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19-05-2026, 11:09 PM
(This post was last modified: 20-05-2026, 09:39 AM by TheHousewife. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
अध्याय १: पंद्रह मिनट का खेल
बोकारो स्टील सिटी की सुबह आम शहरों जैसी नहीं होती थी। यहाँ सुबह किसी चिड़िया की चहचहाहट से नहीं, बल्कि सुबह के ठीक छह बजे 'स्टील प्लांट' से निकलने वाले उस भारी, गूंजते हुए सायरन से होती थी, जो पूरे टाउनशिप की रगों में लोहे की धड़कन की तरह दौड़ जाता था। सन २००० के उस शुरुआती दौर में, जब हवा में न तो स्मार्टफोन की घंटियाँ थीं और न ही मल्टीमीडिया मोबाइलों का शोर, सड़क D3 के क्वार्टर अपनी तयशुदा रूटीन के मुताबिक धीरे-धीरे आंखें खोलते थे। सुबह की हवा में एक अजीब सी नमी और कोयले की हल्की सी महक घुली रहती थी।
सड़क D3 का क्वार्टर नंबर 14। सामने का खुला हुआ छोटा सा आँगन अभी भी अंधेरे और उजाले के बीच कशमकश कर रहा था। लेकिन घर के भीतर, एक बिल्कुल अलग किस्म का सन्नाटा और तनाव पसरा हुआ था।
शोम मित्रा की आँख सायरन की पहली आवाज के साथ ही खुल गई थी। 38 साल का शोम, जिसका बदन उसकी 35 साल की बीवी के मुकाबले बेहद मामूली, दुबला-पतला और ढीला-ढाला था। उसकी रीढ़ की हड्डी में हमेशा एक हल्का सा झुकाव रहता, जैसे वह दुनिया के सामने खुद को सिकोड़ कर रखना चाहता हो। उसके संकरे कंधे और पतली छाती उसे अपनी ही बीवी के सामने एक कमतर और लाचार मर्द की शक्ल देते थे। उठकर बैठते ही उसने अपने सिर पर हाथ फेरा, जहाँ बीच के बाल तेजी से झड़ चुके थे और एक चौड़ा, गंजा ललाट उसकी कमजोर शख्सियत को और नुमायां कर रहा था। अपनी मूंछों के नीचे छिपी एक हिचकिचाती हुई, सहमी सी मुस्कान के साथ उसने बगल में सो रही मुनाई की तरफ देखा।
मुनाई अभी भी गहरी नींद में थी, और उसका वह भारी, बेकाबू जिस्म उस छोटे से बिस्तर पर इस तरह फैला था मानो उस पूरे कमरे पर सिर्फ उसी का राज हो।
मुनाई महज़ 35 साल की थी, लेकिन उसका बदन किसी ढलती हुई उम्र का नहीं, बल्कि एक पूरी तरह से पके हुए, रसीले फल की तरह भारी और गदराया हुआ था। वह उन औरतों में से नहीं थी जो खुद को माहौल के हिसाब से सिकोड़ लें; उसका जिस्म खुद अपनी जगह बनाना जानता था। उसका चेहरा गोल, गाल भरे-भरे और गोरा रंग ऐसा कि सुबह की इस धुंधली रोशनी में भी संगमरमर की तरह चमक रहा था। उसके होंठ कुदरती तौर पर मोटे और रसीले थे, जो सोते समय भी एक अजीब सी कामुकता बिखेर रहे थे। उसके घने, स्याह काले और सीधे बाल उसके सिर के नीचे से निकलकर, तकिये को पूरा ढकते हुए उसकी गोरी, चौड़ी पीठ के नीचे दबे हुए थे।
शोम ने बिस्तर से उतरते समय पूरी एहतियात बरती कि कहीं पैर की कोई आहट मुनाई की नींद न खराब कर दे। वह जानता था कि मुनाई को अपनी सहूलियत से समझौता करना बिल्कुल पसंद नहीं था। यह नया क्वार्टर, यह छोटा सा घर, यहाँ तक कि खुद शोम की यह ढीली-ढाली शख्सियत भी मुनाई के मिजाज के आगे हमेशा घुटने टेकती थी।
शोम अपने पतले पैरों को घसीटता हुआ कमरे से बाहर निकला। ठीक उसी वक्त, बाहर पिछले अहाते से एक जानी-पहचानी आवाज आई—'घड़-घड़-घड़...'। टाउनशिप की पानी की सप्लाई शुरू हो चुकी थी। सरकारी नियम के मुताबिक, सुबह छह से सात बजे के बीच ही पानी आता था, और इसी एक घंटे में जिंदगी के सारे जरूरी काम निपटाने होते थे।
शोम ने आंगन के कोने में बने उस छोटे, संकरे और घुटनभरे बाथरूम का दरवाजा खोला। उस चार-बाय-चार के डिब्बे जैसे बाथरूम में कदम रखते ही शोम को भी एक पल के लिए लगा कि दीवारें उसे जकड़ लेंगी। उसने जल्दी-जल्दी ब्रश किया, अपनी मूंछों को साफ किया और आईने में अपनी उस पतली, झुकी हुई सूरत को देखा जो उसकी उस अति-कामुक, भारी बदन वाली बीवी के सामने किसी नौकर जैसी लगती थी।
जब वह बाहर आया, तो मुनाई जाग चुकी थी। वह बेड पर बैठी अपने घने, लंबे बालों को एक झटके से अपनी पीठ के पीछे फेंक रही थी। उसके उस एक झटके से उसके सीने पर छाती का उभार, जो बेहद भारी, भरा हुआ और भारीपन के कारण नीचे की ओर झुका हुआ था, नाइटी के पतले कपड़े के भीतर बुरी तरह थिरक उठा। उसकी गहरी छाती की दरार उस ढीले गले से साफ और नुमायां नजर आ रही थी।
"पानी आ गया क्या?" मुनाई की आवाज में सुबह की एक भारी कशिश थी, जिसमें कोई नरमी नहीं बल्कि एक हुक्म था।
"हां, सिस्टर्न में पानी गिरने लगा है। मैंने बाल्टियां भी चेक कर ली हैं," शोम ने अपने संकरे कंधों को थोड़ा और सिकोड़ते हुए, बेहद दबी आवाज में कहा।
मुनाई बेड से उतरी। जब वह चलती, तो उसके भारी स्तनों का वह उभार उसकी हर सांस के साथ एक मदहोश कर देने वाली हरकत पैदा करता था। वहाँ से नीचे उतरते ही उसकी कमर थोड़ी नर्म और स्वाभाविक रूप से घूमी हुई थी, जो सीधे जाकर उसके भारी, चौड़े और मांसल नितंबों से जुड़ती थी। उसके नीचे का हिस्सा किसी भारी स्तंभ की तरह मजबूत और गोश्त से भरा हुआ था। उसकी जांघें इतनी मोटी, थिरकती हुई और आपस में सटी हुई थीं कि चलने पर उनका घर्षण साफ महसूस होता था।
वह सीधे उस छोटे इनडोर बाथरूम की तरफ बढ़ी, लेकिन उसके दरवाजे पर खड़े होते ही उसने घृणा से अपनी नाक सिकोड़ ली। वह छोटी सी जगह, वह बंद दीवारें—मुनाई को वहां दम घुटता हुआ महसूस होता था। उसका वह विशाल, मांसल और कामुक बदन उस तंग कोठरी में समाने से इनकार करता था।
"मैं इस घुटनभरे डिब्बे में नहीं नहा सकती, शोम। मेरा दम घुटता है यहाँ," मुनाई ने अपनी भारी जांघों पर हाथ रखते हुए कहा, जिससे उसके नितंबों का घेरा और भी चौड़ा नजर आने लगा। "मैं पिछले अहाते में ही नहाऊँगी। वहीं कंक्रीट की टंकी के पास।"
शोम कुछ नहीं बोला। वह जानता था कि मुनाई को टोकने का कोई फायदा नहीं था। वह अपनी मर्जी की मालिक थी। उसे क्या पता था कि उसकी यही सहूलियत, उसका यही खुलापन, सड़क D3 की उन ऊंची दीवारों के पार क्या गुल खिलाने वाला था। सुबह के 6:30 बज चुके थे, और मुनाई के उस भारी, बेकाबू बदन का अपनी मंजरी पर उतरने का वक्त करीब आ रहा था।
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सुबह के ठीक 6:15 बज रहे थे। घर के भीतर की हवा अब थोड़ी और गर्म होने लगी थी, जिसमें रसोई से उठने वाले केरोसिन स्टोप की तीखी गंध और चाय की पत्ती की खुशबू आपस में मिल रही थी। मुनाई रसोई की संकरी चौखट पर खड़ी थी। वह जगह इतनी छोटी थी कि जब वह स्टोप की तरफ मुड़ती, तो उसके भारी, चौड़े नितंब एक तरफ की दीवार को छू जाते और उसका वह भारी भरा-पूरा सीना सामने वाले शेल्फ से टकराने को होता। इस तंग मकान की हर एक दीवार जैसे उसके उस लबालब भरे, मांसल बदन को जबरदस्ती भींचने की कोशिश कर रही थी।
उसने चूल्हे पर चाय का सस्पैन चढ़ाया। उसकी सूती नाइटी, जो रात की नींद के बाद बदन पर कई जगह से मुड़ चुकी थी, उसके शरीर के उभारों को और भी ज्यादा उभार रही थी। जब वह हाथ ऊपर उठाकर शेल्फ से चीनी का डिब्बा उतारने लगी, तो नाइटी ऊपर को खिंच गई। उसकी गोरी, मांसल और भारी जांघों का एक बड़ा हिस्सा नीचे से दिखने लगी—वो जांघें जो इतनी थुलथुली और गोश्त से भरी थीं कि उनके आपस में रगड़ने से नाइटी का कपड़ा उनकी परतों के बीच फंस जाता था।
शोम वहीं पास में पड़ी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा था। उसकी नज़रें अपनी बीवी के उस बेकाबू, ढीठ बदन पर टिक गईं। 35 की उम्र में भी मुनाई का यह जिस्म किसी भी मर्द की आँखों में सैलाब ला सकता था, लेकिन शोम के भीतर एक अजीब सी कम्ज़ोरी और खौफ था। वह अपनी इस अति-कामुक बीवी के सामने खुद को हमेशा एक बौना महसूस करता था। उसकी रीढ़ का झुकाव और गहरा हो गया जब मुनाई ने चाय का कप उसके सामने टेबल पर पटका।
"तुकाई अभी तक सोया हुआ है?" मुनाई ने अपने घने, सीधे बालों को उंगलियों से सुलझाते हुए पूछा। उसके बालों की महक—जो सिकाकाई और आंवला के तेल की थी—पूरी रसोई में फैल गई।
"हां, रात को देर से सोया था। उसे सोने दो, अभी कॉलेज की बस आने में टाइम है," शोम ने चाय की चुस्की लेते हुए सहमी आवाज में कहा।
ठीक उसी वक्त, बगल के छोटे से कमरे से पांच साल के तुकाई के कुनमुनाने की आवाज आई। मुनाई भारी कदमों से उस तरफ बढ़ी। जब वह चलती थी, तो उसके भारी और नीचे की तरफ झुके हुए स्तनों का उभार एक अजीब सी लय में ऊपर-नीचे होता था, जो उसकी नाइटी के पतले सूती कपड़े को अंदर से लगातार धकेलता रहता था। उसने कमरे में जाकर देखा, तुकाई बिस्तर पर उल्टा लेटा हुआ था। उसने उसके सिर पर हाथ फेरा, लेकिन उसका ध्यान बार-बार अपनी ही देह पर जा रहा था जो उमस और चिपचिपाहट से बेहाल हो रही थी।
सुबह के 6:30 बज चुके थे। टाउनशिप के नियमों के मुताबिक पानी की सप्लाई बंद होने में सिर्फ आधा घंटा बचा था।
मुनाई वापस उस छोटे इनडोर बाथरूम की तरफ गई। उसने जैसे ही उसका लकड़ी का पल्ला खोला, अंदर की सीलन भरी, तंग हवा उसके चेहरे से टकराई। अंदर एक बाल्टी और एक डिब्बा रखने के बाद पैर रखने की भी ढंग की जगह नहीं थी। मुनाई ने अंदर कदम रखा, लेकिन जैसे ही उसने दरवाजा बंद करना चाहा, उसकी चौड़ी पीठ और भारी कूल्हे दीवार से सटने लगे। उसे लगा जैसे यह बाथरूम नहीं, कोई संदूक है जो उसकी इस विशाल, कामुक देह को जिंदा दफन कर देगा।
"नहीं! मुझसे नहीं होगा," वह बड़बड़ाई। उसकी सांसें तेज होने लगी थीं, जिससे उसका वह भारी, गहरा सीना और भी तेजी से ऊपर-नीचे होने लगा। उसकी गोरी गर्दन पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमकने लगी थीं, जो फिसलकर उसकी छाती की उस गहरी दरार में समा रही थीं।
उसने झटके से दरवाजा खोला और बाहर आ गई। उसका चेहरा गुस्से और घुटन से लाल हो चुका था।
"शोम! मैं अंदर नहीं नहा रही। मैं बाहर पिछले अहाते में जा रही हूँ। उस कंक्रीट की टंकी के पास कम से कम खुली हवा तो है," उसने अपनी कमर पर दोनों हाथ टिकाते हुए हुक्म सुनाया। उसके इस तरह हाथ रखने से उसके नितंबों का घेरा और भी ज्यादा चौड़ा और भारी नजर आने लगा।
शोम ने एक बार फिर उसकी तरफ देखा—उसका वह दुबला चेहरा और संकरे कंधे मुनाई के इस रौब के आगे और सिकुड़ गए। "पर मुनाई... बाहर खुला अहाता है। हालांकि दीवारें ऊंची हैं, पर फिर भी..."
"फिर भी क्या?" मुनाई ने उसे बीच में ही काट दिया, उसकी आँखों में एक अजीब सा तीखापन था। "दीवारें इतनी ऊंची हैं कि बाहर गली से कोई देख नहीं सकता। और ऊपर टिन का शेड भी है। मुझे इस डिब्बे जैसे बाथरूम में अपनी जान नहीं देनी। तुम बस तुकाई को देखो।"
उसने अलमारी से अपनी एक पुरानी, हल्की सूती साड़ी निकाली। वह साड़ी इतनी पतली थी कि धूप में आर-पार देखा जा सकता था। उसने एक मोटा सा 'लाइफबॉय' साबुन का टुकड़ा उठाया, एक सूती तौलिया अपने कंधे पर डाला, और भारी, थिरकती जांघों के साथ पिछले अहाते के लोहे के दरवाजे की तरफ बढ़ गई।
घड़ी की सुइयां अब 6:40 की तरफ बढ़ रही थीं। ठीक पांच मिनट बाद, मुनाई का वह भारी, लबालब भरा बदन उस खुले अहाते में उतरने वाला था, इस बात से पूरी तरह अनजान कि सड़क D3 की उन ऊंची दीवारों के ठीक पीछे, सड़क D2 की छतों पर कुछ भूखी और परपीड़क नजरें अपनी आंखें साफ करके उसके हुस्न का बेसब्री से इंतजार कर रही थीं।
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सुबह के ठीक 6:45 हुए थे। पिछले अहाते में हवा थोड़ी ठंडी थी, लेकिन टिन के आधे शेड के नीचे का माहौल उमस और भारी सन्नाटे से भरा हुआ था। कंक्रीट की वह बड़ी, चौकोर टंकी पानी से लबालब भरी जा चुकी थी, और अब सरकारी पाइप से पानी की आखिरी धार एक भारी, गूंजती हुई आवाज के साथ उसमें गिर रही थी।
मुनाई ने अहाते के भारी लोहे के दरवाजे को अंदर से बंद कर दिया। उसके सामने अब सिर्फ वो ऊंची, सीमेंटेड दीवार थी जो उसके इस अहाते को पीछे की गली और सड़क D2 के मकानों से अलग करती थी। मुनाई को इस बात का पूरा भरोसा था कि यह दीवार इतनी ऊंची है कि कोई भी आम इंसान इसके पार नहीं झांक सकता। इसी बेफिक्री ने उसके भीतर एक बेबाक ढीठपन भर दिया था।
उसने अपने कंधे से उस पतले सूती तौलिए को हटाया और उसे कंक्रीट की टंकी के सूखे किनारे पर रख दिया। उसकी हल्की, धानी रंग की सूती साड़ी—जो पहले ही बहुत पतली थी—उसकी भारी देह की गर्मी और पसीने से जगह-जगह चिपकने लगी थी। मुनाई ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी नाइटी के बटन खोले और उसे सरकाकर नीचे गिरा दिया। अब उसके भारी, विशाल बदन पर सिर्फ वह एक पतली सी सूती साड़ी बची थी, जिसे उसने पेटीकोट के बिना ही, सीधे अपनी नंगी त्वचा पर एक लपेटे में कस लिया था।
इस इकलौते लपेटे ने मुनाई के उस अति-कामुक जिस्म के भूगोल को और भी ज्यादा खतरनाक बना दिया था।
उसने अपने दोनों हाथों को पीछे ले जाकर अपने उन घने, स्याह काले और भारी बालों को खोला। जैसे ही उसने अपना सिर झटका, वे लंबे रेशमी बाल उसकी चौड़ी, गोरी पीठ को ढकते हुए सीधे उसके भारी, मांसल नितंबों के निचले हिस्से को छूने लगे। उसका वह भारी भरा-पूरा सीना, जिसके स्तनों का उभार भारीपन के कारण नीचे की तरफ झुका हुआ था, इस खुली हवा में आकर और भी ज्यादा तन गया। साड़ी का पतला कपड़ा उसकी गहरी छाती की दरार को छुपाने में पूरी तरह नाकाम था; बल्कि वह दरार उस पतले कपड़े के आर-पार साफ नजर आ रही थी।
मुनाई ने पीतल की एक भारी, पुरानी बाल्टी उठाई। जब वह टंकी से पानी भरने के लिए आगे झुकी, तो उसकी सूती साड़ी पीछे से उसकी चौड़ी कमर और उन भारी, मांसल कूल्हों पर बुरी तरह कस गई। उसके नितंबों का वह विशाल घेरा उस झुकाव के कारण और भी ज्यादा चौड़ा और गोलाकार नजर आने लगा। उसकी मोटी, आपस में सटी हुई जांघों का मांस उस खिंचाव से और सख्त हो गया था।
उसने पानी से लबालब भरी बाल्टी उठाई। उसके गोरे, गोल और भरे-भरे बाजुओं की नसें उस वजन से थोड़ी उभर आईं। मुनाई ने अपनी आंखें बंद कीं और पहला मग भरकर ठंडा पानी सीधे अपने सिर पर डाल लिया।
"आह..." उसके हलक से ठंडक और सुकून की एक धीमी, दबी हुई सिसकी निकली।
वह ठंडा पानी उसके घने, काले बालों को भिगोता हुआ, उसकी गोरी गर्दन से नीचे उतरा और सीधे उसकी छाती के उस भारी उभार पर जा गिरा। पानी के लगते ही वह पतली सूती साड़ी पूरी तरह पारदर्शी होकर उसकी त्वचा से चिपक गई। मुनाई के गोरे जिस्म का रंग उस गीले कपड़े के नीचे से इस तरह झांकने लगा मानो वह पूरी तरह नग्न हो। ठंडे पानी के मारे उसके बदन का रोम-रोम खड़ा हो गया, और उसकी छाती के कड़े हो चुके निप्पल्स उस गीली साड़ी के सीने वाले हिस्से को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिखने लगे।
वह पूरी तरह अपने ही बदन के इस मलबे में खोई हुई थी। उसने लाइफबॉय साबुन का वह लाल टुकड़ा उठाया और उसे अपने हाथों में रगड़ने लगी। जब झाग बन गया, तो उसने अपने दोनों हाथ अपनी गोरी, चौड़ी गर्दन पर फेरे। वहाँ से होते हुए उसके हाथ उसके उन भारी, बेहद आकर्षक स्तनों पर गए। वह अपने ही हाथों से अपने उस भारी गोश्त को सहलाते हुए साबुन का झाग मल रही थी, ताकि रात भर की वो चिपचिपी उमस दूर हो सके। उसके हाथों के हर एक चाल के साथ उसकी छाती का वह भारी उभार एक मदहोश कर देने वाली लय में थिरक रहा था।
साड़ी का गीला पल्लू खिसककर उसके एक कंधे से नीचे गिर चुका था, जिससे उसकी आधी गोरी पीठ और उसकी गहरी नाभि का हिस्सा पूरी तरह हवा में खुल गया था। वह बेखबर थी कि कंक्रीट की इस टंकी की ठंडक उसके बदन की आग को शांत नहीं कर रही थी, बल्कि उस अहाते के पार कुछ और ही सुलग रहा था।
वह बिल्कुल अकेली थी, अपनी ही दुनिया में मस्त, अपने इस भारी, मांसल स्तंभ जैसी जांघों पर साबुन का झाग रगड़ती हुई, जहां पानी की बूंदें उसकी जांघों के घर्षण के बीच से फिसलकर नीचे चिकने टखनों की तरफ बह रही थीं। उसे जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि घड़ी की सुइयां अब 6:55 मिनट दिखा रही हैं—उसका यह पंद्रह मिनट का खेल अब अपने आखिरी और सबसे खतरनाक मोड़ पर था।
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सड़क D3 की उस ऊंची, सीमेंटेड दीवार के ठीक पीछे एक संकरी और सुनसान पिछड़ी गली थी, जो सीधे सड़क D2 के मकानों के पिछले हिस्सों से जुड़ती थी। सुबह के ठीक 6:56 मिनट हो रहे थे। सड़क D2 के क्वार्टर नंबर 23 की छत पर, प्लास्टिक की एक बड़ी, काली सिंटेक्स टंकी के पास एक अजीब सी हलचल थी।
वहाँ दो मर्द खड़े थे। उनमें से एक, जो इस क्वार्टर का मालिक था, लुंगी और बनियान पहने हाथ में टॉर्च लिए टंकी के ऊपर का ढक्कन खोलकर पानी का लेवल चेक कर रहा था। टाउनशिप में सात बजते ही पानी बंद होने वाला था, इसलिए यह देखना जरूरी था कि दिन भर के लिए टंकी पूरी भरी है या नहीं। "अरे सुन... पानी बस भरने ही वाला है, वाल्व बंद करना पड़ेगा," उसने नीचे झुककर ढक्कन हटाया। लेकिन जैसे ही वह ढक्कन रखने के लिए सीधा हुआ, उसकी नज़र अनजाने में ही सड़क D3 के उस 24 नंबर क्वार्टर के खुले अहाते पर जा गिरी, जो उनकी छत की ऊंचाई से बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था।
उसकी आँखें वहीं की वहीं पथरा गईं। उसके हाथ से प्लास्टिक का ढक्कन छूटते-छूटते बचा।
"क्या हुआ रे? वाल्व बंद करूँ क्या?" बगल में खड़े उसके साले ने पूछा, जो एक ढीली-ढाली हाफ पैंट में था और नींद में अपनी जांघें खुजला रहा था।
"चुप... बिल्कुल चुप! आवाज़ मत कर," जीजा की आवाज़ में एक अजीब सा थरथराहट भरा सन्नाटा था। उसने अपने साले का हाथ पकड़ा और उसे सिंटेक्स टंकी की ओट में, दीवार के छज्जे के पीछे खींच लिया। "इधर आ... और चुपचाप नीचे देख।"
साले ने कशमकश में अपनी नींद से भरी आँखें मलीं और टंकी के पीछे छिपते हुए नीचे झांका। अगले ही पल, दोनों मर्दों की सांसें उनके हलक में ही अटक गईं।
नीचे, उस टिन के आधे शेड के नीचे, मुनाई का वह भारी, मांसल और पानी से पूरी तरह तर-बतर बदन अपनी पूरी कामुकता के साथ बिखरा हुआ था। सुबह की ताज़ा धूप अब दीवार के कोने को छूकर सीधे उस कंक्रीट की टंकी पर पड़ रही थी, जिससे मुनाई का गोरा, गदराया हुआ जिस्म किसी पके हुए फल की तरह चमक रहा था।
उन दोनों ने अपनी जिंदगी में ऐसी औरत कभी नहीं देखी थी। उनके अपने घरों में औरतें सूती साड़ियों के भीतर खुद को समेट कर रखती थीं, लेकिन यहाँ—उनकी आँखों के ठीक नीचे—एक बेहद खूबसूरत बंगालन सिर्फ एक पतली, धानी रंग की गीली साड़ी में खड़ी थी। वह साड़ी पानी के कारण उसके भारी, नीचे की तरफ झुके हुए स्तनों और उसकी चौड़ी, गहरी नाभि से इस तरह चिपक गई थी कि उसकी त्वचा का एक-एक इंच उन दोनों भूखे मर्दों की आँखों के सामने बेपर्दा था।
"भाई साहब... यह तो साक्षात अप्सरा है..." साले ने बेहद दबी, कांपती हुई आवाज़ में कहा। उसकी पैंट के ऊपर से उसका हाथ अनजाने में ही अपने निचले अंग पर चला गया, जिसे वह अब जोर-जोर से भींचने लगा था। उसके माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई थीं।
जीजा की हालत उससे भी बदतर थी। उसकी बनियान उसके सीने की तेज धड़कनों के साथ ऊपर-नीचे हो रही थी। उसने लुंगी के भीतर अपना हाथ डाल लिया था। वह अपनी सूखी जांघों को टंकी की ठंडी दीवार से सटाए, अपनी आँखें फाड़े मुनाई के हर एक चाल को चाट रहा था।
नीचे, मुनाई इस सब से पूरी तरह बेखबर थी। उसने पीतल की बाल्टी से आखिरी मग पानी उठाया और उसे अपनी चौड़ी, गोरी पीठ पर उड़ेल दिया। पानी की वह धार उसकी रीढ़ की हड्डी से होती हुई, उसके उन विशाल, गोलाकार नितंबों की गहरी दरार से फिसलकर उसकी मोटी जांघों के बीच समा गई। जब वह पानी के बहाव से अपनी आँखें बंद करके अपना सिर पीछे की तरफ झुकाती, तो उसका वह भारी सीना और गहरी छाती की दरार ऊपर की तरफ तन जाती।
छत पर छिपे उन दोनों मर्दों के मुंह से लार टपकने को थी। वे अपनी सांसें रोके, सुबह की उमस के बीच उस काली टंकी की ओट में चिपके रहे। वे अपनी पलकें भी नहीं झपका रहे थे, मानो एक सेकंड की भी ढील उस गुप्त तमाशे को उनसे छीन लेगी। टाउनशिप की रूटीन के मुताबिक वे सिर्फ पानी चेक करने आए थे, लेकिन उन्हें अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा और सबसे गंदा नशा मिल चुका था।
ठीक उसी वक्त, घड़ी की सुई सुबह के सात पर पहुँची।
'सुर्र-सुर्र-घड़...'। कंक्रीट की टंकी में गिरते हुए पानी की आवाज़ अचानक धीमी हुई और एक आखिरी हिचकी के साथ पाइप पूरी तरह सूखा हो गया। पानी की सप्लाई बंद हो चुकी थी।
मुनाई ने एक लंबी सांस ली। उसने टंकी के किनारे रखा वह सूखा तौलिया उठाया और उससे अपने उन घने, लंबे बालों को लपेट लिया। उसने अपनी उस पतली, गीली साड़ी को थोड़ा संभाला, जो उसके नितंबों पर बुरी तरह चिपकी हुई थी, और भारी, थिरकती हुई जांघों के साथ अहाते के लोहे के दरवाजे की तरफ बढ़ गई। दरवाजे का कुंडा खुलने की 'खट' की आवाज़ आई, और वह घर के भीतर चली गई। अहाता अब खाली था।
छत पर, सिंटेक्स की टंकी के पीछे से दोनों मर्द धीरे-धीरे बाहर निकले। उनकी सांसें इतनी तेज चल रही थीं मानो वे कोई मील लंबी दौड़ दौड़कर आए हों। जीजा ने अपनी लुंगी को संभाला, जो सामने से पूरी तरह तन चुकी थी। उसने अपने साले की तरफ देखा, जिसकी आँखें अभी भी उसी अहाते की खाली कंक्रीट की टंकी पर टिकी थीं।
"कल सुबह..." जीजा ने बेहद धीमी, हिंसक और कामुक आवाज़ में कहा, "कल सुबह ठीक 6:30 पर... हम यहीं मिलेंगे। यह दुधारू गाय ज़रूर इसी वक़्त के करीब नहाने आएगी "
साले ने बिना कुछ बोले सिर्फ अपना सिर हिलाया। बोकारो की उस ठंडी सुबह में, सड़क D3 के क्वार्टर नंबर 24 की दीवार के पार, एक बेहद खतरनाक और परपीड़क साज़िश की शुरुआत हो चुकी थी। मुनाई का वो 15 मिनट का आराम, अब इन भूखे भेड़ियों का रोज़ का शिकार बनने वाला था।
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Pehla Chapter khatam hua. Thodi purane khayalat ki hu to likhne ka style bhi waisa hi ho sakta hai. Bas thodi sachhi aur thodi masale ke sath ye kahani ap sabke samne rakh rahi hu. Asha karti hu apko padhkar achha lage.
Thank You
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(21-05-2026, 02:32 PM)TheHousewife Wrote: ==============
Pehla Chapter khatam hua. Thodi purane khayalat ki hu to likhne ka style bhi waisa hi ho sakta hai. Bas thodi sachhi aur thodi masale ke sath ye kahani ap sabke samne rakh rahi hu. Asha karti hu apko padhkar achha lage.
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Update thode fast do
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(21-05-2026, 03:29 PM)Mommylovesm Wrote: Update thode fast do
Koshish yahi rahegi.
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22-05-2026, 01:24 AM
(This post was last modified: 22-05-2026, 01:26 AM by TheHousewife. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
अध्याय 2: भट्टी की आंच और बंद दरवाजे
पिछले दस दिनों से बोकारो टाउनशिप के क्वार्टर नंबर 23 की सुबह का भूगोल पूरी तरह बदल चुका था। 42 साल का रामेश्वर प्रसाद, जो बोकारो स्टील प्लांट के 'ब्लास्ट फर्नेस' डिपार्टमेंट में एक सीनियर फोरमैन था, अब सुबह का सायरन बजने से पहले ही बिस्तर पर कशमकश करने लगता था। उसकी मटमैली लुंगी, उसका भारी, थुलथुला पेट और चेहरे पर उग आई तीन दिन की खिचड़ी दाढ़ी—सब कुछ एक अजीब सी हड़बड़ाहट से भरे रहते थे।
रामेश्वर की शादी को पंद्रह साल हो चुके थे। उसकी बीवी सरिता, जो उम्र के चालीसवें पड़ाव पर पहुंचकर भारी, बेडौल और हर वक्त चिड़चिड़ी रहने वाली घरेलू औरत बन चुकी थी, सुबह के वक्त रसोई में पीतल के बर्तनों को ऐसे पटकती मानो कोई जंग लड़ रही हो। रामेश्वर को अपनी उस मोटी, बिखरे बालों वाली बीवी को देखकर अब घृणा होती थी। उसके दिमाग में तो बस एक ही नाम का भूत सवार था—D3 की वो बंगाली औरत, मुनाई मित्रा।
सुबह के ठीक 6:44 मिनट पर, रामेश्वर और उसका साला मिथिलेश, दोनों किसी ट्रेंड शिकारी की तरह अपनी छत पर लगी उस काली सिंटेक्स टंकी के पीछे दुबक जाते थे। मिथिलेश, 24 साल का एक निठल्ला नौजवान, जिसकी आँखें हवस के मारे हर वक्त लाल रहती थीं, अपनी पैंट की जेबों में हाथ डाले दीवार की दरार से नीचे झांकने लगता।
इन दस दिनों में उन्होंने मुनाई के बदन के एक-एक हिस्से का नक्शा अपने दिमाग में उतार लिया था। जब वह पीतल की बाल्टी उठाती, जब उसकी सूती साड़ी का गीला कपड़ा उसके भारी, नीचे झुके हुए स्तनों से चिपक जाता, और जब वह अपनी मोटी, गोश्त से भरी जांघों पर साबुन का सफेद झाग मलती—वह नज़ारा रामेश्वर के लिए किसी अफीम के नशे जैसा हो चुका था। दिन भर कारखाने की तपती भट्टी के सामने खड़े होकर भी, उसे अपनी आँखों के सामने सिर्फ मुनाई की वो गहरी, चौड़ी नाभि और पानी से तर-बतर, भारी नितंबों की हरकत ही दिखाई देती थी।
दोपहर के दो बज चुके थे। बोकारो स्टील प्लांट का 'ब्लास्ट फर्नेस' इलाका किसी जलते हुए जहन्नुम जैसा लग रहा था। चारों तरफ भारी मशीनों का 'धड़-धड़' शोर, क्रेन की गड़गड़ाहट और पिघले हुए लोहे से उठती हुई लाल-नारंगी लपटें हवा को झुलसा रही थीं। काले कोयले की कालिख और ग्रीस की तीखी गंध हवा में घुली हुई थी। यह जगह शोम मित्रा के उस साफ-सुथरे, एयर-कंडीशंड एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिस से कोसों दूर थी, जहाँ वह फाइलों के पीछे अपनी कमजोर शख्सियत को छुपाए बैठा रहता था। इसी वजह से रामेश्वर इस बात से पूरी तरह बेफिक्र था कि उसके इस गंदे खेल की भनक कभी मित्रा बाबू को लगेगी।
"अरे रामेश्वर! जरा हाथ बढ़ाओ, इस वाल्व को टाइट करना है," शिफ्ट इनचार्ज यादव जी ने पसीना पोंछते हुए आवाज दी।
रामेश्वर ने अनमने ढंग से काम निपटाया। जैसे ही आधे घंटे का टी-ब्रेक हुआ, वह, यादव जी और रोलिंग मिल का एक और सहकर्मी, मिश्रा जी, कारखाने के एक ठंडे कोने में लगे लोहे के बेंच पर बैठ गए। मिथिलेश, जो प्लांट में ठेकेदारी पर मजदूरी का काम ढूंढने के बहाने रोज अंदर आ जाता था, वह भी उनके पास आकर बैठ गया।
कांच के गिलासों में गर्म, कड़क चाय आ चुकी थी। चारों तरफ मर्दों का वो ठेठ, खुरदरा माहौल था जहाँ काम के बाद सिर्फ औरत और राजनीति की बातें होती थीं।
"साला, इस बार गर्मी बदन को सुखा दे रही है। भट्टी के सामने खड़े-खड़े चमड़ी झुलस जाती है," मिश्रा जी ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा।
रामेश्वर ने चाय की चुस्की ली, उसकी आँखों में एक अजीब सी ठरक भरी चमक कौंधी। उसने चारों तरफ देखा, अपनी मूंछों पर हाथ फेरा और थोड़ा आगे झुककर दबी आवाज में बोला, "मिश्रा जी, तुम भट्टी की आंच की बात करते हो... हम कहते हैं कि असली आंच देखनी है, तो सुबह के 6:45 बजे हमारी छत पर आओ। ऐसी आग धधक रही है D3 की एक गली में, कि अच्छे-अच्छे मर्दों का पानी छूट जाए।"
यादव जी हँसे, "क्यों बे रामेश्वर, इस उम्र में कौन सा नया भूत पकड़ लिया? तुम्हारी सरिता भाभी को पता चला तो बेलन से हुलिया बिगाड़ देंगी।"
"धत तेरी सरिता की!" रामेश्वर ने हिकारत से थूका। "उस बोरी जैसी औरत की बात मत करो। हम बात कर रहे हैं उस बंगाली बाबू की मेहरारू की, जो अभी नई-नई D3 के 24 नंबर क्वार्टर में आई है। नाम है मुनाई।"
मिश्रा जी ने बीड़ी का धुआं छोड़ते हुए कहा, "अच्छा, वो मित्रा जी की बीवी? वो तो बड़ी सीधी-सादी दिखती है भाई, सूती साड़ी में सिर ढके घूमती है टाउनशिप में।"
"वही तो धोखा है मिश्रा जी!" मिथिलेश बीच में ही कूद पड़ा, उसकी जीभ अपनी सूखी हुई होंठों पर फिर गई। "बाहर से जो जितनी ढकी है, अंदर से उतनी ही लबालब भरी है। सुबह बाथरूम की घुटन के मारे वो पिछले अहाते में नंगे बदन... मतलब सिर्फ एक पतली सी साड़ी लपेटकर नहाती है। कसम लोहे की, ऐसा भारी और गदराया हुआ बदन है उसका, कि देखकर पतलून फट जाए।"
रामेश्वर ने अपनी चाय की प्याली रखी और अपने हाथों से हवा में आकार बनाते हुए, बेहद क्रूड और कामुक लहजे में बोलने लगा, "35 की है, पर बदन ऐसा कि जैसे कोई रसीला, पका हुआ आम हो। उसकी छाती का उभार इतना भारी और भरा हुआ है कि जब वो पानी डालती है, तो वो भारी गोश्त उसकी नाइटी या साड़ी के भीतर बुरी तरह थिरकता है। और नितंब... बाप रे बाप! इतने चौड़े और मांसल कूल्हे हैं कि जब वो झुकती है पानी भरने, तो पीछे का पूरा घेरा ऐसा तना हुआ दिखता है कि किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए। गोरा रंग ऐसा कि पानी की बूंदें उसकी जांघों के घर्षण के बीच से चमकती हुई नीचे गिरती हैं।"
यादव जी और मिश्रा जी ने एक-दूसरे की तरफ देखा और जोर से ठहाका मारकर हंस पड़े। उन्हें रामेश्वर की बातों पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं हुआ।
"अरे रामेश्वर! तुमको भट्टी की गर्मी ज्यादा चढ़ गई है दिमाग पर," यादव जी ने उसकी पीठ पर हाथ मारते हुए कहा। "D3 सरकारी अफसरों और बाबुओं की कॉलोनी है। वहाँ ऐसी खुलेआम नहाने वाली औरत कहाँ से आ जाएगी? तुम अपनी ठरक में किसी मामूली सी औरत को भी अप्सरा समझ बैठे हो।"
"हां भाई," मिश्रा जी ने भी नमक मिर्च लगाया, "मर्द जब भूखा होता है, तो उसे सूखी रोटी भी पुलाव जैसी लगती है। तुम अपनी सरिता भाभी के सताए हुए हो, इसलिए तुमको हर बंगाली औरत में मेनका नजर आ रही है। चलो, शिफ्ट का टाइम हो गया, काम पर लौटो। ख़याली पुलाव बनाना बंद करो।"
रामेश्वर का चेहरा गुस्से और खीझ से लाल हो गया। वह सच कह रहा था, उसने अपनी आँखों से उस बेकाबू, अति-कामुक देह को एक-एक इंच पिघलते देखा था, लेकिन उसके साथी उसे एक ठरकी बुड्ढे की बकवास समझकर खारिज कर रहे थे।
"ठीक है... मत मानो," रामेश्वर ने अपनी लुंगी को झटकते हुए खड़ा हुआ, उसकी आँखें नफरत और हवस से संकरी हो गईं। "तुम साले भट्टी की राख छानते रहो। कल सुबह फिर 6:45 बजेंगे, और फिर वही पंद्रह मिनट का खेल होगा। हम तो अपनी आँखें सेकेंगे, तुम लोग यहीं सड़ते रहो।"
वह दोनों वहाँ से चले गए, लेकिन रामेश्वर के भीतर की हवस अब और भी ज्यादा हिंसक हो चुकी थी। उसे इस बात का घमंड था कि टाउनशिप की उस सबसे कामुक औरत का सबसे बड़ा राज सिर्फ उसके और मिथिलेश के पास था। पर वह इस बात से पूरी तरह बेखबर था कि हर रोज़ सुबह घर से गायब रहने की उसकी इस आदत पर, उसकी अपनी ही बीवी सरिता की शक से भरी नजरें अब टिकने लगी थीं।
अगली सुबह का सन्नाटा सड़क D2 की उस छत पर किसी गहरी साज़िश की तरह पसरा हुआ था। सुबह के ठीक 6:46 मिनट हो रहे थे। हवा में बोकारो की वही चिर-परिचित सीलन और कोयले की महक थी। रामेश्वर प्रसाद और उसका साला मिथिलेश, दोनों हमेशा की तरह काली सिंटेक्स टंकी की ओट में, सीमेंट की छाती जितनी ऊँची मुंडेर से चिपके हुए थे।
उनकी सांसें भारी थीं, और आँखें नीचे डी-३ स्ट्रीट के २४ नंबर क्वार्टर के पिछले अहाते पर टिकी हुई थीं। नीचे, मुनाई हमेशा की तरह अपने उसी मदहोश कर देने वाले दिनचर्या में थी। उसकी धानी रंग की सूती साड़ी पानी से पूरी तरह भीगकर उसकी त्वचा से चिपक चुकी थी। जब वह कंक्रीट की टंकी से पीतल की भारी बाल्टी भर रही थी, तो उसका वह अति-कामुक, भारी बदन और उसके विशाल, चौड़े नितंबों का घेरा धूप में साफ चमक रहा था। रामेश्वर का एक हाथ उसकी लुंगी के भीतर था, और उसका पूरा बदन हवस की एक अजीब सी थरथराहट से कांप रहा था। मिथिलेश अपनी पैंट के ऊपर से ही खुद को सहलाते हुए अपनी राल टपका रहा था। दोनों इस कदर उस मांसल देह को अपनी आँखों से चाटने में मग्न थे कि उन्हें अपने पीछे कदमों की आहट तक सुनाई नहीं दी।
छत पर अब सरिता खड़ी थी।
पिछले चार-पांच दिनों से वह देख रही थी कि उसका मर्द सुबह पानी का वाल्व बंद करने के बहाने छत पर जाता है, तो पूरे आधे घंटे तक नीचे नहीं उतरता। आज वह हाथ में कपड़े धोने का प्लास्टिक का टब लिए चुपचाप ऊपर आई थी। लेकिन सामने का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई।
उसका 42 साल का अधेड़ पति, जिसका पेट बाहर निकला हुआ था, अपनी लुंगी आधी उठाए, सिंटेक्स टंकी के पीछे छिपकर नीचे किसी बिल्ली की तरह ताक रहा था, और उसका अपना सगा भाई मिथिलेश भी उसी ठरक में अंधा होकर अपनी पैंट भींच रहा था।
सरिता का चेहरा गुस्से, जलन और शर्म के मारे तमतमा उठा। उसने प्लास्टिक का भारी टब वहीं सीमेंट के फर्श पर दे मारा।
'धड़ाम!'
उस सन्नाटे में वह आवाज़ किसी बम के फटने जैसी थी। रामेश्वर और मिथिलेश दोनों ऐसे चौंके मानो किसी ने उन पर ठंडा पानी डाल दिया हो। रामेश्वर ने झटके से अपनी लुंगी के भीतर से हाथ बाहर निकाला और हड़बड़ाकर पीछे मुड़ा। मिथिलेश का चेहरा डर के मारे सफेद पड़ गया।
"शर्म नहीं आती तुम दोनों को? काले मुंह के राछस! यहाँ छत पर आकर यह नीच काम कर रहे हो?" सरिता की आवाज़ में एक अजीब सी चीख थी, जो उसके भीतर की सालों की असुरक्षा और गुस्से से पैदा हुई थी। वह भारी कदमों से आगे बढ़ी, उसका थुलथुला बदन गुस्से से कांप रहा था।
"चुप कर! काहे चिल्ला रही है, नीचे आवाज जाएगी," रामेश्वर ने अपनी लुंगी संभालते हुए, अपनी घबराहट को छुपाने के लिए ज़ोर से डांटा। उसकी आँखों में रंगे हाथों पकड़े जाने का खौफ साफ दिख रहा था।
"काहे चुप करूँ? क्यों न चिल्लाऊँ?" सरिता ने मुंडेर के पास आकर नीचे झांका। उसकी नज़र सीधे उस अहाते पर गई, जहाँ मुनाई अब बाल्टी रखकर खड़ी हो चुकी थी और अपनी गीली साड़ी को संभाल रही थी। मुनाई का वह बेहद खूबसूरत, गोरा और भारी गदराया हुआ बदन देखकर सरिता के भीतर की औरत जलकर राख हो गई। वह खुद 40 की उम्र में बेडौल हो चुकी थी, और नीचे खड़ी 35 साल की वह बंगाली औरत किसी रसीले फल की तरह कयामत ढा रही थी।
"अच्छा! तो इस कुलच्छनी, रांड के चक्कर में तुम दोनों सुबह-सुबह यहाँ आकर अपनी लंगोट ढीली करते हो?" सरिता ने सीधे मुनाई की तरफ उंगली उठाई, उसकी आँखों से खून उतर आया था। "यह छिनाल औरत जान-बूझकर यहाँ खुले में अपना यह भारी गोश्त दिखाती फिरती है ताकि मोहल्ले के मर्दों का ईमान डोल जाए! और तुम दोनों... तुम दोनों इसके जाल में फंसकर यहाँ कुत्ता बने बैठे हो!"
"दीदी, धीरे बोलो... नीचे सुन लेगी वो," मिथिलेश ने सहमते हुए अपनी बहन का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
"छोड़ मेरा हाथ!" सरिता ने मिथिलेश को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। "शर्म आनी चाहिए तुझे, कुंवारा लड़का होकर इस छिनाल जैसी पड़ोसन का नंगा बदन देख रहा है! और तुम..." उसने रामेश्वर की छाती पर मुक्का मारा, "तुम जो इस उम्र में ठरकी बुड्ढे बने घूम रहे हो, तुम्हारी इस हवस का इलाज मैं आज ही करूँगी। बहुत गरमी चढ़ी है न उस बंगाली मेहरारू को अपना यह भारी बदन दिखाने की? आज उसकी यह सारी ठसक मैं न निकाल दूँ, तो मेरा नाम भी सरिता नहीं!"
रामेश्वर ने उसका हाथ पकड़कर रोकने की कोशिश की, "सरिता, पागल मत बन! बात घर में ही रख, तमाशा मत कर।"
"तमाशा तो अब होगा, रामेश्वर प्रसाद! जो तमाशा तुम रोज़ सुबह यहाँ छिपकर देखते हो, वो तमाशा आज पूरी डी-३ स्ट्रीट देखेगी," सरिता ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया। उसका चेहरा गुस्से से पूरी तरह विकृत हो चुका था। वह अपनी साड़ी के पल्लू को अपनी भारी कमर में कसती हुई, गुस्से से पैर पटकती हुई छत की सीढ़ियों की तरफ भागी।
रामेश्वर और मिथिलेश दोनों ऊपर ही हक्के-बक्के खड़े रह गए। उन्हें समझ आ गया था कि हवस का जो खेल वे इतने दिनों से चुपचाप खेल रहे थे, वह अब एक भयानक घरेलू और सामाजिक तूफान में बदलने वाला था। सरिता सीधे डी-३ स्ट्रीट के उस २४ नंबर क्वार्टर की तरफ बढ़ रही थी, जहाँ मुनाई अभी-अभी नहाकर अपने घर के भीतर गई थी।
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सरिता किसी पागल हथिनी की तरह सीढ़ियों से नीचे उतरी। रामेश्वर और मिथिलेश के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ रही थीं; उनका पूरा बदन डर के मारे पसीने से नहा गया था। अगर यह बात फैली, तो न सिर्फ रामेश्वर की नौकरी पर आँच आती, बल्कि पूरे टाउनशिप में थू-थू हो जाती।
"सरिता! रुक, अरे बात तो सुन... मत बढ़ा बात को!" रामेश्वर ने भागते हुए अहाते के पास उसका हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन सरिता ने झटका मारकर उसे पीछे ढकेल दिया।
"दीदी, भगवान के लिए रुक जाओ, बदनामी हो जाएगी!" मिथिलेश ने मिन्नतें करते हुए उसके आगे आने की कोशिश की, पर गुस्से में अंधी हो चुकी सरिता के आगे दोनों मर्दों की एक न चली। वह उनके हाथों को झटकती, अपनी भारी कमर को मटकाती हुई सीधे पिछले अहाते के लकड़ी के दरवाजे को खोलकर उस संकरी पिछली गली को पार कर गई। रामेश्वर और मिथिलेश बेबसी और खौफ के मारे उसके पीछे-पीछे दौड़ रहे थे, पर उसे रोकने की हिम्मत अब दोनों में नहीं थी।
सरिता सीधे मित्रा जी के क्वार्टर के पिछले लकड़ी के दरवाजे पर पहुँची और उसने अपने पूरे दम से दरवाजे पर मुक्के बरसाने शुरू कर दिए।
'धाड़! धाड़! धाड़!'
"निकलो बाहर! ऐ बंगालन, निकलो बाहर! जरा हम भी तो देखें कि कितनी बड़ी महारानी हो तुम!" सरिता की चीख उस शांत सुबह में किसी बिजली की तरह कड़की।
घर के भीतर, मुनाई अभी-अभी नहाकर आई थी। वह उस घुटनभरे बाथरूम से बचकर अपने अहाते में नहाने के बाद अभी राहत की सांस ही ले रही थी। उसने अपनी सूती, गीली साड़ी उतारकर वहीं अहाते की बाल्टी में डाल दी थी और बदन सुखाने के लिए अपनी एक पुरानी, धुल-धुल कर बेहद पतली और झीनी हो चुकी पीले रंग की नाइटी पहन ली थी। वह नाइटी इतनी पुरानी थी कि शरीर के उभारों के सामने वह बिल्कुल पारदर्शी लग रही थी। ऊपर के दो बटन टूटे होने के कारण उसका वह भारी, लबालब भरा हुआ सीना और गहरी छाती की दरार साफ झलक रही थी। बिना किसी ब्रा-पैंटी के, उस पतली नाइटी के भीतर से उसके स्तनों का भारीपन और उसकी चौड़ी कमर के मोड़ पूरी तरह नज़र रहे थे।
दरवाजे पर लगातार हो रही उस असभ्य आवाज को सुनकर मुनाई के गोल चेहरे पर गुस्से और हैरत की लकीरें उभर आईं। उसने झटके से पिछले दरवाजे की सांकल खोली।
दरवाजा खुलते ही सामने का नजारा अजीब था। सामने एक भारी, तमतमाए चेहरे वाली औरत खड़ी थी जो गुस्से से हांफ रही थी, और उसके पीछे दो मर्द—एक अधेड़ और एक जवान—चोरों की तरह सिर झुकाए, सरिता को पीछे खींचने की नाकाम कोशिश कर रहे थे।
"क्या बदतमीजी है यह? कौन हैं आप और इस तरह सुबह-सुबह मेरे दरवाजे पर क्यों चिल्ला रही हैं?" मुनाई की आवाज में बंगालियों वाला धीमापन नहीं, बल्कि एक तीखा और कड़ा रौब था। उसने अपनी कमर पर हाथ रख लिया, जिससे उसकी नाइटी उसकी भारी जांघों और चौड़े नितंबों पर और कस गई।
सरिता ने जैसे ही मुनाई को इस हालत में देखा—वह झीनी नाइटी, वो टूटे हुए बटन, और उस पतली परत के पीछे थिरकता हुआ उसका वह अति-कामुक, भारी बदन—सरिता के भीतर की जलन और भड़क उठी।
"बदतमीजी हम कर रहे हैं, या तुम कर रही हो?" सरिता ने मुनाई के उस खुले सीने की तरफ उंगली उठाई, उसकी आँखें नफरत से उबल रही थीं। "शर्म-हया सब बेच खाई है क्या? यह कैसा बदन उघाड़कर खड़ी हो हमारे मर्दों के सामने? यह जो तुम रोज़ सुबह इस खुले अहाते में आकर तमाशा करती हो, यह क्या है?"
रामेश्वर ने पीछे से सरिता का पल्लू खींचा, "सरिता, चल यहाँ से... क्यों बकवास कर रही है!" उसे डर था कि कहीं सरिता के मुंह से छत वाली बात न निकल जाए।
लेकिन सरिता चालाक थी। वह अपने मर्द की चोरी को छुपाते हुए सारा दोष मुनाई पर मढ़ना चाहती थी। उसने चिल्लाकर कहा, "मैं क्यों चलूँ? इस गली में शरीफ और संस्कारी मर्द रहते हैं। सुबह-सुबह सब भगवान का नाम लेने, पानी का लेवल देखने छतों पर जाते हैं। और तुम... तुम जान-बूझकर इस खुले अहाते में, टिन के नीचे इस तरह नंगी होकर नहाती हो! ऐसे वैश्यापंती करती हो ताकि सीधे-साधे, संस्कारी मर्दों का ईमान डोल जाए! यह सब क्या छिनालपन लगा रखा है तुमने?"
साजिश और कीचड़ उछालने के इस सीधे हमले से मुनाई एक पल के लिए सन्न रह गई। उसे समझ आया कि यह औरत उस पर चरित्रहीनता का आरोप लगा रही थी। लेकिन मुनाई दबने वाली औरत नहीं थी। उसने अपनी गहरी आँखों को संकुचित किया, अपने दोनों हाथों को छाती के पास बांधा—जिससे उसका वह भारी उभार और भी ऊपर को तन गया—और सीधे सरिता की आँखों में आँखें डालकर बोली।
"सुनिए जी! अपनी जुबान को थोड़ा लगाम दीजिए," मुनाई की आवाज उस गली के सन्नाटे को चीरती हुई गूंजी। "यह मेरा घर है, मेरा अहाता है, और इसकी दीवारें इतनी ऊंची हैं कि कोई भी शरीफ इंसान इसके पार नहीं देख सकता। मैं अपने घर के भीतर कैसे नहाती हूँ, क्या पहनती हूँ, यह तय करने वाली आप कोई नहीं होतीं।"
"दीवारें ऊंची हैं तो क्या हुआ? आसमान तो खुला है न!" सरिता ने ताना मारा। "जब तुम इस तरह अधनंगी होकर पानी उडेलती हो, तो पड़ोस के शरीफ मर्दों की नजरें पापकर्म की तरफ खिंचती हैं। हमारे घर के मर्द सुबह पानी देखने आते हैं और तुम्हारी इस ठरक की वजह से उनका ध्यान भटकता है!"
मुनाई ने एक ठंडी, तीखी और हिकारत भरी हंसी हंसी। उसने सरिता के पीछे छिपे रामेश्वर और मिथिलेश को देखा, जो इस वक्त अपनी नजरें जमीन में गाड़े खड़े थे।
"अच्छा? तो आपके घर के मर्द इतने कमजोर और बिना रीढ़ के हैं कि पड़ोस के अहाते से आने वाली पानी की आवाज से ही उनका ईमान पिघल जाता है?" मुनाई ने सीधे रामेश्वर की तरफ देखते हुए कहा, जिससे रामेश्वर का कलेजा मुंह को आ गया। "अगर आपके मर्दों की नजरें इतनी ही भूखी और आवारा हैं, तो उन्हें अपने घर के भीतर बंद रखिए। उनसे कहिए कि अपनी आँखें नीचे रखें। मेरे अहाते की दीवारें तो बहुत ऊंची हैं, लेकिन आपके मर्दों की नीयत बहुत नीची और घिनौनी है!"
"तुम... तुम मुझे सिखाओगी!" सरिता चीखी।
"हां, सिखा रही हूँ!" मुनाई ने अपनी आवाज को और भारी और धारदार बनाया। "अगर कोई मर्द अपने घर की छत पर खड़े होकर पड़ोस की दीवार के पार तांक-झांक कर रहा है, तो कसूर मेरा नहीं, उसकी परवरिश और उसकी नीयत का है। अगली बार अगर आपने मेरे दरवाजे पर आकर इस तरह की घटिया और ओछी बातें कीं, तो मैं सिक्युरिटी को बुलाने में एक मिनट की भी देर नहीं करूँगी। अपने इन भूखे मर्दों को संभालिए, वरना टाउनशिप की सिक्युरिटी इन्हें सीधे हवालात में संभालेगी!"
इतना कहकर मुनाई ने एक जोरदार झटका दिया और लकड़ी का भारी दरवाजा सीधे सरिता के मुंह पर बंद कर दिया।
'धड़ाक!'
दरवाजा बंद होने की वह गूंज सरिता के गाल पर किसी तमाचे की तरह लगी। बाहर गली में एक सन्नाटा छा गया। सरिता का चेहरा गुस्से से काला पड़ चुका था, और पीछे खड़े रामेश्वर और मिथिलेश की जान में जान आई कि कम से कम उनका सीधे तौर पर नाम नहीं आया। लेकिन मुनाई के उन तीखे, तीखे तीरों ने सरिता के भीतर की औरत को पूरी तरह घायल कर दिया था। यह विवाद थमा नहीं था, बल्कि इसने एक नए और ज्यादा खतरनाक मोड़ की नींव रख दी थी।
सुबह के ठीक 7:20 बजे थे। बोकारो स्टील प्लांट के प्रशासनिक भवन (Administrative Office) के अपने केबिन में बैठे शोम मित्रा को एक फाइल पलटते हुए अचानक मेज पर रखे लैंडलाइन फोन की तीखी घंटी सुनाई दी। शोम की पहली शिफ्ट सुबह 6:00 से शुरू होती थी, इसलिए वह हमेशा की तरह 5:30 ही घर से निकल गया था।
उसने झिझकते हुए फोन का भारी रिसीवर उठाया, "हैलो, शोम मित्रा बोल रहा हूँ।"
"मित्रा बाबू! अरे जल्दी घर आइए, बड़ा अनर्थ हो गया," दूसरी तरफ से उनके ठीक बगल वाले क्वार्टर के शर्मा जी की घबराई हुई आवाज आई। "आपके जाने के बाद, सड़क D2 के वो फोरमैन रामेश्वर की मेहरारू आई थी। आपके पिछले दरवाजे पर खड़े होकर उसने आपकी मिसेज पर काफ़ी चिल्ला रही थी। बहुत तगड़ी बहस हुई है दोनों में। पूरी गली में सुनाई दिया!"
शर्मा जी की बात सुनते ही शोम के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके संकरे कंधे डर के मारे और सिकुड़ गए। उसने बिना कुछ सोचे-समझे फाइल बंद की, अपने मैनेजर से आधे घंटे की परमिशन ली और अपनी पुरानी मोपेड को लगभग उड़ाते हुए घर की तरफ भागा। उसके दिमाग में बस एक ही डर था—मुनाई का गुस्सा।
जब वह हांफता हुआ पिछले दरवाजे से घर के भीतर दाखिल हुआ, तो घर का माहौल किसी सुलगते हुए ज्वालामुखी जैसा था। पांच साल का तुकाई पहले ही अपनी कॉलेज बस से जा चुका था, इसलिए घर में एक भारी सन्नाटा था।
मुनाई लिविंग रूम में खड़ी थी। वह पीले रंग की पुरानी, झीनी नाइटी उसके बदन पर अभी भी वैसी ही थी, जिसके ऊपर के दो टूटे बटन उसके उस भारी, लबालब भरे सीने की नुमाइश कर रहे थे। गुस्से के मारे उसका गोरा, गोल चेहरा लाल हो चुका था और उसकी भारी, मांसल जांघें उत्तेजना में कांप रही थीं।
"मुनाई! क्या हुआ? शर्मा जी का फोन आया था..." शोम ने अपनी मोपेड खड़ी करते हुए सहमी आवाज में पूछा।
"इस टाउनशिप के मर्द और उनकी औरतें कीड़े-मकोड़े हैं, शोम!" मुनाई चीखी। उसकी आवाज में एक अजीब सी कड़वाहट और हिकारत थी। उसने रामेश्वर की बीवी सरिता द्वारा लगाए गए एक-एक गंदे आरोप—खुले में नहाने, बदन का प्रदर्शन करने और पड़ोस के संकारी मर्दों का ईमान डिगाने वाली बात—शोम के सामने उगल दी।
शोम अपनी बीवी के इस अपमान को सुनकर भीतर तक हिल गया। अपनी कमजोरी के बावजूद, वह अपनी पत्नी के स्वाभिमान के साथ खड़ा था। उसने धीरे से मुनाई का हाथ थामने की कोशिश की, "यह तो बहुत नीच बात है, मुनाई। तुम बिल्कुल सही कह रही हो, तुम्हारी कोई गलती नहीं है। लेकिन... समाज ऐसा ही है। अगर तुम कहो, तो मैं आज ही किसी कारपेंटर को बुलाकर उस पिछले अहाते को ऊपर तक पूरी तरह टिन के शेड से कवर करवा देता हूँ? चारों तरफ से बंद कर देते हैं उसे, ताकि कोई चाहकर भी न देख सके। हमें थोड़ा एडजस्ट करना पड़ेगा..."
"बिल्कुल नहीं!" मुनाई ने झटके से अपना हाथ छुड़ाया, उसकी आँखों में एक जिद्दी और स्वाभिमानी चमक थी। "मैं क्यों एडजस्ट करूँ? मैं अपने ही घर के अहाते में, अपनी सहूलियत से नहीं नहा सकती? गलती मेरी नहीं, उन भूखे भेड़ियों की है जो छतों पर खड़े होकर दूसरों के घरों में ताकते हैं। इस बार एडजस्ट मुझे नहीं, इस मोहल्ले के मर्दों को करना होगा। उन्हें अपनी नीच नजरों पर काबू रखना सीखना होगा। मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगी।"
शोम ने उसके इस रौबदार, अति-कामुक रूप को देखा। वह जानता था कि मुनाई के इस फैसले के आगे उसकी एक नहीं चलने वाली। उसने डरते हुए अपना सिर हिलाया, "ठीक है, जैसा तुम चाहो... मैं तुम्हारे साथ हूँ। लेकिन थोड़ा संभलकर रहना, ये लोग ओछे हैं।"
मुनाई ने शोम की तरफ देखा। उसका यह सीधा-साधा, डरपोक और भीरू पति जो हमेशा समाज से डरता था, इस वक्त उसके सामने खड़ा था। गुस्से, अपमान और अपनी देह की उस गरमी ने मुनाई के भीतर एक अजीब सी हिंसक कामुकता को जगा दिया था। उसका वह भारी, पानी से धुला हुआ बदन अब इस गुस्से को शांत करने के लिए एक कच्ची हवस की मांग कर रहा था।
उसने बिना एक शब्द बोले, आगे बढ़कर शोम की छाती पर हाथ रखा। शोम कुछ समझ पाता, उससे पहले ही मुनाई की गोरी, भरी-भरी उंगलियों ने शोम की शर्ट के बटनों को एक-एक करके खोलना शुरू कर दिया।
"मुनाई... यह क्या कर रही हो? मुझे वापस ऑफिस जाना है..." शोम की आवाज लड़खड़ाई, लेकिन मुनाई के बदन से उठती हुई सिकाकाई और लाइफबॉय साबुन की तीखी, कामुक महक ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था।
मुनाई ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसने नीचे झुककर शोम के ट्राउजर की जिप को नीचे खींचा और अपनी गर्म, नर्म हथेलियों में शोम के उस ढीले, सुस्त पड़े अंग को थाम लिया। उसने अपनी उंगलियों का दबाव बढ़ाया और उसे इस तरह सहलाना शुरू किया कि शोम के बदन में बिजली की एक लहर दौड़ गई। मुनाई की उस जादुई और आक्रामक छुअन के आगे शोम का वह कमजोर अंग देखते ही देखते लोहे की तरह सख्त और कड़ा हो गया।
"मुनाई... तुकाई..." शोम की सांसें उखड़ने लगी थीं।
"तुकाई कॉलेज गया है," मुनाई ने एक भारी, मदहोश आवाज में कहा। उसने अपनी उस झीनी नाइटी को एक झटके में अपनी कमर तक उठा लिया। बिना किसी पैंटी के, उसकी वे भारी, मोटी और आपस में सटी हुई मांसल जांघें और उसके विशाल नितंबों का पूरा भूगोल शोम की आँखों के सामने खुल गया।
उसने शोम को वहीं पास वाले सोफे पर पीछे की तरफ धकेला और खुद उसके ऊपर सवार हो गई। उसने शोम के उस कड़े हो चुके अंग को अपनी दोनों उंगलियों से पकड़ा और अपनी मुलायम रसीली योनि के मुहाने पर टिका दिया। और फिर, एक ही झटके में वह शोम के ऊपर बैठ गई।
"आहहह..." शोम के मुंह से एक चीख निकल गई। मुनाई का वह भारी, गदराया हुआ गोश्त का पहाड़ जब उसके ऊपर उतरा, तो उसे लगा कि वह उस वजन के नीचे दबकर मर जाएगा।
मुनाई ने रुकने का नाम नहीं लिया। वह किसी भूखी शेरनी की तरह शोम के ऊपर तेजी से ऊपर-नीचे होने लगी| उसकी हर एक हरकत के साथ उसकी छाती का वह भारी उभार, उसके वे विशाल स्तन उसकी नाइटी के भीतर बुरी तरह उछल रहे थे, और टूटे बटनों के बीच से उनका गोरापन शोम के चेहरे से टकरा रहा था। मुनाई की चौड़ी कमर और उसके भारी नितंबों की थिरकन इतनी हिंसक थी कि सोफा 'चर-चर' की आवाज करने लगा।
शोम अपनी जिंदगी के सबसे बड़े आनंद में था। वह मुनाई के उन भारी स्तनों को अपने पतले हाथों से भींचने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मुनाई की रफ्तार थमी नहीं। ठीक छठे मिनट पर, मुनाई ने अपनी रफ्तार को दोगुना कर दिया। उसकी जांघों का घर्षण शोम के बदन में आग लगा रहा था। और जैसे ही सातवां मिनट लगा, शोम का पूरा बदन कांप उठा। उसने एक लंबी, बेकाबू सिसकी ली और अपना सारा पानी मुनाई के भीतर ही छोड़ दिया। मुनाई ने भी एक गहरी सांस ली और अपने पूरे भारी बदन का वजन शोम की छाती पर डाल दिया। दोनों हांफ रहे थे।
कमरे में सिर्फ उनकी भारी सांसों की आवाज थी। ठीक दो मिनट बाद, मुनाई उठकर खड़ी हुई। उसने अपनी नाइटी को नीचे किया, अपने बिखरे बालों को समेटा और आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
उसने सोफे पर बेसुध पड़े शोम की तरफ देखा और अपनी उसी ठंडी, हुक्मभरी आवाज में कहा, "अब उठो शोम। सात मिनट हो चुके हैं, तुम्हारी परमिशन का टाइम खत्म हो रहा है। वापस ऑफिस जाओ।"
शोम ने अपनी पैंट को संभालते हुए, अपनी कांपती टांगों पर खड़े होने की कोशिश की। वह अंदर से पूरी तरह तृप्त और हैरान था। मुनाई ने अपनी देह के गुस्से को शांत कर लिया था, लेकिन बाहर गली में, उस कंक्रीट की टंकी के पार, जो आग लगी थी, वह अभी और भड़कने वाली थी।
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Chapter 2 Ends!!!
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अध्याय 3: कानून का शिकंजा और नई भूख
बोकारो टाउनशिप के स्थानीय थाने के भीतर दोपहर की उमस और सुस्ती अपने चरम पर थी। कंक्रीट की मटमैली दीवारों पर बरसों पुरानी फाइलों की सीलन, घटिया फिनाइल की तीखी गंध और मेज के ऊपर लगे उस पुराने, जंग खाए बजाज के पंखे की 'चर-चर' आवाज हवा को और भारी बना रही थी। कोने में रखी एक लोहे की बेंच पर कुछ जंग लगी हथकड़ियाँ लटकी थीं, जो पंखे की हवा से रह-रहकर आपस में टकरा रही थीं।
थाना इंचार्ज योगेंद्र सिंह अपनी भारी-भरकम देह को लकड़ी की मजबूत कुर्सी पर टिकाए बैठे थे। उनकी उम्र 40 के पार थी, चौड़े मजबूत कंधे, कड़क मूंछें और सरकारी खाकी वर्दी जो उनके बाहर को निकले भारी पेट पर बुरी तरह कसी हुई थी। उनकी पैनी, शिकारी आँखें मेज पर रखे पानी के गिलास पर टिकी थीं। बगल में एक महिला कांस्टेबल, शांति बाई, बैठी थी जो मुंह में खैनी दबाए बेहद बोरियत से अपनी उंगलियों के नाखून साफ कर रही थी।
ठीक उसी वक्त, दोपहर के पौने तीन बजे, थाने का लकड़ी का दरवाजा एक झटके से खुला।
"दरोगा जी! गज़ब हो गया! हमारे मोहल्ले में एक ऐसी कुलच्छनी औरत आ गई है कि शरीफ मर्दों का जीना हराम कर दिया है उसने! आज की आज हमें FIR लिखवानी है!"
सरिता किसी तूफान की तरह भीतर दाखिल हुई। उसका थुलथुला, भारी बदन गुस्से के मारे हांफ रहा था और आँखों से मानो चिंगारियाँ निकल रही थीं। उसके पीछे रामेश्वर प्रसाद और उसका साला मिथिलेश, दोनों ऐसे घसीटते हुए आ रहे थे मानो उन्हें फांसी के फंदे की तरफ ले जाया जा रहा हो। रामेश्वर का माथा पसीने से भीगा हुआ था और वह बार-बार अपनी मैली लुंगी को ऊपर खींच रहा था, जबकि मिथिलेश डर के मारे पूरी तरह पीला पड़ चुका था।
योगेंद्र सिंह ने अपनी भारी पलकें उठाईं और इस घरेलू ड्रामे को देखा। उनके चेहरे पर एक मंझे हुए सिक्युरिटीवाले की वो कुटिल मुस्कान उभर आई जो ऐसे रोज के तमाशों को देखकर आती थी।
"अरे-अरे... बैठो भाभी जी, बैठो। ज़रा सांस तो लो," योगेंद्र ने अपनी भारी आवाज में कहा, जो भारी पेट के हिलने के साथ थोड़ी गूंजती थी। "कौन सा पहाड़ टूट गया टाउनशिप पर? और ये दोनों मर्द लोग काहे ऐसे चोरों की तरह दुबके खड़े हैं?"
"दरोगा जी, आप हंस रहे हैं!" सरिता ने मेज पर जोर से अपना हाथ पटका। "बात ही ऐसी है। सड़क D3 के क्वार्टर नंबर 24 में एक बंगाली परिवार आया है। उसकी जो मेहरारू है न—मुनाई मित्रा—वो कोई औरत नहीं, साक्षात डायन है! वो रोज़ सुबह जब पानी आता है, तो अंदर के बाथरूम को छोड़कर पिछले खुले अहाते में नहाने बैठ जाती है!"
बगल में बैठी महिला कांस्टेबल शांति बाई ने अपना मुंह मोड़ा और एक तीखी हंसी दबाते हुए थूकने के बहाने बाहर चली गई। थाना इंचार्ज योगेंद्र सिंह ने भी अपनी मूंछों के पीछे छिपी हंसी को रोकने के लिए अपने गाल के अंदरूनी हिस्से को दांतों से जोर से काट लिया। उनके लिए यह किसी कॉमेडी फिल्म का सीन चल रहा था।
"तो भाभी जी... कोई अपने घर के अहाते में नहा रहा है, तो इसमें सिक्युरिटी क्या करेगी? पानी का टाइम ही ऐसा है टाउनशिप में," योगेंद्र ने मजे लेते हुए पूछा।
"अरे ऐसे-वैसे नहीं नहाती दरोगा जी!" सरिता और आगे झुकी, उसकी आवाज और तीखी हो गई। "वो जान-बूझकर बदन दिखा-दिखाकर नहाती है! पेटीकोट के बिना, सिर्फ एक पतली, झीनी सूती साड़ी बदन पर लपेट लेती है जो पानी पड़ते ही पूरी कांच जैसी आर-पार दिखने लगती है। उसका वो भारी, मांसल सीना और पिछवाड़ा ऐसे नुमायां होते हैं कि पूछो मत! हमारे घर के शरीफ, संस्कारी मर्द सुबह-सुबह छत पर अपनी पानी की टंकी चेक करने जाते हैं, और नीचे वो अधनंगी होकर अपनी जांघों पर साबुन मल रही होती है! आप ही बताइए, मर्दों का ईमान डोल नहीं जाएगा?"
जैसे ही सरिता ने मुनाई के उस रूप का वर्णन किया—वह झीनी साड़ी, पानी से तर-बतर भारी, नीचे झुका हुआ सीना, और मोटी, मांसल जांघों पर साबुन का झाग—थानेदार योगेंद्र सिंह की आँखों में एक अजीब सी, भूखी चमक कौंध गई। उनका ध्यान अब सरिता की बकवास से हटकर उस बंगाली औरत के जिस्म के भूगोल पर टिक गया था, जिसका नक्शा सरिता अनजाने में ही अपनी जलन के मारे उनके सामने खींच रही थी।
योगेंद्र सिंह ने अपनी नज़रें घुमाकर रामेश्वर और मिथिलेश की तरफ देखा। रामेश्वर इस वक्त छत की कड़ियों को ऐसे देख रहा था मानो उसका इस दुनिया से कोई वास्ता न हो, और मिथिलेश थर-थर कांप रहा था।
"क्यों रे रामेश्वर?" योगेंद्र की आवाज अचानक कड़क हुई, जिससे रामेश्वर झटके से सीधा हो गया। "तुम सुबह-सुबह अपनी छत पर पानी का लेवल ही चेक करने जाते हो... या पड़ोस की दीवार के पार उस बंगाली औरत का वो भारी बदन अपनी आँखों से चाटने जाते हो?"
"नहीं-नहीं, साहब! हम तो बस... वो टंकी का वाल्व..." रामेश्वर की जुबान हलक में फंस गई।
योगेंद्र सिंह अपनी कुर्सी से खड़े हुए। उनकी खाकी पैंट के भीतर, सरिता द्वारा किए गए मुनाई के उस कामुक और कच्चे वर्णन की वजह से एक तीखा उभार आकार लेने लगा था। उनका अपना अंग खाकी कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब हो रहा था, लेकिन उन्होंने बड़ी चालाकी से मेज के पीछे खड़े होकर अपनी उस उत्तेजना को छुपाया।
"भाभी जी, बात को ध्यान से सुनिए," योगेंद्र ने अपनी आवाज में एक नकली गंभीरता लाते हुए सरिता से कहा। "कानून की नजर में, कोई औरत अगर अपने ही घर के अहाते में नहा रही है, तो वह कोई जुर्म नहीं कर रही है। अहाता उसका है, घर उसका है। वह चाहे साड़ी पहने या नाइटी, सिक्युरिटी उसे गिरफ्तार नहीं कर सकती। यह आपका आपसी, घरेलू मामला है, इसे आपस में सुलझाइए।"
"क्या? सिक्युरिटी कुछ नहीं करेगी?" सरिता का मुंह खुला का खुला रह गया। "वो खुलेआम हमारे मर्दों को भड़का रही है और आप कह रहे हैं जुर्म नहीं है?"
"जुर्म तो ये दोनों कर रहे हैं!" योगेंद्र ने अचानक अपनी उंगली रामेश्वर और मिथिलेश की तरफ तानी। उनकी आँखें अब इन दोनों मर्दों पर बरस रही थीं। "अगर कोई औरत अपने अहाते में है, और तुम दोनों अपनी छत पर खड़े होकर, सिंटेक्स टंकी के पीछे छिपकर उसके उस भारी बदन को, उसकी जांघों को घूर रहे हो... तो कानून की नजर में इसे 'छेड़खानी' और 'उत्पीड़न' कहते हैं। अगर उस बंगाली औरत ने थाने आकर एक बार शिकायत कर दी न, तो तुम दोनों को ऐसी हवालात की हवा खिलाऊंगा कि ये सारी ठरक भट्टी की राख बन जाएगी!"
रामेश्वर ने तुरंत मिथिलेश का हाथ पकड़ा और गिड़गिड़ाते हुए बोला, "साहब... गलती हो गई। हम आज के बाद कभी छत पर नहीं जाएंगे। सरिता, चल यहाँ से... क्यों हम दोनों की नौकरी और जिंदगी बर्बाद करने पर तुली है!"
"हां दीदी, चलो यहाँ से!" मिथिलेश भी रोने को हो गया।
सरिता ने अपने मर्द की इस बुजदिली को देखा और गुस्से में पैर पटकते हुए थाने से बाहर की तरफ भागी। "निकम्मो! डरपोक कहीं के! सिक्युरिटी भी बिकी हुई है!" वह चिल्लाती हुई बाहर निकल गई। रामेश्वर और मिथिलेश भी सिर झुकाए उसके पीछे-पीछे भाग खड़े हुए।
थाने के भीतर अब फिर से वही सन्नाटा था। लेकिन थाना इंचार्ज योगेंद्र सिंह अपनी मेज के पीछे अभी भी वैसे ही खड़े थे। उनकी खाकी पैंट के भीतर का वह कड़ा, सख्त हो चुका अंग अभी भी शांत नहीं हुआ था। सरिता तो चली गई थी, लेकिन वह योगेंद्र के दिमाग में उस 35 साल की, अति-कामुक, झीनी नाइटी वाली मुनाई मित्रा का एक ऐसा अश्लील और रसीला अक्स छोड़ गई थी, जिसने इस 45 साल के दरोगा की रातों की नींद उड़ाने का इंतजाम कर दिया था। योगेंद्र ने अपनी मूंछों पर हाथ फेरा और एक गहरी, भूखी सांस ली। खेल अब सिर्फ मोहल्ले के मर्दों का नहीं रहा था; अब कानून का रक्षक खुद शिकारी बनने की राह पर निकल चुका था।
रामेश्वर और उसका परिवार जैसे ही थाने की चौखट से बाहर निकला, अंदर का सन्नाटा और भी गहरा हो गया। महिला कांस्टेबल शांति बाई अभी भी बाहर ही खैनी थूकने में मसरूफ थी। योगेंद्र सिंह अपनी मेज के पीछे से धीरे से हिले। उनकी खाकी पैंट के सामने का हिस्सा अभी भी एक सख्त, जिद्दी उभार के साथ तना हुआ था।
योगेंद्र ने अपनी भारी हथेलियों को मेज पर टिकाया और एक गहरी, भूखी सांस ली। उन्होंने अपनी पैंट की जिप के पास हाथ ले जाकर अपनी उस कड़कड़ाती हुई उत्तेजना को थोड़ा एडजस्ट किया।
"साली सरिता कह तो सच ही रही थी..." योगेंद्र बुदबुदाए, उनकी आँखों में एक शातिर और हिंसक चमक आ गई। "ऐसी गदराई हुई बंगालन की हमें खबर तक नहीं।"
एक मंझे हुए शिकारी की तरह योगेंद्र समझ गए थे कि अगर वह सिक्युरिटी की वर्दी में सीधे उसके घर गए, तो बात बिगड़ सकती है। शोम मित्रा सरकारी बाबू था, मामला सीधे डिपार्टमेंट तक जा सकता था। लेकिन मुनाई का वह भारी, अति-कामुक बदन अब योगेंद्र की रातों की नींद छीनने के लिए काफी था। उन्हें उस मांसल जिस्म को करीब से देखना था, उसे अपनी आँखों से नापना था। उन्होंने तय किया कि वह सिक्युरिटी बनकर नहीं, बल्कि एक साए की तरह उसका पीछा करेंगे। जब वह घर की चहारदीवारी से बाहर, टाउनशिप के सेक्टर मार्केट में कदम रखेगी, तब कानून का यह रखवाला अपनी गुप्त ठरक का जाल बिछाएगा।
शाम के ठीक 4:00 बज रहे थे। बोकारो का सेक्टर-5 मार्केट इस वक्त टाउनशिप के लोगों की भीड़ से गुलजार होने लगा था। सरकारी क्वार्टरों की औरतें, बंगाली बाबू और स्टील प्लांट के कर्मचारी शाम की सब्जियां और राशन खरीदने के लिए साइकिलों और बजाज स्कूटरों पर निकल चुके थे। मार्केट की संकरी गलियों में चाट-पकौड़ी के ठेलों की महक और सब्जी वालों की आवाजें गूंज रही थीं।
मार्केट के एक कोने में, नीम के पेड़ की छांव तले, एक सरकारी 'राजदूत' मोटरसाइकिल खड़ी थी। उस पर योगेंद्र सिंह बैठे थे। इस वक्त वह अपनी खाकी वर्दी में नहीं, बल्कि एक ढीली-ढाली सफारी सूट और आँखों पर काले चश्मे पहने हुए थे। उनका वह भारी पेट और मजबूत कंधे इस सादे लिबास में भी किसी शिकारी सा अहसास दे रहे थे। उनकी नजरें लगातार मार्केट के मुहाने पर टिकी थीं, जहाँ D3 की तरफ से आने वाला रास्ता खुलता था।
ठीक 4:15 बजे, योगेंद्र की पैनी आँखों ने उस भीड़ के बीच एक ऐसी हरकत देखी जिसने उनके बदन का खून सुखा दिया।
भीड़ को चीरती हुई मुनाई मित्रा मार्केट के भीतर दाखिल हो रही थी। सिर्फ थाने में हुए उन चंद मिनटों के बयान से उन्होंने मुनाई को पहचान लिया था|
शाम के वक्त उसने अपनी वो नाइटी उतार दी थी और उसकी जगह एक गहरे नीले रंग की सूती तांत की साड़ी पहन रखी थी। लेकिन उस साड़ी का पारंपरिक ढंग भी मुनाई के उस अति-कामुक बदन के रसीले तरबूज़ों को छुपाने में पूरी तरह नाकाम था। साड़ी का पल्लू उसके बाएं कंधे पर इस तरह कसा हुआ था कि उसके दाहिने स्तन का वह भारी, भरा हुआ उभार साड़ी के कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहा था। उसकी गहरी, चौड़ी छाती की दरार ब्लाउज के तंग गले से साफ़ दिख रही थी।
जब वह चलती थी, तो उसके भारी नितंबों का वह विशाल घेरा और उसकी गोश्त से भरी, थिरकती हुई जांघों की हरकत उस सूती साड़ी के नीचे से भी साफ महसूस हो रही थी। उसके घने, काले बाल उसकी पीठ पर एक भारी चोटी में बंधे थे, जो चलते समय उसके कूल्हों के ऊपरी हिस्से पर रह-रहकर चोट कर रही थी।
योगेंद्र सिंह ने अपनी मोटरसाइकिल को किक मारी। इंजन की धीमी 'डग-डग' आवाज के साथ उन्होंने अपनी गाड़ी को मुनाई से करीब बीस कदम की दूरी पर डाल दिया। काले चश्मे के पीछे से उनकी भूखी, ठरकी आँखें मुनाई के उस भारी, मटकते हुए बदन के एक-एक इंच को अपनी नजरों से चबा रही थीं।
मुनाई पूरी तरह बेखबर थी। उसने एक सब्जी वाले के ठेले के पास रुककर तोरई और आलू उठाने के लिए जैसे ही नीचे झुकाव लिया, पीछे से उसकी चौड़ी कमर का मोड़ और उसके मांसल कूल्हों का पूरा उभार उस नीली साड़ी में बुरी तरह कस गया। योगेंद्र ने अपनी मोटरसाइकिल का क्लच दबाया और अपनी नजरें उस विशाल घेरे पर गड़ा दीं। उनकी सफारी सूट की पैंट के भीतर उनका अंग एक बार फिर लोहे की तरह सख्त होने लगा था।
सब्जी वाले के ठेले पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, लेकिन योगेंद्र सिंह की नज़रें सिर्फ मुनाई के उस भारी, झुकते-उठते बदन पर टिकी हुई थीं। मुनाई जब आलू छाँटने के लिए नीचे झुकती, तो ठेले वाले और पास खड़े दो-तीन आवारा लड़के अपनी आँखें फाड़े उसकी नीली साड़ी के नीचे से थिरकते उसके विशाल कूल्हों और ब्लाउज से झांकते उसके भारी सीने को ताक रहे थे। टाउनशिप के इस बाज़ार में हर कोई उस बेकाबू, अति-कामुक देह को अपनी नजरों से नोच लेना चाहता था।
योगेंद्र ने अपनी 'राजदूत' को स्टैंड पर लगाया और अपना काला चश्मा उतारकर सफारी सूट की जेब में रख लिया। वह भारी, रोबीले कदमों से सीधे उस ठेले की तरफ बढ़े। उनका भारी पेट और कड़क मूंछें देखते ही सब्जी बेचने वाले का रंग उड़ गया। वह दरोगा योगेंद्र सिंह को अच्छी तरह पहचानता था।
जैसे ही योगेंद्र ठेले के पास आकर खड़े हुए, उन्होंने उन आवारा लड़कों की तरफ एक ऐसी खूंखार, शिकारी नज़र से देखा कि वे लड़के तुरंत दुम दबाकर भीड़ में गायब हो गए। ठेले वाले ने भी तुरंत अपनी नजरें झुका लीं और मुनाई के बदन को घूरना बंद करके पूरी मुस्तैदी से आलू साफ करने लगा। मुनाई के इर्द-गिर्द का वो पूरा हवस भरा माहौल योगेंद्र की एक धमक से बिल्कुल शांत हो गया।
मुनाई ने इस अचानक आए बदलाव को महसूस किया। उसने पलटकर देखा, तो उसके ठीक बगल में एक तगड़े, रौबदार और साफ-सुथरे लिबास वाले अधेड़ सज्जन खड़े थे, जिनकी मूंछें और रसूखदार चेहरा किसी बड़े सरकारी अफसर जैसा लग रहा था।
"अरे भाई! बहन जी को ज़रा ताज़ी और अच्छी सब्जियां छाँटकर दो। ये बासी तोरई काहे थमा रहे हो?" योगेंद्र ने अपनी आवाज को बेहद धीमा, संस्कारी और मददगार बनाते हुए ठेले वाले को डांटा। फिर वह मुनाई की तरफ मुड़े, उनकी आँखों में एक नकली शराफत तैर रही थी। "नमस्कार भाभी जी। आप शायद इस तरफ नई आई हैं? टाउनशिप के ये दुकानदार नए लोगों को देखकर अक्सर बासी माल थमा देते हैं।"
मुनाई ने उन्हें देखा। योगेंद्र की उस भारी, मर्दाना शख्सियत और उनकी इस मदद ने मुनाई के मन पर तुरंत असर किया। शोम की उस ढीली-ढाली, डरी हुई काया के मुकाबले योगेंद्र का यह रौबदार और सुरक्षात्मक रूप किसी भी औरत को प्रभावित करने के लिए काफी था।
"जी नमस्कार," मुनाई के गोल चेहरे पर एक हल्की, खूबसूरत मुस्कान उभर आई, जिससे उसके भरे-भरे गाल और भी आकर्षक लगने लगे। "हाँ, हम अभी कुछ ही दिन पहले सड़क D3 में आए हैं। मेरे पति स्टील प्लांट के एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिस में बाबू हैं।"
"अरे! मित्रा बाबू की मिसेज हैं आप? बहुत नेक इंसान हैं वो," योगेंद्र ने सफेद झूठ बोलते हुए अपनी मूंछों को ताव दिया। "मैं यहीं लोकल थाने में इंचार्ज हूँ—योगेंद्र सिंह। D1 से लेकर D10 की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी ही है। आप बिल्कुल बेफिक्र होकर बाज़ार आया कीजिए। कोई भी लफंगा परेशान करे, तो सीधे हमें याद कीजिए।"
थानेदार का नाम सुनते ही मुनाई के दिमाग में सुबह का वो तमाशा कौंध गया, जब सरिता ने उसके दरवाजे पर आकर हंगामा किया था और सिक्युरिटी में जाने की धमकी दी थी। उसे लगा कि यह दरोगा कितना शरीफ और मददगार है, जो खुद चलकर उसकी मदद कर रहा था।
योगेंद्र ने बड़े सलीके से अपनी भारी, गोरी उंगलियों से ताज़ी तोरई और अच्छे आलू चुन-चुनकर मुनाई के थैले में डलवा दिए। जब वह सब्जियां उठा रहे थे, तो उनका हाथ अनजाने में, बेहद सूक्ष्म तरीके से मुनाई की गोरी कलाई से हल्का सा छू गया। मुनाई के बदन की वो छुअन और उसकी नीली साड़ी के भीतर से उठती हुई सिकाकाई की खुशबू ने योगेंद्र के सफारी सूट की पैंट के भीतर एक बार फिर जबरदस्त कड़ापन पैदा कर दिया था, लेकिन उनके चेहरे पर एक संस्कारी दरोगा का मुखौटा पूरी तरह फिट था।
"आपका बहुत-बहुत धन्यवाद, दरोगा जी," मुनाई ने अपना भारी थैला संभालते हुए कहा। उस वजन के कारण उसका वह भारी, भरा-पूरा सीना ब्लाउज के भीतर थोड़ा और कस गया था। "अगर आज आप न होते, तो यह दुकानदार मुझे खराब सब्जियां ही दे देता।"
"अरे इसमें धन्यवाद कैसा भाभी जी? यह तो हमारा फर्ज है," योगेंद्र ने अपनी आँखों की ठरक को छुपाते हुए बेहद शालीनता से सिर झुकाया।
मुनाई को योगेंद्र की यह शराफत और उनका यह मददगार रवैया बहुत भाया। एक नए शहर में, जहाँ सुबह ही उसका एक औरत से इतना गंदा झगड़ा हुआ था, वहाँ इस रसूखदार सिक्युरिटीवाले का साथ मिलना उसे एक बड़ी सुरक्षा जैसा लगा। कद्रदान और संस्कारी स्वभाव के चलते, मुनाई ने शिष्टाचार के नाते योगेंद्र को एक ऐसा न्योता दे दिया जिसकी उम्मीद खुद उस शातिर शिकारी को भी नहीं थी।
"दरोगा जी, आप हमारे घर की तरफ तो आते ही होंगे?" मुनाई ने अपनी मदहोश कर देने वाली आवाज में पूछा। "आज शाम को अगर आप उस तरफ आएं, तो हमारे घर चाय पर जरूर आइएगा। मेरे पति भी साढ़े पांच बजे तक ऑफिस से आ जाते हैं। हमें बहुत अच्छा लगेगा।"
शाम की चाय का यह न्योता सुनते ही योगेंद्र सिंह के भीतर जैसे लड्डू फूट गए। उनकी मूंछों के पीछे छिपी कामुक भेड़िये की मुस्कान बाहर आने को बेताब हो उठी। जिस बंगाली मछली को वह जाल बिछाकर पकड़ने की सोच रहे थे, वह खुद उन्हें अपने तालाब का रास्ता दिखा रही थी।
"अरे बिल्कुल-बिल्कुल भाभी जी! यह तो हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है। शाम को राउंड पर निकलते ही मैं आपके घर की तरफ जरूर हाजिर होऊंगा," योगेंद्र ने अपने हाथ जोड़ते हुए कहा।
मुनाई ने मुस्कुराकर विदा ली और अपने उस भारी, मटकते हुए नितंबों के घेरे के साथ भीड़ में आगे बढ़ गई। योगेंद्र सिंह वहीं खड़े होकर उसकी नीली साड़ी के नीचे थिरकते उस मांसल बदन को दूर तक जाते हुए देखते रहे। शाम के छह बजने वाले थे, और कानून के इस रखवाले के दिमाग में अब चाय की पत्ती नहीं, बल्कि मुनाई के उस झीने, पारदर्शी बदन को करीब से छूने की एक बेहद गंदी और खतरनाक साज़िश पकने लगी थी।
शाम के ठीक 6:15 बज रहे थे। स्टील प्लांट में अचानक हुए एक बड़े मैकेनिकल ब्रेकडाउन की वजह से शोम एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिस में ही फंस गया था। उसने घर पर लैंडलाइन फोन करके मुनाई को बता दिया था कि उसे आने में देर होगी।
ठीक उसी वक्त, मुनाई के घर के सामने एक सफ़ेद रंग की मारुति जिप्सी आकर रुकी। योगेंद्र सिंह गाड़ी से नीचे उतरे। उनके चेहरे पर वही रोबीला, मर्दाना आत्मविश्वास था जो किसी भी औरत के दिल में एक पल के लिए घबराहट पैदा कर दे। पांच साल का तुकाई अहाते के बाहर एक छोटी प्लास्टिक की कार से खेल रहा था।
योगेंद्र ने जैसे ही घर के खुले मुख्य दरवाजे पर दस्तक दी, मुनाई भीतर से निकलकर आई।
शाम के वक्त घर में अकेले होने के कारण, मुनाई ने फिर से साड़ी उतार दी थी। इस वक्त उसने आसमानी नीले रंग की एक ढीली-ढाली सूती नाइटी पहन रखी थी। यह नाइटी हालांकि सुबह वाली पीली नाइटी जितनी पुरानी नहीं थी, लेकिन फिर भी मुनाई के उस अति-कामुक बदन के भारीपन के आगे बेबस थी। बिना किसी ब्रा-पैंटी के, उसके उन भारी, नीचे की तरफ झुके हुए स्तनों का उभार उस आसमानी कपड़े को अंदर से लगातार धकेल रहा था। जब वह सामने आई, तो उसकी गहरी छाती की दरार और उसकी चौड़ी कमर के नीचे थिरकते मांसल नितंबों का घेरा योगेंद्र की आँखों के सामने बिल्कुल साफ था।
"अरे, दरोगा जी! आइए, आइए," मुनाई के गोल चेहरे पर एक स्वागत करती मुस्कान उभर आई। "बैठिए न। दरअसल, शोम प्लांट में किसी इमरजेंसी काम की वजह से फंस गए हैं, उन्हें आने में थोड़ी देर हो जाएगी।"
"अरे, कोई बात नहीं भाभी जी। सरकारी नौकरी है, जिम्मेदारी सबसे पहले है," योगेंद्र ने सोफे पर अपनी भारी देह को टिकाते हुए कहा। बैठकर उन्होंने बड़ी चालाकी से अपनी टांग पर टांग चढ़ाई, क्योंकि मुनाई के उस घरेलू, बेपरवाह रूप को देखकर उनकी पैंट के भीतर का अंग एक बार फिर लोहे की तरह सख्त होने लगा था।
"आप बैठिए, मैं आपके लिए अदरक वाली कड़क चाय बनाकर लाती हूँ," मुनाई ने मुस्कुराते हुए कहा और रसोई की तरफ बढ़ गई।
लिविंग रूम और रसोई के बीच सिर्फ एक पतला सा पर्दा लटका था, इसलिए बातचीत आसानी से हो सकती थी। योगेंद्र सोफे पर बैठ-बैठे उस पर्दे के पार देख रहे थे, जहाँ मुनाई चूल्हा जलाने के लिए आगे झुकी थी। उस झुकाव के कारण उसकी नाइटी पीछे से उसकी भारी, गोश्त से भरी जांघों और चौड़े कूल्हों पर बुरी तरह कस गई थी।
योगेंद्र ने अपनी आवाज को थोड़ा और धीमा, मखमली और कामुक बनाते हुए लिविंग रूम से ही कहा, "भाभी जी, वैसे एक बात कहूँ? बुरा मत मानिएगा। आज दोपहर जब आप बाज़ार में नीली साड़ी पहनकर चल रही थीं... तो सच कहूँ, तो पूरे बोकारो शहर की रौनक आपके सामने फीकी लग रही थी।"
रसोई में चाय का सस्पैन चढ़ाती मुनाई के हाथ एक पल के लिए रुक गए। किसी पराय मर्द से, और वो भी शहर के इतने बड़े सिक्युरिटीवाले से अपने हुस्न की ऐसी तारीफ सुनकर उसके गोरे गालों पर एक गुलाबी रंगत उभर आई। वह उस तंग मकान में शोम की मीठी लेकिन बेअसर बातों को सुन-सुनकर ऊब चुकी थी। योगेंद्र जैसी भारी और दमदार शख्सियत वाले मर्द से अपनी सुंदरता की सराहना सुनना उसके आत्मसम्मान और उसकी कामुकता को अंदर तक गुदगुदा गया।
"आप भी न दरोगा जी... कुछ भी बोलते हैं," मुनाई ने रसोई के भीतर से ही थोड़ा शरमाते हुए, एक बेहद मदहोश आवाज में कहा।
"कुछ भी नहीं कह रहा भाभी जी, बिल्कुल सच कह रहा हूँ," योगेंद्र ने अपनी चाल को और आगे बढ़ाया। "भगवान ने आपको गज़ब का तराशा हुआ रूप दिया है। आपका यह भारीपन, आपकी ये सुगठित काया... किसी भी मर्द की आँखों को बांधने के लिए काफी है। आपके पति सचमुच बहुत भाग्यशाली हैं।"
इस सूक्ष्म और तीखी तारीफ ने मुनाई के भीतर के सारे संकोच को पिघला दिया। वह चाय की ट्रे लेकर बाहर आई। जब वह योगेंद्र के सामने झुकी, तो नाइटी के ढीले गले से उसके दोनों भारी स्तनों का गोरापन और उनकी गहरी दरार योगेंद्र की आँखों के ठीक सामने आ गई। योगेंद्र ने अपनी सांसें रोकीं और चाय का कप थाम लिया।
चाय की चुस्कियों के बीच माहौल अब पूरी तरह अनौपचारिक हो चुका था। योगेंद्र ने चाय का आधा कप खत्म किया, मुनाई की तरफ देखा और बेहद शातिर चेहरे के साथ, मानो कोई बहुत ही साधारण बात पूछ रहे हों, बोले, "वैसे भाभी जी... आपका ब्रा का कप साइज क्या है? 38 या 40?"
यह सवाल सुनते ही मुनाई का पूरा बदन जैसे सुन्न हो गया। उसके हाथ में पकड़ा चाय का कप हल्का सा कांपा। उसके गोल चेहरे पर एक पल के लिए गहरा शॉक और नाराजगी के भाव उभरे। किसी शरीफ घर की औरत से इस तरह का सीधा और अश्लील सवाल पूछना किसी गुनाह से कम नहीं था। उसने अपनी नजरें कड़क कीं और योगेंद्र की तरफ देखा।
लेकिन योगेंद्र एक मंझे हुए दरोगा थे। उन्हें पता था कि बात को कब और कैसे पलटना है। मुनाई के मुंह खोलने से पहले ही, उन्होंने अपनी आँखों में एक बेहद मासूम और घरेलू सी चमक लाई और अपनी बात को बड़ी ही चालाकी से मोड़ा कि मुनाई का सारा गुस्सा हवा हो गया।
"अरे-अरे, भाभी जी! आप गलत मत समझिए," योगेंद्र ने एक हल्की सी हंसी हंसते हुए कहा। "दरअसल, मेरी बीवी सरला का बदन भी बिल्कुल आपकी तरह ही है। इस आने वाले सोमवार को हमारी शादी की सालगिरह है, तो मैं सोच रहा था कि एक खास दुकान से उसके लिए एक बहुत ही फैंसी, डिजाइनर ब्लाउज सिलवाकर उसे सरप्राइज गिफ्ट दूँ। अब मर्दों को इन सब साइज का अंदाजा तो होता नहीं। जब मैंने आज आपको बाज़ार में देखा, तो मुझे लगा कि आपकी और मेरी मिसेज की फिटनेस बिल्कुल एक जैसी है। इसीलिए मैंने पूछ लिया ताकि सही नाप बता सकूँ। अगर आपको बुरा लगा हो, तो मैं हाथ जोड़कर माफी मांगता हूँ।"
योगेंद्र का यह स्पष्टीकरण इतना स्वाभाविक और पारिवारिक था कि मुनाई के भीतर का सारा खौफ और शक तुरंत खत्म हो गया। उसे लगा कि वह कितनी बेवकूफ थी जो इतने भले और अपनी बीवी से प्यार करने वाले इंसान पर शक कर रही थी।
"ओह... अच्छा! ऐसा है," मुनाई ने अपनी गहरी सांस छोड़ी, उसका दिल जो जोर से धड़कने लगा था, अब शांत हो चुका था। उसके चेहरे पर फिर से वही नरमी आ गई। उसने अपनी नाइटी के पल्लू को थोड़ा संभाला और मुस्कुराते हुए बोली, "कोई बात नहीं दरोगा जी, मैंने कुछ गलत समझ लिया था। मेरा साइज 38DD है। आप दुकानवाले को बता सकते हैं, आपकी मिसेज को वह ब्लाउज बिल्कुल परफेक्ट आएगा।"
38DD। यह नंबर सुनते ही योगेंद्र सिंह के कानों में जैसे हवस का कोई संगीत गूंज उठा। उनकी पैंट के भीतर का अंग अब पूरी तरह पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। उन्हें जो नाप चाहिए था, वह सीधे उस मांस के पहाड़ की मालकिन के मुंह से मिल चुका था। चाय का कप खत्म हो चुका था, और योगेंद्र अपनी जीत की पहली सीढ़ी चढ़ चुके थे।
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अध्याय समाप्त
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अध्याय ४: गर्म हवाएँ और पिघलती मर्यादा
मई का महीना आते-आते बोकारो टाउनशिप किसी भट्टी की तरह तपने लगा था। दोपहर के वक्त चलने वाली तेज, झुलसा देने वाली 'लू' कंक्रीट के क्वार्टरों की दीवारों को इस कदर गर्म कर देती थी मानो वे ईंटें नहीं, दहकते हुए कोयले हों। सड़कों का डामर पिघलकर चिपचिपा हो चुका था, और घरों के भीतर लगे कूलर भी सिर्फ उमस और भारी, गर्म हवा ही फेंक रहे थे। दिन भर की इस असहनीय तपन से इंसान तो क्या, परिंदे भी अहातों के कोनों में दुबके रहते थे।
इस भीषण गर्मी को देखते हुए टाउनशिप प्रशासन ने सद्भावना के तौर पर एक नई व्यवस्था शुरू की थी। सुबह के अलावा, अब शाम को भी ठीक पांच बजे से छह बजे तक एक घंटे के लिए पानी की विशेष सप्लाई दी जाने लगी थी।
शाम के 5:00 बज चुके थे। सूरज की तीखी धूप अब थोड़ी ढल चुकी थी, लेकिन हवा में अभी भी भारी उमस और तपन बाकी थी। D3 की औरतें इस वक्त घरों के भीतर की घुटन से बचने के लिए अपने-अपने क्वार्टरों के सामने वाले बरामदों और छज्जों के नीचे, पेड़ों की छांव में जुटने लगी थीं। वे चार-पाँच के समूहों में बैठकर हाथ के बांस के पंखे झलती हुई मोहल्ले की गपशप और चुगलियों में मसरूफ थीं। चूंकि औरतें सामने की तरफ सामाजिक मेल-जोल में व्यस्त थीं, इसलिए शाम के इस एक घंटे में पानी का स्टोरेज करने और बर्तनों-बाल्टियों को भरने का जिम्मा घर के मर्दों पर आ गया था।
क्वार्टर नंबर 24bमें भी पानी का काम चल रहा था। शोम अपने दफ्तर से लौट चुका था और इस तपन से राहत पाने के लिए उसने अपनी शर्ट उतारकर सिर्फ एक मैली सफेद बनियान और ढीला सूती पायजामा पहन रखा था। वह अपने घर के सामने वाले छोटे से बगीचे में लगे पौधों को तरोताजा करने के लिए पाइप से पानी डाल रहा था। सामने की ठंडी फुहारें और मिट्टी की सोंधी महक उसे दिन भर की थकान से राहत दे रही थी।
लेकिन घर के पिछले हिस्से में, मुनाई की हालत बदतर थी।
मुनाई का वह भरा-पूरा जिस्म इस उमस भरी गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। उसकी त्वचा पर पसीने की बारीक बूंदें लगातार उभर रही थीं, जिससे उसकी धानी रंग की पुरानी, झीनी नाइटी उसकी पीठ और उसके भारी स्तनों के उभार से चिपककर उसे और ज्यादा बेचैन कर रही थी। उस इनडोर छोटे बाथरूम के भीतर का माहौल इतना गर्म और घुटनभरा था कि वहाँ कदम रखते ही दम घुटने लगता था।
मुनाई पिछले अहाते की तरफ आई। कंक्रीट की वह टंकी अब पाइप के ठंडे पानी से लबालब भर चुकी थी और पानी की सतह पर शाम की हल्की धूप की किरणें तैर रही थीं। पिछले कुछ हफ्तों से, दरोगा योगेंद्र सिंह की उस सख्त चेतावनी के बाद से, D2 स्ट्रीट की छतें पूरी तरह सूनी थीं। रामेश्वर या मिथिलेश ने भूलकर भी उस तरफ अपनी आँखें उठाने की जुर्रत नहीं की थी। यहाँ तक कि मोहल्ले का कोई भी मर्द अब उस मुंडेर की तरफ नहीं फटकता था।
इस लगातार बनी रही शांति ने मुनाई के भीतर सुरक्षा और निजता का एक गहरा, झूठा भरोसा पैदा कर दिया था। उसे पूरा यकीन था कि इस वक्त जब सारी औरतें सामने बातें कर रही हैं और मर्द पानी भरने में व्यस्त हैं, यह पिछला अहाता पूरी तरह महफूज़ है।
उसने टंकी के ठंडे पानी में अपनी गोरी उंगलियां डुबोईं। पानी की वह ताज़ा ठंडक उसके पूरे बदन में एक सिहरन पैदा कर गई। इस दम घुटती गर्मी से निजात पाने के लिए अहाते का यह खुला कोना और टंकी का यह ठंडा पानी एक ऐसा सम्मोहन बन चुका था, जिसे मुनाई ठुकरा नहीं सकती थी। उसने अहाते के भारी लोहे के दरवाजे के भीतर की सांकल को कसकर चढ़ा दिया। शोम बाहर सामने की तरफ पौधों को पानी देने में मग्न था, और मुनाई यहाँ, इस बेफिक्री और आज़ादी के माहौल में, अपने बदन को इस तपन से पूरी तरह आज़ाद करने की तैयारी करने लगी। इस बार वह किसी गीली साड़ी के बंधन में खुद को नहीं जकड़ने वाली थी; इस बार वह प्रकृति के इस झोंके को सीधे अपनी नग्न त्वचा पर महसूस करना चाहती थी।
पिछले हिस्से से लगी हुई वह संकरी और कच्ची पिछड़ी गली इस वक्त पूरी तरह सुनसान थी। शाम के इस पहर D2 की सारी औरतें—जिनमें रामेश्वर की बीवी सरिता भी शामिल थी—अपने घरों के सामने वाले चबूतरे पर चटाई बिछाकर बैठी थीं। सरिता अपनी भारी जांघों पर हाथ मारे जोर-जोर से हंसते हुए मोहल्ले की दूसरी औरतों के साथ अपनी पंचायत में पूरी तरह डूबी हुई थी। सरिता का इस वक्त सामने व्यस्त होना रामेश्वर और मिथिलेश के लिए एक बहुत बड़ी राहत था, क्योंकि घर के पिछले हिस्से पर नजर रखने वाला अब कोई नहीं था।
मिथिलेश अपने अहाते के पास खड़ा होकर कबाड़ में पड़ी एक पुरानी बाल्टी ठीक कर रहा था, कि अचानक उसके कानों में एक बेहद परिचित और भारी आवाज़ गूंजी।
'छपाक... छप-छप...'
मुनाई के पिछले अहाते से ठंडे पानी के गिरने और किसी के बदन से टकराकर बिखरने की वह गूंज इस सूनी गली में साफ सुनाई दे रही थी। मिथिलेश के बदन का खून एक झटके में खौल उठा। वह अपनी बाल्टी वहीं छोड़कर बिल्ली के कदमों से भागता हुआ अंदर गया, जहाँ रामेश्वर रसोई के ड्रम में पानी का पाइप लगाए चुपचाप बीड़ी सुलगने की सोच रहा था।
"जीजा! ओ जीजा! जल्दी आओ... वो... वो फिर से बाहर आई है!" मिथिलेश ने हांफते हुए दबी आवाज में कहा, उसकी आँखें हवस के मारे फटने को थीं।
रामेश्वर ने घबराकर चारों तरफ देखा और मिथिलेश को डांटा, "साले, मरवाएगा क्या? दरोगा की वो कड़क खाकी वर्दी भूल गया? अगर उस बंगालन ने फिर देख लिया, तो सीधे हवालात में चक्की पीसेंगे। हम छत पर नहीं जा रहे!"
"अरे छत पर जाना ही नहीं है जीजा! मेरी बात तो सुनो," मिथिलेश ने रामेश्वर का हाथ पकड़कर उसे पिछले दरवाजे की तरफ खींचा। "दीदी आगे औरतों के साथ गप्पें हांक रही हैं, उन्हें अगले एक घंटे तक होश नहीं आएगा। और हमें छत पर चढ़ने की जरूरत ही नहीं है। इस पिछले रास्ते वाली गली में जो लकड़ी का पुराना दरवाजा लगा है न, इस भीषण गर्मी की लू से उसकी लकड़ियाँ सूखकर सिकुड़ गई हैं। उसमें चौड़ी-चौड़ी दरारें और झिरियाँ बन गई हैं। वहाँ से जमीन पर खड़े-खड़े ही सामने का पूरा नजारा बिल्कुल साफ दिखता है। और इस वक्त उस सूनी गली में कोई कुत्ता भी नहीं आता!"
रामेश्वर के भीतर सोया हुआ ठरकी भेड़िया दरोगा के खौफ पर भारी पड़ गया। सरिता की अनुपस्थिति और ज़मीन के स्तर से ही छिपकर देखने की इस सुरक्षित साज़िश ने उसके भीतर की हवस को दोबारा जगा दिया। उसने बीड़ी को बुझाया, अपनी मूंछों पर हाथ फेरा और मिथिलेश के पीछे-पीछे उस संकरी, छांव वाली पिछड़ी गली में आ गया।
दोनों मर्द दबे पैर चलकर मुनाई के अहाते के ठीक सामने वाले उस पुराने, मटमैले लकड़ी के दरवाजे के पास आकर चिपक गए।
दरवाजे की सूखी हुई लकड़ियों के बीच लगभग आधे इंच चौड़ी दो-तीन लंबी दरारें थीं, जो सीधे मुनाई की कंक्रीट की टंकी वाले हिस्से की तरफ खुलती थीं। रामेश्वर ने अपनी एक आँख उस झिरी पर टिकाई, और मिथिलेश उसके ठीक बगल वाले छेद से झांकने लगा।
अगले ही पल, उन दोनों मर्दों के मुंह खुले के खुले रह गए। उनकी सांसें उनके फेफड़ों में ही जम गईं, मानो उनके सामने किसी ने कोई ऐसा तिलस्म खोल दिया हो जिसकी कल्पना उन्होंने अपने सबसे गंदे सपनों में भी नहीं की थी।
भीषण गर्मी से बेहाल मुनाई ने अपनी वह आसमानी सूती नाइटी उतारकर कंक्रीट के सूखे किनारे पर रख दी थी। वह उस टिन के आधे शेड के नीचे, शाम की मद्धम होती धूप और ठंडी हवा के बीच, पूरी तरह नग्न खड़ी थी। बिना किसी कपड़े की बंदिश के, उसका वह 35 साल का, अति-कामुक और भारी भरा-पूरा जिस्म अपनी पूरी नग्नता के साथ बेपर्दा था।
पानी से धुली उसकी गोरी, चौड़ी पीठ और उसके नितंबों का वह विशाल, मांसल घेरा उस झिरी के आर-पार इतनी नज़दीक दिख रहा था कि रामेश्वर के हाथ अनजाने में ही उसकी लुंगी के भीतर चले गए। लेकिन जो चीज़ देखकर वे दोनों मर्द पूरी तरह पागल होने वाले थे, वह कुछ और ही थी।
दरवाजे की उस सूखी, संकरी झिरी से जो नजारा दिख रहा था, उसने रामेश्वर और मिथिलेश के दिमाग की नसें पूरी तरह सुन्न कर दी थीं। जब मुनाई पीतल की भारी बाल्टी से पानी उठाती, तो उसके वे विशाल, मांसल और नीचे की तरफ झुके हुए स्तनों का पूरा घेरा हवा में भारीपन से डोल उठता था। शाम की ठंडी हवा के स्पर्श और पानी की पहली फुहार पड़ते ही उसके दोनों स्तनों के हलके कत्थई रंग के चूचक कड़े और बेहद सख्त होकर बाहर को तन गए थे। पानी की मोटी, चमकदार धार जब उसके उन भारी, तने हुए स्तनों के गोरेपन से टकराती, तो वह सीधे नीचे गिरने के बजाय उसके सीने के उस विशाल उभार के ढलान से फिसलती हुई, उसकी गहरी छाती की दरार को तर करती हुई आगे बढ़ती थी। पानी की वे बूंदें उसके स्तनों के निचले गोश्त के भारी मोड़ से होकर उसकी गहरी, चौड़ी नाभि और कमर की मांसल परतों को गीला करती हुई नीचे उसकी जांघों की तरफ सफर कर रही थीं। पानी से नहाया उसका वह अति-कामुक जिस्म धूप में किसी मखमली ढाल की तरह चमक रहा था।
रामेश्वर ने हलके से कराहते हुए कहा, "बहनचोद! क्या चूचियां है साली की| मन तो कर रहा मसल-मसल के इत्तर निकालू इसके बदन से"| मिथिलेश जो अब पुरज़ोर हस्तमैथुन में लीन था, वो भी कह पड़ा, "जीजा तुम सिर्फ मसलने की सोच रहे? मैं तो दिन-रात इसकी चूचियाँ चोद कर, अपने माल से रंग दूँ इन फड़फड़ाते हुए नंगे कबूतरों को|"
उस ज़माने की टाउनशिप की आम घरेलू औरतों के पहनावे और रहन-सहन को देखते हुए, रामेश्वर और मिथिलेश के दिमाग में एक बात बिल्कुल तय थी। उन्हें पूरा यकीन था कि इस उम्र की एक शादीशुदा औरत के योनि के पास बालों का एक भारी, प्राकृतिक जंगल होगा, जैसा उनकी अपनी औरतों का होता था।
लेकिन जैसे ही मुनाई ने अगला मग पानी उठाने के लिए अपना बदन थोड़ा सीधा किया और सामने की तरफ घूमी, उन दोनों मर्दों की आँखों के सामने का भूगोल ही बदल गया।
दरार के ठीक पार, मुनाई का वह निचला हिस्सा—उसकी जांघों के मिलन बिंदु के ठीक ऊपर का त्रिकोणीय हिस्सा —पूरी तरह साफ और चिकना था। वहाँ बालों का एक कतरा तक नहीं था। शाम की तीखी धूप जब उसकी उस पूरी तरह साफ की हुई गोरी त्वचा पर पड़ रही थी, तो उसका वह निजी अंग किसी तराशे हुए, चिकने और चमकदार सफेद संगमरमर की तरह चमक रहा था।
"बाप रे बाप... जीजा..." मिथिलेश के मुंह से एक बेहद धीमी, हांफती हुई सिसकी निकली, उसका अंग फटने को बेताब था। "यह तो... यह तो बिल्कुल साफ है। चकाचक... पक्की रांड लगती है।"
रामेश्वर की हालत तो उससे भी बदतर थी। उसकी आँखें उस झिरी से इस कदर चिपक गई थीं मानो कोई उन्हें वहां से खींच ही नहीं सकता था। उसने अपनी लुंगी को सामने से पूरा उठा लिया था और उसका थुलथुला बदन हवस की एक ऐसी हिंसक लहर की चपेट में था कि उसके माथे से पसीने की मोटी बूंदें टपककर उस पुराने लकड़ी के दरवाजे पर गिरने लगी थीं।
उसने अपनी जिंदगी में ऐसी आधुनिक, अपनी देह को इस कदर सहेज कर रखने वाली और कामुक औरत कभी नहीं देखी थी। मुनाई का वह संगमरमर जैसा साफ और गदराई हुई योनि, उसकी मोटी-मोटी जांघों के बीच की वह गोरी दरार, और पानी पड़ने पर उसकी त्वचा पर आने वाली वो चमक—उन दोनों मर्दों के लिए किसी ऐसे गंदे और तीखे नशे जैसी थी जो सीधे उनके खून में घुल रहा था।
मुनाई इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि उसकी इस पूर्ण नग्नता और उसके इस सबसे गुप्त राज को दीवार के ठीक पार खड़े दो भूखे भेड़िये अपनी आँखों से पूरी तरह चाट रहे थे। उसने अपने हाथ में थोड़ा सा साबुन लिया और उसे अपने उन भारी, नीचे झुके हुए स्तनों पर मलना शुरू किया। सफेद झाग उसके स्तनों के गोरेपन को छुपाता हुआ नीचे उसकी उस चिकनी, संगमरमर जैसी जांघों के बीच समाने लगा। वह अपनी आँखें बंद करके उस ठंडे पानी के अहसास में डूबी हुई थी।
बाहर गली में, रामेश्वर और मिथिलेश दोनों अपनी सांसें पूरी तरह रोक चुके थे। उनकी पैंट और लुंगी के भीतर की हरकतें अब बेकाबू हो चुकी थीं। वे बिना कोई आवाज किए, अपनी उंगलियों के घर्षण से खुद को उस नग्न अप्सरा के अक्स को देखते हुए चरम सुख की तरफ ढकेल रहे थे। टाउनशिप की वो गर्म शाम अब उनकी हवस की सबसे काली और सबसे खतरनाक दास्तान की गवाह बन चुकी थी।
उस सुनसान और संकरी पिछड़ी गली में हवस का वह नंगा नाच अपने चरम पर पहुँच चुका था। झिरी के उस पार, मुनाई अब पानी डालकर अपने बदन को पोंछने की तैयारी कर रही थी, और इस पार, रामेश्वर और मिथिलेश दोनों की सांसें बिल्कुल उखड़ चुकी थीं। मुनाई के उस भारी स्तनों, कड़े चूचकों और उसकी जांघों के बीच चमकते उस संगमरमर जैसे साफ, चिकने योनि के अक्स ने उन दोनों को पूरी तरह अंधा कर दिया था।
ठीक उसी पल, एक बेहद तीव्र और बेकाबू सिसकी के साथ दोनों मर्दों का पूरा बदन कांपा। रामेश्वर ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए अपना सारा पानी उस पुराने लकड़ी के दरवाजे पर ही निकाल दिया, और मिथिलेश भी अपनी पैंट के भीतर चरम सुख की लहरों में डूब गया। दोनों हांफते हुए, अपनी कांपती उंगलियों से अपने ढीले पड़ चुके अंगों को वापस अपनी लुंगी और पैंट के भीतर पैक कर ही रहे थे कि अचानक उनके पीछे एक भारी और खुरदरी आवाज गूंजी।
"मज़ा आया?"
वह आवाज़ किसी ठंडे खंजर की तरह उनकी पीठ पर उतरी। रामेश्वर और मिथिलेश का कलेजा जैसे मुंह को आ गया। उनका पूरा बदन डर के मारे पसीने से नहा गया। झटके से पलटकर देखा, तो उनके ठीक पीछे, गली के मद्धम अंधेरे में थाना इंचार्ज योगेंद्र सिंह खड़े थे।
इस बार भी वे सादे लिबास में थे, लेकिन उनकी आँखों में एक खूंखार, शातिर और डरावनी चमक थी। उनके होंठों पर एक ऐसी कुटिल मुस्कान थी जो किसी भी अपराधी की रूह कंपा दे। वे न जाने कब से चुपचाप वहाँ खड़े होकर इन दोनों को रंगे हाथों खुद को सहलाते और मुनाई को ताकते हुए देख रहे थे।
"द-दरोगा साहब... हम... वो..." रामेश्वर के घुटने आपस में टकराने लगे। वह तुरंत योगेंद्र के पैरों में गिरने को हुआ। मिथिलेश की तो घिग्घी बंध चुकी थी, उसे लगा कि अब सीधे हवालात की तीसरी डिग्री तय है।
"उठ! सीधे खड़े रहो दोनों," योगेंद्र ने बहुत ही धीमी, लेकिन एक बेहद डरावनी और भारी आवाज में कहा। उन्होंने चारों तरफ देखा कि कहीं कोई और तो नहीं है। फिर वे आगे बढ़े और दोनों के कंधों पर अपनी भारी, मजबूत हथेलियां टिका दीं। उनके इस दोस्ताना लेकिन जानलेवा अंदाज से दोनों मर्दों की सांसें अटक गईं।
"डरने की कोई जरूरत नहीं है, रामेश्वर प्रसाद," योगेंद्र ने सीधे रामेश्वर की आँखों में झांकते हुए कहा, उनकी आवाज में एक अजीब सी मिठास और खौफ घुला हुआ था। "हम तुम्हें कोई जेल भेजने नहीं आए हैं। अरे, पुरुष हो... और सामने इतना रसीला, 38DD का गोरा गोश्त बिना कपड़ों के संगमरमर की तरह चमक रहा हो, तो अच्छे-अच्छे साधु का ईमान डोल जाए। तुम दोनों तो फिर भी हाड़-मांस के मर्द हो।"
योगेंद्र की बात सुनकर रामेश्वर और मिथिलेश ने अचरज से एक-दूसरे की तरफ देखा। उन्हें अपनी कानों पर भरोसा नहीं हो रहा था।
"साहब... आप... आप केस नहीं करेंगे?" मिथिलेश ने सहमते हुए पूछा।
"केस? कैसा केस?" योगेंद्र ने एक कुटिल ठहाका दबाते हुए कहा। फिर उनकी आवाज अचानक और गहरी तथा गंभीर हो गई। "तुम दोनों को पूरी छूट है। रोज़ शाम को यहाँ आओ, इस दरवाजे की झिरी से अपनी आँखें सेंको, जो देखना है देखो... जब तक कि वो बंगालन या तुम्हारी मेहरारू सरिता तुम्हें रंगे हाथों न पकड़ ले। हमारी तरफ से कोई पाबंदी नहीं है। लेकिन..."
योगेंद्र ने रामेश्वर के कंधे को इतनी जोर से भींचा कि रामेश्वर के मुंह से 'आह' निकल गई। योगेंद्र का चेहरा उनके बिल्कुल करीब आ गया।
"एक बात अपने इस छोटे से दिमाग में अच्छी तरह बिठा लो," योगेंद्र की आँखों में एक हिंसक भेड़िये की हवस साफ दिखने लगी। "इस बंगालन को सिर्फ अपनी आँखों से चाटने का हक तुम दोनों का है। तुम सिर्फ देख सकते हो। लेकिन इस गोरे, चिकने और संगमरमर जैसे बदन का स्वाद... इसे चखने का काम सिर्फ और सिर्फ यह योगेंद्र सिंह करेगा। इस गोश्त पर पहला और आखिरी हक मेरा होगा। समझे?"
रामेश्वर और मिथिलेश ने तुरंत डर और हवस के इस नए गठजोड़ के आगे अपने सिर हिला दिए। उन्हें समझ आ गया था कि कानून का यह रखवाला खुद इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन चुका था।
"बहुत अच्छे," योगेंद्र ने उनकी पीठ थपथपाई और एक शातिर मुस्कान के साथ पीछे हटे। "अब चुपचाप अपने-अपने घरों में दुबक जाओ, इससे पहले कि तुम्हारी औरतें सामने से वापस आएं। इस खेल में आगे क्या करना है, उसके लिए मैं तुम दोनों के संपर्क में रहूँगा। जब मुझे जरूरत होगी, मैं तुम दोनों को याद करूँगा।"
इतना कहकर योगेंद्र सिंह उसी अंधेरी गली के सन्नाटे में चुपचाप आगे बढ़ गए। रामेश्वर और मिथिलेश, जो कुछ मिनट पहले खौफ से मर रहे थे, अब एक अजीब सी उत्तेजना और साज़िश के अहसास से भरे हुए अपने क्वार्टर की तरफ भागे। मुनाई का वह नग्न, बेपर्दा बदन अब सिर्फ एक पड़ोस की औरत का राज नहीं था; वह टाउनशिप के इतिहास के सबसे गंदे और खतरनाक त्रिकोण का केंद्र बन चुका था, जहाँ कानून और हवस दोनों हाथ मिला चुके थे।
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