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मकड़ी का जाला
#1
लखनऊ की उन पुरानी, संकरी लेकिन अजीब सी चमकती हुई कॉलोनियों में से एक में हमारा घर था। घर में घुसते ही फिनायल की तीखी गंध और फर्श की ठंडक अहसास करा देती थी कि यहाँ धूल के एक कण की भी गुंजाइश नहीं है। मेरे पिता एक प्राइवेट कंपनी में मामूली क्लर्क हैं। उनका स्वभाव बेहद शांत, दब्बू और अपनी पुरानी फाइलों तक सीमित रहने वाला है। जब वह शाम को घर लौटते, तो उनके कपड़ों से पसीने और सीलन भरी पुरानी कागज़ी फाइलों की हल्की सी गंध आती। उनके झुके हुए कंधे और दबे पाँव चलने की आहट चीख-चीख कर बता देती थी कि घर के अंदर उनकी हैसियत महज़ एक कमाने वाले सदस्य की है। घर की असली सत्ता, घर का कड़ा संविधान और यहाँ तक कि हवा का रुख भी मेरी मम्मी, अनीता के इशारों पर तय होता था।
मेरी मम्मी 39 साल की एक खूबसूरत लेकिन बेहद सख्त महिला थीं। उनका चेहरा बेदाग गोरा और तीखे नैन-नक्श वाला था, लेकिन उनकी आँखों में एक ऐसी बर्फीली और चुभने वाली सख्ती होती थी, जो किसी को भी नज़रें झुकाने पर मजबूर कर दे। उनका जीवन और स्वभाव किसी तानाशाह से कम नहीं था। जब वह घर के आंगन में चलतीं, तो उनके कदमों की भारी, नपी-तुली 'खट-खट' की आवाज़ से ही पूरे घर में सन्नाटा छा जाता था। वह सिर्फ पैसों का ही हिसाब नहीं रखती थीं, बल्कि हमारे जीवन के हर एक पल पर उनका नियंत्रण था।
खासकर उनका अपना पहनावा इतना रूढ़िवादी और सख्त था कि मैंने उन्हें कभी गलती से भी थोड़े ढीले या आधुनिक कपड़ों में नहीं देखा। उनके शरीर से हमेशा कपड़ों वाले कड़क साबुन और चन्दन के टेलकम पाउडर की एक मिली-जुली, तीखी महक आती थी, जो उनकी साफ-सफाई के गुरूर को दर्शाती थी। उनकी सूती या सिल्क की साड़ियों पर हमेशा कड़क कलफ लगा होता था। जब वह चलतीं, तो उस कलफ लगी साड़ी की 'सर्र-सर्र' और कड़कड़ाहट की आवाज़ उनके सख्त अनुशासन का ऐलान करती थी।
उनका ब्लाउज़ उनके शरीर से इतना कसकर सिला होता था कि सांस लेने पर भी कपड़े में कोई सिलवट नहीं पड़ती थी। साड़ी का पल्लू हमेशा उनके गले तक खींचा हुआ और कंधे पर एक बड़ी सी स्टील की सेफ्टी पिन से निर्दयता से कसा होता था—वह पिन जो कभी-कभी रोशनी पड़ने पर किसी हथियार की तरह चमकती थी। मजाल है कि उनके शरीर का एक इंच हिस्सा या उनकी कमर का कोई हिस्सा बेवजह किसी को दिख जाए। उनकी साड़ी की प्लेट्स भी किसी फौजी की वर्दी की तरह एकदम तीखी और सीधी होती थीं।
उनकी वह सती-सावित्री और अति-संस्कारी छवि इतनी अभेद्य थी कि मोहल्ले का कोई भी इंसान उनकी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता था। अगर कोई उन्हें गलती से घूर ले, तो उनकी तन जाने वाली भौंहें और गुस्से से फड़कते नथुने सामने वाले को वहीं राख कर देते थे। वह नैतिकता की एक ऐसी मूरत थीं, जिसे अपनी इस ढकी हुई पवित्रता पर इतना गहरा गुरूर था, जैसे उनके आस-पास की हवा को भी उनके शरीर को छूने के लिए इजाज़त लेनी पड़ती हो।
मैं नवीन हूँ, उनका 19 साल का बेटा। यह उम्र का वह दहकता हुआ पड़ाव होता है, जहाँ इंसान की रगों में दौड़ता खून किसी उबलते हुए लावे जैसा महसूस होता है और शरीर के भीतर हारमोंस के तूफान किसी तेज़ आंधी की तरह शोर मचाते हैं। कॉलेज की उस नई और खुली दुनिया में कदम रखते ही मेरी इंद्रियां जैसे अचानक जाग जाती थीं—लड़कियों के रंग-बिरंगे लहराते कपड़े, हवा में तैरती उनके परफ्यूम, शैम्पू और हल्की सी पसीने की मीठी महक, और उनकी बिना किसी डर के गूँजती खिलखिलाहट, जो मेरे कानों में किसी मीठे संगीत की तरह बजती थी। मोहल्ले की औरतों की चूड़ियों की खनक और उनकी पायल की 'छम-छम' मुझे एक प्राकृतिक, गर्म कशिश में बांधती थी। लेकिन, जैसे ही मैं इस चहचहाती और रंगों से भरी दुनिया से लौटकर अपने घर की भारी और ठंडी लकड़ी की चौखट पर कदम रखता, मानो मेरे गले में एक अदृश्य, खुरदरा फंदा कस जाता था। घर की उस फिनायल और पुरानी किताबों वाली ठंडी, सीलन भरी हवा के बीच, मम्मी की वह दमघोंटू सख्ती मेरे सीने को किसी सुई की तरह अंदर तक चिढ़ाने लगती थी।
घर में किसी भी तरह की आज़ादी, खुलेपन या खुलकर हँसने की आवाज़ पर एक बर्फ सा जमा देने वाला सन्नाटा हावी रहता था। वहाँ सिर्फ दीवार घड़ी की नीरस, भारी 'टिक-टिक' और मम्मी के अधिकार भरे कदमों की गूँज सुनाई देती थी। मम्मी की इसी चुभने वाली सख्ती, उनकी आँखों की वह बर्फ जैसी ठंडी घूरती हुई नज़र, और दूसरों पर हर वक्त अपनी कड़क आवाज़ का चाबुक चलाने की उनकी फितरत ने मेरे अंदर एक अजीब, सुलगते हुए मनोवैज्ञानिक विद्रोह को जन्म दिया।
मेरे दिमाग के अंधेरे कोनों में अक्सर यह बात एक ज़हरीले और गाढ़े धुएं की तरह उठती थी कि दूसरों पर हमेशा अपनी सत्ता चलाने वाली और खुद को नैतिकता के इतने ऊंचे दर्जे पर रखने वाली मेरी मम्मी, अगर कभी किसी अजनबी की गर्म, हवस भरी और चीर देने वाली नज़रों के सामने बेबस होकर कांपने लगे, तो कैसा लगेगा?
मैं अपनी आँखों से देखना चाहता था कि उनकी वह कलफ लगी, सख्त और रूढ़िवादी दीवार जब दरकती है, तो उनके चेहरे पर कैसा डर और पसीना उभरता है। मैं उनके उस अजेय गुरूर को पिघलते हुए देखना चाहता था। इसी सोच ने मुझे एक ऐसी डार्क और 'ककल्ड' मानसिकता के दलदल में धकेल दिया था। जब भी मैं सिर्फ यह कल्पना करता कि कोई गैर-मर्द उनकी इस 'छू-कर-तो-दिखाओ' वाली पवित्रता को अपनी नज़रों से रौंद रहा है, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते, मेरे कानों में मेरे ही दिल की तेज़, हथौड़े जैसी धड़कनें गूँजने लगतीं, और मेरी हथेलियों में चिपचिपा पसीना आ जाता। उस दमघोंटू घर के सन्नाटे में, मुझे अपनी ही मम्मी की उस ख्याली हार, उनके ढहते हुए आत्मसम्मान और उनकी बेबसी में एक अजीब सी, विकृत लेकिन बेहद गहरी शांति मिलने लगी थी।
अगस्त की एक चिपचिपी और उमस भरी शाम थी। मैं मोहल्ले के नुक्कड़ पर मौजूद चाय की टपरी पर खड़ा था। हवा में खौलती हुई चायपत्ती, जलते हुए कोयले और सस्ती बीड़ी के कड़वे धुएं की एक दमघोंटू, घुली-मिली सी गंध तैर रही थी। तभी मेरे कानों में टपरी की लकड़ी की बेंच पर बैठे कुछ अधेड़ उम्र के आदमियों की रसभरी, दबी हुई फुसफुसाहटें पड़ीं। वे अपनी 'कटिंग चाय' के कांच के गिलासों को मेज पर 'खट-खट' टकराते हुए मोहल्ले के एक स्थानीय प्रैक्टिशनर, डॉ. विक्रम के बारे में बात कर रहे थे।
डॉ. विक्रम कोई बहुत पढ़ा-लिखा या नामी डॉक्टर नहीं था। उसके सीलन भरे क्लिनिक के बाहर टंगे एक जंग खाए पीले बोर्ड पर कोई अजीब सी, आधी-अधूरी सी डिग्री लिखी हुई थी। लेकिन मोहल्ले में उसकी असली शोहरत उसके इलाज से ज़्यादा उसकी रंगीन मिजाजी और गंदी नीयत के लिए थी।
बीड़ी के धुएं के बीच से आदमियों की जो खुरदरी, हँसती हुई आवाज़ें मेरे कानों में पड़ रही थीं, वे साफ़ बता रही थीं कि विक्रम महिला मरीजों के मामले में थोड़ा 'ज़्यादा ही फ्रैंक' या यूँ कहें कि 'शौकीन' किस्म का आदमी था। औरतें दबी जुबान में उसकी शिकायत करती थीं। चेकअप के बहाने महिलाओं के जिस्म पर गैर-ज़रूरी जगह हाथ फेरना, बीमारी पूछने की आड़ में उन्हें असहज कर देने वाले दोहरे अर्थ वाले सवाल पूछना, स्टेथोस्कोप लगाने के नाम पर कपड़ों के अंदर अपनी ठंडी उंगलियां खिसका देना, और अपनी गिद्ध जैसी, चिपचिपी और भूखी आँखों से उनके बदन को किसी मिठाई की तरह चाटना—यह डॉ. विक्रम का रोज़ का काम था।
वह अगस्त के महीने की एक रविवार की दोपहर थी। बाहर सूरज आग उगल रहा था और घर के अंदर छत वाले पुराने पंखे की लगातार आ रही 'चर्र-चर्र' की आवाज़ सन्नाटे को और भारी बना रही थी। रसोई से दोपहर के खाने के सरसों के तेल और हींग की हल्की, उबाऊ महक अब भी हवा में तैर रही थी।
तभी अचानक, उस दमघोंटू सन्नाटे को चीरती हुई मम्मी के कमरे से एक सिसकी उभरी।
मैं भागकर उनके कमरे में पहुँचा। मम्मी, जो कभी किसी के सामने झुकती नहीं थीं, आज अपने बिस्तर पर दोहरी हो रही थीं। उनके दोनों हाथों ने अपने पेट को कसकर दबा रखा था। उनके हमेशा दमकते रहने वाले गोरे चेहरे का रंग सफेद पड़ चुका था, और उनके माथे पर दर्द के कारण ठंडे पसीने की बारीक बूंदें किसी ओस की तरह चमक रही थीं। कमरे की हवा में हमेशा महकने वाले उनके चन्दन के पाउडर की जगह, आज दर्द से उपजे उस चिपचिपे पसीने की एक खुरदरी सी गंध ने ले ली थी। उन्हें शायद खाने से कोई भारी इन्फेक्शन या गैस की भयंकर ऐंठन हो गई थी।
पिताजी भी घबराए हुए दौड़े आए। उनका दब्बू स्वभाव ऐसी अचानक आई मुसीबत के सामने पूरी तरह असहाय हो गया था। उनके माथे पर झुर्रियां पड़ गईं और वह कांपती हुई, घबराई आवाज़ में बोले, "अरे अनीता... क्या हो गया? नवीन, जल्दी जा... चौराहे वाले बड़े अस्पताल से रिक्शा ला, या फिर डॉ. शर्मा को फोन कर।"
इसी पल... मेरे अंदर सोए हुए उस विकृत, डार्क राक्षस ने अपनी आँखें खोल दीं। मेरी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी, गुदगुदाती हुई बिजली दौड़ गई। मेरे कानों में मेरे ही दिल की 'धक्-धक्' किसी हथौड़े की तरह गूँजने लगी। मुझे लगा जैसे मेरे सामने एक तैयार शिकार खुद चलकर आ गया है। मैंने तुरंत अपनी घबराहट का नाटक किया, लेकिन मेरा दिमाग किसी शातिर शिकारी की तरह तेज़ी से काम कर रहा था।
"पापा! बड़ा अस्पताल यहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। इस चिलचिलाती धूप में रिक्शे के झटकों से मम्मी की जान निकल जाएगी!" मैंने अपनी आवाज़ में झूठी चिंता का एक ऐसा तड़का लगाया जो बिल्कुल असली लग रहा था।
"और डॉ. शर्मा आज रविवार को क्लिनिक नहीं खोलते," मैंने एक और दरवाज़ा बंद करते हुए कहा।
फिर मैंने एक गहरी साँस ली और अपना ज़हरीला पासा फेंका। "नुक्कड़ पर डॉ. विक्रम का क्लिनिक खुला है। वह भले ही छोटा डॉक्टर है, लेकिन सब कहते हैं कि उसकी दवाइयों और इंजेक्शन में जादू है। वो तुरंत आराम देता है। हमें अभी के अभी मम्मी को वहाँ ले जाना चाहिए!"
'डॉ. विक्रम' का नाम सुनते ही, दर्द से कराहती मम्मी ने अपनी आँखें खोलीं। उनकी उन तेज़, सख्त आँखों में एक पल के लिए नापसंदगी और गुस्सा उभरा। "न...नहीं... उस झोलेछाप.. के पास मैं नहीं जाऊँगी..." उन्होंने हांफते हुए अपनी उसी पुरानी कड़क लेकिन अब लड़खड़ाती हुई आवाज़ में विरोध किया। वह एक रूढ़िवादी औरत थीं, उनके गुरूर को एक मामूली गली के डॉक्टर के पास जाना गवारा नहीं था।
लेकिन मेरे अंदर का साज़िशकर्ता आज हार मानने वाला नहीं था। मैंने आगे बढ़कर मम्मी के पसीने से भीगे कंधे को पकड़ा—वह कंधा जिसे छूने की हिम्मत घर में किसी की नहीं होती थी।
"मम्मी, ज़िद मत करो! तुम्हें बहुत तेज़ दर्द है। हम बस वहाँ से कोई तेज़ दर्दनिवारक का इंजेक्शन लगवा कर वापस आ जाएंगे। मैं हूँ ना तुम्हारे साथ, मैं किसी को तुम्हें हाथ भी नहीं लगाने दूँगा।" मैंने अपनी आवाज़ में एक बेटे की फिक्र का ऐसा गाढ़ा लेप लगाया, जिसने उनके शक को पूरी तरह दबा दिया।
पेट में उठी दर्द की एक नई और भयंकर लहर ने उनके बाकी बचे गुरूर को भी चकनाचूर कर दिया। वह एक गहरी, कमज़ोर कराह के साथ आगे की ओर झुकीं और उन्होंने हार मानकर सिर हिला दिया।
मेरी साज़िश कामयाब हो चुकी थी।
मैंने और पिताजी ने मिलकर उन्हें उठाया। पिताजी घर बंद करने के लिए पीछे रुके और मैंने मम्मी का हाथ अपने कंधे पर रख लिया। जब हम घर की दहलीज़ लांघकर उस गर्म, धूल भरी गली में निकले, तो मुझे एक अजीब सी, घुटन भरी खुशी महसूस हो रही थी। मम्मी का वह भारी शरीर आज मेरे सहारे टिक कर चल रहा था। उनकी वह हमेशा कड़क कलफ से टाइट रहने वाली सूती साड़ी, आज उनके लड़खड़ाते कदमों और दर्द की ऐंठन के कारण जगह-जगह से सिलवटों से भर गई थी। उनके भारी साँसों की 'हश-हश' आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी।
मैं उन्हें सहारा देकर ले जा रहा था, लेकिन मेरी हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई थीं और मेरे होंठ सूख रहे थे। बाहर से मैं एक फिक्रमंद बेटा लग रहा था, लेकिन अंदर से... अंदर से मैं एक ऐसा 'ककल्ड' था जो अपनी खुद की सख्त, अछूती और पवित्र मम्मी को, जानबूझकर, अपने हाथों से उस हवसी, गिद्ध जैसी आँखों वाले डॉ. विक्रम के गुफा जैसे केबिन की तरफ धकेल रहा था।
जैसे-जैसे हम नुक्कड़ के करीब पहुँच रहे थे, हवा में डॉ. विक्रम के क्लिनिक से आती स्प्रिट, पुरानी दवाइयों और सीलन की वह तीखी, जानी-पहचानी गंध तेज़ होने लगी। मेरे पेट में उत्तेजना के कारण अजीब सी ऐंठन हो रही थी। वह पल अब बस कुछ ही कदम दूर था, जब मेरी मम्मी का सारा गुरूर उस हवसी इंसान के सामने एक मोम की तरह पिघलने वाला था।
चिलचिलाती धूप और गर्म थपेड़ों को चीरते हुए, हम नुक्कड़ के उस जर्जर से क्लिनिक के सामने पहुँचे। क्लिनिक का दरवाज़ा धुंधले कांच का था, जिस पर पड़ी धूल साफ़ बता रही थी कि यहाँ साफ़-सफाई से ज़्यादा ज़ोर किसी और चीज़ पर रहता है।
जैसे ही मैंने उस कांच के भारी दरवाज़े को धकेला, बाहर की गर्मी कट गई और अंदर एक पुराने, खड़खड़ाते हुए एसी की सीलन भरी ठंडक ने हमारा स्वागत किया। हवा में डिटॉल, स्पिरिट, सस्ती अगरबत्ती और किसी पुरानी बंद पड़ी अलमारी जैसी मिली-जुली, दमघोंटू सी महक तैर रही थी। छत पर लगा एक जंग खाया पंखा अपनी धुरी पर 'खट-खट... चर्र-चर्र' की उबाऊ आवाज़ करते हुए घूम रहा था।
सामने एक पुरानी सनमाइका लगी मेज के पीछे डॉ. विक्रम बैठा था। उम्र में वह 32-35 के आसपास का लग रहा था। उसके बालों में तेल कुछ ज़्यादा ही चमचमा रहा था और उसके गले में एक पुराना स्टेथोस्कोप लटक रहा था। वह अपने फोन में कुछ देख रहा था, लेकिन दरवाज़े की आवाज़ सुनते ही उसने सिर उठाया।
उसकी नज़रें जैसे ही दरवाज़े पर पड़ीं, उसका उबाऊ और सुस्त चेहरा अचानक सतर्क हो गया। उसकी नज़रों ने मुझे अनदेखा करते हुए सीधे मेरे सहारे खड़ी मम्मी पर अपना निशाना साध लिया।
दर्द से कराहती, पसीने में भीगी, लेकिन फिर भी अपनी उस कड़क कलफ लगी साड़ी में लिपटी एक 39 साल की बेहद खूबसूरत, भरी-पूरी और सख्त औरत—विक्रम के लिए यह किसी अप्रत्याशित खज़ाने जैसा था। मैंने विक्रम की आँखों को पढ़ते हुए साफ महसूस किया; उसकी गिद्ध जैसी पुतलियाँ एक पल के लिए चौड़ी हुईं और फिर उनमें एक भूखी, चिपचिपी सी चमक आ गई। जैसे कोई शिकारी अपने जाले में फंसे एक नायाब शिकार को देख रहा हो।
मम्मी की छठी इंद्री, जो घर में किसी की भी नज़र भांप लेती थी, यहाँ भी काम कर गई। दर्द से बेहाल होने के बावजूद, उन्होंने उस क्लिनिक की गंदी वाइब को महसूस कर लिया था। उन्होंने कांपते हुए हाथों से अपनी साड़ी के पल्लू को और कसकर अपनी छाती और गले के इर्द-गिर्द लपेट लिया, मानो वह उस पल्लू को एक लोहे की ढाल बना लेना चाहती हों जो उन्हें विक्रम की उन चुभती हुई नज़रों से बचा सके।
"क्या हुआ... अरे, मैडम को क्या हो गया?" विक्रम अपनी कुर्सी से उठते हुए बोला। उसकी आवाज़ में हमदर्दी का एक ऐसा बनावटी और 'चिकना' लेप था, जो सुनने में ही असहज कर रहा था।
"पेट में बहुत तेज़ दर्द है... शायद गैस या भारी इन्फेक्शन है। बहुत तड़प रही हैं," मैंने जल्दी से कहा। मैंने अपनी आवाज़ को जितना हो सके डरा हुआ और सामान्य रखा, लेकिन मेरे अंदर... मेरी पसलियों के नीचे मेरा दिल एक इंजन की तरह धक-धक कर रहा था। मेरे गले में उत्तेजना का एक सूखापन आ गया था।
"कोई बात नहीं, घबराइए मत," विक्रम ने अपनी कुर्सी से बाहर आते हुए कहा। उसकी नज़रें अभी भी मम्मी के दर्द से तड़पते चेहरे और कसकर बंधे पल्लू पर चिपकी हुई थीं। उसने मेज के पीछे बने एक छोटे से हिस्से की तरफ इशारा किया, जिसे एक गंदे, फीके पड़ चुके हरे परदे से ढका गया था। "इन्हें अंदर चेकअप वाले केबिन में ले आइए। मुझे ज़रा गहराई से एग्जामिन करना होगा।"
वह हरा पर्दा... वह सिर्फ एक कपड़े का टुकड़ा नहीं था। वह उस क्लिनिक के 'इलाज' और विक्रम की 'हवस' के बीच की सरहद था।
मैंने मम्मी को सहारा दिया और हम उस परदे के पीछे दाखिल हुए। केबिन के अंदर एक संकरी, घुटन भरी जगह थी। बीच में एक पुराना चेकअप बेड रखा था, जिसे काली रेक्सीन से मढ़ा गया था। उस काली रेक्सीन से रबर और पुराने पसीने की एक खुरदरी गंध आ रही थी। ऊपर एक सफेद ट्यूबलाइट लगी थी, जिसकी तेज़, निर्दयी रोशनी में सब कुछ बिल्कुल साफ दिख रहा था।
मम्मी दर्द के मारे लगभग हांफती हुई उस बेड के किनारे बैठ गईं। वह लगातार सिसक रही थीं।
तभी उस हरे परदे को हटाकर डॉ. विक्रम केबिन के अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर अब एक गंभीर, पेशेवर डॉक्टर का मुखौटा था, लेकिन उसकी नज़रों में छिपी उस ललचाई हुई, गंदी ललक को सिर्फ मैं देख पा रहा था।
मैं केबिन के एक कोने में, ट्यूबलाइट के साये में चुपचाप खड़ा हो गया। मेरी हथेलियाँ ठंडे पसीने से तर-बतर हो चुकी थीं और मेरे पैर ज़मीन से जैसे जम गए थे। वह पल... वह खौफनाक और मेरा सबसे पसंदीदा वर्जित पल बस अब शुरू होने ही वाला था। मैंने अपनी रक्षक वाली ढाल पूरी तरह गिरा दी थी, और अब मैं सिर्फ एक मूक दर्शक, एक 'ककल्ड' था, जो अपनी नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली मम्मी के गुरूर को टुकड़े-टुकड़े होते देखने के लिए बेताब था।
केबिन के अंदर उस तेज़ सफेद ट्यूबलाइट की रोशनी आँखों में चुभ रही थी। काली रेक्सीन वाले बेड पर लेटी मेरी मम्मी, अनीता, दर्द से दोहरी हो रही थीं। उनके माथे पर पसीने की परत चमक रही थी और उनकी भारी, उथली साँसों के साथ उनके होठों से हल्की कराह निकल रही थी। हवा में अब उनकी चन्दन की महक पूरी तरह से स्पिरिट और पसीने की गंध में दब चुकी थी।
डॉ. विक्रम उनके दाहिनी ओर खड़ा हुआ। उसने अपनी जेब से एक छोटा टॉर्च निकाला, अपनी मेज से स्टेथोस्कोप उठाकर कानों में फंसाया और चेहरे पर एक सख्त, अधिकारपूर्ण मेडिकल रवैया ओढ़ लिया—वह रवैया जिसके आगे बड़े-बड़े लोगों का गुरूर टूट जाता है।
"रिलैक्स... सीधे लेट जाइए," विक्रम ने एक सर्द और बनावटी पेशेवराना आवाज़ में कहा।
मम्मी ने अपनी दर्द भरी ऐंठन से लड़ते हुए खुद को सीधा किया। बेड की पुरानी रेक्सीन से 'चर्रर्र...' की एक कर्कश आवाज़ गूंजी।
विक्रम ने अपना कदम थोड़ा और करीब बढ़ाया। अब वह बिल्कुल मम्मी के ऊपर झुका हुआ था। "मैडम, मुझे आपका पेट गहराई से चेक करना होगा। दर्द कहाँ से उठ रहा है, यह बिना छुए पता नहीं चलेगा। अपनी साड़ी का पल्लू हटा लीजिए और कपड़ों को थोड़ा ऊपर कर लीजिए।"
वह वाक्य उस छोटे से केबिन में किसी बम की तरह गिरा।
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#2
hope you guys will love this story too
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