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Incest सुनीता: एक साधारण गृहिणी की कहानी
#1
सुनीता: एक साधारण गृहिणी की कहानी

Part - 1

नन्हा सा कस्बा था वह, जहाँ गलियों में सुबह की धूप के साथ गायों की घंटियों की आवाज़ गूंजती थी। उत्तर प्रदेश के किसी छोटे से शहर में बसा यह कस्बा अपनी सादगी और परंपराओं के लिए जाना जाता था। यहीं, एक पुराने से दो मंज़िला मकान में रहता था एक संयुक्त परिवार। इस परिवार की धुरी थी सुनीता, जिसे सब प्यार से "चाची" कहकर बुलाते थे। सुनीता, 35 साल की एक साधारण सी औरत, दो बच्चों की माँ और आरव की चाची। आरव, 18 साल का कॉलेज जाने वाला नौजवान, उसी घर का हिस्सा था। सुनीता का जीवन परिवार, परंपराओं और धर्म के इर्द-गिर्द घूमता था। उसकी सादगी और मेहनत ही इस परिवार को जोड़े रखती थी।

सुनीता का रूप और पहनावा
सुनीता का रंग गेहुँआ था, न ज़्यादा गोरा, न साँवला, बल्कि वैसा जो गाँव की मिट्टी की तरह सच्चा और देसी लगे। उसका चेहरा सादा था, बिना किसी नखरे के। आँखें बड़ी-बड़ी, जिनमें हमेशा एक गहरा सा अपनापन झलकता था, लेकिन साथ ही थोड़ी थकान भी। होंठों पर हल्की सी मुस्कान रहती, जो बच्चों को डाँटते वक़्त भी गायब नहीं होती। उसकी काया मझोली थी, न ज़्यादा पतली, न भारी। गृहिणी के काम-काज ने उसके शरीर को मज़बूत बनाया था, पर उसकी कमर पर हल्की सी चर्बी भी थी, जो दो बच्चों की माँ होने की निशानी थी।
सुनीता हमेशा साड़ी पहनती थी। उसकी साड़ियाँ ज़्यादातर सूती या सस्ती सिल्क की होतीं, जिन्हें वह बाज़ार की छोटी सी दुकान से ख़रीदती। लाल, हरी, नीली, पीली—हर रंग की साड़ी उसके पास थी, पर वह ज़्यादातर गहरे रंग ही चुनती, क्योंकि उनमें दाग-धब्बे कम दिखते। साड़ी के नीचे वह पेटीकोट और ब्लाउज़ पहनती, जो हमेशा साड़ी से मेल खाता। उसकी ब्लाउज़ की सिलाई पुराने ज़माने की थी—टाइट, छोटी बाँहों वाली, जो उसकी बाँहों को और सुंदर बनाती। ब्रा वह रोज़ पहनती, पर पैंटी का इस्तेमाल सिर्फ़ मासिक धर्म के दिनों में करती, जब सैनिटरी पैड की ज़रूरत पड़ती। यह उसकी गाँव की आदत थी, जहाँ औरतें बिना पैंटी के ही साड़ी पहनती थीं।
सुनीता की देह पर बाल थे, जैसा कि गाँव की औरतों में आम है। उसकी बगलें और निचले हिस्से में घने काले बाल थे, जिन्हें वह कभी नहीं हटाती थी। यह उसकी सादगी और प्राकृतिक जीवन का हिस्सा था। गाँव में ऐसी चीज़ों को कोई अहमियत नहीं दी जाती थी, और सुनीता ने भी इसे कभी ज़रूरी नहीं समझा। उसके बाल काले, घने और लंबे थे, जिन्हें वह हमेशा जूड़े में बाँधती। जूड़े में एक साधारण सी कंघी और कभी-कभार गजरा लगाती, ख़ासकर जब मंदिर जाना हो। उसकी माँग में हमेशा सिंदूर की लाल रेखा और माथे पर छोटा सा बिंदिया सजा रहता, जो उसकी शादीशुदा ज़िंदगी का प्रतीक था।

सुनीता का स्वभाव और आस्था
सुनीता का मन धर्म और परंपराओं में रमा रहता था। वह सुबह उठते ही सबसे पहले तुलसी के पौधे को जल चढ़ाती और शिवजी की पूजा करती। उसका छोटा सा पूजा-घर घर के कोने में था, जहाँ मूर्तियों के सामने अगरबत्ती की ख़ुशबू और घंटियों की आवाज़ हमेशा गूंजती। वह हर सोमवार को व्रत रखती और मंदिर जाकर भोलेनाथ को बेलपत्र चढ़ाती। उसकी आस्था इतनी गहरी थी कि वह हर छोटी-बड़ी बात को भगवान की मर्ज़ी मानती। अगर बच्चे बीमार पड़ते, तो वह तुरंत नीम का पत्ता जलाकर घर में धुआँ करती और मंत्र पढ़ती।
उसका स्वभाव रूढ़िवादी था। वह औरतों के लिए बनाए गए पुराने नियमों को मानती थी। उसे लगता था कि औरत का धर्म है अपने पति और परिवार की सेवा करना। उसने कभी कॉलेज की दहलीज़ नहीं देखी थी, सिवाय कुछ सालों की प्राइमरी पढ़ाई के। गाँव में लड़कियों को ज़्यादा पढ़ाने का रिवाज़ नहीं था, और सुनीता भी उसी परंपरा की देन थी। वह पढ़ना-लिखना मुश्किल से जानती थी, पर घर चलाने की समझ में उसका कोई जवाब नहीं था। वह बाज़ार से सस्ता सामान चुनने, बच्चों को अनुशासन सिखाने और रिश्तेदारों से रिश्ते निभाने में माहिर थी।

सुनीता का दिनचर्या
सुनीता का दिन सुबह चार बजे शुरू होता था। वह उठकर पहले नहाती, फिर पूजा करती और रसोई में चूल्हा जलाती। परिवार बड़ा था, तो खाना भी ढेर सारा बनाना पड़ता। दाल, चावल, सब्ज़ी, रोटी—सब कुछ उसके हाथों से बनता। वह खाना बनाते वक़्त पुराने भजन गुनगुनाती, जिससे रसोई में एक अलग ही रौनक छा जाती। दोपहर में वह बच्चों को खाना खिलाती, कपड़े धोती और घर की साफ़-सफ़ाई करती। आरव को वह हमेशा पढ़ाई के लिए टोकती, "बेटा, किताब खोलो, कॉलेज में नाम कमाओ।" आरव उसकी बातें सुनकर हँसता और कहता, "चाची, आप भी तो पढ़ लो मेरे साथ।" सुनीता हँसकर टाल देती।
शाम को वह मंदिर जाती, जहाँ कस्बे की दूसरी औरतों से गपशप करती। वहाँ वह बच्चों की शादी, रिश्तेदारों की ख़बरें और आने वाले त्योहारों की बातें करती। रात में, जब सब सो जाते, सुनीता चुपके से अपनी साड़ी के पल्लू से आँसू पोंछती। शायद वह अपनी जवानी के दिनों को याद करती, या परिवार की ज़िम्मेदारियों का बोझ महसूस करती। पर अगली सुबह, वह फिर वही मुस्कान लिए उठती और अपने काम में जुट जाती।
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#2
Nice start, it is incest story
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#3
Part - 2

सुनीता का रूप: एक देह की मादकता

सुनीता का रंग गेहुँआ था, पर धूप में वो ऐसा चमकता, जैसे उसकी चमड़ी से देसी घी की ख़ुशबू उठ रही हो। उसकी त्वचा पर मेहनत के निशान थे—हल्की-सी खुरदरापन, जो उसकी चूचियों, गाँड, और चूत पर भी दिखता। पर यही खुरदरापन उसकी देह को मस्त बनाता था, जिसे देखकर किसी का भी लंड खड़ा हो जाए। उसकी आँखें, काली और गहरी, जैसे किसी मोटे लंड की प्यासी हों, पर बाहर से मासूमियत का नकाब पहने रहतीं। उसके होंठ, हल्के गुलाबी, हमेशा सूखे से, पर जब वो चुपके से अपनी ज़ुबान उन पर फेरती, तो लगता जैसे उसे चुदाई की ख़्वाहिश हो रही हो। उसकी नाक, साधारण, पर जब वो पसीने में भीगती, तो उसकी साँसों की गर्मी उसकी बदन की खुशबू को और मादक बनाती।

सुनीता की देह एक मस्त चुदाई का सामान था। उसकी चूचियाँ, भारी, गोल, और रस भरी, ब्लाउज़ में कसी हुई, हर कदम पर उछलतीं, मानो किसी लंड को ललकार रही हों। उसके निप्पल्स, काले, सख़्त, और मोटे, ब्लाउज़ के कपड़े से उभरते, ख़ासकर जब वो रसोई में चूल्हे की आग में पसीना बहाती। उसकी कमर, हल्की-सी चर्बी लिए, साड़ी में लिपटी, पर उसका उभार ऐसा कि किसी की भी आँखें उसकी चूत पर टिक जाएँ। उसकी गाँड, मोटी, नरम, और गदराई, साड़ी के नीचे हर कदम पर लहराती, जैसे चुदाई का खुला न्योता दे रही हो। उसकी चूत, घनी काली झाँटों से ढकी, हमेशा गीली और गर्म रहती, ख़ासकर गर्मी के दिनों में, जब पसीना उसकी झाँटों में रिसता और उसकी चूत की ख़ुशबू हवा में फैलती।

सुनीता ने कभी अपनी झाँटें साफ़ नहीं कीं। उसकी चूत और बगलें काले, घने बालों से भरी थीं, जो उसकी देसी सादगी की निशानी थीं। उसकी बगलें, पसीने में चमकती, जब वो साड़ी का पल्लू उठाती, तो एक तो एक ऐसी महक आती, जो किसी के भी लंड को तड़पा दे। उसकी चूत की झाँटें इतनी घनी थीं कि उसकी चूत का गुलाबी मुँह मुश्किल से दिखता, पर जब वो नहाती, और पानी उसकी चूत पर गिरता, तो उसकी झाँटें चमकतीं, और उसकी चूत का गीला छेद साफ़ नज़र आता। उसकी देह का हर हिस्सा चुदाई की कहानी कहता था—उसकी चूचियाँ, उसकी गाँड, उसकी चूत, और यहाँ तक कि उसकी बगलें भी।

सुनीता की साड़ियाँ उसकी हवस का आलम थीं। वो सस्ती सूती और सिल्क की साड़ियाँ पहनती, जो बाज़ार की छोटी दुकानों से आतीं। गहरे लाल, नीले, मरून, या हरे रंग की साड़ियाँ उसकी गेहुँआ देह पर आग सी लगातीं। साड़ी का पल्लू वो कंधे पर लटकाती, पर रसोई में काम करते वक़्त कमर में खोंस लेती, जिससे उसकी गाँड का मोटा उभार और चूत का हल्का सा निशान साफ़ दिखता। साड़ी के नीचे वो पेटीकोट पहनती, जिसका नाड़ा वो इतना कसकर बाँधती कि उसकी कमर पर लाल निशान पड़ जाता। उसकी ब्लाउज़, टाइट और छोटी, उसकी चूचियों को कसकर पकड़ती, और पीछे से उसकी पीठ का पसीना चमकता। ब्रा वो रोज़ पहनती, सस्ती और सादी, जो उसकी चूचियों को ऊपर उठाती, पर उसके मोटे निप्पल्स को छिपा नहीं पाती। पैंटी वो सिर्फ़ मासिक धर्म में पहनती, जब सैनिटरी पैड उसकी चूत को सहारा देता। बाकी दिन उसकी चूत नंगी रहती, साड़ी और पेटीकोट के नीचे आज़ाद, पसीने और हवा से खेलती। ये आज़ादी उसकी चूत को एक अलग ही मज़ा देती, और जब वो चलती, तो उसकी चूत की गर्मी उसकी जाँघों को गीला कर देती।

उसके बाल, काले, घने, और रेशमी, उसकी गाँड तक लहराते। वो उन्हें जूड़े में बाँधती, पर रात में जब खोलती, तो वो उसकी पीठ पर लहराते, जैसे कोई काला सागर उसकी गाँड को चूम रहा हो। उसकी माँग में सिंदूर की लाल रेखा और माथे पर बिंदिया उसकी शादी की निशानी थी, पर यही बिंदिया उसकी चूचियों और चूत की हवस को और उभारती। कानों में छोटी बाली और गले में मंगलसूत्र, जो उसकी चूचियों के बीच लटकता, उसकी देह को और नंगा करता। उसकी चाल में एक देसी ठुमका था, जब वो साड़ी लपेटे आँगन में चलती, तो उसकी गाँड का हिलना और चूचियों का उछलना किसी चुदाई के गाने का बीट लगता।

सुनीता की देह का हर अंग हवस की आग था। जब वो नहाती, आँगन के कोने में, ठंडा पानी उसकी चूचियों पर गिरता, तो उसके निप्पल्स सख़्त हो जाते, और उसकी चूत में एक सिहरन दौड़ती। वो पेशाब करती, तो उसकी चूत से गर्म धार निकलती, और वो चुपके से अपनी उँगलियों से उसकी गीली झाँटों को छूती, अपनी चूत की गर्मी को महसूस करती।
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#4
प्लीज़ इसमें एक बदसूरत बूढ़े को कहानी का मुख्य किरदार बनाओ।
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#5
Don't make it as incest
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#6
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Sunita
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#7
Part - 3

सुनीता के विचार, सपने, और नंगी चाहतें

सुनीता का मन एक बंद चूत था, जो बाहर से तो धर्म और परंपराओं में लिपटा था, पर अंदर से लंड की भूख में जलता था। दिन में वो रसोई में रोटियाँ बेलती, बच्चों को डाँटती, और मंदिर में शिवलिंग पर जल चढ़ाती, पर रात के सन्नाटे में उसकी चूत और चूचियाँ उसे चुदाई की आग में जलाती थीं। जब घर सो जाता, और वो आँगन में चाँदनी के नीचे अपनी साड़ी खोलती, तो उसकी नंगी देह चमकती। वो अपनी चूचियों को मसलती, उनके भारीपन को महसूस करती, और अपनी उँगलियों को अपनी चूत की झाँटों में डालती, जहाँ गीली गर्मी उसे पागल कर देती। उसकी चूत का पानी उसकी जाँघों पर रिसता, और वो अपनी गाँड को हवा में उठाकर अपनी चूत में दो उँगलियाँ डालती, चुदाई की ख़्वाहिश में तड़पती।

उसके सपनों में एक मर्द आता था—काला, मज़बूत, और मोटा लंड लिए। वो सपने में उस मर्द के लण्ड को अपनी चूत में लेती, अपनी गाँड को उसकी जाँघों से रगड़ती और अपनी चूचियों को उसके मुँह में देती। वो चुदाई इतनी ज़ोरदार होती कि उसकी चूत का पानी बिस्तर पर फैल जाता, और वो सुबह अपनी गीली चूत को छूकर देखती, कि कहीं वो सपना सच तो नहीं था। पर उसकी चूत सिर्फ़ नम होती, और उसका मन और प्यासा। वो इन सपनों से डरती थी, क्योंकि उसका धर्म उसे सिखाता था कि औरत की चूत सिर्फ़ पति के लंड के लिए होती है। पर उसका पति अब उसकी चूत को वही मज़ा नहीं देता था। उसका लंड अब ढीला था, और सुनीता की चूत हर रात चुदाई की भूख में चीख़ती थी।

आरव, उसका भतीजा, उसकी चूत की आग का एक और बहाना था। उसकी मज़बूत बाँहें, उसकी चौड़ी छाती, और उसकी जवानी की गर्मी सुनीता की चूत को गीला कर देती। जब वो रसोई में उसकी मदद करता, और उसका हाथ ग़लती से सुनीता की गाँड या चूचियों को छू जाता, तो उसकी चूत में बिजली सी दौड़ती। एक बार, जब वो पानी का मटका उठा रहा था, और उसकी जाँघ सुनीता की गाँड से टकराई, तो उसकी चूत इतनी गीली हो गई कि उसकी साड़ी पर निशान पड़ गया। वो ख़ुद को डाँटती, "छिः, ये क्या सोच रही हूँ? वो मेरा भतीजा है।" पर उसकी चूत को ये बात समझ नहीं आती थी। वो रात में अपनी चूत में उँगली डालती, और आरव के मोटे लंड को अपनी चूत में घुसता हुआ सोचती, अपनी चूचियों को मसलती, जब तक उसकी चूत का पानी न निकल जाए।

सुनीता की सबसे बड़ी चाहत थी कि कोई उसकी चूत को चोदे, उसकी गाँड को थपथपाए, और उसकी चूचियों को चूसे, जैसे वो अपनी जवानी में सपने देखती थी। वो चाहती थी कि उसकी चूत, जो अब रसोई और बच्चों में खप रही थी, एक बार फिर किसी मोटे लंड की प्यास बने। वो अपनी गाँड को हवा में उठाकर चुदाई की कल्पना करती, और अपनी चूत को उँगलियों से चोदती, पर उसकी चूत को असली लंड की ज़रूरत थी। वो जानती थी कि ये चाहत सिर्फ़ सपनों में पूरी होगी। फिर भी, जब वो अपनी साड़ी उतारती, और अपनी नंगी देह को देखती, तो उसकी चूत और चूचियाँ उसे चीख़कर कहतीं, "सुनीता, अपनी चूत को आज़ाद कर, और किसी लंड को अपनी गाँड में ले।"
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#8
(22-03-2026, 03:42 PM)Vissle Wrote: प्लीज़ इसमें एक बदसूरत बूढ़े को कहानी का मुख्य किरदार बनाओ।

क्यों? लेखक को अपने अनुसार लिखने दीजिये.
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#9
सुनीता का मन एक बंद चूत था - वाह, क्या उपमा है!
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#10
[Image: xxx.png]

Part - 4

सुनीता का संयुक्त परिवार एक दो मंजिले माकन मैं रहता था | घर मैं कोई आंगन न होने के कारण एक मंजिल की आवाज दूसरी मंजिल तक नहीं जा पाती थी। ग्राउंड फ्लोर पर बाकी परिवार रहता था, जबकि पहली मंज़िल पर सुनीता और आरव के कमरे थे। प्रत्येक मंज़िल पर दो दो बाथरूम थे, भारतीय स्टाइल के स्क्वॉट टॉयलेट सीट वाले, जहाँ पानी का मग और बाल्टी हमेशा रखी रहती थी। लेकिन उस दिन, एक साधारण सी सुबह, उसकी ज़िंदगी की सबसे हवस भरी कहानी शुरू होने वाली थी।

सुबह के करीब सात बजे थे। सूरज की किरणें पहली मंज़िल की खिड़कियों से छनकर आ रही थीं। सुनीता, अपनी लाल सूती साड़ी में लिपटी, बाथरूम से जल्दी-जल्दी निकली। उसकी साड़ी का पल्लू हल्का-सा गीला था, उसकी चूचियाँ, जो टाइट ब्लाउज़ में कसी हुई थीं, हर कदम पर हिल रही थीं, और उसकी गाँड का उभार साड़ी के नीचे लहरा रहा था। वो जल्दी में थी, शायद रसोई में चूल्हा जलाने की तैयारी में। उसने आरव को देखा, जो अपने कमरे से निकलकर बाथरूम की ओर जा रहा था, और बोली, "बेटा, जल्दी कर, मैं नाश्ता तैयार कर रही हु, जल्दी नीचे आ जाना।" उसकी आवाज़ में ममता थी, लेकिन आरव की नज़रें उसकी चूचियों पर टिक गईं, और उसका लंड उसके लोअर में हल्का-सा तन गया।

आरव, अपने नीले लोअर और काली टी-शर्ट में, बाथरूम में दाखिल हुआ। दरवाज़ा बंद करते ही उसे कुछ अजीब सा महसूस हुआ। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। हवा में एक तीखी, मादक खुशबू थी, जो उसकी नाक में घुसी और उसके लंड को और सख़्त कर दिया। हवा में अभी भी सुनिता की मौजूदगी का एक गर्म, नशीला अहसास था, हल्की सी खुशबू, उसकी त्वचा की मादक गंध। बस कुछ सेकंड पहले सुनिता यहाँ से निकली थी। आरव ने टॉयलेट की तरफ कदम बढ़ाया और टॉयलेट सीट की ओर देखा, उसका दिल धड़कने लगा, और उसकी साँसें थम गईं। टॉयलेट सीट फ्लश नहीं थी। नीचे, टॉयलेट सीट के तल में, सुनीता का ताज़ा पेशाब चमक रही था, हल्की पिली, गर्म, जिसकी सतह पर नन्हे हवा के बुलबुले तैर रहे थे। उसकी चूत का पानी, जो शायद जल्दी में सुनिता फ्लश करना भूल गई थी। उसकी पेशाब ताजी, गर्म, पवित्र — वहाँ शांत पड़ी थी, मानो उसकी देह का कोई गुप्त अमृत हो।और उसकी गंध इतनी तीखी थी कि आरव का लंड उसके लोअर में फड़कने लगा।

उन्नीस साल का आरव, जो जवानी की आग में जल रहा था, इस दृश्य से अंदर तक हिल गया। आरव की साँसें तेज़ हो गईं। उसका लंड अब पूरी तरह तन चुका था, और उसका लोअर सामने से उभर रहा था। सुनिता - उसकी चाची, उसकी ममतामयी हुस्न की मलिका - उसकी पेशाब, उसका यह अमृत जैसा प्रसाद आरव सामने था। उसकी नज़रें उस सुनहरे अमृत पर ठहर गईं। बुलबुले, जो धीरे-धीरे फट रहे थे, मानो सुनिता की साँसों की तरह जीवंत थे। यह नज़ारा इतना अंतरंग था कि आरव की रगों में बिजली दौड़ गई। उसका लंड धीरे-धीरे तनने लगा, उसकी जींस में उभार साफ़ दिख रहा था।

वह एक कदम और पास आया, उसकी आँखें उस पेशाब पर जमी थीं। यह सुनिता की चूत से निकला था—उसकी नरम, गर्म चूत, जिसके बारे में वह रातों को सपने देखता था। उसने कल्पना की कि सुनिता यहाँ थी, उसकी साड़ी ऊँची उठी हुई, उसकी गोरी जाँघें खुली हुई, और उसकी चूत से यह सुनहरा रस टपक रहा था। उसकी चूत कैसी होगी? शायद गुलाबी, शायद गीली, उसकी झाँटें काली और घनी, जो उसकी देह की गर्मी को और बढ़ाती होंगी। आरव का दिमाग़ घूम गया। यह पेशाब उसकी चूत का अमृत था, उसकी देह का सबसे पवित्र अमृत। उसने एक गहरी साँस ली, और सुनिता की खुशबू उसके फेफड़ों में समा गई। उसका लंड अब पूरी तरह तन चुका था, उसकी जींस में दर्द होने लगा। वह सोच रहा था कि यह पेशाब कितना कीमती है। यह सुनिता की देह का रस था, उसकी चूत की गर्मी, उसकी पवित्रता। उसने अपने होंठों को गीला किया, और एक अजीब सी लालसा उसके मन में जागी। वह इस पेशाब को चखना चाहता था। वह जानना चाहता था कि सुनिता का स्वाद कैसा होगा। क्या यह नमकीन होगा? क्या यह गर्म होगा? क्या यह उसकी चूत की मिठास को अपने में समेटे होगा?
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#11
वाह! लिखते रहिये.
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#12
ye kahani pahle bhi aa chuki hai...tab bhi sirf itni hi likhi gayi thi. is baar dekhte hai ki kya hota hai
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#13
[Image: xxx.png]

Part 5


आरव घुटनों पर टॉयलेट सीट के पास बैठ गया, उसकी आंखें सुनीता के पेशाब पर टिकी हुईं, जैसे कोई भक्त अमृत को निहार रहा हो। उसे सुनीता की पेशाब की गर्मी अभी भी महसूस हो रही थी, हल्का पीला रंग चमक रहा था, और सतह पर बुलबुले तैर रहे थे जो धीरे-धीरे फट रहे थे , जैसे सुनीता की चूत ने अभी-अभी अपनी हवस की निशानी छोड़ी हो -  उसने सोंचा की शायद पेशाब करते समय चाची की चूत में थोड़ी सी उत्तेजना हुई होगी, और उसने चूत को सहलाया होगा। आरव  ने अपनी नाक को और करीब किया, लगभग टॉयलेट सीट के अंदर, और गहरी सांस ली, जैसे हवा को सोख रहा हो। सुनीता की पेशाब की महक इतनी मादक और तीखी थी कि उसके मुंह में पानी आ गया, जीभ पर लार जमा हो गई, और वह कल्पना करने लगा कि यह महक उसकी मां सामान चाची की चूत की है - वही चूत, जो घनी काली झांटों से ढकी हुई है, जो उसने कभी नहीं देखी, लेकिन अब उसकी कल्पना में पूरी नंगी नाच रही थी, चूत के होंठ फैले हुए, गुलाबी मांस चमकता हुआ, और झांटें गीली होकर चिपकी हुईं। उसकी मां जैसी चाची की चूत की नमकीन, हल्की खट्टी खुशबू उसके दिमाग को पागल कर रही थी, जैसे वह चूत को चूसने के लिए तैयार हो। वो सोचने लगा कि सुनीता की चूत कैसी होगी - गुलाबी और फूली हुई, गीली और रसदार, झांटों के घने जंगल में छुपी हुई, जो किसी मोटे, काले लंड को अंदर खींचने के लिए हमेशा तैयार रहती, जहां पीरियड्स के समय खून बहता होगा और सैनिटरी पैड चूत को भिगोता होगा, लेकिन अब वह हवस से भरी थी।

उसकी आंखें टॉयलेट सीट के किनारे पर पड़ीं, और उसका दिल और जोर से धड़कने लगा, जैसे कोई खजाना मिल गया हो। वहां, टॉयलेट सीट के सामने और अंदर की तरफ, 3-4 मोटी, काली, घुंघराली झांटें पड़ी हुई थीं | ये सुनीता की चूत की झांटें थीं, जो शायद पेशाब करते वक्त गिर गई थीं, जब चूत की धार ने झांटों को हिलाया होगा। वो झांटें, अभी भी गीली और चमकती हुई, टॉयलेट सीट पर बिखरी पड़ी थीं, जैसे सुनीता की चूत ने अपनी हवस की सबसे अंतरंग निशानी छोड़ दी हो - झांटें जो चूत के होंठों से चिपकी रहती होंगी, पसीने और चूत के पानी से सनी हुई। आरव का लंड अब इतना सख्त था कि उसका लोअर फटने को था, लंड की टोपी गीली हो गई थी प्री-कम से, और वह महसूस कर रहा था कि अगर थोड़ा सा और छुआ तो रस निकल जाएगा। उसने एक झांट को अपनी उंगली से सावधानी से उठाया, जैसे कोई कीमती हीरा हो, और उसे अपनी नाक के पास लाया, गहरी सांस ली। सुनीता की चूत की गंध, उस झांट में बसी हुई, इतनी तीखी और नशीली थी कि आरव का सारा बदन सिहर उठा, उसके लंड में कंपन हो गया, जैसे चूत की महक सीधे लंड तक पहुंच गई हो। उसने झांट को अपनी उंगलियों के बीच रगड़ा, उसकी बनावट को महसूस किया - मोटी, घुंघराली, हल्की-सी नम और चिपचिपी, जैसे सुनीता की चूत का स्पर्श हो, जहां झांटें चूत के गुलाबी होंठों को ढकती होंगी और चुदाई के समय लंड को गुदगुदाती होंगी। उसने कल्पना की कि ये झांटें उसकी चूत के ऊपरी हिस्से से टूटी होंगी, जहां चूत का क्लिटोरिस छुपा होता, या नीचे से जहां चूत का छेद गर्म रहता, और पेशाब की धार ने उन्हें गिरा दिया होगा। उसने झांट को अपनी जीभ पर रखा, धीरे से चाटा, और उसकी गंध और हल्का नमकीन स्वाद ने उसके लंड को और तड़पाया, जैसे वह सुनीता की चूत को चूस रहा हो। सुनीता की चूत की गंध, झांटों में बसी हुई, इतनी मादक थी कि वो उसकी चूत से निकलने वाले ममतामयी लेकिन हवस भरे अमृत को पीने के लिए पागल हो गया, जैसे वह सुनीता की चूत पर मुंह लगाकर सारा मूत और चूत का पानी चूस ले। उसने दूसरी झांट को उठाया, और उसे अपने लंड पर रगड़ा - उसने लोअर नीचे सरकाया, लंड बाहर निकाला, जो अब मोटा, काला और फूला हुआ था, सुपारे पर गीला रस चमक रहा था - और झांट को लंड की लंबाई पर फेरा, जैसे सुनीता की चूत की झांटें उसके लंड को सहला रही हों। उसकी चूत की झांटें, गीली और मादक, उसके लंड पर फिसल रही थीं, और उसका लंड रस छोड़ने को तैयार था, हर रगड़ पर फड़क रहा था, जैसे चुदाई की शुरुआत हो।

आरव की आंखें बंद हो गईं, और उसका दिमाग सुनीता की चूत की दुनिया में पूरी तरह खो गया, जैसे वह चूत के अंदर घुस गया हो। उसने कल्पना की कि सुनीता अभी-अभी यहां थी, अपनी साड़ी ऊपर उठाए, पेटीकोट कमर तक चढ़ाया, अपनी मोटी जांघें खोले, और चूत को टॉयलेट सीट के ऊपर रखे - चूत का मुंह फैला हुआ, गुलाबी होंठ चमकते, और झांटें पसीने से सनी हुईं। उसकी चूत, घनी काली झांटों से ढकी, गीली और गर्म, पेशाब की धार छोड़ रही थी - जोरदार धार जो चूत के छेद से निकलकर सीट पर गिर रही होगी, और सुनीता की गांड हल्की-हल्की हिल रही होगी मजा में। उसने सोचा कि सुनीता की चूत का गुलाबी मुंह, झांटों के जंगल में छुपा हुआ, चमक रहा होगा, और उसकी पेशाब की गर्म धार चूत के होंठों से निकल रही होगी, शायद थोड़ा सा चूत का पानी भी मिला हुआ, क्योंकि सुनीता की चूत हमेशा हवस से गीली रहती। उसकी चूत की गंध, जो अब बाथरूम में फैली हुई थी, उसकी नाक में घुस रही थी, और उसका लंड हर सांस के साथ और सख्त हो रहा था, जैसे चूत की महक लंड को चोदने का आदेश दे रही हो। उसने कल्पना की कि वो सुनीता की चूत को अपने सामने देख रहा है - गुलाबी, नम, और झांटों से भरी हुई, जहां वह अपनी जीभ डालेगा, झांटों को चूस लेगा, और चूत के रस को पीएगा। उसकी चूत का मुंह, गीला और चमकता हुआ, किसी मोटे लंड को निगलने को तैयार, और वह कल्पना कर रहा था कि वह अपनी जीभ चूत के क्लिटोरिस पर रगड़ेगा, चूत के होंठ चूसेगा, और सुनीता की सिसकारियां सुनेगा। उसकी चूत की गंध, जो अब उसके मुंह में थी, उसे और पागल कर रही थी, जैसे वह चूत को चाट-चाटकर साफ कर रहा हो। वो सोचने लगा कि सुनीता की चूत को चोदते वक्त वो उसकी झांटों को सहलाएगा, झांटों को मुट्ठी में पकड़ेगा, और चूत के होंठों को अपनी उंगलियों से फैलाएगा, ताकि उसका मोटा लंड चूत की गहराई में घुस जाए, चूत की दीवारों को रगड़े, और सुनीता की चूत फटने की कगार पर आ जाए।

आरव का दिमाग अब सुनीता की गांड पर चला गया, जैसे चूत की कल्पना से गांड की हवस जागी हो। उसने सोचा कि सुनीता की गांड, मोटी और गदराई, टॉयलेट सीट पर फैली हुई होगी, जब वो पेशाब कर रही थी—गांड के गाल दबे हुए, गांड का छेद हल्का खुला, और पेशाब की धार के साथ गांड की गर्मी बढ़ रही होगी। उसकी गांड का उभार, साड़ी के नीचे लहराता हुआ, उसने कई बार देखा था, लेकिन अब कल्पना कर रहा था कि गांड नंगी कैसी होगी—नरम, भारी, और चुदाई के लिए बनी हुई, जहां गांड के गालों के बीच गहरा खांचा होगा, और गांड का छेद गुलाबी और टाइट। उसने कल्पना की कि वो सुनीता की साड़ी उठाएगा, पेटीकोट नीचे करेगा, और उसकी गांड को अपने हाथों में लेगा, मोटे गालों को मसलेगा, उंगलियां गांड के खांचे में डालेगा, और गांड के छेद को अपनी उंगली से सहलाएगा, धीरे-धीरे अंदर डालेगा। उसकी गांड की गर्मी, जो शायद पेशाब करते वक्त और बढ़ गई होगी, उसके लंड को और तड़पाएगी, जैसे गांड का छेद लंड को बुला रहा हो। उसने सोचा कि वो सुनीता की गांड को थपथपाएगा, जोरदार थप्पड़ मारेगा, और उसकी चीखें सुनकर उसका लंड और सख्त होगा, जैसे गांड लाल हो जाएगी। उसकी गांड का छेद, जो शायद उसकी चूत की तरह ही गर्म और नम होगा, उसके लंड को ललकारेगा, और वह कल्पना करने लगा कि वो सुनीता की गांड में अपना मोटा लंड डालेगा, धीरे-धीरे घुसाएगा, गांड के छेद को फैलाएगा, और साथ में चूत को अपनी उंगलियों से चोदेगा - दो उंगलियां चूत में, जहां झांटें उंगलियों को गुदगुदाएंगी, और गांड हर धक्के के साथ हिल रही होगी, सुनीता की चूत और गांड दोनों एक साथ चुदाई में डूबी हुई। सुनीता की गांड की मादकता, उसकी चूत की गंध के साथ मिलकर, उसके दिमाग को हवस की आग में जला रही थी, जैसे वह अब चूत और गांड दोनों को चोदने के लिए तैयार हो, और उसका लंड फटने को था।
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#14
वाह! आगे लिखिए.
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#15
jis kisi ko bhi ye story pasand aa rahi hai............ please comment karo.
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#16
welcome
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#17
Dosto Comment karo ki story kaisi lag rahi hai...........
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#18
आगे क्या हुआ?
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#19
चाची का ममता का स्वाद


आरव की सांसें अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थीं। बाथरूम की दीवारें भी उन तेज़-तेज़ सांसों से गूंज रही थीं, जैसे कोई जंगली जानवर अपनी शिकार की महक सूंघ रहा हो। वह अभी भी घुटनों के बल टॉयलेट सीट के ठीक सामने झुका हुआ था, लेकिन अब उसका पूरा ऊपरी शरीर आगे की तरफ़ झुक चुका था। उसका चेहरा इतना नीचे था कि उसकी नाक लगभग सुनीता चाची के ताज़ा छोड़े हुए गर्म मूत की सुनहरी सतह को छू रही थी। टॉयलेट सीट के अंदर भरा हुआ पानी सिर्फ पानी नहीं था, वो सुनीता चाची की चूत का पेशाब था - जो आरव की लिए अब किसी अमृत से कम नहीं था | सुनीता की पेशाब से अभी भी हलके-हलके बुलबुले  रहे थे । हर बुलबुला फटते ही हवा में चाची की चूत की वो मादक, नमकीन-खट्टी महक फैल जाती, जो पेशाब की गर्म धार के साथ मिलकर और भी गहरी, और भी नशीली हो जाती । सुनीता चाची की पेशाब की महक आरव की आत्मा तक उतर चुकी थी ।

उसकी आंखें बंद नहीं थीं - वो खुली थीं, और सीधे उस पीले-गर्म मूत को घूर रही थीं, जैसे कोई भूखा कुत्ता अपने मालिक के हाथ में रोटी को देख रहा हो। “चाची… सुनीता चाची… तेरी चूत का मूत…” वह बार-बार बुदबुदा रहा था, आवाज़ इतनी कांपती हुई कि खुद को भी मुश्किल से सुनाई दे रही थी। उसके होंठों पर पहले से ही लार की मोटी परत चमक रही थी। दिल की धड़कनें इतनी जोर से लग रही थीं कि उसे लग रहा था जैसे उसका सीना फट जाएगा। वो जानता था कि ये गलत है, ये पाप है, अपनी मां सामान चाची के पेशाब को चाटना, पीना - ये सबसे बड़ा अपराध है। लेकिन चाची की चूत की महक, उसके झांटों की गंध, और अब इस गर्म मूत की तीखी खुशबू ने उसके दिमाग को पूरी तरह हथिया लिया था। अब कोई नैतिकता नहीं बची थी, कोई डर नहीं बचा था। सिर्फ़ हवस थी। सिर्फ़ चूत की भूख थी। सिर्फ़ चाची के मूत की प्यास थी।

आरव ने अपना सिर और नीचे किया। अब उसका पूरा मुंह टॉयलेट बाउल के अंदर झुक चुका था। उसकी नाक अब सीधे मूत की सतह पर थी। उसने गहरी सांस ली - एक लंबी, भूखी सांस। मूत की गर्मी उसकी नाक में घुस गई, जैसे चाची की चूत का गर्म रस सीधे उसके फेफड़ों में उतर रहा हो। फिर उसने जीभ बाहर निकाली। जीभ की नोक पर पहले से ही लार की एक चमकती हुई परत थी। बहुत धीरे-धीरे, जैसे कोई प्यासा आदमी पहली बूंद को चख रहा हो, उसने जीभ की नोक को मूत की सुनहरी सतह पर छुआ।

सनसनी! गर्मी और ठंडक का मिश्रण। उसे महसूस हुआ की जैसे मूत अभी भी चाची की चूत की गर्मी से तप रहा था—सुनीता चाची की चूत की वो गर्मी जो अभी कुछ मिनट पहले ही उसकी अमृत जैसे मूट बनकर उसकी प्यारी सी चूत से निकली थी। स्वाद पहले आया—हल्का नमकीन, जैसे समुद्र का पानी, फिर पीछे-पीछे हल्की खटास, जैसे कच्चे आम का रस, लेकिन उसमें चूत की मिठास भी थी। आरव की आंखें खुशी से बंद हो गईं। उसने जीभ को और लंबा किया, अब पूरी जीभ मूत में डूब गयी | फिर उसने जीभ को धीरे-धीरे घुमाया—बाएं से दाएं, ऊपर से नीचे—जैसे कोई बच्चा आइसक्रीम चार रहा हो, पर आरव को ऐसा महसूस हुआ की वह अपनी माँ समान चाची की चूत का अमृत चाट रहा हो। मूत उसके मुंह में फैल गया। गर्म, चिपचिपा, थोड़ा सा चूत का रस मिला हुआ। क्योंकि सुनीता चाची ने पेशाब करते समय शायद अपनी चूत को हल्का-सा सहलाया होगा - उसकी उंगलियां चूत के होंठों पर फिसली होंगी, और कुछ चूत का पानी मूत में घुल गया होगा।

आरव का मोटा काला लंड अब पूरी तरह फटने को था। उसने एक हाथ से लोअर को नीचे सरकाया। लंड बाहर आया - मोटा, काला, नसें फूली हुईं, सुपारा चमक रहा था, प्री-कम की मोटी-मोटी बूंदें टपक रही थीं। उसने लंड को अपनी मुट्ठी में कस लिया और धीरे-धीरे मसलने लगा - ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर - जबकि उसका मुंह अभी भी मूत में डूबा हुआ था। हर रगड़ के साथ वो कल्पना कर रहा था कि ये लंड सुनीता चाची की चूत में घुस रहा है, झांटों को रगड़ रहा है, चूत के गर्म छेद को फाड़ रहा है।

अब वो और गहराई में जाना चाहता था। उसने सिर को और नीचे किया। अब उसके होंठ भी मूत में डूब गए । उसने होंठ खोले और चाय पीने वाले अंदाज में सुनीता की मूत को अपनी अंदर खींचा | एक छोटी-सी धार मुंह में चली आई—गर्म, नमकीन, थोड़ा कड़वा, लेकिन चूत की महक से भरा हुआ। आरव ने उसे गले से नीचे उतारा। “गुलप…” एक जोरदार आवाज़ हुई। पहला घूंट! चाची का मूत उसके पेट में उतर गया। उसकी सांसें और तेज़ हो गईं। मुंह में अब सुनीता चाची की चूत का पूरा स्वाद था—चूत की झांटों की महक, चूत के पानी की मिठास, पेशाब की नमकीन स्वाद, और हल्की-सी periods वाली खटास भी, क्योंकि वो जानता था कि चाची के पीरियड्स आने वाले हैं, और कभी-कभी मूत में थोड़ा खून का स्वाद भी मिल जाता है।

“आह्ह्ह… चाची… तेरी चूत का मूत… कितना स्वादिष्ट है… कितना गर्म है…” वह बड़बड़ाया, आवाज़ में पागलपन था। अब उसने और जोर से अपनी चाची की मूत को पीना शुरू किया । होंठों को टॉयलेट सीट के अंदर दबाया, जैसे वो सीधे चाची की चूत से मूत पी रहा हो। मूत की धार अब लगातार उसके मुंह में आ रही थी। वो चूसता, निगलता, फिर चूसता। कभी-कभी जीभ से बुलबुले फोड़ता, कभी मूत को मुंह में भरकर कुल्ला करता और फिर निगल जाता। उसकी जीभ अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी चाची के मूत से। हर निगल के साथ वो कल्पना कर रहा था कि सुनीता चाची उसके मुंह के ऊपर बैठी है—साड़ी ऊपर, पेटीकोट कमर तक, अपनी मोटी जांघें फैलाए, चूत का मुंह सीधे उसके मुंह पर। “पी ले बेटा… चाची का पूरा मूत पी ले… मेरी चूत का पेशाब तेरा अमृत है…” चाची की वो काल्पनिक आवाज़ उसके कानों में गूंज रही थी।

आरव ने एक हाथ से टॉयलेट सीट के अंदर पहुंचा। उंगलियों को मूत में डुबोया। तीन उंगलियां पूरी तरह गीली हो गईं। फिर उन उंगलियों को अपने मुंह में डाला और चूसने लगा—जैसे चाची की चूत की उंगलियां हों। मूत की बूंदें उसकी ठोड़ी पर टपक रही थीं, गिर रही थीं उसके लंड पर। लंड अब और भी सख्त था। मुट्ठी की रफ्तार बढ़ गई। वो मूत चूसता जा रहा था और लंड हिलाता जा रहा था। बीच-बीच में उसकी नजर टॉयलेट सीट पर पड़ी उन 3-4 काली घुंघराली झांटों पर गई। उसने एक झांट को मूत में डुबोया, फिर जीभ पर रखा और चूस लिया। झांट की मोटी बनावट, चिपचिपी महक, और मूत का स्वाद मिलकर उसे पागल कर रहा था। “चाची… तेरी चूत की झांटें… तेरी चूत का मूत… मैं सब पी जाऊंगा…”

अब उसका मुंह पूरी तरह टॉयलेट बाउल के अंदर था। नाक, मुंह, ठोड़ी—सब मूत में डूबे हुए थे। वो सांस लेने के लिए भी मुंह नहीं उठा रहा था। हर सांस के साथ मूत उसके नथुनों में घुस रहा था। उसने और जोर से चूसना शुरू किया। अब मूत की पूरी धार उसके मुंह में आ रही थी। वो पीता जा रहा था—घूंट-घूंट, फिर और घूंट। पेट भर रहा था चाची के मूत से। उसके लंड पर प्री-कम की जगह अब मूत की बूंदें टपक रही थीं। वो कल्पना कर रहा था कि चाची periods में है—उसकी चूत से खून और मूत दोनों निकल रहे हैं, सैनिटरी पैड चूत पर चिपका हुआ, भिगोया हुआ लाल-लाल। वो सोच रहा था कि अगली बार वो चाची के periods वाले मूत को भी ऐसे ही चूसेगा, सैनिटरी पैड को चाटेगा, खून और चूत के रस को मिलाकर पिएगा।

“चाची… तेरी चूत… तेरी गांड… तेरी periods वाली चूत का मूत…” वह चीखा, मुंह मूत से भरा हुआ। लंड अब फटने को था। मुट्ठी तेज़-तेज़। अचानक उसका पूरा बदन सिहर उठा। “आह्ह्ह… चाची… मैं आ गया… तेरे मूत में…” और उसका मोटा लंड फट पड़ा। गाढ़ा, गर्म वीर्य की फुहारें निकलीं—कुछ मूत में गिर गईं, कुछ टॉयलेट सीट पर, कुछ अपनी उंगलियों पर जो अभी भी मूत चूस रही थीं। वीर्य और चाची का मूत मिलकर एक गंदा, हवस भरा मिश्रण बन गया। आरव ने उसे भी चाट लिया।

वो अभी भी घुटनों पर था, मुंह मूत से सना हुआ, ठोड़ी टपक रही थी, लंड अभी भी फड़क रहा था। उसने अंतिम घूंट लिया, फिर मुंह उठाया। होंठों पर चाची की चूत का मूत चमक रहा था। वो मुस्कुराया—पागल, हवसी मुस्कान। अब वो जान गया था—चाची की चूत का असली स्वाद उसने चख लिया है। लेकिन ये सिर्फ शुरुआत थी। उसने संकल्प लिया की अगली बार वो असली चूत से मूत पिएगा और periods में चाची की चूत तो जरूर चूसेगा 
आरव ने बाथरूम से बाहर निकलने से पहले टॉयलेट सीट को चूम लिया—एक लंबा, गीला चुंबन—जैसे सुनीता चाची की चूत को चूम रहा हो। “चाची… जल्दी मिल… तेरी चूत… तेरी गांड… और तेरा पूरा मूत पीने के लिए तैयार हूं मैं।” 
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#20
[Image: Pee030.jpg]
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