही. मेरा वीर्य चूत मे महसूस करते ही सपना ने भी एक चीख मारी और उसने भी अपने चूतड़ पीछे करके मेरे लौड़े को अधिकतम सीमा तक अंदर से लिया और उसकी चूत से भी उसके कामरस का फुवारा छूट पड़ा.
थोड़ी देर में मेरे लौड़े और उसकी चूत ने अपना पानी छोड़ा।
मैं इतना थक गया था कि सपना के पीहत पर ही गिर गया. काफी दे तक में उस पर ही पड़ा अपनी साँसों को दुरुस्त करता रहा.
फिर कुछ देर में मेरी  बेटी नॉर्मल हो गयी.
अब बेटी को अपने बदन मे दर्द महसूस हो रहा था.
Like Reply
#20
क्यू कि मैं अभी तक बेटी के उपर था

मुझे इस बात का अहसास हुआ.मैं बेटी के उपर से अलग हो गया.
मैं ने अपने लण्ड को बेटी की चूत से बाहर निकाल लिया.
मेरा लण्ड तो उस की चूत से बाहर आने को तैय्यार नही था.
मैंने दिल पर पत्थर रख कर लण्ड को बाहर निकाल लिया.
मेरे लण्ड पे बेटी की चूत का रस और मेरा वीर्य लगा हुआ था.
गांड पर भी रस और उस के पिता  का वीर्य लगा हुआ था.
मैं उठ कर उसके साथ लेट गया. सपना भी मेरे पास लेट गयी. और साथ मे उस के स्तन के साथ प्यार से खेलता रहा हम एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे बेटी को अब दर्द नही हो रहा था
सपना उठ कर कपडे पहनने लगी.
मैंने उसे बांह से खींच कर एक आखिरी बार अपने आगोश में ले लिया और प्यार से फुसफुसाते हुए पुछा।
‘मज़ा आया ?’
‘हाँ, जी. बहुत मज़ा आया, शुरू में तो बहुत दर्द हुआ, बाद में चूत जैसा ही मज़ा वहाँ भी आया।’ वो बोली और उठ कर कपड़े पहनने लगी।
मैंने भी अपने कपड़े पहन लिए और एक आखिरी बार उसके होंठों को चूम कर अपने कमरे में चला गया.
सपना भी अपने कपडे पहन कर अपने कमरे में चली गयी. आज पहली बार उसकी गांड की चुदाई हुई थी. चुदाई क्या पूरी गांड का भोसड़ा बन गया था. अब चुदाई हो चुकी थी पर उसकी गांड में अब इतना दर्द हो रहा था कि उस से ठीक से चला भी नहीं जा रहा था.
अगले दिन भी उस की गांड में बहुत दर्द था. पर वो किसी से कहती भी तो क्या?
उस ने बाथरूम में गिर जाने का बहाना बना दिया।
हम दोनों बाप बेटी इस तरह से दिखावा कर रहे थे. कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो.
थोड़ी देर बाद बेटी सपना और शुभम भी चले गये।  मेरा मन बहुत उदास था. सपना के भी चेहरे पर बहुत उदासी दिख रही थी.
साफ पता चल रहा था कि उसका भी जाने का मन नहीं था. ऐसी चुदाई जो रोज हो रही थी अपने पापा से.
खैर जाना तो था ही,
थोड़े दिनों के बाद जब मैं बाहर से घर आया तो पत्नी ने खुशखबरी सुनाई की सपना माँ बनने वाली है.
मैं बहुत खुश था. भगवान् ने हम बाप बेटी की सुन ली थी, अब मेरी बेटी की गोद में भी बच्चा होगा, और उस के ससुराल मे भी उसकी इज्जत बढ़ जाएगी।
9 महीने बाद सपना के एक बीटा हुआ.
उसकी ससुराल वाले बहुत खुश थे. हम लोग तो खुश थे ही, बस इस ख़ुशी में मेरा रोल क्या था. यह तो बस सपना को पता था या मुझे।
यह हम बाप बेटी का राज था.
अब भी सपना जब भी हमारे यहाँ आती है तो अपने आप वो रात में 11 बजे स्टोर वाले कमरे में आ जाती है और हम बाप बेटी का चुदाई का समारोह शुरू हो जाता है. जितने दिन भी वो रहती है, कभी गांड में तो कभी चूत में रोज जबरदस्त चुदाई होती है,
सब के सामने हम बाप बेटी ही बन कर रहते हैं.
एक तरह से सपना बेटी की एक गलतफहमी ने हम बाप बेटी का एक नया रिश्ता बना दिया और उसकी गोद में बेटा डाल दिया।
अब जीवन में आनंद ही आनंद है.
समाप्त
Like Reply




Users browsing this thread: 1 Guest(s)