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Incest Shaitani aaina
#1
Update - 1


दंगे में रंडियां भी लूटी गईं थीं।
बृजमोहन को नसीम जान का सिंगारदान हाथ लगा था। सिंगारदान का फ्रेम हाथीदांत का था जिसमें आदमकद आईना जडा हुआ था और ब्रजमोहन की लडक़ियां बारी - बारी से शीशे में अपना अक्स देखा करती थीं। फ्रेम में जगह जगह तेल, नाखून पॉलिश और लिपस्टिक के धब्बे थे जिससे उसका रंग मटमैला हो गया था और ब्रजमोहन हैरान था कि इन दिनों उसकी बेटियों के लच्छन ये लच्छन पहले नहीं थे। पहले भी वे बालकनी में खडी रहती थीं लेकिन अन्दाज यह नहीं होता था अब तो छोटी भी उसी तरह पाउडर थोपती थी और होंठों पर गाढी लिपस्टिक जमा कर बालकनी में ठठा करती थी।

आज भी तीनों की तीनों बालकनी में खडी आपस में उसी तरह चुहलें कर रही थीं और बृजमोहन चुपचाप सडक़ पर खडा उनके हाव भाव देख रहा था।

यकायक बडी ने एक भरपूर अंगडाई ली उसके जोबन का उभार नुमायां हो गया। मंझली ने झांक कर नीचे देखा और हाथ पीछे करके पीठ खुजाई। पान की दुकान के निकट खडे एक युवक ने मुसकुरा कर बालकनी की तरफ देखा तो छोटी ने मंझली को कोहनी से ठोका दिया और फिर तीनों की तीनों हंसने लगीं और ब्रजमोहन का दिल एक अनजाने डर से कांपने लगा। आखिर वही हुआ जिस बात का डर था यह डर ब्रजमोहन के दिल में उसी दिन घर कर गया था जिस दिन उसने नसीम जान का सिंगारदान लूटा था। जब बलवाई रंडीपाडे में घुसे थे तो कोहराम मच गया था। बृजमोहन और उसके साथी दनदनाते हुए नसीमजान के कोठे पर चढ ग़ये थ। नसीमजान खूब चीखी - चिल्लाई थी। बृजमोहन जब सिंगारदान लेकर उतरने लगा था उसके पांव से लिपट कर गिडग़िडाने लगी थी - भैया, यह पुश्तैनी सिंगारदान है इसको छोड दो भैया।

लेकिन बृजमोहन ने अपने पांव को जोर का झटका दिया था। चल हट रंडी और वह चारों खाने चित्त गिरी थी। उसकी साडी क़मर तक उठ गई थी। लेकिन फिर उसने तुरन्त ही खुद को संभाला और एक बार फिर बृजमोहन से लिपट गई थी - भैया यह मेरी नानी की निशानै है भैया इस बार बृजमोहन ने उसकी कमर पर जोर की लात मारी। नसीमजान जमीन पर दोहरी हो गई। उसके ब्लाउज क़े बटन खुल गये और । बृजमोहन ने छुरा चमकाया - काट लूंगा नसीमजान सहम गई और दोनों हाथों से छातियों को ढंकती हुई कोने में दुबक गई।बृजमोहन सिंगारदान लिये नीचे उतर गया।

बृजमोहन जब सीढियां उतर रहा था यह सोच कर उसको लिज्जत मिली कि सिंगारदान लूट कर उसने नसीमजान को गोया उसकी पुश्तैनी सम्पदा से महरूम कर दिया है। यकीनन यह मूरूसी सिंगारदान था जिसमें उसकी परनानी अपना अक्स देखती होगी, फिर नानी और उसकी मां भी इसी सिंगारदान के सामने बन - ठन कर ग्राहकों से आंखें लडाती होगी। बृजमोहन यह सोच कर खुश होने लगा कि भले ही नसीमजान इससे अच्छा सिंगारदान खरीद ले लेकिन यह पुश्तैनी चीज तो अब उसको मिलने से रही। तब एक पल के लिये बृजमोहन को लगा कि आहाजनी और लूटमार में लिप्त दूसरे दंगाई भी भावना की इसी तरंग से गुजर रहे होंगे कि एक समुदाय को उसकी विवशता से जान - माल से मरहूम दें। ठीक वैसे ही जैसे षडयन्त्र में वह पेश है।

बृजमोहन जब घर पहुंचा तो उसकी पत्नी को सिंगारदान भा गया। शीशा उसको धुंधला मालूम हुआ तो वह भीगे कपडे से पौंछने लगी। शीशे में जगह - जगह तेल के गर्द आलूद धब्बे थे। साफ होने पर शीशा झलझल कर उठा और बृजमोहन की पत्नी खुश हो गयी। उसने घूम घूम कर अपने को आईने में देखा। फिर लडक़ियां भी बारी - बारी से अपना अक्स देखने लगीं।

बृजमोहन ने भी सिंगारदान में झांका तो उसे अपना अक्स मुकम्मल और आकर्षक लगा। उसको लगा सिंगारदान में वाकई एक खास बात है। उसके जी में आया कि कुछ और देर अपने आपको देखे लेकिन यकायक नसीमजान बिलखती नजर आई - भैया सिंगारदान छोड दो चल हट रंडी बृजमोहन ने सिर को गुस्से में दो तीन झटके दिये और सामने से हट गया।

बृजमोहन ने सिंगारदान अपने बेडरूम में रखा। अब कोई पुराने सिंगारदान को पूछता नहीं था। नया सिंगारदान जैसे सब का महबूब बन गया था। घर का हर व्यक्ति खामखां भी आईने के सामने खडा रहता। बृजमोहन अकसर सोचता कि रंडी के सिंगारदान में आखिर क्या भेद छिपा है कि देखने वाला आईने से चिपक - सा जाता है? लडक़ियां जल्दी हटने का नाम नहीं लेती हैं और पत्नी भी रह रह कर खुद को हर कोण से घूरती रहती है यहां तक कि खुद वह भी लेकिन उसके लिये देर तक आईने का सामना करना मुश्किल होता तुरन्त ही नसीमजान रोने लगती थी और बृजमोहन के दिलो - दिमाग पर धुआं सा छाने लगता था।

बृजमोहन ने महसूस किया कि धीरे - धीरे घर में सबके रंग - ढंग बदलने लगे हैं। पत्नी अब कूल्हे मटका कर चलती थी और दांतों में मिस्सी भी लगाती थी। लडक़ियां पांव में पायल भी बांधने लगी थीं और नित नए ढंग से बनाव - सिंगार में लगी रहतीं। टीका, लिपस्टिक और काजल के साथ वह गालों पर तिल भी बनातीं। घर में एक पानदान भी था गया था और हर शाम फूल और गजरे भी आने लगे थे। बृजमोहन की पत्नी शाम से ही पानदान खोलकर बैठ जाती। छालियां कुतरती और सबके संग ठिठोलियां करती और बृजमोहन तमाशाई बना सब कुछ देखता रहता। उसको हैरत थी कि उसकी जुबान क्यों बन्द हो गई है वह कुछ बोलता क्यों नहीं ? उन्हें फटकारता क्यों नहीं?

एक दिन बृजमोहन अपने कमरे में मौजूद था कि बडी सिंगारदान के सामने आकर खडी हो गई। कुछ देर उसने अपने आपको दाएं - बाएं देखा और चोली के बन्द ढीले करने लगी। फिर बायां बाजू ऊपर उठाया और दूसरे हाथ की उंगलियों से बगलों को छूकर देखा फिर सिंगारदान की दराज से लोशन निकाल कर मलने लगी। बृजमोहन मानो सकते में था। वह चुपचाप बेटी की करतूत देख रहा था। इतने में मंझली भी आ गई और उसके पीछे - पीछे छोटी भी। दीदी! लोशन मुझे भी दो क्या करेगी? बडी ऌतराई। दीदी! यह बाथरूम में लगाएगी। चल हट! मंझली ने छोटी के गालों में चुटकी ली और तीनों की तीनों हंसने लगीं।

बृज मोहान का दिल आशंका से धडक़ने लगा। इन लडक़ियों के तो सिंगार ही बदलने लगे हैं। इनको कमरे में अपने बाप की उपस्थिति का भी ध्यान नहीं है। तब बृजमोहन अपनी जगह से हटकर इस तरह खडा हो गया कि उसका अक्स सिंगारदान में दिखन लगो। लेकिन लडक़ियों के रवैय्ये में कोई फर्क नहीं आया। बडी उसी तरह लोशन मलने में व्यस्त रही और दोनों अगल बगल खडी मटकती रहीं।

बृजमोहन को लगा अब घर में उसका वजूद नहीं है। तब अचानक नसीमजान शीशे में मुस्कुराई। घर में अब मेरा वजूद है। और बृजमोहन हैरान रह गया। उसको लगा वाकइ नसीमजान शीशे में बन्द होकर चली आई है और एक दिन निकलेगी और घर के चप्पे - चप्पे पर फैल जायेगी।

बृजमोहन ने कमरे से निकलना चाहा लेकिन उसके पांव मानो जमीन में गड ग़ये थे। वह अपनी जगह से हिल नहीं सका वह खामोश सिंगारदान को ताकता रहा और लडक़ियां हंसती रहीं। सहसा बृजमोहन को महसूस हुआ ेक इस तरह ठट्ठा करती लडक़ियों के दरम्यान कमरे इस वक्त इनका बाप नहीं एक बृजमोहन को अब सिंगारदान से खौफ मालूम होने लगा और नसीमजान अब शीशे में हंसने लगी। बडी चूडियां खनकाती तो वह हंसती। छोटी पायल बजाती तो वह हंसती बृजमोहन को अब आज भी जब वे बालकनी में खडी हंस रही थीं तो वह तामाशाई बना सब कुछ देख रहा था और उसका दिल किसी अनजाने डर से धडक़ रहा था।

बृजमोहन ने महसूस किया कि राहगीर भी रुक - रुक कर बालकनी की तरफ देखने लगे हैं। यकायक पान की दुकान के निकट खडे एक नवयुवक ने इशारा किया। जवाब में लडक़ियों ने भी इशारे किये तो युवक मुस्कुराने लगा।

बृजमोहन के मन में आया कि युवक का नाम पूछे। वह दुकान की ओर बढा, लेकिन नजदीक पहुंच कर चुप हो गया। सहसा उसे महसूस हुआ कि युवक में वह उसी तरह दिलचस्पी ले रहा है जिस तरह लडक़ियां ले रही हैं। तब यह सोच कर हैरत हुई कि वह उसका नाम क्यों पूछना चाह रहा है? आखिर उसके इरादे क्या हैं? क्या वह उसको अपनी लडक़ियों के बीच ले जायेगा? बृजमोहन के होंठों पर पल भर के लिये एक रहस्यमयी मुस्कान रैंग गयी। उसने पान का बीडा कल्ले में दबाया और जेब से कंघी निकाल कर दुकान के शीशे में बाल सोंटने लगा। इस तरह बालों में कंघी करते हुए उसको एक तरह की राहत का अहसास हुआ। उसने एक बार कनखियों से युवक को देखा। वह एक रिक्शा वाले से आहिस्ता - आहिस्ता बातें कर रहा था और बीच - बीच में बालकनी की तरफ भी देख रहा था। जेब में कंघी रखते हुए बृजमोहन ने महसूस किया कि वाकई उसकी युवक में किसी हद तक दिलचस्पी जरूर है यानी खुद उसके संस्कार भी उंह संस्कार - वंस्कार से क्या होता है? यह उसका कैसा संस्कार था कि उसने एक रंडी को लूटा एक रंडी कोकिस तरह रोती थी भैया भैया मेरे और फिर बृजमोहन के कानों में नसीमजान के रोने - बिलखने की आवाजें ग़ूंजने लगीं बृजमोहन ने गुस्से में दो तीन झटके सिर को दिये। एक नजर बालकनी की तरफ देखा, पान के पैसे अदा किये और सडक़ पार कर घर में दाखिल हुआ।

अपने कमरे में आकर वह सिंगारदान के सामने खडा हो गया। उसको अपना रंग रूप बदला हुआ नज़र आया। चेहरे पर जगह - जगह झांइयां पड ग़ईं थीं और आंखों में कासनी रंग घुला हुआ था। एक बार उसने धोती की गांठ खोल कर बांधी और चेहरे की झांइयाें पर हाथ फेरने लगा। उसके जी में आया कि आंखों में सुरमा लगाये और गले में लाल रूमाल बांध ले कुछ देर तक वह अपने आपको इसी तरह घूरता रहा। फिर उसकी पत्नी भी आ गई। सिंगारदान के सामने वह खडी हुई तो उसका आंचल ढलक गया। वह बडी अदा से मुस्कुराई और आंखों के इशारे से उसने बृजमोहन को चोली के बन्द लगाने के लिए कहा।

बृजमोहन ने एक बार शीशे की तरफ देखा। अंगिया में फंसी हुई छातियों का बिम्ब उसे सुहावना लगा। बन्द लगाते हुए उसके हाथ छातियों की ओर रेंग गये। उई दइया बृजमोहन की पत्नी बल खा गई और बृजमोहन को अजीब कैफियत हो गयी उसने छातियों को जोर से दबा दिया। हाय राजा उसकी पत्नी कसमसाई और बृजमोहन की रगों में रक्तचाप बढ ग़या। उसने एक झटके में अंगिया नोंच कर फेंक दी और उसको पलंग पर खींच लिया। वह उससे लिपटी हुई पलंग पर गिरी और हंसने लगी।

बृजमोहन ने एक नजर शीशे की तरफ देखा। पत्नी के नंगे बदन का अक्स देखकर उसकी रगों में शोला सा भडक़ उठा उसने यकायक खुद को एकदम निर्वस्त्र कर दिया तब बृजमोहन की पत्नी उसके कानों में धीरे से फुसफुसाई - हाय राजा लूट लो भरतपूर..... बृजमोहन ने अपनी पत्नी के मुंह से कभी उई दइया और हाय राजा जैसे शब्द नहीं सुने थे। उसे लगा ये शब्द नहीं सारंगी के सुर हैं जो नसीमजान के कोठे पर गूंज रहे हैं और तब।

और तब फिजा कासनी हो गयी थी। शीशा धुंधला गया था और सारंगी के सुर गूंजने लगे थे... बृजमोहन बिस्तर से उठा, सिंगारदान की दराज से सुरमेदानी निकाली, आंखों में सुरमा लगाया, कलाई पर गजरा लपेटा और गले में लाल रूमाल बांध कर नीचे उतर गया और सीढियों के नीचे दीवाल से लग कर बीडी क़े लम्बे - लम्बे कश लेने लगा।

समय बीतता गया, और बदलाव अब छिपा नहीं रह सका।
पहले तो सिर्फ चाल-ढाल में फर्क था — सरला की साड़ी का पल्लू थोड़ा और नीचे सरकने लगा, रेखा की गर्दन अब पहले जितनी झुकी नहीं रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह बदलाव घर की चार दीवारों से बाहर निकलने लगा।
एक दिन पड़ोस की औरतें सरला से मिलने आईं। चाय की प्यालियों में बातें शुरू हुईं तो रेखा भी कमरे में आ गई। उसने साधारण साड़ी पहनी थी, लेकिन ब्लाउज की कटिंग थोड़ी अलग थी — कंधे थोड़े खुला, गर्दन गहरी। जब रेखा झुककर चाय का कप रख रही थी, तो एक पड़ोसिन की नजर उसके उभार पर अटक गई। वह मुस्कुराई और बोली, “रेखा बेटी, तुम तो दिन-प्रतिदिन और निखरती जा रही हो। लगता है कोई जादू हो गया है।”
रेखा ने आईने वाली मुस्कान दी — वह मुस्कान जो अब उसे सिंगारदान से सीखी लगती थी। उसने कहा, “जादू तो सबके पास होता है आंटी, बस इस्तेमाल कौन करता है।”
सरला चुप रही, लेकिन उसके होंठों पर एक हल्की रेखा उभर आई।
फिर शुरू हुआ बाजार का सिलसिला।
रेखा अब कॉलेज के बाद सीधे घर नहीं आती थी। कभी-कभी देर हो जाती। एक शाम वह लौटी तो उसके हाथ में नए कपड़े थे — एक हल्की रंग की साड़ी, जिसका ब्लाउज काफी संकीर्ण था। जब उसने वह साड़ी पहनकर सिंगारदान के सामने खड़ी होकर खुद को देखा, तो मीना ने पीछे से कहा, “दीदी, इस साड़ी में तुम बहुत... अलग लग रही हो।”
रेखा ने बिना पलटे जवाब दिया, “अलग अच्छा है या बुरा?”
मीना कुछ नहीं बोली। लेकिन अगले हफ्ते वह खुद बाजार गई और एक नाइट ड्रेस लाई, जो घर में पहनने लायक थी, लेकिन इतनी पतली कि उसकी युवा देह की रेखाएँ साफ झलकती थीं।
छोटी पिंकी अभी कॉलेज जाती थी, लेकिन उसकी बातें बदल गई थीं। वह अब दोस्तों से पूछती, “तुम्हारे घर में कितने शीशे हैं?” या “क्या तुम भी कभी खुद को बहुत सुंदर लगते हो?”
बृजमोहन देखता रहता।
उसे अब अहसास हो रहा था कि सिंगारदान सिर्फ एक वस्तु नहीं था। वह एक बीज था, जो धीरे-धीरे घर की मिट्टी में उतर रहा था। और अब फसल उगने लगी थी।
एक रात घर में अकेले में सरला ने बृजमोहन से कहा, “तुम जानते हो, नसीम जान सिर्फ तवायफ नहीं थी। वह औरत थी जो जानती थी कि पुरुष क्या देखना चाहते हैं। अब हमारे घर की लड़कियाँ भी सीख रही हैं।”
बृजमोहन ने पूछा, “सीख रही हैं... क्या?”
सरला ने आईने की तरफ देखते हुए धीरे से कहा,
“अपनी कीमत।”
“कीमत?”
“हाँ। पहले हम सोचते थे कि औरत की कीमत उसकी इज्जत है। अब लगता है कि उसकी कीमत उसकी खूबसूरती और उसकी देह की चाहत में है। रेखा को अब लड़के ज्यादा घूरते हैं। वह शिकायत नहीं करती। वह मुस्कुराती है।”
बृजमोहन का गला सूख गया।
धीरे-धीरे शुरुआत हो चुकी थी।
रेखा अब कभी-कभी शाम को पड़ोस के एक लड़के के साथ देर तक बातें करती दिखती। मीना कॉलेज के टीचर के सामने अब पहले जितनी शर्मीली नहीं रहती थी — वह आँखों में आँखें डालकर बात करती। पिंकी भी अब अपने छोटे-छोटे कपड़ों में घर के आँगन में घूमती, और पड़ोस के लड़के चुपके से झाँकते।
सरला इन सबको देखती और चुप रहती। लेकिन उसके चेहरे पर संतोष था, जैसे कोई पुरानी तवायफ अपनी बेटियों को तैयार करते हुए देख रही हो।
बृजमोहन अब समझ रहा था कि लूट का असली नतीजा क्या होता है।
वह जिस चीज को जबरन ले आया था, वह अब उसके घर की औरतों को धीरे-धीरे बाजार की तरफ ले जा रही थी — पहले नजरों में, फिर चाहत में, और शायद एक दिन... कीमत तय होने लगेगी।
आईना अभी भी चुपचाप देख रहा था।
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#2
अपडेट २

लेकिन जल्द ही बृजमोहन समझ गया कि जो कुछ भी हो रहा है वो सब गलत है ।
रात को बृजमोहन ने एक सपना देखा ।
वो रात को बिस्तर से उठा । सरला गायब थी । वो बिस्तर से उतरा और दूसरे कमरों में सरला को ढूंढने लगा । उसे सरला कहीं नहीं मिली । तभी एक कमरे से उसे बंद दरवाजे से कुछ आवाजें आती सुनाई दी । वो खिड़की के पास गया तो उसने देखा कि उसकी बीवी एक काले कलूटे गैर मर्द के साथ हमबिस्तर है । वो उसके ऊपर चढ़ा हुआ है और ताबड़तोड़ धक्के लगा रहा है ।
सरला की टांगे हवा में उठी हुई थीं । और वो जोर जोर से – आह ... आह ... कर रही थी ।
उसने देखा कि अभी दरवाजे पर 6 – 7 मुल्ले खड़े थे जो हंस हंस के बात कर रहे थे । शायद वो अपनी बारी का इन्तजार कर रहे थे ।
तभी अंदर मौजूद शख्स बोलता है,
– सरला जी , आवाजें जरा धीमे करिए, कहीं आपके पति जाग गए तो ।
सरला – जाग गए तो क्या, पैसे क्या उसे नहीं चाहिए ।फ्री में कुछ नहीं मिलता । वो आ भी तो क्या, वही तो मेरा दलाल है । भगा दूंगी उसे ।
यह कह कर दोनों हसने लगते हैं ।
आदमी – मीना और रेखा भी अब जवान तैयार माल हो गई हैं ।
सरला – तो आखिर नज़र पड़ ही गई तुम्हारी उन पर । आदमी – लड़की की छाती उभरी नहीं की उस पर नजर पड़ ही जाती है, तो कब दिला रही हो उनकी । बहुत डिमांड आ रही है ।
राकेश से ये सब देखा नहीं जाता । वो अपने कमरे में आता है और आइने पर नजर डालता है । उसमें सरला की नंगी छाती, मीना की गीली चूत, रेखा की लचकती कमर और पिंकी की छोटी-सी फुद्दी का अक्स दिख रहा था।
वो दुबारा उस कमरे की ओर जाता है , जहां उसकी बीवी सरला का ऑपरेशन चल रहा था। वो चौंकता है। बाहर खड़े लोग गायब थे । और खिड़की बंद थी ।
वो दरवाजे के पास जाता है, जो बंद था । अंदर से उसे सरला की चीखें सुनाई देती हैं । वो दरवाजे को हल्के से धकेलता है । और अंदर का नजारा देखकर स्तब्ध रह जाता है। सभी चार छह मर्द नग्न हो के सरला को चोद रहे थे। और उसकी आँखें बंद थी। वो दर्द से चीख रही थी, जैसे उसका बलात्कार हो रहा हो । सब ने उसे बीच में दबोच रखा था।
ये देख कर राकेश के मुंह से चीख निकल जाती है ।
सब रुक जाते हैं । और राकेश की ओर देखने लगते हैं ।
सरला की आंख खुलती है ।
सरला है रुक क्यों गए, वो कुछ नहीं करेगा, वो नामर्द है ।
उसके बाद सभी फिर से सरला को चोदने लगे । सैंडविच बना के । दो ने उसका एक एक बोबा मुंह में ले रखा था , और उसे आइस्क्रीम की तरह चूस रहे थे । एक को कुछ नहीं मिला तो वो सरला की जांघ चाट रहा था, और एक उसकी नाभि को जीभ से सहला रहा था ।
सरला राकेश को देख कर मुस्कुरा रही थी , और अपने बालों को दोनो हाथों से लहरा रही थी । तभी राकेश के नीचे हलचल होने लगी । और उसकी नींद खुल गई ।

उसने देखा सरला बगल में लेती है । उसका लिंग तन रखा था । वो सपना बुरा लगने के बजाय उसकी उत्तेजना बढ़ा रहा था ।
राकेश ने अपने कपड़े उतार फेंके और वो सोई हुई सरला के ऊपर चढ़ गया । और उसके स्तनों को दबाने लगा और उसे चूमने लगा । थोड़ी देर बाद सरला भी उठ गई और पति की इच्छा को समझते हुए राकेश का साथ देने लगी ।
सरला है क्या हुआ, कोई सपना देखा क्या ?
राकेश चुप रहा और सरला को मसलने लगा । सरला की सिसकियां छुटने लगीं ।
राकेश सरला का व्यवहार देख हैरान था , उसने पहले भी ऐसा किया था । तब सरला ने उसे झिड़क दिया था । लेकिन आज वो अलग ही नजर आ रही थी उसे । जैसे पहले से तैयार बैठी हो । वो भी ऐसे वाइल्ड होके सेक्स कर रही थी जैसे वो सोने से पहले और कई दिनों के बाद सेक्स करती थी ।
बृजमोहन सरला की फुद्दि चोदने लगा । उसे सरला की फुद्दि बहुत ढीली लगी । तेज झटके लगने पर उसके चेहरे पर उसे दर्द के नहीं , बल्कि उत्तेजना के भाव दिख रहे थे। वो एक वैश्या की तरह बृजमोहन को देख रही थी और मुस्कुरा रही थी ।
सरला – आह ,, धीरे करो राजा, ऐसा क्या देख लिया सपने में
बृजमोहन – तुझे,
सरला – अच्छा जी ! क्या कर रही थी मैं
बृजमोहन – छीनाल, ...
सरला – क्या.... क्या कहा आपने मुझे ... छीनाल
सरला – हां हां , छिनाल, छिनाल बनके चुदवा रही थी तू लोगो से
बृजमोहन ने पहली बार अपनी बीवी को रण्डी कहा था ।
सरला एक नजर उसे देखती है और फिर बेशर्मी के साथ मुस्कुरा कर कहती है ।

सरला - आह ... तो पति देव , किस किस के साथ देख आए तुम मुझे सपने में

सरला भी बुरा मानने के बजाय उस से वैसी ही भाषा में बात कर रही ।

सरला बृजमोहन के निप्पलों को उंगली से छेड़ने लगती है।
सरला – बताओ न ,

बृजमोहन का झड़ जाता है । और वो बिस्तर पे गिर जाता है ।
सरला – अरे ये क्या, इतने जल्दी, बताने से पहले ही, चलो अब तो बता दो
बृजमोहन – कुछ नहीं, जाने दो
सरला - जाने क्यों दूं
थोड़ी देर चुप रहने के बाद सरला करवट बदल के कहती है, " लगता है, जो तुमने सपने में देखा है, मुझे वही करना पड़ेगा ”
बृजमोहन - क्या बकवास कर रही हो ।
वो उसकी बाँह पकड़ के अपनी ओर पलटता है ।
सरला – और नहीं तो क्या, पहले तो करते नही हो, और करते हो तो यूं गरम करके छोड़ देते हो ।
( शरारती नजरों से देखते हुए बृजमोहन का गाल पकड़ती है ) अब मुझे ठंडी नहीं करोगे तो ... मुझे छिनाल तो बनाना ही पड़ेगा न पतिदेव
बृजमोहन – मै तो ऐसे ही कह रहा था । मैंने कोई सपना नहीं देखा था ।
सरला – मैं भी तो मजाक कर रही हूं राजा । ... और सपना तो तुमने देखा है मेरा । ही ही
बृजमोहन – तुमने कभी ऐसे बात नहीं की
सरला – तुमने भी तो मुझे कभी रण्डी नहीं कहा
ब्रजमोहन – गलती हुई मुझसे
सरला – गलती क्यों, तुम कहो मुझे रण्डी । लेकिन मैं तुम्हारी randi हूं औरों की नहीं ठीक है
ब्रज – ठीक है
सरला – अब सो जाओ ।
ब्रिज – अगर तुम्हारी प्यास नहीं बुझी तो फिर करते हैं ।
सरला – नहीं , जरूरत नहीं
बृजमोहन सोने लगता है, लेकिन उसे नींद नहीं आती ।
थोड़ी देर बाद एक झपकी लगने के बाद वो खड़ा उठता है तो देखता है कि सरला अपने बिस्तर पे नहीं है, वो दूसरे कमरे में जाता है । दरवाजे को हल्का खोलकर देखता है कि सरला वहां रखे आइने के आगे निर्वस्त्र हो रखी थी और एक हाथ से अपनी चूत में तेजी से उंगली कर रही थी और दूसरे हाथ से अपनी चूचि को दबा रही थी । उसकी आँखें मजे से बंद थी ।
समय बीतता गया, और बदलाव अब छिपा नहीं रह सका।
पहले तो सिर्फ चाल-ढाल में फर्क था — सरला की साड़ी का पल्लू थोड़ा और नीचे सरकने लगा, रेखा की गर्दन अब पहले जितनी झुकी नहीं रहती थी। लेकिन धीरे-धीरे यह बदलाव घर की चार दीवारों से बाहर निकलने लगा।
एक दिन पड़ोस की औरतें सरला से मिलने आईं। चाय की प्यालियों में बातें शुरू हुईं तो रेखा भी कमरे में आ गई। उसने साधारण साड़ी पहनी थी, लेकिन ब्लाउज की कटिंग थोड़ी अलग थी — कंधे थोड़े खुला, गर्दन गहरी। जब रेखा झुककर चाय का कप रख रही थी, तो एक पड़ोसिन की नजर उसके उभार पर अटक गई। वह मुस्कुराई और बोली, “रेखा बेटी, तुम तो दिन-प्रतिदिन और निखरती जा रही हो। लगता है कोई जादू हो गया है।”
रेखा ने आईने वाली मुस्कान दी — वह मुस्कान जो अब उसे सिंगारदान से सीखी लगती थी। उसने कहा, “जादू तो सबके पास होता है आंटी, बस इस्तेमाल कौन करता है।”
सरला चुप रही, लेकिन उसके होंठों पर एक हल्की रेखा उभर आई।
फिर शुरू हुआ बाजार का सिलसिला।
रेखा अब कॉलेज के बाद सीधे घर नहीं आती थी। कभी-कभी देर हो जाती। एक शाम वह लौटी तो उसके हाथ में नए कपड़े थे — एक हल्की रंग की साड़ी, जिसका ब्लाउज काफी संकीर्ण था। जब उसने वह साड़ी पहनकर सिंगारदान के सामने खड़ी होकर खुद को देखा, तो मीना ने पीछे से कहा, “दीदी, इस साड़ी में तुम बहुत... अलग लग रही हो।”
रेखा ने बिना पलटे जवाब दिया, “अलग अच्छा है या बुरा?”
मीना कुछ नहीं बोली। लेकिन अगले हफ्ते वह खुद बाजार गई और एक नाइट ड्रेस लाई, जो घर में पहनने लायक थी, लेकिन इतनी पतली कि उसकी युवा देह की रेखाएँ साफ झलकती थीं।
छोटी पिंकी अभी कॉलेज जाती थी, लेकिन उसकी बातें बदल गई थीं। वह अब दोस्तों से पूछती, “तुम्हारे घर में कितने शीशे हैं?” या “क्या तुम भी कभी खुद को बहुत सुंदर लगते हो?”
बृजमोहन देखता रहता।
उसे अब अहसास हो रहा था कि सिंगारदान सिर्फ एक वस्तु नहीं था। वह एक बीज था, जो धीरे-धीरे घर की मिट्टी में उतर रहा था। और अब फसल उगने लगी थी।
एक रात घर में अकेले में सरला ने बृजमोहन से कहा, “तुम जानते हो, नसीम जान सिर्फ तवायफ नहीं थी। वह औरत थी जो जानती थी कि पुरुष क्या देखना चाहते हैं। अब हमारे घर की लड़कियाँ भी सीख रही हैं।”
बृजमोहन ने पूछा, “सीख रही हैं... क्या?”
सरला ने आईने की तरफ देखते हुए धीरे से कहा,
“अपनी कीमत।”
“कीमत?”
“हाँ। पहले हम सोचते थे कि औरत की कीमत उसकी इज्जत है। अब लगता है कि उसकी कीमत उसकी खूबसूरती और उसकी देह की चाहत में है। रेखा को अब लड़के ज्यादा घूरते हैं। वह शिकायत नहीं करती। वह मुस्कुराती है।”
बृजमोहन का गला सूख गया।
धीरे-धीरे शुरुआत हो चुकी थी।
रेखा अब कभी-कभी शाम को पड़ोस के एक लड़के के साथ देर तक बातें करती दिखती। मीना कॉलेज के टीचर के सामने अब पहले जितनी शर्मीली नहीं रहती थी — वह आँखों में आँखें डालकर बात करती। पिंकी भी अब अपने छोटे-छोटे कपड़ों में घर के आँगन में घूमती, और पड़ोस के लड़के चुपके से झाँकते।
सरला इन सबको देखती और चुप रहती। लेकिन उसके चेहरे पर संतोष था, जैसे कोई पुरानी तवायफ अपनी बेटियों को तैयार करते हुए देख रही हो।
बृजमोहन अब समझ रहा था कि लूट का असली नतीजा क्या होता है।
वह जिस चीज को जबरन ले आया था, वह अब उसके घर की औरतों को धीरे-धीरे बाजार की तरफ ले जा रही थी — पहले नजरों में, फिर चाहत में, और शायद एक दिन... कीमत तय होने लगेगी।
आईना अभी भी चुपचाप देख रहा था।

रात गहरी हो चुकी थी। बारिश की बूँदें छत पर टपक रही थीं, लेकिन घर के अंदर की हवा गर्म और भारी थी।
सरला अब पहले जैसी नहीं रही थी।
वह रात को बृजमोहन के बिस्तर पर आई, लेकिन इस बार उसकी चाल में एक जानबूझकर की गई मंदता थी। साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरककर कोहनी तक आ गया था। ब्लाउज के ऊपर के दो हुक पहले ही खुले हुए थे। उसकी भारी, गोरी छाती हर साँस के साथ उठ-गिर रही थी। कमरे में सिर्फ सिंगारदान के आईने पर रखी छोटी मोमबत्ती की रोशनी थी, जो सरला के शरीर पर नरम-नरम परछाइयाँ डाल रही थी।
बृजमोहन लेटा हुआ था। उसने आँखें खोलीं तो सरला उसके ऊपर झुक गई। उसकी साड़ी की चुन्नट अब कमर तक खुल चुकी थी। उसकी मोटी, मुलायम कमर और नाभि साफ दिख रही थी।
“आज तुम मुझे देखो,” सरला ने धीमी, भारी आवाज़ में कहा। “सचमुच देखो... जैसे पहले कभी नहीं देखा।”
बृजमोहन की साँस अटक गई। सरला ने खुद अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह सरका दिया। ब्लाउज अब सिर्फ दो हुक पर टिकी हुई थी। उसने धीरे से दोनों हाथ पीछे ले जाकर बाकी हुक भी खोल दिए। भारी, लटकते हुए स्तन बाहर आ गए — बड़े, नरम, लेकिन अब भी काफी सख्त निप्पल्स वाले। मोमबत्ती की रोशनी में वे सुनहरे और गर्म लग रहे थे।
सरला ने एक स्तन को अपने हाथ में उठाया, हल्का दबाया और बृजमोहन की तरफ बढ़ाया।
“इन्हें छुओ... महसूस करो। ये अब पहले जैसे नहीं रहे। इनमें एक नई भूख है।”
बृजमोहन का हाथ काँपता हुआ आगे बढ़ा। जब उसकी उँगलियाँ सरला की गर्म, मुलायम छाती को छुईं, तो सरला ने आँखें बंद कर लीं और एक लंबी, गहरी सिसकारी भरी — “हmmm...”
उसकी आवाज़ में शर्म नहीं थी, बल्कि एक तरह की मुक्ति थी।
सरला अब पूरी तरह खुल चुकी थी। उसने बृजमोहन की पैंट की डोरी खींची और हाथ अंदर डाल दिया। उसके मोटे, सख्त लंड को पकड़कर धीरे-धीरे सहलाने लगी। उसकी उँगलियाँ अनुभवी थीं, जैसे नसीम जान की यादें अब उसके हाथों में आ गई हों।
“तुमने सोचा था कि सिर्फ सिंगारदान ला रहे हो?” सरला ने आँखें खोलकर बृजमोहन को देखते हुए कहा, “लेकिन वह औरत... नसीम जान... उसकी सारी भूख, उसकी सारी कला... अब मेरे अंदर है।”
वह बृजमोहन के ऊपर चढ़ गई। अपनी साड़ी को कमर तक उठाकर उसने अपनी गीली, गरम चूत को बृजमोहन के लंड पर रगड़ना शुरू कर दिया। उसकी चूत अब पहले से कहीं ज्यादा नरम और रसीली हो गई थी। हर रगड़ के साथ एक हल्की-सी चिकनी आवाज़ निकल रही थी।
सरला ने झुककर बृजमोहन के कान में फुसफुसाया,
“मुझे चोदो... लेकिन आज मैं तुम्हें नहीं, तुम मुझे चोदोगे। जोर से। जैसे कोई रंडी को चोदता है।”
बृजमोहन ने उसे पलटकर नीचे किया। सरला की टांगें अपने आप फैल गईं। उसकी मोटी जांघें और गीली फुद्दी मोमबत्ती की रोशनी में चमक रही थी। बृजमोहन जब उसमें घुसा, तो सरला ने जोर से कराहकर अपनी कमर उठाई — “आह्ह्ह... और गहरा... पूरी तरह भर दो मुझे।”
उस रात सरला ने पहली बार बिना किसी संकोच के अपनी पूरी देह दी। वह चीखी, सिसकारी, गालियाँ भी निकाली — “हाँ... फाड़ दो मेरी चूत... मुझे रंडी बना दो...”
जब दोनों थककर लेटे, सरला ने बृजमोहन की छाती पर सिर रखा और धीरे से कहा,
“अब मैं डर नहीं रही। मुझे अच्छा लग रहा है। खुद को खुला महसूस करना... अपनी भूख को स्वीकार करना।”
बाहर पड़ोस में अफवाहें और तेज़ हो रही थीं, लेकिन सरला अब उनसे दूर हो चुकी थी। सिंगारदान के आईने में उसकी छवि अब एक नई औरत की थी — जो अपनी देह को जान चुकी थी, और उसे जीना भी सीख रही थी।
मीना और पिंकी अपने कमरों में सो रही थीं, लेकिन सरला जानती थी कि जल्द ही उनकी बारी भी आएगी।
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#3
कहानी बहुत रोमांच और उत्तेजना से भरपूर है लेकिन prefix incest की जगह adultery होनी चाहिए,
क्योंकि इसमें अब तक incest वाले कोई अंश मुझे तो नज़र नहीं आएं !
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#4
Update -3

सरला अब पूरी तरह खुल चुकी थी।
सिंगारदान ने उसके अंदर दबी हुई औरत को जगा दिया था। अब वह घर की चार दीवारों में कैद नहीं रहना चाहती थी। उसकी देह को अब अपनी भूख का अहसास हो चुका था — गर्म, भारी और बेचैन।
अब घर में भी वो बिना मेकअप के नहीं रहती । उसके ब्लाउज़ेस का साइज भी दिनों दिन छोटा होता जा रहा था । टाइट ब्लाउज पहनने के कारण उससे अंगों का उभार और भी साफ और अच्छे से दिखता । घर में आने वाले आगंतुक जो अब तक उसे भाभी या संभ्रांत महिला के रूप में देखते थे उनके मन में भी सरला के प्रति कामुक विचार आने लगे थे । उनकी भी धारणा सरला के प्रति बदलने लगी थी । लेकिन उनमें से कुछ ने मर्उयादा बनाए रखी । कुछ पे उसने डोरे डाले लेकिन सफल नहीं हुई । उन लोगों ने अपनी इज्ज़त का खयाल करते हुए वहां जाना छोड़ दिया। कुछ ने सरला से डबल मिनिंग बातें की तो सरला ने उन्हें नेगेटिव रेस्पॉन्स दिया क्योंकि उन्हें वो पसंद नहीं करती थी । लेकिन कुछ को वो भाव देने लायक भी समझती थी । उन्हीं में से एक रमेश जी भी थे जो बृजमोहन के अच्छे दोस्त और शुभचिंतक थे । वो अक्सर बृजमोहन के यहां आते रहते थे ।
ऐसे ही एक दिन वो बैठक में बैठे बात कर रहे थे। अंदर किचन में सरला चाय बना रही थी । रमेश रसोई में खड़ी सरला को देख रहा था । असल में सरला ने बैकलेस ब्लाउज पहना था। जिसमें उसकी गोरी नंगी पीठ उसे आकर्षित कर रही थी। और वो बात करते करते उसे देख रहा था । अचानक सरला घूमती है तो रमेश को अपनी पीठ की ओर घूरता हुआ पाती है । वो चौंकती है, क्योंकि रमेश बहुत सज्जन और शरीफ आदमी थे । सोसाइटी में बहुत इज्ज़त थी उनकी । वो दुबारा उसे देखती है तो रमेश की नजरे अपने बदन पर पाती है ।
" आह , ये भी " सरला एक लंबी सांस छोड़ती है।
चाय लाने के लिए जब वो बाहर आती है तो रमेश को घूरती है । सामने बैठी सरला रमेश को घूरे जा रही थी ।
ब्रिज अपनी बातों में लगा था । रमेश कभी ब्रिज की ओर देखता तो कभी सरला की ओर ।
तभी सरला की आंखों में एक अजीब सा नशा चा जाता है। वो गर्दन को हाथ से सहलाने लगी और रमेश को lusti नजरों से देखने लगी । रमेश उसकी नजरों को समझ जाता है लेकिन थोड़ा डरता है , क्योंकि ब्रिज वहीं पे था । लेकिन सरला बड़ी चालकी से ब्रिज के सामने ही रमेश पर नयन बाण चला रही थी ।
अगले दिन वो ब्रिज की अनुपस्थिति में वहां आया । सरला चाय बना के वहां आई ।
रमेश - भाभी जी आपसे एक बात कहें
सरला – कहिए न, रमेश जी, क्या कहना है
रमेश – वो ये आप ब्लाउज कहां सिलवाती हैं
सरला – क्यों, बहुत छोटा है क्या
रमेश - नहीं नहीं वह सावित्री पूछ रही थी
सरला – ओह अच्छा, लेकिन वो तो पहनती नहीं इतना छोटा ।
रमेश– अरे छोटा कहां है आपने भी तो पहना है अब उसी ने मुझे कहा तो इसलिए पूछ रहा हूं
सरला शरारत भरी आवाज में रहती है।
रमेश जी सच-सच बताओ वह पहनना चाहती है या आप उसे पहनना चाहते हो, क्यों
रमेश – अरे नहीं नहीं वो ही पहनना चाहती है
सरला – ठीक है, वो पहना चाहती हैं तो मैं उसे टेलर का एड्रेस दे देती हूं । वैसे बहुत सेक्सी लगेंगी दीदी इस टाइप के ब्लाउज में ।
रमेश – वो तो है
सरला – वैसे मै कैसी लगती हूं आपको , मेरा मतलब आज जो मैने पहना है ।
रमेश की नजर सरला की कमर पे जाती है।
सरला – क्या सोचने लगे
रमेश - आप तो बहुत सुंदर लग रही हो । ब्रिज बाबू बहुत खुशकिस्मत हैं ।
सरला –खुशकिस्मत आप भी हो सकते हैं
रमेश – जी मै ?
सरला – मेरा मतलब खुशकिस्मत तो आप भी हैं जो मेरे जैसी सुंदर भाभी मिली है आपको । क्यों ( सरला रमेश को आंख मारती है )
रमेश – हां जी , वो तो है, आपको तो बार देखने का मन करता है, इतनी सुंदर हो आप
सरला – क्यों पहले नहीं थी क्या ,, हा हा
रमेश - नहीं नहीं पहले भी थी
सरला – तो आ जाया करिए न, अपनी भाभी को देखने के लिए, मैने कहां मन किया है
रमेश सरला का सिग्नल समझ गया और रोज रोज वहां आने लगा ।
सरला समझ गई कि रमेश जी अब गए काम से । उसने तय कर लिया कि अब हथौड़े की चोट कर ही देती हूं ।
एक दोपहर जब बृजमोहन बाजार गया हुआ था, सरला नेे रमेश जी को चाय के बहाने बुला लिया। रमेश जी विधुर थे, उम्र पचास के आसपास, लेकिन शरीर अभी भी तगड़ा था। सरला ने हल्की सी साड़ी पहनी थी — ब्लाउज काफी ढीला और गहरा कटा हुआ, जिससे उसकी भारी छाती का आधा हिस्सा साफ झलक रहा था।
रमेश जी जब आँगन में बैठे, सरला झुककर चाय रख रही थी। उसके स्तन लगभग बाहर आने को थे। रमेश जी की नजरें वहीं अटक गईं।
सरला मुस्कुराई और धीरे से बोली, “क्या देख रहे हो रमेश जी? पहले कभी नहीं देखा क्या?”
रमेश जी का गला सूख गया। “सरला जी... आप... बहुत बदल गई हो।”
सरला ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा और सरकाया, अपनी गोरी, मोटी छाती को और नजदीक लाते हुए कहा, “बदलाव तो अच्छा लगता है न? मेरी ये भारी चुचियाँ... अब बहुत दिनों से छूई नहीं गईं। छूना चाहोगे?”
रमेश हैरान रह गया । सरला ने इतनी बोल्डली कह दिया । लेकिन रमेश खुद वासना में अंधा हो गया था ।
रमेश जी का हाथ काँपता हुआ आगे बढ़ा। सरला ने खुद उसका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। “ आह, अरे रमेश जी कब तक रोज रोज इन्हें देखने यहां आते रहोगे । अब कर लो जो करना है । मै भी तैयार हूं , कब से सिग्नल दे रही हूं, आप भी न ।
रमेश सरला का एक बूब दबा देता है ।
सरला - आह, अब आए न औकात पे, जोर से दबाओ... जैसे कोई रंडी की चूचियाँ दबाता है।
रमेश सरला के मुंह से जब इस तरह की सड़क छाप लैंग्वेज सुनता है तो उसके अंदर का शरीफ आदमी भी भेड़िया बन जाता है, और वो सरला को खींच कर अपनी बाहों में बिठा कर दोनों हाथों से उसके चूचे दबाने लगता है ।
सरला –आह्ह्... हाँ... इसी तरह।
रमेश –भाभी जी, आप तो सच में रण्डी बन गई हो । ये साड़ी उतारो ।
रमेश सरला का पल्लू खींच के हटा देता है ।
सरला सोफे से उठ जाती है ।
सरला – यहां नहीं रमेश जी, अंदर चलो, ये काम बंद कमरों में होते हैं

कुछ ही देर में सरला रमेश जी को हाथ पकड़ के अपने कमरे में ले गई। सिंगारदान के सामने खड़े होकर उसने अपनी साड़ी पूरी उतार दी। नंगी देह आईने में चमक रही थी — भारी स्तन, चौड़ी कमर, मोटी गांड और अब गीली हो चुकी चूत।
सरला ने रमेश जी की पैंट उतारी, उनके मोटे, सख्त लंड को हाथ में लेकर कहा, “कितना मोटा है... आज मेरी भूखी फुद्दी को ठंडक दो। चोदो मुझे जोर से।”
रमेश जी ने सरला को दीवार से सटाकर पीछे से चोदा। सरला की चीखें निकल रही थीं — “हाँ... और तेज... फाड़ दो मेरी चूत... मुझे रंडी की तरह चोदो... आह्ह्ह्... गहरा...!”
रमेश – ब्रिज बाबू तो नहीं आयेंगे
सरला – चिंता मत कीजिए, उन्हें मैने जिस काम से भेजा है वो 4 घंटे से पहले नहीं आयेंगे।
रमेश सरला की चूत को चोद रहा था ।
रमेश – और बेटियां
सरला - आह, वो भी घर से बाहर हैं । देर में आएंगी
इस तरह सरला के रमेश से संबंध स्थापित हो जाते हैं । ब्रिज को भी कुछ दिनों बाद सरला पे शक हो जाता है वो सरला को अपना शरीर रमेश को दिखाते हुए देख लेता है।
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#5
अपडेट – 4 , मीना सत्रह साल की थी, लेकिन उसके शरीर में अब सोलह साल की लड़की नहीं, बल्कि एक जागती हुई औरत रह गई थी। सिंगारदान ने उसके मन को इतना उथल-पुथल कर दिया था कि वह दिन-रात अपनी देह को महसूस करती रहती। रात को अकेले में वह अपनी उँगलियाँ अपनी चूत पर फेरती, लेकिन कभी पूरी तरह अंदर नहीं डाल पाती। वह डरती थी — “अगर सील टूट गई तो?”
फिर राहुल आया।
एक शाम राहुल ने मीना को फोन किया और कहा, “आज मेरे घर आ। माँ-बाप दोनों बाहर गए हैं।” मीना ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने हल्की पीली साड़ी पहनी, जिसमें उसकी उभरी हुई छाती और पतली कमर साफ दिख रही थी। ब्लाउज के हुक उसने जानबूझकर ढीले छोड़ दिए थे।
राहुल के घर पहुँचते ही दोनों सीधे उसके कमरे में गए। दरवाजा बंद होते ही राहुल ने मीना को दीवार से सटा दिया और जोर से किस किया। मीना की साँसें तेज़ हो गईं।
“राहुल... मैं डर रही हूँ,” मीना ने हाँफते हुए कहा।
राहुल ने उसके ब्लाउज के हुक खोलते हुए मुस्कुराकर कहा, “डर मत। आज मैं तुम्हारी सील तोड़ दूँगा। तुम्हारी वो टाइट, कुंवारी चूत आज मेरी हो जाएगी।”
उसने मीना की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया। ब्लाउज पूरी तरह खुल गया। मीना की गोरी, गोल चुचियाँ बाहर आ गईं। राहुल ने एक चुची मुँह में ले ली और जोर से चूसने लगा। मीना की कमर तन गई।
“आह्ह्... राहुल... धीरे... मेरी चुचियाँ बहुत संवेदनशील हो गई हैं...”
राहुल ने मीना को बिस्तर पर लिटाया। उसकी साड़ी को कमर तक ऊपर किया। मीना ने शर्म से टाँगें बंद कर लीं। राहुल ने जबरन टाँगें फैलाईं। उसकी पैंटी पर एक बड़ा गीला धब्बा बन गया था।
“देखो... तुम्हारी चूत कितनी गीली हो रही है,” राहुल ने कहा और पैंटी उतार दी।
मीना की चूत साफ दिख रही थी — हल्के बालों वाली, गुलाबी, और अब पूरी तरह भीगी हुई। राहुल ने उँगली से उसके क्लिटोरिस को छुआ। मीना झटके से काँपी।
“आह्ह्ह... वहाँ मत... बहुत गुदगुदी हो रही है...”
राहुल ने अपनी पैंट उतारी। उसका मोटा, खड़ा लंड बाहर आ गया। मीना ने डरते हुए उसे देखा और बोली, “इतना बड़ा है... मेरी छोटी चूत में कैसे जाएगा?”
राहुल ने मीना की टाँगें कंधों पर रखीं और लंड का सिरा उसकी चूत पर रखा। धीरे-धीरे दबाव डालने लगा।
मीना ने आँखें बंद कर लीं और दाँत भींच लिए।
“आह्ह्ह्ह... दर्द हो रहा है राहुल... धीरे...”
राहुल रुका नहीं। उसने एक जोर का झटका दिया।
“फट्...!”
मीना की सील टूट गई। एक तीखा दर्द उसके पूरे शरीर में फैल गया। वह चीख पड़ी — “आआआह्ह्ह... निकालो... बहुत दर्द हो रहा है... मेरी चूत फट गई...!”
राहुल ने पूरी तरह अंदर डाल दिया। मीना की टाइट चूत अब उसके लंड से पूरी तरह भरी हुई थी। खून की हल्की धार बह रही थी। राहुल ने धीरे-धीरे हिलाना शुरू किया।
दर्द के साथ-साथ अब मीना को एक अजीब सुख भी महसूस होने लगा। उसकी सिसकारियाँ बदल गईं।
“हmmm... राहुल... अब दर्द कम हो रहा है... और अंदर... गहरा चोदो...”
राहुल तेज़ हो गया। वह मीना की चुचियों को दबाते हुए जोर-जोर से चोद रहा था।
मीना अब पूरी तरह खुल चुकी थी। वह अपनी कमर उठाकर राहुल के ठेले का जवाब दे रही थी और सेक्सी आवाज़ में बोल रही थी:
“हाँ... इसी तरह... मेरी कुंवारी चूत फाड़ दो... अब मैं रंडी बन गई हूँ... तुम्हारी रंडी... जोर से चोदो मुझे... आह्ह्ह... मेरी फुद्दी भर दो अपने लंड से...!”
राहुल ने आखिरी जोर लगाया और मीना की चूत के अंदर ही झड़ गया। मीना भी काँपते हुए झड़ गई। उसकी पहली चुदाई पूरी हो चुकी थी।
जब दोनों थककर लेटे, मीना ने राहुल की छाती पर सिर रखा और धीरे से कहा,
“अब मेरी सील टूट गई... अब मैं पहले जैसी नहीं रही। सिंगारदान ने मुझे भी रंडी बना दिया।”
राहुल मुस्कुराया, “अब तुम सचमुच औरत बन गई हो।”
मीना ने आँखें बंद कीं। उसके मन में अब न डर था, न पछतावा — सिर्फ एक नई, गहरी भूख जाग रही थी।रात के नौ बज चुके थे जब मीना घर लौटी।
उसकी चाल में एक नई लचक थी, लेकिन चेहरा थका हुआ और आँखें लाल थीं। साड़ी का पल्लू ठीक से नहीं संभला हुआ था। ब्लाउज के हुक अधूरे बंद थे। कमर पर पसीने का हल्का निशान था। उसके बीच की जगह अभी भी गीली और दर्द भरी थी। राहुल के लंड का असर अभी भी उसके अंदर महसूस हो रहा था।
जैसे ही वह दरवाज़ा खोलकर अंदर आई, सरला सिंगारदान के सामने खड़ी थी। उसने मीना को एक नजर में भाँप लिया।
सरला मुस्कुराई — एक जानकार, अनुभवी मुस्कान।
“आ गईं?” सरला ने धीरे से पूछा।
मीना ने नजरें झुका लीं। उसके गाल लाल हो गए। वह कुछ बोल नहीं पाई।
सरला आगे बढ़ी। उसने मीना की ठोड़ी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर किया।
“शर्मा मत। आँखों में देख।”
मीना ने धीरे-धीरे आँखें उठाईं।
सरला ने उसकी साड़ी के पल्लू को थोड़ा सरकाया और ब्लाउज की तरफ देखा। फिर निचली तरफ नजर गई। मीना की साड़ी के बीच में हल्का गीला निशान था।
सरला की आवाज़ नरम लेकिन गहरी थी,
“सील टूट गई न?”
मीना ने सिर हिलाया। उसकी आवाज़ काँप रही थी,
“हाँ माँ... राहुल ने... आज... पूरी तरह...”
सरला ने मीना को सिंगारदान के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। आईने में दोनों औरतें एक साथ दिख रही थीं — एक अनुभवी, दूसरी अभी-अभी औरत बनी।
सरला ने मीना के कान में धीरे से कहा,
“अब तू भी औरत हो गई है मीना। अब छुपाने की ज़रूरत नहीं। जब भी तेरी चूत में भूख जगे, तू मुझे बता देना। मैं सिखाऊँगी तुझे — कैसे देह को इस्तेमाल करना है, कैसे अपनी कीमत बढ़ानी है।”
मीना ने पीछे मुड़कर अपनी माँ को देखा। उसकी आँखों में शर्म, डर और एक नई उत्तेजना का मिश्रण था।
“माँ... मुझे लगता है... मैं अब पहले जैसी कभी नहीं रहूँगी।”
सरला ने मीना के माथे को चूमते हुए कहा,
“नहीं रहनी है भी।
मीना की सील टूट चुकी थी।
और उसके साथ, घर की आखिरी बची-खुची शर्म भी टूट चुकी थी ।तीन दिन बाद।
मीना अब खुद को रोक नहीं पा रही थी। पहली चुदाई के बाद उसकी चूत में एक लगातार खालीपन और भूख महसूस हो रही थी। दिन भर कॉलेज में बैठे-बैठे भी उसकी जांघें आपस में रगड़ती रहतीं। रात को सोते समय वह बार-बार अपनी उँगलियाँ चूत पर फेरती, लेकिन अब उँगलियाँ काफी नहीं लग रही थीं।
उसने राहुल को मैसेज किया:
“आज शाम को आना चाहती हूँ।”
राहुल ने तुरंत जवाब दिया — “आ जा। घर खाली है।”
शाम सात बजे मीना राहुल के घर पहुँची। इस बार उसने कोई साड़ी नहीं पहनी थी। एक कसी हुई सलवार-कमीज पहनी थी, जिसमें उसकी जवान देह की हर रेखा साफ दिख रही थी। कमीज के ऊपर के तीन बटन पहले से ही खुले हुए थे।
दरवाजा बंद होते ही राहुल ने मीना को जोर से दीवार से सटा दिया और उसके होठों को चूसने लगा।
मीना ने हाँफते हुए कहा, “राहुल... आज मुझे और जोर से चोदना... पहली बार जितना दर्द नहीं चाहिए... बस मुझे अच्छा लगे।”
राहुल मुस्कुराया, “अब तू मेरी रंडी बन चुकी है मीना। आज मैं तुझे पूरा ट्रेन करूँगा।”
उसने मीना की कमीज के बाकी बटन भी खोल दिए। मीना की गोरी, भरी हुई चुचियाँ बाहर आ गईं। राहुल ने दोनों स्तनों को जोर से पकड़कर मसलना शुरू किया।
“आह्ह्... जोर से... मेरी चुचियाँ दबा... काट उन्हें...” मीना सिसक उठी।
राहुल ने मीना को बिस्तर पर पटक दिया। सलवार की नाड़ी खींचकर एक झटके में उतार दी। मीना अब सिर्फ काली पैंटी में थी, जो पहले से ही गीली हो चुकी थी। राहुल ने पैंटी भी उतारी। मीना की चूत अब थोड़ी सूजी हुई थी, लेकिन पूरी तरह तैयार।
राहुल ने घुटनों के बल बैठकर मीना की जांघें चौड़ी कीं और अपनी जीभ से उसकी चूत चाटनी शुरू कर दी।
“आआह्ह्ह... राहुल... क्या कर रहे हो... वहाँ... आह्ह्... जीभ अंदर डालो... चूसो मेरी चूत...”
मीना की कमर उठ-उठकर राहुल के मुँह से सट रही थी। राहुल ने उसका क्लिटोरिस चूसते हुए दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं और तेज़ी से अंदर-बाहर करने लगा।
मीना जोर से चीखी, “हाँ... इसी तरह... मेरी चूत फाड़ दो उँगलियों से... मैं झड़ने वाली हूँ... आह्ह्ह!”
वह पहली बार राहुल की उँगलियों पर झड़ गई। उसके रस राहुल के मुँह और चादर पर फैल गए।
लेकिन राहुल रुका नहीं।
उसने अपनी पैंट उतारी। उसका मोटा, खड़ा लंड पहले से भी ज्यादा सख्त था। उसने मीना को पलटकर घुटनों के बल खड़ा किया — कुत्ते की मुद्रा में।
मीना ने पीछे मुड़कर कहा, “अब डालो... पूरी तरह... आज मुझे जोर से चोदना... जैसे कोई सस्ती रंडी को चोदता है।”
राहुल ने लंड का सिरा मीना की चूत पर रखा और एक ही झटके में आधा लंड अंदर ठेल दिया।
“आआआह्ह्ह...!” मीना की चीख निकल गई। “बहुत मोटा है... धीरे...”
राहुल ने दोनों हाथों से मीना की कमर पकड़ी और पूरी ताकत से पीछे से चोदना शुरू कर दिया। हर ठेला गहरा और तेज़ था। कमरे में ‘पच-पच-पच’ की आवाज़ गूँज रही थी।
मीना अब पूरी तरह खुल चुकी थी। वह अपनी गांड पीछे करके राहुल के ठेले का जवाब दे रही थी और लगातार बोल रही थी:
“हाँ... और तेज... मेरी चूत फाड़ दो... पूरा लंड अंदर डालो... आह्ह्... मुझे रंडी समझकर चोदो राहुल... मेरी फुद्दी तुम्हारी है... जितना मन करे चोदो... हाँ... यही... गहरी चोदाई... मैं फिर झड़ रही हूँ... आआह्ह्ह!”
राहुल ने मीना के बाल पकड़कर उसका सिर पीछे खींचा और और तेज़ चोदने लगा। मीना की चुचियाँ झूल रही थीं। उसकी चूत से सफेद रस निकल-निकलकर राहुल के लंड पर चमक रहा था।
आखिरकार राहुल ने जोर से कराहते हुए मीना की चूत के अंदर ही अपना गर्म वीर्य छोड़ दिया। मीना भी दूसरी बार काँपते हुए झड़ गई।
दोनों थककर बिस्तर पर गिर पड़े। मीना की चूत से वीर्य बाहर निकल रहा था। वह हाँफ रही थी।
राहुल ने उसके कान में कहा, “अब तू पूरी तरह मेरी रंडी है।”
मीना ने मुस्कुराते हुए, आँखें बंद करके जवाब दिया,
“हाँ... अब मैं रंडी बन गई हूँ। और मुझे यह बहुत अच्छा लग रहा है।”
घर लौटते समय मीना की चाल में एक नई मस्ती थी। उसकी चूत अभी भी दर्द कर रही थी, लेकिन उस दर्द में भी एक मीठास थी।
मीना अब अक्सर ही राहुल के साथ अपना कांड करवाने लगी । जब पड़ोसियों के माध्यम से बृजमोहन को पता चला कि मीना आजकल एक लड़के के साथ घूम रही है तो वो शाम को घर आया । सरला और रेखा रसोई में थे, लेकिन मीना अपने कमरे में नहीं थी। बृजमोहन ने पूछा, “मीना कहाँ है?”
सरला ने बिना मुड़े जवाब दिया, “अभी आई होगी।”
बृजमोहन को कुछ शक हुआ। मीना पिछले कुछ दिनों से अक्सर देर से आ रही थी। उसकी चाल में बदलाव, नजरों में एक नई चमक — सब कुछ उसे परेशान कर रहा था।
वो अब समझ रहा था कि ये सब किस कारण से हो रहा है ।
रात करीब दस बजे मीना घर आई।
जैसे ही वह दरवाज़े से अंदर घुसी, बृजमोहन की नजर उस पर पड़ी। मीना की सलवार-कमीज अस्त-व्यस्त थी। सबसे अजीब बात — उसकी चाल में एक असहज लचक थी, जैसे बीच की जगह में अभी भी कुछ दर्द या भारीपन हो।
बृजमोहन का दिल जोर से धड़का।
“मीना... इतनी देर कहाँ थी?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
मीना ने नजरें नीचे कर लीं। कुछ बोल नहीं पाई।
सरला रसोई से बाहर आई और शांत स्वर में बोली, “ब्रजमोहन, छोड़ दो। लड़की थकी हुई है।”
लेकिन बृजमोहन अब रुकने वाला नहीं था। उसका पछतावा, गुस्सा और डर सब एक साथ उबल पड़ा।
“थकी हुई है? देख रही हो तुम इसकी हालत? बाल बिखरे हुए हैं,, चेहरा लाल है... और ये चाल... ये चाल कैसी है मीना?”
मीना चुप रही।
बृजमोहन आगे बढ़ा और मीना की ठोड़ी पकड़कर उसका चेहरा ऊपर किया।
“बोल! कहाँ थी तू? किसके साथ थी?”
मीना की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसकी आवाज़ में अब पहले जैसी शर्म नहीं थी। वह धीरे से बोली,
“राहुल के साथ थी पापा...”

बृजमोहन जैसे बिजली का झटका लगा हो। उसका हाथ काँपने लगा।
“राहुल...? और... क्या किया तुम दोनों ने?”
मीना ने एक पल के लिए सरला की तरफ देखा, फिर बृजमोहन की आँखों में सीधे देखते हुए कहा,
“मैंने उसे... अपनी देह दी। उसने मुझे चोदा।”
घर में सन्नाटा छा गया।
बृजमोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आवाज़ फट पड़ी,
“क्या...? तू... मेरी बेटी... अपनी सील... तूने...?”
मीना की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उसकी आवाज़ अब थोड़ी मजबूत थी।
“हाँ पापा। मेरी सील टूट गई। उसने मुझे दो बार चोदा। पहली बार बहुत दर्द हुआ था... लेकिन दूसरी बार... मुझे बहुत अच्छा लगा। मैंने खुद कहा था — ‘जोर से चोदो... मेरी चूत फाड़ दो... मुझे रंडी बना दो’।”
बृजमोहन का चेहरा सफेद पड़ गया। वह पीछे हटा और दीवार से टेक लगाकर बैठ गया। उसके मुँह से सिर्फ एक शब्द निकला,
“भगवान...”
सरला आगे आई और शांत लेकिन ठंडे स्वर में बोली,
“रो मत ब्रजमोहन। जो होना था, हो गया। सिंगारदान ने जो बीज बोया था, वह अब फल रहा है। मीना अब छोटी बच्ची नहीं रही। वह औरत बन गई है।”
बृजमोहन ने सिर उठाया। उसकी आँखों में आँसू और गुस्सा दोनों थे। मेरी सत्रह साल की मीना किसी लड़के के लंड पर झूल रही है, और तू... तू अपनी बेटी को यह सब करने दे रही है? क्या बन गया है ये घर? कोठा?”
मीना ने धीरे से कहा,
“पापा, अब गाली देने से कुछ नहीं होगा। जो टूटना था, वो टूट चुका है। अब मैं अपनी देह को जान चुकी हूँ। और मुझे यह अच्छा लग रहा है।”
बृजमोहन ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसके कंधे फड़फड़ा रहे थे। वह रो रहा था — नहीं, वह टूट रहा था।
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#6
Updete – 5

बृजमोहन की मझली रेखा, उसके भी लक्षण ठीक नहीं थे । परिवार की मंझली होने के कारण वह न तो बड़ी जिम्मेदारी लेती थी, न छोटी की तरह लाड़ली थी। सिंगारदान घर आते ही रेखा सबसे पहले और सबसे गहरे प्रभाव में आती है। आईने के सामने खड़े होते ही जैसे कोई पुरानी आत्मा उसमें समा गई हो। वह घंटों आईने के सामने खड़ी रहती। अपने बालों को बार-बार संवारती, काजल लगाती, गालों पर तिल बनाती और होंठों पर लिपस्टिक को बार-बार लगाकर चिकना करती।
उसकी चाल बदल गई — कूल्हे हल्के-हल्के मटकने लगे, पाँव में पायल बाँधकर चलतेहुए बजाती।
चोली थोड़ी ढीली रखने लगी, आँखों में एक नशीली चमक आ गई। रेखा अब बालकनी की “मुख्य आकर्षण” बन गई थी। वह जानती थी कि नीचे खड़े युवक किस अदा पर रुकते हैं। वह जानबूझकर लंबी अंगड़ाई लेती, एक कंधा झुकाकर खड़ी होती और मुस्कुराते हुए आँखों से इशारा करती।
छोटी को वह “दीदी” कहकर चिढ़ाती और लोशन, पाउडर या गजरा छुपाकर रखती। लेकिन बड़ी के सामने थोड़ी संकोची भी रहती।
शाम को पानदान के पास बैठकर पान की गिलौरी बनाती और हल्के-हल्के ठिठोलियाँ मारती। उसकी हँसी में अब एक अलग ही मिठास और उकसावा था। बाप की उपस्थिति में भी अब उसे शर्म नहीं आती थी। 
कुछ महीने बाद रेखा का एक युवक से चक्कर चलने लगा। लड़के का नाम राहुल था ।
वह पान की दुकान के पास रहने वाला, २४-२५ साल का, सुंदर और हुस्नपरस्त युवक था। शुरू में वह सिर्फ बालकनी से इशारे करता था, लेकिन रेखा ने धीरे-धीरे उसे और करीब बुला लिया। रेखा अब रात को भी बालकनी में अकेली खड़ी रहने लगी थी। राहुल नीचे खड़ा इंतजार करता। एक रात रेखा ने इशारा किया और बृजमोहन को कुछ बहाना देकर घर से बाहर निकल गई।
पहली मुलाकात गली के कोने में हुई।
दूसरी मुलाकात में राहुल उसे पास की एक पुरानी कोठरी में ले गया।
रेखा ने कोई विरोध नहीं किया। सिंगारदान ने उसके अंदर जो आग जलाई थी, वह अब बेकाबू हो चुकी थी।

राहुल (हाँफते हुए): “रेखा… कितना दिन से तरस रहा था तुम्हारे लिए।”
रेखा (आँखें झुकाकर, लेकिन शरीर से सटते हुए): “तो अब तरसना बंद करो… जो करना है करो।”
राहुल ने झुककर उसके होंठों को चूस लिया। रेखा ने भी पूरी ताकत से जवाब दिया। उनकी जीभें एक-दूसरे में लिपट गईं। राहुल का एक हाथ रेखा की कमर पर था, दूसरे हाथ से उसने उसके स्तनों को दबाया।
रेखा (कराहते हुए): “उफ्फ… जोर से दबाओ न… डरते क्यों हो?”
राहुल ने ब्लाउज के बाकी हुक भी खोल दिए। रेखा का काला ब्रा सामने था। उसने ब्रा ऊपर किया और दोनों स्तनों को बाहर निकाल लिया। वे गोल, भरे हुए और सख्त थे। राहुल ने एक स्तन मुंह में ले लिया और जोर-जोर से चूसने लगा।
रेखा (सिर पीछे करके, आह भरते हुए): “आह… हाँ… काटो… चूसो… मैं आज बहुत गीली हो रही हूँ…”
राहुल दूसरे हाथ से उसकी साड़ी का पल्लू खींचकर नीचे गिरा दिया। साड़ी कमर तक खुल गई। उसने रेखा की पैंटी पर हाथ रखा — पूरी तरह भीगी हुई थी।
राहुल (उँगलियाँ घुमाते हुए): “वाह रेखा… इतनी गीली? लगता है तुम भी मर रही थीं मेरे लंड के लिए।”
रेखा (साँसें तेज़ करते हुए): “हाँ… मारो मुझे… अपनी रंडी बना लो आज… चोद दो जोर से…”
राहुल ने पैंटी उतार दी। रेखा की चिकनी, गीली योनि सामने थी। उसने घुटनों पर बैठकर जीभ से चाटना शुरू किया। रेखा की टांगें काँपने लगीं।
रेखा (मोचे में हाथ डालकर): “आह… राहुल… वहाँ… हाँ… चूसो… उफ्फ मैं मर जाऊँगी…”
कुछ देर चाटने के बाद राहुल उठा। उसने अपनी पैंट उतारी। उसका लंड पूरा खड़ा, मोटा और नसों वाला था। रेखा ने आगे बढ़कर उसे हाथ में लिया और धीरे-धीरे सहलाने लगी।
रेखा (नशीली आँखों से): “कितना मोटा है… आज इसे अंदर लेना है मुझे…”
राहुल ने रेखा को चारपाई पर लिटा दिया, उसके पैर फैलाए और लंड के सिरे को योनि पर रगड़ने लगा।
रेखा (बेचैनी से): “मत तड़पाओ… डाल दो… पूरी तरह अंदर कर दो…”
राहुल ने एक झटके में आधा लंड अंदर कर दिया। रेखा चीख उठी।
रेखा: “आआह… धीरे… बड़ा है न… आह…”
राहुल ने धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर-पूरा बाहर करना शुरू किया। धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ी। अब कमरे में चुटकी बजाने और शरीर की टकराहट की आवाज़ गूंज रही थी।
राहुल (जोर-जोर से धक्के देते हुए): “ले रेखा… ले मेरी जान… कितनी टाइट है तू… आज मैं तुझे भर दूँगा…”
रेखा (नाखून राहुल की पीठ में गड़ाते हुए, चीखते हुए): “हाँ… चोदो… और जोर से… फाड़ दो मुझे… मैं तुम्हारी रंडी हूँ… आह… राहुल… तेज… तेज…”
कुछ ही मिनटों में रेखा का शरीर तन गया। वह जोर से काँपी और पहली बार झड़ गई। राहुल ने भी कुछ और जोरदार धक्कों के बाद रेखा के अंदर ही वीर्य छोड़ दिया।
दोनों पसीने से तर, एक-दूसरे से चिपके पड़े रहे। 
डसके बाद उनका चक्कर नियमित हो गया।
कभी कोठरी में, कभी रात के अंधेरे में छत पर, कभी राहल के
कमरे में। रेखा अब पूरी तरह कामातुर हो चुकी थी ।
राहुल के साथ बार-बार संबंध बनाने के बाद रेखा गर्भवती हो गई। शुरू के दो महीने तक उसने किसी को नहीं बताया, लेकिन उल्टियाँ और थकान बढ़ने लगी।
एक शाम जब रेखा बालकनी में खड़ी थी, तभी बृजमोहन को शक हो गया। उसने रेखा को कमरे में बुलाया।
बृजमोहन ने रेखा का कान पकड़ लिया और जोर से खींचा।
बृजमोहन (गुस्से में चिल्लाते हुए): “हरामजादी! यह क्या हालत कर रखी है अपनी? पेट में क्या है? बोल, यह किसका बच्चा है? राहुल का? या किसी और का?”
रेखा दर्द से चीखी, लेकिन कुछ नहीं बोली। आँखों में आँसू आ गए।
बृजमोहन (और ज़ोर से कान पकड़ते हुए): “मैंने सोचा था सिंगारदान ने घर को बर्बाद कर दिया, लेकिन तू तो पूरी रंडी बन गई! बोल, किस कुत्ते ने तुझे पेट भर दिया?”
इतने में सरला (बृजमोहन की पत्नी) दौड़कर आ गई। पहले तो वह भी हैरान थी, लेकिन अचानक उसका व्यवहार बदल गया। उसने बृजमोहन का हाथ पकड़कर रेखा के कान से अलग किया और शांत स्वर में बोली:
सरला: “बस कीजिए जी। इतना गुस्सा मत कीजिए। लड़की है, गलती हो गई। अब चिल्लाने से क्या होगा? पड़ोस में पता चल जाएगा।”
बृजमोहन हैरान होकर सरला को देखने लगा। सरला ने रेखा की तरफ़ देखा और नाटक करते हुए तेज़ आवाज़ में डाँटा:
सरला: “शर्म नहीं आती तुझे? घर की इज्जत का कुछ ख्याल नहीं? हमने तुझे इतना लाड़-प्यार दिया, और तू यह कर बैठी?”
(सरला अंदर से खुश थी, क्योंकि सिंगारदान का प्रभाव अब उस पर भी पूरा था। वह जानती थी कि बच्चा रखने से घर की “कमाई” प्रभावित होगी।)
सरला (बृजमोहन की तरफ़ मुड़कर, मीठे लेकिन दृढ़ स्वर में): “जी, इसे डाँटने से कुछ नहीं होगा। कल ही अस्पताल ले चलते हैं। बच्चा गिरवा देते हैं। अभी छोटा है, आसानी से हो जाएगा। बाद में मुसीबत बढ़ जाएगी।”
बृजमोहन कुछ देर सोचता रहा, फिर मान गया।
अगले दिन — अस्पताल
सुबह जल्दी ही बृजमोहन, सरला और रेखा अस्पताल गए। रेखा चुप थी। उसका चेहरा पीला पड़ गया था, आँखें सूजी हुई थीं।
डॉक्टर ने चेक किया और कहा कि ८-९ हफ्ते का गर्भ है, गर्भपात आसानी से हो सकता है।
रेखा को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। सरला ने बाहर बैठकर बृजमोहन को समझाया, “चिंता मत कीजिए। सब ठीक हो जाएगा। घर में फिर से पहले जैसा माहौल हो जाएगा।”
दो घंटे बाद रेखा को बाहर लाया गया। उसका गर्भपात कर दिया गया था। रेखा बेहोश-सी पड़ी थी, चेहरा सफेद, आँखों के नीचे काले घेरे।
घर लौटकर रेखा बिस्तर पर लेट गई। सरला ने उसे दवा दी और बोली:
सरला (धीरे से, लेकिन मुस्कुराते हुए): “अब आराम कर , )
रेखा – मां मुझे माफ कर दो, मैंने बहुत गलत कर दिया ।
सरला – गलत तो तब होता, अगर लोगों को पता चल जाता । और बदनामी होती ।
रेखा – फिर भी जो हुआ, वह सब ठीक नहीं हुआ। पिताजी कितने परेशान हैं इस बात से 
सरला – तू उनकी चिंता मत कर कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाएगा । जवानी में ऐसी गलतियां अक्सर हो जाया करती हैं । तू भी तो अब जवान हो गई है ।
आखिर कब तक संभालती इस निगोड़ी जवानी को ।
रेखा सरला की बातें और इस तरह ’ निगोड़ी जवानी ’ जैसे शब्दों को अपनी मां के सुनकर हैरान हो जाती है, और उसे एक टक होकर देखने लगती है ।
उसे क्या पता था की आईने का असर सिर्फ उसे पर ही नहीं बल्कि उसकी मां पर भी हुआ था । वह भी उसके गिरफ्त में थी ।
सरला – ऐसे क्या देख रही है, सही तो कह रही हूं । देख मै भी तेरी उम्र से गुजरी हूं । मुझे पता है, जवानी में दिल में कैसे-कैसे अरमान जाते हैं । शरीर भी क्या-क्या चीजों की मांग करने लगता है । ( सरला शरारती नजरों से रेखा को देखते हुए कहती है )
लेकिन अब तू उस राहुल से मत मिलना । नहीं तो दोबारा पेट से हुई , तो मैं भी तेरा साथ नहीं दूंगी । मैं तेरे पापा से तेरी शादी की बात करती हूं,  जल्दी कोई लड़का देखकर तेरे हाथ पीले कर देंगे । तब तक अपने को काबू में रख ।
उसके बाद सरला कमरे से जाने लगती है तभी वह दरवाजे पर रख कर रेखा की ओर मुड़ती है और कहती है " और हां ज्यादा बालकनी में सज धज के खड़ी मत रहाकर, और लड़कों को इशारे मत करना ”
गर्भपात के बाद रेखा कुछ दिन तक घर में शांत रही। वह ज़्यादातर अपने कमरे में रहती, कम बोलती, खाना भी कम खाती। कभी-कभी रात को अकेले में रो लेती। शरीर कमजोर था, लेकिन सिंगारदान का असर अभी भी उसके खून में था।


गर्भपात के १०-१२ दिन बाद रेखा की देह में फिर से आग सुलगने लगी।
रात में अकेले लेटे-लेटे उसकी चूत कुलबुलाने लगती। स्तन भारी लगते, निप्पल सख्त हो जाते। वह उँगलियों से खुद को सहलाती, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती। आखिरकार उसने राहुल को फोन किया।
रेखा (मोहभरी आवाज़ में): “राहुल… मुझे बहुत याद आ रही है। आज रात मिलोगे?”
राहुल (ठंडे स्वर में): “रेखा, अब नहीं। वो सब खत्म हो गया। मैं नया काम शुरू कर रहा हूँ। तुम भी अपना ध्यान रखो।”
राहुल ने साफ़ मना कर दिया। रेखा का दिल टूट गया, लेकिन उसकी देह और भी बेचैन हो गई।
अब उसकी आँखें आस-पास के लड़कों को तलाशने लगीं।
गर्भपात के बाद रेखा का शरीर काफी बदल गया था। सिंगारदान का प्रभाव, गर्भावस्था के हार्मोन और फिर अचानक गर्भपात — इन सबने मिलकर उसे एक नया, और ज़्यादा कामुक रूप दे दिया था।
रेखा का शारीरिक बदलाव (विस्तार):
स्तन: पहले से ज़्यादा भरे हुए, भारी और नरम हो गए थे। निप्पल गहरे गुलाबी-भूरे रंग के और बहुत संवेदनशील थे — हल्का-सा स्पर्श या कपड़े का रगड़ना भी उन्हें सख्त कर देता।
कमर और पेट: गर्भावस्था के बाद पेट थोड़ा ढीला हो गया था, लेकिन अब वह थोड़ी मोटी और आकर्षक गोलाई के साथ नजर आती थी। कमर में एक नई नरमी आ गई थी।
चूतड़ और जाँघें: अब और मोटी, गोल और दृढ़ हो गई थीं। चलते समय वे हल्के-हल्के लहराती थीं, जो लड़कों को पागल कर देती थीं।
चेहरे और त्वचा: चेहरा थोड़ा गोल हो गया था। त्वचा चमकदार और गुलाबी हो गई थी। होंठ स्वाभाविक रूप से थोड़े फूले हुए लगते थे।
कुल मिलाकर: वह अब पहले से ज़्यादा “मैच्योर और सेक्सी” दिखने लगी थी — १९-२० साल की उम्र में भी वह २४-२५ की शादीशुदा औरत जैसी लगती थी।
लड़कों की नज़र (मोहल्ले और कॉलेज में)
रेखा अब मोहल्ले और कॉलेज दोनों जगह “मुख्य आकर्षण” बन चुकी थी। लड़कों की नज़रें उसके शरीर के हर हिस्से को “खा” रही थीं:
स्तनों पर: जब रेखा चलती तो उसके भारी स्तन हल्के-हल्के उछलते। लड़के दूर से ही उन्हें घूरते और आपस में फुसफुसाते — “यार, देख कितने बड़े और ढीले हो गए हैं…”
चूतड़ पर: पीछे से देखने वाले लड़के उसकी लहराती गांड को देखकर ताली बजाते। कई बार तो सीटी मार देते।
जाँघों और कमर पर: साड़ी या सलवार में जब कमर का गोला दिखता या जाँघों की मोटाई नजर आती, तो लड़के उत्तेजित हो जाते।
चलने के अंदाज़ पर: गर्भपात के बाद रेखा की चाल और भी मटकती हुई हो गई थी — जैसे वह जानबूझकर लड़कों को लुभा रही हो।
लड़कों के बीच चर्चा के कुछ उदाहरण:
“भाई, रेखा तो अब और माल हो गई है। प्रेग्नेंट होने के बाद और गर्म लग रही है।”
“उसकी चूत अब ढीली हो गई होगी… मजा आएगा चोदने में।”
“देख, कितने आराम से स्तन हिल रहे हैं… ब्रा पहनती भी है या नहीं?”
“राहुल ने तो फेंक दिया, अब हमारा टाइम है।”
रेखा जब बालकनी में खड़ी होती, तो १०-१२ लड़के इधर-उधर खड़े होकर उसे घूरते। कोई फोन पर वीडियो बना लेता, कोई सीटी मारता। कुछ तो उसके घर के सामने घंटों घूमते रहते।
रेखा को यह सब अपमान भी लगता था और गर्व भी। वह जानती थी कि अब पूरा मोहल्ला उसकी देह को चाहता है।

कॉलेज और मोहल्ले में खबर आग की तरह फैल गई।
“रेखा राहुल के साथ चक्कर चला रही थी… प्रेग्नेंट भी हो गई थी… गर्भपात कराया…”
कुछ लड़के तो इसे सुनकर और उत्तेजित हो गए। अब रेखा जब भी बालकनी में खड़ी होती या कॉलेज जाती, तो लड़के उसकी तरफ़ घूरते, इशारे करते और लाइन मारते।
चिढ़ाने और छेड़खानी आम हो गई:
मोहल्ले के लड़के रेखा के पीछे “ओये रेखा… राहुल ने छोड़ दिया क्या?” कहकर हँसते।
कोई उसके पीछे आकर “अब हमारा नंबर कब आएगा?” whispering करते।
कॉलेज में कुछ लड़के जानबूझकर उसकी बेंच के पास बैठकर उसकी जाँघों को छूने की कोशिश करते।
एक-दो ने तो सीधे फ्रेंडशिप का प्रस्ताव रख दिया — “एक बार मिल ले, तुझे बहुत मज़ा देंगे।”
रेखा पहले तो चिढ़ती, लेकिन धीरे-धीरे उसकी देह इन इशारों पर प्रतिक्रिया देने लगी। उसकी चूत गीली होने लगती जब कोई लड़का उसकी छातियों को घूरता या पीछे से रगड़ने की कोशिश करता।
एक दिन शाम को मोहल्ले का एक लड़का (नाम: विक्रम) रेखा के घर के पास आया और बोला:
विक्रम: “रेखा, राहुल ने तो तुझे यूज़ करके फेंक दिया। अब हम हैं ना… एक बार मौका दे। मैं तुझे राज़ रखूँगा।”
रेखा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराकर dekhungi kah ke चली गई। 
रेखा के दीवाने दिनों दिन बढ़ते जा रहे थे । सरला तो उसे कुछ ज्यादा कहती नहीं थी , लेकिन बृजमोहन उसे टोकटा रहता था । 
शाम का समय था। बृजमोहन पान की दुकान से लौट रहा था। गली के मोड़ पर दो युवक (विक्रम और उसके दोस्त संजय) सिगरेट पीते हुए खड़े थे। वे आपस में जोर-जोर से बात कर रहे थे। बृजमोहन पास से गुजर रहा था, लेकिन वे उसे देखकर भी नहीं रुके।
विक्रम (हँसते हुए): “यार, रेखा का बदन तो अब पूरा गदराया हुआ है। प्रेग्नेंट होने के बाद स्तन देखे हैं? कितने भारी और लटकते हुए हो गए हैं। चलते समय ऐसे हिलते हैं कि लंड खड़ा हो जाए।”
संजय (उत्तेजित होकर): “हाँ भाई, गांड भी कितनी मोटी हो गई है। साड़ी में फंसकर अलग-अलग नजर आती है। कमर भी भर गई है। लगता है जैसे अभी-अभी किसी ने खूब चोदा हो। राहुल ने तो मजा ले लिया, अब बारी हमारी है।”
विक्रम: “एक बार मौका मिल जाए तो रात भर चोदूँ। निप्पल तो अब दूध देने वाले हो गए हैं। कल बालकनी में खड़ी थी, ब्लाउज से साफ़ दिख रहे थे। मैं तो सोच रहा हूँ, अगली बार सीधे प्रपोज कर दूँ।”
संजय (हँसते हुए): “प्रपोज क्या करना, सीधे पकड़ के चूस लेना। वो मानेगी। अब तो पूरी तैयार है।”
दोनों जोर से हँसे।
बृजमोहन कुछ दूर पर खड़ा सब सुन रहा था। उसके हाथ मुट्ठी में भिंच गए। चेहरा लाल हो गया। गुस्सा, शर्म और एक अजीब सी बेचैनी एक साथ उभर आई। वह जानता था कि रेखा अब मोहल्ले की “साझी संपत्ति” बन चुकी है।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
न तो उन लड़कों को डाँटा, न चिल्लाया।
चुपचाप सिर झुकाए घर की तरफ़ बढ़ गया।

रात में अकेले में लड़के रेखा के बारे में सोचकर हस्तमैथुन करते। उनकी कल्पनाओं में रेखा नंगी होती, चारों खाने चित्त पड़ी होती, या उनके लंड को मुंह में ले रही होती। वे आपस में बात करते:
“यार, रेखा की चूत अब ढीली हो गई होगी… राहुल ने तो खूब चोदा होगा।”
“स्तन देखे हैं? प्रेग्नेंट होने के बाद और भारी हो गए हैं। दूध पिलाने वाली लगती है।”
“एक बार मिल जाए तो रात भर चोदूँ… गर्भपात करा चुकी है, तो अब बिना डर के अंदर भर दूँगा।”
एक रात के करीब ९:३० बजे थे। बृजमोहन दुकान से कुछ सामान लेकर घर लौट रहा था। गली का रास्ता अंधेरा और सुनसान था। जैसे ही वह मोड़ पर मुड़ा, उसकी नज़र एक दृश्य पर पड़ी।
रेखा गली के बीच में एक लड़के (विक्रम) के साथ खड़ी थी। विक्रम के साथ उसके दो और दोस्त भी थे। रेखा की पीठ दीवार से सटी हुई थी। विक्रम उसके बहुत करीब खड़ा था।
बृजमोहन ने देखा कि विक्रम का एक हाथ रेखा की कमर पर था, दूसरा हाथ उसकी छाती के पास। रेखा हल्के से हँस रही थी। एक लड़का रेखा की जाँघ पर हाथ फेर रहा था, जबकि तीसरा उसके बालों को छू रहा था।
विक्रम (रेखा के कान में): “अब तो रोज मिलोगी न? तेरे स्तन तो छूने को तरस रहे हैं…”
रेखा ने हल्के से उसे धक्का दिया, लेकिन मुस्कुरा भी रही थी।
बृजमोहन का खून खौल उठा। उसका हाथ मुट्ठी में भींच गया। वह आगे बढ़ा, लेकिन अचानक रुक गया। कुछ कदम दूर खड़ा होकर वह सब देखता रहा।
एक लड़का: “रेखा, एक किस तो दे दे… राहुल ने तो खूब लिया होगा।”
रेखा ने शरमाते हुए मुंह फेर लिया, लेकिन विरोध नहीं किया।
बृजमोहन ने सब कुछ देख लिया — रेखा का गदराया बदन, लड़कों की लालची नज़रें, हाथों की छेड़खानी। उसका गुस्सा चरम पर था, लेकिन वह चुप रहा।
वह चुपचाप पीछे हट गया और दूसरे रास्ते से घर चला गया।
घर पहुँचकर वह सीधा सरला के पास गया। उसका चेहरा लाल था, लेकिन आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी।
बृजमोहन: “सरला… रेखा अब पूरी तरह बेकाबू हो गई है। अभी मैंने देखा — गली में तीन लड़कों के बीच खड़ी थी। एक तो उसके स्तन छू रहा था, दूसरा जाँघ पर हाथ फेर रहा था… और वह हँस रही थी।”
सरला चौंक गई, लेकिन फिर शांत हो गई।
सरला: “कल मैं उसे अच्छे से समझा लूँगी।”
बृजमोहन (थके हुए स्वर में): “समझाने से कुछ नहीं होगा सरला। अब तो पूरा मोहल्ला जानता है। हम क्या करेंगे?”
वह चुप हो गया। उस रात बृजमोहन सो नहीं सका। बार-बार वही दृश्य आँखों के सामने घूम रहा था — उसकी बेटी तीन लड़कों के बीच, छेड़ी जा रही थी, और वह कुछ नहीं कर सका।
रेखा देर रात घर आई। उसके बाल बिखरे हुए थे, होंठ थोड़े सूजे हुए थे। बृजमोहन ये देख के भड़क गया ।
रात के करीब १० बजे थे। बजमोहन कमरे में चहलकदमी कर रहा था। उसका चेहरा लाल था। सरला बिस्तर पर बैठी पान चबा रहंथी। रेखा अपने कमरे में थी. जबकि बडी बेटी मीना और छोटी
पिंकी भी घर पर ही थीं।
बजमोहन ने अचानक तेज़ आवाज़ मं कहाः
बृजमोहनः "सरला! देख लिया तूमने अपनी बेटी का हाल? रेखा दिन-रात बालकनी में खडी रहती है। लडके इशारे करते हैं, सीटी मारते हैं, और यह मुस्कुरा-मुस्कुरा के जवाब देती है! पूरे मोहल्ले में
हमारी इज्जत उड गई है।"
सरला ने पान की गिलौरी मुँह में रखते हुए शांत स्वर में पूछा "तो क्या करँ?" 
बजमोहन (गुस्से में): "समझाओ उसे! कहो कि अब बहत हो गया। पहले उस आवारा राहुल के चक्कर में पेट ठहरा लिया, गर्भपात कराया। अब फिर वही सिलसिला शुरू हो गया है? अगर यह नहीं मानी तो घर से निकाल दूँगा!"
सरला ने धीरे से सिर हिलाया और बोली: "ठीक है, मैं कल उसे  बोलती हूं । लेकिन आप भी ज़्यादा चिल्लाइए मत.. पडोस में सुनाई दे जाएगा।" 
पिंकी और मीना दरवाजे के पीछे से छुपकर देख रही थीं । बृजमोहन की नज़र उन पर पड़ी ।
बृजमोहन का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। उसने आवाज ऊँची कीः इधर आओ तुम दोनों भी । 
मीना (बडी) और पिंकी (छोटी) डरते-डरते कमरे में आई ।
बृजमोहन (उनकी तरफ़ उँगली दिखाते हुए): "तुम दोनों भी अपनी बहन जैसी बन रही हो क्या? बालकनी में खडी होकर लडकों से इशारे करती हो ? कोठे वाली बनाना है क्या तुम सब को । , पिंकी तू तो अब छोटी भी नहीं रही, एक बार गलती करके भी सुधरी नहीं , तूभी फिर उसी रास्ते पर जा रही है? और मीना, तू तो बड़ी है, तुझे शर्म नहीं आती? तीनों मिलकर घर की इज्जत मिट्टी में मिला रही हो।"
मीना (सिर झूकाकर): "पापा, हम कुछ नहीं करते..."
पिंकी (डर से): "मैं तो बस...
बजमोहन (चिल्लाकर): " तुम क्या मुझे बेवकूफ समझते हो, ये सफेद बाल ऐसे ही नहीं हुए मेरे , मोहल्ले वाले क्या-क्या बातें कर रहे हैं पता है तुमको ”
मीना – लेकिन पापा ...
बृजमोहन – "बस. अब एक शब्द नहीं कल से तीनो का बालकनी में जाना बंद! और अगर किसी लडके का इशारा देखा तो घर में पीटूँगा तुम्हे,  समझ गई?"
सरला बीच में पडीः "बस कीजिए जी। अब जवान लड़कियों पे हाथ उठाओगे । अब क्या बालकनी में भी न जाएं । लड़कों के डर से । 
बृजमोहन – तो बालकनी में जाकर लड़कों को इशारे करेंगी ये ।
सरला – देखो जी , अब घर में तीन तीन जवान लड़कियां हैं, लड़के देखेंगे नहीं क्या , और ये लड़कों को डांटने का इशारा करती हैं, तुम बेकार में ....
बृजमोहन – कमाल है सरला, तुम भी इन्हें सही ठहरा रही हो । 
बृजमोहन – मैंने  कह दिया तो कह दिया  । 
सरला – ठीक है, ठीक है, लडकियाँ समझ गई हैं। अब चुप हो जाइए।"
बृजमोहन – अगर इन्होंने शादी होने तक अपनी जवानी को नहीं सम्हाला तो ठीक नहीं होगा । लड़कियां बदनाम हो जाए तो रिश्ता होना मुश्किल होता है । पता है न तुम्हें ।
सरला – ठीक है ठीक है अब बस करो
बजमोहन ने आखिरी बार गुस्से में कहाः "रेखा को खास तौर पर समझा देना सरला। वह सबसे ज्यादा बिगड गई है। अंधेरे में लड़कों के साथ खड़ी रहती है गलियों में । आते जाते लोग क्या सोचते होंगे ।अगर वह नहीं मानी तो में खुद उसका रास्ता सुधारूँगा।"

सरला ने सिर हिलाया, लेकिन उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी। वह जानती थी कि ब्रजमोहन की ये डाँट सिर्फ़ दिखावा है। रेखा अपने कमरे में सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर न तो डर था, न शर्म। बस एक अजीब सी बेचैनी थी ।
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#7
Update – 6

बृजमोहन की डांट का असर कुछ दिन तक रहा लेकिन फिर वही सब चालू हो गया । लड़कियां अब बृजमोहन के सामने नहीं लेकिन उसके घर में मौजूद न होने पर बालकनी पर जाने लगी ।
धीरे-धीरे आने जाने वाले राहगीर उन्हें भी कोठे वाली समझने लगे । असली कोठा उनके घर से ज्यादा दूर नहीं था । इन कोठा की वश्याएं  बालकनी और छत पर सज धज कर रहती और आनेजने वाले राहगीरों को इशारे से अपने पास बुलाती । तीनो लड़कियों के दिमाग पर शैतानी आइने का असर हो गया था । उनके अंदर भी वैसी ही इच्छाएं जागने लगी जैसे तवायफों की । उनकी चाल ढाल भी वैसी ही होने लग गई थी । अब तो सरला भी बालकनी पर जाने लगी थी । 

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पिंकी भी शैतानी आइने के असर से अछूती नहीं थी , उसकी जवानी भी अंगड़ाई लेने लगी थी । उम्र में वो 15 साल की हो चुकी थी लेकिन फेल होने की वजह से अभी भी आठवीं कक्षा में पढ़ती थी । वो कॉलेज में सफेद शर्ट और नीली प्लेटेड स्कर्ट पहनती थी।

पिंकी पहले शर्मीली, दुबली-पतली सी लड़की थी। लेकिन अब सिंगारदान के सामने खड़े होकर खुद को देखते ही उसका बदन अजीब तरह से गर्म हो जाता। शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई। सुबह उठते ही वह शीशे के सामने खड़ी होकर अपनी छातियों को दोनों हाथों से हल्के से दबाती, जैसे उन्हें नाप रही हो।

धीरे-धीरे **जवानी की दस्तक** तेज होने लगी।  
उसके निम्बू जैसे स्तन पहले छोटे और कड़े थे, अब तेजी से फूलने लगे। कॉलेज की शर्ट के बटन अब टाइट पड़ने लगे। पहले जहां दूसरा बटन आसानी से बंद हो जाता था, अब वहां कपड़ा खिंचने लगा। स्तन भारी और गोल हो गए, चलते वक्त हल्के से उछलते, शर्ट पर साफ नजर आते। पिंकी खुद उन्हें देखकर मुस्कुराती और शीशे के सामने खड़े होकर ऊपर-नीचे हिलाती, “अब तो काफी बड़े हो गए हैं…” 

बृजमोहन ने भी ये नोटिस किया तो उसे टेंशन होने लगी । लड़कों की घूरती नजरों को देखकर वो समझ गया था कि अब वो भी ज्यादा दिनों तक कोरी नहीं बच पाएगी । वो पिंकी पर नजर रखने लगा और जब वो कहीं जाती तो उससे पूछता की कहां जा रही है । 
उसने सरल को देखा कई बार पिंकी के साथ कुछ धीरे धीरे बातें करते हुए । जैसी सहेलियां आपस में करती हैं । सरला और पिंकी के चेहरे पर एक रहस्यमई मुस्कान रहती थी । बृजमोहन को कुछ भी समझमे नहीं आता था । कुछ दिन बद  पिंकी के चलने का ढंग भी बदल गया था । उसके शरीर में मांस तेजी से चढ़ने लगा था । उसका कूल्हा भी चौड़ा होने लगा। स्कर्ट पहले घुटनों तक आती थी, अब वही स्कर्ट जांघों के बीच में चढ़ने लगी। जब वह चलती तो कूल्हे लहराते, और वह जानबूझकर ज्यादा जोर से हिलाकर चलने लगी।

- पहले वह जल्दी सो जाती थी। अब रात को सिंगारदान के सामने घंटों खड़ी रहती। लाइट बंद करके सिर्फ मोबाइल की रोशनी में नंगी हो जाती, अपने नए बदन को देखती — भारी स्तनों को सहलाती, अपनी काली निप्पल को उंगली से घुमाती, फिर हाथ नीचे सरकाकर अपनी गीली जगह को छूती। साँसें भारी हो जातीं, छोटी-छोटी आहें निकलतीं।

- कॉलेज जाते वक्त अब वह शर्ट के ऊपरी बटन खुले रखने लगी। ब्रा का किनारा झांकता, और जब कोई लड़का देखता तो वह जानबूझकर झुककर अपना बैग उठाती ताकि गहरी लाइन साफ दिखे।

- घर में वह अब अकेले कमरे में नहीं रहती। सिंगारदान के सामने खड़े होकर अपनी स्कर्ट ऊपर उठाकर जांघों और गदराए हुए नितंबों को देखती। कभी-कभी उंगली अंदर डालकर खुद को सहलाती, फिर उंगली चूसती हुई शीशे में अपने को निहारती ।

एक दिन वह आंगन मैं झूले पर बैठी हई थी । उसने अभी वही कॉलेज वाली स्कर्ट पहनी हुई थी । और एक जांघ को दूसरी जांघ पर चढ़ा रखा था ।
बृजमोहन वहां आता है तो उसकी नजर उसकी गुदाज नग्न जांघों पर पड़ती है । वह जड़ होके पिंकी को देखने लगता है । पिंकी जो अभी मैगजीन पढ़ रही थी । वह बृजमोहन को एक नजर देखती है । और फिर बिना किसी शर्म के मैगजीन पढ़ने लगती है । बृजमोहन यह देखकर हैरान था
 की पिंकी को कोई शर्म नहीं थी कि उसका बाप उसके सामने खड़ा है और वह इस तरह से बैठी है । वह सामने बड़ी कुर्सी पर बैठ जाता है और अखबार पढ़ने लगता है । अखबार पढ़ते पढ़ते उसकी नजर बार-बार पता नहीं क्यों पिंकी की थाइज़ पर जा रही थी । अचानक पिंकी बृजमोहन की तरफ देखती है तो पाती है की बृजमोहन चोर नजर से उसे देख रहा है । उसे समझ में नहीं आता । फिर वह नीचे झुकती है और बैठे-बैठे जूते की एस लेस बांधने लगती है । तभी वह ब्रिज मोहन को देखती है तो पाती है की उसकी नज़रें कहां पर हैं। अब वह समझ चुकी थी लेकिन शर्माने के बजाय वो पता नहीं क्यों मन ही मन खुश होने लगी । उसने अपनी दोनों चुटियाएं खोल दी । बाप उसे देखने लगा , तो वो भी बृजमोहन को देखते-देखते अपने बाल संवारने लगी । बृजमोहन ने जब पिंकी को इस तरह खुद क
 घूरते हुए देखा तो वह अख़बार पढने लगा । उसके बाद पिंकी के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई । वह खड़ी उठी और जाने लगी । 
उसके जाने के बाद रेखा चाय लेकर बृजमोहन के पास आई । उसने देखा कि बृजमोहन पिंकी को जाते हुए देख रहा है । 
रेखा – पाप चाय 
बृजमोहन – हां रख दे 
रेखा ने अभी एक रेड कलर की कुर्ती पहनी थी  । जिसकी  बाहें बेहद छोटी और गला काफी गहरा था । रेखा ने यह सूट कुछ ही दिन पहले सिलवाया था । बृजमोहन ने इसमें उसे दो-तीन बार ही देखा था । लेकिन जब भी देखा था, उस समय रेखा ने चुनरी ओढ़ी होती । 
लेकिन अभी रेखा बिना चुनरी के थी । जैसे ही रखा टेबल पर चाय का कप रखने के लिए झुकी उसके स्तन छलक कर आधे बाहर आ गए । बृजमोहन ने अनजाने में अखबार हटाया तो उसकी नज़रें उसकी मछली बेटी की उभरी हुई छाती की घाटियों पर पड़ गई जिसे उसने अपने यार से मिजवा मिजवा कर बड़ा कर दिया था ।
आज उसे पता चला की उसकी बेटी रेखा ने जो सूट पहना है वह कितना टाइट और डीप नेक है । बृजमोहन को भी पता था कि रेखा चुदी हुई है । अब रेखा को वह उतना अच्छा नहीं मानता था जितना पहले । लेकिन अभी जो नजारा रेखा उसे दिखा गई थी उसने उसके दिमाग में हलचल मचा दी थी । 
रेखा जाने लगी तो बृजमोहन ने उसे रोकते हुए कहा ।
– रेखा यह मेज थोड़ा गंदा हो रखा है, इसे थोड़ा साफ कर दे 
रेखा  – जी, पापा, अभी आई
रेखा अंदर जाकर एक कपड़ा लेकर आती है , और मैच को कपड़े से साफ करने लगती है । उसने अभी भी चुन्नी नहीं डाली थी । वो नीचे बैठ के मेज साफ कर रही थी जिससे उसकी घाटी नुमाया हो रही थी । बृजमोहन अखबार साइड में रखकर रेखा के अधखुले उरोजो को देखने लगता है । बृजमोहन सचने लगा की जब बेटी ही इतना खुलकर अंग प्रदर्शन कर रही है तो वह भी देख लेगा तो क्या होगा । रेखा नीचे देख रही थी । तभी उसने नजर उठा कर देखा तो पापा को अपनी ओर देखते हुए पाया । उसने 
अपने बाप की नजर अपने सीने पर पाई तो एक पल के लिए वह ठहर गई । लेकिन फिर अगले ही पल वह मेज साफ करने लगी । उसने फिर बृजमोहन की ओर देखा । बृजमोहन उसे ही देख रहा था । अबकी बार रेखा के होठों पर मुस्कान आ गई और वह बृजमोहन को देख मुस्कुराने लगी ।
रेखा – पापा साफ हो गया , मैं जाऊं
ब्रिज – हां, 
रेखा जाने लगी ।
बृजमोहन – अरे सुन तो, 
रेखा – हां, पापा,
ब्रिज – यह सूट नया सिलाया तूने ,
रेखा - हां, पापा नया ही है, कैसा है 
ब्रिज – इतना डीप नेक क्यों सिलाया है, 
रेखा – क्या पापा कहां छोटा है, इतना तो आजकल नॉर्मल है, सभी लड़कियां पहनती हैं 
ब्रिज – ठीक है लेकिन कम से कम दुपट्टा तो ओढ़ा कर 
रेखा – अब क्या घर में भी चुन्नी डाल के रखूं क्या , आपके सामने भी मुझे दुपट्टा ओढ़ना पड़ेगा 

इसके बाद रेखा चली जाती है ।

कुछ दिन बाद पिंकी बंक मारकर वह राहुल के साथ गई। कार में बैठते ही उसकी भूख फूट पड़ी।  
राहुल ने जैसे ही उसकी शर्ट के बटन खोले, भरे-भरे स्तन बाहर आ गए — अब वे बड़े, गोल और भारी हो चुके थे। राहुल ने उन्हें मुंह में लिया तो पिंकी की कमर खुद-ब-खुद उठने लगी। “और जोर से चूसो…” वह कराह रही थी।

उसकी स्कर्ट कमर तक चढ़ गई। गीली पैंटी दिख रही थी। राहुल ने उसे गोद में बिठाया। पिंकी खुद नीचे बैठ गई और ऊपर-नीचे होने लगी। उसके भारी स्तन राहुल के चेहरे पर टकरा रहे थे। वह तेज-तेज हिल रही थी, आँखें बंद, मुंह खुला, “अम्म्माहhh… गहरी… और गहरी…” 

राहुल ने पूरा सीन रिकॉर्ड किया। पिंकी को पता भी नहीं चला। वह तो बस अपने नए खिले हुए बदन के मजा में खोई हुई थी।

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**घर लौटकर:**

पिंकी सीधा सिंगारदान के पास गई। पूरी यूनिफॉर्म उतारकर नंगी खड़ी हो गई। अब उसका बदन पूरी तरह खिल चुका था — भारी निम्बू जैसे स्तन, पतली कमर, गोल नितंब और हमेशा गीली रहने वाली जगह। वह शीशे में खुद को देखकर मुस्कुराई और बोली, “अब मैं तैयार हूँ…”


बृजमोहन जब बेटियों और पत्नी के साथ बाजार निकलता तो लोग उनको लार टपकाते हुए देखते । बृजमोहन साफ देखता की उनकी नजर कहां पर है  ।
ऐसे ही एक दिन वो लड़कियों के साथ बाजार के लिए निकला । बाजार पहुँचते ही चारों तरफ़ नज़रें उन पर टिक गईं। लड़के फुसफुसाने लगे, दुकानदार घूरने लगे।

**बृजमोहन** (बेटियों को देखकर, तनाव भरे स्वर में): “अरे मीना! पिंकी! dupatta नीचे करो जरा! इतना ऊपर क्यों ओढ़ रखा है? लोग क्या सोचेंगे? शर्म करो थोड़ी!”

**मीना** (चिढ़कर): “पापा, गर्मी लग रही है ना। dupatta ऊपर रखूँ तो गला घुटता है।”

**पिंकी** (मासूमियत से): “मैंने तो ठीक से ओढ़ रखा है पापा… आप हर समय डाँटते रहते हो।”

**रेखा** (मुस्कुराते हुए, थोड़ी चिढ़कर): “पापा, आप तो हर बाहर निकलने पर यही ड्रामा करते हो। हम चल तो रहे हैं ना, कोई कुछ नहीं कर रहा।”

**बृजमोहन** (रेखा को घूरकर): “तुम चुप रहो रेखा! तुम्हारी वजह से ही तो पूरा मोहल्ला हमारी तरफ़ देखता है।”

सब्जी वाले की दुकान पर सरला झुककर टमाटर चुन रही थी। उसका पल्लू सरक गया और थैली पर गिर गया। सब्जी वाला मुस्कुराते हुए घूरने लगा।

**बृजमोहन** (तुरंत नाराज होकर): “सरला! अरे, पल्लू तो संभाल लो! देखो, सब देख रहे हैं। कितनी बार कहना पड़ेगा?”

**सरला** (पल्लू ठीक करते हुए, चिढ़कर): “अरे बाबा! पल्लू गिर गया तो गिर गया। जानबूझकर तो नहीं गिराया मैंने। तुम्हें हर छोटी बात में शक हो जाता है।”

**बृजमोहन** (गुस्से में): “शक नहीं, हकीकत देख रहा हूँ सरला! पूरा बाजार तुम चारों को घूर रहा है। रेखा तो खुलकर घूम रही है, अब तुम भी शुरू हो गई हो।”

**सरला** (हँसते हुए, मजाक में चढ़ाते हुए): “अरे मेरे शक्की बाबू… इतना जलते क्यों हो? तब तो दुकान वाले अच्छी सब्जी देंगे, पूरा वजन देंगे। थोड़ा मुस्कुरा लो ना! देखो, सब्जी वाला कितना ध्यान से चुन रहा है।”

**बृजमोहन** (और चिढ़कर): “सरला! मजाक मत करो। यह हँसी-खेल की बात नहीं है। लोग हमारी तरफ़ उँगलियाँ उठा रहे हैं।”

**सरला** (अब थोड़ा गंभीर, लेकिन आत्मविश्वास से): “उँगलियाँ उठा रहे हैं तो उठाने दो। हम क्या करें? घर में बैठकर सड़ें? मैं कोई कैदखाने में तो नहीं हूँ ना? तुम भी तो समझो थोड़ा।”

**बृजमोहन** (सिर हिलाते हुए): “तुम लोग समझ ही नहीं रही हो। पहले रेखा, अब तुम… मुझे डर लग रहा है सरला।”

**सरला** (हल्के से हँसकर, बृजमोहन का हाथ पकड़ते हुए): “अरे, डरो मत। दुनिया बदल रही है, हमें भी बदलना पड़ेगा। अब चुपचाप चलो, अच्छी-अच्छी सब्जियाँ लेते हैं।”

रेखा पीछे से मुस्कुरा रही थी। मीना और पिंकी चुपचाप चल रही थीं। बृजमोहन निराश होकर आगे बढ़ गया, लेकिन उसके मन में तूफान चल रहा था।

शाम के सात बज चुके थे। बृजमोहन अखबार पढ़ रहा था। तभी बाहर बाइक की तेज़ आवाज़ आई और दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक हुई।

सरला ने दरवाज़ा खोला। सामने **जहांगीर** खड़ा था — क्षेत्र का सबसे दबंग नेता और बदमाश। काला कुर्ता, जींस, गले में मोटी सोने की चेन। उसकी आँखों में साफ़ हवस झलक रही थी।

**जहांगीर** (सरला को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए, मुस्कुराते हुए): “अरे वाह सरला भाभी…! आपकी खूबसूरती की तो मैंने बहुत तारीफ़ सुनी थी, लेकिन सामने देखकर लग रहा है कि अफ़वाहें कम थीं। इतनी निखरी हुई, इतनी मस्त… उम्र कहाँ छुपा रखी है आपने?”

सरला थोड़ी झिझक गई। उसने साड़ी का पल्लू समेटा और नजरें नीचे कर लीं, लेकिन उसके गाल लाल हो गए।

**सरला** (हल्के से मुस्कुराते हुए): “आइए अंदर आइए जहांगीर भाई…”

जहांगीर अंदर आया। बृजमोहन भी उठकर सामने आ गया।

**जहांगीर** (बृजमोहन की तरफ़ देखकर): “क्या हाल है बृजमोहन भाई? सब ठीक-ठाक तो है न? घर-परिवार कैसे चल रहा है?”

**बृजमोहन** (घबराते हुए): “जी… सब ठीक है।”

**जहांगीर** (आराम से सोफ़े पर बैठते हुए): “सुनो भाई, अगला पंचायत चुनाव नज़दीक है। मैं सोच रहा हूँ आपको टिकट दिलवा दूँ। मेरे पूरे समर्थन के साथ आप आसानी से जीत सकते हो। क्या कहते हो? तैयार हो?”

**बृजमोहन** (हड़बड़ाकर): “जी… यह तो बड़ी कृपा होगी आपकी…”

**जहांगीर** (फिर सरला की तरफ़ मुड़कर, हवस भरी नज़रों से): “सरला भाभी, आपकी बड़ी बेटी रेखा की भी बहुत चर्चा है मोहल्ले में। कहते हैं लड़की अब पूरी तरह खुल गई है। अच्छा है। आजकल की लड़कियाँ ऐसी ही होनी चाहिए। अगर कोई दिक्कत हो, कोई परेशानी हो, तो सीधा मुझे बता देना। मैं सब सँभाल लूँगा।”

सरला अब सामान्य हो चुकी थी। वह मुस्कुराई और बोली:

**सरला**: “आपका आशीर्वाद है जहांगीर जी ।”

तभी अंदर से **पिंकी** पानी का गिलास लेकर आई। वह बहुत छोटी स्कर्ट और टाइट टॉप पहने थी, जिससे उसकी जाँघें और पेट का निचला हिस्सा साफ़ दिख रहा था।

जहांगीर की नज़र पिंकी पर अटक गई। उसने मुस्कुराते हुए पिंकी को पास बुलाया।

**जहांगीर** (पिंकी के कंधे पर हाथ रखकर, धीरे-धीरे सहलाते हुए): “अरे… यह कौन सी प्यारी सी गुड़िया है? नाम क्या है बेटा?”

**पिंकी** (शरमाते हुए, लेकिन मुस्कुराते हुए): “पिंकी…”

**जहांगीर** (कंधा सहलाते हुए और उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए): “बहुत प्यारी बच्ची है पिंकी। नाजुक, सुंदर और मासूम। स्कर्ट भी कितनी अच्छी पहनी है। लग रही हो जैसे कोई छोटी परी। कितने साल की हो गई हो?”

**पिंकी** (पॉजिटिव और थोड़ी खुश होकर): “सोलह साल…”

**जहांगीर** (हँसते हुए, हाथ अभी भी कंधे पर): “वाह! सोलह साल की उम्र में इतनी खूबसूरत। आगे चलकर तो बहुत माल बनोगी। अच्छे से पढ़ना और अपना ख्याल रखना। अगर कोई परेशानी हो तो चाचा को बता देना, ठीक है?”

**पिंकी** (मुस्कुराते हुए, सिर हिलाते हुए): “जी चाचा…”

जहांगीर ने पिंकी के कंधे को आखिरी बार दबाया, फिर सरला की तरफ देखकर बोला:

**जहांगीर**: “सरला भाभी, आपकी सारी लड़कियाँ बहुत खूबसूरत हैं। घर का माहौल अच्छा रखना। मैं बीच-बीच में आता रहूँगा।”

वह हँसता हुआ उठा और बाहर चला गया।

बृजमोहन चुपचाप खड़ा सब देखता रहा। उसके माथे पर पसीना था, लेकिन मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला।

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**बृजमोहन और सरला के बीच संवाद (विस्तारित सीन)**

जहांगीर के जाने के कुछ मिनट बाद बृजमोहन ने दरवाजा बंद किया। उसका चेहरा तनावग्रस्त था। वह सीधा सरला के पास गया, जो सोफे पर बैठी थी।

**बृजमोहन** (उत्तेजित स्वर में): “सरला, वह यहां क्यों आया था? इतने सालों में कभी नहीं आया, आज अचानक क्यों?”

**सरला** (शांत स्वर में, पान चबाते हुए): “मुझे क्या मालूम? शायद रेखा की बात सुनकर आया होगा। या फिर… किसी और वजह से।”

**बृजमोहन** (गुस्से और डर के मिश्रण से): “आखिर जिस बात का डर था, वही हुआ। तुम भी उसकी नजर में आ गईं। तुमने देखा नहीं कैसे घूर रहा था? जैसे कोई शिकार देख रहा हो।”

सरला ने पान की गिलौरी मुँह में रखी और धीरे से मुस्कुराई।

**सरला**: “तो क्या करूँ? अब मैं खुद को घर में कैद तो नहीं रख सकती ना? बाहर निकलूँगी तो लोग देखेंगे ही।”

**बृजमोहन** (आवाज़ ऊँची करते हुए): “लेकिन वो औरतबाज है सरला! पूरा मोहल्ला जानता है। उसके पीछे कितनी औरतों की कहानियाँ हैं। तुम्हें समझ नहीं आ रहा क्या?”

**सरला** (शांत लेकिन दृढ़ स्वर में): “मैं जानती हूँ। तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं है। वो मुझे कुछ नहीं कर सकता।”

**बृजमोहन** (बैठते हुए, सिर पकड़कर): “मैं कहता हूँ कि राजनीति और इन सब लोगों से दूर रहो। जहांगीर जैसे लोगों से दूर रहना ही अच्छा है।”

**सरला** (बृजमोहन की तरफ़ देखकर, समझाते हुए): “इसमें गलत क्या है? वो कह रहा था कि तुम्हें चुनाव लड़वाएगा। घर की स्थिति सुधरेगी, पैसे आएंगे, इज्जत बढ़ेगी। मैं अभी तो कुछ कहा भी नहीं ना। बस बात कर रही थी।”

**बृजमोहन**: “लेकिन उसके साथ करीबी ठीक नहीं है सरला। तुम देख नहीं रही हो? वो तुम्हें कैसे देख रहा था।”

**सरला** (थोड़ा हँसते हुए, लेकिन गंभीर स्वर में): “चिंता मत करो। वो ऐसा-वैसा कुछ नहीं करेगा। मैं कोई दुकान का सामान नहीं हूँ कि कोई भी उठाकर ले जाए। मैं जानती हूँ कि कैसे बात करनी है। तुम बस शांत रहो।”

बृजमोहन कुछ देर चुप रहा। फिर धीरे से बोला:

**बृजमोहन**: “सरला… पहले घर में सिर्फ रेखा की चिंता थी। अब तुम भी… मुझे डर लग रहा है।”

**सरला** (बृजमोहन का हाथ पकड़कर): “डरो मत। समय बदल रहा है। हमें भी तो आगे का सोचना है  । तुम्हारी दुकान से घर नहीं चल सकता अब । और वो तुम्हे पता है न कौन है, इतना ताकतवर आदमी हमारे दरवाजे पर आया है । अब हमें भी उसके हिसाब से चलना चाहिए । इसमें हमारा भी तो फायदा है”

बृजमोहन ने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप बैठा रहा। उसके मन में हजारों सवाल थे, लेकिन जवाब कहीं नहीं मिल रहे थे।

सरला उठी और रसोई की तरफ चली गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

---दो दिन बाद शाम को दरवाजे पर दस्तक हुई। सरला ने दरवाजा खोला तो जहांगीर सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। इस बार वह अकेला था।
जहांगीर (सरला को ऊपर से नीचे तक देखते हुए, प्रशंसात्मक स्वर में): “अरे वाह सरला भाभी…! आज तो और भी खूबसूरत लग रही हो। रंग में निखार आ गया है। सच कहूँ तो मोहल्ले की कोई औरत तुम्हारे सामने फीकी पड़ जाती है।”
सरला (थोड़ी झिझकते हुए, पल्लू संभालते हुए): “आइए अंदर आइए जहांगीर भाई… बृजमोहन तो दुकान गया है।”
जहांगीर अंदर आकर सोफे पर बैठ गया। उसकी नज़रें सरला के स्तनों और कमर पर बार-बार जा रही थीं।
जहांगीर (आराम से पैर फैलाते हुए): “बृजमोहन की चिंता मत करो। मैं खास तौर पर तुमसे मिलने आया हूँ।”
सरला (पानी का गिलास देते हुए): “मुझसे? कोई काम था क्या?”
जहांगीर (गिलास लेते हुए और सरला की उँगलियों को छूते हुए): “काम तो बहुत हैं… लेकिन सबसे पहले तुम्हारी तारीफ कर लूँ। तुम्हारी चाल, तुम्हारी हँसी, तुम्हारा अंदाज़ — सब कुछ देखकर मन नहीं भरता। बृजमोहन कितना भाग्यशाली है, फिर भी तुम्हारी कद्र नहीं करता लगता है।”
सरला (नजरें नीचे करते हुए, लेकिन मुस्कुराते हुए): “आप ऐसे बोल रहे हैं… मैं क्या जवाब दूँ? आप तो नेता हैं, बड़े-बड़े काम करते हैं।”
जहांगीर (हँसते हुए, आगे झुककर): “नेता होने का फायदा यही है कि जो पसंद आए, उसे अपना बना लूँ। सरला, तुम्हें अगर कभी अकेलापन लगे, या कोई परेशानी हो — घर की, बच्चों की, या… खुद की — तो सीधा मुझे बता देना। मैं हर वक्त तैयार हूँ।”
सरला (थोड़ी घबराकर, लेकिन आकर्षित होते हुए): “आपकी कृपा है भाई… लेकिन लोग क्या कहेंगे?”
जहांगीर (मुस्कुराते हुए, हाथ बढ़ाकर सरला के कंधे पर रखते हुए): “लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर जीवन नहीं जीते सरला। तुम खूबसूरत हो, समझदार हो। बस थोड़ा हिम्मत रखो। मैं तुम्हारे पूरे परिवार का ख्याल रखूँगा — रेखा का, पिंकी का… और तुम्हारा भी।”
सरला ने कंधा हटाने की कोशिश नहीं की। वह बस चुपचाप खड़ी रही। जहांगीर ने अंत में उसकी कमर की तरफ एक लालची नज़र डाली और उठ खड़ा हुआ।
जहांगीर: “अब ज्यादा देर नहीं रुकता। बृजमोहन आ जाएगा तो शक करेगा। लेकिन याद रखना — मेरे पास आने में संकोच मत करना।”
जहांगीर के जाते ही सरला ने दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी।


दो दिन बाद दोपहर में एक सफेद इनोवा कार बृजमोहन के घर के सामने रुकी। ड्राइवर उतरकर दरवाजे पर आया और एक लिफाफा दिया।

**ड्राइवर**: “सरला जी के नाम है। जहांगीर साहब ने भेजा है।”

सरला ने लिफाफा खोला। अंदर एक सुंदर कार्ड था और कुछ नोट्स। कार्ड पर लिखा था:

“प्रिय सरला भाभी,  
आज शाम ७ बजे अपने परिवार के साथ मेरे घर आना। खास तौर पर तुम और बृजमोहन। इंतजार रहेगा।  
— जहांगीर”

सरला ने कार्ड बृजमोहन को दिखाया।

**बृजमोहन** (चिंतित होकर): “यह क्या है सरला? वह हमें अपने घर बुला रहा है? दोनों को? मैं नहीं जाना चाहता।”

**सरला** (कार्ड को सहलाते हुए): “देखो जी, इनकार करना ठीक नहीं होगा। वह दबंग नेता है। अगर हम नहीं गए तो सोच सकता है कि हम उसका अपमान कर रहे हैं।”

**बृजमोहन** (घबराकर): “लेकिन उसकी नीयत साफ नहीं है। तुम्हें देखने का तरीका… मुझे अच्छा नहीं लगता।”

**सरला** (बृजमोहन का हाथ पकड़कर, समझाते हुए): “मैं जानती हूँ। लेकिन हमें भी समझदारी से काम लेना होगा। वहाँ जाकर बात करेंगे। राजनीति की बात भी होगी। तुम्हारा भविष्य बन सकता है।”

**बृजमोहन** (सिर हिलाते हुए): “मुझे डर लग रहा है सरला…”

**सरला** (मुस्कुराते हुए, लेकिन दृढ़ता से): “डरो मत। मैं हूँ ना। हम दोनों साथ जाएँगे। अगर कुछ गलत लगा तो हम तुरंत लौट आएंगे। बस एक बार चलकर देखते हैं। इनकार करने से फायदा नहीं होगा।”

बृजमोहन कुछ देर सोचता रहा, फिर अनमने ढंग से मान गया।

**बृजमोहन**: “ठीक है… चलते हैं। लेकिन तुम सावधानी से रहना।”

सरला ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।

शाम ६:४५ बजे वही इनोवा कार फिर आ गई। जहांगीर ने स्वयं ड्राइवर को भेजा था। बृजमोहन ने देखा सरला ने आज स्लीव्स लेस साड़ी पहनी है । बृजमोहन, सरला, — कार में बैठकर जहांगीर के बड़े बंगले की तरफ रवाना हो गए।
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#8
अपडेट – 7

उसी शाम — जहांगीर के बंगले पर
कार जहांगीर के बड़े और शानदार बंगले पर रुकी। जहांगीर स्वयं गेट पर खड़ा स्वागत करने आया।
जहांगीर (मुस्कुराते हुए): “आइए, आइए! बहुत अच्छा लगा। अंदर चलिए।”
दोनोंअंदर गए। जहांगीर ने उन्हें आराम से बिठाया। चाय-नाश्ता आया। कुछ देर सामान्य बातें हुईं, फिर जहांगीर ने सीधे मुद्दे पर बात की।
जहांगीर (बृजमोहन की तरफ देखकर): “बृजमोहन भाई, मैं सीधे बात करता हूँ। अगला पंचायत चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। मैं चाहता हूँ कि आप की धर्म पत्नी जी इस चुनाव को लड़ें । 
इस बार चुनाव लड़ें। मेरे पूरे समर्थन के साथ। पैसा, लोगों का सहयोग, सब कुछ मैं देख लूँगा।”
बृजमोहन (घबराकर): “ लेकिन सरला ही क्यों …? जहांगीर भाई, वो तो साधारण सी औरत है । उसे कितने लोग जानते होंगे ।  राजनीति का मुझे कुछ पता नहीं।”
जहांगीर (मुस्कुराते हुए, आत्मविश्वास से): “ ऐसी बात नहीं है, उनकी प्रसिद्धि ही मुझे आपके यहाँ खींच लाए । भाभी जी के बारे में कुछ दिन से बहुत सुन रहा था बहुतों के मुंह से । 
बृजमोहन सरला को देखता है । सरला जहांगीर को घूरती है प।
बृजमोहन – क्या सुन रहे थे आप । 
जहांगीर – यही की उनकी क्षेत्र में जान पहचान है । काफी फेमस हैं ये इलाके ने । खूबसूरत तो ये हैं ही दिल की भी अच्छी हैं । बृजमोहन के सामने ही सरला को जहांगीर हवस भरी नजरों सहो गुर्दे में बोला । सरला के चेहरे पे मुस्कुराहट थी । उसने एक होंठ को दांत के नीचे दबा दिया और जहांगीर को कातर नजरों से देखने लगी ।। 
जहांगीर _ आपको बस थोड़ी हिम्मत चाहिए। मैं पीछे हूँ तो आपकी वाइफ की जीत पक्की है। घर की स्थिति भी सुधरेगी, इज्जत बढ़ेगी। सोचिए — सरला जी पंचायत में बैठेंगे, तो रेखा, पिंकी, सरला — सबका भला होगा।”
सरला (बृजमोहन को देखकर): “जी, जहांगीर भाईजान आप, ठीक कह रहे हैं। मौका अच्छा है। मै तैयार हूँ । क्यों जी , ठीक है न
बृजमोहन कुछ देर सोचता रहा, फिर धीरे से सिर हिला दिया।
बृजमोहन: “ठीक है… अगर आप कह रहे हैं और सरला भी चाहती तो ठीक है ,  
सरला – हूँ, यह हुई ना बात। और जहांगीर जी आप को करना पड़ेगा । मुझे राजनीति के बारे में कुछ नहीं पता।
जहांगीर बहुत खुश हुआ। उसने सरला की तरफ देखकर मुस्कुराया।
जहांगीर –मैं सब सिखा दूंगा, आप फिक्र ना करें । 
अगले दिन
सुबह १० बजे वही सफेद इनोवा कार घर के सामने आकर खड़ी हो गई। ड्राइवर ने बताया — “सरला जी को जहांगीर साहब ने बुलाया है। कुछ इलेक्शन से जुड़ी मीटिंग है।”
सरला (बृजमोहन से): “मुझे अकेले जाना है। चुनाव की कुछ मीटिंग है, महिलाओं वाली। तुम चिंता मत करो, शाम तक लौट आऊँगी।”
बृजमोहन (चिंतित होकर): “अकेले? मैं भी चलूँ?”
सरला (मुस्कुराते हुए): “नहीं जी, आपकी जरूरत नहीं है। महिलाओं की मीटिंग है। तुम घर पर रहो। रेखा और पिंकी का ध्यान रखना।”
बृजमोहन कुछ कह नहीं सका। सरला तैयार होकर कार में बैठ गई और चली गई।
शाम को — सरला की वापसी होती है ।
सरला शाम ७:३० बजे लौटी। उसके चेहरे पर एक अलग सी चमक थी। 
बृजमोहन (तुरंत पूछते हुए): “कैसी रही मीटिंग? देर क्यों लग गई? क्या-क्या बात हुई?”
सरला (आराम से बैठते हुए): “बहुत अच्छी रही। जहांगीर भाई ने बहुत कुछ समझाया। महिलाओं को कैसे जोड़ना है, वोट कैसे बटोरने हैं — सब बताया। बहुत सी महिलाएँ आई थीं।”
बृजमोहन (शक भरी नज़र से): “इतनी देर लग गई? … कहां थी ?”
सरला (हल्के से हँसकर): “अरे, अब इन सब कामों में टाइम तो लगेगा, तुम्हारी बीवी प्रधान बनने जा रही है , वो हस्ती है । वो सामान्य व्यवहार कर रही थी ।


कुछ दिन बात सरला कुछ बाहर की महिलाओं के साथ घर आती है । बृजमोहन उनसे मिलता है ।
अब अक्सर इलेक्शन के सिलसिले में बाहर जाने लगी थी । कुछ दिनों से सरला के बहुत बन ठन के ऐसे जाना जैसे किसी शादी में जा रही हो, बृजमोहन के मन में शक पैदा करता है । उसके पूछने पर सरल उसे बताती है कि वह जहांगीर के यहां जा रही है । उसके ब्लाउज छोटे और स्लीवलेस होने लगे थे । चेहरे पर ऐसे मेकअप किया होता जैसे कोई छिनाल अपने कस्टमर के पास जा रही हो मिलने ।
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