08-08-2026, 08:05 PM
छोटी सी भूल
मेरा नाम पंकज है। मैं अठारह साल का हूँ और दिल्ली में रहता हूँ।
लम्बाई करीब पाँच फुट दस इंच है। दुबला-पतला शरीर है, लेकिन कंधे चौड़े हैं। जिम नियमित नहीं जाता, फिर भी घर के काम और कभी-कभी दौड़ने से बाज़ुओं और सीने में हल्की मज़बूती आ गई है। चेहरा साफ़ है, हल्की दाढ़ी की लाइनें अभी नई-नई निकल रही हैं। बाल काले और थोड़े बिखरे हुए हैं। आँखें तेज़ हैं, लेकिन ज़्यादातर समय चुप रहता हूँ। घर में बोलता कम हूँ, देखता ज़्यादा हूँ।
पापा का नाम सुरेश है। उम्र करीब बयालीस-तैंतालीस। कद औसत, पेट थोड़ा निकला हुआ। बालों में सफ़ेदी आ चुकी है। चेहरे पर हमेशा एक थकी हुई गंभीरता रहती है। कपड़े साधारण पहनते हैं—पेंट-शर्ट, कभी-कभी कुर्ता। बातें कम करते हैं, भावनाएँ और भी कम दिखाते हैं।
पापा का बिज़नेस कपड़े का थोक व्यापार है। सूती और सिंथेटिक कपड़ों की सप्लाई—शर्टिंग, सूटिंग, साड़ियाँ, ड्रेस मटीरियल। लुधियाना-अमृतसर के बाज़ारों में पुराने पार्टनर हैं। ऑर्डर और माल पहुँचाने के चक्कर में हफ़्ते में तीन-चार दिन बाहर रहते हैं। घर का ख़र्च बहुत अच्छा चल जाता है।
अब आते हैं हमारी कहानी के सबसे प्रमुख पात्र पर—मेरी मम्मी।
मम्मी का नाम अंजलि है। उम्र सैंतीस। कद पाँच फुट पाँच इंच। देखने में सुंदर हैं—न ज़्यादा पतली, न ज़्यादा मोटी। साफ़ गोरा और चिकना रंग। लंबे काले बाल जो वे हमेशा सादे जूड़े में बाँधती हैं, लेकिन कभी-कभी गर्दन के पीछे से कुछ मुलायम लटें निकल आती हैं। घर में ज़्यादातर साड़ी या सूट पहनती हैं। साड़ी का पल्लू कभी कंधे से नहीं खिसकता। ब्लाउज़ हमेशा सिंपल रखते हैं, आधी आस्तीन वाला। घर में भी कोई लापरवाही नहीं। संस्कारी औरत हैं। घर का सारा काम वही संभालती हैं।
सुबह की दिनचर्या हमेशा एक जैसी होती है। छह बजते-बजते मम्मी उठ जाती हैं। सुबह की चाय, नाश्ता, पापा का काम के लिए बाहर जाना, मेरा कॉलेज। मम्मी मुझे जगाने आती हैं।
“पंकज, कब तक सोएगा? उठ जा। नाश्ता ठंडा हो जाएगा।”
मैं आलस भरी आँखों से उन्हें देखता हूँ। साधारण साड़ी, सिंपल ब्लाउज़। ब्लाउज़ उनकी छातियों की गोलाई को कसकर समेटे रहता है। चेहरे पर थकान है, लेकिन उस थकान में भी एक शांत सुंदरता है। इस सोशल मीडिया के ज़माने में किसी बुराई से अछूता था, ऐसा तो नहीं कह सकता। लेकिन अपनी माँ के बारे में कभी ग़लत नहीं सोचा था। हाँ, उनकी सुंदरता मुझे ज़रूर लुभाती थी, पर मुझे अपनी लिमिट्स पता थीं।
नाश्ते पर पापा अगर घर हों तो अख़बार लेकर बैठे होते हैं। मम्मी उनकी चाय बनाती हैं—अदरक वाली, हल्की मीठी।
पापा: “अंजलि, रमेश आया था। नया ऑर्डर मिला है। दो दिन अमृतसर जाना पड़ेगा।”
मम्मी चाय रखते हुए: “फिर? पिछले हफ़्ते भी गए थे न।”
पापा: “बिज़नेस है क्या करें। तू सँभाल ले। ये भी बड़ा हो गया है।”
मम्मी मेरी तरफ़ देखती हैं। “पढ़ाई का ध्यान रख। बस फ़ोन में मत लगा रह।”
“हाँ मम्मी।”
मैंने कई बार गौर किया है मम्मी के स्वभाव पर। वे कम बोलती हैं। शिकायत कभी नहीं करतीं। पापा के बार-बार बाहर जाने पर भी चेहरे पर सिर्फ़ हल्की थकान होती है, गुस्सा नहीं। लेकिन उनकी चुप्पी में एक अनकहा अकेलापन साफ़ दिखता है। घर में सब कुछ ठीक चल रहा होता है, फिर भी वे जैसे किसी खाली जगह में खड़ी हों।
एक दिन दोपहर को पापा घर नहीं थे। मम्मी छत पर कपड़े सुखा रही थीं। धूप तेज़ थी। साड़ी का पल्लू हवा में हल्का उड़ रहा था। वे बार-बार उसे ठीक कर रही थीं। ब्लाउज़ और साड़ी के बीच से झाँकती उनकी गोरी कमर की झलक दिखी। कपड़े टाँगने के बाद वे थोड़ी देर दीवार के सहारे खड़ी रहीं। आँखें बंद कर लीं। सीना हल्के से ऊपर-नीचे हो रहा था। बस दो-तीन पल। फिर खुद को सँभाला और नीचे आ गईं। ऐसे कई दृश्य मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थे जो मुझे बेचैन कर देते, लेकिन मैं जानता था कि मेरी उम्र भी ऐसे ही दौर से गुज़र रही थी।
शाम को कभी-कभी मम्मी किचन में अकेली बैठी चाय पी रही होती हैं। साड़ी का पल्लू गोद में रखा होता है। जब मैं पानी लेने जाता हूँ तो वे पूछती हैं, “तू भी ले ले?”
“नहीं मम्मी।”
वे सिर हिला देती हैं। आँखों में उस वक्त एक थकान होती है जो नींद की नहीं होती। मम्मी भी मुझसे कभी-कभी खुद ही बात कर लेती थीं। शायद उन्हें भी एहसास था कि इस उम्र में बेटे को एक दोस्त की तरह रखना चाहिए।
एक रात पापा तीन दिन के टूर पर थे। खाना खाते समय मम्मी ने अचानक पूछा, “पंकज, तुझे लगता है पापा घर कम रहते हैं?”
मैंने चौंककर देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी।
“हाँ… बिज़नेस है न मम्मी।”
वे हल्के से मुस्कुराईं। मुस्कान अधूरी थी। “हाँ। बिज़नेस है।” फिर चुप हो गईं। थोड़ी देर बाद बोलीं, “खाना और ले ले। ठंडा हो जाएगा। और जल्दी सो जाना, कल स्टोर रूम की सफ़ाई करनी है। बहुत कबाड़ पड़ा है घर में।”
उस रात मैंने देर तक सोचा। मम्मी ने शिकायत नहीं की थी। बस एक सवाल पूछा था। और उस सवाल के पीछे उनका अकेलापन साफ़ छिपा था। इसी सोच में डूबा मैं कब नींद की गोद में चला गया, मुझे पता नहीं।
अगले दिन दोपहर को मम्मी ने मुझे स्टोर रूम में बुलाया।
“पंकज, थोड़ा मदद कर दे। ऊपर वाली शेल्फ़ पर ये बॉक्स रखने हैं। मेरी पहुँच नहीं हो रही।”
स्टोर रूम में एक छोटी स्टूल पड़ी थी। मम्मी ने हल्के पाउडर पिंक रंग की साड़ी पहनी हुई थी—सिंपल, घर का रोज़ का रंग। ब्लाउज़ भी उसी टोन का। उन्होंने स्टूल पर चढ़कर ऊपर की शेल्फ़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैं नीचे फर्श पर खड़ा था, बॉक्स पकड़े हुए। जब उन्होंने दोनों हाथ ऊपर उठाए तो साड़ी की पेटीकोट थोड़ी ढीली पड़कर नीचे सरक गई और ब्लाउज़ ऊपर को सरक गया।
उसी पल उनका चिकना पेट और गहरी नाभि एकदम मेरे चेहरे के सामने आ गई। साफ़, मुलायम, दूध जैसा गोरा। मैं नीचे खड़ा था और वे स्टूल पर। नज़र की दूरी बहुत कम रह गई थी। वह खुला हुआ चिकना पेट और गहरी नाभि कुछ पल के लिए पूरी तरह साफ़ दिख रही थी।
मैं एक पल के लिए हिल नहीं पाया।
मम्मी ने तुरंत ब्लाउज़ नीचे खींचा और पेटी कस ली। उनके चेहरे पर हल्की शर्मिंदगी थी। आवाज़ में थोड़ी जल्दी थी।
“यहाँ-वहाँ क्या देख रहा है… बॉक्स पकड़ अच्छे से। गिर न जाए।”
मैंने सिर झुकाए रखा और बॉक्स उनके हाथों की तरफ़ बढ़ा दिया। उन्होंने बॉक्स लिया और शेल्फ़ पर रख दिया। फिर सावधानी से स्टूल से उतर आईं।
“हो गया। जा, हाथ धो ले।”
मैं चुपचाप बाहर निकल आया। कमरे में आकर दरवाज़ा बंद किया। आँखें बंद कीं तो वही दृश्य फिर से आ गया—मम्मी स्टूल पर खड़ी, उनका खुला हुआ चिकना पेट, गहरी नाभि, और मेरा नीचे खड़ा होना। उनकी खूबसूरती को कभी इतनी नज़दीक से नहीं देखा था। मन में अजीब ख्याल आ रहे थे, लेकिन रिश्तों की दीवार सामने आ जाती थी।
शाम को मम्मी ने चाय बनाई। अब वे सलवार-कमीज़ में थीं। चेहरे पर अभी भी हल्की शर्मिंदगी के भाव थे, लेकिन मैंने ऐसा व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मम्मी सब कुछ अकेले सँभालती हैं। पापा आते हैं, खाते हैं, चले जाते हैं। घर की दुनिया उनके कंधों पर टिकी है। और वे चुपचाप ढो रही हैं—अपने अकेलेपन के साथ, अपनी थकान के साथ, और अपनी उस सुंदरता के साथ जो कभी-कभी अनजाने में सामने आ जाती है।
ऐसे ही कई दिन बीत गए। कोई खास घटना नहीं हुई।
एक दिन पापा नाश्ता कर रहे थे। अख़बार एक तरफ़ पड़ा था। वे जल्दी में थे।
“अंजलि,” उन्होंने पराठे का एक टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, “सुनो, आज एक लड़का आएगा। राहुल नाम है। मेरे पार्टनर गुप्ताजी का बेटा है।”
मम्मी किचन से बाहर आईं, हाथ पल्लू से पोंछती हुईं। “कौन राहुल? पहले तो कभी नहीं आया।”
पापा ने चाय का घूँट लिया। “अरे, नया-नया बिज़नेस में आया है। गुप्ताजी ने कहा है थोड़ा काम सिखा दूँ। आज कुछ ज़रूरी कागज़ात लेने आएगा। अगर मैं घर पर न मिलूँ, तो तुम उसे दे देना। मेरे दराज में लाल वाली फ़ाइल है, उसी में हैं।”
मम्मी ने सिर हिलाया, लेकिन उनके चेहरे पर हल्की सी झिझक थी। “ठीक है। लेकिन कोई अजनबी…”
पापा ने हाथ हिलाकर बात उड़ा दी। “अरे, अजनबी कैसा? गुप्ताजी का बेटा है। अपने ही घर का समझो। सीधा-साधा लड़का है। तुम बस कागज़ दे देना।”
मम्मी चुप हो गईं। उन्होंने एक बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक चिंता थी।
पापा उठ खड़े हुए। “चलो, मुझे देर हो रही है। तुम ध्यान रखना। और पंकज, तू भी थोड़ा घर में रहना, अगर मम्मी को ज़रूरत पड़े।”
“हाँ पापा,” मैंने कहा।
पापा चले गए। मम्मी ने दरवाज़ा बंद किया और एक गहरी साँस ली।
शाम को घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर एक लड़का खड़ा था। उम्र करीब छब्बीस। लंबा, साफ़-सुथरा। हल्के रंग की शर्ट और गहरे पेंट में। बाल अच्छे से कंगे हुए। चेहरे पर एक विनम्र मुस्कान। हाथ में लिफ़ाफ़ा।
“नमस्ते। मैं राहुल। सुरेश अंकल के पार्टनर का बेटा। अंकल घर पर हैं क्या?”
आवाज़ शांत और सभ्य थी।
पापा उस समय घर पर ही थे। वे बाहर आए। “अरे राहुल! आ जा बेटा। अंदर आ।”
राहुल ने जूते बाहर उतार कर अंदर कदम रखा। बैठक में जाकर कुर्सी पर बैठ गया।
पापा बोले, “अंजलि, चाय ला देना।”
मम्मी किचन से निकलीं। साड़ी पहने, पल्लू कंधे पर सही जगह पर। राहुल तुरंत खड़ा हो गया।
“नमस्ते आंटी।”
आवाज़ में इज़्ज़त थी। नज़रें मम्मी के चेहरे पर कुछ देर तक टिकी रहीं, लेकिन नीचे नहीं गईं।
मम्मी ने भी नमस्ते कहा। “बैठो। चाय लाती हूँ।”
वे किचन चली गईं। राहुल पापा से बिज़नेस की बातें करने लगा।
मम्मी चाय लेकर आईं। राहुल ने दोनों हाथों से कप लिया। “धन्यवाद आंटी।”
बीस-पच्चीस मिनट बाद राहुल उठा। “अंकल, पेपर्स दे दीजिए।”
पापा ने पेपर्स दिए। “ठीक है बेटा। मेहनत कर।”
राहुल ने मम्मी की तरफ़ मुँह किया। “नमस्ते आंटी। कष्ट दिया।”
मम्मी ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं।”
राहुल चला गया। पापा बोले, “अच्छा लड़का है। सभ्य है।”
मम्मी ने सिर्फ़ “हम्म” किया और किचन चली गईं।
उस दिन राहुल में कोई उतावलापन नहीं था। लेकिन इस दिन ने हमारे आने वाले कल को किस तरह बदलना था, इसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा।
अगले दिन दोपहर का समय था। पापा जा चुके थे। मम्मी किचन में थीं। उन्होंने मुझे आवाज़ दी।
“पंकज, ज़रा यहाँ आना।”
मैं किचन में गया। मम्मी ने एक प्लास्टिक की थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई।
“बेटा, यह मेरी गुलाबी वाली साड़ी है। इसकी पेटी थोड़ी ढीली हो गई है। दर्ज़ी को देकर आना, कहना थोड़ा कस दे।”
मेरे मन में स्टोर रूम वाला दिन एकदम से सामने आ गया।
मैंने थैली ली। “ठीक है, मम्मी।”
“भूलना मत,” उन्होंने ज़ोर देकर कहा। “अगले हफ़्ते मुझे यही साड़ी पहननी है। पड़ोस में कीर्तन है।”
“नहीं भूलूँगा, मम्मी,” मैंने कहा और थैली अपने कमरे में रख दी।
लेकिन जैसा अठारह साल के लड़कों के साथ अक्सर होता है, मेरे दिमाग में हज़ार और चीज़ें थीं। दोस्तों के चैट, वीडियो गेम, कॉलेज का असाइनमेंट… साड़ी की पेटी कसवाने का काम दिमाग के किसी कोने में दब गया।
कॉलेज के व्हाट्सएप ग्रुप में रिया की पूल पार्टी वाली फ़ोटो आई। मैं उस फ़ोटो को देखकर उलझ गया। दोपहर को कमरे में थैली बिस्तर पर पटक दी और लैपटॉप खोल लिया। एक गेम दूसरे में बदलता गया। समय का पता ही नहीं चला।
शाम होते-होते जब नज़र थैली पर पड़ी तो खिड़की से बारिश शुरू हो चुकी थी। मैंने खुद को बहाना दिया—“कल सुबह दे आऊँगा।” और वह बात दिमाग से निकल गई।
करीब दस-बारह दिन बाद एक दोपहर राहुल अकेला आया। पापा घर नहीं थे। मैंने दरवाज़ा खोला।
“नमस्ते। अंकल घर पर हैं?”
“नहीं।”
राहुल ने लिफ़ाफ़ा आगे किया। “यह कागज़ रख देना।”
फिर बोला, “आंटी घर पर हैं क्या? नमस्ते कर लूँ।”
मैंने मम्मी को आवाज़ लगाई। मम्मी किचन से निकलीं। उन्होंने हल्के पाउडर ब्लू रंग का सलवार-कमीज़ पहना हुआ था। कमीज़ कमर तक सही बैठी थी। दुपट्टा कंधे पर था। उस दिन वे थकी हुई लग रही थीं। बालों की कुछ लटें गर्दन पर गिर रही थीं।
राहुल जब नमस्ते कर रहा था, तो उसकी नज़र एक पल के लिए उनके कमीज़ के गले और कमर पर चली गई। मम्मी ने तुरंत दुपट्टा ठीक कर लिया।
“नमस्ते आंटी। कागज़ देने आया हूँ।”
“रख दो। पानी पियोगे?”
“जी आंटी।”
मम्मी गिलास लेकर आईं। राहुल ने गिलास लेते समय उनकी उंगलियों को हल्का छू लिया। मम्मी ने गिलास छुड़ाया और एक कदम पीछे हटीं। “पी लो। फिर जाओ।”
वह मुस्कुराया और चला गया।
कुछ देर बाद बारिश होने लगी। मम्मी अपने कमरे में थीं। दरवाज़ा आधा खुला था। मैं पानी लेने गया तो उनकी आवाज़ सुनाई दी।
मैं रुक गया। नज़र अंदर चली गई।
मम्मी बिस्तर के किनारे बैठी थीं। पाउडर ब्लू सलवार-कमीज़ में। नमी की वजह से कपड़े शरीर पर चिपक गए थे। दुपट्टा एक तरफ़ पड़ा था। बाल पूरी तरह खुले हुए थे। कमीज़ की ऊपर की दो बटन खुली हुई थीं। गला नंगा था। छातियों की ऊपरी गोलाई साँस के साथ उठ-गिर रही थी।
वे खिड़की की तरफ़ देख रही थीं। उंगलियाँ बालों में फेर रही थीं। आँखें बंद थीं। साँसें धीरे-धीरे भारी हो रही थीं।
मैं दरवाज़े के पास खड़ा साँस थामे देखता रहा।
एक हफ़्ते बाद कीर्तन वाला दिन आया। मम्मी ने वही गुलाबी साड़ी पहनी जिसकी पेटी मैं दर्ज़ी को देना भूल गया था। उन्होंने बड़ी सावधानी से पहनी। पेटी दो बार बाँधी। पल्लू पिन से जमाया। बिल्कुल संस्कारी।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। राहुल था।
मम्मी चाय लेकर आईं। सोफे पर बैठते समय साड़ी का सिरा कुशन के नीचे दब गया। उठते समय साड़ी खिंच गई। पेटी ढीली पड़ गई। ब्लाउज़ ऊपर उठ गया।
एक पल के लिए मम्मी का दूध जैसा सफ़ेद, चिकना पेट और गहरी नाभि राहुल के बिल्कुल सामने नंगा हो गया।
राहुल की नज़रें वहीं जम गईं। आँखों में पहले हैरानी, फिर एक गहरी, प्यासी चमक आ गई।
मम्मी का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने जल्दी से कपड़े ठीक किए और कमरे में चली गईं।
कुछ देर बाद वे वापस आईं। साड़ी ठीक करके। चेहरा अभी भी लाल था। “मैं जा रही हूँ,” कहकर वे निकल गईं।
दरवाज़ा बंद होते ही राहुल की मुस्कान बदल गई। विनम्रता गायब हो गई। एक टेढ़ी, दुष्ट मुस्कान फैल गई।
वह मेरी तरफ़ मुड़ा।
“पंकज, तुम्हारा कोई छोटा भाई-बहन नहीं है?”
“नहीं… सिर्फ़ मैं हूँ।”
राहुल की मुस्कान और चौड़ी हो गई। “अच्छा… सिर्फ़ तू। और तेरी मम्मी।”
वह करीब आया। “तो फिर घर में… सिर्फ़ तुम दोनों ही रहते हो ज़्यादातर?”
मैं चुप रहा।
राहुल हँसा। वह हँसी साफ़ नहीं थी।
“मैं चलता हूँ। लेकिन पंकज… अपनी मम्मी का ख्याल रखना। और उन्हें मेरी तरफ़ से नमस्ते कह देना।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
घर में भारी सन्नाटा पसर गया।
मैं वहीं खड़ा रह गया। राहुल की टेढ़ी मुस्कान और उसका सवाल कानों में गूँज रहा था।
डेढ़ घंटे बाद मम्मी कीर्तन से वापस आईं। चेहरे पर बेचैनी थी। उन्होंने मुझसे पूछा, “उसने… कुछ कहा?”
मैंने झूठ बोला। “नहीं। बस कागज़ देकर चला गया।”
रात का खाना चुपचाप हुआ। मम्मी की उंगलियाँ काँप रही थीं। खाना खत्म करने के बाद वे पूजा के कोने में पहले से ज़्यादा देर तक खड़ी रहीं। हाथ जोड़े। सिर झुकाए। जैसे माफ़ी माँग रही हों।
मैं अपने कमरे में लेटा रहा। नींद नहीं आ रही थी।
मैं जानता था कि अब बहुत कुछ बदलने वाला है।
मम्मी की ढीली साड़ी सिर्फ़ एक हादसा नहीं थी।
वह एक दरवाज़ा था।
और राहुल उस दरवाज़े से अंदर आने की फ़िराक में था।
मेरा नाम पंकज है। मैं अठारह साल का हूँ और दिल्ली में रहता हूँ।
लम्बाई करीब पाँच फुट दस इंच है। दुबला-पतला शरीर है, लेकिन कंधे चौड़े हैं। जिम नियमित नहीं जाता, फिर भी घर के काम और कभी-कभी दौड़ने से बाज़ुओं और सीने में हल्की मज़बूती आ गई है। चेहरा साफ़ है, हल्की दाढ़ी की लाइनें अभी नई-नई निकल रही हैं। बाल काले और थोड़े बिखरे हुए हैं। आँखें तेज़ हैं, लेकिन ज़्यादातर समय चुप रहता हूँ। घर में बोलता कम हूँ, देखता ज़्यादा हूँ।
पापा का नाम सुरेश है। उम्र करीब बयालीस-तैंतालीस। कद औसत, पेट थोड़ा निकला हुआ। बालों में सफ़ेदी आ चुकी है। चेहरे पर हमेशा एक थकी हुई गंभीरता रहती है। कपड़े साधारण पहनते हैं—पेंट-शर्ट, कभी-कभी कुर्ता। बातें कम करते हैं, भावनाएँ और भी कम दिखाते हैं।
पापा का बिज़नेस कपड़े का थोक व्यापार है। सूती और सिंथेटिक कपड़ों की सप्लाई—शर्टिंग, सूटिंग, साड़ियाँ, ड्रेस मटीरियल। लुधियाना-अमृतसर के बाज़ारों में पुराने पार्टनर हैं। ऑर्डर और माल पहुँचाने के चक्कर में हफ़्ते में तीन-चार दिन बाहर रहते हैं। घर का ख़र्च बहुत अच्छा चल जाता है।
अब आते हैं हमारी कहानी के सबसे प्रमुख पात्र पर—मेरी मम्मी।
मम्मी का नाम अंजलि है। उम्र सैंतीस। कद पाँच फुट पाँच इंच। देखने में सुंदर हैं—न ज़्यादा पतली, न ज़्यादा मोटी। साफ़ गोरा और चिकना रंग। लंबे काले बाल जो वे हमेशा सादे जूड़े में बाँधती हैं, लेकिन कभी-कभी गर्दन के पीछे से कुछ मुलायम लटें निकल आती हैं। घर में ज़्यादातर साड़ी या सूट पहनती हैं। साड़ी का पल्लू कभी कंधे से नहीं खिसकता। ब्लाउज़ हमेशा सिंपल रखते हैं, आधी आस्तीन वाला। घर में भी कोई लापरवाही नहीं। संस्कारी औरत हैं। घर का सारा काम वही संभालती हैं।
सुबह की दिनचर्या हमेशा एक जैसी होती है। छह बजते-बजते मम्मी उठ जाती हैं। सुबह की चाय, नाश्ता, पापा का काम के लिए बाहर जाना, मेरा कॉलेज। मम्मी मुझे जगाने आती हैं।
“पंकज, कब तक सोएगा? उठ जा। नाश्ता ठंडा हो जाएगा।”
मैं आलस भरी आँखों से उन्हें देखता हूँ। साधारण साड़ी, सिंपल ब्लाउज़। ब्लाउज़ उनकी छातियों की गोलाई को कसकर समेटे रहता है। चेहरे पर थकान है, लेकिन उस थकान में भी एक शांत सुंदरता है। इस सोशल मीडिया के ज़माने में किसी बुराई से अछूता था, ऐसा तो नहीं कह सकता। लेकिन अपनी माँ के बारे में कभी ग़लत नहीं सोचा था। हाँ, उनकी सुंदरता मुझे ज़रूर लुभाती थी, पर मुझे अपनी लिमिट्स पता थीं।
नाश्ते पर पापा अगर घर हों तो अख़बार लेकर बैठे होते हैं। मम्मी उनकी चाय बनाती हैं—अदरक वाली, हल्की मीठी।
पापा: “अंजलि, रमेश आया था। नया ऑर्डर मिला है। दो दिन अमृतसर जाना पड़ेगा।”
मम्मी चाय रखते हुए: “फिर? पिछले हफ़्ते भी गए थे न।”
पापा: “बिज़नेस है क्या करें। तू सँभाल ले। ये भी बड़ा हो गया है।”
मम्मी मेरी तरफ़ देखती हैं। “पढ़ाई का ध्यान रख। बस फ़ोन में मत लगा रह।”
“हाँ मम्मी।”
मैंने कई बार गौर किया है मम्मी के स्वभाव पर। वे कम बोलती हैं। शिकायत कभी नहीं करतीं। पापा के बार-बार बाहर जाने पर भी चेहरे पर सिर्फ़ हल्की थकान होती है, गुस्सा नहीं। लेकिन उनकी चुप्पी में एक अनकहा अकेलापन साफ़ दिखता है। घर में सब कुछ ठीक चल रहा होता है, फिर भी वे जैसे किसी खाली जगह में खड़ी हों।
एक दिन दोपहर को पापा घर नहीं थे। मम्मी छत पर कपड़े सुखा रही थीं। धूप तेज़ थी। साड़ी का पल्लू हवा में हल्का उड़ रहा था। वे बार-बार उसे ठीक कर रही थीं। ब्लाउज़ और साड़ी के बीच से झाँकती उनकी गोरी कमर की झलक दिखी। कपड़े टाँगने के बाद वे थोड़ी देर दीवार के सहारे खड़ी रहीं। आँखें बंद कर लीं। सीना हल्के से ऊपर-नीचे हो रहा था। बस दो-तीन पल। फिर खुद को सँभाला और नीचे आ गईं। ऐसे कई दृश्य मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थे जो मुझे बेचैन कर देते, लेकिन मैं जानता था कि मेरी उम्र भी ऐसे ही दौर से गुज़र रही थी।
शाम को कभी-कभी मम्मी किचन में अकेली बैठी चाय पी रही होती हैं। साड़ी का पल्लू गोद में रखा होता है। जब मैं पानी लेने जाता हूँ तो वे पूछती हैं, “तू भी ले ले?”
“नहीं मम्मी।”
वे सिर हिला देती हैं। आँखों में उस वक्त एक थकान होती है जो नींद की नहीं होती। मम्मी भी मुझसे कभी-कभी खुद ही बात कर लेती थीं। शायद उन्हें भी एहसास था कि इस उम्र में बेटे को एक दोस्त की तरह रखना चाहिए।
एक रात पापा तीन दिन के टूर पर थे। खाना खाते समय मम्मी ने अचानक पूछा, “पंकज, तुझे लगता है पापा घर कम रहते हैं?”
मैंने चौंककर देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी।
“हाँ… बिज़नेस है न मम्मी।”
वे हल्के से मुस्कुराईं। मुस्कान अधूरी थी। “हाँ। बिज़नेस है।” फिर चुप हो गईं। थोड़ी देर बाद बोलीं, “खाना और ले ले। ठंडा हो जाएगा। और जल्दी सो जाना, कल स्टोर रूम की सफ़ाई करनी है। बहुत कबाड़ पड़ा है घर में।”
उस रात मैंने देर तक सोचा। मम्मी ने शिकायत नहीं की थी। बस एक सवाल पूछा था। और उस सवाल के पीछे उनका अकेलापन साफ़ छिपा था। इसी सोच में डूबा मैं कब नींद की गोद में चला गया, मुझे पता नहीं।
अगले दिन दोपहर को मम्मी ने मुझे स्टोर रूम में बुलाया।
“पंकज, थोड़ा मदद कर दे। ऊपर वाली शेल्फ़ पर ये बॉक्स रखने हैं। मेरी पहुँच नहीं हो रही।”
स्टोर रूम में एक छोटी स्टूल पड़ी थी। मम्मी ने हल्के पाउडर पिंक रंग की साड़ी पहनी हुई थी—सिंपल, घर का रोज़ का रंग। ब्लाउज़ भी उसी टोन का। उन्होंने स्टूल पर चढ़कर ऊपर की शेल्फ़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैं नीचे फर्श पर खड़ा था, बॉक्स पकड़े हुए। जब उन्होंने दोनों हाथ ऊपर उठाए तो साड़ी की पेटीकोट थोड़ी ढीली पड़कर नीचे सरक गई और ब्लाउज़ ऊपर को सरक गया।
उसी पल उनका चिकना पेट और गहरी नाभि एकदम मेरे चेहरे के सामने आ गई। साफ़, मुलायम, दूध जैसा गोरा। मैं नीचे खड़ा था और वे स्टूल पर। नज़र की दूरी बहुत कम रह गई थी। वह खुला हुआ चिकना पेट और गहरी नाभि कुछ पल के लिए पूरी तरह साफ़ दिख रही थी।
मैं एक पल के लिए हिल नहीं पाया।
मम्मी ने तुरंत ब्लाउज़ नीचे खींचा और पेटी कस ली। उनके चेहरे पर हल्की शर्मिंदगी थी। आवाज़ में थोड़ी जल्दी थी।
“यहाँ-वहाँ क्या देख रहा है… बॉक्स पकड़ अच्छे से। गिर न जाए।”
मैंने सिर झुकाए रखा और बॉक्स उनके हाथों की तरफ़ बढ़ा दिया। उन्होंने बॉक्स लिया और शेल्फ़ पर रख दिया। फिर सावधानी से स्टूल से उतर आईं।
“हो गया। जा, हाथ धो ले।”
मैं चुपचाप बाहर निकल आया। कमरे में आकर दरवाज़ा बंद किया। आँखें बंद कीं तो वही दृश्य फिर से आ गया—मम्मी स्टूल पर खड़ी, उनका खुला हुआ चिकना पेट, गहरी नाभि, और मेरा नीचे खड़ा होना। उनकी खूबसूरती को कभी इतनी नज़दीक से नहीं देखा था। मन में अजीब ख्याल आ रहे थे, लेकिन रिश्तों की दीवार सामने आ जाती थी।
शाम को मम्मी ने चाय बनाई। अब वे सलवार-कमीज़ में थीं। चेहरे पर अभी भी हल्की शर्मिंदगी के भाव थे, लेकिन मैंने ऐसा व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मम्मी सब कुछ अकेले सँभालती हैं। पापा आते हैं, खाते हैं, चले जाते हैं। घर की दुनिया उनके कंधों पर टिकी है। और वे चुपचाप ढो रही हैं—अपने अकेलेपन के साथ, अपनी थकान के साथ, और अपनी उस सुंदरता के साथ जो कभी-कभी अनजाने में सामने आ जाती है।
ऐसे ही कई दिन बीत गए। कोई खास घटना नहीं हुई।
एक दिन पापा नाश्ता कर रहे थे। अख़बार एक तरफ़ पड़ा था। वे जल्दी में थे।
“अंजलि,” उन्होंने पराठे का एक टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, “सुनो, आज एक लड़का आएगा। राहुल नाम है। मेरे पार्टनर गुप्ताजी का बेटा है।”
मम्मी किचन से बाहर आईं, हाथ पल्लू से पोंछती हुईं। “कौन राहुल? पहले तो कभी नहीं आया।”
पापा ने चाय का घूँट लिया। “अरे, नया-नया बिज़नेस में आया है। गुप्ताजी ने कहा है थोड़ा काम सिखा दूँ। आज कुछ ज़रूरी कागज़ात लेने आएगा। अगर मैं घर पर न मिलूँ, तो तुम उसे दे देना। मेरे दराज में लाल वाली फ़ाइल है, उसी में हैं।”
मम्मी ने सिर हिलाया, लेकिन उनके चेहरे पर हल्की सी झिझक थी। “ठीक है। लेकिन कोई अजनबी…”
पापा ने हाथ हिलाकर बात उड़ा दी। “अरे, अजनबी कैसा? गुप्ताजी का बेटा है। अपने ही घर का समझो। सीधा-साधा लड़का है। तुम बस कागज़ दे देना।”
मम्मी चुप हो गईं। उन्होंने एक बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक चिंता थी।
पापा उठ खड़े हुए। “चलो, मुझे देर हो रही है। तुम ध्यान रखना। और पंकज, तू भी थोड़ा घर में रहना, अगर मम्मी को ज़रूरत पड़े।”
“हाँ पापा,” मैंने कहा।
पापा चले गए। मम्मी ने दरवाज़ा बंद किया और एक गहरी साँस ली।
शाम को घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर एक लड़का खड़ा था। उम्र करीब छब्बीस। लंबा, साफ़-सुथरा। हल्के रंग की शर्ट और गहरे पेंट में। बाल अच्छे से कंगे हुए। चेहरे पर एक विनम्र मुस्कान। हाथ में लिफ़ाफ़ा।
“नमस्ते। मैं राहुल। सुरेश अंकल के पार्टनर का बेटा। अंकल घर पर हैं क्या?”
आवाज़ शांत और सभ्य थी।
पापा उस समय घर पर ही थे। वे बाहर आए। “अरे राहुल! आ जा बेटा। अंदर आ।”
राहुल ने जूते बाहर उतार कर अंदर कदम रखा। बैठक में जाकर कुर्सी पर बैठ गया।
पापा बोले, “अंजलि, चाय ला देना।”
मम्मी किचन से निकलीं। साड़ी पहने, पल्लू कंधे पर सही जगह पर। राहुल तुरंत खड़ा हो गया।
“नमस्ते आंटी।”
आवाज़ में इज़्ज़त थी। नज़रें मम्मी के चेहरे पर कुछ देर तक टिकी रहीं, लेकिन नीचे नहीं गईं।
मम्मी ने भी नमस्ते कहा। “बैठो। चाय लाती हूँ।”
वे किचन चली गईं। राहुल पापा से बिज़नेस की बातें करने लगा।
मम्मी चाय लेकर आईं। राहुल ने दोनों हाथों से कप लिया। “धन्यवाद आंटी।”
बीस-पच्चीस मिनट बाद राहुल उठा। “अंकल, पेपर्स दे दीजिए।”
पापा ने पेपर्स दिए। “ठीक है बेटा। मेहनत कर।”
राहुल ने मम्मी की तरफ़ मुँह किया। “नमस्ते आंटी। कष्ट दिया।”
मम्मी ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं।”
राहुल चला गया। पापा बोले, “अच्छा लड़का है। सभ्य है।”
मम्मी ने सिर्फ़ “हम्म” किया और किचन चली गईं।
उस दिन राहुल में कोई उतावलापन नहीं था। लेकिन इस दिन ने हमारे आने वाले कल को किस तरह बदलना था, इसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा।
अगले दिन दोपहर का समय था। पापा जा चुके थे। मम्मी किचन में थीं। उन्होंने मुझे आवाज़ दी।
“पंकज, ज़रा यहाँ आना।”
मैं किचन में गया। मम्मी ने एक प्लास्टिक की थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई।
“बेटा, यह मेरी गुलाबी वाली साड़ी है। इसकी पेटी थोड़ी ढीली हो गई है। दर्ज़ी को देकर आना, कहना थोड़ा कस दे।”
मेरे मन में स्टोर रूम वाला दिन एकदम से सामने आ गया।
मैंने थैली ली। “ठीक है, मम्मी।”
“भूलना मत,” उन्होंने ज़ोर देकर कहा। “अगले हफ़्ते मुझे यही साड़ी पहननी है। पड़ोस में कीर्तन है।”
“नहीं भूलूँगा, मम्मी,” मैंने कहा और थैली अपने कमरे में रख दी।
लेकिन जैसा अठारह साल के लड़कों के साथ अक्सर होता है, मेरे दिमाग में हज़ार और चीज़ें थीं। दोस्तों के चैट, वीडियो गेम, कॉलेज का असाइनमेंट… साड़ी की पेटी कसवाने का काम दिमाग के किसी कोने में दब गया।
कॉलेज के व्हाट्सएप ग्रुप में रिया की पूल पार्टी वाली फ़ोटो आई। मैं उस फ़ोटो को देखकर उलझ गया। दोपहर को कमरे में थैली बिस्तर पर पटक दी और लैपटॉप खोल लिया। एक गेम दूसरे में बदलता गया। समय का पता ही नहीं चला।
शाम होते-होते जब नज़र थैली पर पड़ी तो खिड़की से बारिश शुरू हो चुकी थी। मैंने खुद को बहाना दिया—“कल सुबह दे आऊँगा।” और वह बात दिमाग से निकल गई।
करीब दस-बारह दिन बाद एक दोपहर राहुल अकेला आया। पापा घर नहीं थे। मैंने दरवाज़ा खोला।
“नमस्ते। अंकल घर पर हैं?”
“नहीं।”
राहुल ने लिफ़ाफ़ा आगे किया। “यह कागज़ रख देना।”
फिर बोला, “आंटी घर पर हैं क्या? नमस्ते कर लूँ।”
मैंने मम्मी को आवाज़ लगाई। मम्मी किचन से निकलीं। उन्होंने हल्के पाउडर ब्लू रंग का सलवार-कमीज़ पहना हुआ था। कमीज़ कमर तक सही बैठी थी। दुपट्टा कंधे पर था। उस दिन वे थकी हुई लग रही थीं। बालों की कुछ लटें गर्दन पर गिर रही थीं।
राहुल जब नमस्ते कर रहा था, तो उसकी नज़र एक पल के लिए उनके कमीज़ के गले और कमर पर चली गई। मम्मी ने तुरंत दुपट्टा ठीक कर लिया।
“नमस्ते आंटी। कागज़ देने आया हूँ।”
“रख दो। पानी पियोगे?”
“जी आंटी।”
मम्मी गिलास लेकर आईं। राहुल ने गिलास लेते समय उनकी उंगलियों को हल्का छू लिया। मम्मी ने गिलास छुड़ाया और एक कदम पीछे हटीं। “पी लो। फिर जाओ।”
वह मुस्कुराया और चला गया।
कुछ देर बाद बारिश होने लगी। मम्मी अपने कमरे में थीं। दरवाज़ा आधा खुला था। मैं पानी लेने गया तो उनकी आवाज़ सुनाई दी।
मैं रुक गया। नज़र अंदर चली गई।
मम्मी बिस्तर के किनारे बैठी थीं। पाउडर ब्लू सलवार-कमीज़ में। नमी की वजह से कपड़े शरीर पर चिपक गए थे। दुपट्टा एक तरफ़ पड़ा था। बाल पूरी तरह खुले हुए थे। कमीज़ की ऊपर की दो बटन खुली हुई थीं। गला नंगा था। छातियों की ऊपरी गोलाई साँस के साथ उठ-गिर रही थी।
वे खिड़की की तरफ़ देख रही थीं। उंगलियाँ बालों में फेर रही थीं। आँखें बंद थीं। साँसें धीरे-धीरे भारी हो रही थीं।
मैं दरवाज़े के पास खड़ा साँस थामे देखता रहा।
एक हफ़्ते बाद कीर्तन वाला दिन आया। मम्मी ने वही गुलाबी साड़ी पहनी जिसकी पेटी मैं दर्ज़ी को देना भूल गया था। उन्होंने बड़ी सावधानी से पहनी। पेटी दो बार बाँधी। पल्लू पिन से जमाया। बिल्कुल संस्कारी।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। राहुल था।
मम्मी चाय लेकर आईं। सोफे पर बैठते समय साड़ी का सिरा कुशन के नीचे दब गया। उठते समय साड़ी खिंच गई। पेटी ढीली पड़ गई। ब्लाउज़ ऊपर उठ गया।
एक पल के लिए मम्मी का दूध जैसा सफ़ेद, चिकना पेट और गहरी नाभि राहुल के बिल्कुल सामने नंगा हो गया।
राहुल की नज़रें वहीं जम गईं। आँखों में पहले हैरानी, फिर एक गहरी, प्यासी चमक आ गई।
मम्मी का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने जल्दी से कपड़े ठीक किए और कमरे में चली गईं।
कुछ देर बाद वे वापस आईं। साड़ी ठीक करके। चेहरा अभी भी लाल था। “मैं जा रही हूँ,” कहकर वे निकल गईं।
दरवाज़ा बंद होते ही राहुल की मुस्कान बदल गई। विनम्रता गायब हो गई। एक टेढ़ी, दुष्ट मुस्कान फैल गई।
वह मेरी तरफ़ मुड़ा।
“पंकज, तुम्हारा कोई छोटा भाई-बहन नहीं है?”
“नहीं… सिर्फ़ मैं हूँ।”
राहुल की मुस्कान और चौड़ी हो गई। “अच्छा… सिर्फ़ तू। और तेरी मम्मी।”
वह करीब आया। “तो फिर घर में… सिर्फ़ तुम दोनों ही रहते हो ज़्यादातर?”
मैं चुप रहा।
राहुल हँसा। वह हँसी साफ़ नहीं थी।
“मैं चलता हूँ। लेकिन पंकज… अपनी मम्मी का ख्याल रखना। और उन्हें मेरी तरफ़ से नमस्ते कह देना।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
घर में भारी सन्नाटा पसर गया।
मैं वहीं खड़ा रह गया। राहुल की टेढ़ी मुस्कान और उसका सवाल कानों में गूँज रहा था।
डेढ़ घंटे बाद मम्मी कीर्तन से वापस आईं। चेहरे पर बेचैनी थी। उन्होंने मुझसे पूछा, “उसने… कुछ कहा?”
मैंने झूठ बोला। “नहीं। बस कागज़ देकर चला गया।”
रात का खाना चुपचाप हुआ। मम्मी की उंगलियाँ काँप रही थीं। खाना खत्म करने के बाद वे पूजा के कोने में पहले से ज़्यादा देर तक खड़ी रहीं। हाथ जोड़े। सिर झुकाए। जैसे माफ़ी माँग रही हों।
मैं अपने कमरे में लेटा रहा। नींद नहीं आ रही थी।
मैं जानता था कि अब बहुत कुछ बदलने वाला है।
मम्मी की ढीली साड़ी सिर्फ़ एक हादसा नहीं थी।
वह एक दरवाज़ा था।
और राहुल उस दरवाज़े से अंदर आने की फ़िराक में था।


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