Today, 02:50 AM
गुड़गांव के चिपचिपी गर्मी में, दोपहर के तीन बज रहे थे। वाटिका रियल एस्टेट के वातानुकूलित दफ्तर में भी चैताली घोष के माथे पर पसीने की बारीक बूंदें चमक रही थीं। चालीस पार की इस महिला का शरीर उम्र के साथ ढीला पड़ गया था, खास तौर पर उसकी मम्मे , जो ब्लाउज के नीचे भी अपनी बड़ी, ढीली गांठों को छिपा नहीं पा रही थी। एक संदूक जैसी मेज़ के पीछे बैठी, वह अपने मोटे-मोटे नाखूनों से कीबोर्ड पर थपथपा रही थी, आंखों में एक खालीपन था, जो अक्सर उन चेहरों पर दिखता है जो रोज़मर्रा की नीरसता में खो जाते हैं।
एक घंटे बाद, चैताली एमजी रोड के एक कोने पर खड़ी थी। अब वह साड़ी में नहीं थी। एक छोटी, तंग स्कर्ट, जो उसके घुटनों से ठीक ऊपर खत्म होती थी, और एक ढीला-ढाला टॉप, जो उसकी भारी मम्मे को बमुश्किल ढके हुए था। उसके बाल खुले हुए थे, बिखरे हुए, जैसे अभी-अभी हवा से जूझकर आए हों। उसने अपने होठों पर गहरा लाल लिपस्टिक लगाया था, जो उसकी उम्रदराज़ त्वचा पर थोड़ा अटपटा लग रहा था।
आज का दिन भी बाकी दिनों जैसा ही था। फोन की घंटी बजती,वह बेमन से उठाती, 'वाटिका रियल एस्टेट में आपका स्वागत है, मैं चैताली घोष बोल रही हूं,' उसकी आवाज़ में एक बनावटी मिठास होती। फिर ग्राहक को सेल्स टीम से जोड़ देती। यह उसकी दिनचर्या थी। लेकिन शाम ढलते ही, यह दिनचर्या एक अलग ही रंग ले लेती।
घड़ी की सुई पांच पर पहुंची। चैताली ने अपने कंप्यूटर को शटडाउन किया, एक लंबी सांस ली। यह सांस सिर्फ थकान की नहीं थी, बल्कि एक उम्मीद की भी थी। उसने अपने पर्स से एक छोटा सा कॉम्पैक्ट निकाला, अपनी मोटी उंगलियों से चेहरे पर लगे पाउडर को ठीक किया। उसकी बड़ी आंखें शीशे में खुद को देखती रहीं। वह जानती थी कि वह सुंदर नहीं थी, कभी नहीं थी। लेकिन आज रात, उसे सुंदरता की नहीं, कुछ और चीज़ की ज़रूरत थी।
दफ्तर से बाहर निकलते ही, गर्म हवा के झोंके ने उसे घेर लिया। उसने अपनी सूती साड़ी को कसकर पकड़ा। आज उसे साड़ी में नहीं रहना था। घर जाकर उसे बदलना था।


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