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Adultery बेगम
#1
Heart 
बेगम
Writer/Author- Herotic
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Heart Desi Erotica is Love sex
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#2
नया शहर नई उम्मीदें और एक अनजाना डर। जब हम इस मोहल्ले में शिफ्ट हुए, तो अब्बू ने कहा था कि इंसानियत का कोई मजहब नहीं होता। लेकिन जब हम शांति नगर की तंग गलियों में अपना सामान ट्रक से उतार रहे थे, तो मुझे महसूस हुआ कि नाम और हकीकत में बहुत फासला है।

मेरा नाम रेहान है, और मेरी अम्मी, जुबैरा बेगम, इस दुनिया की सबसे पाक और खूबसूरत रूह हैं। वह 40 की उम्र पार कर चुकी हैं, लेकिन उनकी आंखों में आज भी वही मासूमियत और तहजीब है जो किसी को भी मुतासिर कर दे। वह हमेशा अपने उसूलों की पक्की रही हैं - बाहर निकलते वक्त हमेशा काले हिजाब और बुर्के में रहती हैं। उनके लिए पर्दा सिर्फ एक कपड़ा नहीं, उनकी इज्जत और उनकी पहचान का हिस्सा है।

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हमारा नया घर एक पुराने ढंग का दो मंजिला मकान था। ठीक हमारे घर के सामने एक बड़ी सी बालकनी वाला घर था, जहाँ मोहल्ले के कुछ हिं** लड़के अक्सर जमा रहते थे। जब अम्मी पहली बार गाड़ी से उतरी, तो मैंने देखा कि उन लड़कों की बातचीत अचानक थम गई। उनकी निगाहों में वो दोस्ताना चमक नहीं थी जो एक नए पड़ोसी के स्वागत में होनी चाहिए। बल्कि उनकी आंखों में एक अजीब सी 'जिज्ञासा' और 'शरारत' थी। अम्मी ने अपनी नजरें नीची कर रखी थीं और हाथ में कुरान शरीफ का बक्सा थामे हुए संभलकर अंदर चली गईं। लेकिन मुझे पीछे से उनकी फुसफुसाहट सुनाई दी।
 
"देख भाई, नए पड़ोसी आए हैं। मिया जी की बेगम तो बड़ी सलीके वाली लगती हैं," उनमें से एक ने सिगरेट का धुआं उड़ाते हुए कहा।
 
अगले कुछ दिनों में माहौल और भी भारी होने लगा। अम्मी सुबह - सुबह घर के बाहर रखे गमलों में पानी देने निकलतीं, तो सामने वाली बालकनी पर उन लड़कों का मजमा पहले से तैयार रहता। वे सीधे तौर पर कुछ नहीं कहते, लेकिन उनकी खामोशी और उनका लगातार घूरना किसी गाली से कम नहीं था।
 
एक दिन अम्मी बाजार से राशन लेने जा रही थीं। मैं कॉलेज से लौट रहा था कि मैंने देखा वही तीन-चार लड़के अम्मी से कुछ दूरी बनाकर उनके पीछे चल रहे थे। वे आपस में कुछ मजाक कर रहे थे और बार-बार अम्मी के बुर्के और उनके चलने के अंदाज पर टिप्पणी कर रहे थे। अम्मी की चाल तेज हो गई थी। उनकी घबराहट उनके कांपते हाथों से साफ झलक रही थी। जब वह घर के अंदर दाखिल हुईं, तो उन्होंने जल्दी से दरवाजा बंद कर लिया और काफी देर तक सोफे पर बैठकर लंबी-लंबी सांसें लेती रहीं।
 
"बेटा रेहान," उन्होंने धीमी आवाज में मुझसे कहा, "शायद इन लोगों ने पहले कभी हमें करीब से नहीं देखा। घबराना मत, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। बस दुआ करो कि इनकी नीयत में खोट न आए।"
 
लेकिन हालात ठीक होने के बजाय बिगड़ने लगे। अब वो लड़के सिर्फ घूरते नहीं थे, बल्कि अम्मी के घर से बाहर निकलने के वक्त का इंतजार करने लगे थे। जब भी अम्मी छत पर कपड़े सुखाने जातीं, वे लड़के अपनी छत पर चढ़ जाते। वे अक्सर ज़ोर-ज़ोर से हंसते और ऐसी बातें करते जो अम्मी को असहज कर दें। एक बार तो हद हो गई जब उनमें से एक अम्मी के रास्ते में जानबूझकर अपनी बाइक खड़ी कर दी और तब तक नहीं हटाई जब अम्मी ने अपना रास्ता नहीं बदल लिया।
 
अब्बू काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे। मैं सिर्फ 19 साल का था, , गुस्सा तो बहुत आता था लेकिन डर भी था कि कहीं ये मामला सांप्रदायिक न बन जाए। अम्मी हमेशा मुझे रोक देती थीं। वह अपनी खूबसूरती और गरिमा को उस काले पर्दे में छुपाए रखती थीं, लेकिन उन लड़कों की गंदी नीयत उस पर्दे को भी चीर देना चाहती थी।
 
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, मैंने अम्मी को खिड़की के पास रोते हुए देखा। वह डर गई थीं। वह औरत चंद लड़कों की ओछी हरकतों की वजह से अपने ही घर में कैदी बन गई थी।
 
एक दिन की बात है, दोपहर की कड़ी धूप में छत तप रही थी। जुबैरा बेगम ने अपने सर पर दुपट्टे को और मजबूती से लपेटा और गीले कपड़ों की बाल्टी लेकर ऊपर आईं। उन्हें लगा था कि इस वक्त सब सो रहे होंगे और वह सुकून से कपड़े सुखा पाएंगी। लेकिन सामने वाली छत पर वही विक्रम (जो एक 24 साल का हट्टा-कट्ठा लड़का था और उसकी लंबाई करीब 6 फीट थी, दिखने में काफी मस्कुलर था लेकिन सांवला और बदसूरत था, उसके हाथ में एक मोटा कड़ा और कलावा बंधा था जिससे उसका हाथ और ताकतवर दिखता था, पता नहीं पर मुझे उससे थोड़ा डर लगता था) और उसके दो दोस्त पहले से मौजूद थे, जैसे वे सिर्फ उनके बाहर निकलने का इंतज़ार कर रहे थे।

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ज़ुबैरा ने अपनी नज़रें नीची रखीं और जल्दी-जल्दी तार पर कपड़े फैलाना शुरू किया। तभी अचानक हवा का एक तेज़ झोंका चला। ज़ुबैरा के हाथ से उसकी गीली पैंटी फिसल गई। वह उसे पकड़ पाती, उससे पहले ही हवा ने उसे उड़ाकर सीधे सामने वाली बालकनी में फेंक दिया, ठीक विक्रम के पैरों के पास।
 
ज़ुबैरा का चेहरा ज़र्द पड़ गया। शर्म और घबराहट के मारे उनके हाथ कांपने लगे। उन्होंने एक पल के लिए अपने दुपट्टे से खुद को और ढका और मुड़कर नीचे जाने ही वाली थीं कि विक्रम की आवाज़ आई। "अरे जुबैरा जी! आपकी चीज़ हमारे पास आ गिरी है... इतनी जल्दी क्या है?"
 
ज़ुबैरा की हिम्मत नहीं हुई कि वह पलटकर देखें। लेकिन जो नज़ारा वहां चल रहा था, वह किसी भी शरीफ औरत की रूह कंपा देने वाला था। विक्रम ने झुककर उस गीली पैंटी को उठाया। उसके चेहरे पर एक गंदी, शैतानी मुस्कान थी। उसने ज़ुबैरा की तरफ सीधे देखते हुए, उस कपड़े को अपनी नाक के पास ले गया और लंबी सांस भरकर उसे सूंघने लगा। उसके दोस्त ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। "क्या खुशबू है भाई! मिया जी की पसंद तो बड़ी लाजवाब है," उनमें से एक ने सीटी बजाते हुए कहा।
 
ज़ुबैरा की आँखों में आँसू आ गए। वह उस अपमान को सह न सकीं और तेज़ी से सीढ़ियों की तरफ भाग गईं। नीचे आकर उन्होंने ज़ोर से दरवाज़ा बंद किया और दीवार के सहारे बैठ गईं। उनका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि जैसे सीने से बाहर आ जाएगा। वह एक रूढ़िवादी और नेक औरत थीं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी पर्दे और इज्जत के साथ गुज़ारी थी। आज एक मामूली से कपड़े ने उन्हें उन आवारा लड़कों के सामने बेपर्दा और लाचार महसूस करा दिया था।
 
रेहान ने जब अपनी अम्मी को इस हाल में देखा, तो उसे समझ नहीं आया कि क्या हुआ है। "अम्मी, आप रो क्यों रही हैं? क्या हुआ छत पर?" अम्मी ने सिसकते हुए बस इतना कहा, "बेटा, इस शहर में रहना हमारे लिए मुमकिन नहीं लग रहा। यहाँ की हवाओं में ज़हर है।"
 
दिन बिता और रात का सन्नाटा गहरा चुका था, लेकिन रेहान की आँखों से नींद कोसों दूर थी। अम्मी के चेहरे पर जो डर और बेबसी उसने शाम को देखी थी, उसने उसके सीने में एक आग भर दी थी। वह अपने कमरे की बत्ती बुझाकर खिड़की के पास खड़ा हो गया, जहाँ से सामने वाली बालकनी साफ दिखाई देती थी।
Heart Desi Erotica is Love sex
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#3
Very nice update
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#4
Wonderful start
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#5
Ashadaran shuruwat
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#6
Chamatkar writing ✍️ ♥️
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#7
शांति नगर की गलियों में सन्नाटा था, लेकिन सामने वाले घर की बालकनी की लाइट जल रही थी। रेहान ने देखा कि विक्रम वहां अकेला बैठा था, उसके हाथ में एक सिगरेट थी और बगल में शराब की एक बोतल। लेकिन रेहान की नज़रें फटी की फटी रह गईं जब उसने देखा कि विक्रम की गोद में वही सफेद पैंटी पड़ी थी, जो दोपहर में अम्मी के हाथ से छूट गई थी।
 
विक्रम के चेहरे पर एक वहशी मुस्कान थी। उसने सिगरेट का एक गहरा कश लिया और धुआं छोड़ते हुए उस कपड़े को उठाया। रेहान का खून खौल उठा जब उसने देखा कि विक्रम उस कपड़े को अपने चेहरे पर रगड़ रहा था, जैसे वह अम्मी की खुशबू को महसूस करने की कोशिश कर रहा हो।
 
विक्रम बार-बार उस पैंटी को सूंघता और अपनी आँखें बंद कर लेता। वह बुदबुदा रहा था, शायद अम्मी का नाम ले रहा था और कह रहा था आह्ह्ह साली... क्या मादक महक है इस बेगम की... भोसड़ीका पूरा लौंड़ा टाईट हो गया... साली इसकी कच्छी इतनी मादक गंध दे रही है तो... आह्ह्ह... तो साला इसकी बूर कितनी मादक महकती होगी... जुबैरा तेरी... तेरी चूत मारूँ... आह्ह्ह, कुछ देर बाद, उसने अपनी पैंट की बेल्ट ढीली की और कच्छी को अपने लंड से रगड़ने लगा। उसकी हरकतें इतनी भद्दी और घिनौनी थीं कि रेहान को उबकाई आने लगी। वह लड़का उस छोटे से कपड़े को ऐसे सहला रहा था जैसे वह कोई ज़ुबैरा बेगम का जिस्म हो। उसने उस पैंटी को अपने दांतों से पकड़ा और खींचने लगा, उस कच्छी के बुर वाले हिस्से को वो ऐसे चाट रहा था जैसे वो अम्मी की बुर ही चाट रहा हो, उसके चेहरे पर एक ऐसी हवस थी जिसे देख कर कोई भी कांप जाए।
 
रेहान खिड़की के पर्दे के पीछे खड़ा होकर यह सब देख रहा था। उसके हाथ मुट्ठी में भिंच गए थे और नाखून हथेलियों में गड़ रहे थे। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वह लड़का सिर्फ एक कपड़े के साथ नहीं, बल्कि उसकी अम्मी की इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ कर रहा है। वह अपनी अम्मी को एक पाकिज़ा की तरह मानता था, एक ऐसी औरत जिसने कभी किसी पराए मर्द की तरफ आँख उठाकर नहीं देखा था।
 
"यह जानवर मेरी अम्मी के नाम को भी गंदा कर रहा है," रेहान ने दांत पीसते हुए खुद से कहा। रेहान का मन किया कि अभी नीचे जाकर कोई पत्थर उठाए और उस कमीने का सिर फोड़ दे। लेकिन उसे अम्मी की वो बातें याद आ गईं- "बेटा, माहौल खराब है, हमें संभलकर रहना है।" अगर वह अभी बाहर निकलता, तो बात बढ़ जाती और शायद पूरे मोहल्ले में अम्मी की बदनामी हो जाती।
 
विक्रम ने उस जुबैरा की कच्छी को अपनी शर्ट की जेब में ठूंस लिया, जैसे वह उसकी कोई बड़ी जीत हो, और एक आखिरी बार रेहान के घर की बंद खिड़कियों की तरफ देखकर एक भद्दा इशारा किया। रात भर रेहान सो नहीं सका। उसकी आँखों के सामने बार-बार वही मंज़र घूम रहा था। उसे समझ आ गया था कि ये लड़के सिर्फ 'स्टॉक' नहीं कर रहे, बल्कि वे अम्मी को अपनी हवस का निशाना बनाने की साजिश रच रहे हैं।
 
अगली सुबह का सूरज शांति नगर की गलियों में एक अजीब सी बेचैनी लेकर आया। रात भर जागने के बाद रेहान की आँखें लाल थीं, लेकिन उसका ज़हन पूरी तरह सतर्क था। अम्मी ने सुबह की नमाज़ के बाद अपना सबसे साफ़ काला बुर्का निकाला। आज उन्हें शहर की बड़ी मस्जिद में एक खास मजलिस और दुआ के लिए जाना था।
 
अब्बू घर पर नहीं थे, इसलिए अम्मी ने अपनी चप्पलें पहनीं और हिजाब को सलीके से बांधा। जैसे ही वह घर से बाहर निकलीं, मैंने खिड़की की झिरी से देखा - विक्रम अपनी बाइक के पास खड़ा था। उसके चेहरे पर वही कल रात वाली गंदी मुस्कान थी। जैसे ही अम्मी गली के मोड़ पर मुड़ीं, विक्रम ने अपनी बाइक स्टार्ट की और बहुत धीमी रफ़्तार में उनके पीछे हो लिया। मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। मैंने अपनी साइकिल उठाई और फासला रखते हुए उनके पीछे चल दिया।
 
मस्जिद के पास पहुँचकर अम्मी अंदर चली गईं। विक्रम अपनी बाइक खड़ी कर बाहर ही एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। वह बार-बार अपनी जेब को छू रहा था - वही जेब जिसमें उसने अम्मी की वो पैंटी ठूंस रखी थी। करीब एक घंटे बाद दुआ खत्म हुई और अम्मी बाहर आईं। भीड़ काफी थी, लेकिन अम्मी का चेहरा थकान और शायद प्यास से पीला पड़ रहा था।
 
मस्जिद के पीछे का इलाका थोड़ा सुनसान था, जहाँ घनी झाड़ियाँ और कुछ पुराने पेड़ थे। अम्मी को शायद ज़ोर की पेशाब महसूस हुई। उन्होंने इधर-उधर देखा और कोई बाथरूम न पाकर, एक घनी झाड़ी की ओट में चली गईं। विक्रम दबे पाँव उनके पीछे लपका। मैं अपनी साइकिल फेंककर एक दीवार के पीछे छुप गया। मेरा दम घुट रहा था, लेकिन मैं अपनी अम्मी की बेबसी और उस दरिंदे की नीयत को अपनी आँखों से देख रहा था।
 
अम्मी ने अपना बुर्का अठाया और झुककर बैठने लगीं। उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि कुछ फीट की दूरी पर झाड़ियों के बीच से विक्रम की भूखी आँखें उन्हें देख रही थीं। विक्रम झाड़ियों को थोड़ा हटाकर अम्मी को पेशाब करते हुए घूरने लगा। उसके चेहरे पर एक अजीब सा उन्माद था। उसने अपना हाथ अपनी पैंट के अंदर डाल लिया और अम्मी को पेशाब करते देखते हुए खुद को सहलाने लगा।
 
वो हल्की हल्की आवाज में बुदबुदा रहा था आह्ह्ह... साली की बुर से कैसे मूत की धार निकल रही है देखो तो... आह्ह्ह... मन तो कर रहा है जाकर बेगम की मूत की धार में अपना लंड धो लूँ... आह्ह्ह बेगम तो एकदम माल है बैनचो... साली की चूत भी एकदम रसीली लग रही है... मन तो कर रहा है बेगम की मूत पी लूँ... एकदम ताज़ी मूत... आह्ह्ह...ये सब सुनके मेरे रौंगटे खड़े हो गए।
 
अम्मी जैसे ही फारिग होकर उठीं और अपना बुर्का संभालते हुए जल्दी से वहां से निकल गईं, विक्रम अपनी जगह से बाहर नहीं आया। वह तब तक वहीं रुका रहा जब तक अम्मी की आहट दूर नहीं हो गई। फिर जैसे ही अम्मी वहां से ओझल हुईं, विक्रम उस जगह की तरफ भागा जहाँ अम्मी अभी बैठी थीं। मैंने ने देखा कि विक्रम पागलों की तरह ज़मीन पर झुका। वहां सूखी पत्तियों और मिट्टी पर अम्मी के जिस्म से निकला ताजा पेशाब गिरा हुआ था। विक्रम ने आव देखा न ताव, वह उन गीली पत्तियों के ऊपर झुक गया। उसने अपनी नाक उन पत्तियों से सटा दी और अम्मी के पेशाब की तीखी गंध को पागलों की तरह अंदर खींचने लगा। उसके चेहरे पर जो सुकून था, वह किसी शैतान का ही हो सकता था। हद तो तब हो गई जब उसने अपनी जुबान बाहर निकाली और उन पत्तों पर जमी पेशाब की बूंदों को चाटने लगा।
 
रेहान की रूह कांप गई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि कोई इंसान इतना गिर सकता है। उसकी अम्मी, जो वज़ू के बिना कुरान को हाथ नहीं लगाती थीं, उनकी पाकिज़गी को यह लड़का इस हद तक नापाक कर रहा था। विक्रम वहां बैठकर उन पत्तों को ऐसे चूम रहा था जैसे वह कोई कीमती चीज़ हो।
 
रेहान का जी चाह रहा था कि वह वहीं चिल्ला पड़े, लेकिन गला रुंध गया था। उसे समझ आ गया कि विक्रम सिर्फ एक 'स्टॉकर' नहीं है, वह एक मानसिक बीमार और खतरनाक इंसान है जो उसकी अम्मी की हर एक चीज़ का प्यासा है। फिर विक्रम वहां से उठा, अपनी पैंट ठीक की और अपनी जेब से वही पैंटी निकालकर अपने चेहरे पर रगड़ी। वह पूरी तरह से अम्मी के नशे में धुत लग रहा था।
 
दिन बिता और अब रात का पिछला पहर था। घर में सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन रेहान के ज़हन में दिन भर की वो घिनौनी तस्वीरें किसी ज़हरीले नाग की तरह डस रही थीं। उसे नींद नहीं आ रही थी। बेचैनी इतनी बढ़ गई कि वह ताजी हवा के लिए दबे पाँव छत पर चला गया।
 
चाँद की मद्धम रोशनी शांति नगर की छतों पर फैली थी। रेहान की नज़र अनचाहे ही सामने वाले घर की उस खिड़की पर पड़ी जो विक्रम के कमरे की थी। वहाँ मद्धम पीली लाइट जल रही थी और पर्दा आधा हटा हुआ था। रेहान का दिल ज़ोर से धड़का। उसे लगा शायद विक्रम फिर से वही घिनौनी हरकतें कर रहा होगा, लेकिन जो उसने देखा, उसने उसके पैरों तले से ज़मीन खिसका दी।
 
रेहान की साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। खिड़की के उस पार बिस्तर पर दो जिस्म एक-दूसरे में उलझे हुए थे। उसकी रूह कांप उठी जब उसने पहचाना कि वे कौन थे।
 
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#8
Dhasu upload bro eagerly waiting for next
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#9
Ekdum terrific update
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#10
(07-04-2026, 12:43 PM)Killerkd Wrote: Dhasu upload bro eagerly waiting for next
thanks bro...aur kal naya update aayega.
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#11
(07-04-2026, 12:43 PM)Farjana Mim Wrote: Ekdum terrific update
 thanks
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#12
Waah! Bahut khoob!
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#13
(07-04-2026, 01:20 PM)Glenlivet Wrote: Waah! Bahut khoob!

thanks
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#14
Lovely writing ✍️
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#15
अब तक आपने देखा...

जुबैरा बेगम अपने बेटे रेहान और शौहर सलीम के साथ नये शहर में आईं और शांति नगर नाम के मोहल्ले में रह रही हैं, जो कि एक हिं** बहुल इलाका है। इसी मोहल्ले में उनके घर के सामने विक्रम नाम का लड़का रहता है, जो कि थोड़ा बदमाश किस्म का लड़का है और वो जुबैरा से गलत तरीके से आकर्शीत हो चुका है। शायद वो जुबैरा कि पाकिजगी के साथ कोई खेल खेलना चाहता है, और इसका अंदाज़ा जुबैरा के बेटे रेहान को लग चुका है।
 
अब आगे-
[फ्लैशबैक] रेहान... बेटा मैंने कितनी बार समझाया है तुम्हें कि लड़ाई-झगड़ा करना बुरी बात है... पर आप तो अम्मी की बात कहाँ सुनते हो... हुँह... जाओ आपकी अम्मी आपसे गुस्सा है अम्मी ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए मुझे बोला क्योंकि उस दिन मैंने अपने स्कुल के वक्त के दोस्तों के साथ झगड़ा कर लिया था।
 
पर अम्मी... मैं तो आपका शहज़ादा हूँ ना... अब से मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा... सॉरी अम्मी मैंने जैसे ही सुबकते हुए बोला, अम्मी तुरंत मुझसे लिपट गईं और मुझे बेतहाशा चुमने लगीं, हाँ मेरे शहज़ादे... आप मेरी जान हो... अम्मी को आपकी फिक्र है रेहान, इसलिए आप अपनी अम्मी के लिए ये लड़ाई-झगड़े कभी मत करना... हाँ?” अम्मी कि आँखों में अपने कोख से जन्में शहज़ादे के लिए प्यार देख कर उस दिन मैंने ठान लिया था कि कुछ भी हो, अपनी अम्मी को मैं दुनियाँ की सारी खुशियाँ दूँगा। [फ्लैशबैक एन्ड]
 
रेहान की सासें जैसे गले में अटक गईं। खिकी के उस पार, िस्तर पर दो जिस्म एक-दूसरे में झे हुए थे। उसकी रूह कांप उठी ज उसने हचाना कि वे कौन थे।
 
उसकी अम्मी, जुबैरा बेगम, जो हमेशा सर से पैर तक बुर्के और हया के पर्दे में रहती थीं, उस वक्त पूरी तरह नंगी थीं। उनकी गोरी पीठ बिस्तर की सफेद चादर पर फैली हुई थी। उनकी वो टांगें, जिन्हें आज तक किसी गैर मर्द ने क्या, खुद रेहान ने भी कभी नहीं देखा था, आज पूरी तरह फैली हुई थीं और विक्रम के कंधों के पास थीं।
 
विक्रम पूरी तरह नंगा होकर जुबैरा के ऊपर चढ़ा हुआ था। उसका भारी और काला जिस्म जुबैरा के नाजुक बदन को दबाए हुए था। रेहान ने फटी आँखों से देखा कि विक्रम का सांढ़ जैसा 9 इंच का मोटा काला लंड जुबैरा की बुर की गहराई तक धंसा हुआ था। वह जानवर की तरह झटके ले रहा था और हर झटके के साथ जुबैरा का बदन ऊपर-नीचे हो रहा था।
 
रेहान को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसकी नेक अम्मी, जो पाँच वक्त की नमाज़ी थीं, वह इस दरिंदे के नीचे कैसे हो सकती थीं? विक्रम की मेहनत और रफ़्तार बढ़ती जा रही थी। वह जुबैरा की चुचियों को बुरी तरह भींच रहा था और उनके चेहरे के करीब जाकर कुछ गंदा बुदबुदा रहा था।
 
जुबैरा की आँखें बंद थीं और उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेबसी और पीड़ा के भाव थे, या शायद वह किसी गहरे डर के साये में थीं। विक्रम का लंड हर बार पूरी ताकत से अंदर जाता और बाहर आता, जिससे एक गीली और चिपचिपी आवाज़ पैदा हो रही थी जो सन्नाटे को चीर रही थी। रेहान का दिमाग सुन्न हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी अम्मी वहाँ अपनी मर्जी से थीं या उस रात वाली पैंटी और पेशाब वाली घटना के बाद विक्रम ने उन्हें किसी तरह के ब्लैकमेल के जाल में फंसा लिया था।
 
विक्रम ने जुबैरा की टांगों को और चौड़ा किया और अपनी कमर को तेज़ी से चलाने लगा। जुबैरा के मुँह से सिसकियां निकल रही थीं जिन्हें विक्रम अपने हाथों से दबा रहा था। रेहान को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका पूरा संसार उजड़ गया हो। उसकी अम्मी की वो पाकिज़गी, वो इज्जत, जिसे वह पूरी दुनिया से बचाना चाहता था, आज उस हिं** लड़के के पैरों तले रौंदी जा रही थी।
 
रेहान वहीं छत पर घुटनों के बल बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन सीने में नफरत की आग जल रही थी। रेहान की आँखों के सामने जो मंज़र था, उसने उसके वजूद की नींव हिला दी थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जो अम्मी कल तक पराये मर्दों की परछाई से भी बचती थीं, वो आज उस दरिंदे के बिस्तर पर बेबस और नग्न पड़ी थीं। आखिर यह सब हुआ कैसे?
 
रेहान ने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए और उसे याद आया कि शाम को जब अम्मी घर लौटी थीं, तो उनके हाथ में एक लिफाफा था और उनकी आँखें सूजी हुई थीं। अम्मी जब मस्जिद से लौट रही थीं, तो विक्रम ने अपनी बाइक उनके ठीक सामने अड़ा दी थी। सुनसान गली में अम्मी का रास्ता रोककर उसने अपनी जेब से वह सफेद पैंटी निकाली, जिसे उसने रात भर अपनी हवस का निशाना बनाया था।
 
"अरे बेगम साहिबा, यह पहचानती हैं?" विक्रम ने नीचता की हद पार करते हुए उसे अम्मी के चेहरे के पास लहराया। "और हाँ, मेरे पास सिर्फ यह कपड़ा नहीं है... मेरे पास वो वीडियो भी है जब आप झाड़ियों में बैठी थीं।" ये सुनके जुबैरा बेगम का खून जम गया। दे... देखिए आप ये गलत कर रहे हैं...उनके लिए पर्दा ही उनकी ज़िंदगी थी। अगर यह बात मोहल्ले में फैल जाती या अब्बू तक पहुँच जाती, तो उनके खानदान की इज्जत मिट्टी में मिल जाती। विक्रम ने इसी कमजोरी का फायदा उठाया।
 
"अगर चाहती हो कि यह राज़ राज़ ही रहे, तो आज रात 12 बजे मेरे घर के पिछले दरवाज़े से अंदर आ जाना। वरना कल सुबह यह वीडियो और यह कपड़ा तुम्हारे शौहर के हाथ में होगा।" जुबैरा बेगम रात भर तड़पती रहीं। उन्होंने मुसल्ले पर बैठकर गिड़गिड़ाकर इन सब चीजों का खत्म हो जाने कि दुआ मांगी, लेकिन सामने बदनामी का खौफनाक मंज़र था। एक रूढ़िवादी समाज में एक **स्लिम औरत के लिए बेपर्दा होने का मतलब मौत से बदतर था।
 
रात के अंधेरे में, जब उन्हें लगा कि रेहान सो गया है, वह दबे पाँव घर से निकलीं। विक्रम अपने कमरे में उनका इंतज़ार कर रहा था। जैसे ही जुबैरा अंदर दाखिल हुईं, विक्रम ने दरवाज़ा बंद कर दिया। "बुर्का उतारो," विक्रम ने हुक्म दिया। जुबैरा की आँखों से आँसू बह रहे थे। उनके कांपते हाथों ने एक-एक करके अपनी इज्जत की परतों को उतारा। जब वह पूरी तरह नंगी हो गईं, तो विक्रम की आँखों में वही वहशीपन जाग उठा जो रेहान ने कल देखा था।
 
विक्रम ने जुबैरा को बिस्तर पर धक्का दिया। जुबैरा ने अपनी टांगों को सिकोड़कर खुद को ढकने की कोशिश की, लेकिन विक्रम ने झपटकर उनकी टांगों को फैला दिया। विक्रम ने अम्मी के नाजुक बदन पर अपने गंदे हाथ फेरे। उसने जुबैरा के होंठों को कुचलते हुए अपनी उंगलियां उनकी बुर के अंदर डाल दीं। जुबैरा दर्द और शर्म से कराह उठीं, लेकिन विक्रम को कोई फर्क नहीं पड़ा।
 
विक्रम ने अपना भारी और काला लंड निकाला और बिना किसी रहम के जुबैरा की बुर के द्वार पर रख दिया। एक ज़ोरदार झटके के साथ उसने खुद को अंदर धकेल दिया। जुबैरा की चीख उनके गले में ही दब गई क्योंकि विक्रम ने अपना हाथ उनके मुँह पर रख दिया था। रेहान खिड़की से देख रहा था कि विक्रम किस तरह उसकी अम्मी के पाकिज़ा जिस्म को रौंद रहा था। विक्रम की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी, वह गहरे और तेज़ झटके ले रहा था, जिससे जुबैरा का पूरा बदन बिस्तर पर उछल रहा था। हर झटके के साथ जुबैरा की रूह टूट रही थी और रेहान का दिल नफरत की आग में जल रहा था।
 
अगली सुबह का सूरज शांति नगर के लिए रोज जैसा ही था, लेकिन हमारे घर के अंदर की हवा भारी और ज़हरीली हो चुकी थी। रात भर जागने के बाद मेरी आँखें जल रही थीं, जैसे उनमें किसी ने मिर्च झोंक दी हो। मैंने खुद को बिस्तर पर पड़े रहने का नाटक किया जब मैंने अम्मी के दबे पाँव कमरे में दाखिल होने की आहट सुनी। वह फज्र की अज़ान से ठीक पहले वापस आई थीं।
 
मैंने कंबल के भीतर से देखा। अम्मी का हुलिया देख कर मेरा कलेजा मुँह को आ गया। उनका वो सफेद चेहरा, जो नूर से भरा रहता था, आज राख जैसा काला पड़ गया था। उनके बाल बिखरे हुए और बुर्के के नीचे से उनकी गर्दन पर नीले निशान साफ दिख रहे थे वो उस दरिंदे विक्रम के दाँतों और उंगलियों के निशान थे।
 
अम्मी सीधा गुसलखाने में गईं। काफी देर तक पानी गिरने की आवाज़ आती रही। मुझे महसूस हो रहा था कि वह सिर्फ अपने बदन को नहीं, बल्कि उस नापाक छुअन को धोने की कोशिश कर रही थीं जो विक्रम ने रात भर उनके जिस्म पर छोड़ी थी। जब वह बाहर निकलीं, तो उन्होंने मुसल्ला बिछाया। लेकिन आज उनकी दुआओं में वो सुकून नहीं था; वह बस बुत बनी बैठी रहीं, उनकी आँखों से आँसू गिर रहे थे।
 
करीब नौ बजे, मैं हिम्मत जुटाकर अपनी खिड़की के पास गया। सामने वाली बालकनी पर विक्रम अपनी बनियान में खड़ा था, हाथ में चाय का कप लिए। उसके चेहरे पर एक ऐसी जीत की चमक थी जो मुझे अंदर तक काट रही थी। तभी अम्मी रसोई की खिड़की के पास आईं। जैसे ही विक्रम की नज़र उन पर पड़ी, उसने झटके से अपनी जेब से वही सफेद पैंटी निकाली और उसे अपने चेहरे से सटाकर एक गहरी सांस ली। उसने अम्मी की तरफ देखकर अपनी जीभ अपने होंठों पर फेरी - वही इशारा जो उसने रात को बिस्तर पर किया था। अम्मी के हाथ से कांच का गिलास छूटकर गिर गया। वह थर-थर कांपने लगीं और फौरन पीछे हट गईं।
 
मुझसे अब और देखा नहीं जा रहा था। मेरी अम्मी, जो मेरे लिए खुदा का रूप थीं, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थीं जहाँ मौत भी उन्हें आसान लग रही होगी। मुझे पता था कि विक्रम अब रुकने वाला नहीं है। वह इस ब्लैकमेल के ज़रिए अम्मी को रोज़ उस नर्क में बुलाएगा।
 
मैंने अपने अलमारी के पीछे छुपाकर रखा हुआ वो पुराना जंग लगा चाकू निकाला जो मैंने पिछले महीने कबाड़ से उठाया था। मेरा दिमाग अब सिर्फ एक ही चीज़ सोच रहा था, बदला। अब्बू अगले दो दिन तक नहीं आने वाले थे। दोपहर को जब मोहल्ला सोता है, विक्रम अक्सर अपने नीचे वाले कमरे में अकेला रहता है। वह मोबाइल, जिसमें उसने अम्मी की वो वीडियो छुपा रखी थी जिसने मेरी अम्मी को उसकी रखैल बनने पर मजबूर कर दिया था।
 
करीब दो बजे जब गलियों में सन्नाटा छा गया, मैंने देखा कि विक्रम का मुख्य दरवाज़ा आधा खुला है। शायद वह नशे में था या उसे यकीन था कि इस मोहल्ले में उसे कोई हाथ लगाने वाला नहीं है। मैंने चुपके से घर का पिछला दरवाज़ा खोला। हाथ में चाकू और दिल में नफरत लिए, मैं सीधे उस घर की तरफ बढ़ा जहाँ मेरी अम्मी की इज़्ज़त की नीलामी हुई थी।
 
रेहान का हाथ उस जंग लगे चाकू के हैंडल पर कस गया था, लेकिन जैसे ही उसने विक्रम के घर की दहलीज पर कदम रखना चाहा, उसके कदम जम गए। सामने वाली गली में विक्रम के तीन-चार तगड़े दोस्त रॉयल एनफील्ड बुलेट पर सवार होकर आए और ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने लगे। विक्रम ने ऊपर से उन्हें हाथ हिलाया।
 
रेहान को अपनी कमजोरी का अहसास हुआ। विक्रम कद-काठी में उससे दोगुना था, ताकतवर था और इस हिं** बहुल इलाके में उसका रसूख था। अगर रेहान ने कुछ किया और पकड़ा गया, तो बात सिर्फ खून-खराबे तक नहीं रुकती, पूरे मोहल्ले में दंगा भड़क सकता था और अम्मी की बदनामी का वो वीडियो हर मोबाइल तक पहुँच जाता।
 
"नहीं... अभी नहीं," रेहान ने दांत पीसते हुए खुद को रोका और दबे पाँव अपने घर की तरफ लौट आया। घर के अंदर अजीब सी घुटन थी। रेहान को लगा कि अम्मी शायद सो रही होंगी। वह उनसे नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, लेकिन एक अनजानी बेचैनी उसे अम्मी के कमरे की तरफ खींच ले गई। कमरे का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला था।
 
रेहान ने जब झिरी से अंदर झांका तो जो उसने देखा, उसने उसके दिमाग की नसें हिला दीं।
 
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#16
फिर क्या हुआ?
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#17
Absolutely superbly written update. Hats off.
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#18
रेहान ने जब झिरी से अंदर झांका तो जो उसने देखा, उसने उसके दिमाग की नसें हिला दीं।

अम्मी बिस्तर पर लेटी हुई थीं, उनकी कमीज़ कमर तक ऊपर उठी हुई थी और सलबार नीचे पड़ी हुई थी। उनके सफेद सुडौल पैर फैले हुए थे। रेहान ने देखा कि अम्मी की आँखें बंद थीं और उनके चेहरे पर एक ऐसी कैफियत थी जिसे समझ पाना मुश्किल था वो दर्द था, या रात की उस दरिंदगी का कोई गहरा असर।
 
अम्मी का दाहिना हाथ उनके उनकी बुर की गहराइयों में उतरा हुआ था। उनकी उंगलियां बड़ी तेज़ी और बेताबी से अंदर-बाहर हो रही थीं। अम्मी के होंठों से बहुत धीमी सिसकियां निकल रही थीं। "या अ**ह... मुझे माफ करना..." वह बुदबुदा रही थीं, लेकिन उनकी उंगलियों की रफ़्तार रुक नहीं रही थी।
 
रेहान को समझ आया कि रात को विक्रम ने जिस तरह उनके जिस्म को रौंदा था, उसने अम्मी के अंदर की किसी दबी हुई आग या उस दहला देने वाले अनुभव की एक ऐसी याद छोड़ दी थी जिसे वह अब खुद ही कुरेद रही थीं। उनका बदन रह-रह कर कमान की तरह अकड़ जाता।
 
रेहान वहीं जम गया। उसे नफरत भी हो रही थी और अपनी अम्मी की हालत पर तरस भी आ रहा था। क्या विक्रम ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया था कि अब वह खुद अपनी हया को अपने ही हाथों खत्म कर रही थीं? या फिर विक्रम की उस मर्दानगी ने अम्मी के अंदर के दबे अरमानों को किसी गलत तरीके से जगा दिया था?
 
अम्मी की उंगलियां जब अपनी चरम सीमा पर पहुँचीं, तो उन्होंने अपने दांतों तले अपना दुपट्टा दबा लिया ताकि आवाज़ बाहर न जाए। उनका पूरा बदन पसीने से तर-बतर हो गया और वह निढाल होकर गिर पड़ीं। रेहान ने अपनी आँखें फेर लीं। उसे महसूस हुआ कि अब बात सिर्फ ब्लैकमेलिंग की नहीं रह गई थी; विक्रम ने अम्मी के जिस्म और रूह, दोनों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया था। रेहान का दम घुटने लगा। कमरे के बाहर खड़ा वह अपनी अम्मी की उस हालत को देखकर सुन्न पड़ गया था। जिस औरत को उसने हमेशा एक पाक और मुकद्दस मूरत माना था, आज वह अपने ही बिस्तर पर अपनी हया की चादर समेटे, उन यादों के साथ उलझी हुई थी जो उसे उस विक्रम ने दी थीं।
 
रेहान वहां से हटकर अपने कमरे की तरफ भागा और खुद को बिस्तर पर गिरा दिया। उसके दिमाग में एक ही सवाल गूंज रहा था, "क्या अम्मी अब सचमुच विक्रम की हवस की आदी हो रही हैं, या यह सिर्फ उस जुल्म का असर है जो कल रात उन पर हुआ?"
 
सूरज ढलने को था। अम्मी कमरे से बाहर आईं, उनका चेहरा धुला हुआ था और आँखें झुकी हुई थीं। उन्होंने दोपहर के उस मंज़र का कोई निशान अपने चेहरे पर नहीं रहने दिया था। वह चुपचाप किचन में चली गईं और रात का खाना बनाने लगीं। तभी अचानक गली में एक पत्थर आकर हमारे आंगन में गिरा। पत्थर के साथ एक कागज़ का टुकड़ा लिपटा हुआ था। रेहान ने लपककर उसे उठाया। कागज़ पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था, "आज रात 1 बजे फिर से वही दरवाज़ा खुला मिलेगा। अगर नहीं आई, तो सुबह मोहल्ले के व्हाट्सएप ग्रुप पर तुम्हारा वो झाड़ियों वाला जलवा और उस पैंटी के साथ मेरा खेल वायरल हो जाएगा। इंतज़ार रहेगा, बेगम साहिबा।"
 
रेहान का खून खौल उठा। उसने अम्मी की तरफ देखा। अम्मी के हाथ में बेलन था, लेकिन वह उसे चला नहीं पा रही थीं। उन्होंने रेहान के हाथ से वो कागज़ छीन लिया और उसे पढ़ते ही उनकी चीख निकल गई। वह वहीं ज़मीन पर बैठ गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं।
 
"बेटा, मैं क्या करूँ?" अम्मी ने सिसकते हुए रेहान की तरफ देखा। उनकी आँखों में वही खौफ था जो एक हिरनी की आँखों में शेर को देखकर होता है। "वह शैतान मुझे नहीं छोड़ेगा। तेरे अब्बू आएंगे तो मैं उन्हें क्या मुँह दिखाऊंगी? वह मुझे मार डालेंगे, या शायद खुदकुशी कर लेंगे।"
 
रेहान ने अम्मी के कांपते हाथों को पकड़ा। उसे पता था कि वह विक्रम से सीधे नहीं लड़ सकता, लेकिन वह अपनी अम्मी को उस नर्क में दोबारा जाते हुए भी नहीं देख सकता था। "अम्मी, आप मत जाओ," रेहान ने धीमी आवाज़ में कहा। "नहीं गई तो वह बर्बाद कर देगा रेहान! उसने मेरा सब कुछ छीन लिया है, अब वो मेरी इज़्ज़त को बीच बाज़ार नीलाम करेगा," अम्मी ने बदहवासी में कहा और अपने कमरे की तरफ दौड़ गईं।
 
दिन बिता और रात के एक बज रहे थे। रेहान ने खिड़की से देखा। अम्मी ने अपना वही काला बुर्का पहना। लेकिन उनकी चाल में इस बार वो हिचकिचाहट नहीं थी जो कल थी। शायद दोपहर की उस हरकत ने उनके अंदर के डर को एक अजीब सी बेबाकी में बदल दिया था। वह दबे पाँव घर से निकलीं और सीधे विक्रम के घर के पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ीं। विक्रम वहां पहले से खड़ा सिगरेट पी रहा था। जैसे ही अम्मी करीब पहुँचीं, विक्रम ने उनका हाथ पकड़ा और झटके से उन्हें अंदर खींच लिया।
 
रेहान फिर से अपनी छत पर पहुँच गया। खिड़की का पर्दा आज भी आधा खुला था। अंदर जाते ही विक्रम ने अम्मी को दीवार से सटा दिया। उसने उनके बुर्के को ऊपर से फाड़ना शुरू किया और उन्हें कुछ ही पलों में नंगा कर दिया। अम्मी ने एक बार भी विरोध नहीं किया। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और विक्रम के उन हाथों को अपने बदन पर महसूस करने लगीं।
 
विक्रम ने उन्हें बिस्तर पर पटका और उनकी टांगों को इतनी ज़ोर से खींचा कि अम्मी के मुँह से सिसकारी निकल गई। विक्रम ने अपना वही काला और मोटा लंड बाहर निकाला और अम्मी के चेहरे के पास ले जाकर उन्हें उसे चूमने पर मजबूर किया।
 
रेहान की आँखों के सामने उसकी अम्मी उस दरिंदे की हर गंदी फरमाइश पूरी कर रही थी। विक्रम ने उन्हें उल्टा लेटाया और पीछे से उन पर वार करने लगा। अम्मी का बदन हर धक्के के साथ हिल रहा था, और उनके हाथ बिस्तर की चादर को कसकर जकड़े हुए थे।
 
ऐसे ही कुछ दिन बीते और आज रा**वमी का दिन था। पूरे शांति नगर में भ*वा झंडे लहरा रहे थे और लाउडस्पीकर पर भजनों का शोर गूंज रहा था। सुबह से ही लड़कों की टोलियां चंदा इकट्ठा करने के लिए घर-घर जा रही थीं। अब्बू अभी भी शहर से बाहर थे, इसलिए घर की जिम्मेदारी अम्मी और मुझ पर थी।
 
दोपहर के वक्त, जब धूप तेज़ थी, हमारे दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हुई। मैंने खिड़की से झांका तो वही विक्रम, उसके साथ वही तीन-चार आवारा लड़के और कुछ नए चेहरे हाथ में रसीद बुक लिए खड़े थे। उनके गले में केसरिया गमछे थे और आँखों में वही पुरानी वहशी चमक। अम्मी ने डरते हुए अपना दुपट्टा सर पे डाला और दरवाज़ा खोला। मैं उनके ठीक पीछे खड़ा था।
 
"कैसी हैं, जुबैरा जी!" विक्रम ने अपनी आवाज़ में एक अजीब सी खनक लाते हुए कहा। "रा**वमी का उत्सव है, मोहल्ले का नया घर है आपका, तो चंदा तो बनता है।" अम्मी ने कांपते हाथों से 500 का नोट आगे बढ़ाया। "ये लीजिए... " विक्रम ने नोट लेने के बहाने अम्मी की उंगलियों को कसकर पकड़ लिया। अम्मी ने झटके से हाथ पीछे खींचना चाहा, लेकिन विक्रम की पकड़ मजबूत थी। उसके पीछे खड़े लड़कों ने ज़ोर का ठहाका लगाया।
 
"अरे जुबैरा जी, इतनी जल्दी क्या है? अभी तो हमें रसीद काटनी है," विक्रम ने अपनी आवाज़ नीची की और अम्मी के कान के पास झुककर बोला, जिसे सिर्फ मैं और अम्मी सुन सकते थे। "रात को तो बड़ी फुर्ती दिखाती हो, अभी इतना शर्मा क्यों रही हो?" तभी उसके एक दोस्त ने, जो बगल में खड़ा था, जानबूझकर अपना कंधा अम्मी के सीने से टकराया। अम्मी पीछे की दीवार से जा लगीं। "भाई, मिया जी के घर की मिठाई तो बड़ी रसीली लगती है, क्यों?" दूसरे लड़के ने अम्मी को ऊपर से घूरते हुए कहा। "सुना है अंदर का माल बड़ा सफेद और कीमती है।"
 
विक्रम ने रसीद देने के बहाने अपना हाथ अम्मी के कंधे पर रखा और धीरे से नीचे की तरफ सरकाते हुए उनकी पीठ पर फेरने लगा। अम्मी जैसे पत्थर की बन गई थीं। उनके बुर्के के अंदर उनका बदन थर-थर कांप रहा था। "क्यों बेगम, रात वाला 'प्रसाद' अच्छा लगा या आज फिर से ताज़ा चाहिए?" विक्रम ने अपनी आँख मारी और अम्मी के हिजाब के पास लटकते एक धागे को खींचते हुए उनके गाल को अपनी उंगलियों से छू दिया।
 
अम्मी की आँखों में खौफ और शर्म का सैलाब था। वह अपनी ही चौखट पर अपने जवान बेटे के सामने नीलाम हो रही थीं। लेकिन उन्होंने पलटकर जवाब नहीं दिया। उनकी पलकें झुकी हुई थीं और उनके होंठों से बस एक धीमी सी सिसकी निकली। वह जानती थीं कि अगर उन्होंने शोर मचाया, तो विक्रम वहीं सबके सामने वो वीडियो चला देगा। वह यह भी जानती थीं कि ये लड़के सिर्फ चंदा लेने नहीं आए थे, बल्कि उन्हें यह अहसास कराने आए थे कि अब वह उनकी जागीर बन चुकी हैं।
 
जैसे ही वो लड़के हंसते हुए आगे बढ़े, विक्रम ने पीछे मुड़कर अम्मी को एक गंदा इशारा किया और अपनी जेब पर हाथ मारा, जहाँ शायद उसने अब भी वो पैंटी छुपा रखी थी। मैंने देखा कि अम्मी जैसे ही अंदर आईं, उन्होंने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी। वह वहीं फर्श पर बैठ गईं और अपने चेहरे को हाथों से ढंक लिया। उनके कंधे बुरी तरह हिल रहे थे। "अम्मी..." मैंने उनके पास जाकर हाथ रखना चाहा।
 
"मुझसे दूर रहो रेहान!" अम्मी चिल्लाईं, उनकी आवाज़ में नफरत और आत्म-घृणा थी। "मैं नापाक हो चुकी हूँ... मैं इस घर की इज़्ज़त नहीं रही।", रेहान ने देखा कि अम्मी अपने उस कंधे को कमीज़ के ऊपर से ही ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थीं जहाँ विक्रम ने छुआ था, जैसे वह उस गंदी छुअन की परत को खाल से उतार देना चाहती हों। लेकिन उनकी आँखों की वो चमक बुझ चुकी थी।
 
रात का सन्नाटा गहरा चुका था। रा**वमी का शोर अब शांत हो चुका था, लेकिन विक्रम के कमरे के अंदर एक अलग ही किस्म की दरिंदगी अपना नंगा नाच दिखा रही थी। अम्मी फर्श पर बेदम पड़ी थीं, उनका शरीर पसीने से तरबतर था और उनकी रूह ज़ख्मों से छलनी। विक्रम ने उन्हें पिछले एक घंटे से अपनी हवस का निशाना बनाया हुआ था, जैसे वह कोई इंसान नहीं बल्कि एक बेजान खिलौना हों।
 
विक्रम ने अपनी पैंट की जिप बंद की और बिस्तर के कोने पर रखे उस लिफाफे को उठाया। उसने जुबैरा के चेहरे पर थूकते हुए वह सफेद पैंटी निकाली, वही कपड़ा जिसने इस पूरे खेल की शुरुआत की थी। "ले, उठा इसे! अपनी ये गंदगी अपने साथ ले जा," विक्रम ने पैंटी को अम्मी के चेहरे पर जोर से दे मारा। "उस दिन बड़ी सफाई से सुखा रही थी न इसे छत पर? अब ये उतनी ही गंदी है जितनी कि तू खुद है।"
 
अम्मी की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने कांपते हाथों से उस कपड़े को उठाया, जो अब विक्रम की गंदगी से सना हुआ था। विक्रम ने उनके बाल पकड़े और उनका सर ऊपर की तरफ झटका। उसकी आँखों में नफरत और हवस का एक घिनौना मिश्रण था। "क्या लगा था तुझे? कि तू बहुत बड़ी पाकिज़ा औरत है? अब देख अपनी औकात। तू कुछ नहीं है, बस एक रांड है मेरे लिए... म**ब की बड़ी दुहाई देती थी न? कहाँ गया तेरा पर्दा? अब तू सिर्फ एक रांड है जिसे मैंने अपने पैरों के नीचे रौंदा है," विक्रम ने हँसते हुए कहा। "सुन रही है न? तू एक छिनाल है। अपने मियां के पीछे मेरे पास आती है... तुझे शर्म नहीं आती? तू तो असल में एक स्लट है जिसे तड़पाने में मुझे मज़ा आता है।"
 
अम्मी ने अपने कपड़े को समेटा। उनके कानों में वो गालियां किसी तेजाब की तरह गिर रही थीं। वह औरत, जो कल तक इस मोहल्ले की सबसे प्रतिष्ठित महिला मानी जाती थी, आज एक आवारा लड़के के सामने नग्न और अपमानित खड़ी थी। विक्रम ने उन्हें धक्का देकर दरवाज़े की तरफ कर दिया। "निकल यहाँ से! और याद रखना, कल फिर इसी वक्त आएगी। अगर एक मिनट की भी देरी हुई, तो वीडियो पूरी दुनिया देखेगी। जा, अपनी इस नापाकी को धो ले, लेकिन मेरा निशान तेरे जिस्म से कभी नहीं जाएगा।"
 
रेहान छत से यह सब देख रहा था। उसने देखा कि अम्मी जब घर के अंदर दाखिल हुईं, तो उनके हाथ में वही पैंटी थी जिसे वह अब सीने से लगाकर सिसक रही थीं। उनके कानों में विक्रम की वो गालियां गूंज रही थीं- 'रांड', 'स्लट', 'छिनाल'। रेहान ने अपनी मुट्ठियां इतनी ज़ोर से भींचीं कि उसके नाखूनों से खून निकलने लगा। उसे समझ आ गया था कि विक्रम ने अम्मी को सिर्फ जिस्मानी तौर पर नहीं, बल्कि मानसिक तौर पर भी खत्म कर दिया है। वह अब खुद को वही समझने लगी थीं जो विक्रम उन्हें बुला रहा था।
 
अम्मी जब विक्रम के घर से लौटीं, तो उनकी हालत किसी ज़िंदा लाश जैसी थी। वह सीधा गुसलखाने में चली गईं। बाहर खड़े रेहान को बस गिरते हुए पानी की तेज़ आवाज़ और बीच-बीच में अम्मी की दबी हुई सिसकियाँ सुनाई दे रही थीं। लगभग एक घंटे बाद जब अम्मी बाहर निकलीं, तो उनका चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ चुका था और बाल गीले थे। उन्होंने रेहान की तरफ देखा भी नहीं और नज़रें झुकाए अपने कमरे में चली गईं।
 
रेहान के अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी। वह दबे पाँव बाथरूम के अंदर गया। वहाँ भाप भरी हुई थी और साबुन की महक के साथ एक अजीब सी भारी गंध घुली हुई थी। बाथरूम के कोने में रखे कपड़ों के टब के ऊपर वही सफेद पैंटी पड़ी थी, जिसे विक्रम ने अम्मी के मुँह पर दे मारा था। वह गीली थी, शायद अम्मी ने उसे धोने की कोशिश की थी, लेकिन उस पर अभी भी कुछ दाग और उस दरिंदे की वहशी छुअन के निशान बाकी थे।
 
रेहान की साँसें तेज़ हो गईं। उसने कांपते हाथों से उस कपड़े को उठाया। रेहान ने उस पैंटी को अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसके दिमाग में वे सारे मंज़र घूमने लगे जो उसने खिड़की से देखे थे - अम्मी का वो नंगा बदन, विक्रम के काले हाथ और वह गंदी गालियां। एक पल के लिए रेहान के अंदर का शैतान जाग उठा। उसने उस पैंटी को धीरे-धीरे अपने चेहरे के करीब लाया। वह उस खुशबू को महसूस करना चाहता था जिसमें उसकी अम्मी की जिस्म का गंध और विक्रम की दी हुई नापाकी दोनों घुली हुई थीं। जैसे ही वह कपड़ा उसकी नाक के बिल्कुल पास पहुँचा, अचानक रेहान को अम्मी का वो चेहरा याद आया जब वह उसे कु**न पढ़ाती थीं। उसे अम्मी की वो बेबस चीखें याद आईं जो विक्रम के बिस्तर पर दब गई थीं।
 
"मैं क्या कर रहा हूँ?" रेहान ने झटके से अपना हाथ पीछे खींचा और खुद को एक मानसिक तमाचा मारा। उसका ज़मीर उसे धिक्कारने लगा। वह कपड़ा उसकी अम्मी की इज़्ज़त का जनाज़ा था, कोई कामुक खिलौना नहीं, उसने खुद को संभाला और गहरी सांस ली। उसकी आँखों में पछतावे के आँसू थे। उसने उस पैंटी को वापस टब में डाल दिया और नल खोलकर उसे ज़ोर-ज़ोर से रगड़कर धोने लगा, जैसे वह अम्मी के दामन पर लगे उन दागों को मिटा देना चाहता हो।
 
अब कुछ दिन ऐसे ही बिता और एक दिन रात के डेढ़ बज रहे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी हथौड़े की तरह सुनाई दे रही थी। रेहान अपनी छत के कोने में दुबका हुआ था, उसकी नज़रें सामने वाली खिड़की पर जमी थीं। आज का मंजर पिछले दिनों से कहीं ज़्यादा खौफनाक होने वाला था।
 
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#19
Really super excellent and wonderful writings!! thanks
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#20
Chamatkar aur ekdum mind blowing update. bahut hi mast writings!
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