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Incest चाचा की आग भरी ज़ुबान: घर की प्यासी औरतें
#1
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चाचा की आग भरी ज़ुबान: घर की प्यासी औरतें



मुख्य पात्रों का परिचय

कथावाचक (आरव, 24 वर्ष):

मैं आरव हूँ। मध्यमवर्गीय परिवार का अकेला बेटा। दिल्ली के एक साधारण अपार्टमेंट में रहता हूँ। पढ़ाई पूरी कर नौकरी की तलाश में हूँ। स्वभाव से शांत, थोड़ा संकोची, और अपनी माँ तथा बहनों के प्रति अत्यधिक सम्मान रखने वाला। मेरी आँखों के सामने जो कुछ घटित होने वाला है, उसे मैं छिपकर, दरवाजे की दरार से, या दीवारों के उस पार सुनकर देखता-सुनता रहूँगा। यह कहानी मेरी है, पर इसका केंद्र कोई और है।
चाचा (राजेश शर्मा, 48 वर्ष):

मेरे पिता के छोटे भाई। लंबे, गठीले शरीर वाले, घने बाल जिनमें सफेदी के कुछ तार, गहरी आवाज, और बात करने का एक ऐसा अंदाज जो किसी को भी अपनी तरफ खींच ले। वे कोई साधारण पुरुष नहीं। वे शब्दों से खेलते हैं। किसी स्त्री की आँखों में छिपे अकेलेपन, इच्छा या संकोच को पहचान लेते हैं और धीरे-धीरे, बिना जल्दबाजी के, उसे खोलते हैं। वे कभी जबरदस्ती नहीं करते। वे सुनते हैं, समझते हैं, फिर उस समझ को शब्दों में पिरोकर सामने वाली को स्वयं आगे बढ़ाते हैं। परिवार में वे सम्मानित हैं, पर उनके अंदर एक चुपचाप जलती हुई आग है।

माँ (सुमन, 45 वर्ष):
घर की धुरी। संस्कारी, साड़ी पहनने वाली, पूजा-पाठ करने वाली, पड़ोस की औरतों में आदर्श मानी जाने वाली महिला। गेहुँआ रंग, गोलाकार चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें हमेशा थकान और स्नेह का मिश्रण रहता है। गर्दन लंबी और चिकनी। स्तन पूर्ण, भारी, साड़ी के आँचल के नीचे दबे हुए। कमर पतली, कूल्हे चौड़े और गोल। जाँघें मोटी और नरम। पति की मृत्यु के बाद वे पूरी तरह घर और बच्चों में सिमट गई हैं। उनकी देह में अभी भी वह आकर्षण बाकी है जिसे वे स्वयं अनदेखा करती हैं।

भाभी (प्रिया, 32 वर्ष):
मेरे बड़े भाई की पत्नी। शादी के पाँच वर्ष हो चुके हैं। गोरी, नुकीली नाक, गुलाबी होठ, और घने काले बाल। शरीर युवा और लचीला। स्तन मध्यम आकार के, गोल और सख्त। कमर पतली, नितंब उभरे हुए। वह पढ़ी-लिखी है, पर घर में रहते-रहते थोड़ी उदासीन हो गई है। पति के काम में व्यस्त रहने के कारण उसकी भावनात्मक जरूरतें अधूरी रह जाती हैं।

बहन (आंचल, 21 वर्ष):
मेरी छोटी बहन। कॉलेज की छात्रा। गोरी, लंबे बाल, पतली कमर, और युवा स्तन जो अभी पूर्ण रूप से विकसित हो रहे हैं। आँखें चंचल, पर घर में संस्कार की दीवारें ऊँची हैं। वह अभी भी मासूमियत और जिज्ञासा के बीच झूलती है।
इनके अलावा कहानी में पड़ोस की कुछ विवाहित महिलाएँ (मिल्फ) भी आएंगी—जैसे श्रीमती मेहता (38), श्रीमती गुप्ता (42)—जिनके शरीर और जीवन की कहानियाँ धीरे-धीरे खुलेंगी।

गर्मी का एक शनिवार था। घर में पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था। माँ रसोई में थीं। भाभी अपने कमरे में लेटी हुई थीं। आंचल कॉलेज की किताबें लेकर बालकनी में बैठी थी। मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर कुछ खोज रहा था।
दरवाजे की घंटी बजी। चाचा आए थे। लंबे समय बाद। उनके हाथ में फल की टोकरी और एक छोटा सा उपहार था। माँ ने दरवाजा खोला। उनकी आवाज में हल्का आश्चर्य था।
“राजेश… आप?”
चाचा मुस्कुराए। उनकी मुस्कान आँखों तक पहुँची। “दीदी, इतने दिन बाद आया हूँ। अकेलेपन में घर याद आ गया।”
माँ ने उन्हें अंदर बुलाया। साड़ी का पल्लू उन्होंने ठीक से समाया। चाचा बैठे। पानी पिया। फिर उन्होंने माँ की ओर देखा—नहीं, सिर्फ देखा नहीं, जैसे उनकी आँखों में कुछ पढ़ रहे हों।
“दीदी, आपका चेहरा थका हुआ लगता है। रात को नींद ठीक से आती है?”
माँ थोड़ी सकुचाईं। “अब क्या… घर का काम, बच्चों की चिंता। आदत हो गई है।”
चाचा ने धीरे से कहा, “आदत और मजबूरी में फर्क होता है। कभी-कभी शरीर भी बोलता है, पर हम सुनते नहीं।”
माँ चुप रहीं। उन्होंने चाय बनाई। मैं दरवाजे के पास खड़ा सुन रहा था। चाचा की आवाज में कोई जल्दबाजी नहीं थी। वे सामान्य बातें कर रहे थे—पुरानी यादें, पिताजी की बातें, बचपन के किस्से। पर हर वाक्य में एक हल्की गर्माहट थी।
जब चाय आई, चाचा ने कप थामा और माँ की उंगलियों को एक पल के लिए छू लिया। माँ का हाथ थोड़ा काँपा। उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“दीदी, आप अभी भी वैसी ही सुंदर लगती हैं जैसे शादी के समय।”
माँ ने आँखें नीची कर लीं। “अब उम्र हो गई राजेश। ऐसी बातें मत कीजिए।”
चाचा हल्के स्वर में बोले, “उम्र शरीर को नहीं, मन को बदलती है। और आपका मन अभी भी कोमल है। मैं देख सकता हूँ।”
माँ रसोई की तरफ मुड़ीं। उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से थोड़ा सरक गया था। पीठ की हल्की नमी दिखाई दे रही थी। चाचा ने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप चाय पीते रहे।
शाम को चाचा रुक गए। रात के खाने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए। मैं देर रात तक जागता रहा। अचानक मुझे हल्की सी आवाजें सुनाई दीं। चाचा और माँ बैठक में बात कर रहे थे।
चाचा कह रहे थे, “दीदी, जब कोई सालों से अकेला होता है, तो शरीर याद दिलाता है कि वह अभी भी जीवित है। कभी-कभी एक स्पर्श, एक बात… बहुत कुछ बदल देती है।”
माँ की आवाज काँप रही थी। “राजेश… यह ठीक नहीं। मैं आपकी भाभी हूँ।”
“मैं जानता हूँ। इसलिए जल्दबाजी नहीं कर रहा। मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ कि आप अकेली नहीं हैं। अगर कभी मन भारी लगे… तो बात कर सकते हैं।”
उस रात कुछ और नहीं हुआ। पर जब माँ अपने कमरे में गईं, तो उन्होंने दरवाजा बंद किया और देर तक लेटी रहीं। उनके हाथ अपने स्तनों पर थे—जैसे कोई भूली हुई संवेदना वापस आ रही हो।
मैंने यह सब देखा नहीं, पर सुना। और समझ गया कि चाचा ने सिर्फ बातों से एक छोटी सी दरार निकाल दी है।
अगली सुबह चाचा चले गए। जाते समय उन्होंने माँ के कंधे पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “ध्यान रखना दीदी। शरीर भी आत्मा का घर है।”
माँ ने कुछ नहीं कहा। पर उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—डर, उलझन, और कुछ ऐसा जो वे स्वयं नहीं समझ पा रही थीं।

तीन दिन बाद चाचा फिर आए। इस बार शाम के समय। घर में सिर्फ भाभी प्रिया थीं। माँ मंदिर गई हुई थीं। आंचल कॉलेज से देर से लौटने वाली थी। मैं अपने कमरे में बैठा था, दरवाजा आधा खुला छोड़कर।
चाचा ने घंटी बजाई। प्रिया ने दरवाजा खोला। वह सलवार-कमीज में थी—हल्के गुलाबी रंग की, जो उसके गोरे रंग पर और भी चमक रही थी। बाल खुले थे, कंधों तक लहराते हुए। गले में हल्का सा पसीना चमक रहा था। स्तनों की गोलाई कमीज के कपड़े के नीचे साफ झलक रही थी। कमर पतली, और नीचे नितंबों का उभार सलवार में दबा हुआ।
“आइए चाचा,” उसने कहा। आवाज में थकान थी।
चाचा अंदर आए। उन्होंने जूते उतारे और सोफे पर बैठ गए। प्रिया पानी लेकर आई। जब उसने गिलास दिया, तो चाचा की उंगलियाँ उसकी हथेली से थोड़ी देर तक छूती रहीं। प्रिया ने कुछ नहीं कहा, पर उसकी साँस थोड़ी तेज हो गई।
“प्रिया, तुम ठीक लग नहीं रही,” चाचा ने धीरे से कहा। आवाज में कोई जल्दबाजी नहीं थी। बस एक शांत ध्यान।
प्रिया सोफे के किनारे बैठ गई। “कुछ नहीं चाचा। घर का काम… और भाई साहब तो हमेशा ऑफिस में रहते हैं।”
चाचा ने पानी पिया। फिर उन्होंने उसकी ओर देखा। आँखों में कोई भूख नहीं थी—सिर्फ समझ।
“जब कोई सालों तक सिर्फ काम और जिम्मेदारी में जीता है, तो शरीर चुपचाप भूखा रह जाता है। भावनाएँ भी। तुम्हारी आँखों में वही भूख दिख रही है।”
प्रिया की गर्दन पर एक हल्की लाली फैल गई। उसने बालों को कान के पीछे किया। “ऐसी बातें मत कीजिए चाचा। मैं शादीशुदा हूँ।”
“मैं जानता हूँ,” चाचा ने कहा। स्वर बहुत नरम था। “शादीशुदा होना भावनाओं को बंद नहीं करता। कभी-कभी एक व्यक्ति सिर्फ सुनने वाला चाहिए होता है। कोई जो तुम्हें ‘पत्नी’ या ‘बहू’ की तरह नहीं, बल्कि एक स्त्री की तरह देखे।”
प्रिया चुप रही। उसकी उंगलियाँ सलवार के किनारे को मोड़ रही थीं। कमीज का बटन गले के पास थोड़ा खुला था। वहाँ से हल्की सी दरार में गोरी त्वचा और स्तनों की शुरुआत दिख रही थी।
चाचा ने आगे कहा, “तुम्हारा शरीर अभी युवा है। कमर पतली, स्तन सख्त… पर आँखों में थकान है। कोई तुम्हें छूता भी है क्या? सिर्फ जरूरत के लिए नहीं… बल्कि तुम्हें महसूस करने के लिए?”
प्रिया की साँस अटक गई। उसने आँखें नीची कर लीं। “चाचा… यह गलत है।”
“गलत तब होता है जब कोई जबरदस्ती करे,” चाचा ने उत्तर दिया। “मैं सिर्फ पूछ रहा हूँ। तुम जवाब दो या न दो, तुम्हारी मर्जी। पर अगर कभी मन भारी लगे… तो मैं सुन सकता हूँ।”
उस क्षण प्रिया ने कुछ नहीं कहा। पर उसकी जाँघें हल्की सी सिकुड़ गईं। सलवार के कपड़े में एक छोटी सी हलचल हुई। चाचा ने देखा, पर कोई टिप्पणी नहीं की। वे बस चुपचाप बैठे रहे।
थोड़ी देर बाद माँ लौटीं। उन्होंने चाचा को देखकर हल्की मुस्कान दी, पर उनकी आँखों में पिछले मुलाकात की याद साफ थी। चाचा ने माँ से सामान्य बात की—मंदिर की पूजा, मौसम, पड़ोस की खबरें। पर जब माँ रसोई की तरफ गईं, तो चाचा की निगाह एक पल के लिए प्रिया पर टिकी रही।
रात के खाने के बाद सब बिखर गए। प्रिया अपने कमरे में चली गईं। मैंने देखा कि वह देर तक आईने के सामने खड़ी रही। उसने कमीज का एक बटन और खोला। उंगलियाँ अपने स्तनों पर फिरीं—जैसे कोई भूली हुई संवेदना जाँच रही हो। फिर उसने जल्दी से बटन बंद कर लिया और बिस्तर पर लेट गई।
उसी रात माँ अपने कमरे में लेटी हुई थीं। पंखा चल रहा था। उनके हाथ साड़ी के नीचे अपने पेट पर थे। वे कुछ याद कर रही थीं—चाचा की आवाज, उनके शब्दों का वजन। कोई स्पष्ट इच्छा नहीं थी, सिर्फ एक अजीब सी बेचैनी जो शरीर के अंदर घूम रही थी।
चाचा घर में ही रुके। रात के ग्यारह बजे वे बालकनी में खड़े थे। मैंने उनकी पीठ देखी—सीधी, मजबूत। वे सिगरेट नहीं पी रहे थे। बस रात की हवा में साँस ले रहे थे। जैसे कोई शिकारी धैर्य से इंतजार कर रहा हो।
अगली सुबह चाचा ने नाश्ते में माँ से कहा, “दीदी, आपका चेहरा आज थोड़ा हल्का लग रहा है। अच्छी नींद आई?”
माँ ने चाय की प्याली में देखा। “हाँ… थोड़ी।”
प्रिया चुपचाप मेज पर बैठी थी। उसकी निगाह कभी-कभी चाचा की ओर उठती, फिर झुक जाती।
चाचा ने किसी से कोई अनुचित बात नहीं की। वे बस वहाँ मौजूद थे—अपनी शांत आवाज, अपने ध्यान से भरे शब्दों, और उस अदृश्य तनाव के साथ जो अब घर की हवा में तैरने लगा था।
मैंने यह सब देखा। और समझ गया कि चाचा ने एक नहीं, दो दरारें निकाल दी हैं। माँ की और प्रिया की। दोनों अलग-अलग हैं, पर दोनों में एक समान भूख चुपचाप जाग रही है।


दो दिन बाद आंचल घर लौटी। कॉलेज की छुट्टी शुरू हो गई थी। वह हल्के नीले रंग की कुर्ती में थी—पतली कमर को साफ उभारती हुई, स्तनों की युवा गोलाई कपड़े के नीचे हल्की सी उठती-गिरती। बाल खुले थे, पीठ पर लहराते। चेहरे पर अभी भी मासूमियत थी, पर आँखों में वह चंचल जिज्ञासा जो युवा लड़कियों में होती है।
चाचा बैठक में अखबार पढ़ रहे थे। आंचल ने नमस्ते की। चाचा ने आँखें उठाईं और मुस्कुराए—वही शांत, गहरी मुस्कान।
“आंचल, तुम और लंबी हो गई हो,” उन्होंने कहा। आवाज में स्नेह था, पर उसके नीचे एक सूक्ष्म ध्यान भी। “कॉलेज में सब ठीक चल रहा है?”
आंचल सोफे पर बैठ गई। कुर्ती का किनारा जाँघों तक सरक गया। गोरी, चिकनी जाँघें हल्की सी चमक रही थीं। “हाँ चाचा। पढ़ाई ठीक है… पर कभी-कभी मन ऊब जाता है।”
चाचा ने अखबार रख दिया। “ऊब तब लगती है जब जिंदगी में कुछ नया न हो। तुम्हारी उम्र में मन बहुत सी बातें पूछता है—जो किताबों में नहीं मिलतीं।”
आंचल की गर्दन पर हल्की लाली दौड़ गई। उसने बालों को एक तरफ किया। “आप कैसे जानते हैं चाचा?”
“क्योंकि मैंने भी उसी उम्र में बहुत कुछ महसूस किया था,” चाचा ने धीरे से उत्तर दिया। “शरीर बदलता है, इच्छाएँ जागती हैं… और कोई सही से समझाए नहीं, तो सब उलझ जाता है।”
आंचल चुप रही। उसकी उंगलियाँ कुर्ती के किनारे को पकड़े हुए थीं। चाचा ने और कुछ नहीं कहा। वे बस उसकी ओर देखते रहे—नहीं, देखते नहीं, जैसे उसकी चुप्पी को पढ़ रहे हों।
उसी शाम माँ रसोई में थीं। चाचा पानी पीने गए। रसोई छोटी थी। माँ साड़ी में थीं—आज गहरा लाल रंग। पल्लू कंधे पर था, पर काम करते हुए थोड़ा सरक गया था। पीठ की चिकनी त्वचा, और कमर का वह मोड़ जहाँ साड़ी कसकर बँधी थी, साफ दिख रहा था। स्तन भारी थे, साड़ी के आँचल के नीचे दबे हुए। जब वे झुकतीं, तो उनकी गोलाई और उभर आती।
चाचा ने गिलास भरा। माँ ने पीछे मुड़कर देखा। उनकी आँखों में वही पुरानी बेचैनी थी।
“राजेश… आप इतने दिन रुक रहे हैं,” उन्होंने कहा। स्वर में उलझन थी।
चाचा ने गिलास रखा। फिर एक कदम आगे बढ़े। दूरी बहुत कम रह गई। “दीदी, घर अच्छा लग रहा है। और… आप भी।”
माँ की साँस थोड़ी तेज हुई। उन्होंने पल्लू ठीक करने की कोशिश की, पर चाचा का हाथ धीरे से उनके कंधे पर आ गया। उंगलियाँ गर्म थीं। माँ का शरीर एक पल के लिए कठोर हो गया, फिर ढीला पड़ गया।
चाचा ने कुछ और नहीं किया। बस कंधे को हल्के से दबाया। “आप तनाव में हैं। शरीर बता रहा है।”
माँ की आँखें बंद हो गईं। एक पल के लिए। फिर उन्होंने आँखें खोलीं और पीछे हट गईं। “यह… यह ठीक नहीं।”
चाचा ने हाथ हटा लिया। कोई जल्दबाजी नहीं। “मैं जानता हूँ। इसलिए रुका हुआ हूँ। जब आप तैयार हों… तब।”
माँ ने कुछ नहीं कहा। वे वापस बर्तन धोने लगीं। पर उनके हाथ काँप रहे थे। साड़ी का पल्लू अब और सरक चुका था। एक स्तन का ऊपरी भाग हल्का सा दिख रहा था—गोरा, मुलायम, और उस पर हल्की नमी।
रात को आंचल अपने कमरे में थी। दरवाजा आधा खुला था। मैंने देखा कि वह आईने के सामने खड़ी थी। कुर्ती उतारकर सिर्फ स्लिप में। युवा स्तन सख्त थे, निप्पल हल्के गुलाबी। उसने अपने शरीर को देखा—जैसे पहली बार समझ रही हो कि वह अब बच्ची नहीं रही। फिर उसने जल्दी से कपड़े पहन लिए।
उसी रात माँ अपने बिस्तर पर लेटी हुई थीं। हाथ साड़ी के नीचे थे। उंगलियाँ अपने स्तनों पर घूम रही थीं—बहुत धीरे, जैसे कोई डरते-डरते छू रहा हो। कोई पूर्ण संतुष्टि नहीं। सिर्फ वह पहली बार की कोशिश जब शरीर शब्दों से आगे बढ़ने लगता है।
चाचा अपने कमरे में जाग रहे थे। वे जानते थे कि बीज अब अंकुरित हो रहा है। माँ में, प्रिया में, और अब आंचल की जिज्ञासा में भी।
घर की हवा में अब एक नया तनाव था—अदृश्य, पर हर साँस में महसूस होने वाला।


अगली दोपहर घर में अजीब सी चुप्पी थी। माँ पूजा के कमरे में थीं। आंचल अपनी किताबों के साथ छत पर चली गई थी। मैं अपने कमरे में बैठा था। प्रिया बैठक में अकेली थीं।
चाचा अंदर आए। उन्होंने दरवाजा बंद नहीं किया, बस धीरे से बंद कर दिया। प्रिया सोफे पर बैठी हुई थीं। आज उन्होंने हल्की पीली साड़ी पहनी थी। पल्लू ढीला था। स्तनों की भारी गोलाई साफ उभर रही थी। कमर पतली, और जब वे थोड़ा झुकतीं तो नितंबों का गोल उभार साड़ी के नीचे साफ दिखता। गर्दन पर पसीने की एक पतली रेखा चमक रही थी।
चाचा उनके सामने कुर्सी पर बैठ गए। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर चाचा ने धीमी आवाज में कहा, “तुम रात को सो नहीं पा रही हो।”
प्रिया की उंगलियाँ साड़ी के किनारे को कसकर पकड़ गईं। “आप कैसे…?”
“आँखों के नीचे हल्की सी छाया है। और जब कोई तुम्हें देखता है, तो तुम नज़रें चुरा लेती हो।” चाचा का स्वर बिल्कुल शांत था। “शरीर झूठ नहीं बोलता, प्रिया।”
प्रिया ने साँस ली। साड़ी का पल्लू और सरक गया। एक स्तन का ऊपरी भाग अब और स्पष्ट था—गोरा, मुलायम, और उसकी नमी में हल्की चमक। “चाचा, मैं… मैं उलझन में हूँ।”
“कहकर देखो,” चाचा ने कहा। “जो मन में है, वह बाहर निकालो। कोई दोष नहीं देगा।”
प्रिया की आवाज काँपी। “भाई साहब… वे सिर्फ काम करते हैं। छूते भी हैं तो जैसे कोई औपचारिकता हो। मुझे… मुझे लगता है जैसे मेरा शरीर सूख रहा है। कोई मुझे देखता ही नहीं… स्त्री की तरह।”
चाचा ने कुर्सी से थोड़ा आगे झुके। दूरी कम हो गई। “तुम्हारा शरीर सूखा नहीं है। वह सिर्फ भूखा है। स्तन अभी भी सख्त हैं, कमर लचीली है, जाँघें मुलायम… पर कोई उन्हें महसूस नहीं कर रहा। यही बात तुम्हें रात में जगाए रखती है।”
प्रिया की साँस तेज हो गई। उसने आँखें बंद कर लीं। एक पल के लिए उसकी जाँघें हल्की सी खुल गईं, फिर तुरंत बंद हो गईं। साड़ी के नीचे एक छोटी सी हलचल हुई।
चाचा ने हाथ नहीं बढ़ाया। बस बोले, “मैं तुम्हें छूने नहीं आया। मैं तुम्हें समझने आया हूँ। जब तुम तैयार होogi… तब खुद बताना।”
प्रिया की आँखों में पानी आ गया। उसने जल्दी से पल्लू ठीक किया और उठ खड़ी हुई। “मुझे… मुझे रसोई में काम है।”
वह चली गईं। पर उनके जाने के बाद सोफे पर एक हल्की सी गंध रह गई—पसीने और इत्र की मिली-जुली।
उसी शाम आंचल छत से उतरकर सीधे चाचा के पास आई। वह कॉटन की छोटी फ्रॉक में थी। युवा स्तन फ्रॉक के कपड़े को हल्के से धकेल रहे थे। जाँघें खुली हुई थीं, चिकनी और गोरी।
“चाचा,” उसने सीधे पूछा, “क्या औरतें भी… वैसी ही इच्छाएँ महसूस करती हैं जैसे मर्द?”
चाचा ने अखबार नीचे रखा। आँखों में कोई आश्चर्य नहीं था। “हाँ। कभी-कभी और भी तेज। फर्क सिर्फ इतना है कि वे उसे छुपा लेती हैं।”
आंचल की गर्दन लाल हो गई। “तो… क्या माँ भी?”
चाचा ने उसकी ओर देखा। स्वर बहुत धीमा था। “तुम्हारी माँ एक स्त्री हैं। और हर स्त्री के अंदर एक आग होती है। वह बुझती नहीं… सिर्फ दब जाती है।”
आंचल कुछ और पूछने वाली थी कि माँ अंदर आ गईं। आंचल चुप हो गई और अपने कमरे की तरफ चली गई।
रात को माँ अपने कमरे में थीं। दरवाजा बंद था। वे साड़ी उतारकर सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में लेटी हुई थीं। स्तन भारी थे, ब्लाउज के कपड़े में दबे हुए। उन्होंने अपना हाथ धीरे से एक स्तन पर रखा। उंगलियाँ निप्पल के आसपास घूमीं—बहुत हल्के से। शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने आँखें बंद कर लीं और चाचा के कंधे वाले स्पर्श को याद किया। वह छोटा सा स्पर्श अब उनके पूरे शरीर में फैल चुका था।
उन्होंने हाथ और नीचे ले जाना चाहा, पर रुक गईं। साँस भारी थी। कोई पूर्ण संतुष्टि नहीं। सिर्फ वह बेचैनी जो अब और गहरी हो गई थी।
चाचा अपने कमरे में खड़े होकर खिड़की से बाहर देख रहे थे। वे जानते थे कि घर की हर औरत अब अलग-अलग ढंग से जाग रही है। प्रिया शब्दों में खुल चुकी थी। माँ स्पर्श के बाद और उलझ गई थीं। आंचल सवाल पूछने लगी थी।
बीच की दीवारें अब धीरे-धीरे पतली पड़ रही थीं।

रात के बारह बज रहे थे। घर में सन्नाटा पसरा था। केवल पंखे की मंद आवाज और दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की गूँज सुनाई दे रही थी। सुमन अपने कमरे में लेटी हुई थीं। साड़ी की जगह उन्होंने एक पुरानी नाइटी पहन रखी थी—ढीली, सफेद, जो उनके भारी स्तनों की गोलाई को छुपा नहीं पा रही थी। कपड़े के नीचे स्तन स्वतंत्र थे, निप्पल हल्के से कपड़े को छू रहे थे। कमर पर नाइटी का कपड़ा सिकुड़ा हुआ था, और जाँघों की मोटी, मुलायम रेखाएँ बिस्तर की चादर पर फैल रही थीं।
आँखें खुली थीं। छत की ओर देखती हुई वे अपने ही मन से लड़ रही थीं।
“मैं क्या कर रही हूँ…” यह वाक्य बार-बार उनके मन में घूम रहा था।
राजेश का हाथ उनके कंधे पर आया था—सिर्फ एक क्षण के लिए। गर्म उंगलियाँ, हल्का दबाव। उससे पहले की बातें… “शरीर भी आत्मा का घर है।” वे शब्द अब उनकी त्वचा के नीचे बस गए थे। हर बार जब वे आँखें बंद करतीं, तो वही स्पर्श वापस आ जाता। कंधे से शुरू होकर गर्दन तक, फिर सीने तक फैलता। स्तनों में एक अजीब सी भारीपन उठता, जैसे कोई भूखी चीज अंदर से धक्का दे रही हो।
वे संस्कारी औरत थीं। पति की मृत्यु के बाद उन्होंने अपना शरीर जैसे ताला लगा दिया था। पूजा, व्रत, बच्चों की जिम्मेदारी—यही उनकी दुनिया रह गई थी। पड़ोस की औरतें उन्हें आदर्श कहती थीं। “सुमन जी तो जैसे देवी हैं।” यह बात उन्हें गर्व देती थी। पर अब वही गर्व उनके गले में अटक रहा था।
“मैं उनकी भाभी हूँ,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। अंधेरे में उनकी अपनी आवाज भी पराई लग रही थी। “यह पाप है। यह गलत है।”
पर शरीर नहीं मान रहा था।
उन्होंने नाइटी के ऊपर से अपना हाथ स्तन पर रखा। उंगलियाँ गोलाई को महसूस कर रही थीं—भारी, मुलायम, और निप्पल अब सख्त हो चुका था। हल्के स्पर्श से एक सिहरन कमर तक उतर गई। जाँघें अपने आप सिकुड़ गईं। पेटीकोट के नीचे एक हल्की नमी महसूस हुई। उन्होंने आँखें भींच लीं। शर्म और इच्छा एक साथ लड़ रहे थे।
यादें आने लगीं। शादी के पहले सालों की। पति का स्पर्श। तब शरीर कितना जीवंत था। फिर बच्चे हुए, जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, और धीरे-धीरे सब कुछ rutin में बदल गया। पति के जाने के बाद तो जैसे देह मर गई हो। पर राजेश की आवाज ने उसे फिर जगा दिया था। उनकी बातें जबरदस्ती नहीं करती थीं। वे बस उस खालीपन को छू जाती थीं जिसे सुमन ने सालों से छुपा रखा था।
“क्या मैं इतनी कमजोर हूँ?” मन ने पूछा।
“नहीं,” दूसरा स्वर बोला। “तुम सिर्फ अकेली हो। और अकेलापन शरीर को भूखा कर देता है।”
वे करवट बदलकर लेटीं। नाइटी ऊपर खिसक गई। एक स्तन लगभग बाहर आ गया—गोरा, भारी, निप्पल गुलाबी और तना हुआ। उन्होंने उसे फिर से ढक लिया, पर उंगलियाँ वहीं रुक गईं। धीरे-धीरे गोलाई को सहलाया। सिहरन और तेज हो गई। दूसरी जाँघ हिली। नमी बढ़ रही थी।
“बस… यहीं तक,” उन्होंने खुद से कहा। “इससे आगे नहीं।”
पर मन नहीं मान रहा था। राजेश की आँखें याद आ रही थीं—वो शांत, समझने वाली निगाह जो उन्हें ‘माँ’ या ‘भाभी’ की तरह नहीं, बल्कि एक स्त्री की तरह देखती थी। जो उनके थके चेहरे में भी सुंदरता खोज लेती थी। जो कहती थी कि उम्र शरीर को नहीं मारती।
सुमन की साँस भारी हो गई। हाथ और नीचे चला गया। नाइटी के अंदर, पेट पर, फिर जाँघों के जोड़ पर। उंगलियाँ वहाँ रुकीं जहाँ गर्मी सबसे ज्यादा थी। उन्होंने छुआ नहीं—सिर्फ महसूस किया। नमी उंगलियों से चिपक रही थी। शर्म से उनका चेहरा जल रहा था, पर शरीर माँग कर रहा था।
“राजेश…” नाम उनके होंठों पर आ गया। फुसफुसाहट में।
तुरंत उन्होंने मुँह बंद कर लिया। आँखों में पानी आ गया। “मैं पागल हो गई हूँ। मेरे बच्चे हैं… आंचल… आरव… प्रिया। मैं क्या उदाहरण दूँगी?”
आँसू बह निकले। वे तकिए में मुँह चुुपाकर रोने लगीं। पर रोते हुए भी शरीर की गर्मी कम नहीं हुई। स्तन अभी भी भारी थे, निप्पल कपड़े से रगड़ खा रहे थे, और जाँघों के बीच वह गीलापन जैसे उन्हें याद दिला रहा हो कि देह अब चुप नहीं रहेगी।
बहुत देर बाद वे शांत हुईं। आँखें सूज गई थीं। उन्होंने नाइटी ठीक की, चादर ओढ़ ली। मन ने फैसला किया—कल से राजेश से दूरी बनाएँगी। बात नहीं करेंगी। नजरें नहीं मिलाएँगी।
पर दिल की गहराई में एक और आवाज थी, बहुत हल्की, बहुत जिद्दी—
“दूर रहकर भी तुम उन्हें भूल नहीं पाओगी। क्योंकि उन्होंने जो छुआ है, वह तुम्हारे अंदर अब जाग चुका है।”
सुमन ने आँखें बंद कर लीं। नींद दूर थी। शरीर और मन की लड़ाई जारी थी—संस्कार एक तरफ, और दूसरी तरफ वह भूखी स्त्री जो सालों बाद फिर साँस लेने लगी थी।
खिड़की के बाहर रात गहरी होती जा रही थी। और उनके अंदर की रात और भी गहरी।


सुबह का उजाला कमरे में घुस रहा था। सुमन की आँखें सूजी हुई थीं। उन्होंने रात भर बहुत कम नींद ली थी। नाइटी उतारकर उन्होंने साड़ी पहनी—आज गहरा नीला रंग, पल्लू कसकर बाँधा हुआ। जैसे कोई कवच पहन रही हों। स्तन साड़ी के आँचल के नीचे दबे हुए थे, पर उनकी भारी गोलाई छुप नहीं पा रही थी। कमर पर पेटिकोट की डोरी कसकर बाँधी गई थी।
वे रसोई में उतर आईं। चाय बनाते समय हाथ काँप रहे थे। मन में वही फैसला दोहराया जा रहा था—“आज दूरी बनाए रखूँगी। नजरें नहीं मिलाऊँगी। बात नहीं बढ़ाऊँगी।”
चाचा बैठक में पहले से बैठे थे। अखबार हाथ में था, पर आँखें उस पर नहीं। जब सुमन चाय लेकर आईं, तो उन्होंने प्याली टेबल पर रखी और तुरंत पीछे हट गईं। उंगलियाँ प्याली के हैंडल से छूती रहीं एक पल के लिए। गर्म चीनी मिट्टी का स्पर्श उनके हाथ में रह गया।
“दीदी, रात को नींद नहीं आई?” चाचा की आवाज शांत थी, जैसे रात की कोई बात उन्हें पता हो।
सुमन ने जवाब नहीं दिया। वे रसोई की तरफ मुड़ गईं। पर उनकी पीठ पर चाचा की निगाह महसूस हो रही थी। साड़ी का पल्लू हल्की हवा से थोड़ा सरका। गर्दन की नमी चमकने लगी। स्तनों में वह पुरानी भारीपन वापस आ गई—जैसे रात वाला स्पर्श अभी भी वहाँ मौजूद हो।
प्रिया भी उतर आईं। आज उन्होंने ढीली कुर्ती पहनी थी। आँखों के नीचे हल्की छाया थी। वह चाचा के पास से गुजरी तो उनकी निगाह एक पल के लिए मिली। प्रिया की साँस रुक गई। कुर्ती के कपड़े के नीचे स्तन हल्के से काँपे। वह जल्दी से पानी लेने रसोई चली गईं।
आंचल बाद में आई। फ्रॉक की जगह आज उसने सलवार-कमीज पहन रखी थी। पर कमीज का बटन गले के पास खुला था। युवा स्तनों की गोलाई साफ झलक रही थी। वह चाचा के पास बैठ गई और सीधे पूछा, “चाचा, क्या आप हमें कुछ दिन और रुकेंगे?”
चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा, “देखते हैं। घर अच्छा लग रहा है।”
सुमन ने यह बात सुन ली। उनके हाथ में चम्मच गिर गई। धातु की आवाज रसोई में गूँजी। उन्होंने जल्दी से उठाया, पर उंगलियाँ अभी भी काँप रही थीं।
नाश्ते के समय सुमन ने अपनी कुर्सी चाचा से दूर रखी। बातचीत सामान्य रखने की कोशिश की—मौसम, सब्जी के भाव, पड़ोस की औरत की बीमारी। पर हर बार जब चाचा बोलते, उनकी आवाज सुमन के शरीर में उतर जाती। स्तनों के निप्पल साड़ी के कपड़े से रगड़ खाकर सख्त हो जाते। जाँघें अपने आप सिकुड़ जातीं। नमी की एक हल्की सी अनुभूति फिर शुरू हो गई।
एक बार चाय की प्याली देते समय उनकी उंगलियाँ चाचा की उंगलियों से छू गईं। सिर्फ एक क्षण। सुमन ने जैसे बिजली छू ली हो, हाथ पीछे खींच लिया। प्याली टेबल पर झटक दी। चाय बिछ गई।
“माफ कीजिए…” उनकी आवाज काँपी।
चाचा ने तौलिया उठाया और टेबल पोंछने लगे। उनकी उंगलियाँ सुमन के हाथ के बहुत करीब आ गईं। सुमन पीछे हट गईं, पर शरीर आगे बढ़ने को हो रहा था। स्तन भारी हो गए थे। साड़ी का आँचल उनकी हलचल से थोड़ा खिसक गया। एक स्तन का ऊपरी वक्र हल्का सा दिखने लगा—गोरा, मुलायम, और उस पर पसीने की चमक।
वे जल्दी से रसोई में चली गईं। दरवाजे के पीछे खड़े होकर साँस ली। हाथ सीने पर रखा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। निप्पल इतने सख्त थे कि कपड़े से दर्द हो रहा था। जाँघों के बीच नमी अब साफ महसूस हो रही थी।
“शरीर गद्दार है,” उन्होंने फुसफुसाया। “मैं दूरी बना रही हूँ… पर यह नहीं मान रहा।”
उसी समय प्रिया रसोई में आईं। दोनों की निगाहें मिलीं। प्रिया ने कुछ नहीं कहा, पर उसकी आँखों में भी वही बेचैनी थी। एक पल के लिए दोनों औरतें एक-दूसरे की उलझन को समझ गईं—बिना बोले।
आंचल बाहर बैठक में चाचा से कुछ और पूछ रही थी। उसकी आवाज में जिज्ञासा और हल्की सी उत्तेजना थी।
सुमन ने ठंडा पानी पिया। मन ने फिर से कसम खाई—आज पूरे दिन व्यस्त रहूँगी। मंदिर जाऊँगी। पूजा लंबी करूँगी। राजेश से बात नहीं बढ़ाऊँगी।
पर जब वे बैठक में वापस आईं, तो चाचा खड़े हो चुके थे। वे उनके पास आए। दूरी बहुत कम थी। उनकी सुगंध—साबुन और हल्की सी पुरुष की गंध—सुमन के नथुनों में भर गई।
“दीदी,” उन्होंने बहुत धीमे स्वर में कहा, “आप भाग रही हैं। पर जो अंदर जाग चुका है, वह भागने से नहीं सोएगा।”
सुमन की साँस अटक गई। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस पल्लू कसकर पकड़ लिया और अपने कमरे की तरफ चली गईं। दरवाजा बंद करते समय उनकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
कमरे के अंदर उन्होंने साड़ी का पल्लू खोला। स्तन स्वतंत्र हो गए। निप्पल तने हुए थे, गुलाबी और संवेदनशील। उन्होंने उन्हें छुआ नहीं। बस आईने में देखा। आँखों में डर था, और उसके नीचे वह भूख जो रात से और तेज हो चुकी थी।
शरीर ने गद्दारी कर दी थी। और सुमन जानती थीं कि यह लड़ाई अब और कठिन होने वाली है।
Fuckuguy
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#2
रात की पूजा और दरवाजे के पार की हलचल
रात के दस बज रहे थे। घर फिर से शांत हो चुका था। आंचल अपने कमरे में किताब लेकर लेटी हुई थी, पर पन्ने पलट नहीं रही थी। प्रिया अपने कमरे का दरवाजा आधा खुला छोड़कर बैठी थी। मैं अपने कमरे की अंधेरे में खड़ा सुन रहा था।
सुमन पूजा के कमरे में थीं। उन्होंने लाल रंग की साड़ी पहन रखी थी—वही जो त्योहारों पर पहनती थीं। पल्लू सिर पर ढका हुआ था। सामने छोटी सी दीया जल रही थी। धुएँ की हल्की रेखा ऊपर उठ रही थी। वे हाथ जोड़कर बैठी थीं, होंठों पर मंत्र चल रहे थे। पर मन मंत्रों पर नहीं था।
हर साँस के साथ राजेश की आवाज याद आ रही थी—“जो अंदर जाग चुका है, वह भागने से नहीं सोएगा।”
उनके स्तन साड़ी के आँचल के नीचे भारी थे। निप्पल अभी भी सख्त थे, कपड़े से रगड़ खाकर संवेदनशील। जब वे झुककर दीया की बाती ठीक करतीं, तो स्तनों की गोलाई और उभर आती। जाँघों के बीच वह हल्की नमी रात भर बनी हुई थी। पूजा के आसन पर बैठे-बैठे उनकी कमर में एक अजीब सी बेचैनी फैल रही थी।
मंत्र अधूरा छोड़कर उन्होंने आँखें खोल दीं। दीया की रोशनी में उनकी छाया दीवार पर काँप रही थी। “भगवान… मुझे बचाओ,” उन्होंने फुसफुसाया। आवाज में प्रार्थना से ज्यादा हार थी।
उसी समय घर के दूसरे सिरे पर हलचल हुई।
प्रिया अपने कमरे से बाहर निकली। उसने हल्की सी चप्पल पहनी थी। सलवार-कमीज में शरीर की रेखाएँ साफ थीं—पतली कमर, उभरे नितंब, और स्तनों की युवा भारीपन। वह धीरे-धीरे गलियारे से गुजरी। चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर एक छोटी सी लाइट जल रही थी।
प्रिया ने दरवाजे के पास खड़े होकर आवाज दी, बहुत धीमी। “चाचा… आप जागे हुए हैं?”
अंदर से चाचा की गहरी आवाज आई। “हाँ। अंदर आ जाओ।”
प्रिया ने दरवाजा और खोला। कमरे में घुसते हुए उसकी साँस तेज हो गई। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे। छाती के बाल हल्के से दिख रहे थे। प्रिया ने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया। बस आधा रखा।
“मैं… सो नहीं पा रही,” प्रिया ने कहा। आवाज में संकोच था। “आपकी बातें… दिन भर दिमाग में घूम रही हैं。”
चाचा ने उसे कुर्सी की तरफ इशारा किया। “बैठो। कहो जो कहना है।”
प्रिया बैठ गई। सलवार का कपड़ा जाँघों पर तन गया। गोरी त्वचा की चमक लाइट में साफ थी। “मैं अपने आप को रोक नहीं पा रही। शरीर… माँग कर रहा है। पर डर भी लग रहा है।”
चाचा ने आगे झुककर कहा, “डर स्वाभाविक है। पर भूख भी। तुम बताओ—तुम्हें क्या चाहिए? सिर्फ बात? या कुछ और?”
प्रिया की उंगलियाँ सलवार के किनारे को मरोड़ रही थीं। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। “मुझे नहीं पता… बस यह अकेलापन खत्म हो जाए।”
चाचा ने हाथ बढ़ाया और उसकी हथेली पर अपनी हथेली रख दी। गर्म स्पर्श। प्रिया का शरीर सिहर उठा। उसने हाथ नहीं हटाया। उंगलियाँ एक-दूसरे में उलझ गईं।
उसी क्षण गलियारे में हल्के कदमों की आवाज आई।
आंचल अपने कमरे से निकली थी। पानी पीने के बहाने। उसने चाचा के कमरे का आधा खुला दरवाजा देखा। अंदर की रोशनी में प्रिया की पीठ और चाचा का हाथ उसकी हथेली पर दिख रहा था। आंचल की साँस रुक गई। वह दीवार से सट कर खड़ी हो गई। आँखें फटी की फटी।
उसने देखा—चाचा का दूसरा हाथ अब प्रिया के घुटने पर था। सलवार के ऊपर। उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरक रही थीं। प्रिया की गर्दन पीछे झुक गई। होंठ खुले हुए थे। कोई चुप्पी थी, सिर्फ साँसों की आवाज।
आंचल का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसकी युवा स्तन फ्रॉक (उसने फिर से फ्रॉक पहन ली थी) के अंदर काँप रहे थे। जाँघों में एक अजीब सी गर्मी फैल गई। वह वहाँ से हटी नहीं। देखती रही।
पूजा वाले कमरे में सुमन अभी भी बैठी हुई थीं। दीया की बाती अब छोटी हो चुकी थी। अचानक उन्हें गलियारे से हल्की सी आवाज सुनाई दी—किसी के कमरे का दरवाजा हिलने की। उन्होंने कान तेज किए। कुछ स्पष्ट नहीं सुनाई दिया। पर मन में एक अजीब सा संदेह उठ खड़ा हुआ।
वे उठकर खड़ी हो गईं। साड़ी का पल्लू ठीक किया। दिल तेजी से धड़क रहा था—पूजा की शांति अब टूट चुकी थी। शरीर की बेचैनी और मन का संदेह दोनों एक साथ बढ़ रहे थे।
वे गलियारे की तरफ एक कदम बढ़ातीं कि अचानक प्रिया का कमरे से निकलने का हल्का सा शोर हुआ। दरवाजा बंद हुआ। फिर सन्नाटा।
सुमन वहीं रुक गईं। अंधेरे में खड़ी। उनके स्तन भारी साँस के कारण साड़ी के अंदर गति कर रहे थे। जाँघों के बीच नमी फिर से जाग उठी थी।
और इस बार उनके मन में एक नया प्रश्न था—
“क्या सिर्फ मैं ही नहीं…?”
दीया बुझ गई। अंधेरा गहरा हो गया। घर की हर दीवार अब कुछ छुपाए हुए लग रही थी।

दीया बुझने के बाद सुमन अपने कमरे में लौट आईं। साड़ी अभी भी पहने हुए थीं। उन्होंने दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गईं। दिल की धड़कन तेज थी। गलियारे वाली आवाज उनके कानों में गूँज रही थी—दरवाजे का हिलना, फिर सन्नाटा।
“प्रिया…?” मन में सवाल उठा।
वे उठकर खड़ी हो गईं। आईने के सामने आकर पल्लू हटाया। स्तन साड़ी के आँचल से बाहर आ गए—भारी, गोरे, निप्पल अभी भी तने हुए। उन्होंने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा। उंगलियाँ गोलाई को कसकर दबा रही थीं। सिहरन कमर तक उतर गई। जाँघें खुल गईं। नमी अब चादर तक पहुँचने को थी।
“क्या वह भी…?” उन्होंने फुसफुसाया। आवाज में जलन थी—ईर्ष्या नहीं, बल्कि एक अजीब सी सहानुभूति और डर का मिश्रण। “क्या राजेश ने उसे भी छू लिया?”
उन्होंने हाथ हटाए। शर्म से चेहरा जल उठा। फिर से साड़ी ठीक की और बिस्तर पर लेट गईं। आँखें बंद कीं, पर नींद नहीं आई। हर बार पलक झपकते ही चाचा का चेहरा और प्रिया की पीठ दिखाई दे जाती।
उसी समय आंचल अपने कमरे में थी। उसने जो देखा था, वह आँखों के सामने घूम रहा था—चाचा का हाथ प्रिया के घुटने पर, उंगलियाँ धीरे-धीरे ऊपर सरकती हुई, प्रिया की गर्दन का पीछे झुकना।
आंचल ने फ्रॉक उतार दी। सिर्फ पैंटी में रह गई। युवा स्तन हवा में तन गए—गोल, सख्त, निप्पल गुलाबी और खड़े। उसने आईने के सामने खड़े होकर उन्हें देखा। हाथ बढ़ाकर एक स्तन को सहलाया। सिहरन इतनी तेज थी कि उसकी कमर काँप गई।
“भाभी… और चाचा…” उसने फुसफुसाया। आवाज में डर नहीं, बल्कि एक नई सी उत्तेजना थी।
उसने पैंटी के अंदर उंगलियाँ डालीं। वहाँ पहले से गीलापन था। उंगलियाँ धीरे-धीरे घूमने लगीं। आँखें बंद हो गईं। कल्पना में वही दृश्य और तेज हो गया—चाचा का हाथ अब और ऊपर, प्रिया की सलवार खिसकती हुई, आवाजें दबती हुई। आंचल की साँसें तेज हो गईं। जाँघें काँपने लगीं। उसने मुँह पर दूसरा हाथ रख लिया ताकि आवाज बाहर न जाए।
बहुत देर तक वह अपने शरीर से खेलती रही। फिर अचानक रुक गई। आँखें खोलीं। चेहरे पर पसीना चमक रहा था। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। उसने पैंटी ठीक की और बिस्तर पर लेट गई। मन में एक सवाल बार-बार घूम रहा था—“क्या माँ भी…?”
प्रिया अपने कमरे में वापस आ चुकी थी। दरवाजा बंद करके उसने कमीज के बटन खोले। स्तन बाहर आ गए। चाचा का हाथ अभी भी उसकी हथेली और घुटने पर महसूस हो रहा था। उसने स्तनों को पकड़ा और जोर से दबाया। निप्पल उंगलियों में दब गए। एक हल्की सी कराह निकल गई।
“उन्होंने सिर्फ इतना छुआ… और मैं इतनी गीली हो गई,” उसने खुद से कहा।
सलवार खिसकाकर उसने उंगलियाँ नीचे ले गईं। वहाँ की गर्मी और नमी ने उसे और बेचैन कर दिया। वह बिस्तर पर लेट गई। एक हाथ स्तन पर, दूसरा जाँघों के बीच। आँखें बंद करके उसने चाचा की आवाज याद की—“तुम बताओ—तुम्हें क्या चाहिए?”
शरीर जवाब माँग रहा था। पर उसने खुद को रोक लिया। पूरी तरह नहीं खोला। सिर्फ किनारे तक गई और रुक गई। साँसें उखड़ी हुई थीं। चादर गीली हो चुकी थी।
घर के तीन अलग-अलग कमरों में तीन औरतें जाग रही थीं।
एक संस्कार और इच्छा के बीच पिस रही थी।
दूसरी स्पर्श की गर्मी से जल रही थी।
तीसरी पहली बार अपनी ही देह की आग से परिचित हो रही थी।
और बीच में चाचा अपने कमरे में शांत लेटे हुए थे। आँखें खुलीं। वे जानते थे कि आज की रात ने घर की हवा बदल दी है। दीवारें अब पहले जैसी मोटी नहीं रहीं।
सुबह दूर थी। पर इच्छा और करीब आ चुकी थी।

सुबह का उजाला धीरे-धीरे घर में फैल रहा था। सुमन की आँखें रात भर की बेचैनी से सूजी हुई थीं। उन्होंने साड़ी पहनी—आज काला रंग, पल्लू कसकर बाँधा हुआ, जैसे कोई दीवार खड़ी कर रही हों। स्तन आँचल के नीचे दबे थे, पर उनकी भारी गोलाई और निप्पलों की सख्ती कपड़े को धकेल रही थी। जाँघों के बीच की नमी रात भर बनी रही थी; सुबह नहाते समय भी वह पूरी तरह नहीं गई थी।
रसोई में उतरते ही उनकी निगाह प्रिया पर पड़ी। प्रिया कुर्ती में थी, बाल खुले, आँखों के नीचे हल्की छाया। दोनों की निगाहें मिलीं। एक पल के लिए सुमन ने प्रिया की आँखों में वह वही बेचैनी देखी जो रात को खुद महसूस कर रही थीं। प्रिया ने जल्दी से निगाहें झुका लीं और चाय बनाने लग गईं।
सुमन पास गईं। आवाज बहुत धीमी रखी, “रात को देर तक जागती रही?”
प्रिया के हाथ में चम्मच थम गई। “हाँ… नींद नहीं आई।”
सुमन ने और कुछ नहीं पूछा। बस प्रिया के गले की हल्की लालिमा और कुर्ती के खुले बटन पर एक पल के लिए निगाह दौड़ाई। स्तनों की युवा गोलाई साफ झलक रही थी। सुमन का मन और उलझ गया। संदेह अब पक्का होता जा रहा था।
आंचल बाद में आई। उसने साधारण सलवार-कमीज पहन रखी थी, पर कमीज का ऊपरी बटन खुला छोड़ दिया था। युवा स्तनों की सख्त गोलाई हर साँस के साथ हिल रही थी। वह नाश्ते की मेज पर बैठते ही चाचा की ओर देखने लगी। निगाह में वह जिज्ञासा थी जो रात को आईने के सामने जाग चुकी थी। चाचा ने उसकी ओर देखा, पर कुछ नहीं कहा। बस हल्की सी मुस्कान दी—वही शांत, समझने वाली मुस्कान।
नाश्ता खत्म होने के बाद घर में काम का बहाना चल पड़ा। प्रिया कपड़े सुखाने छत पर चली गईं। आंचल किताब लेकर बालकनी में बैठ गई। आरव अपने कमरे में चला गया।
सुमन रसोई में बर्तन धो रही थीं कि चाचा अंदर आ गए। दरवाजा उन्होंने आधा ही बंद किया। दूरी कम थी। रसोई की गर्मी में सुमन की गर्दन पर पसीना चमक रहा था। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक चुका था। पीठ की चिकनी त्वचा और कमर का मोड़ साफ दिख रहा था।
चाचा ने पानी का गिलास उठाया। फिर धीरे से बोले, “दीदी, आप रात भर जागी हैं। आँखें बता रही हैं।”
सुमन ने बर्तन पर नजर रखी। “कुछ नहीं… बस नींद नहीं आई।”
चाचा एक कदम और करीब आए। उनकी आवाज और धीमी हो गई, “संदेह भी नींद नहीं आने देता। है ना?”
सुमन के हाथ रुक गए। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। चाचा बहुत नजदीक थे। उनकी साँस सुमन के गाल तक महसूस हो रही थी। स्तन भारी हो गए। निप्पल साड़ी के कपड़े से रगड़ खाकर और सख्त हो उठे। जाँघें अपने आप सिकुड़ गईं।
“आप… आप क्या कह रहे हैं?” सुमन की आवाज काँपी।
चाचा ने हाथ बढ़ाया। उंगलियाँ सुमन की कलाई पर रख दीं—वहीं जहाँ नसों की धड़कन तेज चल रही थी। “मैं कुछ नहीं कह रहा। आप खुद महसूस कर रही हैं। प्रिया की आँखों में जो देखा, वह आपने खुद में भी देखा है।”
सुमन ने हाथ खींचने की कोशिश की, पर चाचा ने हल्का सा दबाया। गर्म स्पर्श उनकी त्वचा में उतर गया। स्तनों में सिहरन दौड़ गई। नमी फिर से जाग उठी।
“यह गलत है, राजेश…” उन्होंने फुसफुसाया। “मैं आपकी भाभी हूँ।”
“और एक स्त्री भी,” चाचा ने उत्तर दिया। स्वर में कोई जल्दबाजी नहीं थी। “जो सालों से भूखी है। शरीर अब छुप नहीं रहा, दीदी। आप जब भी मेरे पास आती हैं, आपके निप्पल तन जाते हैं। साड़ी का पल्लू बार-बार सरकता है। जाँघें सिकुड़ती हैं। यह सब मैं देख रहा हूँ।”
सुमन की आँखें भर आईं। उन्होंने अपना हाथ छुड़ाया और पीछे हट गईं। पीठ दीवार से सट गई। साड़ी का आँचल पूरी तरह सरक चुका था। एक स्तन का ऊपरी भाग लगभग बाहर था—गोरा, भारी, निप्पल कपड़े के नीचे गुलाबी बिंदु की तरह तना हुआ।
चाचा ने आगे कदम नहीं बढ़ाया। बस खड़े रहे। “मैं जबरदस्ती नहीं करूँगा। जब आप खुद कहेंगी… तब।”
सुमन ने पल्लू जल्दी से ठीक किया। साँसें उखड़ी हुई थीं। वे रसोई से बाहर निकल गईं, पर उनके जाने के बाद भी शरीर की गर्मी रसोई में बनी रही।
बालकनी में आंचल यह सब आंशिक रूप से सुन चुकी थी। उसने किताब बंद कर दी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। युवा स्तन कमीज के अंदर काँप रहे थे। उसने अपनी जाँघें भींच लीं। रात वाली गर्मी वापस आ गई थी।
छत पर प्रिया कपड़े टाँग रही थी। हवा में उसकी कुर्ती उड़ रही थी। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे। चाचा के कल वाले स्पर्श की याद आते ही उसकी उंगलियाँ रुक गईं। उसने आसपास देखा, फिर एक हाथ से अपने स्तन को हल्के से दबाया—जैसे कोई सबूत खोज रही हो कि वह गर्मी अभी भी बाकी है।
घर की तीनों औरतें अब एक ही अदृश्य धागे से बँध चुकी थीं।
सुमन की लड़ाई और गहरी हो गई थी।
प्रिया की भूख और साफ हो गई थी।
आंचल की जिज्ञासा अब खतरे के किनारे पर खड़ी थी।
और चाचा शांत खड़े थे—जैसे वे जानते हों कि अगला कदम अब किसी औरत का होगा, उनका नहीं।

रात के ग्यारह बज चुके थे। घर फिर से सन्नाटे में डूबा था। पंखे की मंद आवाज के अलावा कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। सुमन अपने कमरे में बैठी हुई थीं। साड़ी उतारकर उन्होंने नाइटी पहन ली थी—ढीली सफेद, जो उनके भारी स्तनों की गोलाई को मुश्किल से ढक पा रही थी। निप्पल कपड़े के नीचे तने हुए बिंदुओं की तरह उभर रहे थे। जाँघें चादर पर फैली हुई थीं, उनके बीच की हल्की नमी अभी भी बाकी थी।
मन में वही संघर्ष चल रहा था। “सिर्फ बात करूँगी। बस इतना ही।”
वे उठ खड़ी हुईं। चप्पल नहीं पहनी। गलियारे में धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर छोटी सी लाइट जल रही थी। सुमन ने दरवाजे पर हल्के से ठोकर लगाई।
“राजेश… जागे हुए हो?”
अंदर से गहरी आवाज आई, “हाँ, दीदी। आ जाओ।”
सुमन अंदर गईं। दरवाजा उन्होंने पूरी तरह बंद नहीं किया। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज के बटन खुले हुए थे। छाती के बाल लाइट में चमक रहे थे। सुमन कुर्सी पर बैठ गईं। नाइटी का कपड़ा जाँघों पर तन गया। गोरी, मोटी जाँघें साफ दिख रही थीं।
“मैं… बात करना चाहती थी,” सुमन ने कहा। आवाज में संकोच था। “आज रसोई में जो कुछ हुआ… वह मेरे मन से नहीं उतर रहा।”
चाचा ने उन्हें देखा। निगाह में कोई जल्दबाजी नहीं थी। “कहकर देखो। जो भी है।”
सुमन की उंगलियाँ नाइटी के किनारे को मरोड़ रही थीं। स्तन तेजी से उठ-गिर रहे थे। “मैं डरती हूँ। अपने आप से। शरीर… मान नहीं रहा। जब आप पास होते हो तो… सब गड़बड़ हो जाता है।”
चाचा कुर्सी से उठे और उनके सामने खड़े हो गए। दूरी बहुत कम रह गई। “शरीर गड़बड़ नहीं कर रहा, दीदी। वह सिर्फ याद दिला रहा है कि वह अभी भी जीवित है। आप सालों से उसे चुप कराती रही हैं।”
सुमन ने आँखें उठाईं। चाचा की आँखें बहुत करीब थीं। उनकी साँस सुमन के होठों तक महसूस हो रही थी। एक पल के लिए सुमन का शरीर आगे बढ़ने को हुआ। स्तन लगभग छूने को थे। फिर उन्होंने खुद को रोक लिया।
“मैं जाऊँ,” उन्होंने फुसफुसाया और उठ खड़ी हुईं।
चाचा ने उनका हाथ पकड़ लिया—सिर्फ कलाई से। गर्म उंगलियाँ। सुमन की साँस अटक गई। निप्पल और सख्त हो गए। नाइटी के कपड़े में उनकी आकृति साफ उभर आई।
“जब तैयार हो, तब लौटना,” चाचा ने धीरे से कहा। हाथ छोड़ दिया।
सुमन कमरे से निकल गईं। गलियारे में उनका शरीर काँप रहा था। स्तन भारी थे, जाँघों के बीच नमी बढ़ चुकी थी। वे अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया और बिस्तर पर गिर गईं। हाथ अपने आप स्तनों पर चले गए। उंगलियाँ निप्पलों को दबा रही थीं। सिहरन इतनी तेज थी कि उन्होंने मुँह तकिए में दबा लिया।
उसी समय प्रिया अपने कमरे में थी। उसने कल वाले स्पर्श की गर्मी को बर्दाश्त नहीं किया। कमीज उतार दी। स्तन स्वतंत्र हो गए—गोल, सख्त, निप्पल तने हुए। उसने आईने के सामने खड़े होकर दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा और जोर से दबाया। एक हल्की कराह निकल गई। फिर सलवार खिसकाई। उंगलियाँ नीचे चली गईं। वहाँ की गर्मी और गीलापन ने उसे काँप दिया।
इस बार उसने खुद को नहीं रोका। उंगलियाँ अंदर-बाहर होने लगीं। आँखें बंद थीं। कल्पना में चाचा का हाथ उसके घुटने से ऊपर सरक रहा था, फिर और ऊपर। साँसें तेज हो गईं। जाँघें काँपने लगीं। शरीर में एक लहर दौड़ी—पहली बार इतनी तीव्र। उसने मुँह पर हाथ रख लिया। आवाज दबा ली। चादर गीली हो गई।
बहुत देर बाद वह शांत हुई। शरीर ढीला पड़ गया। आँखों में पानी था—संतुष्टि और शर्म का मिश्रण।
आंचल ने यह सब आंशिक रूप से भाँप लिया था। वह अपने कमरे से निकली और गलियारे में चुपचाप खड़ी हो गई। चाचा के कमरे का दरवाजा अब बंद था। माँ का कमरा भी। प्रिया के कमरे से हल्की सी आवाजें आ रही थीं—साँसों की, फिर सन्नाटा।
आंचल का दिल जोर से धड़क रहा था। उसने अपने कमरे में वापस जाकर फ्रॉक उतार दी। सिर्फ पैंटी में रह गई। युवा स्तन हवा में तन गए। उसने एक हाथ से स्तन सहलाया, दूसरे हाथ से पैंटी के अंदर उंगलियाँ डालीं। रात वाला दृश्य आँखों के सामने घूम रहा था—चाचा का हाथ, प्रिया की गर्दन, माँ की काँपती आवाज। उंगलियाँ तेज घूमने लगीं। शरीर में गर्मी फैल गई। उसने खुद को रोकने की कोशिश नहीं की। पहली बार पूरा अनुभव लिया—काँपते हुए, मुँह दबाए हुए।
घर की तीनों औरतें उसी रात अपने-अपने कमरों में अपनी भूख से मिलीं।
सुमन ने सिर्फ छुआ।
प्रिया ने पहली बार खुद को पूरा खोला।
आंचल ने अपनी जिज्ञासा को शरीर तक पहुँचा दिया।
और चाचा अपने कमरे में जाग रहे थे। वे जानते थे कि आज की रात ने एक रेखा पार कर दी है। अगली बार कोई सिर्फ बात करने नहीं आएगा।

सुबह का उजाला इस बार भारी लग रहा था। घर की हवा में एक अजीब सी नमी तैर रही थी—जैसे रात की घटनाएँ दीवारों में समा गई हों।
सुमन रसोई में थीं। साड़ी आज हल्के गुलाबी रंग की थी। पल्लू ढीला छोड़ रखा था। स्तन आँचल के नीचे भारी और संवेदनशील थे; हर हल्की रगड़ पर निप्पल तन जाते। जाँघों के बीच की नमी नहाते समय भी पूरी तरह साफ नहीं हुई थी। उनकी आँखों में उलझन साफ थी—शर्म, इच्छा और एक नई सी स्वीकारोक्ति का मिश्रण।
प्रिया जब उतरकर आई तो उसकी चाल में फर्क था। कुर्ती का कपड़ा शरीर से चिपक रहा था। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे। आँखों में वह चमक थी जो रात की संतुष्टि के बाद आती है। वह सुमन के पास से गुजरी तो दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। सुमन ने प्रिया की गर्दन पर हल्की लालिमा देखी। प्रिया ने जल्दी से निगाहें फेर लीं, पर उसके होठों पर एक छोटी सी सिहरन रह गई।
आंचल सबसे बाद में आई। उसने ढीली फ्रॉक पहन रखी थी। युवा स्तन कपड़े के अंदर सख्त थे। चलते समय उसकी जाँघें एक-दूसरे से रगड़ खा रही थीं। वह नाश्ते की मेज पर बैठती तो बार-बार अपनी स्थिति संभालती—जैसे शरीर अभी भी रात की गर्मी याद रख रहा हो। चाचा की ओर उसकी निगाह बार-बार उठती और झुक जाती।
नाश्ता चुपचाप हुआ। चाचा सामान्य बातें करते रहे—मौसम, बाजार, पुरानी यादें। पर उनकी निगाह हर औरत पर एक-एक करके रुकती। सुमन की साड़ी का सरकता पल्लू, प्रिया के तने हुए निप्पल, आंचल की बेचैन जाँघें—सब नोट कर रहे थे।
नाश्ते के बाद प्रिया कपड़े धोने के बहाने पीछे के आँगन में चली गई। आंचल बालकनी में किताब लेकर बैठ गई। आरव बाहर चला गया।
सुमन पूजा के कमरे में दीया जलाने गईं। तभी चाचा ने पीछे से आवाज दी, “दीदी, एक मिनट।”
सुमन मुड़ीं। चाचा गलियारे में खड़े थे। उन्होंने इशारे से अपने कमरे की तरफ बुलाया। सुमन का दिल तेज धड़कने लगा। वे धीरे-धीरे उनके कमरे तक गईं। चाचा ने दरवाजा बंद कर दिया। कुंडी लग गई।
कमरे में हल्की रोशनी थी। सुमन दीवार से सट गईं। साड़ी का पल्लू कंधे से सरक चुका था। स्तनों की भारी गोलाई साफ उभर रही थी।
चाचा पास आए। दूरी अब कुछ इंच की रह गई थी। “रात को आप आई थीं। बात अधूरी रह गई।”
सुमन ने निगाहें झुका लीं। “मैं… मैं सिर्फ बात करने आई थी।”
चाचा ने हाथ बढ़ाया। उंगलियाँ सुमन के गाल पर रखीं। गर्म स्पर्श। सुमन की साँस रुक गई। फिर उंगलियाँ धीरे-धीरे नीचे सरकीं—गर्दन से होती हुई कॉलरबोन तक। साड़ी का आँचल और खिसक गया। एक स्तन का ऊपरी भाग बाहर आ गया। गोरा, मुलायम, निप्पल गुलाबी और तना हुआ।
चाचा ने उसे नहीं छुआ। बस पास से देखा। “यह शरीर अब छुपाने लायक नहीं रहा, दीदी। यह माँग कर रहा है।”
सुमन की आँखें बंद हो गईं। शरीर काँप रहा था। जाँघें सिकुड़ गईं। नमी ताजी हो उठी। चाचा का हाथ अब उनके कंधे पर था, फिर पीठ पर। उंगलियाँ कमर के मोड़ तक पहुँचीं। साड़ी का कपड़ा हल्के से दब गया।
“राजेश…” सुमन की आवाज टूटी हुई थी। “बस… यहीं तक।”
चाचा रुक गए। हाथ हटा लिया। “जैसा आप कहें।”
पर उन्होंने एक कदम और करीब आकर अपनी साँस सुमन के कान तक पहुँचाई। “अगली बार जब आओगी, तो सिर्फ बात के लिए नहीं आना।”
सुमन ने आँखें खोलीं। चेहरा लाल था। उन्होंने जल्दी से पल्लू ठीक किया और दरवाजा खोला। गलियारे में निकलते समय उनके पैर काँप रहे थे। स्तन भारी थे, निप्पल कपड़े से दर्द कर रहे थे। जाँघों के बीच गीलापन अब साफ महसूस हो रहा था।
वे अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया। साड़ी का आँचल पूरी तरह खोला। दोनों स्तन बाहर आ गए। उन्होंने उन्हें हाथों में लिया और जोर से दबाया। सिहरन कमर तक उतर गई। उंगलियाँ निप्पलों पर घूमने लगीं। आँखें बंद थीं। कल्पना में चाचा का हाथ अब स्तनों तक पहुँच चुका था। उन्होंने जाँघें खोल दीं। एक हाथ नीचे चला गया। नमी उंगलियों से चिपक रही थी। इस बार उन्होंने खुद को थोड़ा और आगे बढ़ने दिया—किनारे तक, फिर रुक गईं। साँसें उखड़ी हुई थीं। तकिया गीला हो चुका था।
बाहर बालकनी में आंचल ने माँ के कमरे का दरवाजा बंद होते देखा था। उसने किताब बंद कर दी। फ्रॉक के अंदर उसके युवा स्तन काँप रहे थे। उसने अपनी जाँघें भींच लीं। जिज्ञासा अब शरीर की गर्मी में बदल चुकी थी।
आँगन में प्रिया कपड़े धोते-धोते रुक गई। उसके मन में रात वाली संतुष्टि अभी भी तैर रही थी। उसने आसपास देखा, फिर एक हाथ से अपने स्तन को कुर्ती के ऊपर से दबाया। निप्पल तुरंत सख्त हो गया। मुस्कान हल्की सी फैल गई—जैसे कोई गुप्त जीत मिल गई हो।
घर अब पहले जैसा नहीं रहा था।
सुमन ने पहली बार बंद दरवाजे के पीछे स्पर्श को स्वीकार किया था।
प्रिया अपनी भूख को छुपा नहीं पा रही थी।
आंचल हर हलचल को नोट कर रही थी।
और चाचा अपने कमरे में खड़े थे। उंगलियों पर अभी भी सुमन की त्वचा की गर्माहट बाकी थी। वे जानते थे कि अगली दीवार अब गिरने वाली है।

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। घर पूरी तरह सो चुका लग रहा था। पर तीन कमरों में आँखें खुली थीं।
प्रिया अपने बिस्तर पर beless लेटी नहीं रह सकी। शरीर जल रहा था। उसने हल्की सी नाइटी पहन रखी थी—पतली, सफेद, नीचे कुछ नहीं। स्तन पूरी तरह साफ झलक रहे थे। निप्पल तने हुए, गहरे गुलाबी। जाँघों के बीच पहले से गीलापन फैल चुका था। वह उठी और चुपके से गलियारे में निकली।
चाचा के कमरे का दरवाजा आधा खुला था। प्रिया ने हल्के से ठोकर लगाई।
“चाचा…”
अंदर से आवाज आई, “आ जाओ।”
प्रिया घुसी और पीछे से दरवाजा बंद कर दिया। कुंडी लगा दी। कमरे में सिर्फ एक छोटी सी लाइट जल रही थी। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज पूरी तरह खुली हुई थी। छाती के बाल, मजबूत पेट, और नीचे पैंट में उभरी हुई सख्ती साफ दिख रही थी।
प्रिया की साँस तेज हो गई। “मैं… सो नहीं पा रही। शरीर पागल हो रहा है।”
चाचा ने उसे पास बुलाया। प्रिया नजदीक गई। चाचा ने उसका हाथ पकड़ा और अपनी हथेली पर रखा। फिर धीरे-धीरे उसका हाथ अपनी छाती पर फेरने लगे। प्रिया की उंगलियाँ बालों में उलझ गईं। गर्म त्वचा।
“यहीं तक नहीं रहेगा,” चाचा ने धीमी आवाज में कहा। “तुम खुद बताओ, कहाँ तक ले जाना है।”
प्रिया का शरीर काँप रहा था। चाचा ने उसका हाथ छोड़ा और दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ ली। नाइटी ऊपर खिसक गई। नितंब नंगे हो गए। चाचा की उंगलियाँ गोल, मुलायम नितंबों पर फिरने लगीं। जोर से दबाया। प्रिया की एक हल्की कराह निकल गई।
फिर चाचा ने नाइटी और ऊपर की। दोनों स्तन बाहर आ गए—गोल, सख्त, निप्पल खड़े। चाचा ने एक स्तन को हाथ में लिया। भारी गोलाई को मसलने लगे। निप्पल को अंगूठे और उंगली से दबाया, ऐंठा। प्रिया की कमर लचक गई। जाँघें खुल गईं।
“आह… चाचा…” आवाज दबी हुई थी।
चाचा ने दूसरा स्तन भी पकड़ लिया। दोनों हाथों से मसल रहे थे, निप्पलों को खींच रहे थे। प्रिया की नाइटी कमर तक उलझी हुई थी। चाचा का एक हाथ नीचे गया। उंगलियाँ जाँघों के अंदर स्लाइड हुईं। गीलापन उंगलियों से चिपक गया। उन्होंने धीरे से एक उंगली अंदर धकेल दी।
प्रिया की आँखें बंद हो गईं। मुँह खुला। साँसें तेज। चाचा की उंगली अंदर-बाहर होने लगी। दूसरी उंगली भी अंदर चली गई। प्रिया की जाँघें काँप रही थीं। नितंब चाचा के हाथ में दब रहे थे। स्तन उनके चेहरे के करीब आ गए। चाचा ने एक निप्पल मुँह में ले लिया। जीभ घुमाने लगे, दाँतों से हल्के से काटने लगे।
प्रिया का शरीर ऐंठने लगा। “और… अंदर… जोर से…”
चाचा ने उंगलियाँ तेज कीं। अंगूठा ऊपर की संवेदनशील जगह पर रगड़ने लगा। प्रिया की कराहें दबाने के बावजूद निकल रही थीं। अचानक शरीर में तेज लहर दौड़ी। जाँघें चाचा के हाथ के आसपास कस गईं। अंदर की दीवारें उंगलियों को जकड़ रही थीं। पानी की तरह गीलापन बह निकला। प्रिया काँपते हुए चाचा के कंधे से लिपट गई।
बहुत देर तक दोनों वैसे ही रहे। प्रिया की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हुईं। चाचा ने उंगलियाँ निकालीं। वे चमक रही थीं। प्रिया ने शर्म से आँखें चुरा लीं, पर शरीर अभी भी काँप रहा था।
उसी समय सुमन अपने कमरे में खड़ी थीं। कान गलियारे की तरफ। प्रिया की दबी कराहें उन्हें साफ सुनाई दे रही थीं। “आह… चाचा… जोर से…”
सुमन की साड़ी का पल्लू अपने आप सरक गया। स्तन बाहर आ गए। उन्होंने एक स्तन को जोर से पकड़ लिया। निप्पल इतना सख्त था कि दर्द हो रहा था। दूसरा हाथ साड़ी के नीचे चला गया। उंगलियाँ गीलेपन में डूब गईं। प्रिया की कराहें सुनकर सुमन की उंगलियाँ तेज हो गईं। आँखें बंद। कल्पना में वही दृश्य—चाचा के हाथ, प्रिया के स्तन, उंगलियाँ अंदर। सुमन की कमर लचकने लगी। वह दीवार से सट गईं। मुँह पर हाथ रखा। शरीर में लहर दौड़ी। जाँघें काँप उठीं। नमी उनकी उंगलियों से नीचे टपकने लगी।
आंचल ने भी आवाजें सुन ली थीं। वह चुपके से गलियारे में आ गई। चाचा के कमरे के दरवाजे के पास खड़ी हो गई। अंदर से हल्की सी चरमराने की आवाज और प्रिया की भारी साँसें आ रही थीं। आंचल की फ्रॉक के अंदर युवा स्तन तन गए। उसने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। उंगलियाँ घूमने लगीं। आँखें बंद करके वह कल्पना करने लगी—अंदर क्या हो रहा होगा। शरीर जल्दी ही काँप उठा। उसने मुँह दबा लिया। गीलापन उसकी उंगलियों पर फैल गया।
दरवाजे के अंदर प्रिया अभी भी चाचा के पास खड़ी थी। नाइटी कमर तक उलझी हुई। स्तन नंगे। जाँघों से नमी चमक रही थी। चाचा ने उसके निप्पल को फिर से हल्के से ऐंठा और कहा, “यह तो बस शुरुआत है। अगली बार और ले लूँगा।”
प्रिया ने कुछ नहीं कहा। बस काँपते हुए नाइटी ठीक की और दरवाजा खोला। गलियारे में आंचल जल्दी से अंधेरे में गायब हो गई। प्रिया अपने कमरे की तरफ चली गई। चाल लड़खड़ा रही थी।
सुमन अपने कमरे में वापस बिस्तर पर गिर गईं। शरीर ढीला। उंगलियाँ अभी भी गीली। आँखों में पानी था—उत्तेजना और जलन दोनों।
घर की दीवारें अब सिर्फ ईंट की नहीं रह गई थीं। वे साँसें, कराहें और गीलापन सोख रही थीं।
Fuckuguy
albertprince547;
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#3
सुबह का उजाला इस बार और भी भारी लग रहा था। घर की हवा में रात की कराहें और गीलापन अभी भी तैर रहा था।
प्रिया जब रसोई में उतरी तो उसकी चाल बिलकुल अलग थी। कुर्ती पतली थी, अंदर ब्रा नहीं। स्तन स्वतंत्र रूप से हिल रहे थे, निप्पल कपड़े को धकेल रहे थे। जाँघों के बीच चलते समय हल्की सी रगड़ हो रही थी। आँखों में वह शांत, संतुष्ट चमक थी जो रात भर की तीव्रता के बाद आती है। वह सुमन के पास से गुजरी तो जानबूझकर उनकी निगाह से निगाह मिलाई। एक पल के लिए। फिर मुस्कुरा दी—हल्की, गुप्त।
सुमन की साड़ी का पल्लू उस मुस्कान से ही सरक गया। स्तन भारी हो गए। निप्पल तुरंत सख्त। उन्होंने जल्दी से निगाहें झुका लीं, पर शरीर ने गद्दारी कर दी। जाँघें भींच गईं। नमी ताजी महसूस हुई।
आंचल नाश्ते पर आई तो फ्रॉक की जगह उसने छोटी सी नाइटी जैसी कुर्ती पहन रखी थी। युवा स्तन साफ उभरे हुए थे। निप्पल की आकृति कपड़े पर साफ दिख रही थी। वह चाचा के सामने से गुजरी तो जानबूझकर धीरे चली। जाँघें हिलीं। चाचा की निगाह एक पल के लिए उसकी युवा गोलाई पर रुकी, फिर सामान्य हो गई।
नाश्ता चुपचाप चला। पर हर कोई जान रहा था कि रात कुछ बदल चुकी है।
नाश्ते के बाद प्रिया छत पर चली गई। आंचल बालकनी में। आरव बाहर।
चाचा ने सुमन को रसोई से बुलाया। आवाज सामान्य थी, “दीदी, एक मिनट कमरे में।”
सुमन का दिल जोर से धधकने लगा। वे उनके कमरे तक गईं। चाचा ने दरवाजा बंद किया। कुंडी लगा दी।
कमरे में हल्की रोशनी थी। सुमन दीवार से सट गईं। साड़ी का पल्लू पहले से ही ढीला था। चाचा पास आए। बिना कुछ कहे उन्होंने सुमन का पल्लू पूरी तरह हटा दिया। दोनों स्तन साड़ी के आँचल से बाहर आ गए—भारी, गोरे, निप्पल गहरे गुलाबी और तने हुए।
चाचा ने दोनों हाथों से स्तन पकड़ लिए। जोर से मसला। उंगलियों से निप्पलों को ऐंठा, खींचा। सुमन की कराह दबी हुई निकली। “राजेश… आह…”
चाचा ने एक निप्पल मुँह में ले लिया। जीभ घुमाई, जोर से चूसा। दाँतों से हल्के से काटा। सुमन की कमर लचक गई। पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। चाचा का दूसरा हाथ साड़ी के नीचे चला गया। पेटीकोट ऊपर खिसकाया। उंगलियाँ सीधे गीलेपन पर पहुँच गईं।
“इतनी गीली… सिर्फ कराहें सुनकर,” चाचा ने निप्पल छोड़कर कहा। आवाज भारी थी।
उंगलियाँ अंदर घुस गईं—दो उंगलियाँ एक साथ। सुमन की आँखें बंद हो गईं। मुँह खुला। चाचा की उंगलियाँ तेज अंदर-बाहर होने लगीं। अंगूठा ऊपर की घुंडी पर जोर-जोर से रगड़ने लगा। दूसरी ओर मुँह फिर से स्तन पर था—चूसते हुए, काटते हुए, जीभ घुमाते हुए।
सुमन का शरीर काँप रहा था। जाँघें चाचा के हाथ को जकड़ रही थीं। “और… जोर से… अंदर…” आवाज टूटी हुई थी।
चाचा ने उंगलियाँ और तेज कीं। तीसरी उंगली भी अंदर धकेल दी। सुमन की कराहें अब दबाने के बावजूद निकल रही थीं। अचानक शरीर में तेज बिजली दौड़ी। अंदर की दीवारें उंगलियों को कसकर जकड़ गईं। पानी की तरह गीलापन चाचा की हथेली पर बह निकला। सुमन काँपते हुए चाचा के कंधे से लिपट गईं। स्तन उनके चेहरे पर दब गए।
बहुत देर तक वे वैसे ही रहे। सुमन की साँसें उखड़ी हुई थीं। चाचा ने उंगलियाँ निकालीं। वे पूरी तरह चमक रही थीं। उन्होंने सुमन की आँखों में देखा और उंगलियाँ उनके होठों पर रख दीं। सुमन ने बिना सोचे उन्हें मुँह में ले लिया। चाखी।
चाचा ने धीरे से कहा, “अब तुम भी प्रिया जैसी हो गई हो। अगली बार पूरा लूँगा।”
सुमन ने कुछ नहीं कहा। बस काँपते हुए साड़ी ठीक की। दरवाजा खोला। गलियारे में निकलते समय उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। साड़ी का निचला हिस्सा हल्का गीला था।
वे अपने कमरे में जाकर गिर गईं। शरीर अभी भी काँप रहा था। स्तन नंगे। निप्पल पर चाचा के दाँतों के हल्के निशान। जाँघों के बीच नमी बह रही थी। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। पहली बार इतनी तीव्र संतुष्टि मिली थी—और वह भी अपने देवर की उंगलियों से।
बाहर बालकनी में आंचल ने माँ के कमरे से आती दबी कराहें सुन ली थीं। उसने कुर्ती ऊपर की। युवा स्तन नंगे कर दिए। एक हाथ से मसलने लगी, दूसरा पैंटी के अंदर। उंगलियाँ तेज घूमने लगीं। आँखें बंद। कल्पना में माँ और चाचा। शरीर जल्दी काँप उठा। गीलापन उसकी उंगलियों से नीचे टपकने लगा। उसने मुँह दबा लिया। कराह अंदर ही दब गई।
छत पर प्रिया खड़ी थी। हवा में उसकी कुर्ती उड़ रही थी। उसने जानबूझकर ब्रा नहीं पहनी थी। निप्पल हवा में तन गए थे। मुस्कान उसके होठों पर थी—अब वह अकेली नहीं रह गई थी।
घर की तीनों औरतें अब एक ही आग में जल रही थीं।
सुमन ने पहली बार पूरा चरम सुख चाचा की उंगलियों से लिया था।
प्रिया अपनी जीत पर मुस्कुरा रही थी।
आंचल अपनी बारी का इंतजार कर रही थी।
और चाचा अपने कमरे में उंगलियाँ सूंघ रहे थे। सुमन की गंध अभी भी उन पर बाकी थी। वे जानते थे कि अब कोई वापस नहीं लौटेगा।

रात के बारह बजने वाले थे। घर में सन्नाटा पसरा था, पर हवा भारी थी।
आंचल अपने कमरे में beless नहीं रह सकी। शरीर जल रहा था। उसने सिर्फ एक पतली सी स्लिप पहन रखी थी—नीचे कुछ नहीं। युवा स्तन सख्त थे, निप्पल तने हुए, गुलाबी। जाँघों के बीच पहले से ही गीलापन फैल चुका था। रात-रात भर माँ और भाभी की कराहें उसके कानों में गूँज रही थीं। अब वह और इंतजार नहीं कर सकती थी।
वह उठी। चप्पल नहीं पहनी। गलियारे में धीरे-धीरे गई। चाचा के कमरे के दरवाजे पर खड़ी हुई। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। फिर हल्के से ठोकर लगाई।
“चाचा… आप जागे हो?”
अंदर से गहरी आवाज आई, “आ जाओ।”
आंचल घुसी। दरवाजा बंद किया। कुंडी लगा दी। कमरे में मंद रोशनी थी। चाचा बिस्तर पर बैठे थे। कमीज खुली हुई। पैंट में सख्ती साफ उभरी हुई थी। आंचल की निगाह वहीं अटक गई। उसकी साँस तेज हो गई।
चाचा ने उसे देखा। “तुम भी आ गई। सोच रहा था कब आओगी।”
आंचल पास गई। आवाज काँप रही थी, “मैं… सुन रही थी। माँ को… भाभी को… मुझे भी… वैसा ही चाहिए।”
चाचा ने उसे और करीब खींच लिया। दोनों हाथों से उसकी पतली कमर पकड़ी। स्लिप ऊपर खिसक गई। नितंब नंगे हो गए—गोल, मुलायम, युवा। चाचा ने जोर से दबाया। आंचल की हल्की कराह निकल गई।
फिर स्लिप पूरी तरह ऊपर की। दोनों युवा स्तन बाहर आ गए—सख्त, गोल, निप्पल खड़े। चाचा ने एक को मुँह में ले लिया। जोर से चूसा। जीभ घुमाई। दाँतों से हल्के से काटा। आंचल की कमर लचक गई। “आह… चाचा…”
चाचा ने दूसरा स्तन भी हाथ में ले लिया। मसलने लगे। निप्पलों को ऐंठने लगे। आंचल का शरीर काँप रहा था। चाचा का एक हाथ नीचे गया। उंगलियाँ सीधे गीलेपन पर पहुँचीं। इतनी नमी थी कि उंगलियाँ फिसल गईं।
“इतनी प्यासी… पहली बार?” चाचा ने पूछा।
आंचल ने सिर हिलाया। आँखें बंद थीं। चाचा ने दो उंगलियाँ एक साथ अंदर धकेल दीं। आंचल की कराह निकल गई। जाँघें काँप उठीं। चाचा की उंगलियाँ तेज अंदर-बाहर होने लगीं। अंगूठा ऊपर की घुंडी पर जोर से रगड़ने लगा। मुँह स्तन पर था—चूसते, काटते, जीभ से खेलते।
आंचल का शरीर ऐंठने लगा। “और… जोर से… अंदर तक…”
चाचा ने उंगलियाँ और तेज कीं। तीसरी उंगली भी अंदर चली गई। आंचल की कराहें अब दबाने के बावजूद जोर से निकल रही थीं। अचानक शरीर में तेज लहर दौड़ी। अंदर की दीवारें उंगलियों को जकड़ गईं। गीलापन चाचा की हथेली पर बह निकला। आंचल काँपते हुए चाचा से लिपट गई। युवा स्तन उनके चेहरे पर दब गए।
बहुत देर तक वह काँपती रही। फिर चाचा ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। स्लिप पूरी तरह उतार दी। आंचल नंगी लेटी थी—युवा स्तन उठे हुए, जाँघें खुली हुई, बीच में चमकता गीलापन। चाचा ने उसके पैरों को और फैलाया। सिर नीचे किया। जीभ सीधे उस गीली जगह पर लगा दी।
आंचल की कमर उछल गई। “आह्ह… चाचा… जीभ… वहाँ…”
चाचा की जीभ तेज घूमने लगी। अंदर तक घुस रही थी। ऊपर की घुंडी को चूस रहे थे। आंचल के हाथ चाचा के बालों में उलझ गए। जाँघें उनके सिर को जकड़ रही थीं। दूसरी बार लहर और तेज आई। आंचल की कराहें कमरे में गूँज गईं। शरीर ऐंठ गया। पानी की तरह रस उनकी जीभ पर बह निकला।
उसी समय सुमन अपने कमरे में खड़ी थीं। कान दरवाजे से सटे। आंचल की कराहें साफ सुनाई दे रही थीं—“आह… चाचा… जीभ… जोर से…”
सुमन की साड़ी अपने आप खुल गई। स्तन नंगे। उन्होंने एक हाथ से स्तन मसलना शुरू किया, दूसरा साड़ी के नीचे। उंगलियाँ अंदर चली गईं। आंचल की कराहें सुनकर उंगलियाँ पागलों की तरह तेज हो गईं। सुमन की भी कराह निकल गई। शरीर काँप उठा। गीलापन उंगलियों से नीचे टपकने लगा।
प्रिया भी अपने कमरे में जाग रही थी। उसने नाइटी उठा रखी थी। एक हाथ स्तन पर, दूसरा जाँघों के बीच। आंचल की आवाजें सुनकर उसकी उंगलियाँ भी तेज हो गईं। “छोटी भी… चली गई…” उसने फुसफुसाया। शरीर में लहर दौड़ी। वह भी काँपते हुए चरम तक पहुँच गई।
दरवाजे के अंदर चाचा अभी भी आंचल की जाँघों के बीच थे। जीभ निकालकर उन्होंने आंचल की आँखों में देखा। “अब तुम भी तैयार हो। अगली बार तीनों को एक साथ लूँगा।”
आंचल नंगी, काँपती, गीली लेटी थी। साँसें उखड़ी हुईं। युवा शरीर अभी भी सिहर रहा था।
चाचा उठे। पैंट की सख्ती और भी तन गई थी। उन्होंने आंचल को चूमा—गहरा, जीभ के साथ। फिर कहा, “जा, सो जा। कल रात असली खेल शुरू होगा।”
आंचल ने स्लिप पहनी। लड़खड़ाते हुए दरवाजा खोला। गलियारे में माँ और भाभी दोनों के कमरों से हल्की सी साँसों की आवाज आ रही थी। आंचल मुस्कुरा दी—थकी हुई, संतुष्ट।
घर की तीनों औरतें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं।
आंचल ने पहली बार चाचा की जीभ से चरम सुख लिया था।
सुमन और प्रिया ने उनकी कराहें सुनकर खुद को फिर से गीला कर लिया था।
और चाचा जानते थे कि अब कोई सीमा बाकी नहीं रही।

अगली रात। बारह बजने में दस मिनट बाकी थे। घर में कोई नहीं सो रहा था।
चाचा अपने कमरे में इंतजार कर रहे थे। कमीज पूरी तरह उतार रखी थी। पैंट की डोरी खुली हुई। सख्ती भारी और तनी हुई थी। बिस्तर पर चादर बिछी थी। लाइट मंद कर दी गई थी।
पहले दस्तक प्रिया की हुई। वह अंदर आई और दरवाजा बंद कर दिया। नाइटी पहले ही उतार रखी थी। नंगी खड़ी थी—गोल स्तन, तने निप्पल, जाँघों के बीच चमकता गीलापन। चाचा ने उसे बिस्तर पर खींच लिया। बिना बात किए मुँह स्तनों पर लगा दिया। जोर से चूसा। उंगलियाँ अंदर घुस गईं। प्रिया तुरंत काँप उठी। “आज… पूरा लो…” उसने माँगा।
चाचा ने उसे बिस्तर पर लिटाया। पैंट नीचे की। सख्ती बाहर आ गई—मोटी, लंबी, नसों से भरी। प्रिया की आँखें फटी की फटी रह गईं। चाचा ने उसके पैर फैलाए। मुँह की नमी से गीला किया। फिर धीरे-धीरे अंदर धकेलना शुरू किया। प्रिया की कराह निकल गई। “आह्ह… इतना मोटा…”
चाचा ने पूरा अंदर तक धकेल दिया। फिर जोर-जोर से चलाने लगे। प्रिया के स्तन हिल रहे थे। नितंब चाचा की जाँघों से टकरा रहे थे। कमरा चरमराने लगा। प्रिया की कराहें तेज हो गईं। अचानक शरीर ऐंठ गया। अंदर की दीवारें सख्ती को जकड़ रही थीं। गीलापन और बढ़ गया। चाचा ने और तेज किया। कुछ देर बाद खुद भी छोड़ दिया—गर्म, गाढ़ा रस प्रिया के अंदर।
प्रिया काँपते हुए लेटी रही। तभी दूसरी दस्तक हुई।
सुमन अंदर आईं। साड़ी पहले ही ढीली थी। उन्होंने दरवाजा बंद किया। प्रिया को नंगा, गीला, चाचा की सख्ती अभी भी अंदर देखकर उनकी साँस रुक गई। पर शरीर ने गद्दारी की। साड़ी अपने आप खुल गई। स्तन बाहर आ गए।
चाचा ने प्रिया से अलग होकर सुमन को खींच लिया। “अब तुम्हारी बारी।”
सुमन को बिस्तर पर लिटाया। प्रिया एक तरफ लेटी देख रही थी। चाचा ने सुमन के भारी स्तनों को मसला, निप्पलों को चूसा। फिर सख्ती जो अभी भी तनी हुई थी, सुमन की गीली जगह पर लगाई। धीरे-धीरे अंदर धकेला। सुमन की आँखें बंद हो गईं। “राजेश… आह… पूरा…”
चाचा ने जोर लगाया। पूरा अंदर। फिर तेज गति। सुमन के भारी स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। कराहें प्रिया से भी जोर की थीं। प्रिया ने खुद के स्तन मसलने शुरू कर दिए। चाचा एक हाथ से सुमन के स्तन दबा रहे थे, दूसरे से प्रिया के। कमरा कराहों से भर गया। सुमन जल्दी ही काँप उठीं। अंदर रस बह निकला। चाचा ने कुछ और देर चलाया, फिर दूसरी बार छोड़ दिया—सुमन के अंदर।
सुमन और प्रिया दोनों गीली, काँपती लेटी थीं। तभी तीसरी दस्तक हुई।
आंचल अंदर आई। स्लिप उतार रखी थी। नंगी। युवा स्तन तने हुए। जाँघों के बीच पहले से नमी। उसने माँ और भाभी को नंगा देखकर निगल लिया। पर रुकी नहीं। चाचा के पास चली गई।
चाचा ने उसे भी बिस्तर पर लिटाया। दोनों औरतों के बीच। मुँह आंचल के युवा स्तनों पर लगाया। जोर से चूसा। फिर सख्ती जो तीसरी बार तन चुकी थी, आंचल की टIGHT जगह पर लगाई। धीरे से अंदर धकेला। आंचल की कराह तेज निकल गई। “आह्ह… चाचा… दर्द… पर अच्छा…”
चाचा ने धीरे-धीरे पूरा अंदर लिया। फिर गति बढ़ाई। आंचल के युवा नितंब उनके हाथ में थे। माँ और भाभी दोनों देख रही थीं—एक हाथ से अपने स्तन, दूसरे से अपनी गीली जगह। चाचा ने आंचल को जोर-जोर से भेदना शुरू किया। आंचल की कराहें कमरे में गूँज रही थीं। जल्दी ही उसका शरीर ऐंठ गया। चाचा ने भी तीसरी बार छोड़ दिया—आंचल के अंदर।
तीनों औरतें बिस्तर पर नंगी, गीली, काँपती लेटी थीं। स्तनों पर निशान, जाँघों पर चमक, साँसें उखड़ी हुईं। चाचा बीच में बैठे थे। सख्ती अभी भी भारी थी।
उन्होंने तीनों को देखा और धीमी आवाज में कहा, “अब यह घर सिर्फ तुम्हारा नहीं रहा। हर रात यही होगा। कभी एक-एक करके, कभी तीनों साथ।”
सुमन, प्रिया और आंचल कुछ नहीं बोलीं। सिर्फ काँपती रहीं। शरीर अभी भी सिहर रहे थे। अंदर चाचा का गर्म रस बह रहा था।
गलियारे में आरव खड़ा था। दरवाजे के पास। उसने सब सुन लिया था—कराहें, चरमराने की आवाजें, नाम। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था। पर वह हिला नहीं। बस सुनता रहा।
घर अब पूरी तरह बदल चुका था।
तीनों औरतें चाचा की हो चुकी थीं।
और कथावाचक बेटा अब सब कुछ जान चुका था।

सुबह का उजाला धीरे-धीरे कमरों में घुस रहा था। घर पहले जैसा नहीं लग रहा था। हवा में एक अजीब सी गंध तैर रही थी—पसीना, रस और रात की गर्मी की मिली-जुली।
सुमन सबसे पहले उठीं। नहाते समय जाँघों के बीच से अभी भी गाढ़ा, चिपचिपा रस बह रहा था। चाचा का छोड़ा हुआ। उन्होंने खुद को साफ करने की कोशिश की, पर पूरी तरह नहीं जा सका। साड़ी पहनते समय स्तनों पर हल्के नीले निशान दिख रहे थे—चाचा के दाँतों और उंगलियों के। निप्पल अभी भी संवेदनशील थे। हर कपड़े की रगड़ पर सिहरन हो रही थी।
प्रिया ने नहाया। उसके अंदर भी वही रस था। कुर्ती पहनते समय उसने जानबूझकर ब्रा नहीं डाली। स्तन स्वतंत्र हिल रहे थे। निप्पल कपड़े पर साफ उभर रहे थे। जाँघों के बीच चलते समय हल्की सी चिपचिपाहट महसूस हो रही थी। होठों पर एक शांत, संतुष्ट मुस्कान थी।
आंचल सबसे बाद में उठी। युवा शरीर अभी भी रात की तीव्रता से काँप रहा था। नहाते समय उसके अंदर से भी सफेद रस निकला। उसने छोटी सी फ्रॉक पहनी। अंदर पैंटी हल्की गीली थी। स्तन सख्त थे, निप्पल तने हुए।
नाश्ते की मेज पर तीनों एक साथ बैठीं। चाचा भी आ गए। आरव देर से आया। उसका चेहरा उतरा हुआ था। आँखों में नींद की बजाय कुछ और था—सनसनी, गुस्सा, और एक अजीब सी बेचैनी। वह माँ की ओर देखता, फिर भाभी की ओर, फिर बहन की ओर। तीनों की आँखों में वही थकी हुई, गीली चमक थी।
चाय पीते समय सुमन की उंगलियाँ काँप रही थीं। प्रिया जानबूझकर चाचा के पास बैठ गई थी। उसकी जाँघ चाचा की जाँघ से छू रही थी। आंचल चुपचाप रोटी तोड़ रही थी, पर हर बार जब चाचा कुछ कहते, उसकी जाँघें भींच जातीं।
आरव ने अचानक पूछा, “रात को… सबकी नींद ठीक रही?”
तीनों औरतें एक साथ निगाहें झुका लीं। चाचा ने शांत स्वर में कहा, “हाँ बेटा। बहुत गहरी नींद आई।”
आरव की मुट्ठी बंद हो गई। उसने और कुछ नहीं कहा। बस अपनी प्लेट में देखता रहा। पर उसकी निगाह बार-बार माँ के स्तनों पर जा रही थी—जहाँ साड़ी के आँचल के नीचे हल्के निशान छुपे थे।
नाश्ता खत्म होने के बाद आरव अपने कमरे में चला गया। दरवाजा जोर से बंद किया। प्रिया छत पर चली गई। आंचल बालकनी में।
सुमन रसोई में थीं कि चाचा पीछे से आए। उन्होंने कमर से पकड़ लिया। साड़ी ऊपर की। एक हाथ से भारी स्तन मसला, दूसरे हाथ से जाँघों के बीच उंगलियाँ डाल दीं। अभी भी नमी और पुराना रस दोनों मिला हुआ था। “रात को अंदर कितना छोड़ दिया था… अभी भी बाकी है,” चाचा ने कान में कहा। सुमन की कराह दबी हुई निकली। चाचा ने दो उंगलियाँ अंदर घुमाईं, फिर निकाल लीं। उंगलियाँ चाट कर चले गए।
दिन भर घर में अजीब तनाव रहा। आरव कमरे से बाहर नहीं निकला। तीनों औरतें एक-दूसरे की ओर देखतीं तो शर्म और एक नई सी समझ दोनों होती।
रात फिर आई।
इस बार चाचा ने तीनों को एक साथ बुलाया। कमरे में लाइट और मंद थी। बिस्तर बड़ा था। तीनों नंगी होकर आईं—सुमन के भारी स्तन, प्रिया के गोल सख्त, आंचल के युवा तने हुए। जाँघों के बीच तीनों की नमी पहले से चमक रही थी।
चाचा ने पहले सुमन को चारपाई पर घुटनों के बल कर दिया। पीछे से प्रवेश किया। जोर-जोर से। सुमन के भारी स्तन लटक रहे थे, हिल रहे थे। प्रिया को सुमन के सामने बिठाया। सुमन का मुँह प्रिया की गीली जगह पर लगा दिया। आंचल को चाचा के मुँह के पास खींच लिया। जीभ आंचल के निप्पल पर थी, उंगलियाँ उसकी युवा जगह में।
कमरा कराहों, चपलाने और चरमराने की आवाजों से भर गया। चाचा सुमन को जोर से भेद रहे थे। सुमन प्रिया को चाट रही थीं। प्रिया आंचल के स्तन मसल रही थी। आंचल चाचा की उंगलियों पर काँप रही थी। एक के बाद एक चरम आ रहे थे। रस बह रहा था। चादर गीली हो चुकी थी।
चाचा ने पोजीशन बदली। अब प्रिया को घोड़ी बनाकर पीछे से लिया। सुमन आंचल के युवा स्तन चूस रही थीं। आंचल प्रिया के मुँह में उंगलियाँ दे रही थी। फिर आंचल की बारी आई—चाचा ने उसे ऊपर बिठाया। युवा शरीर उनके ऊपर उछल रहा था। भारी सख्ती पूरी अंदर तक जा रही थी। सुमन और प्रिया दोनों नीचे से आंचल के स्तन और चाचा के अंडकोष सहला रही थीं।
रात बहुत लंबी चली। तीनों औरतें बार-बार काँपीं। चाचा ने तीनों के अंदर बारी-बारी से छोड़ा। आखिर में तीनों बिस्तर पर नंगी, एक-दूसरे से चिपटी, रस से लथपथ लेटी थीं। स्तनों पर दाँतों के निशान, जाँघों पर सफेद धारियाँ, होठों पर थकान और संतुष्टि।
चाचा बीच में बैठे थे। साँसें भारी। उन्होंने तीनों के नितंबों पर हाथ फेरते हुए कहा, “अब यह रोज होगा। कभी कमरे में, कभी रसोई में, कभी छत पर। और हाँ… आरव सुन रहा है। उसे भी आदत पड़ जाएगी।”
तीनों औरतें कुछ नहीं बोलीं। सिर्फ एक-दूसरे के शरीर से चिपककर लेटी रहीं। अंदर अभी भी गर्म रस घूम रहा था।
गलियारे में आरव खड़ा था। इस बार उसने दरवाजे की दरार से कुछ देखा भी था। उसका शरीर काँप रहा था—गुस्से से नहीं, किसी और भावना से। उसने मुट्ठी भींची और अपने कमरे में लौट गया। दरवाजा बंद करके बिस्तर पर गिर गया। आँखें खुली थीं। दिमाग में वही दृश्य घूम रहे थे।
घर अब सिर्फ घर नहीं रह गया था।
वह एक खुला हुआ, गीला, कराहता हुआ खेल बन चुका था।
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#4
[img=464x1400][Image: RDT-20260827-1232491598975013645221839.jpg][/img]
सुबह का उजाला इस बार तेज नहीं, बल्कि भारी और धुँधला लग रहा था। कमरे में चादरें अभी भी उलझी हुई थीं। हवा में पसीने और पुरानी गर्मी की गंध बाकी थी।
सुमन सबसे पहले जागीं। शरीर में दर्द था—जाँघों के अंदर, स्तनों पर, कमर में। अंदर अभी भी चाचा का गाढ़ा रस चिपचिपा महसूस हो रहा था। उन्होंने आँखें खोलीं तो प्रिया उनके बगल में नंगी लेटी थी, एक हाथ सुमन के भारी स्तन पर रखा हुआ। आंचल दूसरी तरफ, युवा शरीर अभी भी सिहरता हुआ। तीनों एक-दूसरे से चिपटी हुई थीं।
सुमन का मन अचानक भारी हो गया। रात की कराहें, शरीर की भूख, चरम सुख—सब याद आया। फिर बच्चों का चेहरा। आरव की उतरी हुई आँखें। आंचल की मासूमियत जो अब टूट चुकी थी। आँसू आँखों में भर आए। उन्होंने प्रिया का हाथ धीरे से हटाया और उठ बैठीं। साड़ी ढूँढते हुए उनके हाथ काँप रहे थे।
प्रिया भी जाग गई। उसने सुमन के आँसू देखे। कुछ देर चुप रही, फिर धीमी आवाज में बोली, “दीदी… पछतावा हो रहा है?”
सुमन ने सिर हिलाया। आवाज टूटी हुई थी, “मैं उनकी माँ हूँ… आंचल की… आरव की। मैंने क्या कर दिया? संस्कार, इज्जत… सब खो दिया।”
प्रिया ने अपना शरीर सुमन से सटा लिया। गोल स्तन सुमन की बाँह से छू रहे थे। “मैं भी शादीशुदा हूँ। पर रात को जब वे अंदर थे… तो पहली बार लगा कि कोई सच में मुझे चाह रहा है। सिर्फ शरीर नहीं… मुझे।”
आंचल भी उठ बैठी। आँखों में नींद और उलझन दोनों थी। “माँ… मुझे डर लग रहा है। पर शरीर बार-बार वही माँग रहा है। क्या हम पाप कर रहे हैं?”
तीनों चुप हो गईं। कमरे में सिर्फ उनकी साँसें गूँज रही थीं। सुमन ने आंचल को अपनी छाती से लगा लिया। भारी स्तन आंचल के युवा स्तनों से दब गए। माँ-बेटी नंगी एक-दूसरे से लिपटी थीं। प्रिया ने पीछे से दोनों को बाहों में ले लिया। तीनों का शरीर एक-दूसरे से चिपक गया—गर्म, नमी भरा, और अब भावनाओं से भी भारी।
इतने में दरवाजे पर हल्की सी आवाज हुई। चाचा अंदर आए। उन्होंने तीनों को एक-दूसरे से लिपटे देखा। कुछ पल बस देखते रहे। फिर धीरे से बोले, “रोओ मत। जो हो चुका है, वह अब तुम्हारा सच है। शरीर ने जो चुना, मन धीरे-धीरे मान जाएगा।”
सुमन ने आँसू पोंछे। “राजेश… आरव… वह जानता है। मैं उसके सामने कैसे जाऊँ?”
चाचा पास आए। उन्होंने सुमन का चेहरा उठाया। अंगूठे से आँसू पोंछे। फिर धीरे से होठों पर चूम लिया—इस बार जल्दबाजी में नहीं, बल्कि लंबे समय तक। जीभ हल्की सी घुमाई। सुमन की साँस काँप गई। शरीर फिर से प्रतिक्रिया दे रहा था, पर इस बार मन भी उसके साथ था। चाचा ने प्रिया और आंचल को भी बारी-बारी से चूमा। तीनों के होठों पर उनकी लार चमक रही थी।
“आज दिन भर सामान्य रहो,” चाचा ने कहा। “रात को फिर बात करेंगे। भावनाएँ भी खेल का हिस्सा हैं।”
वे चले गए। तीनों औरतें फिर से चुपचाप नंगी बैठी रहीं। एक-दूसरे के शरीर की गर्माहट में अब सिर्फ वासना नहीं, एक अजीब सा सहारा भी था।
नाश्ते पर आरव आया। चेहरा सूजा हुआ। आँखें लाल। उसने माँ की ओर देखा। सुमन की निगाह झुक गई। साड़ी का पल्लू उन्होंने बहुत कसकर बाँधा था, पर स्तनों की भारीपन और गर्दन पर हल्का निशान छुप नहीं पाया। आरव की निगाह वहीं अटक गई। फिर प्रिया की ओर। फिर आंचल की ओर—जो आज भी छोटी फ्रॉक में थी, जाँघें नंगी।
आरव ने प्लेट रखी। आवाज में कंपन था, “माँ… रात को मैंने सुना। सब कुछ।”
सुमन काँप उठीं। चाय की प्याली उनके हाथ से छूटने को हुई। प्रिया ने नीचे देखा। आंचल की आँखें भर आईं।
चाचा शांत बैठे रहे। “बेटा, कुछ चीजें घर के बड़े समझते हैं। तुम अभी छोटे हो।”
आरव की आँखों में गुस्सा और कुछ और था—जलन, घबराहट, और एक अजीब सी उत्सुकता। “मैं छोटा नहीं हूँ। मैंने देखा भी… दरार से।”
घर में सन्नाटा छा गया। सुमन के आँसू फिर गिरने लगे। उन्होंने खुलेआम रोना शुरू कर दिया। “बेटा… माफ़ कर… मैं कमजोर पड़ गई…”
आरव उठा। कुर्सी धक्का देकर पीछे गिरी। “मैं… मैं बाहर जा रहा हूँ।” वह निकल गया। दरवाजा जोर से बंद हुआ।
तीनों औरतें मेज पर बैठी रह गईं। चाचा ने सुमन का हाथ पकड़ा। “रोको मत आँसू। आज शाम उसे भी समझाना होगा। घर अब पहले जैसा नहीं रह सकता।”
दिन भर घर में भारी चुप्पी रही। सुमन पूजा कमरे में घंटों बैठी रहीं—पर मंत्र नहीं पढ़ पा रही थीं। शरीर याद दिला रहा था कि रात को कितनी बार काँपा था। प्रिया बार-बार चाचा के कमरे के बाहर से गुजरती। आंचल अपने कमरे में आईने के सामने नंगी खड़ी रहती और अपने शरीर पर बचे निशानों को छूती।
शाम को आरव लौटा। आँखें अभी भी लाल थीं। चाचा ने उसे अपने कमरे में बुलाया। दरवाजा बंद हुआ। अंदर क्या बात हुई, तीनों औरतें बाहर से सुन नहीं पाईं। बस आरव की ऊँची आवाज एक बार आई, फिर लंबी चुप्पी।
रात जब आई तो तीनों औरतें फिर से चाचा के कमरे के बाहर खड़ी थीं। इस बार सिर्फ वासना लेकर नहीं आई थीं। मन में डर था, शर्म थी, भावना थी… और उसके नीचे वही पुरानी भूख भी।
चाचा ने दरवाजा खोला। आरव कमरे में कुर्सी पर बैठा था। चेहरा कठोर। निगाहें तीनों औरतों पर generीं—नंगी नहीं, पर साड़ी और कुर्ती में भी उनके शरीर की गर्मी साफ झलक रही थी।
चाचा ने धीमी आवाज में कहा, “अब घर का सच सबके सामने है। चाहो तो भाग लो… या फिर इस सच्चाई का हिस्सा बन जाओ।”
सुमन की आँखों में फिर आँसू आ गए। प्रिया ने होंठ काटे। आंचल काँप रही थी।
और आरव… उसने पहली बार माँ की ओर ऐसा देखा जैसे वह सिर्फ माँ नहीं, एक स्त्री भी है।
कमरे में तनाव इतना गहरा था कि साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था। वासना, भावना, गुस्सा और स्वीकारोक्ति सब एक साथ उलझ गए थे।


कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। आरव कुर्सी पर बैठा था। मुट्ठियाँ भींची हुईं। आँखें लाल। सुमन, प्रिया और आंचल दरवाजे के पास खड़ी थीं—साड़ी और कुर्ती में, पर शरीर की गर्मी और रात के निशान छुप नहीं पा रहे थे।
सुमन सबसे पहले बोलीं। आवाज में रोना और थकान दोनों थे, “बेटा… माँ से नफरत मत कर। मैंने खुद को रोकने की बहुत कोशिश की। पर अंदर जो खालीपन था… वह राजेश ने भर दिया। मैं कमजोर हूँ। तुझे माफ़ करना चाहिए था मुझे… पर मैं माफ़ी के लायक भी नहीं रही।”
आरव की आँखों में आँसू आ गए। गुस्सा और दर्द एक साथ। “माँ… तुम… तुम उनकी… उनकी औरत बन गई? भाभी… आंचल… सब? मैंने दरार से देखा। तुम्हारे शरीर… उनकी चीखें… सब कुछ।” उसकी आवाज टूट गई। “मैं कैसे भूलूँ? हर बार जब तुम्हें देखता हूँ, वही दृश्य आँखों के सामने आ जाता है।”
प्रिया ने आगे कदम बढ़ाया। आवाज में कंपन था, “आरव, हम सब फँस गए। पहले सिर्फ बातें थीं… फिर स्पर्श… फिर शरीर हार गया। मैं अपने पति को भूल नहीं पाई, पर रात को जब वे छूते हैं तो लगता है कोई सच में मेरी भूख समझता है। यह गलत है… पर अब शरीर मानने को तैयार नहीं।”
आंचल रो पड़ी। युवा चेहरे पर आँसू बह रहे थे। “भाई… मुझे डर लग रहा है। पर जब चाचा ने मुझे छुआ… तो पहली बार लगा कि मैं सिर्फ बच्ची नहीं, एक स्त्री हूँ। माँ और भाभी के साथ वही कमरा… वही बिस्तर… मुझे शर्म भी आती है, और चाह भी।”
चाचा अब तक चुप थे। उन्होंने आरव के पास जाकर कुर्सी के सामने खड़े हो गए। आवाज बहुत शांत, गहरी थी, “बेटा, गुस्सा कर। नफरत कर। पर सच से भाग मत। यह घर अब पुराना घर नहीं रहा। तीनों औरतें मेरी हो चुकी हैं—शरीर से, और धीरे-धीरे मन से भी। तुम या तो इसे स्वीकार करो… या फिर यहाँ से चले जाओ। बीच का रास्ता अब नहीं बचा।”
आरव उठा। कुर्सी पीछे गिर गई। उसने चाचा को धक्का दिया। “तुम… तुमने मेरी माँ को… मेरी बहन को…” उसकी आवाज में रोना फूट पड़ा। फिर अचानक उसकी निगाह सुमन पर गई—साड़ी के आँचल के नीचे भारी स्तन, गर्दन पर हल्का निशान, आँखों में आँसू और वह थकी हुई चमक। कुछ पल वह बस देखता रहा। गुस्से के नीचे एक अजीब सी जलन और खिंचाव भी था।
सुमन ने आरव की ओर हाथ बढ़ाया। “बेटा… पास आ। माँ को मार दे, गाली दे… पर छोड़ मत।”
आरव काँप रहा था। वह धीरे-धीरे माँ के पास गया। सुमन ने उसे छाती से लगा लिया। भारी स्तन आरव के सीने से दब गए। आरव की साँस अटक गई। माँ की गर्माहट, उनकी खुशबू, साड़ी के नीचे का शरीर—सब कुछ उसके लिए अब सिर्फ माँ जैसा नहीं रह गया था। उसने आँखें बंद कर लीं। आँसू बह निकले।
चाचा ने प्रिया और आंचल को इशारे से पास बुलाया। दोनों आरव और सुमन के पास चले गए। प्रिया ने आरव के बालों पर हाथ फेरते हुए कहा, “हम सब टूट चुके हैं। अब साथ रहकर ही ठीक हो सकते हैं… या फिर और टूट सकते हैं।”
आंचल ने भाई का हाथ पकड़ लिया। उसकी युवा उंगलियाँ आरव की मुट्ठी में थीं। “भाई… मुझे भी डर है। पर अकेले से बेहतर है कि हम सब एक साथ इस पाप में डूबे रहें।”
आरव ने माँ से चेहरा उठाया। आँखें भीगी थीं। उसने प्रिया की ओर देखा, फिर आंचल की ओर। तीनों औरतों के शरीर की गर्मी उसके इर्द-गिर्द थी। मन में घृणा और एक अजीब सी भूख एक साथ उठ रही थी। उसने धीरे से कहा, “मैं… मैं नहीं जा सकता। पर मैं सिर्फ देखता रहूँ… यह भी नहीं सह सकता।”
चाचा ने आरव का कंधा पकड़ा। “तो फिर हिस्सा बन जा। आज रात सिर्फ देख मत। महसूस भी कर।”
कमरे में हवा भारी हो गई। सुमन की आँखों में डर और एक नई सी स्वीकृति दोनों थी। प्रिया के होठ काँप रहे थे। आंचल की साँस तेज हो गई। आरव खड़ा था—गुस्सा, दर्द, और जागती हुई इच्छा सब उलझी हुई।
चाचा ने सुमन का पल्लू धीरे से हटाया। भारी स्तन बाहर आ गए। निप्पल तने हुए। आरव की निगाह वहीं अटक गई। सुमन ने बेटे की ओर देखा। आँसू अभी भी बह रहे थे, पर उन्होंने आरव का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया। “देख… छू… जो तूने दरार से देखा था, अब सामने से महसूस कर।”
आरव का हाथ काँप रहा था। माँ के गर्म, मुलायम स्तन का स्पर्श उसके शरीर में बिजली की तरह दौड़ गया। उसने निप्पल को हल्के से दबाया। सुमन की हल्की कराह निकल गई। आँखों में आँसू और इच्छा दोनों थे।
प्रिया ने आरव का दूसरा हाथ पकड़ा और अपनी कुर्ती के अंदर रख दिया। गोल स्तन उसकी हथेली में आ गए। आंचल ने भाई के पीछे से जाकर अपनी युवा छाती उसकी पीठ से सटा दी। तीनों औरतें आरव को घेर रही थीं—शरीर से, आँसू से, और उस भावना से जो अब सिर्फ वासना नहीं रह गई थी।
चाचा ने धीरे से कहा, “अब रोना बंद करो। आज रात भावनाओं के साथ शरीर भी बोलेंगे। कल से यह घर एक नया घर होगा—जहाँ कोई छुपाने की जरूरत नहीं।”
आरव की आँखें बंद थीं। माँ का स्तन एक हाथ में, भाभी का दूसरे में, बहन का शरीर पीछे। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। गुस्सा धीरे-धीरे किसी और चीज में बदल रहा था—दर्द भरा, रोमांच भरा, और खतरनाक।
सुमन ने बेटे के होठों पर अपना माथा टिकाया। फुसफुसाई, “माँ को माफ़ कर… या फिर माँ को अपना ले।”
कमरे में सिर्फ साँसें और दिल की धड़कनें रह गई थीं। रिश्ते टूट चुके थे। अब नया रिश्ता बनने वाला था—जो खून का नहीं, शरीर और भावनाओं का था।
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albertprince547;
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#6
[img=464x3400][Image: RDT-20260828-1549531324977125178526018.jpg][/img]
सुबह का उजाला इस बार तेज था। कमरे में चारों शरीर अभी भी एक-दूसरे से सटे हुए थे। चादर गीली थी। हवा भारी।
सुमन सबसे पहले उठीं। शरीर में दर्द और थकान दोनों थे। जाँघों के बीच तीनों मर्दों (आरव और चाचा के पुराने निशान) का मिला-जुला अहसास बाकी था। उन्होंने धीरे से आरव का हाथ हटाया और साड़ी ढँक ली। मन में एक अजीब सा सवाल था—अब सामान्य जीवन कैसे जिएँ?
प्रिया और आंचल भी जाग गईं। तीनों औरतें चुपचाप नहाकर तैयार हुईं। नाश्ते पर चाचा पहले से बैठे थे। आरव देर से आया। चेहरा थका हुआ, पर आँखों में एक नया अधिकार था। चारों ने एक-दूसरे को देखा। कोई लंबी बात नहीं हुई। बस एक समझ थी कि रात जो हुई, वह अब रोजमर्रा का हिस्सा बनती जा रही है।
नाश्ता खत्म होने के बाद आरव ने कहा, “आज कॉलेज जाना है। दो दिन से नहीं गया।”
सुमन ने सिर हिलाया। “जा… सामान्य रहने की कोशिश कर।”
आरव निकला। बस स्टॉप तक पैदल गया। दिमाग में रात वाले दृश्य घूम रहे थे—माँ के नीचे, प्रिया की कराहें, आंचल का युवा शरीर। शरीर में अभी भी वह गर्मी बाकी थी।
कॉलेज पहुँचा तो उसका पुराना दोस्त रोहित मिल गया। रोहित हँसते हुए बोला, “अरे साले, दो दिन से गायब था। घरवालों ने बंद कर दिया था क्या? चेहरा ऐसा लग रहा है जैसे रात भर सोया ही न हो।”
आरव ने बनावटी हंसी हँसी। “कुछ घर की समस्या थी। अब ठीक है।”
रोहित ने उसकी ओर गौर से देखा। “समस्या दिखती नहीं। तू चमक रहा है यार। कोई नई वाली पटा ली क्या?”
आरव का दिल तेज धधका। उसने विषय बदल दिया। क्लास में बैठकर भी ध्यान नहीं लग रहा था। प्रोफेसर कुछ समझा रहे थे, पर आरव की निगाह खिड़की से बाहर थी। मन घर पर था—माँ अभी क्या कर रही होंगी, प्रिया, आंचल।
दोपहर को कैंटीन में रोहित ने फिर पूछा, “सच बता। घर में कुछ गड़बड़ है? तू पहले इतना चुप नहीं रहता था।”
आरव ने कॉफी की चुस्की ली। “घर… बदल गया है। बस।”
रोहित ने और कुछ नहीं पूछा। पर उसकी निगाह में सवाल रह गया। आरव समझ गया कि बाहरी दुनिया अभी भी वही है। दोस्त, क्लास, हँसी-मजाक। पर अंदर वह अब वही आरव नहीं रहा।
शाम को घर लौटा तो देखा कि बैठक में एक नई औरत बैठी है। पड़ोस की श्रीमती मेहता। उम्र करीब अड़तीस। गोरी, सुडौल शरीर। साड़ी में भारी स्तन और पतली कमर। वह सुमन के साथ चाय पी रही थी। हँस रही थी।
सुमन ने आरव को देखा और सामान्य स्वर में बोलीं, “आ गया? मेहता जी आई हुई हैं। उनके पति बाहर गए हैं दो दिन के लिए। अकेली थीं तो बात करने आ गईं।”
श्रीमती मेहता ने आरव को देखा। निगाह थोड़ी देर तक रुकी। “बेटा बड़ा हो गया है। पहले तो छोटा सा लगता था।”
आरव ने नमस्ते की और कमरे में चला गया। मन में हल्की बेचैनी हुई। घर के अंदर का सच और बाहर का सामान्य जीवन अब टकराने वाले थे।
रात का खाना चुपचाप हुआ। चाचा ने श्रीमती मेहता के बारे में हल्की सी टिप्पणी की, “अच्छी औरत है। अकेली पड़ने पर समय कटना मुश्किल हो जाता है।”
सुमन ने उनकी ओर देखा। निगाह में एक छोटा सा सवाल था। प्रिया चुप रही। आंचल ने रोटी तोड़ते हुए सिर नीचे रखा।
खाना खत्म होने के बाद आरव अपने कमरे में गया। दरवाजा बंद किया। बिस्तर पर लेटते ही रोहित की बात याद आई—“तू चमक रहा है यार।” फिर श्रीमती मेहता की निगाह। फिर माँ का चेहरा। सब कुछ एक साथ उलझ रहा था।
गलियारे में हल्के कदम सुनाई दिए। दरवाजे पर दस्तक नहीं हुई। सिर्फ आवाज आई—सुमन की। “सो गया क्या?”
आरव ने जवाब नहीं दिया। मन में फैसला नहीं हो पा रहा था। बाहर की दुनिया अब घर के अंदर घुसने लगी थी। दोस्त के सवाल। पड़ोस की औरत की निगाह। और घर के अंदर वो रिश्ते जो अब छुपाए नहीं छुप रहे थे।
दूसरी तरफ बैठक में चाचा और सुमन अकेले थे। चाचा ने धीमे से कहा, “मेहता वाली बार-बार आएगी। अकेलापन सबसे बड़ा कमजोर बिंदु होता है। तू देखती रह।”
सुमन ने पल्लू ठीक किया। “घर के अंदर ही इतना कुछ हो रहा है… बाहर से और उलझ जाएगा क्या?”
चाचा ने जवाब नहीं दिया। बस खिड़की से बाहर देखा। रात गहरी होती जा रही थी।
आरव के कमरे में अंधेरा था। वह लेटा हुआ सोच रहा था—कॉलेज, दोस्त, पड़ोस… सब सामान्य लग रहे थे। पर वह खुद अब सामान्य नहीं रहा। और यह फर्क अब ज्यादा दिन छुप नहीं सकता था।
एक छोटी सी दरार बाहर की दुनिया में भी पड़ चुकी थी।
रोहित के सवाल।
श्रीमती मेहता की निगाह।
और घर के अंदर वो सन्नाटा जो हर रात कुछ नया जन्म दे रहा था।

अगले दिन आरव कॉलेज गया तो रोहित ने सीधा पूछा, “आज शाम को तेरे घर चलते हैं। बहुत दिन हो गए। तेरी माँ के हाथ की चाय पीनी है।”
आरव का चेहरा एक पल के लिए कठोर हो गया। “आज नहीं यार। घर में थोड़ी व्यस्तता है।”
रोहित हँसा, “क्या व्यस्तता? तू तो पहले कहता था घर पर कोई रोक-टोक नहीं। चल, शाम को बस से उतरकर सीधा तेरे घर।”
आरव ने मना करने की कोशिश की, पर रोहित ने जिद पकड़ ली। आखिरकार आरव ने हामी भर ली। मन में बेचैनी बढ़ गई। घर का सच और दोस्त का आना—दोनों चीजें एक साथ कैसे संभलेंगी?
शाम को दोनों दोस्त घर पहुँचे। आरव ने घंटी बजाई। सुमन ने दरवाजा खोला। साड़ी में थीं। चेहरे पर सामान्य मुस्कान लगाई, पर आँखों में हल्की घबराहट थी। “आओ बेटा… रोहित भी साथ में?”
रोहित ने नमस्ते की। “आंटी, बहुत दिन बाद आया हूँ। आपका हाथ का खाना याद आ रहा था।”
सुमन उन्हें अंदर ले गईं। प्रिया रसोई से निकलीं। उन्होंने भी मुस्कान दी, पर आरव की निगाह से निगाह मिलते ही थोड़ी सकुचा गईं। आंचल अपने कमरे से बाहर आई। छोटी कुर्ती में थी। रोहित ने उसे देखा और हल्की सी मुस्कान दी। “आंचल भी बड़ी हो गई।”
चारों बैठक में बैठे। चाचा भी आ गए। बातें सामान्य रहीं—पढ़ाई, मौसम, पुरानी यादें। पर आरव हर पल सतर्क था। सुमन चाय बनाने गईं तो प्रिया साथ हो लीं। रसोई में प्रिया ने धीमे से कहा, “दोस्त के सामने सामान्य रहना होगा दीदी। ज्यादा देर आँखें मत झुकाना।”
सुमन ने सिर हिलाया। हाथ काँप रहे थे। चाय के कप ले जाते समय उनकी निगाह आरव पर गई। बेटे की आँखों में वही अधिकार था जो रात को था। सुमन ने जल्दी से निगाह फेर ली।
रोहित चाय पीते हुए बोला, “आंटी, आरव पिछले कुछ दिनों से अजीब सा व्यवहार कर रहा है। घर में सब ठीक तो है न?”
सुमन की साँस एक पल के लिए रुकी। फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा। सब ठीक है। बस थोड़ी घर की व्यस्तता थी।”
चाचा ने बीच में कहा, “युवावस्था में मन कई बार उलझ जाता है। सामान्य बात है।”
रोहित ने आरव की ओर देखा। कुछ और पूछने वाला था कि दरवाजे की घंटी फिर बज गई। आंचल ने दरवाजा खोला। श्रीमती मेहता फिर आ गई थीं। हाथ में एक छोटी सी मिठाई की डब्बी थी। “सुमन जी, कल की बात अधूरी रह गई थी। सोचा चाय पीते हुए बात हो जाए।”
अब बैठक में भीड़ हो गई थी। रोहित, श्रीमती मेहता, चाचा, सुमन, प्रिया, आंचल और आरव। बाहरी दुनिया घर के अंदर आ चुकी थी। सुमन ने मेहता जी को बैठाया। चाय और मिठाई आने लगी।
श्रीमती मेहता ने आरव को गौर से देखा। “बेटा, कॉलेज में पढ़ाई कैसी चल रही है? चेहरा थोड़ा थका हुआ लग रहा है।”
आरव ने संक्षिप्त जवाब दिया। रोहित ने श्रीमती मेहता से बातचीत शुरू कर दी। प्रिया चुपचाप सबको देख रही थी। आंचल रोहित की ओर कभी-कभी देख लेती। चाचा शांत बैठे सबकी हरकतें नोट कर रहे थे।
थोड़ी देर बाद रोहित ने उठते हुए कहा, “आंटी, आज तो रुक जाता हूँ खाने पर। बहुत दिन बाद इतना अच्छा महसूस हो रहा है।”
आरव की निगाह माँ से मिली। सुमन ने हल्के से सिर हिलाया। “रुक जाओ बेटा। खाना लग जाएगा।”
श्रीमती मेहता भी मुस्कुराईं। “तो फिर मैं भी उठती हूँ। कल फिर आऊँगी।”
चाचा ने कहा, “रुक जाइए। खाना साथ ही हो जाए।”
मेहता जी थोड़ी सकुचाईं, पर बैठ गईं। अब घर में दो बाहरी लोग थे। आरव का दोस्त और पड़ोस की अकेली औरत। बातें चलती रहीं। हँसी-मजाक हुआ। पर हर हँसी के नीचे घर के लोगों की निगाहों में एक तनाव था।
खाना लगने के समय सुमन और प्रिया रसोई में थीं। प्रिया ने धीमे से कहा, “दोस्त रुक गया। मेहता जी भी। आज रात कुछ नहीं हो सकेगा।”
सुमन ने बर्तन धोते हुए जवाब दिया, “शायद यही ठीक है। थोड़ी साँस लेने का समय मिल जाएगा।”
पर उनकी आवाज में पूरा विश्वास नहीं था। शरीर अभी भी रात की गर्मी याद रखे हुए था।
खाना खत्म होने के बाद रोहित ने आरव के कमरे में जाने को कहा। दोनों दोस्त कमरे में गए। दरवाजा बंद हुआ। रोहित ने सीधा पूछा, “अब सच बता। घर में कुछ न कुछ है। तेरी माँ की आँखें झुक रही थीं। भाभी तेरी ओर देख रही थीं। तू खुद भी अजीब सा है। क्या चल रहा है?”
आरव ने खिड़की की तरफ देखा। जवाब नहीं दिया। मन में माँ का नंगा शरीर, प्रिया की कराहें, आंचल का चेहरा सब घूम रहा था। उसने सिर्फ इतना कहा, “घर… थोड़ा बदल गया है। उससे ज्यादा कुछ नहीं।”
रोहित ने और दबाव डाला, पर आरव चुप रहा। बाहर बैठक में श्रीमती मेहता चाचा और सुमन के साथ बात कर रही थीं। आंचल चुपचाप सब सुन रही थी।
रात गहराई। रोहित सोफे पर सोने को तैयार हो गया। श्रीमती मेहता जाने को हुईं तो चाचा ने कहा, “देर हो गई है। कल सुबह चली जाना।”
मेहता जी ने मना करने की कोशिश की, पर अंत में हामी भर ली। अब घर में दो बाहरी लोग रात बिताने वाले थे।
आरव अपने कमरे में लेटा। दिमाग में सवाल घूम रहे थे। माँ दूसरे कमरे में होगी। प्रिया और आंचल भी। चाचा भी। और बीच में रोहित और श्रीमती मेहता। घर का सच अब बहुत करीब से छुपना पड़ रहा था।
सुमन ने रात को आरव के कमरे का दरवाजा धीरे से खोला। सिर्फ एक बार देखा। आरव जाग रहा था। दोनों की निगाहें मिलीं। सुमन ने कुछ नहीं कहा। बस दरवाजा बंद करके चली गईं।
आरव की मुट्ठी बंद हो गई। बाहरी दुनिया अब घर की दहलीज पर खड़ी थी। और अंदर का सच कितने दिन छुप पाएगा… यह सवाल अब सबके मन में था।

रात के बारह बज चुके थे। घर में दो अतिरिक्त लोग सो रहे थे—रोहित सोफे पर, श्रीमती मेहता मेहमान वाले छोटे कमरे में। बाकी सब अपने-अपने कमरों में थे, पर कोई गहरी नींद में नहीं था।
आरव अपने बिस्तर पर लेटा हुआ आँखें खोले हुए था। दिमाग में रोहित के सवाल घूम रहे थे। “घर में कुछ न कुछ है।” वह बात बार-बार कानों में गूँज रही थी। थोड़ी देर बाद उसे हल्की प्यास लगी। वह पानी लेने उठा। गलियारे में निकला तो देखा कि माँ का कमरा आधा खुला है। अंदर हल्की रोशनी थी।
सुमन बिस्तर पर बैठी थीं। साड़ी का पल्लू ढीला था। उन्होंने आरव को देख लिया। दोनों की निगाहें मिलीं। सुमन ने इशारे से उसे अंदर बुलाया। आरव घुस गया और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया।
“सो नहीं पा रही,” सुमन ने धीमी आवाज में कहा। “घर में बाहर वाले हैं। मन घबरा रहा है।”
आरव पास बैठ गया। “रोहित पूछ-पूछ कर थक गया। मैं कुछ बता नहीं सका। माँ… अगर कुछ सुन लिया तो?”
सुमन ने बेटे का हाथ पकड़ लिया। “संभालना पड़ेगा। आज रात कोई हलचल मत करना। चुपचाप सो जा।”
पर हाथ पकड़ते ही दोनों की साँसें थोड़ी तेज हो गईं। रात वाली यादें एक पल के लिए लौट आईं। आरव की उंगलियाँ माँ की हथेली पर दब गईं। सुमन ने हाथ नहीं छुड़ाया। कुछ पल वे ऐसे ही बैठे रहे। फिर सुमन ने धीरे से कहा, “जा… अपने कमरे में। कल बात करते हैं।”
आरव उठकर चला गया। गलियारे में उसने देखा कि प्रिया का दरवाजा भी आधा खुला है। प्रिया अंदर खड़ी थी। उसने आरव को देखते ही दरवाजा और खोल दिया। आवाज बहुत धीमी थी, “रोहित सो गया? मेहता जी का कमरा शांत है?”
आरव ने सिर हिलाया। प्रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया। “आज नहीं। जोखिम मत ले। पर… दिन भर तरासता रहा।” उसकी आँखों में वही भूख थी। आरव ने सिर्फ सिर हिलाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।
इतने में आंचल भी गलियारे में आ गई। पानी की बोतल हाथ में थी। तीनों एक पल के लिए गलियारे में आमने-सामने खड़े हो गए। कोई कुछ नहीं बोला। बस निगाहें मिलीं। फिर सब अपने कमरों में लौट गए।
नीचे सोफे पर रोहित करवट बदल रहा था। नींद पूरी नहीं आ रही थी। अचानक उसे ऊपर से हल्की सी आवाज सुनाई दी—जैसे कोई दरवाजा बंद हो रहा हो। उसने कान तेज किए। फिर सन्नाटा। वह उठकर बैठ गया। मन में शक की एक छोटी सी लकीर तन गई। पर कुछ समझ नहीं आया। वापस लेट गया।
मेहमान वाले कमरे में श्रीमती मेहता भी जाग रही थीं। पति के बाहर होने पर अकेलापन अख्तर आ रहा था। घर की दीवारों से हल्की हलचल सुनाई दी। उन्होंने सोचा शायद कोई पानी लेने उठा होगा। पर मन में एक अजीब सा ख्याल आया—इस घर में कुछ अलग सा लगता है। सुमन जी की आँखें, प्रिया की चुप्पी, आरव का व्यवहार… सब थोड़ा अलग।
ऊपर चाचा अपने कमरे में खड़े खिड़की से बाहर देख रहे थे। उन्हें सबकी हलचल का अंदाजा था। उन्होंने दरवाजा खोला और गलियारे में आकर धीमी आवाज में कहा, “सब अपने कमरों में रहो। आज कोई गलती मत करना।”
आवाज सुनकर सुमन, प्रिया और आंचल ने अपने दरवाजे पूरी तरह बंद कर लिए। आरव ने भी कुंडी लगा दी। घर फिर से शांत हो गया।
पर सन्नाटा भारी था।
रोहित आँखें बंद किए लेटा था, पर दिमाग चल रहा था। श्रीमती मेहता करवट बदल-बदल कर सोच रही थीं। आरव अपने बिस्तर पर माँ की छुई हुई उंगलियों की गर्माहट महसूस कर रहा था। सुमन अंधेरे में लेटी हुई बेटे की आँखें याद कर रही थीं। प्रिया और आंचल दोनों अपने-अपने कमरों में बेचैन थीं।
सुबह से पहले एक छोटी सी घटना और हुई।
रोहित प्यास लगने पर उठा। रसोई की तरफ जा रहा था कि सीढ़ियों के पास आंचल से टकरा गया। आंचल पानी की बोतल लेकर जा रही थी। दोनों एक पल के लिए स्तब्ध रह गए। आंचल की कुर्ती का बटन खुला था। युवा स्तनों की हल्की रेखा रोहित की निगाह में आ गई। आंचल ने जल्दी से बटन बंद किया और सर झुकाकर निकल गई। रोहित वहीं खड़ा रह गया। मन में एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ।
वह रसोई से पानी लेकर वापस सोफे पर आ गया। आँखें अब पूरी तरह खुल चुकी थीं। घर की हर छोटी-छोटी बात अब उसे संदिग्ध लगने लगी थी।
सुबह का उजाला धीरे-धीरे आया। घर में सभी जल्दी उठ गए। रोहित की आँखों में नींद से ज्यादा सवाल थे। श्रीमती मेहता भी थकी हुई लग रही थीं। नाश्ते पर बातें सामान्य रखने की कोशिश हुई, पर तनाव हवा में तैर रहा था।
रोहित ने नाश्ता खत्म करके कहा, “आंटी, अब मैं चलता हूँ। आरव, शाम को कॉलेज में मिलते हैं। बात करनी है।”
आरव ने सिर्फ सिर हिलाया। श्रीमती मेहता भी उठीं। “सुमन जी, कल फिर आऊँगी। अकेलापन अच्छा नहीं लगता।”
चाचा ने उन्हें दरवाजे तक छोड़ा। जब दोनों बाहरी लोग चले गए तो घर में फिर से वही पुराना सन्नाटा छा गया। पर अब वह सन्नाटा पहले जैसा नहीं था। बाहर की दुनिया ने घर की दीवारों पर अपनी छाप छोड़ दी थी।
सुमन ने आरव की ओर देखा। “संभल कर। रोहित शक कर रहा है।”
आरव ने जवाब दिया, “जानता हूँ। अब और सावधान रहना होगा।”
प्रिया ने धीमे से कहा, “मेहता जी भी बार-बार आएंगी। अकेलापन उन्हें यहाँ खींच लाएगा।”
आंचल चुपचाप सब सुन रही थी। मन में रात वाली मुलाकात घूम रही थी—रोहित की निगाह और अपना खुला बटन।
घर के अंदर का सच अब सिर्फ अंदर तक सीमित नहीं रह गया था।
दोस्त के सवाल।
पड़ोसिन की अकेली आँखें।
और घर के लोगों का दबा हुआ तनाव।
सब मिलकर एक नई परत बना रहे थे—सरल, साफ, लेकिन खतरनाक।

कॉलेज की कैंटीन में भीड़ थी। आरव कोने की मेज पर बैठा कॉफी ठंडी होने दे रहा था। रोहित सामने बैठ गया। चेहरे पर सामान्य मुस्कान नहीं थी।
“अब बहाने मत बना,” रोहित ने सीधा कहा। “कल रात मैंने आवाजें सुनी थीं। ऊपर किसी के कमरे के दरवाजे बंद हो रहे थे। आंचल से टकराया तो वह घबरा गई। तेरी माँ की आँखें झुक रही थीं। भाभी तेरी तरफ देख रही थीं। घर में कुछ चल रहा है आरव। बता।”
आरव की उंगलियाँ कप पर कस गईं। उसने आसपास देखा और धीमी आवाज में कहा, “घर में कुछ उलझनें हैं। परिवार की। तुझे बताकर क्या करेगा?”
रोहित ने आगे झुककर कहा, “इसलिए तो पूछ रहा हूँ। तू बदल गया है। पहले हँसता था, अब हर बात पर बचता है। अगर कोई समस्या है तो बता। दोस्त हूँ।”
आरव चुप रहा। मन में माँ का चेहरा, प्रिया की आँखें, आंचल की घबराहट सब घूम गया। उसने आखिरकार सिर हिलाया। “सच में कुछ बताने लायक नहीं। बस घर का माहौल थोड़ा अलग हो गया है। तू ज्यादा मत सोच।”
रोहित ने उसे गौर से देखा। विश्वास नहीं हुआ, पर और दबाव नहीं डाला। “ठीक है। पर अगर कुछ बिगड़ता दिखे तो बता। मैं यहाँ हूँ।”
क्लास में आरव का ध्यान नहीं लग सका। रोहित के सवाल उसके दिमाग में गूँजते रहे। दोपहर होते-होते उसने फैसला किया—घर जाकर सबको सावधान करना होगा।
शाम को घर पहुँचा तो देखा कि श्रीमती मेहता फिर से बैठी हैं। इस बार अकेली नहीं, सुमन के साथ छत पर चाय पी रही थीं। प्रिया नीचे रसोई में थीं। आंचल अपने कमरे में। चाचा अखबार पढ़ रहे थे।
आरव ने नमस्ते की और ऊपर छत पर चला गया। दोनों औरतें कुर्सियों पर बैठी थीं। सुमन ने बेटे को देखकर हल्की मुस्कान दी। श्रीमती मेहता ने कहा, “आओ बेटा। तुम्हारी माँ से बातें हो रही थीं।”
आरव पास खड़ा रह गया। श्रीमती मेहता ने आगे कहा, “पति दो दिन और बाहर रहेंगे। घर में सन्नाटा बहुत अख्तर है। यहाँ आकर थोड़ा मन हल्का हो जाता है।”
सुमन ने चाय की प्याली घुमाते हुए कहा, “अकेलापन सबको होता है। हम सब यहीं हैं।”
बातें सामान्य रहीं—मौसम, बाजार, पुरानी यादें। पर श्रीमती मेहता की निगाह बार-बार सुमन पर ठहर जाती। जैसे कोई बात पूछना चाहती हों पर हिम्मत नहीं जुटा पा रही हों। थोड़ी देर बाद आरव नीचे चला गया। प्रिया ने उसे रसोई में देखकर धीमे से पूछा, “रोहित ने क्या कहा?”
“पूछ रहा था। शक हो गया है। सावधान रहना होगा।”
प्रिया ने सिर हिलाया। “मेहता जी भी बार-बार आ रही हैं। दीदी के साथ छत पर काफी देर से हैं।”
ऊपर छत पर श्रीमती मेहता ने अचानक आवाज धीमी कर दी। “सुमन जी, एक बात पूछूँ? आपका घर… थोड़ा अलग लगता है। सब लोग एक-दूसरे को जैसे… ज्यादा करीब से देखते हैं। मेरी गलतफहमी है क्या?”
सुमन का हाथ प्याली पर रुक गया। दिल तेज धधकने लगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “गलतफहमी ही होगी। परिवार है। साथ रहते हैं तो करीब लगते हैं।”
श्रीमती मेहता ने गहराई से देखा। “अकेलापन में इंसान बहुत कुछ सोचने लगता है। कभी-कभी गलत भी। माफ करना अगर ज्यादा बोल गई।”
सुमन ने विषय बदल दिया। थोड़ी देर बाद दोनों नीचे आ गईं। श्रीमती मेहता ने विदा ली। “कल फिर आऊँगी। अगर तकरीफ न हो।”
चाचा ने दरवाजे पर कहा, “कोई तकरीफ नहीं। आती रहिए।”
जब वह चली गईं तो घर में फिर से वही चार लोग रह गए। आरव ने सबको बैठक में बुलाया। सीधे कहा, “रोहित शक कर रहा है। कल रात की हलचल उसने सुन ली। आंचल से टकराया भी। मेहता जी भी सवाल पूछ रही हैं। अब और लापरवाही नहीं चलेगी।”
सुमन ने पल्लू कसकर बाँधा। “तो फिर कुछ दिन संयम रखें। बाहर वाले संदेह में हैं।”
प्रिया ने धीमे से कहा, “संयम रखा जा सकता है। पर अंदर की बेचैनी कैसे दबेगी?”
आंचल चुप थी। रोहित वाली मुलाकात याद आ रही थी। उसका खुला बटन और रोहित की निगाह। मन में एक अजीब सा डर और उत्सुकता दोनों थे।
चाचा ने शांत स्वर में कहा, “दोनों तरफ से दबाव बढ़ रहा है। बाहर वाले पूछ रहे हैं। अंदर वाले दब रहे हैं। कोई गलती हुई तो सब खुलेगा। इसलिए आज रात सब अपने कमरों में रहें। कोई किसी के पास न जाए।”
सबने सिर हिलाया। पर आँखों में वह बात नहीं थी।
रात हुई। घर शांत था। पर हर कोई जाग रहा था। आरव अपने कमरे में लेटा सोच रहा था—रोहित आगे क्या करेगा। सुमन बिस्तर पर करवटें बदल रही थीं। प्रिया बार-बार उठकर दरवाजे के पास जा रही थीं। आंचल आईने के सामने खड़ी अपने शरीर को देख रही थी।
और कहीं दूर श्रीमती मेहता अपने अकेले घर में बैठी सोच रही थीं—उस घर में सच में क्या चल रहा है। रोहित अपने हॉस्टल में लेटा वही सवाल दोहरा रहा था।
घर की दीवारें अब सिर्फ अंदर का सच नहीं छुपा रही थीं।
बाहर के सवाल अंदर तक आ चुके थे।
और अंदर की बेचैनी बाहर की तरफ धकेल रही थी।
एक छोटी सी गलती अब काफी थी सब कुछ बदल देने के लिए।


रात फिर गहरी थी। घर में सन्नाटा पसरा था, पर हर कोई जाग रहा था। चाचा के आदेश के बाद भी कोई गहरी नींद में नहीं था।
आरव अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ा था। रोहित के सवाल उसके दिमाग में घूम रहे थे। “घर में कुछ चल रहा है।” वह बात बार-बार दोहराई जा रही थी। मन में डर था कि कहीं दोस्त सच में कुछ जान न ले। उसी समय गलियारे में हल्के कदम सुनाई दिए।
दरवाजे पर बहुत हल्की दस्तक हुई। आरव ने खोला तो प्रिया खड़ी थी। नाइटी में। बाल खुले। आँखों में वही बेचैनी।
“सो नहीं पा रही,” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। “चाचा ने मना किया है… पर मन नहीं मान रहा।”
आरव ने गलियारे की तरफ देखा। सब शांत था। उसने प्रिया को अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया। दोनों कुछ पल बस एक-दूसरे को देखते रहे। फिर प्रिया ने आरव का हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। नाइटी पतली थी। स्तनों की गर्मी हथेली में उतर गई।
“बस इतना… आज सिर्फ इतना,” प्रिया ने फुसफुसाया। “बाकी कल।”
आरव की साँस भारी हो गई। उसने प्रिया को दीवार से सटाया और चूम लिया। गहरा। प्रिया की बाँहें उसके गले में बंद हो गईं। चुंबन लंबा चला। हाथ नाइटी के अंदर चले गए। स्तन नंगे हो गए। आरव ने एक निप्पल को उंगलियों से दबाया। प्रिया की हल्की कराह निकल गई।
इतने में बाहर गलियारे में और कदम गूँजे। दोनों थम गए। आरव ने जल्दी से प्रिया की नाइटी ठीक की। दरवाजे के पास जाकर कान लगाया। आवाज सुमन की थी। वह पानी लेने गई थीं। आरव ने प्रिया को इशारे से शांत रहने को कहा। सुमन का कमरा बंद होने की आवाज आई। फिर सन्नाटा।
प्रिया ने धीमे से कहा, “अब जाता हूँ। जोखिम काफी हो गया।”
वह दरवाजा खोलकर चुपचाप निकल गई। आरव अकेला रह गया। शरीर में गर्मी थी, पर मन में डर और भी बढ़ गया था।
उसी रात श्रीमती मेहता अपने घर में नहीं सो पाईं। अकेलापन और पिछले दिनों की मुलाकातें उसके दिमाग में घूम रही थीं। आधी रात को उसने फैसला किया। हल्के कपड़े पहने और पड़ोस वाले घर की तरफ चल दीं। सोचा था सिर्फ गेट तक जाकर देख लें कि कोई रोशनी है या नहीं।
घर के गेट के पास पहुँची तो ऊपर के एक कमरे में हल्की रोशनी देखी। आरव के कमरे की। वह कुछ देर खड़ी रही। फिर वापस अपने घर चली गईं। मन में शक और भी गहरा हो गया।
सुबह हुई तो घर में थकान साफ झलक रही थी। नाश्ते पर सब चुप थे। आरव ने प्रिया की ओर देखा। प्रिया ने निगाहें झुका लीं। सुमन ने दोनों को देख लिया। कुछ नहीं कहा। बस चाय बनाती रही।
कॉलेज में रोहित ने आरव को फिर से पकड़ लिया। “कल रात सोया नहीं। तेरे घर की बातें याद आ रही थीं। आज शाम को फिर चलते हैं। इस बार खाना खाकर ही लौटूँगा।”
आरव ने मना करने की कोशिश की। “यार आज घर पर मेहमान आने वाले हैं।”
रोहित हँसा। “कोई बात नहीं। मेहमानों के साथ भी बैठ लेंगे। मैं तय करके आया हूँ।”
आरव की बेचैनी बढ़ गई। शाम को घर पहुँचा तो देखा कि श्रीमती मेहता पहले से बैठी हैं। सुमन के साथ बातें कर रही हैं। प्रिया और आंचल भी वहीं थीं। चाचा अखबार रख कर बातों में शामिल हो रहे थे।
रोहित पीछे-पीछे आ गया। अब घर में फिर से दो बाहरी लोग थे। बातें सामान्य रहीं। हँसी-मजाक हुआ। पर हर हँसी के नीचे तनाव था। रोहित बार-बार आरव की ओर देख रहा था। श्रीमती मेहता सुमन की आँखों में कुछ खोज रही थीं।
खाना लगने के समय सुमन और प्रिया रसोई में थीं। सुमन ने धीमे से कहा, “रात को तू आरव के कमरे में गई थी?”
प्रिया का हाथ रुक गया। “सिर्फ बात करने। कुछ नहीं हुआ।”
सुमन ने गौर से देखा। “चेहरे पर लिखा है। संभल। बाहर वाले नजर रखे हुए हैं।”
खाना खत्म होने के बाद रोहित ने आरव से कहा, “आज रात यहीं रुकूँगा। सुबह साथ चलेंगे।”
आरव ने माँ की ओर देखा। सुमन ने हल्के से सिर हिलाया। श्रीमती मेहता भी उठने को हुईं तो चाचा ने कहा, “देर हो गई। कल सुबह चली जाइए।”
मेहता जी फिर रुक गईं। अब घर में दो बाहरी मेहमान रात भर के लिए थे। कमरों का बंटवारा हुआ। रोहित फिर सोफे पर। श्रीमती मेहता मेहमान कमरे में। बाकी अपने-अपने कमरों में।
रात के पहर में जब सब सोने चले गए तो आरव का दरवाजा फिर धीरे से खुला। इस बार आंचल खड़ी थी। आँखों में डर और जिद दोनों। “भाई… आज सिर्फ बात। कुछ और नहीं। मन भारी है।”
आरव ने उसे अंदर लिया। दरवाजा बंद किया। दोनों बैठे। आंचल ने धीमे से कहा, “रोहित बार-बार आ रहा है। मेहता जी भी। मुझे डर लग रहा है कि कहीं सब खुुल न जाए। और… मुझे भी तरास हो रहा है।”
आरव ने बहन का हाथ पकड़ लिया। “आज नहीं। जोखिम बहुत है।”
आंचल ने सिर हिलाया। कुछ पल चुप बैठी रही। फिर उठकर चली गई। गलियारे में उसकी कुर्ती का किनारा हल्का सा फड़फड़ाया।
नीचे सोफे पर रोहित आँखें खोले लेटा था। ऊपर की हलचल उसने फिर से सुन ली थी। इस बार वह उठा। सीढ़ियों की तरफ कुछ कदम बढ़ाया। फिर रुक गया। मन में फैसला कर रहा था—कल सुबह सीधा पूछूँगा। अब और नहीं।
मेहमान कमरे में श्रीमती मेहता भी जाग रही थीं। उन्होंने भी हल्की आवाज सुनी थी। उन्होंने फैसला किया—कल सुमन जी से अकेले में बात करेंगी। साफ-साफ।
घर फिर से शांत हो गया। पर यह खामोशी अब टूटने वाली थी।
दोस्त का शक पक्का हो रहा था।
पड़ोसिन के सवाल गहरे हो रहे थे।
और घर के अंदर दबी हुई भावनाएँ बार-बार दरवाजे खटखटा रही थीं।
एक छोटी सी गलती अब बाकी थी। और वह गलती किसी भी पल हो सकती थी।

रात के दो बज रहे थे। घर में सन्नाटा इतना गहरा था कि पंखे की आवाज भी तेज लग रही थी। रोहित सोफे पर करवटें बदल रहा था। नींद अधूरी थी। श्रीमती मेहता मेहमान कमरे में लेटी हुई अकेलापन से लड़ रही थीं। ऊपर सब अपने कमरों में थे—मना किया गया था, पर शरीर नहीं मान रहा था।
आरव का दरवाजा धीरे से खुला। प्रिया फिर से खड़ी थी। इस बार नाइटी भी नहीं। सिर्फ एक पतली चादर ओढ़े हुए। आँखों में भूख और डर दोनों।
“आज… बस एक बार,” उसने फुसफुसाया। “चुपचाप। कोई आवाज नहीं।”
आरव ने उसे अंदर खींच लिया। दरवाजा बंद किया। कुंडी नहीं लगाई—डर था कि आवाज न हो। दोनों अंधेरे में एक-दूसरे से चिपक गए। प्रिया की चादर गिर गई। नंगा शरीर आरव के हाथों में आ गया। गोल स्तन, तने निप्पल, जाँघों के बीच पहले से गीलापन।
आरव ने उसे दीवार से सटाया। एक हाथ से मुँह दबा रखा था ताकि कराह न निकले। दूसरे हाथ से अपनी पैंट नीचे की। सख्ती निकल आई। प्रिया ने खुद ही टाँग उठाई। आरव ने एक झटके में अंदर तक धकेल दिया।
प्रिया की आँखें फटी रह गईं। मुँह आरव के हाथ में दबा था। सिर्फ नाक से तेज साँसें निकल रही थीं। आरव ने धीरे-धीरे लेकिन गहराई तक चलाना शुरू किया। हर धक्का चुपचाप, लेकिन जोर का। प्रिया के स्तन उसकी छाती से रगड़ खा रहे थे। निप्पल इतने सख्त थे कि आरव को चुभ रहे थे।
“उम्म्म… उम्म्म…” प्रिया की दबी आवाज हाथ के नीचे से निकल रही थी। आँखों में आँसू और मजा दोनों थे। आरव ने कान में बिलकुल धीमे से कहा, “चूत कितनी गीली है… रोहित नीचे सोया है… फिर भी तू भीग रही है…”
प्रिया ने सिर हिलाया। जाँघें उसके कमर पर और कस गईं। आरव की गति थोड़ी तेज हुई। दीवार हल्की सी चरमराने लगी। दोनों ने एक साथ साँस रोकी। रुके। फिर फिर से शुरू किया—और भी धीमे, और भी गहरे।
इतने में गलियारे में कदम सुनाई दिए।
दोनों पत्थर की तरह कठोर हो गए। आरव अभी भी अंदर था। प्रिया की पीठ दीवार से सटी थी। कदम करीब आए… फिर रुक गए। दरवाजे के ठीक बाहर।
श्रीमती मेहता खड़ी थीं। अकेलापन उन्हें बाहर निकाल लाया था। पानी की चाह में निकली थीं। अंधेरे में आरव के कमरे का दरवाजा आधा खुला दिखा। अंदर हल्की हलचल। वह पास गईं। दरार से देखा।
अंधेरे में भी साफ दिख रहा था—आरव प्रिया को दीवार से सटाए हुए जोर-जोर से लेकिन चुपचाप चोद रहा था। प्रिया का एक पैर उसके कमर पर था। स्तन दबे हुए। मुँह दबा हुआ। दोनों पसीने से तर।
श्रीमती मेहता की साँस अटक गई। वह भागने वाली थीं… पर शरीर ने साथ नहीं दिया। जाँघों के बीच अचानक गर्मी फैल गई। अकेलापन, दबी इच्छा और यह दृश्य—सब एक साथ। वह वहीं खड़ी रह गईं। दरार से देखती रहीं। एक हाथ अपने स्तन पर चला गया। दूसरे ने साड़ी के नीचे उंगलियाँ डाल दीं।
अंदर आरव ने प्रिया के मुँह से हाथ हटाया। प्रिया की दबी कराह निकली—“आह्ह… चुप… मार… अंदर…”
आरव ने और तेज किया। दीवार हल्की सी धूल उड़ा रही थी। प्रिया का शरीर ऐंठ गया। आरव ने भी उसी पल छोड़ दिया—गर्म रस प्रिया के अंदर धधकता हुआ भर गया। दोनों काँपते हुए एक-दूसरे से चिपके रहे। साँसें उखड़ी हुईं।
दरवाजे के बाहर श्रीमती मेहता भी उसी पल काँप उठीं। उंगलियाँ गीली हो चुकी थीं। उन्होंने मुँह दबा लिया। आँखें खुली की खुली रह गईं।
आरव ने प्रिया को धीरे से अलग किया। दोनों ने कपड़े संभाले। दरवाजा खोला तो गलियारा खाली था। श्रीमती मेहता तेजी से अपने कमरे की तरफ जा चुकी थीं। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। शरीर में वह गर्मी पहली बार इतनी तेज जगी थी।
प्रिया आरव के कमरे से निकलकर अपने कमरे में चली गईं। आरव दरवाजा बंद करके बिस्तर पर गिर गया। उसे कुछ पता नहीं था कि दरार से कोई देख रहा था।
मेहमान कमरे में श्रीमती मेहता ने दरवाजा बंद किया। साड़ी उतार दी। नंगी बिस्तर पर लेट गईं। उंगलियाँ फिर से नीचे चली गईं। आँखें बंद करके वही दृश्य दोहराया—आरव, प्रिया, दीवार, चुपचाप धक्के, दबी कराहें। शरीर जल्दी ही दूसरी बार काँप उठा। मुँह में तकिया दबा लिया। आवाज नहीं निकलने दी।
सुबह होने में अभी देर थी।
घर में सब सोने की कोशिश कर रहे थे।
रोहित सोफे पर अधखुली आँखों से छत देख रहा था।
आरव और प्रिया अपने कमरों में थके और संतुष्ट पड़े थे।
और श्रीमती मेहता… अकेली, नंगी, अभी भी काँपती हुई… पहली बार इस घर के सच का हिस्सा बन चुकी थीं—बिना किसी के जाने।
यह रात किसी ने नहीं सोची थी।
न आरव ने।
न प्रिया ने।
न चाचा ने।
और न ही श्रीमती मेहता ने खुद।
अब सवाल यह था—
सुबह जब आँखें खुलेंगी तो श्रीमती मेहता क्या करेंगी?
छुपाएँगी… या फिर इस घर की नई भूख में खुद को और गहरा धकेल देंगी?
Fuckuguy
albertprince547;
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#7
सुबह का उजाला धीरे-धीरे घर में फैला। रात वाली घटना की गर्मी अभी भी दीवारों में बाकी थी, पर चेहरों पर थकान और सतर्कता साफ झलक रही थी।
आरव सबसे पहले उठा। शरीर में प्रिया की याद बाकी थी—दीवार, दबी कराहें, अंदर तक का गीलापन। उसने नहाया और नीचे उतरा। रोहित सोफे पर बैठकर चाय पी रहा था। आँखों में नींद कम, सवाल ज्यादा थे।
“रात को ऊपर हलचल थी,” रोहित ने सीधे कहा। “तुम जाग रहे थे?”
आरव ने सामान्य स्वर में जवाब दिया, “पानी लेने उठा था। फिर सो गया।”
रोहित ने और कुछ नहीं पूछा, पर निगाह में विश्वास नहीं था।
श्रीमती मेहता मेहमान कमरे से निकलीं। साड़ी सामान्य थी, पर आँखों में एक अलग सी चमक थी। उन्होंने सुमन को देखकर मुस्कुराया—पहले जैसी सामाजिक मुस्कान नहीं, बल्कि कुछ जानने वाली मुस्कान। सुमन ने महसूस किया कि निगाह थोड़ी देर ज्यादा टिकी रही।
नाश्ते पर सब बैठे। बातें हल्की-फुल्की रहीं। श्रीमती मेहता ने अचानक कहा, “रात को नींद कम आई। घर की दीवारें… जैसे कुछ कह रही हों।”
सुमन की चाय की प्याली में हलचल हुई। प्रिया ने निगाहें झुका लीं। आंचल चुप रही। चाचा ने शांत स्वर में विषय बदल दिया।
नाश्ता खत्म होने के बाद रोहित उठा। “आरव, मैं चलता हूँ। शाम को कॉलेज में बात करेंगे। इस बार साफ-साफ।”
वह चला गया। तनाव थोड़ा कम हुआ, पर पूरी तरह नहीं।
श्रीमती मेहता ने विदा लेने की बजाय सुमन से कहा, “थोड़ी देर और बैठूँ? अकेले घर जाना अच्छा नहीं लग रहा।”
चाचा ने सहमति दी। प्रिया और आंचल अपने कामों में लग गए। आरव कॉलेज के लिए निकल गया। घर में सुमन, चाचा और श्रीमती मेहता रह गए।
बैठक में चाय और बातें हुईं। श्रीमती मेहता ने धीरे से आवाज नीची की, “सुमन जी, एक बात कहूँ? रात को… मैंने कुछ देख लिया।”
सुमन का चेहरा सफेद पड़ गया। चाचा की निगाह तेज हो गई।
श्रीमती मेहता ने जारी रखा, “मैं भागने वाली थी। पर… शरीर ने साथ नहीं दिया। मैं वहीं खड़ी रह गई। और… बाद में अपने कमरे में जाकर खुद को छूती रही। पहली बार इतनी तेज गर्मी महसूस की।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमन बोल नहीं पाईं। चाचा ने धीमे से पूछा, “अब आप क्या करने वाली हैं?”
श्रीमती मेहता ने आँखें उठाईं। निगाह में डर नहीं, बल्कि एक भूखी स्वीकारोक्ति थी। “मैं बाहर नहीं जाऊँगी। न सिक्युरिटी, न किसी से शिकायत। उल्टे… मुझे भी उस गर्मी का हिस्सा बनना है। अकेलापन मुझे खा रहा है। अगर आप लोग मुझे ठुकरा दें तो मैं चुपचाप चली जाऊँगी। पर अगर जगह हो… तो मैं रहना चाहती हूँ।”
सुमन की साँस तेज हो गई। चाचा ने कुछ पल उन्हें गौर से देखा। फिर धीरे से कहा, “जगह बन सकती है। पर नियम होंगे। और सबकी सहमति जरूरी होगी।”
श्रीमती मेहता ने सिर हिलाया। “मैं तैयार हूँ।”
उसी क्षण प्रिया रसोई से निकलकर आ गईं। उन्होंने बात का कुछ अंश सुन लिया था। चेहरे पर हैरानी और एक अजीब सी उत्सुकता दोनों थी। आंचल भी पीछे खड़ी हो गई।
चाचा ने तीनों औरतों की ओर देखा। “अब फैसला तुम्हारा। श्रीमती मेहता रात को देख चुकी हैं। वे हिस्सा बनना चाहती हैं। मना करो तो वे चली जाएँगी। स्वीकार करो तो घर की परत और बड़ी हो जाएगी।”
सुमन ने आँखें बंद कर लीं। मन में बेटे का चेहरा, प्रिया की कराहें, आंचल की जिज्ञासा और अब यह नई औरत—सब उलझ गया। प्रिया ने धीमे से कहा, “अकेलापन सबको होता है। अगर वे सच में चाहती हैं… तो एक मौका दिया जा सकता है।”
आंचल ने सिर हिलाया। आवाज में हल्की घबराहट थी, “मैं… मैं भी देखना चाहती हूँ कि आगे क्या होता है।”
सुमन ने आखिरकार आँखें खोलीं। “ठीक है। पर धीरे-धीरे। और आरव को भी बताना होगा।”
चाचा ने श्रीमती मेहता की ओर देखा। “आज रात रुक जाइए। बाकी सब देखेंगे।”
श्रीमती मेहता की आँखों में राहत और उत्तेजना दोनों तैर गईं। उन्होंने साड़ी का पल्लू ठीक किया, पर उंगलियाँ हल्की काँप रही थीं। शरीर पहले से ही याद कर रहा था कि रात को उसने क्या देखा था और खुद के साथ क्या किया था।
दोपहर भर घर में अजीब सा सन्नाटा रहा। आरव कॉलेज से लौटा तो चाचा ने उसे अलग बुलाकर सब बता दिया। आरव की आँखें फैल गईं। “वे… देख रही थीं? और अब… रहना चाहती हैं?”
चाचा ने सिर हिलाया। “हाँ। अब फैसला तेरा भी है।”
आरव कुछ देर चुप रहा। फिर धीमे से कहा, “अगर माँ और सब मान गए… तो मैं भी मानता हूँ। पर सावधानी रखनी होगी।”
रात धीरे-धीरे गहरी होने लगी।
श्रीमती मेहता मेहमान कमरे में तैयार बैठी थीं। साड़ी के नीचे उन्होंने कुछ नहीं पहना था। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। पहली बार किसी अजनबी घर के सच में इतनी गहराई तक उतरने जा रही थीं।
ऊपर के कमरों में सुमन, प्रिया, आंचल और आरव सब अपने-अपने तरीके से इंतजार कर रहे थे।
कोई डर के साथ।
कोई उत्सुकता के साथ।
कोई नई भूख के साथ।
और चाचा बैठक में शांत बैठे थे—जैसे एक और परत सफलतापूर्वक जोड़ ली हो।
घर अब सिर्फ परिवार का नहीं रह गया था।
एक बाहरी औरत ने दरवाजा खटखटा दिया था।
और इस बार कोई उसे वापस नहीं भेजने वाला था।

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। घर में सब नहा-धोकर तैयार थे। चाचा ने मेहमान कमरे में जाकर श्रीमती मेहता को बुलाया। वह साड़ी में थीं, पर आँखों में वह चमक थी जो रात को दरार से देखने के बाद जगी थी।
चाचा ने उन्हें ऊपर आरव वाले बड़े कमरे में ले गए। वहाँ सुमन, प्रिया, आंचल और आरव पहले से मौजूद थे। लाइट मंद थी। बिस्तर बड़ा और खुला हुआ।
श्रीमती मेहता ने दरवाजे पर रुककर सबको देखा। सुमन की भारी छाती, प्रिया के गोल स्तन, आंचल का युवा शरीर और आरव की शांत लेकिन तीव्र निगाह। उनकी साँस तेज हो गई।
चाचा ने दरवाजा बंद किया। “अब कोई बाहरी नहीं। जो होना है, खुलकर होगा। मेहता जी, आप शुरू करें या हम?”
श्रीमती मेहता ने जवाब में साड़ी का पल्लू गिरा दिया। फिर ब्लाउज के हुक खोले। भारी, गोरे स्तन बाहर आ गए—निप्पल बड़े और पहले से तने हुए। उन्होंने पेटिकोट भी खोल दिया। नंगी खड़ी हो गईं। जाँघों के बीच हल्की नमी पहले से चमक रही थी।
“मैं… रात को देखकर पागल हो गई थी,” उन्होंने सीधी आवाज में कहा। “अब सिर्फ देखना नहीं… महसूस करना चाहती हूँ।”
आरव सबसे पहले आगे बढ़ा। उसने श्रीमती मेहता को कमर से पकड़ा और चूम लिया। गहरा, जीभ के साथ। उनकी उम्र और शरीर की मुलायमियत उसके हाथों में समा गई। सुमन ने पीछे से आकर श्रीमती मेहता के स्तन दोनों हाथों में ले लिए और मसलने लगीं। प्रिया घुटनों के बल बैठ गई और उनकी जाँघों के बीच जीभ लगा दी। आंचल ने श्रीमती मेहता का एक हाथ पकड़कर अपने युवा स्तनों पर रख दिया।
श्रीमती मेहता की कराह निकल गई। “आह्ह… इतने लोग… एक साथ…”
चाचा ने कपड़े उतारे। सख्ती पहले से तनी हुई थी। उन्होंने श्रीमती मेहता को बिस्तर पर लिटा दिया। आरव उनके मुँह की तरफ गया। प्रिया और आंचल दोनों तरफ स्तन चूसने लगीं। सुमन ने खुद को श्रीमती मेहता के चेहरे पर बैठा लिया।
“चाटो… दीदी की चूत चाटो,” सुमन ने धीमी लेकिन साफ आवाज में कहा।
श्रीमती मेहता ने जीभ निकाल दी। सुमन की गीली जगह पर। उसी पल चाचा ने उनके पैर फैलाए और एक झटके में अंदर तक धकेल दिया।
“आह्ह्ह… इतना मोटा… भर गया…!” श्रीमती मेहता की आवाज सुमन की जाँघों में दब गई।
चाचा ने जोर-जोर से चलाना शुरू किया। हर धक्के के साथ श्रीमती मेहता के भारी स्तन हिल रहे थे। प्रिया और आंचल उन्हें चूस-चूस कर लाल कर रहे थे। आरव ने अपना लंड श्रीमती मेहता के मुँह में ठूंस दिया। सुमन उनकी जीभ पर अपनी चूत रगड़ रही थीं।
“लो… चुसो… और गहरा… हाँ… ऐसे…” आरव गंदी बातें कर रहा था।
चाचा ने गति बढ़ा दी। “कितनी टIGHT चूत है मेहता जी… रात भर अकेली उंगलियाँ मारती रहीं ना… अब असली लंड लो…”
श्रीमती मेहता का शरीर काँप रहा था। मुँह भरा हुआ था, फिर भी कराहें निकल रही थीं। अचानक उनका शरीर ऐंठ गया। चाचा के लंड पर जोर से झड़ गईं। रस बह निकला। चाचा ने उसी हालत में और तेज चोदा और अंदर ही छोड़ दिया। गर्म गाढ़ा वीर्य उनके अंदर भर गया।
आरव ने मुँह से निकाला और प्रिया को खींच लिया। प्रिया ने तुरंत घोड़ी बना लिया। आरव ने पीछे से प्रवेश किया। “आह्ह… भाभी की चूत… रात वाली याद आ रही है ना… दीवार वाली…”
प्रिया चीखने लगी। “हाँ… मार… जोर से मार… मेरी चूत फाड़ दे…”
आंचल श्रीमती मेहता के ऊपर चढ़ गई। दोनों औरतें एक-दूसरे के स्तन चूसने लगीं। सुमन चाचा के लंड को साफ करने लगीं—मुँह से। चाचा फिर से तन गए। उन्होंने सुमन को लिटाया और दूसरी बार प्रवेश किया।
कमरा कराहों, चपलाने, गीली आवाजों और गंदी बातों से भर गया।
“चोदो… और गहरा…”
“चूत कितनी प्यासी है…”
“वीर्य अंदर छोड़ो…”
“स्तन जोर से चूसो…”
श्रीमती मेहता फिर से काँपीं। इस बार आरव के हाथों से। प्रिया आरव के लंड पर झड़ गईं। आंचल ने खुद को आरव के मुँह पर बैठा लिया। सुमन चाचा के नीचे कराह रही थीं।
रात बहुत लंबी चली। बारी-बारी से सबने सबको लिया। श्रीमती मेहता ने पहली बार एक साथ तीन मर्दों का स्वाद चखा—चाचा, आरव और फिर दोनों के साथ। शरीर पर नाखूनों और दाँतों के निशान पड़ गए। जाँघों से वीर्य रिस रहा था। स्तनों पर लार चमक रही थी।
आखिर में सब बिस्तर पर गिर गए। पाँच शरीर एक-दूसरे से चिपके। पसीना, वीर्य, रस और थकान।
श्रीमती मेहता ने भारी साँस लेते हुए कहा, “अब… अब मैं अकेली नहीं हूँ।”
सुमन ने उनका हाथ पकड़ लिया। प्रिया ने उनके स्तन पर सिर रख दिया। आंचल उनके पेट पर लेटी थी। आरव और चाचा दोनों तरफ थे।
घर की नई परत पूरी तरह जुड़ चुकी थी।
एक बाहरी औरत अब अंदर तक आ गई थी।
और उसने खुद माँग कर इस गर्मी में डुबकी लगा ली थी।
बाहर रोहित के मन में शक बाकी था।
पर अंदर अब कोई शक नहीं बचा था।
सब कुछ खुल चुका था—शरीर तक।
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