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छोटी सी भूल
मेरा नाम पंकज है। मैं अठारह साल का हूँ और दिल्ली में रहता हूँ।
लम्बाई करीब पाँच फुट दस इंच है। दुबला-पतला शरीर है, लेकिन कंधे चौड़े हैं। जिम नियमित नहीं जाता, फिर भी घर के काम और कभी-कभी दौड़ने से बाज़ुओं और सीने में हल्की मज़बूती आ गई है। चेहरा साफ़ है, हल्की दाढ़ी की लाइनें अभी नई-नई निकल रही हैं। बाल काले और थोड़े बिखरे हुए हैं। आँखें तेज़ हैं, लेकिन ज़्यादातर समय चुप रहता हूँ। घर में बोलता कम हूँ, देखता ज़्यादा हूँ।
पापा का नाम सुरेश है। उम्र करीब बयालीस-तैंतालीस। कद औसत, पेट थोड़ा निकला हुआ। बालों में सफ़ेदी आ चुकी है। चेहरे पर हमेशा एक थकी हुई गंभीरता रहती है। कपड़े साधारण पहनते हैं—पेंट-शर्ट, कभी-कभी कुर्ता। बातें कम करते हैं, भावनाएँ और भी कम दिखाते हैं।
पापा का बिज़नेस कपड़े का थोक व्यापार है। सूती और सिंथेटिक कपड़ों की सप्लाई—शर्टिंग, सूटिंग, साड़ियाँ, ड्रेस मटीरियल। लुधियाना-अमृतसर के बाज़ारों में पुराने पार्टनर हैं। ऑर्डर और माल पहुँचाने के चक्कर में हफ़्ते में तीन-चार दिन बाहर रहते हैं। घर का ख़र्च बहुत अच्छा चल जाता है।
अब आते हैं हमारी कहानी के सबसे प्रमुख पात्र पर—मेरी मम्मी।
मम्मी का नाम अंजलि है। उम्र सैंतीस। कद पाँच फुट पाँच इंच। देखने में सुंदर हैं—न ज़्यादा पतली, न ज़्यादा मोटी। साफ़ गोरा और चिकना रंग। लंबे काले बाल जो वे हमेशा सादे जूड़े में बाँधती हैं, लेकिन कभी-कभी गर्दन के पीछे से कुछ मुलायम लटें निकल आती हैं। घर में ज़्यादातर साड़ी या सूट पहनती हैं। साड़ी का पल्लू कभी कंधे से नहीं खिसकता। ब्लाउज़ हमेशा सिंपल रखते हैं, आधी आस्तीन वाला। घर में भी कोई लापरवाही नहीं। संस्कारी औरत हैं। घर का सारा काम वही संभालती हैं।
सुबह की दिनचर्या हमेशा एक जैसी होती है। छह बजते-बजते मम्मी उठ जाती हैं। सुबह की चाय, नाश्ता, पापा का काम के लिए बाहर जाना, मेरा कॉलेज। मम्मी मुझे जगाने आती हैं।
“पंकज, कब तक सोएगा? उठ जा। नाश्ता ठंडा हो जाएगा।”
मैं आलस भरी आँखों से उन्हें देखता हूँ। साधारण साड़ी, सिंपल ब्लाउज़। ब्लाउज़ उनकी छातियों की गोलाई को कसकर समेटे रहता है। चेहरे पर थकान है, लेकिन उस थकान में भी एक शांत सुंदरता है। इस सोशल मीडिया के ज़माने में किसी बुराई से अछूता था, ऐसा तो नहीं कह सकता। लेकिन अपनी माँ के बारे में कभी ग़लत नहीं सोचा था। हाँ, उनकी सुंदरता मुझे ज़रूर लुभाती थी, पर मुझे अपनी लिमिट्स पता थीं।
नाश्ते पर पापा अगर घर हों तो अख़बार लेकर बैठे होते हैं। मम्मी उनकी चाय बनाती हैं—अदरक वाली, हल्की मीठी।
पापा: “अंजलि, रमेश आया था। नया ऑर्डर मिला है। दो दिन अमृतसर जाना पड़ेगा।”
मम्मी चाय रखते हुए: “फिर? पिछले हफ़्ते भी गए थे न।”
पापा: “बिज़नेस है क्या करें। तू सँभाल ले। ये भी बड़ा हो गया है।”
मम्मी मेरी तरफ़ देखती हैं। “पढ़ाई का ध्यान रख। बस फ़ोन में मत लगा रह।”
“हाँ मम्मी।”
मैंने कई बार गौर किया है मम्मी के स्वभाव पर। वे कम बोलती हैं। शिकायत कभी नहीं करतीं। पापा के बार-बार बाहर जाने पर भी चेहरे पर सिर्फ़ हल्की थकान होती है, गुस्सा नहीं। लेकिन उनकी चुप्पी में एक अनकहा अकेलापन साफ़ दिखता है। घर में सब कुछ ठीक चल रहा होता है, फिर भी वे जैसे किसी खाली जगह में खड़ी हों।
एक दिन दोपहर को पापा घर नहीं थे। मम्मी छत पर कपड़े सुखा रही थीं। धूप तेज़ थी। साड़ी का पल्लू हवा में हल्का उड़ रहा था। वे बार-बार उसे ठीक कर रही थीं। ब्लाउज़ और साड़ी के बीच से झाँकती उनकी गोरी कमर की झलक दिखी। कपड़े टाँगने के बाद वे थोड़ी देर दीवार के सहारे खड़ी रहीं। आँखें बंद कर लीं। सीना हल्के से ऊपर-नीचे हो रहा था। बस दो-तीन पल। फिर खुद को सँभाला और नीचे आ गईं। ऐसे कई दृश्य मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थे जो मुझे बेचैन कर देते, लेकिन मैं जानता था कि मेरी उम्र भी ऐसे ही दौर से गुज़र रही थी।
शाम को कभी-कभी मम्मी किचन में अकेली बैठी चाय पी रही होती हैं। साड़ी का पल्लू गोद में रखा होता है। जब मैं पानी लेने जाता हूँ तो वे पूछती हैं, “तू भी ले ले?”
“नहीं मम्मी।”
वे सिर हिला देती हैं। आँखों में उस वक्त एक थकान होती है जो नींद की नहीं होती। मम्मी भी मुझसे कभी-कभी खुद ही बात कर लेती थीं। शायद उन्हें भी एहसास था कि इस उम्र में बेटे को एक दोस्त की तरह रखना चाहिए।
एक रात पापा तीन दिन के टूर पर थे। खाना खाते समय मम्मी ने अचानक पूछा, “पंकज, तुझे लगता है पापा घर कम रहते हैं?”
मैंने चौंककर देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी।
“हाँ… बिज़नेस है न मम्मी।”
वे हल्के से मुस्कुराईं। मुस्कान अधूरी थी। “हाँ। बिज़नेस है।” फिर चुप हो गईं। थोड़ी देर बाद बोलीं, “खाना और ले ले। ठंडा हो जाएगा। और जल्दी सो जाना, कल स्टोर रूम की सफ़ाई करनी है। बहुत कबाड़ पड़ा है घर में।”
उस रात मैंने देर तक सोचा। मम्मी ने शिकायत नहीं की थी। बस एक सवाल पूछा था। और उस सवाल के पीछे उनका अकेलापन साफ़ छिपा था। इसी सोच में डूबा मैं कब नींद की गोद में चला गया, मुझे पता नहीं।
अगले दिन दोपहर को मम्मी ने मुझे स्टोर रूम में बुलाया।
“पंकज, थोड़ा मदद कर दे। ऊपर वाली शेल्फ़ पर ये बॉक्स रखने हैं। मेरी पहुँच नहीं हो रही।”
स्टोर रूम में एक छोटी स्टूल पड़ी थी। मम्मी ने हल्के पाउडर पिंक रंग की साड़ी पहनी हुई थी—सिंपल, घर का रोज़ का रंग। ब्लाउज़ भी उसी टोन का। उन्होंने स्टूल पर चढ़कर ऊपर की शेल्फ़ की तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैं नीचे फर्श पर खड़ा था, बॉक्स पकड़े हुए। जब उन्होंने दोनों हाथ ऊपर उठाए तो साड़ी की पेटीकोट थोड़ी ढीली पड़कर नीचे सरक गई और ब्लाउज़ ऊपर को सरक गया।
उसी पल उनका चिकना पेट और गहरी नाभि एकदम मेरे चेहरे के सामने आ गई। साफ़, मुलायम, दूध जैसा गोरा। मैं नीचे खड़ा था और वे स्टूल पर। नज़र की दूरी बहुत कम रह गई थी। वह खुला हुआ चिकना पेट और गहरी नाभि कुछ पल के लिए पूरी तरह साफ़ दिख रही थी।
मैं एक पल के लिए हिल नहीं पाया।
मम्मी ने तुरंत ब्लाउज़ नीचे खींचा और पेटी कस ली। उनके चेहरे पर हल्की शर्मिंदगी थी। आवाज़ में थोड़ी जल्दी थी।
“यहाँ-वहाँ क्या देख रहा है… बॉक्स पकड़ अच्छे से। गिर न जाए।”
मैंने सिर झुकाए रखा और बॉक्स उनके हाथों की तरफ़ बढ़ा दिया। उन्होंने बॉक्स लिया और शेल्फ़ पर रख दिया। फिर सावधानी से स्टूल से उतर आईं।
“हो गया। जा, हाथ धो ले।”
मैं चुपचाप बाहर निकल आया। कमरे में आकर दरवाज़ा बंद किया। आँखें बंद कीं तो वही दृश्य फिर से आ गया—मम्मी स्टूल पर खड़ी, उनका खुला हुआ चिकना पेट, गहरी नाभि, और मेरा नीचे खड़ा होना। उनकी खूबसूरती को कभी इतनी नज़दीक से नहीं देखा था। मन में अजीब ख्याल आ रहे थे, लेकिन रिश्तों की दीवार सामने आ जाती थी।
शाम को मम्मी ने चाय बनाई। अब वे सलवार-कमीज़ में थीं। चेहरे पर अभी भी हल्की शर्मिंदगी के भाव थे, लेकिन मैंने ऐसा व्यवहार किया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मम्मी सब कुछ अकेले सँभालती हैं। पापा आते हैं, खाते हैं, चले जाते हैं। घर की दुनिया उनके कंधों पर टिकी है। और वे चुपचाप ढो रही हैं—अपने अकेलेपन के साथ, अपनी थकान के साथ, और अपनी उस सुंदरता के साथ जो कभी-कभी अनजाने में सामने आ जाती है।
ऐसे ही कई दिन बीत गए। कोई खास घटना नहीं हुई।
एक दिन पापा नाश्ता कर रहे थे। अख़बार एक तरफ़ पड़ा था। वे जल्दी में थे।
“अंजलि,” उन्होंने पराठे का एक टुकड़ा तोड़ते हुए कहा, “सुनो, आज एक लड़का आएगा। राहुल नाम है। मेरे पार्टनर गुप्ताजी का बेटा है।”
मम्मी किचन से बाहर आईं, हाथ पल्लू से पोंछती हुईं। “कौन राहुल? पहले तो कभी नहीं आया।”
पापा ने चाय का घूँट लिया। “अरे, नया-नया बिज़नेस में आया है। गुप्ताजी ने कहा है थोड़ा काम सिखा दूँ। आज कुछ ज़रूरी कागज़ात लेने आएगा। अगर मैं घर पर न मिलूँ, तो तुम उसे दे देना। मेरे दराज में लाल वाली फ़ाइल है, उसी में हैं।”
मम्मी ने सिर हिलाया, लेकिन उनके चेहरे पर हल्की सी झिझक थी। “ठीक है। लेकिन कोई अजनबी…”
पापा ने हाथ हिलाकर बात उड़ा दी। “अरे, अजनबी कैसा? गुप्ताजी का बेटा है। अपने ही घर का समझो। सीधा-साधा लड़का है। तुम बस कागज़ दे देना।”
मम्मी चुप हो गईं। उन्होंने एक बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक चिंता थी।
पापा उठ खड़े हुए। “चलो, मुझे देर हो रही है। तुम ध्यान रखना। और पंकज, तू भी थोड़ा घर में रहना, अगर मम्मी को ज़रूरत पड़े।”
“हाँ पापा,” मैंने कहा।
पापा चले गए। मम्मी ने दरवाज़ा बंद किया और एक गहरी साँस ली।
शाम को घर के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर एक लड़का खड़ा था। उम्र करीब छब्बीस। लंबा, साफ़-सुथरा। हल्के रंग की शर्ट और गहरे पेंट में। बाल अच्छे से कंगे हुए। चेहरे पर एक विनम्र मुस्कान। हाथ में लिफ़ाफ़ा।
“नमस्ते। मैं राहुल। सुरेश अंकल के पार्टनर का बेटा। अंकल घर पर हैं क्या?”
आवाज़ शांत और सभ्य थी।
पापा उस समय घर पर ही थे। वे बाहर आए। “अरे राहुल! आ जा बेटा। अंदर आ।”
राहुल ने जूते बाहर उतार कर अंदर कदम रखा। बैठक में जाकर कुर्सी पर बैठ गया।
पापा बोले, “अंजलि, चाय ला देना।”
मम्मी किचन से निकलीं। साड़ी पहने, पल्लू कंधे पर सही जगह पर। राहुल तुरंत खड़ा हो गया।
“नमस्ते आंटी।”
आवाज़ में इज़्ज़त थी। नज़रें मम्मी के चेहरे पर कुछ देर तक टिकी रहीं, लेकिन नीचे नहीं गईं।
मम्मी ने भी नमस्ते कहा। “बैठो। चाय लाती हूँ।”
वे किचन चली गईं। राहुल पापा से बिज़नेस की बातें करने लगा।
मम्मी चाय लेकर आईं। राहुल ने दोनों हाथों से कप लिया। “धन्यवाद आंटी।”
बीस-पच्चीस मिनट बाद राहुल उठा। “अंकल, पेपर्स दे दीजिए।”
पापा ने पेपर्स दिए। “ठीक है बेटा। मेहनत कर।”
राहुल ने मम्मी की तरफ़ मुँह किया। “नमस्ते आंटी। कष्ट दिया।”
मम्मी ने हल्के से मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं।”
राहुल चला गया। पापा बोले, “अच्छा लड़का है। सभ्य है।”
मम्मी ने सिर्फ़ “हम्म” किया और किचन चली गईं।
उस दिन राहुल में कोई उतावलापन नहीं था। लेकिन इस दिन ने हमारे आने वाले कल को किस तरह बदलना था, इसके बारे में किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा।
अगले दिन दोपहर का समय था। पापा जा चुके थे। मम्मी किचन में थीं। उन्होंने मुझे आवाज़ दी।
“पंकज, ज़रा यहाँ आना।”
मैं किचन में गया। मम्मी ने एक प्लास्टिक की थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई।
“बेटा, यह मेरी गुलाबी वाली साड़ी है। इसकी पेटी थोड़ी ढीली हो गई है। दर्ज़ी को देकर आना, कहना थोड़ा कस दे।”
मेरे मन में स्टोर रूम वाला दिन एकदम से सामने आ गया।
मैंने थैली ली। “ठीक है, मम्मी।”
“भूलना मत,” उन्होंने ज़ोर देकर कहा। “अगले हफ़्ते मुझे यही साड़ी पहननी है। पड़ोस में कीर्तन है।”
“नहीं भूलूँगा, मम्मी,” मैंने कहा और थैली अपने कमरे में रख दी।
लेकिन जैसा अठारह साल के लड़कों के साथ अक्सर होता है, मेरे दिमाग में हज़ार और चीज़ें थीं। दोस्तों के चैट, वीडियो गेम, कॉलेज का असाइनमेंट… साड़ी की पेटी कसवाने का काम दिमाग के किसी कोने में दब गया।
कॉलेज के व्हाट्सएप ग्रुप में रिया की पूल पार्टी वाली फ़ोटो आई। मैं उस फ़ोटो को देखकर उलझ गया। दोपहर को कमरे में थैली बिस्तर पर पटक दी और लैपटॉप खोल लिया। एक गेम दूसरे में बदलता गया। समय का पता ही नहीं चला।
शाम होते-होते जब नज़र थैली पर पड़ी तो खिड़की से बारिश शुरू हो चुकी थी। मैंने खुद को बहाना दिया—“कल सुबह दे आऊँगा।” और वह बात दिमाग से निकल गई।
करीब दस-बारह दिन बाद एक दोपहर राहुल अकेला आया। पापा घर नहीं थे। मैंने दरवाज़ा खोला।
“नमस्ते। अंकल घर पर हैं?”
“नहीं।”
राहुल ने लिफ़ाफ़ा आगे किया। “यह कागज़ रख देना।”
फिर बोला, “आंटी घर पर हैं क्या? नमस्ते कर लूँ।”
मैंने मम्मी को आवाज़ लगाई। मम्मी किचन से निकलीं। उन्होंने हल्के पाउडर ब्लू रंग का सलवार-कमीज़ पहना हुआ था। कमीज़ कमर तक सही बैठी थी। दुपट्टा कंधे पर था। उस दिन वे थकी हुई लग रही थीं। बालों की कुछ लटें गर्दन पर गिर रही थीं।
राहुल जब नमस्ते कर रहा था, तो उसकी नज़र एक पल के लिए उनके कमीज़ के गले और कमर पर चली गई। मम्मी ने तुरंत दुपट्टा ठीक कर लिया।
“नमस्ते आंटी। कागज़ देने आया हूँ।”
“रख दो। पानी पियोगे?”
“जी आंटी।”
मम्मी गिलास लेकर आईं। राहुल ने गिलास लेते समय उनकी उंगलियों को हल्का छू लिया। मम्मी ने गिलास छुड़ाया और एक कदम पीछे हटीं। “पी लो। फिर जाओ।”
वह मुस्कुराया और चला गया।
कुछ देर बाद बारिश होने लगी। मम्मी अपने कमरे में थीं। दरवाज़ा आधा खुला था। मैं पानी लेने गया तो उनकी आवाज़ सुनाई दी।
मैं रुक गया। नज़र अंदर चली गई।
मम्मी बिस्तर के किनारे बैठी थीं। पाउडर ब्लू सलवार-कमीज़ में। नमी की वजह से कपड़े शरीर पर चिपक गए थे। दुपट्टा एक तरफ़ पड़ा था। बाल पूरी तरह खुले हुए थे। कमीज़ की ऊपर की दो बटन खुली हुई थीं। गला नंगा था। छातियों की ऊपरी गोलाई साँस के साथ उठ-गिर रही थी।
वे खिड़की की तरफ़ देख रही थीं। उंगलियाँ बालों में फेर रही थीं। आँखें बंद थीं। साँसें धीरे-धीरे भारी हो रही थीं।
मैं दरवाज़े के पास खड़ा साँस थामे देखता रहा।
एक हफ़्ते बाद कीर्तन वाला दिन आया। मम्मी ने वही गुलाबी साड़ी पहनी जिसकी पेटी मैं दर्ज़ी को देना भूल गया था। उन्होंने बड़ी सावधानी से पहनी। पेटी दो बार बाँधी। पल्लू पिन से जमाया। बिल्कुल संस्कारी।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। राहुल था।
मम्मी चाय लेकर आईं। सोफे पर बैठते समय साड़ी का सिरा कुशन के नीचे दब गया। उठते समय साड़ी खिंच गई। पेटी ढीली पड़ गई। ब्लाउज़ ऊपर उठ गया।
एक पल के लिए मम्मी का दूध जैसा सफ़ेद, चिकना पेट और गहरी नाभि राहुल के बिल्कुल सामने नंगा हो गया।
राहुल की नज़रें वहीं जम गईं। आँखों में पहले हैरानी, फिर एक गहरी, प्यासी चमक आ गई।
मम्मी का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने जल्दी से कपड़े ठीक किए और कमरे में चली गईं।
कुछ देर बाद वे वापस आईं। साड़ी ठीक करके। चेहरा अभी भी लाल था। “मैं जा रही हूँ,” कहकर वे निकल गईं।
दरवाज़ा बंद होते ही राहुल की मुस्कान बदल गई। विनम्रता गायब हो गई। एक टेढ़ी, दुष्ट मुस्कान फैल गई।
वह मेरी तरफ़ मुड़ा।
“पंकज, तुम्हारा कोई छोटा भाई-बहन नहीं है?”
“नहीं… सिर्फ़ मैं हूँ।”
राहुल की मुस्कान और चौड़ी हो गई। “अच्छा… सिर्फ़ तू। और तेरी मम्मी।”
वह करीब आया। “तो फिर घर में… सिर्फ़ तुम दोनों ही रहते हो ज़्यादातर?”
मैं चुप रहा।
राहुल हँसा। वह हँसी साफ़ नहीं थी।
“मैं चलता हूँ। लेकिन पंकज… अपनी मम्मी का ख्याल रखना। और उन्हें मेरी तरफ़ से नमस्ते कह देना।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
घर में भारी सन्नाटा पसर गया।
मैं वहीं खड़ा रह गया। राहुल की टेढ़ी मुस्कान और उसका सवाल कानों में गूँज रहा था।
डेढ़ घंटे बाद मम्मी कीर्तन से वापस आईं। चेहरे पर बेचैनी थी। उन्होंने मुझसे पूछा, “उसने… कुछ कहा?”
मैंने झूठ बोला। “नहीं। बस कागज़ देकर चला गया।”
रात का खाना चुपचाप हुआ। मम्मी की उंगलियाँ काँप रही थीं। खाना खत्म करने के बाद वे पूजा के कोने में पहले से ज़्यादा देर तक खड़ी रहीं। हाथ जोड़े। सिर झुकाए। जैसे माफ़ी माँग रही हों।
मैं अपने कमरे में लेटा रहा। नींद नहीं आ रही थी।
मैं जानता था कि अब बहुत कुछ बदलने वाला है।
मम्मी की ढीली साड़ी सिर्फ़ एक हादसा नहीं थी।
वह एक दरवाज़ा था।
और राहुल उस दरवाज़े से अंदर आने की फ़िराक में था।
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Amazing start update soon
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अगले दिन सुबह एक छोटी सी घटना घटी।
मैं नहाने गया तो नल से पानी नहीं आया। बस कुछ बूँदें टपकीं। मम्मी किचन में थीं। उन्होंने भी देखा। दोनों नल बंद थे। छत पर जाकर देखा तो टंकी का पानी लगभग खत्म हो चुका था। और सबसे बड़ी बात—टंकी के नीचे वाला पाइप थोड़ा मुड़ा हुआ और लीक कर रहा था। सफाई के समय शायद ढक्कन उठाते वक्त जोर पड़ने से पाइप की फिटिंग ढीली हो गई थी।
मम्मी ने फोन पर पापा को बताया। पापा ने कहा, “कल सुबह प्लंबर भेज दूँगा। अभी रात है। बर्तनों में पानी भर लो जो बचा है।”
लेकिन सुबह तक पानी और कम हो गया। प्लंबर का कोई अता-पता नहीं। पापा का फोन व्यस्त आ रहा था।
दोपहर तक घर में पानी की किल्लत हो गई। मम्मी परेशान थीं। नहाने का, कपड़े धोने का, खाना बनाने का… सब अटक गया था।
पापा ने कुछ दिन पहले ही घर की छत पर लगी पानी की टंकी की सफाई की बात की थी। टंकी काफी दिनों से साफ नहीं हुई थी। अंदर काई जम गई थी। पानी में गंदी गंध आने लगी थी। लेकिन पापा सुबह ही चले गए थे। मैं कॉलेज में था। मम्मी ने सोचा कि अकेले ही टंकी साफ कर लेंगी।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
मम्मी ने दरवाजा खोला। दरवाजा खुलते ही उनकी साँसें एक पल के लिए थम गईं। सामने राहुल खड़ा था। हाथ में कुछ औजार और एक नया पाइप का टुकड़ा।
“आंटी, अंकल ने मुझे फोन किया। बोला टंकी खराब हो गई है। प्लंबर नहीं मिल रहा।”
यह झूठ था। पापा ने राहुल को फोन नहीं किया था। बातचीत में पापा ने अनजाने में कह दिया होगा कि घर में टंकी खराब हो गई है, प्लंबर नहीं मिल रहा और अंजलि परेशान है। राहुल ने मौका संभाल लिया और पापा से कह दिया कि वह खुद देख लेगा। पापा उस पर अभी भी बहुत भरोसा करते थे।
मम्मी दरवाजे पर खड़ी रहीं। उन्होंने हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी। पल्लू सिर पर लपेटा हुआ था। पसीने से गला और पीठ चिपक गए थे। ब्लाउज आधी आस्तीन वाला था। बाल जल्दबाजी में बाँधे हुए। चेहरे पर थकान साफ थी।
“नहीं… प्लंबर आ जाएगा,” मम्मी ने कहा।
राहुल ने धीरे से कहा, “आंटी, पानी के बिना कैसे रहेगा? पंकज भाई कॉलेज गए होंगे। आप अकेली परेशान होंगी। बस आधा घंटा लगता है। मैं ठीक कर देता हूँ।”
मम्मी ने एक पल सोचा। घर में पानी नहीं था।
“आंटी, अंकल ने खुद बोला था मुझे। कहा था—राहुल, टंकी वाला काम है। अगर तू अपनी आंटी की मदद कर दे तो अच्छा रहेगा।”
मम्मी ने उस पर भरोसा कर लिया। शायद इसलिए कि पापा अक्सर ऐसी बातें कहते थे—“राहुल अपना ही लड़का है।” उन्होंने सिर हिलाया और उसे अंदर आने दिया।
मम्मी आगे चलीं और राहुल पीछे। सीढ़ियाँ चढ़ते समय उसका ध्यान मम्मी के हिलते मादक नितंबों पर चला गया। उसने एक हल्की सी आह भरी। मम्मी ने चौंककर पीछे देखा। राहुल ने ऐसा मुँह बनाया जैसे बहुत गर्मी के कारण उसने ऐसा किया हो। दोनों छत पर पहुँचे।
धूप तेज थी। छत का फर्श गर्म था। टंकी के नीचे पाइप से पानी की धार धीरे-धीरे रिस रही थी। फर्श गीला और चिकना हो चुका था।
राहुल झुककर काम करने लगा। उसकी शर्ट पीठ से चिपक गई। मम्मी पास खड़ी थीं। कभी-कभी पानी की बाल्टी पकड़तीं, कभी पाइप संभालतीं।
तभी राहुल ने एक अजीब हरकत की। उसने अपनी शर्ट उतारकर एक तरफ रख दी। बनियान में वह टंकी के पास आया। मम्मी की निगाह उसके बाजुओं के मसल्स पर पड़ी। उन्होंने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं।
एक बार जब राहुल ने जोर से पाइप घुमाया तो पानी का छींटा सीधा मम्मी की साड़ी पर पड़ गया। पतली साड़ी पेट और कमर पर चिपक गई। कपड़ा गीला होकर शरीर से सट गया। गोरी त्वचा की आकृति साफ उभर आई।
मम्मी ने झट से पीछे कदम बढ़ाया। गाल लाल हो गए। उन्होंने पल्लू से गीला हिस्सा ढकने की कोशिश की, लेकिन कपड़ा और चिपक गया।
राहुल की नजर एक पल के लिए वहीं रुक गई। फिर उसने जल्दी से आँखें हटा लीं। आवाज में नमी थी।
“सॉरी आंटी… हाथ फिसल गया।”
मम्मी ने कुछ नहीं कहा। बस दुपट्टा कस लिया और थोड़ा दूर खड़ी हो गईं।
लेकिन राहुल अब पाइप के करीब था। उसने कहा, “आंटी, अंदर वाला कनेक्शन भी देखना पड़ेगा। बाहर से ठीक हो रहा है, लेकिन अंदर से भी ढीला हो सकता है। मैं देखता हूँ।”
टंकी का ढक्कन भारी था। राहुल ने उसे ऐसे उठा लिया जैसे फूल हो। उसने कहा कि वह अंदर जाता है, लेकिन मम्मी ने मना कर दिया और खुद टंकी के अंदर चली गईं। भीगे कपड़े से अंदर की दीवारें साफ करने लगीं। साफ-सफाई के दौरान मम्मी की साड़ी और गीली होने लगी।
राहुल ने पूछा, “आंटी, ये टंकी कितने साल से लगी है?”
“दस-बारह साल हो गए।”
“अंकल ने कभी बदलने की बात नहीं की?”
“नहीं। चल रही है तो ठीक है न।”
“आंटी, आप सब अकेले करती हैं न?”
“हाँ। आदत हो गई है।”
“इसे आदत नहीं, मजबूरी कहते हैं।”
मम्मी चुप हो गईं। उन्होंने टंकी की तरफ ध्यान दिया। लेकिन राहुल की यह बात उनके कानों में रह गई।
ढक्कन वापस लगाते समय राहुल का हाथ मम्मी के हाथ के बहुत पास आया। दोनों की उंगलियाँ एक पल के लिए छू गईं। मम्मी ने झटके से हाथ खींच लिया। राहुल ने कुछ नहीं कहा। बस हल्के से मुस्कुराया।
“आंटी, ढक्कन लग गया। अब पानी भर जाएगा।”
छत पर पानी जमा हो गया था। राहुल ने पानी की तरफ देखा और कुछ सोचकर मम्मी के ठीक पीछे आ गया। बहुत करीब। उसकी साँसें मम्मी की गर्दन पर महसूस हो रही थीं। मम्मी ने घबराकर कंधे मोड़े, लेकिन कुछ कहा नहीं।
तभी राहुल ने पीछे से एक हल्की सी हरकत की। शायद अपना पैर आगे बढ़ाया। अचानक मम्मी का पाँव फिसल गया।
“आह…!”
वे संतुलन खो बैठीं। शरीर पीछे की तरफ झुकने लगा। गिरने ही वाली थीं कि राहुल ने तेजी से हाथ बढ़ाया।
उसने उन्हें उनकी नंगी कमर से पकड़ लिया।
दोनों हथेलियाँ सीधी उनकी चिकनी त्वचा पर चिपक गईं। उंगलियाँ कमर के गोल हिस्से पर दब गईं। एक पल के लिए पूरी हथेली उनकी नंगी कमर को थामे हुए थी—गर्म, मुलायम, और पूरी तरह बेपर्दा।
मम्मी का शरीर राहुल की छाती से सट गया। उनकी साँस अटक गई। राहुल के हाथ उनकी कमर पर और कस गए, जैसे संभालने के बहाने उन्हें और करीब खींच रहा हो।
“सावधान आंटी…” उसकी आवाज कानों के पास थी, साँसें भारी। “फिसल गईं थीं।”
मम्मी ने तुरंत अपने को छुड़ाने की कोशिश की। गाल लाल हो चुके थे। साँसें तेज चल रही थीं।
लेकिन उसी पल राहुल ने एक और हरकत की।
अचानक उसने आगे से एक हल्का सा झटका दिया—जैसे संतुलन बनाने के बहाने। झटके से साड़ी और पेटीकोट नीचे की तरफ खिंच गई। साड़ी नाभि से तीन इंच नीचे आ गई। मौके का फायदा उठाते हुए उसका दूसरा हाथ तेजी से आगे बढ़ गया।
बहाने से उसकी हथेली सीधी मम्मी के नरम, चिकने, मुलायम पेट पर चिपक गई।
उंगलियाँ धीरे से नाभि के गड्ढे पर रुक गईं। गर्म, चिकनी त्वचा। हल्के पसीने से चमकती हुई। नाभि गहरी और नरम थी। राहुल की उंगलियाँ एक पल के लिए वहाँ दब गईं। फिर उसने एक उंगली नाभि के अंदर हल्के से घुसा दी।
मम्मी की आँखें चढ़ने लगीं। शरीर सख्त हो गया।
“क्या कर रहे हो…!” आवाज में घबराहट और शर्म दोनों थे।
राहुल ने हाथ नहीं हटाया तुरंत। उसकी हथेली अभी भी उनके पेट पर टिकी हुई थी। उंगली नाभि के अंदर हल्के दबाव के साथ रुकी रही—बस एक सेकंड के लिए। फिर उसने धीरे से हाथ खींचा।
मम्मी ने खुद पर काबू करते हुए खुद को राहुल से छुड़ाया।
“सॉरी आंटी… संभाल रहा था। आप गिर जातीं तो…” आवाज नरम थी, लेकिन साँसें भारी चल रही थीं। आँखों में वही प्यासी चमक थी।
मम्मी ने झटके से उसके हाथ धकेल दिए और पीछे हट गईं। साड़ी का पल्लू जल्दी से पेट पर लपेट लिया। गाल लाल हो चुके थे। पेट और नाभि पर अभी भी उसके हाथ और उंगली का गर्म अहसास बाकी था—जैसे कोई निशान छूट गया हो।
वे दोनों कुछ पल चुपचाप खड़े रहे। छत पर सिर्फ पानी की टप-टप की आवाज थी।
मम्मी ने आँखें नहीं मिलाईं। बस तेजी से पल्लू कस लिया और बोलीं, “काम खत्म हो गया। नीचे जाओ।”
राहुल ने सिर हिलाया। मुस्कान धीमी थी।
“जैसी आंटी की मर्जी।”
राहुल ने औजार समेटे और नीचे जाने लगा। लेकिन जब वह मुड़ा, तो उसकी नजर एक बार फिर मम्मी के पेट की तरफ गई—जहाँ कुछ पल पहले उसकी हथेली थी।
पानी फिर से आने लगा था। जाते समय वह थोड़ा रुक गया। आवाज धीमी थी।
“आंटी… दोबारा से पानी रुक जाए तो बताना। मैं निकाल दूँगा।”
उसके इस गंदे, दो अर्थ वाली बात को सुनकर मम्मी चौंक गईं। राहुल ने मुँह मोड़ लिया। उसके चेहरे पर अश्लील मुस्कान नाच रही थी। उसे पता था कि मम्मी उसे पीछे से देख रही हैं। उसने जानबूझकर अपने हाथों को चूमा—जैसे मम्मी की नरम कमर के अहसास को अपने हाथों पर महसूस कर रहा हो।
वह चला गया।
मैं शाम को घर आया तो मम्मी किचन में खड़ी थीं। साड़ी अभी भी थोड़ी नम लग रही थी। उन्होंने मुझसे टंकी वाली बात कही, लेकिन राहुल का नाम बहुत धीरे से लिया। जैसे खुद को याद न दिलाना चाहती हों।
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अगले दिन रात को जो हुआ, उसने हमारी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
मम्मी अभी किचन से फ्री होकर बैठी थीं और मैं अपनी स्टडी कर रहा था कि तभी मम्मी का फोन बज उठा। स्क्रीन पर पापा का नाम चमक रहा था।
मैंने झटके से फोन उठाया और कॉल रिसीव की।
“हाँ पापा,” मैंने जवाब दिया।
“पंकज, मेरी राहुल से अभी बात हुई। वो हमारे इलाके में किसी काम से आया था। अभी बाहर बारिश बहुत तेज़ हो गई है। रास्तों में पानी भर गया है और उसकी बाइक भी स्लिप कर रही थी,” पापा की आवाज़ में चिंता थी।
“तो… तो वो घर पहुँच गया ना?” मैंने उम्मीद करते हुए पूछा।
“अरे कहाँ! मैंने ही उसे रास्ते से वापस भेज दिया है। इतनी रात में और इतने खराब मौसम में मैं उस लड़के को खतरे में नहीं डाल सकता। मैंने उससे कह दिया है कि आज रात वो हमारे ही घर रुक जाए। बाहर वाले गेस्ट रूम में उसे सुला देना।”
पापा के ये शब्द मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे।
“पापा! नहीं! मेरा मतलब है… गेस्ट रूम की सफ़ाई नहीं हुई है। और… और वो चला जाएगा, वो कोई बच्चा थोड़ी है,” मैंने हताशा में कहा।
“कैसी बातें कर रहा है पंकज? वो हमारा अपना ही लड़का है। गेस्ट रूम गंदा है तो हॉल में सोफ़े पर बिस्तर लगा देना। उसे बोल दिया है मैंने, वो बस पहुँचता ही होगा। जा दरवाज़ा खोल। और अपनी मम्मी से कह दे कि उसे एक कंबल दे दें। मैं रखता हूँ।” पापा ने बात खत्म कर दी और फोन कट गया।
मैंने फोन नीचे रखा। मम्मी ने मेरी बात सुन ली थी। उनका चेहरा कागज़ की तरह सफ़ेद पड़ गया था। उनकी आँखों में वह खौफ़ था जो किसी जानवर को कसाई के सामने देखकर होता है।
“मम्मी…”
“नहीं…” मम्मी के होंठ हिले, लेकिन आवाज़ गले में ही अटक गई। “पंकज, वो रात भर यहाँ…”
तभी मेन गेट की घंटी बजी।
टन-टन…
इस बार यह घंटी किसी मौत के फ़रमान जैसी लग रही थी। वह दरिंदा जिसे मैं घर से बाहर रखना चाहता था, अब पूरी रात के लिए हमारे घर में दाखिल होने वाला था। और सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि मेरे ही पिता ने उसे यह हक़ दिया था।
मैंने मम्मी को हाथ पकड़कर उठाया। “आप अपने कमरे में जाओ। दरवाज़ा अंदर से लॉक कर लेना। चाहे जो हो जाए, दरवाज़ा मत खोलना। मैं बाहर हॉल में ही सोऊँगा।”
मम्मी बिना कुछ कहे लगभग भागते हुए अपने कमरे में गईं। मैंने उनके कमरे की कुंडी अंदर से बंद होने की ‘क्लिक’ की आवाज़ सुनी। उसके बाद मैं भारी कदमों से दरवाज़े की तरफ़ गया।
दरवाज़ा खोला। सामने राहुल खड़ा था।
वह बारिश में पूरी तरह भीग चुका था। उसकी टी-शर्ट उसके शरीर से चिपक गई थी, जिससे उसके कसे हुए मसल्स साफ़ दिख रहे थे। पानी उसके बालों से टपककर उसके चेहरे पर आ रहा था। लेकिन उस भीगे हुए चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह खून सुखा देने वाली थी।
“सॉरी पंकज भाई,” उसने एक नकली बेचारगी का नाटक करते हुए कहा। “अंकल ने इतनी ज़िद की कि मैं मना ही नहीं कर पाया। बोले, ‘तू मेरा बेटा है, बारिश में कुछ हो गया तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगा’।”
वह जानबूझकर ‘बेटा’ शब्द पर ज़ोर दे रहा था।
“अंदर आ जा,” मैंने कठोरता से कहा और किनारे हट गया।
वह अंदर आया। घर के बीचों-बीच खड़े होकर उसने अपने गीले बाल झटके। फिर उसकी नज़रें सीधे मम्मी के बंद दरवाज़े पर जाकर टिक गईं।
“आंटी सो गईं क्या? मुझे लगा शायद मेरे लिए तौलिया लेकर आएँगी,” उसने दरवाज़े की तरफ़ देखते हुए कहा।
“मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है। तौलिया मैं ले आता हूँ,” मैंने कहा।
मैं बाथरूम से एक तौलिया ले आया और उसकी तरफ़ फेंक दिया। उसने तौलिया पकड़ा और अचानक, बिना कुछ कहे, उसने अपनी गीली टी-शर्ट उतार दी। उसका नंगा, गठीला शरीर मेरे सामने था।
“अरे, भीग गया था ना… कपड़े तो सुखाने पड़ेंगे,” उसने बड़ी बेशर्मी से कहा और अपनी टी-शर्ट को सोफ़े के किनारे पर डाल दिया।
“तू इसी सोफ़े पर सोएगा। ये रहा कंबल,” मैंने सेंटर टेबल पर कंबल रखते हुए कहा। “और सुन… बाथरूम हॉल के इस तरफ़ है।”
राहुल तौलिए से अपने बाल पोंछ रहा था। उसने तौलिए के पीछे से मुझे देखा। उसकी आँखों में एक खतरनाक, भूखी चमक थी।
“अरे भाई, तुम इतना क्यों घबरा रहे हो?” वह धीरे से मेरे करीब आया। उसकी आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई थी। “मैं तो बस यहाँ… रखवाली करने आया हूँ। अंदर की चीज़ें… महफ़ूज़ रहनी चाहिए, है ना?”
उसकी बात का इशारा इतना गंदा था कि मेरा हाथ खुद-ब-खुद मुट्ठी में बँध गया।
“जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, पंकज भाई,” उसने कंबल उठाया और सोफ़े पर पसर गया।
मैंने हॉल की लाइट बंद कर दी। सिर्फ़ एक छोटा सा नाइट बल्ब जल रहा था। मैं अपने कमरे में गया, लेकिन मैंने अपना दरवाज़ा खुला रखा ताकि मेरी सीधी नज़र हॉल और मम्मी के कमरे के दरवाज़े पर रहे। मैं अपनी कुर्सी खींचकर दरवाज़े के ठीक सामने बैठ गया।
बाहर बारिश ज़ोरों से हो रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट और घर के अंदर पसरा वह भयानक सन्नाटा—दोनों मिलकर एक खौफ़नाक माहौल बना रहे थे।
रात के बारह बज चुके थे। घर में अँधेरा था। सोफ़े की तरफ़ से राहुल के गहरी साँसें लेने की आवाज़ आ रही थी, जैसे वह सो गया हो। लेकिन मुझे पता था कि वह सोया नहीं है। वह बस इंतज़ार कर रहा था।
और मम्मी… मैं जानता था कि दीवार के उस पार, अपने बिस्तर पर सिकुड़ी हुई मम्मी भी नहीं सोई होंगी। आज रात, इस घर में कोई भी नहीं सोने वाला था।
रात के करीब दो बज चुके थे। बाहर बारिश की आवाज़ अब एक डरावनी धुन की तरह लग रही थी। नाइट बल्ब की हल्की पीली रोशनी में हॉल का दृश्य किसी डरावने सपने जैसा था।
मैं अपनी कुर्सी पर बैठा था। मेरी आँखें सामने सोफ़े पर टिके राहुल के शरीर पर थीं। उसने कंबल आधा हटा दिया था। उसका चौड़ा सीना और गठीले बाइसेप्स उस हल्की रोशनी में भी साफ़ चमक रहे थे।
तभी… हॉल के सन्नाटे में एक हल्की सी आवाज़ गूँजी।
चररर…
मेरे पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई।
यह आवाज़ मम्मी के कमरे के दरवाज़े की थी। कुंडी खुलने की आवाज़।
मैंने अपनी साँस रोक ली। अँधेरे में मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। मम्मी के कमरे का दरवाज़ा बहुत धीरे-धीरे खुला। एक नंगे, गोरे पैर ने बाहर हॉल के फ़र्श पर कदम रखा।
मम्मी बाहर आ गई थीं।
उन्होंने वही ढीला सूट पहना हुआ था। नींद में करवटें बदलने की वजह से उनका दुपट्टा खिसक कर एक कंधे पर झूल रहा था। उनके एक हाथ में खाली स्टील का गिलास था। शायद गला सूख गया था और वे किचन से पानी लेने आई थीं।
उन्हें लगा होगा कि राहुल सो गया है। और उन्हें यह भी लगा होगा कि मैं अपने कमरे में सो रहा हूँ।
वे दबे पाँव किचन की तरफ़ बढ़ने लगीं। किचन तक जाने के लिए उन्हें उस सोफ़े के पास से गुज़रना था जहाँ राहुल लेटा हुआ था।
मैं चीखकर उन्हें रोकना चाहता था—‘मम्मी, वापस जाओ! वो जाग रहा है!’ लेकिन मेरे होंठ सिले हुए थे। मेरी वह बीमार मानसिकता मुझे रोकने के बजाय तमाशा देखने पर मजबूर कर रही थी।
मैंने धीरे से अपना हाथ अपनी पैंट की ज़िप पर रखा।
मम्मी सोफ़े के करीब पहुँचीं। उनकी नज़रें सोफ़े पर थीं, यह पक्का करने के लिए कि राहुल सो रहा है।
लेकिन जैसे ही वे सोफ़े के ठीक सामने से गुज़रने लगीं, अँधेरे में एक आवाज़ गूँजी।
“प्यास लगी है… आंटी?”
मम्मी के कदम वहीं जम गए। उनके हाथ से स्टील का गिलास छूटकर नीचे गिरा, लेकिन ज़मीन पर टकराने से पहले ही अँधेरे से एक मज़बूत हाथ बिजली की फ़ुर्ती से निकला और उसने हवा में ही गिलास को पकड़ लिया।
वह राहुल का हाथ था।
मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली, जिसे उन्होंने तुरंत अपने दूसरे हाथ से दबा लिया। वे दो कदम पीछे हटीं।
राहुल धीरे से सोफ़े से उठा। वह कमर से ऊपर पूरी तरह नंगा था। नाइट बल्ब की रोशनी उसके चौड़े सीने और गठीले पेट पर पड़ रही थी। वह बिल्कुल एक भूखे शेर की तरह लग रहा था।
“इतनी रात को… अकेले बाहर नहीं आना चाहिए था,” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। वह गिलास लेकर मम्मी की तरफ़ बढ़ा।
“मु… मुझे पानी लेना है… तुम सो जाओ,” मम्मी की आवाज़ काँप रही थी।
“लाइए, मैं पिला देता हूँ,” राहुल ने उनके बिल्कुल करीब आकर कहा।
मम्मी पीछे हटना चाहती थीं, लेकिन उनकी पीठ डाइनिंग टेबल से टकरा गई। अब उनके पास पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं था। राहुल उनके और करीब आ गया। उनके बीच मुश्किल से एक इंच का फ़ासला था। राहुल का नंगा, गर्म शरीर लगभग मम्मी के कपड़ों को छू रहा था।
मैंने धीरे से अपनी ज़िप खोल दी। मेरे अंदर का वह नामर्द और हवसी बेटा अब पूरी तरह जाग चुका था।
राहुल ने जग से गिलास में पानी डाला और मम्मी के होठों के पास ले गया। मम्मी डर के मारे काँप रही थीं। उन्होंने गिलास अपने हाथों में लेना चाहा, लेकिन राहुल ने गिलास नहीं छोड़ा।
“पी लीजिए आंटी… गला बहुत सूख रहा है आपका,” उसने गहरी आवाज़ में कहा।
मम्मी ने डरते-डरते पानी का घूँट भरा। उनके होंठ काँप रहे थे, जिसकी वजह से पानी की कुछ बूँदें उनके होठों से छलक कर उनकी ठुड्डी और फिर गले से होती हुई उनके सीने तक बह गईं।
राहुल की आँखें उस पानी की बूँद का पीछा कर रही थीं।
“पानी गिर गया,” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाया। उसने अपना गिलास नीचे रखा और अपना बड़ा, खुरदरा हाथ मम्मी के गले की तरफ़ बढ़ा दिया।
“राहुल… नहीं…” मम्मी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
राहुल के हाथ नहीं रुके। उसके अँगूठे ने मम्मी के गले पर गिरी पानी की बूँद को पोंछा। उसकी खुरदरी उंगलियाँ मम्मी के गोरे, मुलायम गले को सहलाने लगीं। मम्मी ने आँखें कसकर बंद कर लीं। उनका शरीर बुरी तरह काँप रहा था।
“कितना डरती हैं आप…” राहुल ने अपना चेहरा उनके कान के पास ले जाकर कहा। “पंकज तो अंदर गहरी नींद में है। अंकल शहर से बाहर हैं। फिर ये घबराहट कैसी?”
यह कहते हुए राहुल का हाथ गले से नीचे खिसका और उसने मम्मी के सूट के ऊपर से उनके कॉलरबोन को छुआ। मम्मी की साँसें तेज़ हो गईं।
“छोड़ो मुझे… मुझे जाने दो…” मम्मी ने उसे अपने दोनों हाथों से धकेलने की कोशिश की। लेकिन राहुल एक पहाड़ की तरह वहीं खड़ा रहा।
उसने मुस्कुराते हुए मम्मी के दोनों हाथों को अपनी एक ही मज़बूत मुट्ठी में पकड़ लिया और उनके हाथों को नीचे कर दिया। अब मम्मी पूरी तरह उसके सामने बेबस थीं।
मेरा हाथ मेरे शरीर पर तेज़ी से चलने लगा था।
राहुल का दूसरा हाथ नीचे गया। उसने मम्मी की कमर पर हाथ रखा—बिल्कुल उसी जगह जहाँ कल छत पर पकड़ा था।
“कल छत पर आप बहुत जल्दी में थीं, आंटी… मैंने तो ठीक से अंदर की ‘फ़िटिंग’ चेक भी नहीं की थी,” राहुल ने बेशर्मी से कहा।
उसने अपनी उंगलियों से मम्मी के सूट के कपड़े को कसकर मुट्ठी में पकड़ा और हल्का सा ऊपर की तरफ़ खींचा।
“आह…” मम्मी के मुँह से एक दबी हुई, सिसकती हुई आह निकली।
राहुल ने अपना हाथ सूट के अंदर सरका दिया। उसकी बड़ी सी हथेली मम्मी के उसी मुलायम, गोरे पेट पर थी। और उसकी एक उंगली फिर से उनकी गहरी नाभि को टटोल रही थी।
मम्मी का सिर पीछे की तरफ़ लुढ़क गया। उन्होंने अपने दाँतों से अपना निचला होंठ ज़ोर से काट लिया। उनका शरीर राहुल के उस नंगे, गठीले शरीर से सट गया था।
राहुल की उंगलियाँ मम्मी के पेट पर घूम रही थीं जब अचानक उसकी नज़र अँधेरे में मेरे कमरे की तरफ़ चली गई। दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था। नाइट बल्ब की मद्धम रोशनी में उसने मेरी आँखों की चमक पकड़ ली।
उसके चेहरे पर एक धीमी, खतरनाक मुस्कान फैल गई।
वह समझ गया था।
मैं देख रहा हूँ।
राहुल ने मम्मी को और कसकर अपनी ओर खींच लिया। एक हाथ उनकी कमर पर था, दूसरा उनके सिर के पीछे। उसने धीरे से मम्मी का चेहरा मेरे कमरे की तरफ़ घुमा दिया।
“देखो आंटी…” उसने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। “उधर… अँधेरे में।”
मम्मी की आँखें मेरे कमरे के खुले दरवाज़े पर ठहर गईं। लेकिन अँधेरा इतना गहरा था कि उन्हें कुछ दिखाई नहीं दिया।
“क्या… क्या है वहाँ?” मम्मी की आवाज़ काँप रही थी।
राहुल हल्का सा हँसा। “कुछ नहीं आंटी… बस अँधेरा है।”
फिर उसने वह किया जो मैं चाहता था।
उसने मम्मी के सूट के कुर्ते को दोनों हाथों से पकड़ा और धीरे-धीरे ऊपर की तरफ़ खींच दिया। कपड़ा उनकी कमर से सरकते हुए ऊपर उठने लगा। पहले मम्मी की गहरी नाभि दिखाई दी, फिर पूरा पेट, फिर पसलियों का निचला हिस्सा। गोरी, मुलायम त्वचा नाइट बल्ब की रोशनी में चमक उठी। राहुल ने कुर्ते को और ऊपर खींचकर ठीक उनके स्तनों के नीचे इकट्ठा कर दिया। कपड़ा वहीं अटका दिया गया। अब मम्मी का पूरा पेट और पसलियाँ नंगी थीं।
उसी हाथ से उसने नीचे की तरफ़ भी काम किया। उनकी सलवार को पकड़कर तीन इंच नीचे खींच दिया। नाभि के गड्ढे से काफ़ी नीचे तक कपड़ा सरक गया। गहरी नाभि पूरी तरह बेपर्दा हो गई।
मम्मी के मुँह से एक लंबी, दबी हुई कराह निकल गई। “आह्ह…” शरीर काँप उठा।
मम्मी ने झटके से उसके हाथ पकड़ने की कोशिश की। “नहीं… राहुल… मत करो…”
लेकिन राहुल ने उनके हाथ आसानी से हटा दिए। कुर्ता स्तनों के ठीक नीचे अटका हुआ था और सलवार नाभि से तीन इंच नीचे। मम्मी का गोरा, चिकना पेट नंगा था।
मेरी साँसें अटक गईं। मेरा हाथ और तेज़ हो गया। उत्तेजना सिर तक चढ़ गई थी।
राहुल ने मम्मी के कान के पास मुँह लाते हुए कहा, “पंकज सो रहा है न? तो फिर डर किस बात का?”
यह कहते हुए उसने मम्मी के कान की लौ को मुँह में भर लिया। एक पल के लिए मम्मी के मुँह से हल्की कराह निकली और उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
मम्मी की आँखें अभी भी मेरे कमरे के अँधेरे दरवाज़े पर थीं। वे काँप रही थीं। उनके नंगे पेट पर राहुल की उंगलियाँ घूम रही थीं—नाभि के आसपास, फिर थोड़ा ऊपर, फिर नीचे। हर स्पर्श पर उनके मुँह से हल्की कराहें निकल रही थीं।
मैं पागल हो रहा था।
राहुल ने मम्मी के नंगे पेट पर अपना गरम हाथ फेरा और धीरे से बोला, “कितना मुलायम शरीर है आपका आंटी… पंकज को पता भी नहीं होगा कि उसकी माँ कितनी… हम्म।”
मम्मी ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ काँप रहे थे। एक आँसू उनकी आँख से निकलकर गाल पर बह गया। एक और कराह उनके गले से फूट निकली।
और मैं अँधेरे में बैठा, हाँफता हुआ, अपनी माँ का नंगा पेट देखता रहा।
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राहुल ने अपनी उंगलियाँ मम्मी की सलवार के अंदर और गहराई तक घुसा दीं। मम्मी का शरीर एक झटके से तन गया। उनके मुँह से एक लंबी, दबी हुई कराह निकली, जिसे वे अपने होंठ काटकर रोकना चाहती थीं, लेकिन रोक नहीं पाईं।
“आह्ह…” उनकी आवाज़ सिसकी और कराह के बीच खो गई।
राहुल ने धीरे-धीरे उंगलियाँ घुमाईं। मम्मी के घुटने काँपने लगे। उनका शरीर राहुल के नंगे सीने पर और ज़ोर से टिक गया। कुर्ता अभी भी स्तनों के नीचे अटका हुआ था। सलवार नाभि से नीचे खिसकी हुई। पूरा पेट और उससे नीचे का हिस्सा नाइट बल्ब की रोशनी में चमक रहा था।
राहुल ने अपना दूसरा हाथ कुर्ते के अंदर और ऊपर बढ़ाया। उसकी हथेली अब मम्मी के एक स्तन के निचले हिस्से को थामे हुए थी। उसने हल्के से दबाया और उंगलियों से धीरे-धीरे सहलाया।
मम्मी का सिर पीछे की तरफ़ लुढ़क गया। आँखें बंद थीं। होंठ काँप रहे थे। एक आँसू के बाद दूसरा आँसू उनके गाल पर बह रहा था। लेकिन उनके शरीर की प्रतिक्रिया अब सिर्फ़ डर की नहीं रह गई थी। साँसें तेज़ थीं। पेट के निचले हिस्से में हल्के-हल्के संकुचन हो रहे थे।
राहुल ने यह महसूस कर लिया।
उसने मम्मी के कान में फ़ुसफ़ुसाया, “आपका शरीर तो आपसे ज़्यादा ईमानदार है आंटी… मुँह से ‘नहीं’ कह रही हो, लेकिन अंदर… गीली हो चुकी हो।”
मम्मी ने सिर हिलाने की कोशिश की, लेकिन राहुल ने उनके बाल पकड़कर सिर को स्थिर रख दिया। उसने फिर से मम्मी का चेहरा मेरे कमरे की तरफ़ घुमाया।
“आँखें खोलो। उधर देखो।”
मम्मी ने आँखें खोलीं। अँधेरे दरवाज़े की तरफ़। उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। वे नहीं जानती थीं कि उनका बेटा वहाँ बैठा है, हाँफता हुआ, अपना हाथ तेज़ी से चलाता हुआ।
राहुल की उंगलियाँ नीचे और तेज़ हो गईं। मम्मी के मुँह से छोटी-छोटी कराहें लगातार निकलने लगीं। वे राहुल की बाँह को इतनी ज़ोर से पकड़े हुए थीं कि उनके नाखून उसकी त्वचा में गड़ गए थे।
“पंकज… आह्ह… जाग… ” मम्मी ने सिसकते हुए कहने की कोशिश की।
राहुल हल्का-सा हँसा। “तो क्या होगा आंटी? तुम्हारा बेटा देख लेगा कि उसकी माँ कितनी… गरम है?”
यह कहते हुए उसने उंगलियों का दबाव और बढ़ा दिया। मम्मी का शरीर एक तेज़ झटके से काँप उठा। उनके मुँह से एक तेज़ कराह निकली, जिसे उन्होंने तुरंत दबाने की कोशिश की।
मैं अँधेरे में बैठा यह सब देख रहा था। मेरी साँसें अब काबू में नहीं थीं। मेरा हाथ पागलों की तरह चल रहा था। मेरी माँ का नंगा पेट, उनके काँपते स्तनों का निचला हिस्सा, राहुल का हाथ उनके सबसे निजी अंग में घूमता हुआ—सब कुछ मेरे सामने था।
मुझे रोकना चाहिए था।
चीखना चाहिए था।
राहुल को धक्का देकर हटाना चाहिए था।
लेकिन मैं कुछ नहीं कर रहा था।
मैं सिर्फ़ देख रहा था।
और उस देखने में एक गंदी, पागल कर देने वाली उत्तेजना मिल रही थी।
राहुल ने मम्मी को और कसकर अपनी ओर खींच लिया। अब उनका पूरा शरीर उसके नंगे शरीर से चिपक गया था। उसने मम्मी के कान की लौ को फिर से मुँह में ले लिया और धीरे से चूसा।
मम्मी की कराहें अब लगातार निकल रही थीं। शरीर काँप रहा था। पैर लगभग जवाब दे चुके थे। राहुल ही उन्हें थामे हुए था।
“आज रात लंबी है आंटी…” राहुल ने धीरे से कहा। “और पंकज… गहरी नींद में है।”
मैं अँधेरे में बैठा, हाँफता हुआ, अपनी माँ को एक दरिंदे के हाथों में तड़पता हुआ देख रहा था। और उस पल मुझे पता चल गया था—यह रात अब वापस नहीं आने वाली थी।
राहुल की उंगलियाँ अभी भी मम्मी के अंदर थीं, जब उसने अचानक मम्मी को अपनी बाँहों में कस लिया और उन्हें ज़मीन से उठा लिया।
मम्मी ने घबराकर हाथ-पैर पटकने शुरू कर दिए। “नहीं… छोड़ो… कहाँ ले जा रहे हो… राहुल… नहीं!”
लेकिन राहुल उनकी बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहा था। वह मम्मी को गोद में उठाए हुए सीधे उनके कमरे की तरफ़ बढ़ गया। मम्मी उसके सीने पर मुक्के बरसा रही थीं, लेकिन उनकी ताक़त उसके सामने कुछ नहीं थी।
मैं अँधेरे में बैठा यह सब देख रहा था। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मैं उठना चाहता था। रोकना चाहता था। लेकिन शरीर जैसे जड़ हो गया था। उत्तेजना और डर दोनों ने मुझे कुर्सी से चिपका रखा था।
राहुल ने मम्मी के कमरे का दरवाज़ा लात मारकर खोला और अंदर घुस गया। उसने मम्मी को बिस्तर पर पटक दिया। मम्मी तुरंत उठने की कोशिश करने लगीं, लेकिन राहुल ने उनके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए।
“छोड़ो… प्लीज़… पंकज जाग जाएगा…” मम्मी सिसकते हुए बोलीं। उनकी आँखों में आँसू थे।
राहुल ने उनके ऊपर झुकते हुए कहा, “सो रहा है वह। और अगर जाग भी गया… तो क्या? देख लेगा।”
मम्मी ने सिर इधर-उधर हिलाना शुरू कर दिया। “नहीं… मत करो… मैं तुम्हारी आंटी हूँ…”
राहुल हल्का-सा हँसा। उसने मम्मी के दोनों हाथ एक हाथ से पकड़ रखे और दूसरे हाथ से उनका कुर्ता पूरी तरह ऊपर कर दिया। अब उनके स्तन सिर्फ़ ब्रा में थे। फिर उसने सलवार को और नीचे खींच दिया। नाभि के काफ़ी नीचे तक सब नंगा हो चुका था।
मम्मी हिलने-डुलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन राहुल का शरीर उनके ऊपर भारी पड़ रहा था।
फिर राहुल ने अपना सिर नीचे झुकाया।
पहले उसने मम्मी के पेट पर एक हल्का-सा चुंबन लिया। फिर नाभि के ठीक ऊपर। मम्मी का शरीर एक झटके से तन गया।
“आह्ह…” उनके मुँह से एक लंबी कराह निकल गई।
“इस ज़ालिम पेट ने मुझे बहुत परेशान किया हुआ है। आज इसे नहीं छोड़ने वाला,” राहुल ने कहा।
और अपनी जीभ निकालकर मम्मी की गहरी नाभि के आसपास धीरे-धीरे चाटा। फिर जीभ को नाभि के गड्ढे में डाल दिया और घुमाया।
मम्मी के मुँह से और तेज़ कराहें निकलने लगीं। “नहीं… वहाँ मत… आह्ह… छोड़ो…”
लेकिन उनकी आवाज़ में अब सिर्फ़ विरोध नहीं रह गया था। कराहों में एक अजीब-सी कमज़ोरी घुल गई थी। शरीर काँप रहा था। पेट की मांसपेशियाँ हल्के-हल्के संकुचित हो रही थीं।
राहुल ने मम्मी के पूरे पेट पर गीले चुंबन लगाने शुरू कर दिए। कभी नाभि के आसपास, कभी थोड़ा ऊपर, कभी पसलियों के नीचे। हर चुंबन पर मम्मी की कराहें निकल रही थीं। वे अब राहुल के बालों को पकड़ने लगी थीं—धकेलने के लिए नहीं, बल्कि सहने के लिए।
मैं अपने कमरे के दरवाज़े से यह सब देख रहा था। मेरी साँसें उखड़ चुकी थीं। मेरा हाथ पागलों की तरह चल रहा था। मेरी माँ बिस्तर पर लेटी हुई थीं, उनका पेट नंगा था, और एक गैर मर्द उनकी नाभि और पेट को चूम-चाट रहा था। मम्मी कराह रही थीं।
राहुल ने अपना चेहरा मम्मी के पेट से उठाया। उसके होंठ चमक रहे थे। उसने मम्मी की आँखों में देखते हुए कहा, “कितनी मीठी हो आंटी… नाभि तक।”
फिर उसने फिर से सिर झुकाया और मम्मी की नाभि को ज़ोर से चूसने लगा।
मम्मी का शरीर एक तेज़ लहर की तरह काँप उठा। उनके मुँह से एक लंबी, दबी हुई चीख निकल गई, जिसे उन्होंने तुरंत अपने हाथ से दबा लिया।
और मैं अँधेरे में खड़ा, हाँफता हुआ, अपनी माँ को बिस्तर पर तड़पता हुआ देखता रहा।
राहुल मम्मी के पेट और नाभि को चूमता रहा। उसकी जीभ नाभि के गड्ढे में घूम रही थी, कभी हल्के से चाटती, कभी ज़ोर से चूसती। मम्मी बिस्तर पर कराह रही थीं। उनके हाथ कभी राहुल के बाल पकड़ते, कभी चादर को मरोड़ते। शरीर लगातार काँप रहा था।
“आह्ह… बस करो… राहुल… मत करो…” उनकी आवाज़ अब पूरी तरह टूटी हुई थी। कराहें और सिसकियाँ एक-दूसरे में घुल गई थीं।
राहुल ने अचानक सिर उठाया। उसके होंठ मम्मी के पेट की चमक से गीले थे। उसने मम्मी की आँखों में देखा और फिर दोनों हाथ उनके ब्रा के पीछे ले गया।
मम्मी ने समझते ही आँखें फाड़ दीं। “नहीं… वो मत… प्लीज़…”
लेकिन राहुल ने एक झटके में ब्रा का हुक खोल दिया। ब्रा ढीली पड़ गई। उसने दोनों हाथों से उसे खींचकर मम्मी के हाथों से ऊपर की तरफ़ सरका दिया और एक तरफ़ फेंक दिया।
अब मम्मी के दोनों स्तन पूरी तरह नंगे थे। गोरे, मुलायम, और उत्तेजना से हल्के तने हुए। नाइट बल्ब की रोशनी में उनकी नोकें साफ़ चमक रही थीं।
मम्मी ने तुरंत दोनों हाथों से अपने स्तन ढँकने की कोशिश की, लेकिन राहुल ने उनके हाथ पकड़कर सिर के दोनों तरफ़ दबा दिए।
“इतने छुपाए क्यों रखती हो आंटी…” उसने धीरे से कहा।
फिर उसने सिर झुकाया और बिना किसी चेतावनी के मम्मी के एक स्तन की नोक को मुँह में भर लिया।
मम्मी के मुँह से एक तेज़ कराह निकल गई। “आह्ह्ह…!”
राहुल ने बेरहमी से चूसना शुरू कर दिया। दाँतों से हल्के-हल्के काटते हुए, जीभ से नोक को दबाते हुए, ज़ोर-ज़ोर से खींचते हुए। मम्मी का शरीर बिस्तर पर उछलने लगा। वे राहुल के सिर को धकेलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनकी उंगलियाँ उल्टे उसके बालों में फँस गईं।
“नहीं… दर्द… हो रहा है… छोड़ो…” मम्मी सिसकते हुए बोलीं, लेकिन राहुल रुका नहीं।
वह एक स्तन को ज़ोर-ज़ोर से चूसता रहा, फिर दूसरे पर चला गया। वहाँ भी वही बेरहमी। नोक को दाँतों के बीच दबाकर खींचना, जीभ से घुमाना, ज़ोर से चूसना। मम्मी की कराहें अब कमरे में गूँज रही थीं। वे अपने होंठ काट-काट कर आवाज़ दबाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन आवाज़ रुक नहीं रही थी।
राहुल ने एक स्तन को मुँह से छोड़ा। नोक गीली और लाल हो चुकी थी। उसने तुरंत दूसरे स्तन को फिर से मुँह में ले लिया और पहले से भी ज़्यादा ज़ोर से चूसने लगा।
मम्मी का शरीर एक तेज़ लहर की तरह काँप उठा। उनके मुँह से एक लंबी, दबी हुई चीख निकल गई। आँखों से आँसू बह रहे थे। पैर बेकाबू हो रहे थे।
मैं दरवाज़े के पास अँधेरे में खड़ा यह सब देख रहा था। मेरी साँसें पूरी तरह उखड़ चुकी थीं। मेरा हाथ पागलों की तरह चल रहा था। मेरी माँ बिस्तर पर नंगी पड़ी थीं, उनके स्तन एक गैर मर्द के मुँह में थे, और वह उन्हें बेरहमी से चूस रहा था। मम्मी कराह रही थीं। तड़प रही थीं।
और मैं…
मैं सिर्फ़ देख रहा था।
और उस देखने में डूबता जा रहा था।
राहुल अभी भी मम्मी के स्तनों को बेरहमी से चूस रहा था। एक नोक उसके मुँह में थी, दूसरी उसके हाथ में मसली जा रही थी। मम्मी बिस्तर पर कराह रही थीं। शरीर काँप रहा था। आँखें बंद थीं। आँसू बह रहे थे।
अचानक राहुल ने स्तन को मुँह से छोड़ा। दोनों नोकें अब गीली, लाल और सूजी हुई थीं। उसने मम्मी की आँखों में देखा—उनमें डर और थकान दोनों थे—फिर अपना शरीर थोड़ा नीचे खिसकाया।
मम्मी ने तुरंत समझ लिया। उन्होंने पैर जोड़कर बंद करने की कोशिश की। “नहीं… राहुल… वो मत… प्लीज़ छोड़ो…”
लेकिन राहुल ने उनके दोनों घुटनों को पकड़कर ज़ोर से अलग कर दिया। मम्मी की सलवार पहले से ही नाभि से तीन इंच नीचे खिसकी हुई थी। राहुल ने दोनों हाथों से उसे पकड़ा और एक झटके में नीचे की तरफ़ खींच दिया।
सलवार मम्मी की जाँघों से सरकती हुई उनके घुटनों तक आ गई। राहुल ने फिर से ज़ोर लगाया। सलवार पूरी तरह निकलकर उनके पैरों से बाहर हो गई और बिस्तर के किनारे गिर पड़ी।
अब मम्मी सिर्फ़ अपनी घरेलू सफ़ेद पैंटी में थीं। ब्रा पहले ही उतार दी गई थी। नीचे सलवार गायब। उनका जाँघों का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह नंगा था। पैंटी पतली थी और शरीर से सटी हुई।
मम्मी ने तुरंत दोनों हाथों से अपने नीचे के हिस्से को ढँकने की कोशिश की। “नहीं… प्लीज़… छोड़ो मुझे… पंकज…”
राहुल ने उनके हाथ पकड़कर फिर से सिर के ऊपर दबा दिए। उसकी नज़रें मम्मी के नंगे पेट से होती हुई पैंटी पर ठहर गईं। उसने एक हाथ से मम्मी की जाँघ के अंदरूनी हिस्से को सहलाया और धीरे से कहा—
“अब कुछ नहीं बचा आंटी…”
मम्मी की साँसें तेज़ हो गईं। वे सिर इधर-उधर हिला रही थीं। आँसू बह रहे थे। शरीर काँप रहा था।
राहुल ने अपना सिर फिर से उनके पेट पर रखा। पहले नाभि को चूसा, फिर जीभ से नीचे की तरफ़ बढ़ने लगा—पैंटी की किनारी तक।
मम्मी के मुँह से एक लंबी, दबी हुई कराह निकल गई। “आह्ह्ह… नहीं…”
और मैं दरवाज़े के पास अँधेरे में खड़ा, हाँफता हुआ, देखता रहा।
राहुल की जीभ मम्मी की नाभि से नीचे सरक रही थी। वह पैंटी की किनारी तक पहुँच चुका था। जीभ से कपड़े के ऊपर हल्के-हल्के चाट रहा था। मम्मी का शरीर हर स्पर्श पर काँप उठता। वे बिस्तर पर कराह रही थीं। दोनों हाथ अभी भी राहुल ने सिर के ऊपर दबा रखे थे।
“नहीं… वहाँ मत… राहुल… छोड़ो…” मम्मी की आवाज़ सिसकी भरी थी। पैर बेकाबू हो रहे थे। वे घुटने जोड़ने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन राहुल ने अपने शरीर से उन्हें अलग किए रखा था।
राहुल ने अपना चेहरा उठाया। उसके होंठ गीले थे। उसने मम्मी की आँखों में देखा और फिर एक हाथ से उनकी पैंटी की इलास्टिक पकड़ ली।
मम्मी की आँखें फैल गईं। “नहीं… वो मत उतारो… प्लीज़… मैं तुम्हारी आंटी हूँ…”
राहुल ने जवाब नहीं दिया। उसने पैंटी को धीरे-धीरे नीचे खींचना शुरू कर दिया। पहले एक तरफ़, फिर दूसरी तरफ़। मम्मी ने कमर ऊँची करके रोकने की कोशिश की, लेकिन राहुल ने उनका पेट दबाए रखा। पैंटी जाँघों तक आ गई।
अब मम्मी का सबसे निजी हिस्सा लगभग खुल चुका था। राहुल ने पैंटी को और नीचे खींचकर उनके घुटनों तक ला दिया। फिर एक झटके में पूरी तरह उतारकर फेंक दिया।
मम्मी अब पूरी तरह नंगी थीं।
सब कुछ बेपर्दा। गोरा शरीर नाइट बल्ब की रोशनी में काँप रहा था।
मम्मी ने आँखें कसकर बंद कर लीं। आँसू बह रहे थे। वे सिर घुमाए हुए थीं, जैसे यह सब न देखना चाहती हों। उनके होंठ काँप रहे थे। “पंकज… ने अगर देख लिया तो… मैं मर जाऊँगी…”
राहुल ने उनके नंगे शरीर को अपनी आँखों से नोंचा। फिर उसने दोनों हाथों से मम्मी की जाँघों को और फैला दिया। अपना सिर उनके पेट पर रखा और नाभि को ज़ोर से चूसने लगा। साथ ही एक हाथ नीचे की तरफ़ बढ़ गया।
मम्मी का शरीर एक तेज़ झटके से उछल पड़ा। उनके मुँह से एक लंबी, दबी हुई चीख निकल गई। “आह्ह्ह… नहीं… प्लीज़…”
राहुल की उंगलियाँ अब उनके सबसे संवेदनशील हिस्से पर थीं। वह धीरे-धीरे सहला रहा था, कभी हल्के दबाव के साथ, कभी गोलाकार गति में। मम्मी के पैर काँप रहे थे। कमर बार-बार बिस्तर से उठ रही थी। कराहें अब रुक नहीं रही थीं।
“शरीर तो आपका तैयार है आंटी…” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। “मुँह से नहीं कह रही हो, लेकिन यहाँ… सब पता चल रहा है।”
मम्मी ने सिर ज़ोर-ज़ोर से हिलाया। “नहीं… छोड़ो मुझे… मैं नहीं चाहती…”
लेकिन उनका शरीर कुछ और कह रहा था। साँसें पूरी तरह बिखर चुकी थीं। पेट के निचले हिस्से में बार-बार संकुचन हो रहे थे। राहुल की उंगलियों के हर आंदोलन पर उनकी कराहें निकल रही थीं।
मैं दरवाज़े के पास अँधेरे में खड़ा यह सब देख रहा था। मेरी माँ पूरी तरह नंगी बिस्तर पर पड़ी थीं। एक गैर मर्द उनकी नाभि चूस रहा था और उसका हाथ उनके सबसे निजी अंग पर था। मम्मी कराह रही थीं। तड़प रही थीं।
मेरा हाथ पागलों की तरह चल रहा था। उत्तेजना इतनी तेज़ हो गई थी कि आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था।
राहुल ने मम्मी की एक जाँघ को और ऊपर उठाया। अपना चेहरा और नीचे ले गया। फिर उसने जीभ निकालकर सीधे उनके संवेदनशील हिस्से पर लगा दी।
मम्मी के मुँह से एक तेज़, लंबी चीख निकल गई, जिसे उन्होंने तुरंत अपने हाथ से दबाने की कोशिश की। शरीर बिस्तर पर उछलने लगा। पैर राहुल के कंधों पर जाकर अटक गए।
और मैं…
अँधेरे में खड़ा, हाँफता हुआ, सब कुछ देखता रहा।
वह धीरे-धीरे चाट रहा था, कभी ज़ोर से चूसता, कभी सिर्फ़ नोक से छूता। मम्मी का शरीर बिस्तर पर बेकाबू हो रहा था। उनकी कमर बार-बार उठ रही थी। दोनों पैर राहुल के कंधों पर कस गए थे।
“आह्ह्ह… नहीं… निकालो… राहुल… बस करो…” मम्मी की आवाज़ अब पूरी तरह टूट चुकी थी। कराहें और सिसकियाँ एक साथ निकल रही थीं। आँखें बंद थीं। आँसू गालों पर बह रहे थे। वे राहुल के बाल पकड़-पकड़ कर धकेलने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन हाथों में ताक़त नहीं बची थी।
राहुल रुका नहीं। उसने दोनों हाथों से मम्मी की जाँघों को और फैला दिया और अपनी जीभ और गहराई तक ले गया। मम्मी के मुँह से एक तेज़ चीख निकल गई। शरीर एक लंबी लहर की तरह काँप उठा। उनके नाखून राहुल की खोपड़ी में गड़ गए।
“प्लीज़… अब नहीं… मैं मर जाऊँगी…” मम्मी सिसकते हुए बोलीं। पेट बार-बार तन रहा था। साँसें इतनी तेज़ थीं कि सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
राहुल ने अचानक जीभ हटाई। मम्मी ने राहत की साँस ली, लेकिन अगले ही पल उसने अपनी दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं।
मम्मी का शरीर बिस्तर से उछल पड़ा। “आह्ह्ह्ह…!” उनकी चीख इस बार और तेज़ थी। राहुल ने उंगलियाँ अंदर-बाहर चलानी शुरू कर दीं—धीमी, गहरी, और लगातार। साथ ही अपना मुँह फिर से उनके संवेदनशील हिस्से पर लगा दिया। जीभ और उंगलियाँ एक साथ काम कर रही थीं।
मम्मी अब बिल्कुल बेकाबू हो चुकी थीं। उनके पैर काँप रहे थे। कमर अपने-आप राहुल के मुँह की तरफ़ उठ रही थी। कराहें एक के बाद एक निकल रही थीं। वे अपना मुँह हाथ से बंद किए हुए थीं ताकि आवाज़ बाहर न जाए, लेकिन आवाज़ रुक नहीं रही थी।
“देखिए आंटी, जो आप अपनी ज़ुबान से नहीं कहतीं, वह आपका शरीर कह रहा है।”
मम्मी ने सिर ज़ोर-ज़ोर से हिलाया। आँसू बह रहे थे। “नहीं… पंकज… छोड़ दो मुझे… प्लीज़…”
राहुल की उंगलियाँ और तेज़ हो गईं। उसने एक तीसरी उंगली भी जोड़ दी। मम्मी का शरीर एक तेज़ झटके से तन गया। उनके मुँह से एक लंबी, दबी हुई चीख निकल गई। पैर राहुल के कंधों पर इतने ज़ोर से कस गए कि उसके कंधे दब गए।
मम्मी कराह रही थीं, तड़प रही थीं, और उनका शरीर उनके नियंत्रण से बाहर जा चुका था।
मेरा हाथ पागलों की तरह चल रहा था। उत्तेजना अब दर्द में बदलने वाली थी। आँखों के आगे अँधेरा छा रहा था। साँसें नहीं चल रही थीं।
राहुल ने अचानक उंगलियाँ निकाल लीं। मम्मी ने फिर से राहत की साँस ली, लेकिन वह सिर्फ़ एक पल की थी।
राहुल अपने घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपनी पैंट के बटन खोले और उसे नीचे सरका दिया। उसकी मर्दानगी बाहर आ गई—सख्त, मोटी और पूरी तरह तैयार।
मम्मी की आँखें फैल गईं। उन्होंने सिर इधर-उधर हिलाना शुरू कर दिया। “नहीं… वो मत… राहुल… मैं तुम्हारी आंटी हूँ… प्लीज़… मत करो…”
राहुल ने मम्मी की दोनों जाँघों को पकड़कर और फैला दिया। अपना शरीर उनके ऊपर ले आया। उसकी नोक अब मम्मी के संवेदनशील हिस्से को छू रही थी।
“अब कुछ नहीं बचेगा आंटी,” उसने धीरे से कहा।
मम्मी चीखने वाली थीं—
और मैं अँधेरे में खड़ा, हाँफता हुआ, देखता रहा।
राहुल की नोक मम्मी के संवेदनशील हिस्से को छू रही थी। वह अपने शरीर को आगे बढ़ाने ही वाला था कि मम्मी ने आँखें फाड़कर उसे देखा। आँसुओं से भरी आँखों में अब सिर्फ़ डर था।
“नहीं… राहुल… मत करो…” उनकी आवाज़ टूटी हुई थी। “मैं शादीशुदा हूँ… तुम्हारी आंटी हूँ… एक बच्चा है मेरा… प्लीज़… छोड़ दो मुझे…”
राहुल रुका नहीं। उसने मम्मी की जाँघों को और कसकर पकड़ रखा था।
मम्मी ने सिर ज़ोर-ज़ोर से हिलाना शुरू कर दिया। आँसू बह रहे थे। “मैं… तुम्हारी माँ जैसी… मत करो यह पाप… मेरी इज़्ज़त मत लूटो… मैं कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रहूँगी… प्लीज़ राहुल… मैं गिड़गिड़ाती हूँ… छोड़ दो…”
उनकी आवाज़ में सिसकियाँ घुल गई थीं। “मेरा पति है… मेरा बेटा है… मैं एक माँ हूँ… तुम ऐसा कैसे कर सकते हो… मैं तुम्हारी आंटी हूँ… रहम करो…”
राहुल ने मम्मी के मुँह पर अपना एक हाथ रख दिया। उनकी बातें दब गईं। सिर्फ़ सिसकियाँ और अटकती साँसें रह गईं।
“बहुत बोल चुकी आंटी,” राहुल ने धीरे से कहा। आवाज़ में कोई नर्मी नहीं थी। “अब बस।”
उसने अपना शरीर और आगे बढ़ाया।
मम्मी के आँसू और तेज़ी से बहने लगे। वे राहुल के हाथ के नीचे से कुछ बोलने की कोशिश कर रही थीं—शायद फिर से “नहीं”, शायद “पंकज”, शायद “छोड़ो”—लेकिन आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।
उनका शरीर काँप रहा था। पैर बेकाबू थे। आँखें कभी बंद हो रही थीं, कभी खुल रही थीं।
तभी राहुल का औज़ार मम्मी की नज़रों में आया।
मम्मी की आँखें फैल गईं। कम से कम आठ इंच लंबा, मोटा, सख्त—जैसे कोई लोहे की रॉड हो। उनके मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। वे डर से पीछे हटने की कोशिश करने लगीं, लेकिन राहुल ने उनकी जाँघें पकड़ रखी थीं।
“नहीं… यह… यह क्या है… राहुल… मत… मैं मर जाऊँगी…” मम्मी की आवाज़ में खौफ़ साफ़ था। आँखें फटी हुई थीं। वे राहुल की मर्दानगी को देखकर बुरी तरह काँप रही थीं।
“इतना बड़ा… मत करो… प्लीज़… छोड़ दो…” वे सिर ज़ोर-ज़ोर से हिला रही थीं। आँसू बह रहे थे। “मैं सह नहीं पाऊँगी… राहुल… रहम करो… मैं तुम्हारी आंटी हूँ…”
राहुल ने मम्मी की जाँघों को और फैला दिया। अपना मोटा औज़ार उनकी कलियों-सी कोमल चूत की फाँकों पर रखा। सिर्फ़ छूने से ही मम्मी का शरीर तन गया।
“अब देखो आंटी,” राहुल ने धीरे से कहा। “स्वर्ग की सैर करने को तैयार हो क्या?”
मम्मी की आँखें आतंक से भरी हुई थीं। वे कुछ और बोलना चाहती थीं, लेकिन गले से सिर्फ़ सिसकियाँ निकल रही थीं।
और मैं अँधेरे में खड़ा, यह दृश्य देख रहा था—
मेरी माँ बिस्तर पर नंगी, डरी हुई,
और उनके सामने खड़ा वह मोटा, डरावना औज़ार।
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Very good bhai bas ab rahul andar na daale to aunty tadap uthe aur khud bole use ki daalo
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Bahut mast rough sex jarwana
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और उनके सामने खड़ा वह मोटा, डरावना औज़ार।
मेरी बीस साल से शादीशुदा पतिव्रता माँ आज किसी और के बिस्तर की रौनक बनने वाली थी।
राहुल ने धीरे से अपने लंड का दबाव माँ की कमरस से सराबोर योनि पर बनाया। सिर्फ़ सिरे ने अंदर जाना शुरू किया।
मम्मी की आँखें फैल गईं। उनके मुँह से एक तेज़, दबी हुई चीख निकल गई। “आह्ह्ह… नहीं… दर्द… हो रहा है… निकालो…”
राहुल रुका नहीं। वह धीरे-धीरे अंदर धकेलता गया। हर इंच के साथ मम्मी का शरीर तनता जा रहा था। उनके नाखून चादर में गड़ गए। पैर काँप रहे थे। आँसू बह रहे थे।
“नहीं… और मत… मैं फट जाऊँगी… राहुल… प्लीज़…” मम्मी की आवाज़ सिसकी और चीख के बीच खो गई थी।
राहुल ने एक लंबा, धीमा धक्का दिया। आधा अंदर चला गया। मम्मी का शरीर बिस्तर पर उछल पड़ा। उनके मुँह से एक लंबी चीख निकल गई, जिसे उन्होंने तुरंत दबाने की कोशिश की।
फिर राहुल ने दूसरा धक्का दिया—इस बार थोड़ा और ज़ोर से। पूरा अंदर समा गया।
मम्मी की आँखें पीछे की तरफ़ फिर गईं। शरीर एक तेज़ लहर की तरह काँप उठा। “आह्ह्ह्ह…!” उनकी चीख अब रोकने के बावजूद निकल गई।
राहुल रुका। एक पल के लिए अंदर पूरी तरह बैठा रहा। मम्मी के अंदर धड़कन महसूस हो रही थी। फिर उसने बाहर खींचा… और ज़ोर से अंदर धकेला।
धक्का इतना तेज़ था कि मम्मी का पूरा शरीर ऊपर उठ गया। उनके मुँह से एक और तेज़ कराह निकली।
राहुल ने लय पकड़ ली।
धीरे बाहर… और ज़ोर से अंदर।
फिर और ज़ोर से।
फिर और तेज़।
राहुल ने जो चाहा था, उसे आज मिल गया था।
हर धक्के के साथ मम्मी की कराहें निकल रही थीं। उनका शरीर बिस्तर पर धक्कों से हिल रहा था। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। पेट की मांसपेशियाँ तन रही थीं। आँखें बंद थीं। आँसू लगातार बह रहे थे।
“आह्ह… दर्द… बहुत… राहुल… धीरे… आह्ह्ह…” मम्मी बड़बड़ा रही थीं। लेकिन राहुल की गति बढ़ती जा रही थी। हर धक्का पिछले से ज़्यादा गहरा और ज़्यादा ज़ोर का था।
बिस्तर की चरमराहट, शरीर की टकराहट और मम्मी की दबी हुई चीखें कमरे में गूँज रही थीं। राहुल ने मम्मी के दोनों पैरों को अपने कंधों पर उठा लिया और और गहराई तक ठोकने लगा।
हर स्ट्रोक पर मम्मी का शरीर काँप उठता। उनके मुँह से अब सिर्फ़ टूटी-फूटी कराहें निकल रही थीं। “आह… आह्ह… नहीं… बहुत… ज़ोर… से…”
राहुल पसीने से तर हो चुका था। वह मम्मी को नीचे दबाए हुए लगातार ठोक रहा था—ज़ोरदार, गहरे, बेरहम धक्के। कमरे में मम्मी की कराहें, उनकी चूड़ियों के खनकने और टूटने की आवाज़ें थीं, और राहुल के हर झटके पर मम्मी के पैरों की पायल भी खनक उठती। यह सब मिलकर ऐसा मादक संगीत कमरे में पैदा कर रहा था कि मैंने अपना औज़ार उसी की लय पर हिलाना शुरू कर दिया।
मम्मी की इज़्ज़त, उनकी शादी, उनका बेटा… उनका परिवार—सब कुछ हर धक्के के साथ टूटता जा रहा था।
और मैं दरवाज़े के पास अँधेरे में खड़ा,
हाँफता हुआ,
अपनी माँ को बिस्तर पर कुचले जाते हुए देखता रहा।
पर राहुल को भावनाओं से कोई मतलब नहीं था। उसकी हालत ऐसी थी जैसे किसी भूखे को छप्पन भोग वाली थाली मिल गई हो—और वह थाली थी मेरी संस्कारी माँ, जिसने किसी पर पुरुष का साया भी कभी खुद पर नहीं पड़ने दिया था।
राहुल ने एक लंबा, धीमा धक्का दिया। मम्मी को अंदर तक महसूस हुआ—जैसे कुछ उनके पेट के गहरे हिस्से तक पहुँच गया हो। उनकी आँखें पीछे की तरफ़ फिर गईं।
“आह्ह्ह्हहा…!”
राहुल ने दूसरा धक्का दिया—इस बार और ज़ोर से। मम्मी को साफ़ अहसास हुआ कि वह उनकी नाभि के ठीक नीचे, गर्भाशय के पास छू रहा है। एक गहरी, भारी-भरपूर अनुभूति ने उनके पेट के अंदर तक झटका दिया।
“आहाаааааа…!” मम्मी की चीख निकल गई। आँसू तेज़ी से बहने लगे।
राहुल रुका। एक पल के लिए अंदर पूरी तरह बैठा रहा। मम्मी के अंदर धड़कन महसूस हो रही थी। फिर उसने बाहर खींचा… और ज़ोर से अंदर धकेला।
धक्का इतना गहरा था कि मम्मी को लगा जैसे उनकी नाभि के पीछे तक जा रहा हो। पेट में एक तेज़ दबाव महसूस हुआ। उनका शरीर बिस्तर पर उछल पड़ा।
“आह्ह्ह्हहा आहाаааа…!”
राहुल ने लय बनाए रखी।
धीरे बाहर… और ज़ोर से अंदर।
हर धक्के के साथ मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे। राहुल उनके अंदर तक गहराई में पहुँच रहा था। नाभि के नीचे एक गहरी, धड़कती हुई संवेदना फैल रही थी।
“आह्ह… आहाаа… दर्द… बहुत अंदर… आह्ह्ह्हहा…!” मम्मी हर धक्के पर चीख रही थीं। आवाज़ अब दब नहीं पा रही थी। शरीर राहुल के धक्कों से हिल रहा था। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। पेट की मांसपेशियाँ तनकर नाभि के आसपास सिकुड़ रही थीं।
राहुल ने मम्मी के दोनों पैरों को अपने कंधों पर उठा लिया और और गहराई तक ठोकने लगा। अब हर झटके से राहुल का लंड मम्मी के गर्भाशय के मुहाने पर दस्तक दे रहा था। मम्मी को साफ़ महसूस हो रहा था।
“आहाаааа आहाаа… नहीं… इतना अंदर… आह्ह्ह्हहा…!”
मम्मी के आँसू अब रोकने से बाहर हो चुके थे। हर धक्के के साथ वे ज़ोर-ज़ोर से सिसक रही थीं और चीख रही थीं। शरीर बेकाबू हो चुका था। कमर अपने-आप उठ रही थी, जैसे दर्द के बावजूद शरीर प्रतिक्रिया दे रहा हो।
राहुल पसीने से तर था। वह लगातार, गहरे और ज़ोरदार धक्के दे रहा था। हर स्ट्रोक मम्मी की नाभि तक पहुँच रहा था। गर्भ में बार-बार टकराहट हो रही थी। मम्मी की चीखें एक के बाद एक निकल रही थीं—
“आह्ह्ह्हहा… आहाаааа… आहाаа…!”
बिस्तर चरमरा रहा था। शरीर की टकराहट की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। मम्मी की इज़्ज़त हर गहरे धक्के के साथ टूटती जा रही थी।
राहुल की तेज़ और गहरी ठोकरें अचानक धीमी पड़ गईं।
वह अंदर तक समाया हुआ था, लेकिन अब धक्के रोक दिए। मम्मी हाँफ रही थीं। आँखें आँसुओं से भरी थीं। शरीर अभी भी काँप रहा था। हर साँस के साथ उनकी नाभि के नीचे वह भारी अहसास धड़क रहा था।
राहुल ने धीरे से बाहर खींचा—लगभग किनारे तक—फिर बहुत धीरे-धीरे फिर से अंदर धकेला। इस बार कोई ज़ोर नहीं था। बस एक लंबा, धीमा, पूरा भराव।
मम्मी के मुँह से एक लंबी, काँपती हुई कराह निकल गई। “आह्ह्ह…”
राहुल ने वही गति दोहराई। धीरे बाहर… और और धीरे अंदर। हर बार पूरा अंदर तक जाता, नाभि के पीछे तक छूता, फिर रुककर वहीं दबाए रखता। मम्मी का पेट हर बार हल्के से फूलता और सिकुड़ता। उनकी आँखें बंद थीं। होंठ काँप रहे थे।
“अब धीरे…” राहुल ने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा। आवाज़ में वह बेरहमी कम हो गई थी, जगह एक गंदी नमी ने ले ली थी। “महसूस करो आंटी… कितना गहरा बैठता है।”
वह अंदर तक गया और वहीं रुक गया। अपना शरीर मम्मी के शरीर से सटाए हुए छोटे-छोटे गोलाकार आंदोलन करने लगा। मर्दानगी उनके गर्भ के मुहाने पर धीरे-धीरे घूम रही थी। मम्मी की कराहें अब तेज़ चीखों से बदलकर लंबी, सिसकती हुई आवाज़ों में बदल गई थीं।
“आह्ह… अह्ह… क्या… कर रहे हो…” उनकी आवाज़ में अब सिर्फ़ दर्द नहीं रह गया था। कुछ और भी घुल गया था।
राहुल ने एक हाथ से मम्मी का स्तन पकड़ा और नोक को उंगलियों के बीच धीरे-धीरे मसलने लगा। दूसरा हाथ उनकी नाभि पर रखा और हल्के दबाव के साथ सहलाने लगा। नीचे उसका घर्षण लगातार, धीमा और गहरा बना हुआ था।
मम्मी का शरीर अब अलग तरह से प्रतिक्रिया दे रहा था। कमर हल्के-हल्के उठने लगी थी। साँसें भारी थीं। पेट की मांसपेशियाँ बार-बार सिकुड़ रही थीं। आँसू अभी भी बह रहे थे, लेकिन कराहों में एक अजीब-सी मिठास आ गई थी।
राहुल ने अपना चेहरा उनके कान के पास लाया। “बोलो आंटी… कैसा लग रहा है अंदर?”
मम्मी ने सिर हिलाने की कोशिश की, लेकिन जवाब में सिर्फ़ एक लंबी कराह निकली। “आह्ह्ह… बहुत… अंदर…”
राहुल मुस्कुराया। उसने गति को और धीमा कर दिया—इतना धीमा कि हर इंच साफ़ महसूस हो रहा था। पूरा बाहर निकालता, सिरे से सहलाता, फिर धीरे-धीरे फिर से भर देता। हर बार नाभि के पीछे तक जाता और वहाँ रुककर दबाता।
मम्मी के नाखून अब उसकी पीठ में गड़ रहे थे। पैर उसके कमर के आसपास लिपटने लगे थे। शरीर अपने-आप उसके धीमे आंदोलनों का जवाब दे रहा था।
“आह्ह… अह्हह… राहुल…” उनका नाम उनके मुँह से निकल गया। आवाज़ में विरोध कमज़ोर पड़ चुका था।
राहुल ने दोनों स्तनों को हाथों में ले लिया और नोकों को उंगलियों से धीरे-धीरे मसलते हुए नीचे अपना धीमा, गहरा खेल जारी रखा। मम्मी की कराहें अब एक लय में आ गई थीं—हर भराव के साथ एक लंबी, काँपती हुई आवाज़।
और मैं अँधेरे में खड़ा,
यह धीमा, गंदा, इरोटीक खेल देखता रहा।
मेरी माँ बिस्तर पर तड़प रही थीं…
और इस बार उनकी कराहें सिर्फ़ दर्द की नहीं रह गई थीं।
अचानक राहुल ने मम्मी के कान के पास होंठ लाते हुए धीरे से पूछा—
“आंटी… अंकल का कितना है?”
मम्मी की आँखें अचानक खुल गईं। उन्होंने उसकी तरफ़ देखा। आवाज़ में घबराहट और शर्म दोनों थीं। “क्या…?”
राहुल ने एक गहरा, धीमा धक्का दिया और अंदर तक दबाए रखते हुए दोबारा पूछा। “अंकल का… कितना बड़ा है? इतना?” उसने थोड़ा और अंदर दबाया। “या इससे कम?”
मम्मी ने सिर घुमा लिया। आँसू फिर से बहने लगे। “मत पूछो… राहुल… मत…”
राहुल हल्का-सा हँसा। उसने गति को और धीमा कर दिया—इतना धीमा कि हर इंच साफ़ महसूस हो रहा था। “बोलो न आंटी। अंकल इतनी देर बाहर रहते हैं… रात में कितना देते होंगे आपको?”
मम्मी चुप रहीं। सिर्फ़ कराहें निकल रही थीं।
राहुल ने एक हाथ से उनका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया। “मुझसे छोटा है न? बोलो।”
मम्मी की आँखें काँप रही थीं। उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में, सिसकते हुए कहा, “हाँ…”
राहुल की मुस्कान और गंदी हो गई। उसने ज़ोर से एक गहरा धक्का दिया। मम्मी की कराह निकल गई।
“तो फिर आज सही मर्द से मिल रही हो आंटी,” उसने फ़ुसफ़ुसाते हुए कहा और फिर से अपना धीमा, गहरा खेल जारी रखा।
मम्मी ने आँखें बंद कर लीं। आँसू बह रहे थे। लेकिन उनका शरीर राहुल के हर भराव पर प्रतिक्रिया दे रहा था।
और मैं अँधेरे में खड़ा,
यह सब सुन और देख रहा था।
मम्मी की साँसें अचानक बहुत तेज़ हो गईं। पेट की मांसपेशियाँ बार-बार ज़ोर से सिकुड़ने लगीं। पैर राहुल की कमर के आसपास कस गए। नाखून उसकी पीठ में गड़ गए।
“नहीं… रुक… कुछ… हो रहा है… आह्ह्ह…” मम्मी ने सिर ज़ोर-ज़ोर से हिलाना शुरू कर दिया। आँखें बंद थीं। होंठ काँप रहे थे।
राहुल ने गति को थोड़ा तेज़ कर दिया—अभी भी गहरा, लेकिन अब ज़्यादा दबाव के साथ। हर धक्का सीधे उनके सबसे संवेदनशील बिंदु पर जा रहा था।
मम्मी का शरीर अचानक तन गया। उनकी कमर बिस्तर से उठ गई। मुँह खुला का खुला रह गया।
“आह्ह्ह्हहा… आहाаааа…!”
एक लंबी, तेज़ चीख उनके गले से फूट निकली। पूरा शरीर ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगा। अंदर वाली दीवारें राहुल की मर्दानगी को बार-बार जकड़ रही थीं। पेट की मांसपेशियाँ नाभि के नीचे तेज़ी से संकुचित हो रही थीं। पैर बेकाबू हो गए। आँसू ज़ोर से बहने लगे।
राहुल ने उन्हें कसकर पकड़े रखा और उसी गहराई पर छोटे-छोटे धक्के देते हुए उनका ऑर्गैज़्म निकलवाता रहा। मम्मी की चीखें अब सिसकियों में बदल गई थीं। शरीर एक के बाद एक लहरों में काँप रहा था। वे राहुल के कंधे में मुँह छुपाकर ज़ोर-ज़ोर से काँप रही थीं।
कई लंबे पल तक यह सिलसिला चला। फिर धीरे-धीरे मम्मी का शरीर ढीला पड़ने लगा। साँसें हाँफने लगीं। आँखें आँसुओं से भरी हुई थीं। पूरे शरीर में कमज़ोरी छा गई थी।
राहुल अभी भी अंदर था। उसने मम्मी के कान के पास फ़ुसफ़ुसाया, “हो गया आंटी… पहली बार सही मर्द से चुदी हो।”
मम्मी कुछ नहीं बोल पाईं। सिर्फ़ सिसक रही थीं। शरीर अभी भी हल्के-हल्के काँप रहा था।
और मैं दरवाज़े के पास अँधेरे में खड़ा,
यह सब देखता रहा—
मेरी माँ का शरीर एक गैर मर्द के नीचे काँपता हुआ,
उनका ऑर्गैज़्म,
उनकी टूटी हुई कराहें।
राहुल की गति फिर से बदल गई। मम्मी अभी भी ऑर्गैज़्म की कमज़ोरी में काँप रही थीं कि उसने अचानक गहरे और तेज़ धक्के शुरू कर दिए।
मम्मी की आँखें फैल गईं। उन्होंने तुरंत समझ लिया।
“नहीं… राहुल… अंदर मत… करना… बाहर निकालो… प्लीज़… अंदर मत छोड़ना…” वे घबराकर बोलने लगीं। हाथों से उसकी छाती धकेलने की कोशिश करने लगीं। “बाहर निकाल… राहुल… मत… मैं गर्भ… आहाаааа… नहीं…”
राहुल ने उनके हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए। उसकी साँसें तेज़ हो चुकी थीं। धक्के और गहरे हो गए।
“जिस खेत में इतना हल चलाया है, उसमें अपना बीज डालना तो बनता ही है न मेरी आंटी जी…” उसने दाँतों के बीच से कहा।
“नहीं… मत… राहुल… मेरी बात सुनो… अंदर मत… पंकज के पापा… नहीं…” मम्मी सिसक-सिसक कर बोल रही थीं। शरीर हिलाने की पूरी कोशिश कर रही थीं, लेकिन राहुल का वजन उन पर भारी था।
राहुल के शरीर में अचानक एक तेज़ तनाव दौड़ गया। उसने मम्मी की कमर को दोनों हाथों से कसकर पकड़ा और एक लंबा, गहरा धक्का देकर अंदर तक समा गया।
फिर वह रुक गया।
मम्मी को साफ़ महसूस हुआ—गर्म, गाढ़ा तरल उनके गर्भाशय के सबसे गहरे हिस्से में छूट रहा है। एक स्पर्ट… फिर दूसरा… फिर तीसरा। ज़ोर-ज़ोर के झटके के साथ राहुल का वीर्य उनकी कोख में भरता जा रहा था।
“आह्ह… नहीं… निकालो… प्लीज़!” मम्मी चीख उठीं। वे और ज़ोर से छटपटाने लगीं, लेकिन राहुल ने उन्हें दबाए रखा। उसके शरीर के झटके जारी थे। एक के बाद एक गर्म लहरें मम्मी के गर्भ में उतर रही थीं।
राहुल की साँसें हाँफने लगीं। वह मम्मी के ऊपर गिरा हुआ था। अंदर अभी भी धड़क रहा था। आखिरी कुछ स्पर्ट भी उनके सबसे गहरे हिस्से में छोड़ चुका था।
मम्मी की आँखों से आँसू बह रहे थे। वे सिसक रही थीं। “क्या कर दिया तुमने… अंदर… मैं क्या करूँगी अब…”
राहुल ने उनका चेहरा अपनी तरफ़ घुमाया। पसीने से तर चेहरे पर एक थकी हुई, संतुष्ट मुस्कान थी। उसने धीरे से कहा—
“अब शायद… छोटा भाई या बहन हो जाए पंकज का।”
उसकी बात सुनते ही मेरे दिमाग में बिजली-सी कौंध गई।
वह दिन… मम्मी के कीर्तन पर जाने के बाद…
जब राहुल ने मुझसे पूछा था—
“पंकज, तुम्हारा कोई छोटा भाई-बहन नहीं है?”
अब समझ में आ रहा था।
वह सिर्फ़ एक सवाल नहीं था।
वह एक इरादा था।
और आज रात…
उसने वह इरादा मेरे घर में, मेरी माँ की कोख में पूरा कर दिया था।
मैं अँधेरे में खड़ा,
यह सब देखता रहा।
मेरी माँ बिस्तर पर नंगी पड़ी थीं।
उसकी कोख में एक हवसी दरिंदे ने अपना बीज डाल दिया था, जिसे किसी के घर की मान-मर्यादा या किसी के परिवार की ख़ुशियों का कोई ख़याल नहीं था। उसे अपनी गंदी हवस का खेल खेलना था—और उस रात उसका खिलौना मेरी माँ अंजलि थी।
और राहुल… मुस्कुरा रहा था।
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sab readers se guzarish hai ke jyada se jyada feedback dein,ta ki aur bhi kahaniyan aur novels aap ke liye likh sakun.
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aage continue karu kya story? Aap bhai log batao, mai tu isse yahin khatam karna chahta tha. aage ka sequence aap log suggest karo, but jyada lambi nahi rakhunga story.
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