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मकड़ी का जाला
#1
लखनऊ की उन पुरानी, संकरी लेकिन अजीब सी चमकती हुई कॉलोनियों में से एक में हमारा घर था। घर में घुसते ही फिनायल की तीखी गंध और फर्श की ठंडक अहसास करा देती थी कि यहाँ धूल के एक कण की भी गुंजाइश नहीं है। मेरे पिता एक प्राइवेट कंपनी में मामूली क्लर्क हैं। उनका स्वभाव बेहद शांत, दब्बू और अपनी पुरानी फाइलों तक सीमित रहने वाला है। जब वह शाम को घर लौटते, तो उनके कपड़ों से पसीने और सीलन भरी पुरानी कागज़ी फाइलों की हल्की सी गंध आती। उनके झुके हुए कंधे और दबे पाँव चलने की आहट चीख-चीख कर बता देती थी कि घर के अंदर उनकी हैसियत महज़ एक कमाने वाले सदस्य की है। घर की असली सत्ता, घर का कड़ा संविधान और यहाँ तक कि हवा का रुख भी मेरी मम्मी, अनीता के इशारों पर तय होता था।
मेरी मम्मी 39 साल की एक खूबसूरत लेकिन बेहद सख्त महिला थीं। उनका चेहरा बेदाग गोरा और तीखे नैन-नक्श वाला था, लेकिन उनकी आँखों में एक ऐसी बर्फीली और चुभने वाली सख्ती होती थी, जो किसी को भी नज़रें झुकाने पर मजबूर कर दे। उनका जीवन और स्वभाव किसी तानाशाह से कम नहीं था। जब वह घर के आंगन में चलतीं, तो उनके कदमों की भारी, नपी-तुली 'खट-खट' की आवाज़ से ही पूरे घर में सन्नाटा छा जाता था। वह सिर्फ पैसों का ही हिसाब नहीं रखती थीं, बल्कि हमारे जीवन के हर एक पल पर उनका नियंत्रण था।
खासकर उनका अपना पहनावा इतना रूढ़िवादी और सख्त था कि मैंने उन्हें कभी गलती से भी थोड़े ढीले या आधुनिक कपड़ों में नहीं देखा। उनके शरीर से हमेशा कपड़ों वाले कड़क साबुन और चन्दन के टेलकम पाउडर की एक मिली-जुली, तीखी महक आती थी, जो उनकी साफ-सफाई के गुरूर को दर्शाती थी। उनकी सूती या सिल्क की साड़ियों पर हमेशा कड़क कलफ लगा होता था। जब वह चलतीं, तो उस कलफ लगी साड़ी की 'सर्र-सर्र' और कड़कड़ाहट की आवाज़ उनके सख्त अनुशासन का ऐलान करती थी।
उनका ब्लाउज़ उनके शरीर से इतना कसकर सिला होता था कि सांस लेने पर भी कपड़े में कोई सिलवट नहीं पड़ती थी। साड़ी का पल्लू हमेशा उनके गले तक खींचा हुआ और कंधे पर एक बड़ी सी स्टील की सेफ्टी पिन से निर्दयता से कसा होता था—वह पिन जो कभी-कभी रोशनी पड़ने पर किसी हथियार की तरह चमकती थी। मजाल है कि उनके शरीर का एक इंच हिस्सा या उनकी कमर का कोई हिस्सा बेवजह किसी को दिख जाए। उनकी साड़ी की प्लेट्स भी किसी फौजी की वर्दी की तरह एकदम तीखी और सीधी होती थीं।
उनकी वह सती-सावित्री और अति-संस्कारी छवि इतनी अभेद्य थी कि मोहल्ले का कोई भी इंसान उनकी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं कर सकता था। अगर कोई उन्हें गलती से घूर ले, तो उनकी तन जाने वाली भौंहें और गुस्से से फड़कते नथुने सामने वाले को वहीं राख कर देते थे। वह नैतिकता की एक ऐसी मूरत थीं, जिसे अपनी इस ढकी हुई पवित्रता पर इतना गहरा गुरूर था, जैसे उनके आस-पास की हवा को भी उनके शरीर को छूने के लिए इजाज़त लेनी पड़ती हो।
मैं नवीन हूँ, उनका 19 साल का बेटा। यह उम्र का वह दहकता हुआ पड़ाव होता है, जहाँ इंसान की रगों में दौड़ता खून किसी उबलते हुए लावे जैसा महसूस होता है और शरीर के भीतर हारमोंस के तूफान किसी तेज़ आंधी की तरह शोर मचाते हैं। कॉलेज की उस नई और खुली दुनिया में कदम रखते ही मेरी इंद्रियां जैसे अचानक जाग जाती थीं—लड़कियों के रंग-बिरंगे लहराते कपड़े, हवा में तैरती उनके परफ्यूम, शैम्पू और हल्की सी पसीने की मीठी महक, और उनकी बिना किसी डर के गूँजती खिलखिलाहट, जो मेरे कानों में किसी मीठे संगीत की तरह बजती थी। मोहल्ले की औरतों की चूड़ियों की खनक और उनकी पायल की 'छम-छम' मुझे एक प्राकृतिक, गर्म कशिश में बांधती थी। लेकिन, जैसे ही मैं इस चहचहाती और रंगों से भरी दुनिया से लौटकर अपने घर की भारी और ठंडी लकड़ी की चौखट पर कदम रखता, मानो मेरे गले में एक अदृश्य, खुरदरा फंदा कस जाता था। घर की उस फिनायल और पुरानी किताबों वाली ठंडी, सीलन भरी हवा के बीच, मम्मी की वह दमघोंटू सख्ती मेरे सीने को किसी सुई की तरह अंदर तक चिढ़ाने लगती थी।
घर में किसी भी तरह की आज़ादी, खुलेपन या खुलकर हँसने की आवाज़ पर एक बर्फ सा जमा देने वाला सन्नाटा हावी रहता था। वहाँ सिर्फ दीवार घड़ी की नीरस, भारी 'टिक-टिक' और मम्मी के अधिकार भरे कदमों की गूँज सुनाई देती थी। मम्मी की इसी चुभने वाली सख्ती, उनकी आँखों की वह बर्फ जैसी ठंडी घूरती हुई नज़र, और दूसरों पर हर वक्त अपनी कड़क आवाज़ का चाबुक चलाने की उनकी फितरत ने मेरे अंदर एक अजीब, सुलगते हुए मनोवैज्ञानिक विद्रोह को जन्म दिया।
मेरे दिमाग के अंधेरे कोनों में अक्सर यह बात एक ज़हरीले और गाढ़े धुएं की तरह उठती थी कि दूसरों पर हमेशा अपनी सत्ता चलाने वाली और खुद को नैतिकता के इतने ऊंचे दर्जे पर रखने वाली मेरी मम्मी, अगर कभी किसी अजनबी की गर्म, हवस भरी और चीर देने वाली नज़रों के सामने बेबस होकर कांपने लगे, तो कैसा लगेगा?
मैं अपनी आँखों से देखना चाहता था कि उनकी वह कलफ लगी, सख्त और रूढ़िवादी दीवार जब दरकती है, तो उनके चेहरे पर कैसा डर और पसीना उभरता है। मैं उनके उस अजेय गुरूर को पिघलते हुए देखना चाहता था। इसी सोच ने मुझे एक ऐसी डार्क और 'ककल्ड' मानसिकता के दलदल में धकेल दिया था। जब भी मैं सिर्फ यह कल्पना करता कि कोई गैर-मर्द उनकी इस 'छू-कर-तो-दिखाओ' वाली पवित्रता को अपनी नज़रों से रौंद रहा है, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते, मेरे कानों में मेरे ही दिल की तेज़, हथौड़े जैसी धड़कनें गूँजने लगतीं, और मेरी हथेलियों में चिपचिपा पसीना आ जाता। उस दमघोंटू घर के सन्नाटे में, मुझे अपनी ही मम्मी की उस ख्याली हार, उनके ढहते हुए आत्मसम्मान और उनकी बेबसी में एक अजीब सी, विकृत लेकिन बेहद गहरी शांति मिलने लगी थी।
अगस्त की एक चिपचिपी और उमस भरी शाम थी। मैं मोहल्ले के नुक्कड़ पर मौजूद चाय की टपरी पर खड़ा था। हवा में खौलती हुई चायपत्ती, जलते हुए कोयले और सस्ती बीड़ी के कड़वे धुएं की एक दमघोंटू, घुली-मिली सी गंध तैर रही थी। तभी मेरे कानों में टपरी की लकड़ी की बेंच पर बैठे कुछ अधेड़ उम्र के आदमियों की रसभरी, दबी हुई फुसफुसाहटें पड़ीं। वे अपनी 'कटिंग चाय' के कांच के गिलासों को मेज पर 'खट-खट' टकराते हुए मोहल्ले के एक स्थानीय प्रैक्टिशनर, डॉ. विक्रम के बारे में बात कर रहे थे।
डॉ. विक्रम कोई बहुत पढ़ा-लिखा या नामी डॉक्टर नहीं था। उसके सीलन भरे क्लिनिक के बाहर टंगे एक जंग खाए पीले बोर्ड पर कोई अजीब सी, आधी-अधूरी सी डिग्री लिखी हुई थी। लेकिन मोहल्ले में उसकी असली शोहरत उसके इलाज से ज़्यादा उसकी रंगीन मिजाजी और गंदी नीयत के लिए थी।
बीड़ी के धुएं के बीच से आदमियों की जो खुरदरी, हँसती हुई आवाज़ें मेरे कानों में पड़ रही थीं, वे साफ़ बता रही थीं कि विक्रम महिला मरीजों के मामले में थोड़ा 'ज़्यादा ही फ्रैंक' या यूँ कहें कि 'शौकीन' किस्म का आदमी था। औरतें दबी जुबान में उसकी शिकायत करती थीं। चेकअप के बहाने महिलाओं के जिस्म पर गैर-ज़रूरी जगह हाथ फेरना, बीमारी पूछने की आड़ में उन्हें असहज कर देने वाले दोहरे अर्थ वाले सवाल पूछना, स्टेथोस्कोप लगाने के नाम पर कपड़ों के अंदर अपनी ठंडी उंगलियां खिसका देना, और अपनी गिद्ध जैसी, चिपचिपी और भूखी आँखों से उनके बदन को किसी मिठाई की तरह चाटना—यह डॉ. विक्रम का रोज़ का काम था।
वह अगस्त के महीने की एक रविवार की दोपहर थी। बाहर सूरज आग उगल रहा था और घर के अंदर छत वाले पुराने पंखे की लगातार आ रही 'चर्र-चर्र' की आवाज़ सन्नाटे को और भारी बना रही थी। रसोई से दोपहर के खाने के सरसों के तेल और हींग की हल्की, उबाऊ महक अब भी हवा में तैर रही थी।
तभी अचानक, उस दमघोंटू सन्नाटे को चीरती हुई मम्मी के कमरे से एक सिसकी उभरी।
मैं भागकर उनके कमरे में पहुँचा। मम्मी, जो कभी किसी के सामने झुकती नहीं थीं, आज अपने बिस्तर पर दोहरी हो रही थीं। उनके दोनों हाथों ने अपने पेट को कसकर दबा रखा था। उनके हमेशा दमकते रहने वाले गोरे चेहरे का रंग सफेद पड़ चुका था, और उनके माथे पर दर्द के कारण ठंडे पसीने की बारीक बूंदें किसी ओस की तरह चमक रही थीं। कमरे की हवा में हमेशा महकने वाले उनके चन्दन के पाउडर की जगह, आज दर्द से उपजे उस चिपचिपे पसीने की एक खुरदरी सी गंध ने ले ली थी। उन्हें शायद खाने से कोई भारी इन्फेक्शन या गैस की भयंकर ऐंठन हो गई थी।
पिताजी भी घबराए हुए दौड़े आए। उनका दब्बू स्वभाव ऐसी अचानक आई मुसीबत के सामने पूरी तरह असहाय हो गया था। उनके माथे पर झुर्रियां पड़ गईं और वह कांपती हुई, घबराई आवाज़ में बोले, "अरे अनीता... क्या हो गया? नवीन, जल्दी जा... चौराहे वाले बड़े अस्पताल से रिक्शा ला, या फिर डॉ. शर्मा को फोन कर।"
इसी पल... मेरे अंदर सोए हुए उस विकृत, डार्क राक्षस ने अपनी आँखें खोल दीं। मेरी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी, गुदगुदाती हुई बिजली दौड़ गई। मेरे कानों में मेरे ही दिल की 'धक्-धक्' किसी हथौड़े की तरह गूँजने लगी। मुझे लगा जैसे मेरे सामने एक तैयार शिकार खुद चलकर आ गया है। मैंने तुरंत अपनी घबराहट का नाटक किया, लेकिन मेरा दिमाग किसी शातिर शिकारी की तरह तेज़ी से काम कर रहा था।
"पापा! बड़ा अस्पताल यहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। इस चिलचिलाती धूप में रिक्शे के झटकों से मम्मी की जान निकल जाएगी!" मैंने अपनी आवाज़ में झूठी चिंता का एक ऐसा तड़का लगाया जो बिल्कुल असली लग रहा था।
"और डॉ. शर्मा आज रविवार को क्लिनिक नहीं खोलते," मैंने एक और दरवाज़ा बंद करते हुए कहा।
फिर मैंने एक गहरी साँस ली और अपना ज़हरीला पासा फेंका। "नुक्कड़ पर डॉ. विक्रम का क्लिनिक खुला है। वह भले ही छोटा डॉक्टर है, लेकिन सब कहते हैं कि उसकी दवाइयों और इंजेक्शन में जादू है। वो तुरंत आराम देता है। हमें अभी के अभी मम्मी को वहाँ ले जाना चाहिए!"
'डॉ. विक्रम' का नाम सुनते ही, दर्द से कराहती मम्मी ने अपनी आँखें खोलीं। उनकी उन तेज़, सख्त आँखों में एक पल के लिए नापसंदगी और गुस्सा उभरा। "न...नहीं... उस झोलेछाप.. के पास मैं नहीं जाऊँगी..." उन्होंने हांफते हुए अपनी उसी पुरानी कड़क लेकिन अब लड़खड़ाती हुई आवाज़ में विरोध किया। वह एक रूढ़िवादी औरत थीं, उनके गुरूर को एक मामूली गली के डॉक्टर के पास जाना गवारा नहीं था।
लेकिन मेरे अंदर का साज़िशकर्ता आज हार मानने वाला नहीं था। मैंने आगे बढ़कर मम्मी के पसीने से भीगे कंधे को पकड़ा—वह कंधा जिसे छूने की हिम्मत घर में किसी की नहीं होती थी।
"मम्मी, ज़िद मत करो! तुम्हें बहुत तेज़ दर्द है। हम बस वहाँ से कोई तेज़ दर्दनिवारक का इंजेक्शन लगवा कर वापस आ जाएंगे। मैं हूँ ना तुम्हारे साथ, मैं किसी को तुम्हें हाथ भी नहीं लगाने दूँगा।" मैंने अपनी आवाज़ में एक बेटे की फिक्र का ऐसा गाढ़ा लेप लगाया, जिसने उनके शक को पूरी तरह दबा दिया।
पेट में उठी दर्द की एक नई और भयंकर लहर ने उनके बाकी बचे गुरूर को भी चकनाचूर कर दिया। वह एक गहरी, कमज़ोर कराह के साथ आगे की ओर झुकीं और उन्होंने हार मानकर सिर हिला दिया।
मेरी साज़िश कामयाब हो चुकी थी।
मैंने और पिताजी ने मिलकर उन्हें उठाया। पिताजी घर बंद करने के लिए पीछे रुके और मैंने मम्मी का हाथ अपने कंधे पर रख लिया। जब हम घर की दहलीज़ लांघकर उस गर्म, धूल भरी गली में निकले, तो मुझे एक अजीब सी, घुटन भरी खुशी महसूस हो रही थी। मम्मी का वह भारी शरीर आज मेरे सहारे टिक कर चल रहा था। उनकी वह हमेशा कड़क कलफ से टाइट रहने वाली सूती साड़ी, आज उनके लड़खड़ाते कदमों और दर्द की ऐंठन के कारण जगह-जगह से सिलवटों से भर गई थी। उनके भारी साँसों की 'हश-हश' आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी।
मैं उन्हें सहारा देकर ले जा रहा था, लेकिन मेरी हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई थीं और मेरे होंठ सूख रहे थे। बाहर से मैं एक फिक्रमंद बेटा लग रहा था, लेकिन अंदर से... अंदर से मैं एक ऐसा 'ककल्ड' था जो अपनी खुद की सख्त, अछूती और पवित्र मम्मी को, जानबूझकर, अपने हाथों से उस हवसी, गिद्ध जैसी आँखों वाले डॉ. विक्रम के गुफा जैसे केबिन की तरफ धकेल रहा था।
जैसे-जैसे हम नुक्कड़ के करीब पहुँच रहे थे, हवा में डॉ. विक्रम के क्लिनिक से आती स्प्रिट, पुरानी दवाइयों और सीलन की वह तीखी, जानी-पहचानी गंध तेज़ होने लगी। मेरे पेट में उत्तेजना के कारण अजीब सी ऐंठन हो रही थी। वह पल अब बस कुछ ही कदम दूर था, जब मेरी मम्मी का सारा गुरूर उस हवसी इंसान के सामने एक मोम की तरह पिघलने वाला था।
चिलचिलाती धूप और गर्म थपेड़ों को चीरते हुए, हम नुक्कड़ के उस जर्जर से क्लिनिक के सामने पहुँचे। क्लिनिक का दरवाज़ा धुंधले कांच का था, जिस पर पड़ी धूल साफ़ बता रही थी कि यहाँ साफ़-सफाई से ज़्यादा ज़ोर किसी और चीज़ पर रहता है।
जैसे ही मैंने उस कांच के भारी दरवाज़े को धकेला, बाहर की गर्मी कट गई और अंदर एक पुराने, खड़खड़ाते हुए एसी की सीलन भरी ठंडक ने हमारा स्वागत किया। हवा में डिटॉल, स्पिरिट, सस्ती अगरबत्ती और किसी पुरानी बंद पड़ी अलमारी जैसी मिली-जुली, दमघोंटू सी महक तैर रही थी। छत पर लगा एक जंग खाया पंखा अपनी धुरी पर 'खट-खट... चर्र-चर्र' की उबाऊ आवाज़ करते हुए घूम रहा था।
सामने एक पुरानी सनमाइका लगी मेज के पीछे डॉ. विक्रम बैठा था। उम्र में वह 32-35 के आसपास का लग रहा था। उसके बालों में तेल कुछ ज़्यादा ही चमचमा रहा था और उसके गले में एक पुराना स्टेथोस्कोप लटक रहा था। वह अपने फोन में कुछ देख रहा था, लेकिन दरवाज़े की आवाज़ सुनते ही उसने सिर उठाया।
उसकी नज़रें जैसे ही दरवाज़े पर पड़ीं, उसका उबाऊ और सुस्त चेहरा अचानक सतर्क हो गया। उसकी नज़रों ने मुझे अनदेखा करते हुए सीधे मेरे सहारे खड़ी मम्मी पर अपना निशाना साध लिया।
दर्द से कराहती, पसीने में भीगी, लेकिन फिर भी अपनी उस कड़क कलफ लगी साड़ी में लिपटी एक 39 साल की बेहद खूबसूरत, भरी-पूरी और सख्त औरत—विक्रम के लिए यह किसी अप्रत्याशित खज़ाने जैसा था। मैंने विक्रम की आँखों को पढ़ते हुए साफ महसूस किया; उसकी गिद्ध जैसी पुतलियाँ एक पल के लिए चौड़ी हुईं और फिर उनमें एक भूखी, चिपचिपी सी चमक आ गई। जैसे कोई शिकारी अपने जाले में फंसे एक नायाब शिकार को देख रहा हो।
मम्मी की छठी इंद्री, जो घर में किसी की भी नज़र भांप लेती थी, यहाँ भी काम कर गई। दर्द से बेहाल होने के बावजूद, उन्होंने उस क्लिनिक की गंदी वाइब को महसूस कर लिया था। उन्होंने कांपते हुए हाथों से अपनी साड़ी के पल्लू को और कसकर अपनी छाती और गले के इर्द-गिर्द लपेट लिया, मानो वह उस पल्लू को एक लोहे की ढाल बना लेना चाहती हों जो उन्हें विक्रम की उन चुभती हुई नज़रों से बचा सके।
"क्या हुआ... अरे, मैडम को क्या हो गया?" विक्रम अपनी कुर्सी से उठते हुए बोला। उसकी आवाज़ में हमदर्दी का एक ऐसा बनावटी और 'चिकना' लेप था, जो सुनने में ही असहज कर रहा था।
"पेट में बहुत तेज़ दर्द है... शायद गैस या भारी इन्फेक्शन है। बहुत तड़प रही हैं," मैंने जल्दी से कहा। मैंने अपनी आवाज़ को जितना हो सके डरा हुआ और सामान्य रखा, लेकिन मेरे अंदर... मेरी पसलियों के नीचे मेरा दिल एक इंजन की तरह धक-धक कर रहा था। मेरे गले में उत्तेजना का एक सूखापन आ गया था।
"कोई बात नहीं, घबराइए मत," विक्रम ने अपनी कुर्सी से बाहर आते हुए कहा। उसकी नज़रें अभी भी मम्मी के दर्द से तड़पते चेहरे और कसकर बंधे पल्लू पर चिपकी हुई थीं। उसने मेज के पीछे बने एक छोटे से हिस्से की तरफ इशारा किया, जिसे एक गंदे, फीके पड़ चुके हरे परदे से ढका गया था। "इन्हें अंदर चेकअप वाले केबिन में ले आइए। मुझे ज़रा गहराई से एग्जामिन करना होगा।"
वह हरा पर्दा... वह सिर्फ एक कपड़े का टुकड़ा नहीं था। वह उस क्लिनिक के 'इलाज' और विक्रम की 'हवस' के बीच की सरहद था।
मैंने मम्मी को सहारा दिया और हम उस परदे के पीछे दाखिल हुए। केबिन के अंदर एक संकरी, घुटन भरी जगह थी। बीच में एक पुराना चेकअप बेड रखा था, जिसे काली रेक्सीन से मढ़ा गया था। उस काली रेक्सीन से रबर और पुराने पसीने की एक खुरदरी गंध आ रही थी। ऊपर एक सफेद ट्यूबलाइट लगी थी, जिसकी तेज़, निर्दयी रोशनी में सब कुछ बिल्कुल साफ दिख रहा था।
मम्मी दर्द के मारे लगभग हांफती हुई उस बेड के किनारे बैठ गईं। वह लगातार सिसक रही थीं।
तभी उस हरे परदे को हटाकर डॉ. विक्रम केबिन के अंदर दाखिल हुआ। उसके चेहरे पर अब एक गंभीर, पेशेवर डॉक्टर का मुखौटा था, लेकिन उसकी नज़रों में छिपी उस ललचाई हुई, गंदी ललक को सिर्फ मैं देख पा रहा था।
मैं केबिन के एक कोने में, ट्यूबलाइट के साये में चुपचाप खड़ा हो गया। मेरी हथेलियाँ ठंडे पसीने से तर-बतर हो चुकी थीं और मेरे पैर ज़मीन से जैसे जम गए थे। वह पल... वह खौफनाक और मेरा सबसे पसंदीदा वर्जित पल बस अब शुरू होने ही वाला था। मैंने अपनी रक्षक वाली ढाल पूरी तरह गिरा दी थी, और अब मैं सिर्फ एक मूक दर्शक, एक 'ककल्ड' था, जो अपनी नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली मम्मी के गुरूर को टुकड़े-टुकड़े होते देखने के लिए बेताब था।
केबिन के अंदर उस तेज़ सफेद ट्यूबलाइट की रोशनी आँखों में चुभ रही थी। काली रेक्सीन वाले बेड पर लेटी मेरी मम्मी, अनीता, दर्द से दोहरी हो रही थीं। उनके माथे पर पसीने की परत चमक रही थी और उनकी भारी, उथली साँसों के साथ उनके होठों से हल्की कराह निकल रही थी। हवा में अब उनकी चन्दन की महक पूरी तरह से स्पिरिट और पसीने की गंध में दब चुकी थी।
डॉ. विक्रम उनके दाहिनी ओर खड़ा हुआ। उसने अपनी जेब से एक छोटा टॉर्च निकाला, अपनी मेज से स्टेथोस्कोप उठाकर कानों में फंसाया और चेहरे पर एक सख्त, अधिकारपूर्ण मेडिकल रवैया ओढ़ लिया—वह रवैया जिसके आगे बड़े-बड़े लोगों का गुरूर टूट जाता है।
"रिलैक्स... सीधे लेट जाइए," विक्रम ने एक सर्द और बनावटी पेशेवराना आवाज़ में कहा।
मम्मी ने अपनी दर्द भरी ऐंठन से लड़ते हुए खुद को सीधा किया। बेड की पुरानी रेक्सीन से 'चर्रर्र...' की एक कर्कश आवाज़ गूंजी।
विक्रम ने अपना कदम थोड़ा और करीब बढ़ाया। अब वह बिल्कुल मम्मी के ऊपर झुका हुआ था। "मैडम, मुझे आपका पेट गहराई से चेक करना होगा। दर्द कहाँ से उठ रहा है, यह बिना छुए पता नहीं चलेगा। अपनी साड़ी का पल्लू हटा लीजिए और कपड़ों को थोड़ा ऊपर कर लीजिए।"
वह वाक्य उस छोटे से केबिन में किसी बम की तरह गिरा।
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Do not mention / post any under age /rape content. If found Please use REPORT button.
#2
hope you guys will love this story too
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#3
(21-08-2026, 11:01 AM)ripsin183 Wrote: hope you guys will love this story too

Your stories are awesome
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#4
It's amazing update soon
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#5
Update please
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#6
good start
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#7
Bqhut khub esa beta Sav ko mile taki koi mummy pyasi naa rahe
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#8
वह वाक्य उस छोटे से केबिन में किसी बम की तरह गिरा।
मैंने कोने में खड़े-खड़े अपनी साँस रोक ली। मेरे कानों में सिर्फ छत वाले पंखे की 'खट-खट' और मेरे दिल की जंगली धड़कनें सुनाई दे रही थीं। जो औरत घर में अपनी गर्दन तक का हिस्सा किसी को नहीं दिखने देती थी, जिसका पल्लू लोहे की सेफ्टी पिन से हमेशा सीने पर जड़ा रहता था, उसे आज एक अजनबी मर्द के सामने अपना शरीर खोलने का हुक्म दिया गया था।
मम्मी की आँखों में अचानक दर्द से भी बड़ी एक तिलमिलाहट और खौफ की लहर दौड़ गई। उनकी वह सती-सावित्री और अभेद्य छवि इस हुक्म के आगे बगावत कर रही थी। उन्होंने कांपते हुए, पसीने से भीगे अपने दोनों हाथों को कसकर अपनी छाती और गले पर रखे उस पल्लू पर जमा लिया। उनकी आँखें मुझे ढूँढ रही थीं—अपने रक्षक को, अपने बेटे को।
लेकिन मैं... मैं उस ट्यूबलाइट के साये में एक पत्थर की मूर्ति की तरह खड़ा रहा। मैंने जानबूझकर अपनी नज़रें नीची कर लीं। मेरी खामोशी ने मेरी मम्मी को निहत्था कर दिया था।
जब मम्मी को अपनी रूढ़िवादी ढाल बचाने का कोई रास्ता नहीं दिखा और दर्द की एक नई भयंकर लहर ने उनके पेट में सूजे चुभाए, तो उनका वह तानाशाह गुरूर घुटने टेकने पर मजबूर हो गया।
उनके कांपते हुए हाथों की उंगलियां उस बड़ी सी स्टील की सेफ्टी पिन तक गईं। पूरे केबिन के सन्नाटे में... 'क्लिक'... वह पिन खुलने की हल्की सी धात्विक आवाज़ गूंजी। मेरे लिए वह आवाज़ दुनिया के सबसे बड़े किले के दरवाज़े टूटने जैसी थी।
उन्होंने झिझकते हुए, बंद आँखों के साथ, भारी मन से उस कड़क कलफ लगे पल्लू को किनारे सरकाया। फिर अपनी उँगलियों से अपनी साड़ी और पेटीकोट के नाड़े वाले हिस्से को हल्का सा नीचे की तरफ खिसकाया।
ट्यूबलाइट की तेज़, निर्दयी रोशनी में उनका गोरा, बिल्कुल बेदाग और दूधिया पेट अचानक पूरी तरह से नंगा हो गया। उनके उस सख्त, रूढ़िवादी लिबास के नीचे छिपकर रहने वाला वह अछूता हिस्सा अब उस केबिन की हवा में बेबस होकर कांप रहा था। साँस लेने के साथ उनका वह नरम, गोरा पेट ऊपर-नीचे हो रहा था।
मैंने विक्रम की तरफ देखा। उसकी नज़रें बीमारी या इलाज पर नहीं थीं। उसकी आँखों की पुतलियाँ चौड़ी हो गई थीं और उसकी गिद्ध जैसी नज़रों में हवस का एक गाढ़ा, चिपचिपा सा अंधकार छा गया था। उसने धीरे से अपना सूखा थूक गटका। उसकी साँसें अचानक तेज़ और भारी हो गई थीं। एक 39 साल की बेहद खूबसूरत, और खुद को हमेशा ढक कर रखने वाली औरत का यह अनावृत रूप उसके लिए किसी दावत से कम नहीं था।
फिर... विक्रम ने अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया।
जैसे ही उसकी लंबी, खुरदरी और ठंडी उँगलियों ने मम्मी के उस दूधिया, गर्म पेट को छुआ... मम्मी के पूरे शरीर में करंट सी एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें भींच लीं और उनके होंठ कस गए।
विक्रम ने अपने हाथ को उनके पेट के अलग-अलग हिस्सों पर दबाना शुरू किया। तकनीकी रूप से वह लीवर और आंतों की सूजन चेक कर रहा था, लेकिन उसके स्पर्श का तरीका बिल्कुल भी पेशेवर नहीं था। उसकी उँगलियाँ ज़रूरत से ज़्यादा धीरे, ज़रूरत से ज़्यादा गहराई तक और ज़रूरत से ज़्यादा देर तक मम्मी के उस नरम गोरे पेट पर रगड़ खा रही थीं।
उसने अपना स्टेथोस्कोप का ठंडा धात्विक सिरा मम्मी की नाभि के ठीक ऊपर रखा। उसकी नज़रें मम्मी के चेहरे पर नहीं थीं, वे किसी भूखे जानवर की तरह लगातार उनके उस खुले हुए पेट पर चिपकी हुई थीं। वह अपनी नज़रों से उन्हें चाट रहा था, उनके उस पवित्र गुरूर को अपनी हवस भरी आँखों तले कुचल रहा था।
और मैं?
मैं उस केबिन के अंधेरे कोने में अपनी पसीने से चिपचिपी मुट्ठियों को भींचे खड़ा था। एक बेटे के तौर पर मुझे उस डॉक्टर का गला पकड़ लेना चाहिए था, लेकिन इसके उलट... मेरी रगों में एक ज़हरीली, डरावनी और वर्जित उत्तेजना का लावा उबल रहा था।
मेरी अपनी तानाशाह मम्मी, जिनकी कड़क आवाज़ से पूरा घर थरथराता था, आज मेरे ही सामने एक झोलेछाप हवसी डॉक्टर के गंदे हाथों और भूखी नज़रों के नीचे एक बेबस, लाचार शिकार बनी पड़ी थीं। मैं अपनी इसी मनोवैज्ञानिक बगावत, इसी 'ककल्ड' जीत को महसूस कर रहा था, जो शर्मनाक होने के बावजूद मुझे एक अजीब सी, घुटन भरी विकृत संतुष्टि दे रही थी। वह दीवार टूट चुकी थी, और मैं उस मलबे के सामने खड़ा अपना तमाशा देख रहा था।
केबिन की उस घुटन भरी हवा में समय जैसे जम सा गया था। डॉ. विक्रम की उंगलियाँ मम्मी के गोरे, पसीने से चमकते हुए पेट पर अब एक क्रूर और धीमी लय में घूम रही थीं। उसकी आँखों की वह चिपचिपी, भूखी चमक उस तेज़ सफेद ट्यूबलाइट में और भी भयानक लग रही थी।
"यहाँ दर्द है?" विक्रम ने अपनी आवाज़ को भारी और अधिकारपूर्ण बनाते हुए पूछा। उसने अपने अँगूठे और उँगलियों से मम्मी की नाभि के ठीक नीचे, पेटीकोट के नाड़े के ठीक किनारे वाले हिस्से को गहराई से दबाया।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई, सिसकती हुई कराह निकल गई— "आह्ह... ह..हाँ।"
यह कराह सिर्फ उस शारीरिक दर्द की नहीं थी। यह उस असहज, अवांछित स्पर्श की चुभन थी। डॉ. विक्रम की उँगलियाँ ज़रूरत से ज़्यादा नीचे, उनकी साड़ी की सरहद तक पहुँच गई थीं। मम्मी का पूरा शरीर एक कमान की तरह तन गया था। उन्होंने अपने होठों को इतने ज़ोर से भींच लिया था कि उनका रंग सफेद पड़ गया था। उनके हाथ, जो अब तक अपने पल्लू को बचाने की कोशिश कर रहे थे, अब हार मानकर उस काली, खुरदरी रेक्सीन को खरोंच रहे थे।
विक्रम ने उस मेडिकल अधिकार का पूरा फायदा उठाया, जिसके आगे इंसान पूरी तरह निहत्था हो जाता है। उसने अपना दूसरा हाथ भी उनके पेट पर रख दिया। अब उसके दोनों खुरदरे, बड़े हाथ मम्मी के उस नाज़ुक, अछूते जिस्म को टटोल रहे थे। वह कभी दाईं तरफ दबाता, कभी बाईं तरफ, लेकिन हर बार उसके हाथ वापस नाभि के आस-पास आकर कुछ पलों के लिए रुक जाते। उसकी उँगलियों की पोरें मम्मी की त्वचा पर सिर्फ दबाव नहीं डाल रही थीं, बल्कि उसे सहला रही थीं।
उस छोटे से केबिन में सिर्फ तीन आवाज़ें गूँज रही थीं—छत के पंखे की 'चर्र-चर्र', मम्मी की उथली, कांपती हुई साँसों की 'हश-हश', और डॉ. विक्रम की भारी, उत्तेजित साँसें जो बिल्कुल मम्मी के चेहरे के करीब से आ रही थीं।
उसने अपना स्टेथोस्कोप फिर से लगाया। इस बार उसने स्टेथोस्कोप का ठंडा हिस्सा मम्मी के पेट के ऊपरी हिस्से, पसलियों के ठीक नीचे रखा। ऐसा करने के लिए उसे अपना पूरा शरीर मम्मी के ऊपर झुकाना पड़ा। विक्रम का चेहरा अब मम्मी के सीने और खुले पेट के बिल्कुल करीब था। मैं विक्रम के बालों से आती उस सस्ते, चमेली के तेल की तेज़ गंध को उस कोने तक महसूस कर सकता था।
मम्मी ने अपनी आँखें पूरी तरह से कसकर बंद कर ली थीं। उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ, दीवार की ओर मोड़ लिया था। वह इस सच्चाई का सामना ही नहीं करना चाहती थीं कि उनके साथ क्या हो रहा है। वह औरत, जिसकी एक घूरती हुई नज़र से घर में मेरे पिताजी की भी आवाज़ कांपने लगती थी, आज अपनी आँखें चुरा रही थी। वह इस गंदे, पसीने और स्पिरिट की बदबू वाले केबिन में एक झोलेछाप की हवस भरी नज़रों के नीचे अपनी उस अभेद्य, 'सती-सावित्री' छवि को टुकड़े-टुकड़े होते हुए चुपचाप सह रही थी।
उस अंधेरे कोने में खड़े होकर, मेरी साँसें मेरे गले में अटक गई थीं। मेरी आँखों के सामने मेरी ही रची हुई यह साज़िश अपने चरम पर थी।
विक्रम ने कुछ और सेकंड्स तक स्टेथोस्कोप को उनके पेट पर घुमाया। उसकी आँखें लगातार उनके शरीर के उस खुले हुए हिस्से का नज़ारा ले रही थीं, जैसे वह अपनी नज़रों से ही उस हिस्से को खा जाना चाहता हो। फिर, बहुत धीरे से, लगभग एक अनिच्छा के साथ, उसने अपना हाथ वहाँ से हटाया।
"हम्म..." विक्रम ने एक गहरी, संतुष्ट साँस छोड़ते हुए अपना स्टेथोस्कोप वापस गले में लटका लिया। उसने एक कदम पीछे लिया और मम्मी के शरीर से अपनी वह चिपचिपी नज़र हटाकर मेरी तरफ देखा। "आंतों में काफी तेज़ ऐंठन है और थोड़ा इन्फेक्शन भी लग रहा है। घबराने की बात नहीं है।"
जैसे ही विक्रम ने अपना हाथ हटाया, मम्मी ने बिना एक सेकंड की देरी किए, लगभग कांपते हुए हाथों से अपनी साड़ी का पल्लू खींचा और अपने पेट को तुरंत ढक लिया। उन्होंने उसे इतनी ज़ोर से पकड़ा, जैसे कोई डूबता हुआ इंसान किसी लकड़ी को पकड़ता है। उनके चेहरे पर अभी भी वह अपमान और बेबसी की कालिख पुती हुई थी, जिसे उन्होंने दर्द की आड़ में छुपाने की नाकाम कोशिश की थी।
मैं अभी भी अपनी जगह पर बुत बना खड़ा था। एक अजीब सा, स्याह सन्नाटा मेरे अंदर पसर गया था। विक्रम ने बिना छुए, सिर्फ अपनी मेडिकल हैसियत और भूखी नज़रों से मेरी मम्मी के गुरूर को कुचल दिया था। और मैं, उनका बेटा, उनका रक्षक, इस पूरी प्रक्रिया में विक्रम का मूक सहयोगी बन गया था।
उस क्षण, अपनी मम्मी को वापस अपने कपड़े ठीक करते और दर्द से कराहते हुए देखकर, मुझे अपने अंदर एक बहुत गहरी, डरावनी और हीन भावना महसूस हुई। मैं अब सिर्फ एक बेटा नहीं रह गया था, मैं पूरी तरह से उस 'ककल्ड' मानसिकता का हिस्सा बन चुका था—एक कमज़ोर दर्शक, जिसने अपने ही घर की तानाशाह को किसी और के सामने घुटने टेकते देखने के लिए, अपनी नैतिकता और ज़मीर का हमेशा के लिए कत्ल कर दिया था।
अगले दिन की सुबह बिल्कुल वैसी ही शुरू हुई, जैसी मेरे घर में हमेशा से होती आई थी।
सूरज की किरणें घर के आंगन में पड़ने से पहले ही, रसोई से प्रेशर कुकर की तेज़ सीटी और बर्तनों के खटकने की जानी-पहचानी आवाज़ें गूँजने लगी थीं। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ सुन रहा था। तभी मुझे कदमों की वही भारी, नपी-तुली 'खट-खट' सुनाई दी।
मैं धीरे से उठकर कमरे के दरवाज़े पर आया। मैंने देखा, मम्मी आंगन में खड़ी थीं। उनके शरीर पर वही सूती साड़ी थी, जिस पर कलफ इतनी कड़क थी कि हवा भी शायद उससे टकराकर मुड़ जाती। पल्लू उनके गले तक बिल्कुल उसी लोहे की सेफ्टी पिन से निर्दयता से कसा हुआ था। उनके चेहरे का रंग फिर से दमक रहा था और उनकी आँखों में वही बर्फ जैसी चुभने वाली सख्ती वापस लौट आई थी।
पिताजी चुपचाप सिर झुकाए चाय पी रहे थे।
"दवा खा ली तुमने, अनीता?" पिताजी ने डरते-डरते पूछा।
"हाँ... खा ली। तुम चाय पीकर जल्दी दफ्तर निकलो, फालतू के सवाल मत करो," मम्मी ने एक कड़क, अधिकारपूर्ण आवाज़ में कहा, जो पूरे घर के सन्नाटे को चीर गई।
वह वापस उसी अजेय, सती-सावित्री और तानाशाह वाले खोल में लौट आई थीं। बाहर से देखने पर वह फिर से वही औरत थीं, जिसके गुरूर को कोई छू तक नहीं सकता था। कोई नहीं कह सकता था कि कल दोपहर यही औरत एक छोटे से क्लिनिक की काली रेक्सीन वाली बेड पर, दर्द और बेबसी के मारे सिसक रही थी।
लेकिन मैं... मैं उस कमरे के दरवाज़े पर खड़ा, उन्हें देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था।
पहले, उनकी इस कड़क आवाज़ और सख्त रवैये से मेरे सीने में घुटन होती थी, मुझे गुस्सा आता था। लेकिन आज, उनकी यह आवाज़ मेरे कानों में एक हारी हुई धुन की तरह बज रही थी। मैं उनके चेहरे को देख रहा था, लेकिन मेरी आँखों के सामने वह दृश्य आ रहा था जब उन्होंने कांपते हुए हाथों से इसी साड़ी के पल्लू को खोला था। मैं उनके उस ढके हुए सीने और गले को देख रहा था, लेकिन मेरे दिमाग में डॉ. विक्रम के वे हवस भरे, खुरदरे हाथ उनके गोरे, अनावृत पेट को टटोल रहे थे।
उनकी यह सख्ती अब मुझे डराती नहीं थी; बल्कि यह मुझे उस गहरे, डार्क राज़ की याद दिलाती थी, जो सिर्फ मुझे पता था। मैं उनकी इस झूठी नैतिकता और ढोंग के पीछे की बेबसी का चश्मदीद गवाह था।
दवाइयों से मम्मी का पेट दर्द काफी हद तक ठीक हो गया था, लेकिन तीन दिन बाद वह दर्द फिर से एक हल्की चुभन बनकर लौट आया। शाम का समय था और मैं कॉलेज से वापस आ चुका था।
मम्मी अपने कमरे में बिस्तर के किनारे बैठी थीं और उनके चेहरे पर एक हल्की सी सिकुड़न थी। उन्होंने अपना हाथ अपने पेट के बाईं ओर रखा हुआ था।
"क्या हुआ मम्मी? दर्द फिर से उठ रहा है क्या?" मैंने पास जाकर पूछा। मेरी आवाज़ में वही बनावटी चिंता थी, जो अब मेरा सबसे बड़ा हथियार बन चुकी थी।
उन्होंने एक गहरी साँस ली और अपना चेहरा थोड़ा घुमाते हुए बोलीं, "पता नहीं... थोड़ी सी चुभन है। शायद गैस होगी। मैं अजवायन खा लूंगी।"
उनकी आवाज़ में दर्द से ज़्यादा एक खौफ था—डॉ. विक्रम के पास वापस जाने का खौफ। वह उस सीलन भरे क्लिनिक, उस काली रेक्सीन वाले बेड और विक्रम के उस असहज करने वाले स्पर्श को दोबारा नहीं झेलना चाहती थीं। उन्होंने अपनी नैतिकता के गुरूर को एक बार दांव पर लगा दिया था, लेकिन वह दोबारा उस ज़हर को नहीं पीना चाहती थीं।
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#9
उन्होंने अपनी नैतिकता के गुरूर को एक बार दांव पर लगा दिया था, लेकिन वह दोबारा उस ज़हर को नहीं पीना चाहती थीं।
लेकिन मेरे अंदर का वह विकृत राक्षस इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। वह जो पहला तमाशा था, उसने मेरे अंदर की आग बुझाई नहीं थी, बल्कि उसे और भड़का दिया था।
"नहीं मम्मी!" मैंने तुरंत टोका। "डॉ. विक्रम ने कहा था कि अगर दर्द दोबारा उठे, तो तुरंत ले आना। इन्फेक्शन अगर आंतों में फैल गया, तो ऑपरेशन की नौबत आ सकती है!" मैंने उनकी रूढ़िवादी सोच पर डर का सबसे बड़ा हथौड़ा मारा।
'ऑपरेशन' शब्द सुनते ही मम्मी के चेहरे का रंग फीका पड़ गया।
"लेकिन... वह डॉक्टर... वह अजीब तरह से चेक करता है। मुझे अच्छा नहीं लगा। मैं कल बड़े अस्पताल चली जाऊंगी," उन्होंने दबी हुई, लगभग हारती हुई आवाज़ में अपना बचाव किया। उनके होंठ कांप रहे थे। यह पहली बार था जब मैंने अपनी तानाशाह मम्मी को मुझसे, अपने 19 साल के बेटे से, किसी चीज़ के लिए बचकर भागते या बहाना बनाते देखा था।
यह मेरा मनोवैज्ञानिक चरम था। मेरी मम्मी, जो घर का संविधान थी, आज अपनी रक्षा के लिए गिड़गिड़ाने के कगार पर थी।
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा—एक रक्षक का हाथ नहीं, बल्कि एक शिकारी का हाथ।
"मम्मी, वह डॉक्टर है। बीमारी पकड़ने के लिए पेट तो चेक करना ही पड़ेगा ना? तुम खामखां इतना सोच रही हो। मैं हूँ ना तुम्हारे साथ। उठो... चलो। रिस्क नहीं ले सकते," मैंने एक ऐसा कठोर आदेश दिया, जिसमें चिंता की मिठास घुली थी।
मम्मी ने एक पल के लिए मेरी आँखों में देखा। शायद वह मेरी आँखों में छिपी उस ज़हरीली साज़िश को पढ़ना चाहती थीं, लेकिन उन्हें वहाँ सिर्फ एक 'फिक्रमंद बेटे' का मुखौटा दिखा। दर्द के डर और मेरे दबाव के आगे वह टूट गईं।
उन्होंने गहरी साँस लेते हुए, हार मानकर सिर हिला दिया। वह उठीं और बिना कुछ बोले बाहर की तरफ चल दीं।
जब हम दोबारा उस धूल भरी सड़क से होते हुए डॉ. विक्रम के क्लिनिक की तरफ बढ़ रहे थे, तो मेरे पेट में उत्तेजना की वह जानी-पहचानी ऐंठन फिर से शुरू हो गई थी। मेरी हथेलियाँ फिर से पसीने से भीगने लगी थीं।
मम्मी आज पहले से भी ज़्यादा कसकर अपनी साड़ी में लिपटी थीं। उनका चलना पहले से भी धीमा था, जैसे वह फांसी के फंदे की तरफ जा रही हों।
और मैं?
मैं इस बार कोई सहमा हुआ, डरा हुआ लड़का नहीं था। मैं एक अनुभवी दर्शक था, जो अपना पसंदीदा खेल दोबारा देखने जा रहा था। मैं फिर से अपनी उस अजेय मम्मी को विक्रम की उन गिद्ध जैसी नज़रों और खुरदरे हाथों के हवाले करने जा रहा था, और इस बार... मुझे पता था कि मैं इसका एक-एक सेकंड, एक-एक एहसास पूरी तरह जियूँगा।
हम क्लिनिक के उस धुंधले कांच के दरवाज़े के पास पहुँचे, और अंदर से वही स्पिरिट और फिनायल की सीलन भरी ठंडक बाहर आई। मेरा खेल फिर से शुरू होने वाला था।
कांच के भारी दरवाज़े को धकेलते ही ऊपर लगी छोटी सी घंटी ने 'टिंग' की आवाज़ की। हम अंदर दाखिल हुए। क्लिनिक में वही जानी-पहचानी एसी की सीलन, डिटॉल और पुरानी स्पिरिट की गंध का कॉकटेल हवा में तैर रहा था।
मेज के पीछे बैठा डॉ. विक्रम आज कोई किताब पढ़ रहा था। घंटी की आवाज़ सुनकर उसने अपना सिर उठाया। जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर और फिर मेरे सहारे खड़ी मेरी मम्मी पर पड़ी, उसके उबाऊ चेहरे पर एक पल के लिए चौंकने का भाव आया, जो तुरंत ही एक गहरी, शातिर और लगभग शिकारी जैसी मुस्कान में बदल गया। उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि यह नायाब और सख्त शिकार खुद चलकर उसके जाले में दोबारा वापस आ जाएगा।
"अरे... आइए, आइए मैडम," विक्रम ने अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा। इस बार उसकी आवाज़ में हमदर्दी कम और एक अजीब सी आतुरता ज़्यादा थी।
मम्मी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपनी आँखें नीची कर लीं। उनका दायां हाथ कसकर उनकी छाती पर बंधे पल्लू को पकड़े हुए था, जैसे वह उस कपड़े से अपनी पूरी गरिमा को बांध कर रखना चाहती हों। उनकी उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे।
"क्या हुआ? दर्द दोबारा लौट आया क्या?" विक्रम ने मेज के पास आते हुए पूछा। उसकी नज़रें सीधे मम्मी के चेहरे पर थीं, मानो वह उनकी घबराहट और खौफ का मज़ा ले रहा हो।
"हाँ डॉक्टर, थोड़ा दर्द फिर से उठ रहा है। हमने सोचा कोई रिस्क ना लें," मैंने एक आज्ञाकारी बेटे का पर्दा ओढ़ते हुए तुरंत जवाब दिया।
विक्रम ने मेरी तरफ सिर्फ एक सेकंड देखा और फिर अपनी नज़रें वापस मम्मी के कसकर बंधे हुए लिबास पर गाड़ दीं। "बहुत अच्छा किया। इन्फेक्शन को हल्के में नहीं लेना चाहिए। ले जाइए इन्हें अंदर... उसी चेकअप केबिन में।" उसने उसी गंदे, फीके पड़ चुके हरे परदे की तरफ इशारा किया।
जैसे ही हम उस हरे परदे के पीछे घुसे, उस छोटे से केबिन की सफेद, निर्दयी ट्यूबलाइट की रोशनी ने हमें घेर लिया। वही काली रेक्सीन वाला बेड, वही दमघोंटू हवा।
मम्मी कांप रही थीं। यह दर्द की वजह से कम और उस आने वाले अपमान के खौफ की वजह से ज़्यादा था। वह बेड के किनारे पर बैठीं, लेकिन इस बार उनका शरीर एकदम अकड़ा हुआ था। उन्होंने मुझे देखा। उनकी उन सख्त आँखों में, जिनसे कभी मेरे पिताजी भी कांपते थे, आज एक मूक विनती थी। वह जैसे मुझसे कह रही थीं कि 'मुझे यहाँ से ले चलो।'
लेकिन मैंने जानबूझकर अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया और केबिन के उसी पुराने अंधेरे कोने में जाकर खड़ा हो गया। मैंने अपना फैसला सुना दिया था—मैं उन्हें नहीं बचाऊंगा।
हरे परदे के सरकने की 'सर्रर्र' आवाज़ हुई और विक्रम अंदर दाखिल हुआ। उसके गले में स्टेथोस्कोप लटक रहा था और उसके चेहरे पर अब एक ऐसा आत्मविश्वास था, जो पिछली बार से कहीं ज़्यादा खतरनाक था। उसे समझ आ गया था कि यह सख्त दिखने वाली औरत उसकी उस छोटी सी मेडिकल दुनिया में पूरी तरह बेबस है।
"लेट जाइए," विक्रम ने एक सर्द, हुक्म देने वाली आवाज़ में कहा।
मम्मी ने एक गहरी, कांपती हुई साँस ली और बेड पर लेट गईं।
विक्रम बेड के करीब आया। वह बिल्कुल मम्मी के ऊपर खड़ा था। इस बार उसने कोई भूमिका नहीं बांधी, कोई नज़ाकत नहीं दिखाई।
"साड़ी का पल्लू और कपड़े हटाइए। पूरा पेट चेक करना होगा कि सूजन कहाँ तक फैली है," उसने आदेश दिया।
मम्मी के पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी पलकें झपकाईं और अपनी कांपती आवाज़ में विरोध करने की एक आखिरी, कमज़ोर कोशिश की— "द...दर्द सिर्फ ऊपर की तरफ है। नीचे... नीचे ठीक है।"
उनका यह बोलना, वह भी एक मामूली डॉक्टर के सामने गिड़गिड़ाने के लहज़े में, मेरे लिए किसी अफीम के नशे जैसा था। मेरे दिल की धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गईं। मेरी हथेलियाँ पसीने से भीगने लगीं।
विक्रम की आँखों में एक क्रूर चमक आ गई। "मैडम, आप डॉक्टर हैं या मैं? इन्फेक्शन नीचे आंतों तक फैल सकता है। पूरा पेट चेक किए बिना मैं कैसे दवा दे दूँगा? कपड़े ऊपर कीजिए।" उसका स्वर इतना तीखा और पेशेवर था कि उसमें बहस की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।
मम्मी ने हार मान ली।
उस छोटे से केबिन के सन्नाटे में एक बार फिर से उस बड़ी स्टील की सेफ्टी पिन के खुलने की 'क्लिक' आवाज़ गूंजी। वह आवाज़ मेरे लिए दुनिया का सबसे बेहतरीन संगीत थी।
मम्मी के कांपते हुए, पसीने से भीगे हाथों ने भारी मन से कलफ लगे पल्लू को सीने से हटाया और अपनी सूती साड़ी को हल्का सा नीचे खिसका दिया। ट्यूबलाइट की चकाचौंध रोशनी में, उनका वह गोरा, बेदाग और भरा हुआ दूधिया पेट एक बार फिर से उस अजनबी की हवस भरी नज़रों के लिए बेपर्दा हो गया।
जैसे ही मम्मी का पेट नंगा हुआ, मैंने देखा कि विक्रम की साँसें अचानक भारी हो गईं। उसके नथुने फूल गए। उसकी नज़रें बीमारी को नहीं ढूँढ रही थीं; वे किसी गिद्ध की तरह मम्मी के उस गोरे जिस्म पर टूट पड़ी थीं।
उसने बिना कोई और बात किए, अपने दोनों बड़े, खुरदरे और ठंडे हाथ मम्मी के उस नरम, गर्म पेट पर रख दिए।
मम्मी के मुँह से दर्द और अपमान की एक घुटी हुई सिसकी निकल गई। उन्होंने अपनी आँखें इतनी ज़ोर से भींच लीं कि उनके माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उन्होंने अपना सिर दूसरी तरफ मोड़ लिया। वह अपनी ही बेबसी का यह तमाशा नहीं देखना चाहती थीं।
विक्रम की उंगलियाँ इस बार पिछली बार से ज़्यादा बेखौफ थीं। वह अपने अँगूठे से नाभि के आस-पास दबाव डाल रहा था। उसकी हथेलियों की रगड़ मम्मी की त्वचा पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी। वह कभी पसलियों के नीचे दबाता, तो कभी अपनी उंगलियों को खिसका कर बिल्कुल पेटीकोट के नाड़े के पास ले आता। उसका हर स्पर्श धीमा, जानबूझकर किया गया और हवस में डूबा हुआ था।
कोने में खड़े होकर मेरी साँसें मेरे सीने में अटक रही थीं। मेरी आँखें फटी हुई थीं। मैं इस पूरे दृश्य का एक-एक कतरा अपने अंदर सोख रहा था।
मेरी मम्मी... घर की तानाशाह... जिस औरत ने मुझे कभी अपनी मर्ज़ी से सांस तक नहीं लेने दी... वह आज एक ऐसे आदमी के गंदे हाथों के नीचे कांप रही थी, जिसे वह देखना तक पसंद नहीं करती थी। विक्रम उनके जिस्म के उस हिस्से को सहला रहा था (चेकअप की आड़ में), जिसे किसी ने बरसों से नहीं देखा था।
विक्रम ने अपना सिर झुकाया। उसका चेहरा मम्मी के खुले हुए पेट और सीने के इतना करीब था कि मैं महसूस कर सकता था कि उसकी गर्म, भारी साँसें मम्मी की त्वचा से टकरा रही होंगी। उसने अपना स्टेथोस्कोप लगाया और उसे पेट के निचले हिस्से तक घुमाया। वह अपनी नज़रों से मम्मी के उस बेबस रूप को अपनी यादों में कैद कर रहा था, और मैं अपनी नज़रों से उसके इस अधिकार को सेलिब्रेट कर रहा था।
"दर्द यहाँ है?" विक्रम ने फुसफुसाते हुए पूछा, जबकि उसका अंगूठा मम्मी के पेट पर गहराई से धंसा हुआ था।
मम्मी बस "हम्म..." में एक कमज़ोर सी आवाज़ निकाल पाईं। उनका सारा अहंकार, उनकी वह 'छू-कर-तो-दिखाओ' वाली छवि, आज इस चेकअप बेड पर राख हो चुकी थी।
मुझे अचानक अपने अंदर एक डरावनी सच्चाई का एहसास हुआ। मैं इस बेबसी को देखकर दुखी नहीं था। मैं खुश था। मैं एक 'ककल्ड' मानसिकता के इतने गहरे कुएं में गिर चुका था कि मुझे अपनी ही मम्मी के इस चरम अपमान, उनके इस पतन में एक अजीब, वर्जित और गंदी यौन उत्तेजना महसूस हो रही थी। मेरी खामोश बगावत जीत चुकी थी, और इस जीत का नशा मेरे रग-रग में किसी मीठे ज़हर की तरह दौड़ रहा था।
केबिन के अंदर हवा जैसे किसी भारी पत्थर की तरह जम गई थी। छत के पंखे की 'चर्र-चर्र' आवाज़ अब मुझे दूर से आती हुई किसी धुन की तरह लग रही थी। मेरी पूरी चेतना सिर्फ उस बेड पर केंद्रित थी, जहाँ एक भयानक और वर्जित खेल चल रहा था।
डॉ. विक्रम के दोनों हाथ अभी भी मम्मी के गोरे, पसीने से भीगे हुए पेट पर टिके हुए थे। उसकी खुरदरी उँगलियों का धीमा, लगभग सहलाता हुआ दबाव मम्मी की नाभि के आस-पास घूम रहा था। मम्मी का चेहरा दीवार की तरफ मुड़ा हुआ था, आँखें कसकर बंद थीं और होठों को इतने ज़ोर से भींच रखा था कि वे सफेद पड़ गए थे। उनकी उथली, कांपती हुई साँसों से उनका नंगा पेट ऊपर-नीचे हो रहा था, जो विक्रम की आँखों में हवस की आग को और भड़का रहा था।
तभी, विक्रम ने कुछ ऐसा किया जिसने मेरे दिमाग के सारे तार झकझोर कर रख दिए।
उसने "पेट की आवाजें" सुनने का बहाना बनाते हुए अपना सिर नीचे किया। वह स्टेथोस्कोप के बिना, सीधे अपने कान को मम्मी के पेट के करीब ले गया। उसका चेहरा मम्मी के उस खुले हुए, दूधिया पेट से महज़ कुछ इंच की दूरी पर था।
उस छोटे से, शांत केबिन में मैंने साफ सुना... 'शशश... हह्ह...'।
विक्रम ने जानबूझकर एक गहरी साँस छोड़ी। उसकी वह भारी, गर्म और हवस से भरी साँस सीधा मम्मी के उस नरम, पसीने से चमकते हुए नंगे पेट की त्वचा से जाकर टकराई।
उस साँस की गर्मी का अहसास होते ही मम्मी के पूरे शरीर में बिजली के झटके जैसी एक भयानक सिहरन दौड़ गई। उनका पेट अचानक अंदर की तरफ सिकुड़ गया। उनका मुड़ा हुआ चेहरा और ज़्यादा तकिए में धंस गया, और उनके गले से एक बेहद घबराई हुई, दबी हुई सी घुटन भरी आवाज़ निकली— "डॉक्टर..."
यह शब्द किसी अधिकार या गुस्से से नहीं निकला था; यह एक बेबस, निहत्थी औरत की कांपती हुई सिसकी थी। उनकी वह 'छू-कर-तो-दिखाओ' वाली, लोहे सी सख्त छवि आज एक झोलेछाप डॉक्टर की गर्म साँसों के आगे मोम की तरह पिघल कर बह रही थी।
विक्रम ने उनकी उस कमज़ोर आवाज़ को पूरी तरह अनसुना कर दिया। उसने अपना चेहरा वहीं टिकाए रखा। उसकी नाक लगभग मम्मी की त्वचा को छू रही थी। वह अपनी गिद्ध जैसी आँखों को आधा बंद किए हुए था, जैसे वह मम्मी के उस पवित्र, रूढ़िवादी जिस्म से आती हुई पसीने, कड़क साबुन और चन्दन की उस मिली-जुली महक को अपनी रगों में उतार रहा हो। वह सिर्फ बीमारी नहीं टटोल रहा था; वह अपने अधिकार, अपनी हवस की मुहर मेरी मम्मी के जिस्म पर लगा रहा था।
मैं अंधेरे कोने में खड़ा था। मेरी मुट्ठियाँ इतनी ज़ोर से भिंची हुई थीं कि मेरे नाखूनों ने मेरी हथेलियों में गहरे लाल निशान छोड़ दिए थे।
एक सामान्य, संस्कारी बेटे को इस दृश्य को देखकर पागल हो जाना चाहिए था। उसे विक्रम के उस तेल लगे बालों वाले कॉलर को पकड़कर उसे दीवार में दे मारना चाहिए था। "तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी मम्मी के पेट पर अपनी गंदी साँसें छोड़ने की!"—यह चिल्लाहट मेरे गले से निकलनी चाहिए थी।
लेकिन मेरे होंठ आपस में सिले हुए थे।
मेरे पैरों में जैसे भारी सीसा भर गया था। मैं हिलना भी नहीं चाहता था। मेरी साँसें तेज़ और भारी हो गई थीं। मेरी आँखों की पुतलियाँ फैली हुई थीं। एक भयानक, डार्क और चिपचिपी सी उत्तेजना मेरे पेट के निचले हिस्से में कुंडली मार रही थी।
मेरी तानाशाह मम्मी, जो हर सुबह कलफ लगी साड़ी पहनकर मुझे और मेरे पिता को अपनी एक घूरती हुई नज़र से डरा देती थी, जिसके सामने घर का कोई इंसान ऊँची आवाज़ में बात नहीं कर सकता था, आज वह इस घुटन भरे केबिन में विक्रम की गर्म साँसों के नीचे थरथरा रही थी। वह अपने पल्लू को खोलने पर मजबूर थी। वह एक अनजान, हवसी मर्द की नज़रों और साँसों से लुट रही थी, और उसे बचाने वाला कोई नहीं था।
और सबसे भयानक बात? मैंने खुद इस स्थिति को जन्म दिया था।
यह कोई इत्तेफाक नहीं था; यह मेरे अंदर पल रही उस 'ककल्ड' फैंटेसी का मास्टरपीस था। मैं एक रक्षक की जगह से हटकर पूरी तरह से एक विकृत दर्शक बन चुका था। मुझे इस बात में एक गंदी, डरावनी और अजीब सी चरम संतुष्टि मिल रही थी कि मेरी मम्मी, अपनी सारी नैतिकता और सती-सावित्री वाली ढाल के बावजूद, विक्रम के सामने बस एक 'शिकार', एक आम औरत बनकर रह गई थीं।
कुछ बहुत लंबे, अनगिनत पलों के बाद, विक्रम ने धीरे से अपना सिर ऊपर उठाया। उसने अपनी आँखों में छिपी उस ललचाई चमक को वापस पेशेवर मुखौटे के पीछे धकेला।
"आंतों में ऐंठन काफी गहरी है," विक्रम ने एक सर्द, लगभग फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा, जबकि उसका हाथ अभी भी मम्मी के पेट पर टिका था। "मुझे एक इंजेक्शन सीधा पेट की नसों के पास देना होगा, ताकि तुरंत आराम मिले।"
'पेट पर इंजेक्शन'—यह सुनते ही मम्मी ने झटके से अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में अब सिर्फ दर्द नहीं था, बल्कि एक गहरा, शुद्ध आतंक था।
लेकिन मैं जानता था... और विक्रम भी जानता था... कि अब वह विरोध नहीं कर पाएंगी। उनका गुरूर टूट चुका था, और मेरा डार्क खेल अब अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया था।
'पेट पर इंजेक्शन' सुनते ही मम्मी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"न...नहीं..." उनकी आवाज़ में अब कड़कपन का एक कतरा भी बाकी नहीं था। वह गिड़गिड़ा रही थीं। "हाथ पर लगा दीजिए... पिछली बार की तरह... हाथ पर।"
उनका कांपता हुआ दायां हाथ, जो अभी तक बेबसी से बेड की रेक्सीन खुरच रहा था, झटके से उठा और उन्होंने अपनी साड़ी को अपने नंगे, पसीने से भीगे हुए पेट पर खींचने की कोशिश की। वह उस असहज और गंदे माहौल से किसी भी कीमत पर खुद को ढँक लेना चाहती थीं।
लेकिन विक्रम का हाथ बिजली की तरह तेज़ी से आगे बढ़ा। उसने मम्मी की कांपती हुई कलाई को बीच में ही कसकर पकड़ लिया।
वह पकड़ महज़ एक डॉक्टर की नहीं थी; वह एक अधिकार जमाने वाले, ताकतवर मर्द की पकड़ थी, जिसने यह दिखा दिया कि इस छोटे से केबिन के अंदर सत्ता किसके पास है।
"मैडम..." विक्रम ने उनकी कलाई को अपनी खुरदरी उँगलियों से कसते हुए एक धीमी, फुफकारती हुई आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में अब वह शिकारी वाली चमक बिल्कुल साफ थी। "सूजन आंतों के निचले हिस्से में है। बांह पर दिया गया इंजेक्शन असर करने में घंटों लगा देगा। मैं जो कह रहा हूँ, वह आपके भले के लिए है। कपड़े मत खींचिए।"
विक्रम ने बहुत आराम से, लेकिन एक क्रूर ताकत के साथ, मम्मी का हाथ वापस बेड पर टिका दिया। मम्मी की आँखें एक बार फिर मेरी तरफ उठीं। उनकी उन खूबसूरत आँखों में आंसू तैरने लगे थे। वह मुझसे कह रही थीं, "नवीन... मुझे बचा लो।"
पर मैंने क्या किया?
मैंने अंधेरे कोने में खड़े होकर, सिर्फ धीरे से अपना सिर हिला दिया। मेरी आँखों में एक 'मजबूर' बेटे का भाव था, जो कह रहा था—"मम्मी, डॉक्टर सही कह रहे हैं, इलाज तो करवाना पड़ेगा।"
मेरी इस खामोश सहमति ने मम्मी की आखिरी उम्मीद को भी कुचल दिया। वह अंदर से टूटकर बिखर गईं। उन्होंने हार मानकर अपना चेहरा फिर से दीवार की तरफ मोड़ लिया और अपनी दोनों मुट्ठियों को भींच लिया। उनकी आँखें कसकर बंद हो गईं और उनके गाल पर एक अकेली, बेबस आंसू की बूंद छलक आई।
वह मेरी तानाशाह मम्मी, जो मेरी आज़ादी छीनकर खुद को भगवान समझती थी, आज मेरे ही सामने घुटने टेक चुकी थी।
विक्रम अपनी मेज की तरफ गया। उसने सीरिंज निकाली और उसमें एक सफेद रंग की दवा भरी। केबिन में सिर्फ उसकी साँसों और उस सुई के भरने की 'सुप-सुप' आवाज़ आ रही थी।
वह वापस मम्मी के पास आया। उसके हाथ में एक स्पिरिट लगा हुआ रुई का फाहा था।
"कपड़े थोड़े और नीचे खिसकाइए। इंजेक्शन नाभि के थोड़ा नीचे, साइड में लगेगा," विक्रम ने हुक्म दिया।
मम्मी का पूरा शरीर किसी सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। उन्होंने विरोध नहीं किया। उन्होंने अपने होठों को चबाते हुए अपनी उँगलियों से पेटीकोट के नाड़े को पकड़ा और उसे हल्का सा और नीचे सरका दिया।
अब उनका वह गोरा, बेदाग पेट नाभि से काफी नीचे तक उस तेज़ ट्यूबलाइट की रोशनी में नंगा हो चुका था। वह हिस्सा, जो सिर्फ उनका निजी था, आज इस सीलन भरे, बदबूदार केबिन में विक्रम की हवस भरी नज़रों के सामने परोसा गया था।
विक्रम की आँखें उस नज़ारे को देखकर और भी फैल गईं। उसने अपनी जीभ से अपने सूखे होठों को तर किया।
उसने स्पिरिट लगी रुई मम्मी के पेट पर रगड़ी। वह ठंडा और गीला स्पर्श... विक्रम ने जानबूझकर अपनी उँगलियों को उस रुई के साथ मम्मी की त्वचा पर रगड़ा। वह सिर्फ इंजेक्शन की जगह साफ नहीं कर रहा था; वह उनके जिस्म के उस नाज़ुक, अछूते हिस्से को सहला रहा था। उसकी खुरदरी पोरें मम्मी के पेट पर मंडरा रही थीं।
मम्मी के मुँह से सिसकी निकल गई। उनका पेट हवा में ऊपर-नीचे होने लगा।
तभी, विक्रम ने अपना बायां हाथ मम्मी के पेट पर रखा, अपनी उँगलियों से उनके गोरे मांस को थोड़ा सा चुटकी में उठाया, और दाएँ हाथ से...
चुभ...
सुई सीधे मम्मी के पेट के मांस में उतर गई।
"आह्ह्ह्..." मम्मी के गले से दर्द की एक लंबी, टूटी हुई चीख निकल गई।
मैं वहीं खड़ा था। मेरे रोंगटे खड़े थे। मेरे कानों में उनकी वह चीख गूँज रही थी। मेरे शरीर के हर रोम में एक डार्क, वर्जित उत्तेजना दौड़ रही थी। मेरी सांसें भारी हो गई थीं। मेरी हथेलियाँ पसीने से तर-बतर थीं।
डॉक्टर विक्रम ने धीरे-धीरे दवा अंदर धकेली। वह सुई निकाल सकता था, लेकिन उसने उसे ज़रूरत से ज़्यादा देर तक वहाँ रोके रखा, सिर्फ यह देखने के लिए कि मेरी सख्त, रूढ़िवादी मम्मी दर्द और बेबसी के मारे उसके सामने कैसे तड़पती है।
सुई निकालने के बाद, उसने उसी रुई को वहाँ कसकर दबा दिया। इस बार उसकी उँगलियों ने मम्मी के पेट पर जो दबाव डाला, वह साफ-साफ किसी गैर-मर्द का हक जताने वाला स्पर्श था।
"बस... हो गया। अब दर्द गायब हो जाएगा," विक्रम ने फुसफुसाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी संतुष्टि थी, जैसे उसने कोई बहुत बड़ा शिकार मार गिराया हो।
इंजेक्शन लगने के तुरंत बाद, मम्मी ने लगभग झपटकर अपनी साड़ी का पल्लू खींचा और अपने पेट को ढक लिया। उन्होंने उसे इतने ज़ोर से अपनी गर्दन और सीने पर लपेटा, जैसे वह खुद को दुनिया की नज़रों से हमेशा के लिए छुपा लेना चाहती हों।
वह बेड से उतरीं। उनका चेहरा पूरी तरह सफेद था। उनकी आँखों में कोई रौब, कोई कड़कपन या तानाशाही नहीं थी। वहाँ सिर्फ शर्मिंदगी, हार और एक गहरी मनोवैज्ञानिक चोट थी।
विक्रम ने अपने हाथ धोए और एक बनावटी, पेशेवर अंदाज़ में मुझसे कहा, "दवाइयाँ वही कंटिन्यू कीजिएगा। मैंने एक एंटीबायोटिक बढ़ा दी है।"
मैंने पर्चा लिया। विक्रम और मेरी नज़रें एक सेकंड के लिए मिलीं। हम दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई, लेकिन उस पल में... उसकी आँखों की वह शातिर चमक और मेरे चेहरे का वह खामोश, विकृत भाव—हम दोनों जानते थे कि उस केबिन के हरे परदे के पीछे आज क्या हुआ है। हमने मिलकर एक गुरूर को तोड़ा था।
जब हम उस क्लिनिक से बाहर निकले, तो मम्मी का हाथ मेरे कंधे पर पहले से ज़्यादा भारी लग रहा था। वह बिल्कुल चुप थीं। वह पूरी तरह से टूट चुकी थीं।
और मैं? मैं अपने ही मन की उस गंदी, डार्क और वर्जित भूलभुलैया में पूरी तरह खो चुका था। मैं एक 'ककल्ड' बेटे के रूप में अपनी इस खामोश, मनोवैज्ञानिक जीत का जश्न मना रहा था। मैंने अपनी मम्मी के उस अभेद्य, 'सती-सावित्री' वाले तिलिस्म को खुद अपनी आँखों के सामने चकनाचूर होते देखा था।
मुझे अब उनके अनुशासन से डर नहीं लगता था, क्योंकि मैं जान गया था कि इस लोहे की दीवार के पीछे... एक ऐसी बेबस औरत छिपी है, जिसे कोई विक्रम अपनी हवस और मेडिकल अधिकार की आड़ में नंगा कर सकता है। और सबसे खौफनाक सच यह था कि मुझे यह सच्चाई... पसंद आ गई थी।
क्लिनिक के बाहर निकलते ही मम्मी का हाथ मेरे कंधे पर और भी भारी लग रहा था। वह चुप थीं। उनके कदम अनिश्चित थे। मैंने दरवाज़ा खोला और उन्हें कार की ओर ले जाने लगा।
तभी पीछे से विक्रम की आवाज़ आई।
“एक मिनट।”
हम दोनों रुके। विक्रम बाहर आ गया था। उसके हाथ में एक छोटा सा पर्ची थी। उसने मेरी ओर देखा। उसकी नज़रें मेरी आँखों में ठहर गईं।
मैंने जानबूझकर अपनी पुतलियों को थोड़ा और नरम कर दिया। मेरी ठोड़ी थोड़ी झुक गई। मेरी साँसें भारी थीं। मैंने अपनी निगाहें एक पल के लिए नीचे गिराईं, फिर फिर से उठाईं—बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई आज्ञाकारी, कमज़ोर बेटा डॉक्टर के सामने खड़ा हो।
विक्रम ने मेरी उस भाव-भंगिमा को पकड़ लिया।
उसकी आँखों में एक धीमी, शातिर चमक फैल गई। उसने मेरी तरफ बहुत हल्का सा सिर हिलाया—जैसे कोई चुपचाप पुष्टि कर रहा हो। वह समझ गया था। वह जान गया था कि मैं सिर्फ एक बेटा नहीं हूँ। वह जान गया था कि मैंने अपनी मम्मी को उसके हाथों में सौंपने में एक गंदी, वर्जित खुशी महसूस की थी। वह जान गया था कि मैं एक कायर, विकृत दर्शक हूँ… एक ककल्ड बेटा।
उसने अपना ध्यान मम्मी की ओर मोड़ा।
“अनीता जी,” उसने धीमी लेकिन दबाव भरी आवाज़ में कहा, “आपकी हालत अभी भी नाज़ुक है। पेट की सूजन पूरी तरह नहीं उतरी है। अगर आपने वही पुरानी, तंग साड़ियाँ और पेटीकोट पहनना जारी रखा… तो हालात और बिगड़ जाएँगे।”
मम्मी ने सिर उठाया। उनकी आँखों में अभी भी डर और शर्म बाकी थी।
“मैं… मैं घर पर ढीले कपड़े पहन लूँगी,” उन्होंने धीमे से कहा।
विक्रम ने सिर हिलाया। उसकी आवाज़ और भी गंभीर हो गई।
“नहीं। सिर्फ घर पर नहीं। आपको अब से ऐसे कपड़े पहनने होंगे जो शरीर को साँस लेने दें। पेट और कमर पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए। ढीली, हल्की साड़ी… या फिर घर पर सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज़। शरीर को ताज़ी हवा लगनी चाहिए। नहीं तो सूजन फिर से बढ़ जाएगी और इंजेक्शन भी काम नहीं करेगा।”
मम्मी का चेहरा सफेद पड़ गया।
“लेकिन… बाहर… और घर में भी…”
विक्रम ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आवाज़ में अब एक हल्की धमकी थी, जो चिकित्सकीय चिंता की आड़ में छिपी थी।
“अगर आपने मेरे कहे अनुसार नहीं किया, तो दर्द फिर से बढ़ जाएगा। और अगली बार इंजेक्शन सिर्फ पेट पर नहीं… और नीचे लगाना पड़ सकता है। आप समझ रही हैं ना?”
मम्मी की साँसें अटक गईं। उन्होंने मेरे चेहरे की ओर देखा, जैसे कोई आखिरी उम्मीद तलाश रही हों। लेकिन मैंने फिर से वही खामोश, विनम्र नज़रें दिखाईं। मैंने सिर हिलाया।
“मम्मी… डॉक्टर सही कह रहे हैं। आपको आराम चाहिए।”
मेरी इस सहमति ने उन्हें फिर से तोड़ दिया।
विक्रम ने मेरी तरफ एक बार और देखा। उसकी आँखों में स्पष्ट संतुष्टि थी। वह जानता था कि मैं उसके खेल में शामिल हूँ। वह जानता था कि मैं अपनी मम्मी को उसके सामने और अधिक कमज़ोर, और अधिक उजागर देखना चाहता हूँ।
उसने मम्मी की तरफ मुड़कर आखिरी निर्देश दिया:
“आज रात से ही ढीले कपड़े पहनना शुरू कर दीजिए। शरीर को हवा लगनी चाहिए। और अगर दर्द बढ़ा… तो तुरंत आ जाना। मैं खुद देख लूँगा।”
मम्मी ने सिर्फ सिर हिलाया। उनकी आवाज़ निकलने लायक नहीं बची थी।
हम कार की ओर बढ़े। मम्मी चुपचाप सीट पर बैठ गईं। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू को और कसकर लपेटा, जैसे अब भी खुद को छिपाना चाहती हों। लेकिन उनकी आँखों में वह पुरानी तानाशाही अब नहीं थी। वहाँ सिर्फ हार और एक नई, गहरी बेबसी थी।
और मैं?
मैं गाड़ी स्टार्ट करते हुए रियरव्यू मिरर में अपनी आँखें देख रहा था।
वहाँ एक बेटा नहीं बैठा था।
वहाँ एक आदमी बैठा था जिसने आज अपनी मम्मी के गुरूर को डॉक्टर के हाथों टूटते हुए देखा था… और उसे पसंद आया था।
विक्रम ने मुझे पहचान लिया था।
और अब खेल सिर्फ क्लिनिक तक सीमित नहीं रहने वाला था। जो मकड़ी का जाला मैंने बुना था, मम्मी उसमें फंस के रह गई थीं।
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#10
बहुत सुंदर
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