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11-04-2026, 04:55 AM
(This post was last modified: 11-04-2026, 10:51 PM by MohdIqbal. Edited 1 time in total. Edited 1 time in total.)
गुड़गांव के ब्लू बेल्स मॉडल कॉलेज का विशाल प्रांगण रंगों और उमंग से सराबोर था। होली से ठीक एक दिन पहले, कॉलेज ने एक भव्य पार्टी का आयोजन किया था, जहाँ शिक्षकों और छात्रों के बीच का औपचारिक पर्दा कुछ देर के लिए हट गया था। ढोल की थाप पर थिरकते कदम, हवा में उड़ते गुलाल के रंग और बच्चों की खिलखिलाहट से पूरा माहौल जीवंत हो उठा था।
कॉलेज की रिसेप्शनिस्ट, श्रीमती चैताली घोष, आज अपनी होंडा एक्टिवा पर आई थीं, उसका मन भी इस उत्सव में डूबने को बेताब था। छत्तीस साल की चैताली, अपनी घघरा-चोली में बेहद आकर्षक लग रही थीं। गहरे लाल रंग की चोली उसके सुडौल शरीर पर कसकर बैठी थी, जिससे उसके भरी हुई चूची साफ झलक रही थीं। सुनहरे धागों से कढ़ी चोली की पतली पट्टियाँ उसके कंधों पर टिकी थीं, और कमर पर बंधा घाघरा हर कदम के साथ लहरा रहा था। उसके लहराती काली जुल्फें, उसके कमर तक पहुँचती थीं और हर मोड़ पर उसके चाल में एक खास नज़ाकत भर देती थीं। उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, जो उसके आँखों में चमक भर रही थी।
उसने अपनी एक्टिवा पार्किंग में खड़ी की, हेलमेट उतारा और अपनी उंगलियों से बालों को संवारा। कॉलेज के गलियारे में कदम रखते ही, रंगों की बौछार उसका स्वागत करने को तैयार थी।
"चैताली मैम! होली है!" एक शरारती छात्र की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, और इससे पहले कि वह कुछ समझ पातीं, एक गुब्बारा उसके कंधे से टकराया। पानी से भीगा गुलाल उसके चोली पर फैल गया, लेकिन चैताली हँसी।
"अरे! इतनी जल्दी शुरू हो गए?" उसने बनावटी गुस्सा दिखाया, लेकिन उसके आँखों में ख़ुशी थी।
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ये वाटिका रियल एस्टेट वाली चैताली है?
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पी.टी. टीचर राजबीर राणा, एक मजबूत कद-काठी का आदमी, अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, एक कोने में खड़ा था। उसकी पैनी निगाहें चैताली पर टिक गईं, जब वह अपनी एक्टिवा से उतरी थीं। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई। चैताली की चाल में एक खास मटकन थी, उसके कमर की हर लहर उसके दिमाग में एक अलग ही तस्वीर बना रही थी। राजबीर ने अपनी जेब में हाथ डाला और एक छोटी सी पुड़िया टटोली। आज उसका इरादा कुछ और ही था, सिर्फ रंगों से होली खेलने का नहीं।
"अरे चैताली जी! आइए, आइए! कहाँ रह गईं आप?" राजबीर ने एक मीठी आवाज़ में बुलाया, उसकी आँखें चैताली के भरे हुए जिस्म पर ठहर गईं।
चैताली ने देखा, राजबीर उन्हें बुला रहा था। वह उसके पास गईं। "बस आ ही रही थी राजबीर जी। आप लोगों ने तो रंग खेलना भी शुरू कर दिया।"
"हाँ, तो होली है! रंग तो चलेंगे ही।" राजबीर ने एक स्टील का गिलास उसकी ओर बढ़ाया। "एकदम ठंडा शरबत बनाया है, ख़ास आपके लिए। आज की गर्मी में इससे बेहतर कुछ नहीं।"
चैताली ने गिलास लिया। "वाह! क्या बात है। बहुत-बहुत शुक्रिया।" उसने एक घूँट भरा। शरबत मीठा और ताज़ा था, लेकिन उसमें एक हल्का सा कड़वापन था, जिसे चैताली ने गर्मी और अन्य स्वादों के कारण नज़रअंदाज़ कर दिया।
राजबीर ने दूर खड़े आर्यन और आकाश को आँख के इशारे से बुलाया। आर्यन, बारहवीं का छात्र, उन्नीस साल का था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, और वह अक्सर कॉलेज की लड़कियों को घूरता रहता था। आकाश यादव, अठारह साल का, आर्यन का दोस्त, थोड़ा शांत था, लेकिन आर्यन के साथ रहकर उसकी शरारतें भी बढ़ गई थीं। दोनों राजबीर के इशारे को समझ गए।
आर्यन राजबीर के पास आया। "सर, क्या बात है?"
राजबीर ने अपनी आवाज़ धीमी की। "काम हो गया। शरबत में मिला दिया है। बस इंतज़ार करो।"
आर्यन की आँखों में हैवानियत की चमक उभरी। "ठीक है सर।"
चैताली ने एक और घूँट लिया। शरबत का स्वाद अब थोड़ा अजीब लगने लगा था, लेकिन वह खुद को समझा रही थी कि शायद यह होली के माहौल की वजह से है। वह कुछ देर तक बच्चों के साथ होली खेलती रहीं, उसके गालों पर गुलाल लगातीं, और उसके हँसी में शामिल होती रहीं।
धीरे-धीरे, एक अजीब सी सुस्ती उसके शरीर में फैलने लगी। उसके सिर में हल्का सा भारीपन महसूस हुआ, जैसे कोई उन्हें धीरे-धीरे नींद की गहरी खाई में धकेल रहा हो। रंगों की चकाचौंध धुंधली पड़ने लगी, और ढोल की थाप दूर से आती हुई सुनाई देने लगी।
"मुझे... मुझे थोड़ा अजीब लग रहा है," चैताली ने अपने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। उसके आवाज़ लड़खड़ाने लगी थी।
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राजबीर तुरंत उसके पास आया। "क्या हुआ चैताली जी? तबीयत ठीक नहीं लग रही?" उसके चेहरे पर बनावटी चिंता थी।
"पता नहीं... चक्कर आ रहे हैं... और नींद भी आ रही है।" चैताली की पलकें भारी होने लगीं।
राजबीर ने आर्यन और आकाश को फिर से इशारा किया। "लगता है गर्मी लग गई है आपको। आइए, आपको अंदर किसी ठंडी जगह ले चलते हैं।"
वह चैताली को सहारा देने के लिए आगे बढ़ा। चैताली का शरीर अब पूरी तरह से ढीला पड़ चुका था। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे, और उसने राजबीर का सहारा ले लिया। राजबीर ने एक हाथ उसके कमर पर रखा, और उसके हाथ का स्पर्श चैताली को अजीब सा लगा, लेकिन उसके पास विरोध करने की शक्ति नहीं बची थी।
"चलो आर्यन, आकाश, मदद करो।" राजबीर ने कहा।
आर्यन और आकाश दोनों चैताली के दूसरी तरफ आए और उन्हें पकड़ लिया। चैताली का भारी शरीर उसके कंधों पर लटक गया। उसके चोली और घाघरा अब रंगों से और पसीने से गीला हो चुका था। उसके बालों की लटें उसके चेहरे पर चिपक गई थीं। उसके आँखें अब लगभग बंद थीं।
"किस क्लासरूम में ले चलें सर?" आकाश ने फुसफुसाते हुए पूछा।
"सबसे आखिर वाला, जहाँ कोई नहीं जाता।" राजबीर ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी ठंडक थी।
तीनों चैताली को घसीटते हुए कॉलेज के गलियारों से होते हुए, सबसे आखिर वाले, खाली क्लासरूम की ओर बढ़ चले। गलियारे में सन्नाटा था, क्योंकि सारे बच्चे और शिक्षक पार्टी के शोरगुल में मग्न थे। चैताली का शरीर हर कदम पर झूल रहा था, उसके घघरे का कपड़ा ज़मीन पर घिसट रहा था।
खाली क्लासरूम का दरवाज़ा खुला। अंदर धूल और बंद हवा की गंध थी। खिड़कियों से हल्की रोशनी आ रही थी, जिससे कमरे में एक धुंधला सा माहौल था। उसने चैताली को ज़मीन पर गिरा दिया, उसके कमर और कूल्हों पर एक हल्की सी चोट आई, लेकिन वह इतनी बेहोश थीं कि उन्हें महसूस नहीं हुआ।
राजबीर ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर से कुंडी लगा दी। कमरे में अंधेरा और बढ़ गया।
"तो... अब क्या सर?" आकाश ने पूछा, उसकी आवाज़ में थोड़ी घबराहट थी।
राजबीर ने एक मुस्कान दी। "अब वही जो करना है।" उसकी आँखें चैताली के अर्ध-बेहोश शरीर पर टिकी थीं। चैताली की साँसें तेज़ हो रही थीं, उसके होंठ हल्के से खुले थे, और उसके चूची हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं।
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"हमें तो लगा था कि बस छेड़ने के लिए ले आए हैं," आकाश ने कहा।
"छेड़ना? नहीं, आकाश। आज चैताली जी की होली कुछ अलग तरीके से मनेगी।" राजबीर ने अपनी कमीज़ के बटन खोले। "आज तुम दोनों की भी होली मनेगी।"
आर्यन की आँखें चमक उठीं। उसने कभी सोचा नहीं था कि उसे ऐसा मौका मिलेगा। उसने चैताली को कई बार देखा था, उसके चाल, उसके मुस्कान, और उसके भरे हुए जिस्म ने उसे हमेशा आकर्षित किया था।
राजबीर ने चैताली के पास घुटने टेके। उसका हाथ उसके चोली पर गया। चैताली ने एक हल्की सी सिसकी भरी, उसके आँखें आधी खुलीं, लेकिन वह कुछ भी समझ नहीं पाईं। उसके पुतलियाँ फैली हुई थीं।
"क्या हुआ चैताली जी? नींद आ रही है?" राजबीर ने उसके गाल पर थपकी दी। "अभी तो पार्टी शुरू हुई है।"
उसने चैताली की चोली के हुक खोलने शुरू किए। एक-एक करके हुक खुलने लगे, और चैताली की साँसें और तेज़ हो गईं। उसके चूची, जो अब तक कसकर बंधी थीं, आज़ाद होने लगीं। उसके लाल रंग की ब्रा साफ दिखने लगी, जो उसके भरे हुए स्तनों को मुश्किल से संभाले हुए थी।
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आर्यन और आकाश दोनों चुपचाप खड़े थे, उसके नज़रें चैताली के शरीर पर टिकी थीं। आकाश थोड़ा डरा हुआ था, लेकिन आर्यन की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।
"अरे खड़े क्या हो? मदद करो।" राजबीर ने आर्यन से कहा।
आर्यन आगे बढ़ा। राजबीर ने चैताली की चोली पूरी तरह से हटा दी, उसे ज़मीन पर फेंक दिया। चैताली अब सिर्फ ब्रा और घाघरे में थीं। उसके ब्रा के कप उसके स्तनों को पूरी तरह से नहीं ढक पा रहे थे, उसके ऊपरी हिस्से थोड़े बाहर झाँक रहे थे। उसके निप्पल ब्रा के कपड़े के नीचे से भी साफ दिखाई दे रहे थे।
राजबीर ने चैताली की ब्रा की पट्टियाँ खींचीं। "देख रहे हो लड़के? क्या चीज़ है।"
चैताली ने एक और कमज़ोर सी आवाज़ निकाली, उसके हाथ हल्के से उठे, जैसे वह कुछ रोकने की कोशिश कर रही हों, लेकिन उसके शरीर में ताकत नहीं थी।
राजबीर ने उसके ब्रा उतार दी। चैताली के मम्मे अब पूरी तरह से नग्न थे, हवा में खुले हुए। उसके बड़े, भरे हुए मम्मे, उसके निप्पल भूरे और खड़े हुए थे, शायद उत्तेजना या डर के कारण। राजबीर ने एक मम्मे को अपने हाथ में पकड़ा। वह भारी और गरम था।
"उफ़्फ़... क्या माल है!" राजबीर की आवाज़ में वासना साफ झलक रही थी। उसने अपने मुँह से लार निगली।
उसने आर्यन की ओर देखा। " आर्यन, तुम्हारी बारी।"
आर्यन हिचकिचाया, लेकिन राजबीर के इशारे को नज़रअंदाज़ नहीं कर सका। वह चैताली के पास आया, उसके हाथ काँप रहे थे। उसने चैताली के एक मम्मे को हल्के से छुआ। चैताली ने एक गहरी साँस ली, उसका शरीर हल्का सा हिल गया।
राजबीर ने आर्यन को धक्का दिया। "अरे! ऐसे नहीं! ज़ोर से पकड़ो! निचोड़ो!"
आर्यन ने हिम्मत जुटाई और चैताली के दोनों स्तनों को अपने हाथों में भर लिया। उसके मम्मे नरम और मांसल थे, और आर्यन को एक अजीब सी सनसनी महसूस हुई। उसने हल्के से उसके निप्पल को सहलाया।
राजबीर ने आकाश की ओर देखा। "आकाश, तुम भी हाथ साफ करो।"
आकाश ने सिर हिलाया। वह अभी भी थोड़ा डरा हुआ था, लेकिन उसके अंदर की वासना उसे खींच रही थी। उसने चैताली के पेट पर हाथ रखा, फिर धीरे-धीरे ऊपर की ओर ले गया, और उसके दूसरे मम्मे को सहलाने लगा। चैताली का शरीर अब पूरी तरह से उसके हाथों में था।
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आकाश ने सिर हिलाया। वह अभी भी थोड़ा डरा हुआ था, लेकिन उसके अंदर की वासना उसे खींच रही थी। उसने चैताली के पेट पर हाथ रखा, फिर धीरे-धीरे ऊपर की ओर ले गया, और उसके दूसरे मम्मे को सहलाने लगा। चैताली का शरीर अब पूरी तरह से उसके हाथों में था।
राजबीर ने अपने पैंट की ज़िप खोली। उसका लंड बाहर निकल आया, आधा खड़ा हुआ। "अब इस घाघरे को भी उतारो।"
आर्यन और आकाश ने मिलकर चैताली का घाघरा ऊपर उठाया। उसके घाघरे के नीचे एक गुलाबी रंग की पेटीकोट थी, जो उसके जाँघों पर चढ़ी हुई थी। राजबीर ने घाघरे की डोरी खोली, और घाघरा चैताली के पैरों से होता हुआ ज़मीन पर गिर गया।
अब चैताली सिर्फ अपनी पेटीकोट में थीं। उसके हिप्स और जाँघें, जो पेटीकोट के कपड़े के नीचे से दिख रही थीं, भरी हुई और आकर्षक थीं।
राजबीर ने पेटीकोट को भी खींचकर उतार दिया। चैताली अब सिर्फ अपनी गुलाबी रंग की पैंटी में थीं। उसके पैंटी उसके मोटे कूल्हों के बीच फँसी हुई थी, और उसके चूत के उभार को साफ दिखा रही थी। पैंटी का कपड़ा उसके गीलेपन के कारण थोड़ा चिपका हुआ था।
"वाह! क्या नज़ारा है!" राजबीर ने कहा, उसकी आँखें चैताली के शरीर पर नाच रही थीं। उसने अपनी पैंट पूरी तरह से उतार दी, और उसका पूरा लंड अब बाहर था, पूरा खड़ा हुआ, उसकी मुंडी गुलाबी और चमकदार थी।
"आओ आर्यन, पहले तुम।" राजबीर ने कहा। "तुम्हें सबसे ज्यादा शौक था ना?"
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"क्या... क्या करना है सर?" आर्यन की आवाज़ काँप रही थी।
"क्या करना है? जो मन करे, करो!" राजबीर ने कहा। "आज यह तुम्हारी होली का तोहफा है।"
चैताली ज़मीन पर लेटी हुई थीं, उसके आँखें हल्की खुली थीं, लेकिन वह किसी धुंध में थीं। उसके होंठ खुले थे, और वह हल्की-हल्की साँस ले रही थीं। उसके शरीर पर अब सिर्फ पैंटी बची थी।
आर्यन चैताली के पास घुटनों के बल आया। उसने अपना हाथ उसके पैंटी पर रखा। उसने धीरे से पैंटी को नीचे खींचना शुरू किया। चैताली ने एक धीमी सी आवाज़ निकाली, उसके हिप्स हल्के से हिले, लेकिन वह विरोध नहीं कर पाईं।
गुलाबी पैंटी उसके घुटनों तक उतर गई, और फिर पैरों से बाहर निकल गई। चैताली अब पूरी तरह से नग्न थीं। उसके चूत, उसके मोटे होंठ, जो हल्के से खुले हुए थे, गुलाबी और गीले दिख रहे थे। उसके बाल काले और घने थे, जो उसके गुप्त अंगों को ढक रहे थे।
आर्यन ने अपना लंड निकाला, और उसे चैताली की चूत के ऊपर रखा। चैताली की चूत से एक अजीब सी गंध आ रही थी, मीठी और नमकीन। आर्यन ने हल्के से अपनी मुंडी को उसके चूत होंठों पर रगड़ा।
"अंदर डालो!" राजबीर ने आदेश दिया।
आर्यन ने हिम्मत जुटाई। उसने अपना लंड चैताली की चूत के अंदर धकेलने की कोशिश की। चैताली ने एक ज़ोरदार सिसकी भरी, उसके आँखें पूरी तरह से खुल गईं, लेकिन वह अभी भी धुंध में थीं। उसका शरीर हल्का सा उछला।
"आह्ह्ह्ह..." चैताली के मुँह से एक दर्द भरी आवाज़ निकली।
आर्यन को लगा जैसे वह किसी गर्म और गीली चीज़ में घुस रहा है। चैताली की चूत टाइट थी। आर्यन का लंड धीरे-धीरे अंदर जाने लगा। चैताली ने अपने होंठ भींचे, उसके माथे पर पसीने की बूँदें थीं।
आर्यन का लंड पूरी तरह से अंदर चला गया। चैताली के शरीर में एक झटका लगा, और उसने अपने हिप्स को हल्का सा ऊपर उठाया। आर्यन ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए। चैताली के शरीर से एक हल्की सी चीख निकली, लेकिन वह इतनी कमज़ोर थीं कि वह पूरी तरह से चिल्ला नहीं पाईं।
"आह्ह्ह... उफ़्फ़..." चैताली के मुँह से दर्द के मिले-जुले स्वर निकल रहे थे। उसके आँखें कभी खुलतीं, कभी बंद होतीं। उसके शरीर में एक अजीब सी ऐंठन हो रही थी।
आर्यन ने अपनी गति बढ़ाई। उसके लंड की रगड़ से एक श्लिक-श्लिक की आवाज़ आ रही थी, जो कमरे के सन्नाटे में साफ सुनाई दे रही थी। चैताली के हिप्स हर धक्के के साथ ज़मीन पर उठते और गिरते। उसके मम्मे हिल रहे थे, और उसके गुलाबी निप्पल और भी ज़्यादा खड़े हो गए थे।
राजबीर और आकाश दोनों इस नज़ारे को देख रहे थे, उसके साँसें तेज़ हो रही थीं। राजबीर ने अपना लंड अपने हाथ में पकड़ा हुआ था, और उसे सहला रहा था। आकाश का लंड भी पूरी तरह से खड़ा हो चुका था, और वह अपनी पैंट के अंदर से उसे पकड़े हुए था।
आर्यन का शरीर पसीने से भीग गया था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा भाव था, वासना और अपराधबोध का मिश्रण। वह चैताली के अंदर गहराई तक घुस रहा था, और चैताली की चूत की गर्मी उसे पागल कर रही थी।
"बस... बस करो..." चैताली ने धीमी, लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, उसके होंठ काँप रहे थे।
लेकिन आर्यन रुका नहीं। उसने और तेज़ी से धक्के लगाए। चैताली के शरीर से एक आह निकली, और उसके पैर हवा में हल्के से उठ गए। उसके हिप्स ज़मीन पर ज़ोर से टकरा रहे थे, जिससे एक थप-थप की आवाज़ आ रही थी।
"जल्दी करो आर्यन!" राजबीर ने कहा। "हमें भी तो मौका दो।"
आर्यन ने कुछ और ज़ोरदार धक्के लगाए, और फिर उसके शरीर में एक ऐंठन हुई। उसका लंड चैताली के अंदर गरम वीर्य से भर गया। वह चैताली के ऊपर ही गिर पड़ा, हाँफते हुए।
चैताली के शरीर में एक और झटका लगा, और उसके होंठों से एक लंबी सिसकी निकली। उसके शरीर में एक गर्म तरल पदार्थ बहने का एहसास हुआ।
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"हो गया तेरा?" राजबीर ने पूछा।
आर्यन ने सिर हिलाया, उसका चेहरा लाल था।
राजबीर ने आकाश की ओर देखा। "अब तुम्हारी बारी।"
आकाश ने झिझकते हुए अपनी पैंट उतारी। उसका लंड पूरी तरह से खड़ा हुआ था, और वह आर्यन के लंड से थोड़ा मोटा था। आकाश चैताली के पास आया, उसके हाथ काँप रहे थे।
चैताली अभी भी ज़मीन पर लेटी हुई थीं, उसके आँखें आधी खुली थीं। उसके शरीर पर पसीना था, और उसके बाल बिखरे हुए थे। उसके होंठ सूजे हुए थे।
आकाश ने चैताली के पैरों को पकड़ा और उन्हें थोड़ा सा फैलाया। चैताली की चूत अभी गीली और खुली हुई थी, आर्यन के वीर्य से भरी हुई। आकाश ने अपने लंड को चैताली की चूत के ऊपर रखा।
"अंदर डालो!" राजबीर ने फिर से आदेश दिया।
आकाश ने हिम्मत जुटाई, और उसने अपने लंड की मुंडी को चैताली की चूत के खुले होंठों पर रखा। चैताली ने एक धीमी सी आवाज़ निकाली, उसके शरीर में एक हल्की सी ऐंठन हुई।
आकाश ने अपने लंड को अंदर धकेला। चैताली की चूत अभी थोड़ी टाइट थी, लेकिन अब गीली होने के कारण उसका लंड आसानी से अंदर चला गया। चैताली ने एक गहरी साँस ली, उसके होंठों से एक हल्की सी सिसकी निकली।
आकाश ने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए। उसका लंड चैताली के अंदर श्लिक-श्लिक की आवाज़ कर रहा था। चैताली के हिप्स हर धक्के के साथ ऊपर उठते और गिरते। उसके मम्मे हिल रहे थे।
"आह्ह्ह... उफ़्फ़..." चैताली के मुँह से धीमी, दर्द भरी आवाज़ें निकल रही थीं। उसके आँखें अब पूरी तरह से बंद थीं, और उसके चेहरे पर दर्द का भाव था।
आकाश ने अपनी गति बढ़ाई। उसके लंड की रगड़ से चैताली के शरीर में एक अजीब सी सनसनी फैल रही थी। चैताली के शरीर में एक हल्की सी ऐंठन हुई, और उसके पैर हल्के से ऊपर उठ गए।
राजबीर अब चैताली के सिर के पास आया। उसने चैताली के बालों को पकड़ा और उसके सिर को थोड़ा सा ऊपर उठाया। "मज़ा आ रहा है ना चैताली जी?" उसने उसके कान में फुसफुसाया।
चैताली ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उसके होंठों से एक धीमी सी आह निकली।
आकाश ने कुछ और ज़ोरदार धक्के लगाए, और फिर उसके शरीर में एक ऐंठन हुई। उसका लंड भी चैताली के अंदर गरम वीर्य से भर गया। वह चैताली के ऊपर ही गिर पड़ा, हाँफते हुए।
चैताली के शरीर में एक और झटका लगा, और उसके होंठों से एक लंबी सिसकी निकली। उसके शरीर में एक गर्म तरल पदार्थ बहने का एहसास हुआ।
आकाश ने धीरे से अपना लंड चैताली की चूत से बाहर निकाला। उसके लंड पर चैताली के चूत रस और उसके वीर्य का मिश्रण लगा हुआ था। चैताली की चूत से एक चिपचिपा पदार्थ बाहर टपक रहा था।
"अब मेरी बारी।" राजबीर ने कहा, उसकी आँखें चमक रही थीं।
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