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Adultery बुरा ना मानो होली है-Bura na mano holi hai
#1
Tongue 
 
गुड़गांव के ब्लू बेल्स मॉडल कॉलेज का विशाल प्रांगण रंगों और उमंग से सराबोर था। होली से ठीक एक दिन पहले, कॉलेज ने एक भव्य पार्टी का आयोजन किया था, जहाँ शिक्षकों और छात्रों के बीच का औपचारिक पर्दा कुछ देर के लिए हट गया था। ढोल की थाप पर थिरकते कदम, हवा में उड़ते गुलाल के रंग और बच्चों की खिलखिलाहट से पूरा माहौल जीवंत हो उठा था।
 
कॉलेज की रिसेप्शनिस्ट, श्रीमती चैताली घोष, आज अपनी होंडा एक्टिवा पर आई थीं, उसका मन भी इस उत्सव में डूबने को बेताब था। छत्तीस  साल की चैताली, अपनी घघरा-चोली में बेहद आकर्षक लग रही थीं। गहरे लाल रंग की चोली उसके सुडौल शरीर पर कसकर बैठी थी, जिससे उसके भरी हुई चूची साफ झलक रही थीं। सुनहरे धागों से कढ़ी चोली की पतली पट्टियाँ उसके कंधों पर टिकी थीं, और कमर पर बंधा घाघरा हर कदम के साथ लहरा रहा था। उसके लहराती काली जुल्फें, उसके कमर तक पहुँचती थीं और हर मोड़ पर उसके चाल में एक खास नज़ाकत भर देती थीं। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, जो उसके आँखों में चमक भर रही थी।
 
उसने अपनी एक्टिवा पार्किंग में खड़ी की, हेलमेट उतारा और अपनी उंगलियों से बालों को संवारा। कॉलेज के गलियारे में कदम रखते ही, रंगों की बौछार उसका स्वागत करने को तैयार थी।
 
"चैताली मैम! होली है!" एक शरारती छात्र की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, और इससे पहले कि वह कुछ समझ पातीं, एक गुब्बारा उसके कंधे से टकराया। पानी से भीगा गुलाल उसके चोली पर फैल गया, लेकिन चैताली हँसी।
 
"अरे! इतनी जल्दी शुरू हो गए?" उसने बनावटी गुस्सा दिखाया, लेकिन उसके आँखों में ख़ुशी थी।
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#2
बस इतनी सी?
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#3
ये वाटिका रियल एस्टेट वाली चैताली है?
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#4
पी.टी. टीचर राजबीर राणा, एक मजबूत कद-काठी का आदमी, अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, एक कोने में खड़ा था। उसकी पैनी निगाहें चैताली पर टिक गईं, जब वह अपनी एक्टिवा से उतरी थीं। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई। चैताली की चाल में एक खास मटकन थी, उसके कमर की हर लहर उसके दिमाग में एक अलग ही तस्वीर बना रही थी। राजबीर ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक छोटी सी पुड़िया टटोली। आज उसका इरादा कुछ और ही था, सिर्फ रंगों से होली खेलने का नहीं।

"अरे चैताली जी! आइए, आइए! कहाँ रह गईं आप?" राजबीर ने एक मीठी आवाज़ में बुलाया, उसकी आँखें चैताली के भरे हुए जिस्म पर ठहर गईं।

चैताली ने देखा, राजबीर उन्हें बुला रहा था। वह उसके पास गईं। "बस आ ही रही थी राजबीर जी। आप लोगों ने तो रंग खेलना भी शुरू कर दिया।"

"हाँ, तो होली है! रंग तो चलेंगे ही।" राजबीर ने एक स्टील का गिलास उसकी ओर बढ़ाया। "एकदम ठंडा शरबत बनाया है, ख़ास आपके लिए। आज की गर्मी में इससे बेहतर कुछ नहीं।"

चैताली ने गिलास लिया। "वाह! क्या बात है। बहुत-बहुत शुक्रिया।" उसने एक घूँट भरा। शरबत मीठा और ताज़ा था, लेकिन उसमें एक हल्का सा कड़वापन था, जिसे चैताली ने गर्मी और अन्य स्वादों के कारण नज़रअंदाज़ कर दिया।

राजबीर ने दूर खड़े आर्यन और आकाश को आँख के इशारे से बुलाया। आर्यन, बारहवीं का छात्र, उन्नीस साल का था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, और वह अक्सर कॉलेज की लड़कियों को घूरता रहता था। आकाश यादव, अठारह साल का, आर्यन का दोस्त, थोड़ा शांत था, लेकिन आर्यन के साथ रहकर उसकी शरारतें भी बढ़ गई थीं। दोनों राजबीर के इशारे को समझ गए।

आर्यन राजबीर के पास आया। "सर, क्या बात है?"

राजबीर ने अपनी आवाज़ धीमी की। "काम हो गया। शरबत में मिला दिया है। बस इंतज़ार करो।"

आर्यन की आँखों में हैवानियत की चमक उभरी। "ठीक है सर।"


चैताली ने एक और घूँट लिया। शरबत का स्वाद अब थोड़ा अजीब लगने लगा था, लेकिन वह खुद को समझा रही थी कि शायद यह होली के माहौल की वजह से है। वह कुछ देर तक बच्चों के साथ होली खेलती रहीं, उसके गालों पर गुलाल लगातीं, और उसके हँसी में शामिल होती रहीं।

धीरे-धीरे, एक अजीब सी सुस्ती उसके शरीर में फैलने लगी। उसके सिर में हल्का सा भारीपन महसूस हुआ, जैसे कोई उन्हें धीरे-धीरे नींद की गहरी खाई में धकेल रहा हो। रंगों की चकाचौंध धुंधली पड़ने लगी, और ढोल की थाप दूर से आती हुई सुनाई देने लगी।

"मुझे... मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है," चैताली ने अपने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। उसके आवाज़ लड़खड़ाने लगी थी।
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#5
राजबीर तुरंत उसके पास आया। "क्या हुआ चैताली जी? तबीयत ठीक नहीं लग रही?" उसके चेहरे पर बनावटी चिंता थी।

"पता नहीं... चक्कर आ रहे हैं... और नींद भी आ रही है।" चैताली की पलकें भारी होने लगीं।

राजबीर ने आर्यन और आकाश को फिर से इशारा किया। "लगता है गर्मी लग गई है आपको। आइए, आपको अंदर किसी ठंडी जगह ले चलते हैं।"

वह चैताली को सहारा देने के लिए आगे बढ़ा। चैताली का शरीर अब पूरी तरह से ढीला पड़ चुका था। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, और उसने राजबीर का सहारा ले लिया। राजबीर ने एक हाथ उसके कमर पर रखा, और उसके हाथ का स्पर्श चैताली को अजीब सा लगा, लेकिन उसके पास विरोध करने की शक्ति नहीं बची थी।

"चलो आर्यन, आकाश, मदद करो।" राजबीर ने कहा।

आर्यन और आकाश दोनों चैताली के दूसरी तरफ आए और उन्हें पकड़ लिया। चैताली का भारी शरीर उसके कंधों पर लटक गया। उसके चोली और घाघरा अब रंगों से और पसीने से गीला हो चुका था। उसके बालों की लटें उसके चेहरे पर चिपक गई थीं। उसके आँखें अब लगभग बंद थीं।

"किस क्लासरूम में ले चलें सर?" आकाश ने फुसफुसाते हुए पूछा।

"सबसे आखिर वाला, जहाँ कोई नहीं जाता।" राजबीर ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी।

तीनों चैताली को घसीटते हुए कॉलेज के गलियारों से होते हुए, सबसे आखिर वाले, खाली क्लासरूम की ओर बढ़ चले। गलियारे में सन्नाटा था, क्योंकि सारे बच्चे और शिक्षक पार्टी के शोरगुल में मग्न थे। चैताली का शरीर हर कदम पर झूल रहा था, उसके घघरे का कपड़ा ज़मीन पर घिसट रहा था।

खाली क्लासरूम का दरवाज़ा खुला। अंदर धूल और बंद हवा की गंध थी। खिड़कियों से हल्की रोशनी आ रही थी, जिससे कमरे में एक धुंधला सा माहौल था। उसने चैताली को ज़मीन पर गिरा दिया, उसके कमर और कूल्हों पर एक हल्की सी चोट आई, लेकिन वह इतनी बेहोश थीं कि उन्हें महसूस नहीं हुआ।

राजबीर ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर से कुंडी लगा दी। कमरे में अंधेरा और बढ़ गया।

"तो... अब क्या सर?" आकाश ने पूछा, उसकी आवाज़ में थोड़ी घबराहट थी।

राजबीर ने एक मुस्कान दी। "अब वही जो करना है।" उसकी आँखें चैताली के अर्ध-बेहोश शरीर पर टिकी थीं। चैताली की साँसें तेज़ हो रही थीं, उसके होंठ हल्के से खुले थे, और उसके चूची हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं।
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