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Adultery Jawan Patni ka Naajayaz Sambandh
#1
मैं अपनी साड़ी लपेट चुकी थी और बालो को आखिरी स्वरुप दे रही थी की तभी सासु माँ की आवाज़ आयी की तैयार हुई की नहीं, सब लोग आ चुके होंगे ज्यादा देर नहीं करते अब।

मैं तुरंत कंघा नीचे रखते हुए बोली हो गया बस और कमरे से बाहर निकल गयी। सासु जी तैयार थे पडोसी के यहाँ एक रात्री जागरण में जाने के लिए। मैंने तुरंत कमरे को ताला लगाया और सासुजी के साथ पैदल घर से निकल पड़ी।

सासु जी कुछ बोलते हुए चल रहे थे पर में किन्ही और ख्यालो में थी, पति को दूसरे शहर गए 4 महीने हो चुके थे और बहुत याद आ रही थी, विरह के कुछ महीने काट रही थी।

दस मिनट के बाद ही हम पड़ोस के मकान के सामने खड़े थे, अंदर काफी चहल पहल थी, रात्रि जागरण का माहौल बन चूका था। एक बड़े हाल में सारे पुरुष लोगो के लिए व्यवस्था थी।

वहाँ की मेरी भाभी सहेलिया दूसरे थोड़े छोटे कमरे में थी अपने पीहर और घनिष्ट सहेलियों के साथ, इसलिए थोड़े अभिवादन के बाद मैंने उनको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा।

अंदर एक बड़े कमरे में सारी औरते बैठी बातों में मशगूल थी, हमारे आते हैं उन्होंने स्वागत किया और हम लोग बैठ गए। कुछ औरते बातों में मग्न थी कुछ ने सोने की तैयारी कर ली थी। पता चला पूजा आरती का कार्यक्रम सुबह 5 बजे होने वाला हैं।

मैं अपने पुराने दिनों और विचारो में खो गयी और मध्य रात्रि होने वाली थी, अब तक सारी औरते और पुरुष सो चुके थे। शायद सुबह 5 बजे उठने की तैयारी में, मगर मेरी आँखों में नींद नहीं थी, भीड़ भरा माहौल देख कर मेरी नींद वैसे भी जा चुकी थी। मैं कमरे से बाहर लघु शंका के बहाने किसी तरह औरतो के पाँव बचाते हुए बाहर निकली।

तभी सामने मोहित दिखाई दिया, जिसका यह घर था। एक हंसमुख और मुखर स्वभाव का युवक मेरे पति का हम उम्र। जब भी किसी फंक्शन में जाता अपनी बातों से वह शमा बाँध लेता। मुझे ऐसे व्यक्तित्व हमेशा आकर्षित करते हैं।

पिछली बार जब कुछ महीने अपने पति से दूर थी तब जब भी वह मिलता मेरी कुशलक्षेम जरुर पूछता और मदद के लिए पूछता। मगर कभी उसे मदद का मौका नहीं दिया।

मुझे देखते ही उसने हँसते हुए सवाल दाग दिया की मेरे पति कब आने वाले हैं। मुझे भी पक्का पता नहीं था पर बोल दिया कुछ और महीने लगेंगे। फिर उसने पूछा की मैं अब तक सोई क्यों नहीं जब की सारे लोग सो चुके थे।

फिर उसने सुबह 5 बजे के प्रोग्राम के बारे में बताया। मैंने उसे समझाया की इस भीड़ में मैं नहीं सो सकती। उसको मुझ पर दया आयी और कुछ सोचने लगा। उसकी इस उधेड़बुन को देखते हुए मैंने एक सवाल दाग दिया आप अब तक क्यों नहीं सोये।

उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान तेर गयी और हाथ में पकड़ी कम्बल को थोड़ा उठाते हुए बोला की उसके सोने का एक विशेष प्रबंध किया हैं उसने घर की छत पर। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, और पूछा छत पर तो बहुत मच्छर होंगे और सुबह होने तक ठण्ड भी बढ़ जाएगी।
वह मेरे सवालो के जवाब के साथ तुरंत तैयार था। उसने बताया की उसने एक मच्छरदानी का इंतज़ाम पहले से कर लिया हैं और ठण्ड के लिए कम्बल लेने ही आया था।

यह कम्बल भी उसने किसी और सोते हुए व्यक्ति के सिरहाने से निकाल कर लिया हैं। मैं उसकी इस शरारत पर खिलखिला पड़ी। मेरे चेहरे पर हंसी देख कर उसको अच्छा लगा और मुझे मदद के रास्ते सोचने लगा।

मैंने मजाक करते हुए कहा आपके अच्छा हैं विशेष इंतेज़ाम हैं, हमारा क्या? यह बात उसकी दिल को लगी। उसमे मुझे सुझाव दिया की मैं छत पर मच्छरदानी में सो जाऊ। मुझे लगा वह मजाक कर रहा हैं, पर वह इस बात पर गंभीर था।

उसने अब और ज्यादा आग्रह किया तो तो मैंने उसको टालने के लिए बोल दिया की फिर आप कहा सोएंगे। उसने बोला की वह नीचे ही सो जायेगा पुरुषो के कमरे में।

मैंने उसका प्रस्ताव यह कहते हुए ठुकरा दिया की यह नहीं हो सकता, सारी महिलाये यहाँ हैं मैं वहां अकेले जाउंगी और किसी को पता लगा तो अच्छा नहीं होगा।

उसने बताया की छत पर कोई नहीं हैं और मैं छत पर लगे दरवाज़े को अंदर से बंद करके सो सकती हूँ, किसी को पता नहीं चलेगा और सुबह सबके जागने तक वापिस नीचे आ सकती हूँ। मुझे कुछ और नहीं सुझा तो बहाना मार दिया की मैं वहाँ अकेले नहीं सो सकती डर लगता हैं।

कुछ सोचने के बाद वह बोला कि वह मेरे साथ सो जायेगा। उसके यह कहते ही एक चुप्पी सी छा गयी। उसे अहसास हुआ की उसने क्या बोल दिया और तुरंत अपनी बात सुधारते हुए बोला कि वह पास में ही दूसरा बिस्तर लगा के सो जाएगा।

मैंने तुरंत मना कर दिया कि मेरी वजह से मैं उसको मच्छरों का भोजन नहीं बना सकती। वह अपने आप को लाचार महसूस करने लगा। हमेशा मदद के लिए ऑफर करने वाला आज मदद मांगने पर नहीं कर पा रहा था।

उसने अपना आखिरी प्रस्ताव रखा कि मच्छरदानी पलंग के साइज की हैं जिसमे दो लोग आसानी से सो सकते हैं और अगर मुझे आपत्ति ना हो तो हम दोनों वहां सो सकते हैं।

मेरे हां कहने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता पर अब उसने एक ब्रह्मास्त्र छोड़ा की अगर मैं उसपे थोड़ा सा भी भरोसा करती हु तो हां कर दू। अब मैं बुरी तरह फंस चुकी थी। न हां कह सकती और न ही ना कह सकती। एक तरफ कुआ दूसरी तरफ खाई।

ऐसा नहीं था की मैं उसपे भरोसा नहीं करती। परन्तु यह समाज, अगर किसी को पता चल गया, तो कुछ ना होते हुए भी मुझे बहुत कुछ होने वाला था। अपने पति को क्या जवाब दूंगी।

मैं हां या ना कुछ कह पाती उसके पहले ही उसने मुझे निर्देश दिया कि मैं अपनी सासुजी को बोल दू की मैं दूसरे कमरे में भाभी (उसकी पत्नी) के साथ सो रही हु और फिर मैं छत पर आ जाऊ वह मेरा इंतज़ार करेगा। यह कहते हुए वह सीढिया चढ़ते हुए चला गया।

मेरे पाँव अब जम गए, फिर औरतो वाले कमरे की तरफ गयी सासुजी दूसरे कोने में सो रहे थे और उन तक पहुंचने के लिए काफी लोगो को लांघ कर जाना था, फिर सासुजी की नींद ख़राब करना ठीक नहीं समझा। मैं मुड़ कर सीढ़ियों की तरफ भारी कदमो से बढ़ने लगी।

किसी तरह बेमन से मैं छत पर पहुंची, वहा वो मेरा इंतज़ार कर रहा था। उसने छत के दरवाज़े पर कुण्डी लगाते हुए मुझे आश्वासन दिया कि चिंता ना करू और किसी को पता नहीं चलेगा।

उसने अच्छे से गद्दा लगा रहा था और मच्छरदानी के अंदर दो तकिये लगे हुए थे। उसने कही से मेरे लिए दूसरे तकिये का इंतज़ाम कर लिया था। शायद फिर किसी के सिरहाने से खिंच कर।

अब हम दोनों एक ही बिस्तर पर आस पास लेटे आसमान को निहार रहे थे। चांदनी रात थी आसमान साफ़ था तारो से भरा हुआ और बहुत खुशनुमा रात का मौसम था। हलकी सी हवा चल रही थी पर ठण्ड शुरू नही हुई थी इसलिए कम्बल एक कोने में पड़ा था। थोड़ी देर ऐसे ही बातें करते रहे फिर थोड़ी 
ख़ामोशी और पता ही नहीं चला कब मेरी आँख लग गयी।

अचानक मैंने अपने सीने पर कुछ हलचल महसूस कि और मेरी नींद टूट गयी पर आँखें अभी भी बंद ही थी। मैंने मह्सूस किया कुछ उंगलिया मेरे ब्लाउज के हुक को खोल रही थी। मैं डर से काँप उठी, क्या यह उसी की हरकत हैं।

अब में क्या कर सकती हु। अगर चिल्लाई तो लोग पूछेंगे मैं यहाँ अकेले क्यों आयी और मुझ पर ही शक करेंगे। मैंने आँखें बंद किये हुए ही कुछ इंतज़ार करना ठीक समझा।

तब तक सारे हुक खुल चुके थे और मेरे खुले ब्लाउज के अंदर कुछ हवा प्रवेश कर गयी। मैं फिर से कांप उठी और एक अनिष्ट की आशंका से गिर गयी। मैं इंतज़ार करने लगी आगे क्या गलत होने वाला हैं।

अब उसका हाथ मेरे पेट पर था, पुरे 4 महीने बाद किसी पुरुष ने मुझे छुआ था, पुरे शरीर में एक तरंग सी दौड़ गयी। कुछ मजा भी आ रहा था पर डर ज्यादा था। उसने अब मेरे पेटीकोट से साड़ी की पटली निकालने की कोशिश की जिसमे वह कामयाब नहीं हुआ, शायद मेरे जाग जाने के डर से ज्यादा ताकत नहीं लगाई। मैंने चैन की सांस ली।

अब उसने मेरा ब्लाउज सामने से और खुला कर दिया शायद मेरे स्तन देखना चाहता था, पर कसे हुए ब्रा की वजह से कुछ हो नहीं पाया। ब्रा का हुक पीठ पर था और मैं पीठ के बल ही सोइ थी इस बात की ख़ुशी थी। वो चाहते हुए भी ब्रा नहीं खोल सकता था।

कुछ मिनट ऐसे ही निकल गए और वो मेरे कमर और ऊपरी सीने पर ऐसे ही हाथ मलता रहा, फिर जब उसे अहसास हुआ की कुछ होने वाला नहीं तो मेरे हुक वापिस लगा दिए। मैंने चैन की लम्बी सांस ली और थोड़ी देर बाद कब फिर आँख लग गयी पता ही नहीं चला।

मेरी नींद में दूसरी बार व्यवधान आया, इस बार मैं करवट लेके उसकी और पीठ करके सोई हुई थी इसलिए आँखें खोली, अभी भी गहरी चांदनी रात थी और नींद खुलने का कारण वही था।

पर थोड़ी देर हो चुकी थी, ब्लाउज के सारे हुक खुल चुके थे। फिर से डर की लहर कोंध गयी कि इस बार कैसे बचूंगी क्यों की मैं करवट लेके सोई थी और ब्रा का हुक उसकी तरफ था।

कुछ सोच पाती उसके पहले ही खट की आवाज़ से ब्रा का हुक खुल चूका था और अचानक सीने पर कस के बाँधा हुआ प्रोटेक्शन ढीला हो चूका था। मैंने एक साये को अपने चेहरे की तरफ आते महसूस किया और तुरंत अपनी आँखें बंद कर ली।

उसके हाथों ने अब मेरा ब्रा, मेरे शरीर के एक महत्पूर्ण अंग से उठा दिया और हवा की लहरे अब मेरे स्तनों को छू रही थी। उस साये में मैंने मह्सूस किया कि अब वह मेरे शरीर के उस भाग को घूर रहा हैं जिसे देखने की असफल कोशिश उसने कुछ देर पहले ही की थी, पर अब वो कामयाब हो चूका था।

मैं अपने आप को कोसने लगी क्यों मैंने करवट ली। और उससे भी पहले क्यू मैं उसको ना नहीं बोल पाई छत पर आने के लिए। पर अब क्या हो सकता था, या अब भी बहुत कुछ रोका जा सकता था।

अगले कुछ क्षणों के बाद उसने एक हाथ से मेरे स्तन को दबोच लिया था, मैं अंदर से पूरी तरह सिहर गयी थी। पर कुछ बोलने या करने की हिम्मत नहीं जुटा पायी। और यह प्रार्थना करने लगी की इससे बुरा कुछ न हो, या शायद अंदर ही अंदर कही से यह चाहती थी की 4 महीने के एकांत वास को टूटने दिया जाये। शायद मैं कुछ निर्णय नहीं ले पा रही थी और खुद को भाग्य के हाथों छोड़ दिया था।

कुछ देर ऐसे खेलने के बाद उसके हाथ फिर मेरी साड़ी की पटली की तरफ बढे और कुछ सेकंड के जद्दोजहद के बाद पटली पेटीकोट के बाहर थी और अगले कुछ मिनटों में मेरी पूरी साड़ी पेटीकोट से अलग हो चुकी थी।

अब मैं एक अबला की नारी तरह पड़ी थी जिसके शरीर पर सिर्फ पेटीकोट था ऊपर के वस्त्र सामने से खुले थे। फिर से एक खट की आवाज़ हुई और मेरे पेटीकोट का नाड़ा खुल चूका था और उसने मेरा पेटीकोट कमर से नीचे खिसकाना शुरू कर दिया।

मैंने आंखें खोली तो पेटीकोट पूरा निकल कर मेरी आँखों के सामने पड़ा चिढ़ा रहा था। और कुछ सोचने के पहले ही मेरे नीचे के अंगवस्त्र भी निकल कर पेटीकोट का साथ पड़े थे।

अब मुझे अहसास हो चूका था कि बचने का कोई रास्ता नहीं हैं और आत्म समर्पण कर देना चाहिए या तुरंत उठ कर फटकार लगा देनी चाहिये कि उसकी यह हिम्मत कैसे हुई। फिर किसी डर की आशंका से या काफी समय से शरीर की जरुरत पूरी नहीं होने की वजह से मैं चुप चाप लेटी रही।

मेरे नग्न शरीर को देख कर अब शायद उसका अपने आप पर नियंत्रण नहीं रहा था और पीछे से उसका शरीर मुझसे चिपका हुआ था और रह रह कर ऊपर निचे रगड़ रहा था। और उसका एक हाथ मेरे कमर, कूल्हों और स्तनों पर फेरा रहा था।

फिर उसने अपना शरीर मुझसे अलग कर लिया, मुझे लगा उसका इरादा बदल गया लगता हैं और मैं सुरक्षित हूं, पर मैं गलत थी। फिर कुछ कपडे निकलने की आवाज़ आयी।

अब मैंने अपने पीछे के निछले हिस्से में एक गर्म बदन का स्पर्श महसूस किया, मुझे समझते देर नहीं लगी की उसने क्या किया हैं। और अब वो पूरा नग्न था मुझसे पीछे से फिर चिपक गया। इस बार शायद कुछ ज्यादा ही जोर से, शायद नग्नावस्था में उसकी इन्द्रिया और सक्रीय हो गयी थी।

उसका लचीला अंग मेरे पुठ्ठो को छु गया। अब शायद कही न कही मैं अपने आप को तैयार कर चुकी थी एक अनपेक्षित मिलन के लिए। उसका शरीर बराबर मुझे पीछे से रगड़ रहा था। मैं महसुस कर पा रही थी उसका लचीला अंग धीरे धीरे कठोर होता जा रहा था। अब वह जोर जोर से मेरे स्तनों को दबाते हुए कुचलने लगा पर अब मुझे बुरा नहीं लग रहा था।

कुछ देर बार उसने हाथ स्तनों से हटा लिया। उसका कठोर अंग अब मेरे दोनों टांगो के बीच खोजी कुत्ते तरह कुछ ढूंढ रहा था। शायद अंदर प्रवेश का मार्ग पर मिल नहीं रहा था। एक दो बार वह मेरे योनि द्वार के आस पास भी पंहुचा था।

थोड़े प्रयासों के बाद ही उसे मेरे शरीर पर गीली जमीन मिल गयी और वो रुक गया। उसका लिंग अब मेरे योनि द्वार पर था। मेरी साँसे जैसे रुक गयी। एक भटकते हुए प्यासे राहगीर के होठों पर जैसे किसी ने पानी का गिलास रख दिया था।

उसके लिंग ने थोड़ी ऊपर नीचे हरकत की और थोड़ा सा योनि में अंदर गड़ गया। मैंने आँखें जोर से बंद कर ली अगले क्षणों में जो होने वालो था उसकी तैयारी में। पति के अलावा पहली बार कोई पुरुष मेरी योनि में प्रवेश करने वाला था। इतनी देर की रगड़ से मेरे अंदर पहले ही थोड़ा गीला हो चूका था।
मक्खन की तरह धीरे धीरे उसका लिंग फिसलते हुए अंदर आता गया और उसके मुँह से सिसकी निकलती गयी। मेरा हाथ चेहरे के पास ही था, सो अपने होठों पर रख मुँह बंद कर दिया। उसने अपने हाथ से एक बार फिर मेरा स्तन दबोच लिया।

मैं अपने काफी अंदर तक उसके कठोर लिंग को महसूस कर पा रही थी। जितनी धीमी गति से वो अंदर गया उसी धीमी गति से उसने फिर उसको आधे से भी ज्यादा बाहर निकाला। अंदर और बाहर निकलते समय उसका लिंग मेरी योनी की दीवारों को रगड़ते हुए जा रहा था और मेरा पूरा शरीर अंदर ही अंदर कम्पन कर रहा था।

दो सेकंड के विराम के बाद एक बार फिर उसी धीमी गति से वो दीवार रगड़ता हुआ अंदर गया। जितना अंदर वो गया उससे मुझे अहसास हो गया उसकी लम्बाई कितनी ज्यादा रही होगी, और जिस तरह वो मेरी दीवारों से रगड़ खा रहा था इतनी मोटाई मैंने तो पहले महसूस नहीं की थी।

काफी समय तक वो ऐसे ही मालगाड़ी की रफ़्तार से धीरे धीरे अंदर जाता थोड़ा रुकता और बाहर आता फिर थोड़ा रूककर अंदर जाता। हर बार अंदर जाते ही उसकी एक लम्बी आह निकलती।

पता ही नहीं चला कब उसकी मालगाड़ी फ़ास्ट ट्रैन में बदली और कब राजधानी एक्सप्रेस बन गयी। उसका लिंग अंदर योनी में एकत्रित पानी को तेजी से चीरता हुआ आ जा रहा था जिससे छपाक छपाक की आवाज़े आने लगी थी। उसकी झटको की गति बढ़ने के साथ छपाक की आवाज़े काफी तेज हो गयी थी।

अब वह तेजी से बार बार झटके मारते हुए अंदर बाहर हो रहा था और मेरी उत्तेजना भी बढ़ती जा रही थी। उसके मुँह से अब आहें निकलने लगी और समय के साथ तेज होती गयी।

मुझे डर लगा कही कोई सुन न ले। रात के सन्नाटे में ऐसी आवाज़ें ज्यादा ही गूंजती हैं। पर मैं मन ही मन चुपके से उसका आनद भी लेती जा रही थी। कुछ ही देर में न चाहते हुए भी मैं भी उस आनंद में भीग गयी।

मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज़ अभी तक दबा के रखी हुई थी, जो की अब आपे से बाहर होता जा रहा था। मेरे होठों के बीच से एक आवाज़ छूट ही गयी।

इसके पहले कि मैं अपने हाथों से ओर जोर से मुँह को दबाती, उसने सुन लिया और डरने की बजाय मेरी आह को मेरी मौन स्वीकर्ती मान कर उसने कुछ जोर के झटके मुझे मारे, जिससे मेरी हलकी चीख निकलने लगी।

अब कोई फायदा नहीं था आवाज़ दबाने का। जिस चीज़ के लिए मैं कुछ महीनो से तड़प रही थी वह मिली तो भी इस तरह से और वह भी किस व्यक्ति से, यह सपने में भी नहीं सोचा था।

उसने अब मेरे ब्लाउज और ब्रा को पूरी तरह मेरे शरीर से अलग कर दिया था। अब मेरे शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं था और ना ही उसके। पर अब हमें कपड़ो की परवाह नहीं थी, हम इन क्षणों को पूरी तरह सफल बनाने में झूट गए।

हम दोनों की आहे एक ही सुर में छपाको की आवाज़ से ताल मिला रही थी। इतनी देर करने के बाद भी उसकी शक्ति क्षीण नहीं हुई थी और उसी गति से उसके झटके निर्बाध जारी थे।

मैं अपनी योनी के बाहर कुछ तरल पदार्थ रिसता हुआ महसूस कर पा रही थी जो उसके लिंग के बाहर आते वक़्त साथ बाहर आ रहा था। मैं अपने चरम की तरफ बढ़ती जा रही थी और दुआ कर रही थी की मुझसे पहले कही वो छूट ना जाये।

पर शायद इन मर्दो को दूसरी औरतो के साथ करते वक़्त ज्यादा ही ताकत मिल जाती हैं। मेरा नशा अब सर तक चढ़ने लगा था और जैसे चक्कर आने लगे, मैं निश्तेज महसूस करने लगी थी, ये चरम के नजदीक पहुंचने के संकेत थे।

मैंने अपनी टाँगे अब खोल दी, जिससे बाहर छलके पानी से हवा टकराई और एक ठंडक का अहसास हुआ। टाँगे खुलने से उसको और भी बड़ा रास्ता मिला और उसने अपना लिंग ओर गहराई में ड़ाल दिया। शायद एक इंच ओर गहरा वो उतर गया था।

अगले कुछ मिनट बहुत कीमती थे, उसने जिस गहराई से एक के बाद एक तेज झटके मारे मैं पूरा छूट गयी, मेरी छोटी छोटी आहें चरम पर आते ही एक लम्बी चीख में तब्दील हो गयी, और उसके बाद मेरी कुछ हलकी चीखे निकली और मैंने अपना चरम प्राप्त कर लिया।

मेरे चरम से उसका उत्साहवर्धन हुआ और वो भूखे भेड़िये की तरह आवाज़े निकालते हुए झटको पर झटके मारता रहा। मेरे स्तन को वो अब बुरी तरह से मौसम्बी की तरह निचोड़ रहा था।

फिर एक झटका उसका इतनी गहराई में उतरा की लिंग बाहर नहीं निकला और वही पड़ा हुआ कुलबुला कर फुफकारने लगा। मैंने अपने अंदर एक गर्म लावा महसूस किया, उसने सारा पानी अंदर छोड़ दिया था। वो कुछ देर तक ऐसे ही निढाल पड़ा रहा।

सारी प्रतिक्रियाए शांत हो चुकी थी जैसे एक तूफ़ान के बाद की शांति। अब भी वह मुझे झकड़े हुए था और उसके शरीर का एक हिस्सा मेरे शरीर में था।
कुछ क्षणों के बाद अपनी चेतना को लौटाते हुए उसने अपने आप को मुझसे अलग किया, उसके बाहर निकलते ही ऐसे लगा जैसे मेरे शरीर का कोई हिस्सा मुझसे अलग हो गया, और एक हलके दर्द से मेरी आह निकली।

मुझे में पीछे मुड़ कर उससे आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं थी, जबकि सारी गलती उसकी थी, शायद मेरी गलती सिर्फ यह थी की मैंने उसे नहीं रोका। पर क्या मैं उसको रोक सकती थी! इसमें मेरी क्या गलती थी, शायद मेरे पति की गलती थी जो की इतने महीनो तक मुझसे दूर रहा और इस हाल में छोड़ दिया की मैं इस गलती में न चाहते हुए भागीदार बनी।

मैंने एक एक कर फिर से अपने कपडे पहनना शुरू किआ। मुझे यह सुनिश्चित करना था की सुबह उठ कर जब नीचे जाउंगी तो मेरी हालत देख कर किसी को कुछ शक ना हो।

कपडे पहनने के बाद जैसे ही मैं मुड़ी देखा वह काफी पहले ही कपडे पहन चूका था और मेरा इंतज़ार कर रहा था दूसरी और देख कर। शायद कपडे पहनते वक़्त भी उसने मुझे घुरा होगा, पर मैंने मन में सोचा अब उधर देखने का क्या फायदा, सब कुछ को वह पहले ही देख चूका हैं।

क्या उसे अपने किये पर शर्मिंदा नहीं होना चाहिए। गलती तो उसने की हैं या फिर मुझे उसको शुक्रिया कहना चाहिए था। उसकी इस जबरदस्ती ने मुझे कई दिनों के बाद एक मानसिक और शारीरिक सुख की प्राप्ति कराई थी। काफी समय के बाद मैं अपने आप को बहुत पूर्ण, तरो ताज़ा और तंदरुस्त महसूस कर थी।

वह मेरे पास चलते हुए आया और पास आकर खड़ा हो गया। मुझे लगा मुझसे माफ़ी मांगेंगा और मैं उसे झूठमूठ गुस्सा करके डाट दूंगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

उसने कहा साढ़े चार बज गए हैं और थोड़ी देर में सब लोग उठने लगेंगे अब मुझे नीचे जाना चाहिए। मैंने उसको दबे शब्दों में कहा आप जरा मेरे आगे चलिए और देखिये कोई मुझे सीढ़ियों से उतरते हुए न देख ले।

उसने तुरंत मेरे हुक्म का पालना किया, और करता भी क्यों नहीं, मैंने उसको उसके एक सपना पूर्ण करने में साथ दिया जो नैतिक तौर पर गलत था। मैंने चैन की सांस ली कि सब ठीक हैं और किसीने नहीं देखा मुझे यह पाप करते हुए।

मैं सासु जी के पास बैठी और थोड़ी ही देर में वह उठ गए। मुझसे कहने लगे तू उठ गयी? नींद तो ठीक से आयी ना? मैंने शरमाते हुए हां में सर हिला दिया और एक कुटिल मुस्कान अंदर ही दबा ली।

सुबह के 7 बज रहे थे और सारे कार्यक्रम ख़त्म हो चुके थे और लोग अपने अपने घरो की तरफ जाने के लिए निकल रहे थे। सासुजी ने आंटी से विदा ली और हम लोग उस घर से बाहर निकले।

कुछ कदम चलने के बाद मैंने पीछे मुड़ कर घर की छत को देखा जहां मैंने कभी ना भूलने वाली रात बितायी थी। वह अभी वही छत पर खड़ा था, शायद मौन रह कर माफ़ी मांग रहा था या शायद मुझे शुक्रिया कह रहा था।

तभी उसने ऊपर से जोर से आवाज़ लगायी “मौसी, मंगलवार को दूसरा जागरण भी रखा हैं याद रखना, जरूर आना हैं”। मेरी सासु जी ने मुस्करा कर “हां याद हैं” जवाब दिया और फिर चल पड़े।

मैंने सासुजी को कहा की मम्मी आप मंगलवार के जागरण में अकेले जाओ तो मुझे भी ले जा सकते हो कंपनी देने के लिए। उन्होंने हां में सर हिलाया। मैं मन ही मन एक मुस्कान लिए उनके साथ अपने घर की तरफ चल पड़ी।
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#2
आखिर वो मंगलवार के दिन का सूरज उग आया, जिसका मुझे पिछले कुछ दिनों से इंतज़ार था। पर इंतज़ार अभी पुरा ख़त्म नहीं हुआ था। असल इंतज़ार तो आज रात के जागरण का था। मैं एक मीठी मुस्कान के साथ उठी और एक उत्साह के साथ रोज़मर्रा के कामों में लग गयी।

दोपहर को मैं रात की तैयारी में लग गयी, मैंने चेहरे पर उबटन लगाया ताकि मेरा चेहरा ओर खिल जाए। फिर अपने पुरे शरीर का वैक्सीन किया ताकि सारे अनचाहे बाल निकल कर त्वचा चिकनी हो जाये।

आज तो समय भी जैसे धीरे धीरे बीत रहा था। जब किसी का बेसब्री से इंतज़ार होता हैं तो समय ऐसे ही परीक्षा लेता हैं।

शाम का खाना खा लेने के तुरंत बाद ही मैंने सजना सवरना शुरू कर दिया था। जैसे किसी जागरण में नहीं किसी शादी में शिरकत करनी हो।

अभी एक घंटा बाकी था जाने में और मैंने अंदर से अपनी पसंदीदा गुलाबी साड़ी निकाली, फिर पहले ही बनाये प्लान के मुताबिक अंदर से वो महंगे वाले डिज़ाइनर अंतवस्त्र निकाले जो मेरे पति कुछ ख़ास मौको पर उन्हें रिझाने के लिए पहनने को कहते थे।

मैं क्या, कोई भी स्त्री उन खूबसूरत अंतवस्त्रों में बहुत कामुक और हसीन लगती। अब मैंने साड़ी पहन ली। फिर से मैं अपना मेकअप करने लगी। मैं सारी तैयारी ऐसे कर रही थी जैसे जागरण नहीं सुहागरात हो। ओरो के लिए वो जागरण था पर मेरे लिए तो सुहागरात ही थी।

एक बार फिर से सासु जी की चिर परिचित आवाज़ सुनाई दी, तैयार हो गयी क्या। इतनी तैयारियों में ध्यान ही नहीं रहा कि कब वो समय हो गया जिसका मुझे कब से इंतज़ार था।

वहां पहुंच कर मेरी नजरे लगातार मोहित को ढूंढ रही थी, जिसके लिए लिए मैंने आज सुबह से इतनी तैयारियां की थी। पर वो मुझे कही दिखाई नहीं दिया। तभी भाभियो ने अपने कक्ष में बुलाया। आज वहाँ इतनी भीड़ नहीं थी।

अब हम लोग आपस में बातें करने लगे। दोनों भाभियाँ कह रही थी कि आज उनके इस कमरे पर दूसरी औरतों का कब्जा होने वाला हैं। उनके कुछ ख़ास रिश्तेदार दूसरी औरतों से अलग उस छोटे कमरे में सोना चाहते थे।

तभी सामने से मोहित ने इठलाते हुए कमरे में प्रवेश किया। मैं ऐसे शरमाई जैसे नई नवेली दुल्हन का पति आ गया हो। उसने अपनी पत्नी को बताया कि उन्होंने जो काम सौपा था वो करके आया हैं। फ़िर वो वापिस बाहर अपने दूसरे कामों के लिए चला गया।

भाभी ने बताया कि वो लोग इस भीड़ में नहीं सोयेंगे बल्कि छत पर सायेंगे। उनका पति उसी इंतज़ाम की बात कर रहा था। मुझे एक गहरा धक्का लगा, अगर यह सब भी ऊपर सोयेंगे तो मेरे अरमानो का क्या होगा।

मुझे अपनी दिनभर की सारी तैयारियां व्यर्थ होती नज़र आयी। मुझे मोहित पर भी बहुत गुस्सा आया, वो ये कैसे कर सकता हैं। क्या इसमें सिर्फ मेरा ही फायदा था, उसका भी तो फायदा था।

उन्होंने मुझसे आग्रह किया की मैं भी इस भीड़ में ना रहु और उनके साथ ही ऊपर सो जाऊ। उन्हें कैसे बताती कि मेरा उनसे भी पहले ऊपर सोने का ही प्लान था।

काफी देर बातें करने के बाद, दूसरी औरतें उस कमरे में आने लगी, तो हम लोग बाहर निकल आये। अब सबके सोने का समय हो चुका था। पिछली बार की तरह इस बार भी सुबह 5 बजे का मुहर्त था।

मैं, दोनों भाभियाँ और उनकी एक सहेली के पीछे पीछे छत पे जाने के लिए सीढिया चढ़ने लगे। तभी मोहित आ गया और मेरे पीछे चलने लगा। इस दौरान उसने बड़ी बेशर्मी से मेरे कमर को छुआ और मेरे पुट्ठो पर हाथ फेरता रहा।

मुझे ख़ुशी तो हो रही थी साथ ही साथ गुसा भी आ रहा था कि उसने मेरे साथ ये धोखा क्यों किया। वो कुछ ओर इंतज़ाम कर सकता था हम दोनों के लिए।

अब हम छत पर पहुंच गए, मोहित ने दरवाज़े पर कुण्डी लगा ली ताकि कोई ओर ना आ सके। वहा तीन मच्छरदानियाँ लगी थी तीन गद्दों के साथ।

बढ़ी भाभी अपनी सहेली जो शायद उनकी बहन थी के साथ एक गद्दे को हथिया लिया। छोटी भाभी जो मोहित की पत्नी भी थी ने मुझे अपने साथ सोने का निमंत्रण दिया।

मोहित ने पीछे से आँख से इशारा करते हुए हुए मुझे ना करने को कहा। मैं अब उसकी बात क्यों मानु? मैं वही करुँगी जो मैं चाहती हूँ। मैं कहना चाहती थी मेरी इच्छा आपके साथ सोने की नहीं बल्कि आपके पति के साथ हैं।

फिलहाल मैंने मना कर दिया, और कहा कि आप अपने पति के साथ सो जाइये, मैं आखिरी गद्दे पे अकेले सो जाउंगी। वो भी शायद यही चाहती थी।

वो लोग अब आपस में कुछ मजाक मस्ती की बातें कर रहे थे। सारे मजाक मोहित की तरफ से ही आ रहे थे और बाकी लोग सिर्फ हंस रहे थे। मैं मन ही मन कुढ़ रही थी इसको तो जैसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ रहा था।

मैं चुपचाप अपनी किस्मत को कोस रही थी। मैं आसमान को निहारते हुए सोच रही थी कि पुरे दिन भर जो तैयारियां की थी वो सब व्यर्थ हो गयी थी। इतने दिनों के इंतजार का यह फल मिला मुझे।

मैने देखा वो अब उन लोगो को कुछ बाँट रहा था। पता चला हाजमे की गोलियां थी। गोली देते हुए वो मजाक में कह रहा था। मुझे उसके मजाक अब सजा लग रहे थे।

सबको गोली देने के बाद उसने मेरी तरफ भी एक गोली बढ़ा दी। मुझे लगा हाजमे की गोली नहीं बेवकूफ बनाने की गोली दे रहा था। मैंने गोली मुंह में रखी और चूसने लगी। सोचने लगी क्या में फिर नीचे चली जाऊ, अब यहाँ रुकने का क्या फायदा। थोड़ी देर के बाद सारी बातें शांत हो गयी थी। मैं भी अब पलट कर सो गयी और मेरी आँख लग गयी।

अचानक मेरी आँखें खुली, कोई मेरे गद्दे पर था और मुझे पीछे से चिपक कर सोया था। उसके हाथ मेरे वक्षो के ऊपर थे। क्या यह वो ही था, पर ये कैसे हो सकता हैं? इतने लोगो, खासकर अपनी पत्नी के वहाँ होते हुए उसकी ये हिम्मत नहीं हो सकती थी।

मैंने थोड़ा पलटकर देखा वही था। मैं तुरंत उठ बैठी और एक निगाह दूसरे गद्दों पर डाली, सब लोग गहरी नींद में थे। ना चाहते हुये भी मैंने इशारों में उसे समझाया कि वहाँ और भी लोग हैं और उसे वापिस अपनी पत्नी के पास जाना चाहिए।

वो एक शरारती मुस्कान के साथ मुझे नज़रअंदाज़ कर रहा था। अब मुझे खतरा महसूस हुआ, अपनी जिद से वो पिछली बार की सारी पोल खोल देगा।

उसने मुझे फिर से लेटा दिया और धीमे से कहने लगा वो लोग अब इतनी जल्दी नहीं उठेंगे। उसने बताया कि बाकियो के ऊपर छत पर सोने का कार्यक्रम दिन में ही बन गया था इसलिए उसने हाजमे की जगह नींद की गोलिया दी थी फ्लेवर वाली। हम दोनों ने जो गोली गयी वो बिना दवाई की थी।

मैं उसके तेज दिमाग की कायल हो गयी। वो बोला बाकि लोग अगले 3-5 घंटे तक नहीं उठेंगे, क्या मेरे लिए इतना वक़्त काफी हैं। मैंने शरमाते हुए कहाँ आपकी इच्छा हो तो सुबह तक भी कर सकते हैं। इतना सुनते ही उसने मेरे वक्षो को फिर से भींच लिया।

अब मुझे कही न कही यकीन हो गया कि मेरी श्रृंगार की मेहनत फ़ालतू नहीं जाएगी। उसने मेरी साड़ी ऊपर से हटा दी, और एक हाथ से ब्लाउज के हुक खोलने लगा। फिर मेरा ब्लाउज निकाल कर रख दिया। अब वह मेरा डिज़ाइनर ब्रा पर हाथ फिराते हुए मजे ले रहा था।

शायद उसको यह बहुत पसंद आया था। आता भी क्यों नहीं, उसकी डिज़ाइन और रंग ही इतना कामुक था किसी को भी ललचाने के लिए। उसे वो इतना पसंद आया कि उसे खोलने की कोशिश भी नहीं की।

अब उसके हाथ नीचे की और गए और मेरी साड़ी को पेटीकोट से अलग कर दिया। अब तो जैसे उसे महारत हासिल हो गयी थी। अब बारी मेरे पेटीकोट की थी।

उसने नाड़ा खोल कर पेटीकोट निचे खिसकाते हुए पैरो से निकाल दिया। अब वो मेरे नीचे के डिज़ाइनर अंतवस्त्र को घूर रहा था। मेरा पैतरा काम कर रहा था। उसने शायद ऐसे अंतवस्त्र पहले कभी नहीं देखे थे। वह उनपर हाथ फिराने लगा।

मुझे लगा वो उन वस्त्रो को मेरे लेटने की वजह से सही ढंग से नहीं देख पा रहा होगा। मैं उठी और मूर्ति की तरह अलग अलग मुद्राये बनाती गयी और अपने बदन को उन अंतवस्त्रों के साथ नुमाइश करके उसको उत्तेजित करने लगी।

उसकी हंसी अब ओर चौड़ी हो गयी और जैसे लार टपकाने लगा। वह तुरंत मेरे समीप आया और घुटनो के बल बैठ गया। अब वो मेरे वेक्स किये हुए टांगो पर अपने हाथ फिराने लगा। मेरी चिकनी टांगो पर उसके हाथ फिसलते जा रहे थे। इन चिकने टांगो के स्पर्श से उसे मजा आने लगा।

मेरी नजर पास के गद्दों पर पड़ी, क्या नींद की दवाई बराबर असर करेगी, इनमे से कोई जाग गया और कुछ देख लिया तो मेरा क्या होगा। तभी उसके दोनों हाथ ऊपर आये और मेरे नीचे के डिज़ाइनर अंतवस्त्र को उतार कर अलग कर दिया। मेरे बिना बालों के नाजुक चिकने अंग को देख कर उसका प्यार उमड़ आया और उसे चूमने लगा।

मैंने भी तुरंत अपनी दोनों टांगो को एक दूसरे से दूर कर उसे थोड़ी ओर जगह दे दी। अब उसका चेहरा मेरे प्रवेश द्वार के नीचे था, उसने अपने होठों और जीभ से मेरे द्वार को चूमना और चाटना शुरू कर दिया।

मेरे शरीर में बिजली दौड़ पड़ी। मैंने अपना शरीर ओर ढीला छोड़ दिया। वह अपनी तीखी जबान से मेरे द्वार के भीतरी दीवारों को रगड़ने लगा। मेरी आहें निकलनी लगी।

कुछ देर इसी तरह वह मुझे आनंदित करता रहा और थोड़ी देर में ही मेरा पानी छूटने लगा। अब मैंने उसे अपने से दूर किया और उसके सामने बैठ गयी।

मैंने उसका टी-शर्ट निकाल दिया, पहली बार किसी पराये मर्द के कपडे खोले थे, शायद उससे बदला लिया मुझे दो बार निवस्त्र करने का। अब मैंने उसकी पैंट भी निकाल दी।

उसके अंतवस्त्र में मुझे उभरता हुआ लिंग दिखाई दिया। मैंने अब तक उसके दर्शन नहीं किये थे। मैंने बिना वक़्त गवाए उसके अंतवस्त्र निकाल दिए, उसका लिंग कुछ उछलते हुए बाहर आ गया, जैसे कब से बाहर आने को तड़प रहा था।

मैंने अपना सर आगे झुकाते हुए उसके लिंग को अपने मुँह में ले लिया। उसकी एक हलकी आह निकल पड़ी। अब मैं अपने होठो और जीभ को आगे पीछे करते हुए उसके लिंग पर रगड़ने लगी। वह सिसकिया मारते हुए आनंदित हुए जा रहा था।

कुछ मिनटों बाद मुझे अपने मुँह में उसके गर्म नमकीन पानी का टेस्ट आया। मुझे लगा वो पूरी तरह कठोर और तैयार हैं। मैंने उसका लिंग अपने मुँह से बाहर निकाला। उसके लिंग से मेरे छेद के बीच चिकने पानी की लारो के तार बन गए।

मैंने उसको धक्का देते हुए लेटा दिया और उस पर सवार हो गयी। मैंने एक बार फिर उसका लिंग हाथ में लिया और अपने शरीर को थोड़ा ऊपर उठाते हुए उसको अपने योनि के आस पास ऊपर नीचे की तरफ रगड़ने लगी।

उसका चिकना अंग फिसल फिसल कर अंदर जाने की कोशिश कर रहा था। मैंने ज्यादा न तड़पाते हुए इस बार अपने प्रवेश द्वार में घुसा दिया। हम दोनों की एक साथ आहें निकल पड़ी।

अब मैं ऊपर नीचे होते हुए उस क्रीड़ा का आनंद लेने लगी। हम दोनों की सांसें तेज चल रही थी और उस सन्नाटे को चीरती हुई हमारी धीमी आहें थी।

उसने अपने बदन को एक हाथ के सहारे ऊपर उठाया और दूसरे हाथ से मेरे ब्रा का हुक खोल उतार दिया और फिर लेट गया। मेरे वक्ष अब मेरे ऊपर नीचे होने के साथ ही नाचते हुए उछल रहे थे। वह उन दोनों को बड़े ध्यान से देख रहा था।

मैंने उसके हाथों को उठाया और अपने वक्षो को पकड़ने को कहाँ। उसने वैसा ही किया और उनको मसलने लगा। थोड़ी देर बाद मैं झुकी और अपना सीना उसके सीने पर रख दिया। मेरे वक्ष अब दब चुके थे।

वह मेरे कमर पर हाथ फेरने लगा। मेरी गति थोड़ी धीमी हुई तो वह भी नीचे से झटके मारने लगा, जिससे उसका लिंग और भी गहरायी से मेरे अँदर जाने लगा।

मैंने अब अपने पाँव लम्बे कर दिए थे। हमारी आहें और भी तेजी से बढ़ने लगी। बीच बीच मैं हम एक दूसरे को होठों पर चुम्बन देते जा रहे थे।

काफी देर करने के बाद मैं थक कर रुक गयी मगर वह नीचे लेटा हुए भी झटके मार रहा था। उसने मुझे अब अपने ऊपर से हटने को कहा, मैं बिना काम पुरे हुए हटना नहीं चाहती थी पर मुझे पता था वो मेरा काम पूरा करेगा।

उसने मुझे दोनों हाथ के पंजो और घुटनो के बल बैठने को कहा डॉगी स्टाइल में। मेरे डॉगी बनते ही वो घुटनो के बल मेरे पीछे आया और एक झटके में अपना लिंग मेरे अंदर उतार दिया। तेजी से अंदर बाहर झटके मारता हुआ वो आवाज़े निकाल रहा था। वो इतना अंदर घुस गया की मेरी भी सिसकिया निकलने लगी।

थोड़ी ही देर में हमको वही चिर परिचित पानी के छपकने की आवाज़े आने लगी। उसने अब अपनी एक टांग को फोल्ड करके पंजो के बल आ गया और दूसरी अभी भी घुटनो के बल थी।

इससे उसकी झटको की ताकत दुगुनी हो गयी थी जिससे मेरी योनी के अंदर की पहुंच और गहरी हो गयी। थोड़ी ही देर में मेरी योनी के अंदर घमासान शुरू हो चूका था। झील के पानी में जैसे तेजी से बार बार डंडा मारने पर जो आवाज़े आती हैं वैसी आवाज़े मेरे अंदर से आ रही थी।

अब मैं अपने चरम तक पहुंच रही थी, मैं उसका नाम बड़ी कामुकता से लिए जा रही थी, मैं यह भी भूल चुकी थी की उसकी पत्नी पास ही में सोई हुई थी।

मेरे उसका नाम लेने से उसका जोश ओर बढ़ गया था। झटके मारना जारी रखते हुए अपने एक हाथ से मेरा वक्ष दबोच लिया। मैं तो पूरा छूटने ही वाली थी की उसने फिर लिंग बाहर निकाल दिया। मुझे थोड़ा बुरा लगा।

उसने मुझे अब बिस्तर पर सीधा लेटाया और दोनों पाँव चौड़े कर दिए। वो मेरे ऊपर लेट गया। मैंने अपना हाथ नीचे किया और उसका लिंग पकड़ कर अपने अंदर कर दिया। उसकी मशीन एक बार फिर शुरू हो गयी। हम दोनों चरम प्राप्ति की तरफ तेजी से बढ़ रहे थे। मैंने अपनी दोनों टांगो को उठाते हुए उसकी कमर पर लपेट दिया।

वो मेरी अंदर की गहराइयों में डूबता हुआ कही खो गया था पर उसकी गति लगातार बढ़ती जा रही थी। यह संकेत था उसके चरम के नजदीक पहुंचने का। चरम प्राप्ति पर मेरे मुँह से कुछ ज्यादा ही जोर से निकल गया- ओ मोहित ! वो भी तेज आहें निकलते हुआ छूट गया, हम दोनों ने एक दूसरे को कस कर झकड़ लिया। हम दोनों ऐसे ही निश्चेत पड़े रहे।

अब मैंने उठने की कोशिश की तो उसने फिर मुझे झकड़ लिया। मुझे भी यह पसंद आया। अब हम दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते थे। अभी तीन घंटो में कुछ समय बाकी था। उसका लिंग अब नरम पड़ कर अपने आप मेरे प्रवेश द्वार से बाहर आ गया था।

अब मैं उठी और अपने बिखरे हुए कपडे सँभालने लगी। मैं अपने नीचे के अंतवस्त्र को पहने लगी, उसने तुरंत मुझसे छीन कर उसे एक तरफ रख दिया और मुझे पीठ के बल लेटा कर अपने मुँह से मेरे निप्पल को चूसने लगा। मुझे मजा आने लगा।

वह अपना एक हाथ बराबर मेरे शरीर पर घुमा रहा था। बारी बारी से अब वो मुझे होठों पर चुम रहा था कभी निप्पल पर। मैं भी उसकी पीठ और पुठ्ठो पर अपने हाथों का प्यारा स्पर्श कर फिरा रही थी। हम कुछ देर तक ऐसे ही एक दूसरे के शरीर का आनद लेते रहे।

अब काफी समय हो चूका था और हम नींद की दवाई के साथ और रिस्क नहीं लेना चाहते थे। मैंने खड़े होकर अपने दोनों अंतवस्त्र पहन लिए। वह कपडे पहन चूका था और मुझे फिर घूरने लगा। मैंने पूछा क्या करू, ऐसे ही रहु, उसने शरारत से सर हां में हिला लिया। थोड़ी ही देर में मैंने अपने सारे कपडे पहन लिए थे।

अब मैं फिर से पहले की भांति लेट गयी। वो अभी भी मेरे गद्दे पर ही था। मैंने उसे थोड़ा धक्का लगाते हुए उसके गद्दे की तरफ धकेला। उसने कहा काम निकल गया क्या? मेरी हंसी निकल गयी। मैंने उसका शर्ट गले से पकड़ा और अपनी और खिंच कर उसके होठों पर चुम्बन कर दिया।

हम कुछ सेकंड तक एक दूसरे के होठों का रस लेते रहे। अब मैं पूरी थक चुकी थी, मेरी उबासी निकली और वो मुझे छोड़ कर बाहर निकला और वापिस आकर अपनी पत्नी के साथ गद्दे पर सो गया।

कब आँख लगी पता ही नहीं चला, एक संतुष्टि की बहुत प्यारी नींद ली मैंने उस रात। सुबह पांच बजे कुछ आवाज़ के साथ मैं जागी। मोहित अपनी पत्नी को उठाने की कोशिश कर रहा था पर वो नींद की दवाई के असर से उठ ही नहीं रही थी।

उसने झकझोड़ते हुए उसको उठाया, फिर दोनों ने मिल कर बाकी के दोनों लोगो को भी उठाया। मैं भी तब उठ खड़ी हुई। अब हम सब नीचे पहुंचे जहां पूजा में सब अपने लिए कुछ मांग रहे थे। मुझे तो मेरा वर मिल चूका था जिसने मेरी सारी मांगे पूरी कर दी थी।
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#3
BHAI SAHAB AB TAK KI KAHANI ME

FULL STOP(.), COMMA (,) LINE BREAK AND PARAGRAPH NAZAR NAHI AA RAHE.

SACH ME AGAR IN SABKA ISTEMAAL KAROGE TO KAHANI AUR ACHCHHI LAGEGI.

MANO. . . NA. . .MANO . . . . . .MARZI AAPKI HAI
Journey of my Kamasutra my first story

https://xossipy.com/thread-12331.html
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#4
जागरण की उस सुबह जब मैं घर लौटी, तो मेरा शरीर थकान से चूर था पर मन एक अजीब सी उत्तेजना से भरा हुआ था। सासु जी और बाकी लोग तो यही समझ रहे थे कि मैं पूरी रात माता की भक्ति में डूबी रही, पर सिर्फ मैं जानती थी कि उन तीन घंटों में मैंने अपनी देह की भक्ति करवाई थी। वह संतुष्टि ऐसी थी कि मुझे अपने पति अशोक का पास आना भी अब फीका लगने लगा था।

मोहित का वह बेबाक अंदाज़, उसका वह 'नींद की गोलियों' वाला शातिर दिमाग—ये सब मेरे दिमाग में घर कर गया था। मुझे पहली बार अहसास हुआ कि नियम और परंपराएं सिर्फ उन लोगों के लिए हैं जो डरते हैं। जो चालाक हैं, उनके लिए पूरी दुनिया एक मौका है।

कुछ हफ्तों बाद जब मेरा मासिक धर्म आया, तो मुझे एक अजीब सी निराशा हुई। मन के किसी कोने में एक उम्मीद थी कि शायद मोहित के साथ उस रात का कोई 'निशान' मेरे अंदर रह गया हो। पर ऐसा नहीं हुआ। इसी बीच अशोक का ट्रांसफर एक बड़े शहर में हो गया। यह हमारे लिए एक ताजी हवा के झोंके जैसा था। हमने अपना बोरिया-बिस्तर समेटा और नए शहर की चकाचौंध में आ गए।

नए शहर में आकर मुझे लगा कि यहाँ कोई टोकने वाला नहीं होगा। लेकिन यहाँ की तन्हाई ने मुझे और भी बेचैन कर दिया। अशोक ऑफिस में व्यस्त रहते और मैं दिन भर अपनी देह और अपनी अधूरी ख्वाहिशों के बारे में सोचती।

नए शहर में आए हमें अभी कुछ ही महीने हुए थे। उम्मीद थी कि नई जगह, नया माहौल शायद हमारे आंगन में भी किलकारियां भर देगा, पर ऐसा हुआ नहीं। अशोक अक्सर थके-हारे घर लौटते और समाज के ताने फोन के जरिए यहाँ भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहे थे। आखिर एक दिन अशोक ने भारी मन से कहा, "चलो, किसी बड़े शहर के बड़े डॉक्टर को दिखाते हैं, जो होगा देखा जाएगा।"

अगले दिन हम शहर के सबसे मशहूर फर्टिलिटी सेंटर पहुँचे। वहां की सफेद दीवारें और दवाइयों की गंध मुझे डरा रही थी। डॉक्टर खन्ना ने अशोक को कुछ टेस्ट करवाने की सलाह दी।

दो दिन बाद जब हम रिपोर्ट लेने पहुँचे, तो डॉक्टर के केबिन में भारी सन्नाटा था। डॉक्टर खन्ना ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और गंभीर आवाज़ में बोले, "मिस्टर अशोक, मुझे दुख है कि रिपोर्ट्स वैसी नहीं हैं जैसी हम उम्मीद कर रहे थे। आपका स्पर्म काउंट 'निल' के बराबर है। मेडिकल भाषा में इसे अज़ोस्पर्मिया (Azoospermia) कहते हैं। इस स्थिति में कुदरती तौर पर पिता बनना लगभग नामुमकिन है।"

अशोक के चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। उनके हाथ में पकड़ी फाइल नीचे गिर गई। उन्होंने कांपती आवाज़ में पूछा, "क्या कोई इलाज, कोई सर्जरी?"

डॉक्टर ने सहानुभूति से सिर हिलाया, "इलाज लंबा है और सफलता की गारंटी बहुत कम। अगर आप चाहें तो हम 'डोनर स्पर्म' की कोशिश कर सकते हैं।"

डॉक्टर की क्लिनिक से आने के बाद अशोक ने खुद को कमरे में बंद कर लिया था। बाहर सन्नाटा था, लेकिन कमरे के अंदर से उनके सिसकने की आवाज़ें आ रही थीं। जब रात के दो बजे मैं पानी लेकर अंदर गई, तो देखा कि अशोक जमीन पर बैठे थे, उनके हाथ में हमारी शादी की तस्वीर थी और आँखों से आंसू बह रहे थे।

मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा, तो वो मुझसे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगे। "मैं अधूरा हूँ," उन्होंने सिसकते हुए कहा। "समाज मुझे कोसेगा, माँ तुम्हें बाँझ कहेगी, पर असली मुजरिम मैं हूँ। मैं तुम्हें वो सुख नहीं दे पा रहा जिसकी तुम हकदार हो।"

मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की, "हम गोद ले लेंगे अशोक, कोई बात नहीं।"

लेकिन अशोक ने झटके से अपना सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं। "गोद? नहीं! मैं चाहता हूँ कि इस घर में जो बच्चा पले, वो तुम्हारी कोख से जन्मा हो। उसका आधा खून तो तुम्हारा होगा। मैं किसी और के बच्चे को अपना नाम नहीं दे सकता, लेकिन तुम्हारे खून को अपना नाम दे सकता हूँ।"

उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा और बहुत धीमी, लड़खड़ाती आवाज़ में बोले, "मैंने इंटरनेट पर पढ़ा है... स्पर्म डोनेशन के बारे में। पर वो सब बहुत अजीब है। किसी अनजान डॉक्टर के हाथ से, किसी अनजान मर्द का स्पर्म... नहीं! मुझे डर है कि कहीं बच्चा बिलकुल अलग न दिखने लगे।"

वो कुछ देर चुप रहे, फिर मेरी आँखों में गहराई से झांकते हुए बोले, "अगर... अगर हम डोनर खुद चुनें तो? कोई ऐसा जिसे मैं जानता हूँ, जिसकी सेहत और अक्ल का मुझे पता हो। कोई ऐसा जो दिखने में थोड़ा-बहुत मेरी तरह हो।"

मैं स्तब्ध रह गई। "आप क्या कह रहे हैं अशोक? आप... आप मुझे किसी और के पास...?"

अशोक की आँखों से फिर आंसू टपक पड़े। उन्होंने अपना चेहरा हाथों से ढँक लिया। "मेरे लिए यह कहना मौत जैसा है। मैं एक पति हूँ, अपनी पत्नी को किसी और के साथ देखने का ख्याल ही मुझे मार देता है। लेकिन तुम्हें रोज़ तिल-तिल मरते देखना, उन तानों को सहते देखना उससे भी बड़ी मौत है। मैं चाहता हूँ कि तुम माँ बनो। अगर मैं जरिया नहीं बन सकता, तो कम से कम मैं वो जरिया 'चुन' तो सकता हूँ।"

अशोक ने मुझे बिस्तर पर बिठाया और समझाने लगे, जैसे कोई किसी को सौदा समझाता है। "देखो, अगर हम सीधे किसी से मदद मांगेंगे, तो वो जिंदगी भर हमें ब्लैकमेल करेगा। वो बच्चे पर हक जताएगा। हमें यह काम 'चोरी' से करना होगा। उसे लगना चाहिए कि उसने गलती की है, उसने मौका पाकर एक 'सोती हुई' औरत का फायदा उठाया है।"

उनकी आवाज़ में अब एक अजीब सी सख्ती आ गई थी। "हम उसे फंसाएंगे। मैं घर छोड़कर जाऊंगा, तुम उसे मौका दोगी। और जब वो अपना काम कर लेगा, तो हम उसे इतना डरा देंगे कि वो शहर छोड़कर भाग जाए। उसे ताउम्र ये अहसास रहे कि उसने अपने दोस्त की पत्नी के साथ बलात्कार जैसा कुछ किया है। इस डर और शर्म के मारे वो कभी वापस नहीं आएगा, और न ही कभी इस बात का जिक्र करेगा।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। एक पति अपनी पत्नी को 'शिकार' की तरह पेश करने की योजना बना रहा था। अशोक बोले, "मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता, पर मैं तुम्हें 'माँ' बनते देखना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे सम्मान के लिए, हमारे परिवार के लिए इतना बड़ा त्याग करोगी? क्या तुम एक नाटक करोगी?"

मेरे मन में भी कुछ समय से ये विचार था पर पति के डर से बोलने की हिम्मत नहीं थी। फिर भी मैंने उनके प्रस्ताव पर ऐसे रिएक्ट किया जैसे कोई आघात लगा हो और मना कर दिया। पति ने यकीन दिलाया कि इस से बढ़िया उपाय नहीं हो सकता तो मैंने हां कर दी।

इस काम के लिए अगर हम किसी जान पहचान वाले को चुनते तो कल को वो हमे ब्लैकमेल कर सकता था या बच्चे पर हक़ जता सकता था। अगर अनजान को चुनते तो हो सकता हैं उसे कोई छीपी बीमारी हो। हमें ऐसा आदमी भी चुनना था जो दिखने में पति से बिलकुल विपरीत ना हो।

अंत में हमने निर्णय लिया कि किसी जान पहचान वाले को चुनेंगे जिसका मेडिकल बैकग्राउंड हमें अच्छे से पता हो। जहा तक ब्लैकमेल की बात हैं तो हमें कुछ ऐसा करना था जिससे उसको कभी ये पता नहीं चले कि होने वाला बच्चा उसका हैं और हमारा मकसद क्या हैं। वो भविष्य में मुझे मजबूर ना करे इसके लिए हमें कोई ऐसा जाल बुनना था कि सेक्स करने के बाद उसके मन में एक अपराधबोध रहे जिसकी वजह से वो इसका जिक्र किसी से न करे और इस काण्ड को भूल जाये।

हमने हमारी साजिश की रुपरेखा बना ली थी बस एक बकरे की तलाश थी। कुछ दिनों बाद मेरे पति शाम को घर पर बहुत ख़ुशी ख़ुशी लौटे और मुझे बताया की शिकार का इंतज़ाम हो गया हैं।

उनका कॉलेज का एक दोस्त नरेश जो दूसरे शहर में रहता हैं, वो हमारे शहर में कंपनी के काम से दो दिन बाद आने वाला हैं और उसका हमसे मिलने का भी प्लान हैं। पति ने उसको शाम के खाने पर भी बुला लिया हैं। उन्होंने उसका फोटो भी बताया, रंग रूप में मेरे पति से थोड़ा मिलता जुलता था।

हम दोनों अपना प्लान डिटेल में बनाने लगे। क्या कपडे पहनने हैं से लेकर क्या डायलॉग बोलने हैं तक सब सोच लिया था। इन दो दिनों में कई बार रिहर्सल भी कर के देख ली थी। प्लान A के अलावा प्लान B और C भी तैयार रखा था।

आखिर वो निर्णायक शाम भी आयी। मैंने खाना तैयार कर लिया था और अच्छे से मेक अप लगा लिया उसको रिझाने के लिए। हलके रंग की पारदर्शी साडी के अंदर स्लीवलेस डीप नैक ब्लाउज पहना, बिना ब्रा के। उस ब्लाउज को बांधने के लिए सिर्फ दो डोरिया थी, एक पीछे गर्दन के नीचे और दूसरा कमर पर। पूरी पीठ और कमर नंगी थी जिससे मेरा पूरा ऊपरी फिगर दिख रहा था।

दरवाज़े की घंटी बजी पति ने की-होल से देखा नरेश ही था। वो वापस अंदर सोफे पर आकर बैठ गए और प्लान के अनुसार मैंने दरवाज़ा खोला। मुझ हसीन को देखते ही नरेश की आँखें फटी रह गयी।

हाय हेलो हुआ। पर उसकी नज़रे मेरे सीने पर जा टिकी, पारदर्शी साडी में क्लीवेज दिख रहा था जिसे वो घूर रहा था। उसको अंदर लिया और गैलरी से होते हुए हम हॉल की तरफ बढे। वो मेरे पीछे चल रहा था जिससे मेरी नंगी पीठ और कमर को देख पाए।

पति और नरेश आपस में बातें करने लगे और मैं खाना लगाने चली गयी। हमने साथ में बैठ कर खाना गया और फिर वापिस आकर तीनो हॉल में बातें करने लगे। मुझसे बात करते वक़्त उसकी नज़रे लगातार मेरे शरीर को स्कैन कर रही थी।

रात 9:30 के करीब पति ने नरेश को बोला कि इतनी लेट तुम कहाँ दूर होटल में वापिस जाओगे, आज रात यही रुक जाओ। वो भी रुकना तो चाहता था पर कहा कि तुम दोनों को तकलीफ होगी। हम दोनों ने उसको कन्विंस कर लिया रात रुकने के लिए।

पति ने उसको अपना एक पाजामा और टीशर्ट दे दिया रात को पहनने के लिए और दोनों हॉल में फिर बातें करने लगे। रात के दस बजे मैंने बैडरूम से पति को फ़ोन किया। उन्होंने ऑफिस में किसी से बात कर रहे हो ऐसा नाटक किया।

फ़ोन रखने के बाद मैं हॉल में आयी। पति ने प्लान के अनुसार बहाना बनाया कि ऑफिस में कोई अर्जेंट इस्यु आया हैं और उनको जाना पड़ेगा। नरेश मन ही मन बहुत खुश हुआ पर ऊपर से बोला कि अशोक तुम जा रहे हो तो मैं भी निकलता हूँ।

पति ने कहा कि मैं अपनी पत्नी को रात को घर पर अकेला नहीं छोड़ता सेफ्टी के लिए पर अच्छा हुआ आज तुम घर पर हो तो मुझे टेंशन नहीं। मैं तुम्हारे भरोसे जा सकता हूँ। वह खुश हो गया, बिल्ली को दूध की रखवाली करने को मिल गयी थी।

मेरे पति थोड़ी देर में तैयार होकर निकलने लगे और बोल गए, नरेश मैं सुबह वापिस ना आउ तब तक जाना मत। उन्होंने पहले से ही प्लान के मुताबिक हमारी बिल्डिंग से थोड़ी ही दूर उनके अपने ऑफिस के बैचलर लड़को के फ्लैट में रहने चले गए और वहां बहाना मार दिया कि वाइफ मायके गयी हैं और मेरी चाबी फ्लैट में अंदर रह गयी, रात को चाबी बनाने वाला नहीं मिलेगा तो रात वही रुकेंगे।

मैं और नरेश अब बातें करने लगे। इस बीच वो मुझे प्यासी निगाहों से घूरता रहा। उसकी नज़रे जैसे मेरे कपड़ो के अंदर झांक रही थी।

पहले वो हॉल में सोफे पर सोने वाला था अब मैंने उसको कहा की मेरा बेड किंग साइज हैं और पति नहीं हैं तो बिस्तर आधा खाली पड़ा हैं, तो वो अंदर सो सकता हैं, सोफे के मुकाबले आरामदायक रहेगा।

अंधे को क्या चाहिए दो आँखें। पर अपने आप को शरीफ बताने के लिए उसने बोला अशोक को बुरा न लग जाए। मैंने सांत्वना दी की अशोक भी यही कहते सो चिंता मत करो। उसने कहा आपको प्रॉब्लम नहीं हैं तो चलेगा और हम दोनों बैडरूम में आ गए।

नाईट लैंप लगा दिया और हम दोनों एक दूसरे की आमने सामने करवट लेकर बातें करने लगे। जैसा कि हम रिहर्सल कर चुके थे, लेटने से मेरे वक्षो पर दबाव पढ़ा और वो डीप कट ब्लाउज से आधे बाहर झांकने लगे। उसकी निगाहें दो सेकंड मेरे चेहरे पर तो दस सेकंड सीने पर टिक रही थी।

मैंने अब गुड नाईट बोल कर दूसरी तरफ करवट ली। मेरी नंगी पीठ उसकी तरफ थी जिस पर सिर्फ ब्लाउज की दो डोरियों की गांठे थी। थोड़ी ही देर में मैंने हलके नकली खर्राटों की आवाज़े निकाली ताकि उसको अहसास हो कि मैं सो चुकी हूँ।

अब वो खिसक कर मेरे इतने करीब आ गया कि उसकी गर्म सांसें मैं अपने पीठ और गर्दन पर महसूस कर पा रही थी। बीच बीच में उसकी उंगलिया जरा सी मेरे बदन को छू रही थी।

इतनी देर से कण्ट्रोल किये हुए उसने अब एक एक करके मेरी ब्लाउज की डोरियों की दोनों गांठे खोल दी। मेरा ब्लाउज ढीला हो कर वक्षो से थोड़ा दूर हो गया। उसने पीठ और कमर पर हाथ फ़ेरना शुरू कर दिया। मैं गरम होने लगी।

अब उसने ऊपर की डोरी को आगे की तरफ लाकर नीचे की तरफ खिंचा जिससे मेरा ब्लाउज मेरे वक्षो से दूर हो गया और ऊपर की तरफ से निप्पल दिखने लगे। मेरे वक्ष कड़क थे और निप्पल तने हुए थे। ये देख कर उसकी हालत खराब हो गयी।

उसने तुरंत एक हाथ कमर पर रखा और धीरे धीरे ऊपर लाते हुए ढीले ब्लाउज के अंदर ले गया। उसकी उंगलिया मेरे उभरे वक्षो को छु गयी। उससे कण्ट्रोल नहीं हुआ और उसने मेरा ऊपर वाला वक्ष पूरा हाथ में भर कर दबा लिया।

थोड़ी देर वो ऐसे ही उनको मलता रहा। अब बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने आलस भरी आवाज़ में कहा अशोक छोडो न सो जाओ। ताकि उसको ये लगे कि मैं आधी नींद मैं हूँ और उसको अपना पति समझ रही हूँ।

उसके हौसले बढ़ गए और मेरे बदन पर हाथ फेरता रहा और पीछे से चिपक गया, जिससे मैं गीला होने लगी। उसने मेरे आधे खुले ब्लाउज के साथ ही नीचे के बाकी सारे कपडे भी एक एक करके निकाल दिए।

मेरा पूरा नंगा बदन देख कर उसकी हालत ख़राब हो गयी। वो अपना लिंग मेरे पिछवाड़े पर रगड़ने लगा और रगड़ते रगड़ते अचानक मेरे आगे के छेद में अंदर घुसा दिया। उसके मुँह से एक चैन की आह निकली।

मेरे मुँह से भी आह निकली और कहा अशोक क्या कर रहे हो सोने दो न। पर उस पर तो नशा चढ़ गया था। ऊपर से सांत्वना थी कि मैं उसको अपना पति समझ रही थी नींद में।

अब तो उसने बिना रुके मुझे पीछे से झटके पे झटके मारना शुरू कर दिया। हमारा आधा प्लान कामयाब हो चूका था। मैंने भी उसको उकसाने के लिए बोलना शुरू कर दिया अशोक जोर से मारो। नरेश अपने आप को अशोक के भेष में महसूस करके ओर जोर से चोदने लगा।

हम दोनों ही भरे बैठे थे, हालांकि मकसद अलग अलग था पर फीलिंग्स तो एक जैसी हो रही थी। मैं तो चाहती थी की मेरे अंदर आज दो चार अंडे एक साथ बन जाये।

उसका हाथ कभी मेरी निप्पलों को दबाता तो कभी आगे के छेद के ऊपर रगड़ता। जिससे मेरी और भी जोर से सिसकी निकलती और उसको मजा आता। उसने अब मेरी ऊपर की एक टांग अपने हाथ से हवा में उठा ली और अपना लिंग ओर भी अंदर गाड़ दिया।

मैं चाहती थी कि उसका सारा पानी मेरे अंदर खाली हो जाये, इसके लिए मैं अपना हाथ नीचे ले गयी और उसके लिंग के नीचे की थैलियों पर रख दिया। उसके आगे पीछे के झटको के साथ मेरा हाथ उसकी थैलियों को रगड़ रहा था। उसको दुगुना मजा आने लगा।

बहुत देर तक करने के बाद उसका बूंद बूंद पानी रिसने लगा और आखिर मेरे पानी का उसके गरम पानी से मिलन हुआ और कमरा अंदर की तरह तरह की आवाज़ों से गूंज उठा और उस बीच मेरी आ ऊ की रट।

आखिरी कुछ क्षणों में उसने अपना गला फाड़ते हुए चीखते हुए अपनी पिचकारी को मेरे अंदर पूरा खाली कर दिया। अगले कुछ झटके उसने बहुत जोर से मारे कि मेरी तो अंदर से जैसे फट ही गयी थी और मैं पागलो के जैसे दर्द के मारे चीखने लगी। और वो मेरा नाम लेकर जोश जोश में गंदी गंदी गालियाँ निकालने लगा।

उसके काम ख़त्म करते ही अब बारी थी प्लान के दूसरे भाग की। मैं तेजी से पलटी और आश्चर्य से कहा तुम! मुझे लगा अशोक हैं। तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया।

मैं रोनी सूरत बना कर रोते रोते कहा तुमने मेरे साथ ज़बरदस्ती की हैं और धोखा दिया हैं और ये कहते हुए अपने तन को पास पड़े कपड़ो से ढकने लगी।

उसका काम ख़त्म हो चूका था तो नशा भी उतर चूका था। अब उसको अहसास था कि जोश जोश में उसने क्या कर दिया हैं। वो बुरी तरह से डर गया और कपडे पहनते हुए मुझे माफ़ी मांगने लगा।

मैंने उसको सिक्युरिटी में ले जाने की भी धमकी दी जिससे उसकी हालत पतली हो गयी और मेरे पैर पड़ने लगा कि उसकी बदनामी हो जाएगी।

तो मैंने उसको कहा कि बदनामी तो मेरी भी होगी। मैं एक ही शर्त पर माफ़ करुँगी कि वो ये बात किसी से ना कहे क्यों कि इससे मेरी भी बदनामी होगी और अगर मेरी बदनामी हुई तो मैं उसको जेल पहुचा के ही रहूंगी।

वो तुरंत मान गया और वादा किया कि कभी किसी को नहीं बताएगा और आज के बाद मेरे सामने भी नहीं आएगा।

तभी वो बाहर जाकर सो गया। मुझे यकिन था कि वो डर गया हैं और मेरा प्लान कामयाब रहा। सुबह पति के घर आने के बाद बिना नज़रे मिलाये हुए ही जल्दी में वह बाय बोलकर एक अपराधी की तरह तेजी से भाग निकला।

हमारी फ़साने की चाल तो कामयाब रही पर परिणाम जैसा चाहा वैसा नहीं मिला। एक बार की चुदाई से मैं माँ नहीं बन पायी, शायद एक दो बार और करवाने से काम हो जाता। पर अब हमें पता था कि काम कैसे निकलवाना हैं।

इसके बाद हमने यही पैतरा तीन ओर मर्दो पर आजमाया ताकि बच्चा होने की सम्भावना बढ़ जाए।
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#5
एक औलाद के लिए तरसते हम पति पत्नी ने किस तरह समझौता करते हुए एक साजिश रची और पति के दोस्त को फंसा कर मेरे साथ सेक्स करवा लिया। काम निकलने के बाद उसको डरा धमका कर भगा भी दिया।

हमारा काम अभी भी पूरा नहीं हुआ था, और हमें ये साजिश फिर से रचनी थी।

हमारी जो मोडस ऑपरेंडी था उसके हिसाब से हम एक ही मर्द को दो बार नहीं फंसा सकते थे वरना पकड़े जाते। अब हमने सोच लिया था कि एक के बाद एक दो तीन लोगो को फंसाना होगा, जिससे मेरे गर्भधारण की संभावना बढ़ जाये। साथ ही साथ बाकी की बातों का भी ध्यान रखना था, हमें अपना अगला शिकार काफी आसानी से मिल गया।

आपको याद होगा मेरे पति अशोक रात को रहने के लिए अपने ऑफिस के सहकर्मी के यहाँ गए थे, जो कि हमारे घर के पास ही रहता था। वो एक दो बार हमारे घर आ चूका था। उसका नाम रौनक था और 22 साल का बैचलर लड़का था। मुझसे 3 साल ही छोटा था।

रौनक बहुत ही शरीफ लड़का था, पति की तरह लंबा था। शायद उसकी शराफत की वजह से उसको फंसाना थोडा मुश्किल होता पर उसको डराना उतना ही आसान होता, तो फिर हमने उसी को चुना।

हमें इतना तो पता था कि सुबह के वक्त किया हुआ सेक्स प्रेग्नेंट होने के लिए ज्यादा फायदेमंद होता हैं। हमने इसी समय के हिसाब से अपना प्लान बनाना शुरू किया। पिछले प्लान की कामयाबी के बाद हमारा हौसले बुलंद थे।

रौनक रोज सुबह जॉगिंग के लिए हमारे घर के पास वाले गार्डन में आता हैं। हमें इसी वक्त उसको पकड़ना था। शनिवार और रविवार को छुट्टी होती हैं तो हमने रविवार की सुबह का प्लान बनाया।

रविवार सुबह जल्दी उठ हमने सारा सेटअप कर लिया था। सुबह सात बजे के करीब दूध वाला थैली दरवाज़े के बाहर टांग कर बेल बजा कर चला जाता हैं। पति ने बाहर जाकर चेक किया दूध आ गया था, उन्होंने दूध वही छोड़ा और अंदर आकर रौनक को फ़ोन घुमाया।

रौनक को फ़ोन पर बताया कि उसकी एक मदद चाहिए। पति ने उसको बताया कि वो शनिवार को ही आउट ऑफ़ स्टेशन के लिए निकल गए थे और आज सुबह आने वाले थे पर अब दोपहर तक ही पहुंचेंगे। सुबह से वाइफ को यानि मुझे फ़ोन कर रहे हैं पर फ़ोन लग नहीं रहा हैं। शायद वाइफ पीहर जाने का प्लान बना रही थी तो शायद सच में चली गयी हैं और ट्रेवल कर रही हैं इसलिए फ़ोन नहीं लग रहा।

उनको रौनक से ये मदद चाहिए कि दूध वाला थैली लगा कर गया हैं तो वो आकर डोरमेट के नीचे छिपा कर रखी चाबी से दरवाज़ा खोले और दूध अंदर फ्रीज में रख दे, ताकि दोपहर पति के आने तक दूध खराब न हो जाये।

रौनक वैसे भी जॉगिंग पे निकलने ही वाला था और हमारे घर की तरफ ही आने वाला था तो उसने हां कर दी। हमने जल्दी से पोजीशन लेनी शुरू कर दी।

मैंने पहले से इस दिन के लिए लिए ख़रीदा हुआ पारदर्शी गाउन पहन लिया जो घुटनो तक ही आता था। गाउन के अंदर कुछ नहीं पहना था तो थोड़ा बहुत अंदर का सामान दिख रहा था।

मैं हॉल में सोफे के पास नीचे कारपेट पर लेट गयी। एक पाँव सोफे के ऊपर और एक जमीन पर था, जिससे मेरे दोनों टांगो के बीच के गैप से सब कुछ दिख रहा था। पति ने मेरी टांगो कि पोजीशन चेक कर ली जिससे जो भी दरवाज़े के अंदर आये उसे सबसे पहले मेरे टांगो के बीच का खुला दरवाज़ा दिखे।

सेंटर टेबल पर शराब की लगभग खाली बोतल, एक गिलास और साथ में चखना रख दिया। ताकि कोई भी आये तो उसे लगे कि मैं शराब के नशे में धुत हूँ। मैं शराब नहीं पीती पर थोड़ी सी अपने होठों पर और थोड़ी अपने कपड़ो पर छिड़क ली ताकि शरीर से शराब की बदबू आये।

पति अब अंदर बेडरूम में गए और हमारे वॉक इन क्लोसेट में छुप गए।

कुछ मिनटों के बाद ही ताला खुलने की आवाज़ आयी। मैंने आँखें इस तरह बंद की कि सामने से लगे वो बंद हैं पर पलकों के नीचे थोड़े गैप से थोड़ा दीखता रहे। ये भी थोड़ी रिहर्सल के बाद पति से टेस्ट करवा के किया हुआ था।

अब दरवाज़ा खुला और रौनक हाथ में दूध की थैली लिए अंदर घुसा और उसकी नज़रे मुझ पर पड़ी। उसकी आँखें मेरी दोनों टांगो के बीच पड़ी थी जो कि उसके खुले मुँह से लग गया था, उसको मेरा हरा भरा माल दिख रहा था। वो तेजी से चलता हुआ मेरे पास आया।

मेरी आँखें बंद देख कर मुझे आवाज़ लगाई। उसने अब टेबल पर पड़ी शराब और चखना देख कर अंदाज़ा लगा लिए था कि क्या माजरा हैं। उसने एक बार पाँव तो एक बार हाथ हिला कर उठाने की कोशिश की।

फिर वो मेरे पैर की तरफ आकरबैठ गया और मेरी टांगो के बीच के माल को घूरने लगा। उसकी आँखों में प्यास थी। थोड़ी देर घूरने के बाद वो वो आगे आया और मेरे पारदर्शी गाउन के अंदर के अंग देख कर मेरे बदन पर जगह जगह हाथ लगा कर मुझे झकझोर कर उठाने की कोशिश करने लाग। उठाने की कोशिश कम पर मेरे बदन को महसूस करने की कोशिश ज्यादा थी।

वैसे तो बहुत शरीफ बनता हैं पर था तो एक मर्द, वो भी एक बैचलर। ऊपर से सामने तिजोरी खुली पड़ी थी तो उसका ईमान डोल गया था। तभी उसका फ़ोन बजा। उसने दूध उठाया और किचन की तरफ जाते हुए फ़ोन पर बात करने लगा।

किचन से लौटते वक्त थोड़ा पानी गिलास में ले आया और थोड़ा मेरी आँखों पर छिड़कने लगा। मैंने आँखें मिचमिचाई और फिर वैसे ही बंद कर दी।

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैं थोड़ा घबराइ कि इस वक्त तो कोई आता नहीं। इस चीज का तो हमने कोई काउंटर प्लान ही नहीं बनाया था। मैं अगर उठ जाती तो प्लान फ़ैल हो सकता था। तब तक रौनक ने दरवाज़ा खोल दिया और एक दूसरे लड़के को अंदर ले लिया। मैंने देखा ये तो उसका रूममेट संदीप हैं।

मैंने लेटे रहने में ही भलाई समझी। अब संदीप मेरी टांगो के बीच घूर रहा था और रौनक को बोल रहा था क्या माल हैं यार। आज तो लॉटरी लग गयी। चल इसको पूरी नंगी कर देते हैं और मजे ले लेते हैं ये तो वैसे भी नशे में हैं कुछ पता नहीं चलेगा।

रौनक ने उसको मना किया और बोला कि अंदर बैडरूम में सुला देते हैं और उठाने की कोशिश करते हैं। रौनक ने मेरे कंधो के नीचे हाथ डाला उठाने के लिए और संदीप ने सोफे पर पड़ी मेरी टांग नीचे की और टाँगे उठा ली। इससे मेरा गाउन कमर की तरफ खिसक गया और मेरे नीचे के अंग बाहर दिखने लगे। दोनों हसने लगे और ऐसे ही मुझे उठा कर बैडरूम में ले आये।

मेरी पति पहले ही अंदर छुपे थे और अब तक दो लोगो की आवाज़े सुन चुके थे। बाहर आ नहीं सकते क्यों कि खुद झूठे साबित हो जाते इसलिए क्लोसेट के अंदर से ही चुपचाप सब देखना था।

मुझे बिस्तर पर लेटाने के बाद संदीप ने मेरा गाउन थोड़ा और ऊपर कर दिया और मेरे नीचे के नाजुक अंग पर हाथ फेरने लगा। फिर अपनी ऊँगली बाहर की सतह पर रगड़ने लगा। मुझे कुछ कुछ होने लगा।

संदीप को देख कर रौनक के भी हौसले बढ़ गए। वो हलके पारदर्शी गाउन के ऊपर से ही मेरे वक्षो को देख पा रहा था तो उनको दबाने लगा और संदीप को बोला कि बड़े जबरदस्त हैं ये तो। संदीप को भी एक्साइटमेन्ट हुआ और अपने दूसरे फ्री हाथ से मेरा एक वक्ष दबाने लगा।

संदीप बदमाश निकला, उसने रौनक को बोला कि ये गाउन निकालने के बाद दबाने का ज्यादा मजा आएगा। रौनक ने अब मेरा गाउन ऊपर की तरफ खींच कर सर से बाहर निकाल लिया। अब मेरे शरीर पर एक कपडा नहीं। संदीप तब तक लगातार अपनी ऊँगली मेरे नीचे रगड़ रहा था।

अब उसने अपनी ऊँगली मेरे छेद में घुसाना शुरू किया। मेरा पानी बनने लगा था तो उसकी ऊँगली फिसलते हुए अंदर चली गयी। वो तो उसको और भी अंदर डालना चाहता था पर ऊँगली छोटी थी तो ऐसे ही अंदर ऊँगली फिरा कर मजे लेने लगा।

रौनक इस बीच मेरे दोनों वक्षो को अपने हाथों में ले कर मसल रहा था और मेरे निप्पलों से खेल रहा था। मेरा तो अब मूड बन चूका था। एक का सोचा था पर यहाँ तो दो दो को चुपचाप हैंडल करना था।

रौनक ने अब मेरे दोनों वक्षो को छोड़ा और अपने नीचे के कपडे उतार दिए। अब वह मेरे सीने पर बैठ गया। उसका पिछवाड़ा मेरे वक्षो की गद्दी पर बैठा था। अपना लंड मेरे मुँह के पास लाया और अपने हाथ से मेरा मुँह थोड़ा खोल कर अपना कड़क लंड अंदर डालने लगा।

उसने एक झटका मारा और लंड मेरे मुँह में घुसा दिया। उसकी मोटाई बहुत ज्यादा थी जिससे मेरा पूरा मुँह भर गया कि हवा पानी निकलने की भी जगह नहीं थी। फिर उसने लंड थोड़ा बाहर निकाल कर और भी जोर के झटके से मेरे गले तक उतार दिया। थोड़ा और अंदर डालता तो मेरी सांस ही बंद हो जाती।

एक तरफ वो मेरे मुँह में झटके मारे जा रहा था तो दूसरी तरफ नीचे के छेद में संदीप ऊँगली कर रहा था। मेरा मुँह अब खारा होने लगा था जैसे नमकीन गुनगुनी शिकंजी पी ली हो। मैंने मन ही मन सोचा ये क्यों वीर्य बर्बाद कर रहा हैं, जहा जरुरत हैं वहा डाले।

संदीप ने अब अपनी ऊँगली बाहर निकाल दी। उसने अपने कपडे उतार दिए थे। थोड़ी ही देर में मेरी दोनों टाँगे ऊपर की और उठा कर अपने कंधो पर रख दी थी। एक मांस का लोथड़ा मैंने अपने नीचे के छेद के पास टकराता महसूस किया। ये संदीप का लंड था। जिसके लिए ये सारी मेहनत की थी उसकी घडी आ गयी थी।

कुछ सेकंड तक संदीप अपने लंड से डंडे की तरह मेरे नीचे के नाज़ुक अंग पर मारता रहा जिससे चटाक चटाक आवाज़े आने लगी।

अब वो मेरी चूत के बाहर की अंदरूनी दीवारों पर लंड रगड़ने लगा। मेरी सिसकिया नहीं निकल पा रही थी क्यों की मुँह में रौनक का लंड था। संदीप ने थोड़ी देर ऐसे ही तड़पाया फिर अपना लंड मेरे छेद के मुहाने पर लगा दिया।

अब संदीप अपने लंड को एक इंच अंदर डाल कर बाहर निकाल रहा था। थोड़ी देर ऐसे ही करने से मेरी तड़प और बढ़ने लगी। तब तक रौनक ने अब झटके मारना बंद कर दिया था और ऐसे ही मेरे मुँह में लंड डाल कर बैठा रहा।

संदीप अब एक इंच की बजाय 2 इंच तक लंड अंदर बाहर करने लगा। मैं अब तड़पने लगी। ऐसे ही खेलते रहने के बाद उसने अब धीरे धीरे ओर भी अंदर उतरना शुरू कर दिया।

अब वो पूरा मेरे अंदर था क्यों कि उसकी बॉडी मेरे नीचे टकरा गयी थी। मुझे अंदाज़ा हो गया कि उसका लंड मेरे पति के मुकाबले थोड़ा पतला और छोटा ही था, जिससे मुझे ज्यादा कुछ महसूस नहीं हो रहा था। वो अंदर अठखेलिया कर रहा था और मझे जैसे गुदगुदी हो रही थी।

मेरी कोई प्रतिक्रिया नहीं देख कर संदीप को शायद गुसा आ गया और वो जोर जोर से अंदर झटके मारते वक़्त अपना शरीर मेरे शरीर से टकरा रहा था।

वो इतनी ताकत से मार रहा था कि मुझे चोट लग रही थी। दर्द के मारे मेरी बॉडी नीचे से छटपटाने लगी। पर उसको कोई रहम नहीं आया और एक जानवर की तरह झटके मारता रहा।

मेरा दर्द असहनीय सा हो रहा था पर मैं उठ नहीं सकती थी क्यों कि काम पूरा होने से पहले ही खेल ख़त्म हो जाता। मैंने जैसे तैसे सहन करना जारी रखा। पता ही नहीं चला कब धीरे धीरे दर्द कम होता गया या फिर मुझे अंदर जो मज़ा आने लगा था जिससे दर्द का अह्सास कम लग रहा था।

अब रौनक ने लंड मेरे मुँह से बाहर निकाला और पास में बैठ कर मेरे वक्षो को मलता हुआ संदीप को देखने लगा जो कि लगा पड़ा था। अब हम दोनों का पानी छूटने लगा था। चटाक चटाक की आवाज़े अब धीरे धीरे फचाक फचाक में बदलने लगी थी। मेरे मुँह से अब आह निकलने लगी, थोड़ी बहुत दर्द के मारे और थोड़ी मजे की वजह से।

संदीप का जोश और बढ़ गया। थोड़ी ही देर में मेरा सारा पानी छूट गया और उसके 2 मिनट बाद संदीप ने भी आ… ऊ… करते हुए अपना सारा पानी मेरे अंदर खाली कर दिया।

इसके बाद वो रुक गया और लंड अंदर ही रखे थोड़ी देर बैठा रहा। मुझे दर्द से थोड़ी राहत मिली। अब उसने अपना अंग मेरे अंदर से बाहर निकाल दिया। मेरी टाँगे अपने कंधो से उतार कर नीचे सुला दी।

संदीप के झाड़ते ही मैंने चैन की सांस भी पूरी नहीं ली थी कि कुछ ही सेकंड में अब रौनक मेरी दोनों टांगो को चौड़ा कर बीच में आकर बैठ गया। मैं भी चाहती थी कि दो लोग करेंगे तो बच्चा होने की सम्भावना बढ़ जाएगी परन्तु थोड़ा ब्रेक तो मुझे भी चाहिए था।

उसने मेरा साइड में पड़ा गाउन उठाया और मेरी योनी पर लगा पानी साफ़ करने लगा जो संदीप छोड़ कर गया था। अब उसने अपना लंड पकड़ कर मेरे छेद में डालना शुरू किया।

थोड़ी देर पहले उसका मुँह में लेने से ही मुझे उसकी मोटाई का अंदाजा था। मुँह में बड़ी मुश्किल से समां रहा था तो नीचे के छोटे छेद में कैसे जायेगा ये सोच मैं घबरा गयी।

वैसा ही हुआ, दो इंच भी अंदर नहीं गया और अटक गया, मेरी तो हालत खराब हो गयी इतने में ही। उसने थोड़ा जोर लगाने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हुआ, उल्टा मुझे दर्द हुआ और थोड़ी चीख निकल गयी।

संदीप ने पीछे से उसको बोला कि सारा लुब्रीकेंट तो तूने साफ़ कर दिया अब सूखे में कैसे जाएगा, पहले गीला कर।

उसने अपना लंड पूरा बाहर खींच लिया। मैंने चैन की सांस ली। अब उसने झुक कर अपने होठ मेरे योनी के होठों पर लगा दिए। थोड़ी देर चूमने के बाद अपनी जबान ऊपर से नीचे रगड़ने लगा चूत की दरार पर।

ऐसे ही वो अपनी खुरदरी गीली जुबान दरार में फेराता रहा तो मुझे मज़ा आने लगा। थोड़ी देर में उसने अपनी जबान रोल की और अंदर छेद में डाल कर जीभ लपलपाने लगा। मेरी तो झुरझुरी छूट गयी। अंदर एक करंट दौड़ गया।

कुछ मिनटों तक ऐसे ही मुझे वो करंट लगाता रहा फिर सीधा बैठ गया। मेरे अंदर अच्छा खासा गीला हो गया था। थोड़ी देर पहले ही छूटी थी और अब उसने फिर मेरा मूड बना दिए था। अब उसने अपना लंड धीरे धीरे प्यार से अंदर घुसाना शुरू किया।

उसकी मोटाई इतनी ज्यादा थी कि मेरा छोटा छेद उसको सहन नहीं कर पा रहा। मुझे बहुत दर्द हुआ, ऐसे मोटे लंड का ये पहला अनुभव था।

मेरी जागरण वाली कहानी में मोहित के लंड से भी ये थोड़ा मोटा था। मुझे डर लगा कही मेरी चूत फट ही ना जाए।

अगले कुछ सेकंड में उसका लगभग 6 इंच से भी लम्बा रहा होगा लंड मेरे अंदर था। हालांकि वो बहुत प्यार से अंदर डाल रहा था पर मैं तो दर्द से एक बार फ़िर चीख रही थी। अब रौनक ने अपना लंड वैसे ही धीरे धीरे करते पूरा बाहर निकाल लिया।

बाहर निकालते ही एक बार फिर पहले की तरह पूरा अंदर घुसा दिया। ऐसे 8 -10 बार रौनक ने ऐसे पूरा बाहर और फिर पूरा अंदर डाला। पता नहीं कैसा खेल खेल रहा था वो।

पति क्लोसेट के पीछे छिपे थे, कही मेरा दर्द देख कर बाहर ना जाये। सारा भांडा फुट जायेगा ऐसे तो। पर सब देख सुन कर भी वो सहन करते रहे अंदर से।

अब रौनक मेरे पास आकर लेट गया। मेरा हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींचने लगा, उधर से संदीप ने मेरी टाँगे और कमर उठा कर मुझे धकेलते हुए रौनक पर सुला दिया। नीचे रौनक था और उसके ऊपर पीठ के बल मैं लेटी थी।

रौनक ने अपना हाथ नीचे ले जा कर अपना लंड एक बार फिर मेरे अंदर डालना शुरू किया। उसके पुरा अंदर जाने के बाद उसने अंदर बाहर धीरे धीरे झटका मारना शरू कर दिया।

संदीप मेरे पास आकर बैठ गया और मेरी नाभी और उसके आस पास चूमने लगा। मेरा बदन वहां से थर थर कापने लगा। संदीप ने अब अपनी एक ऊँगली मेरी चूत के थोड़ा ऊपर रख मलने लगा।

उधर रौनक लगातार झटके मार रहा था जबकि संदीप लगातार मेरे पेट पर चूमते हुए मेरी उत्तेजना बढ़ा रहा था। मुझे मजा तो बहुत आ रह था पर जल्दी से ये सब ख़त्म करना था क्यों कि दर्द सहन नहीं हो रहा था।

अब धीरे धीरे रौनक ने झटको की रफ़्तार बढ़ा दी, तब संदीप ने पेट चूमना बंद किया और मेरे वक्षो को मसलने लगा। एक हाथ से वक्ष तो दूसरे हाथ की ऊँगली से मेरी चूत के ऊपर की तरफ मालिश कर रहा था।

रौनक बहुत देर तक करता रहा पर उसक तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था जबकि मेरा तो अच्छा ख़ासा पानी छूटने लगा था। इससे पहले कि मैं दोबारा छूट जाती रौनक ने लंड बाहर निकाल दिया। मुझे पता था कि उसका अभी हुआ नहीं हैं।

रौनक ने मुझे अपने ऊपर से उतार कर उल्टी लेटा दिया और मेरे दोनों पाँव पकड़ कर बिस्तर से नीचे लटका दिए जब की कमर के ऊपर का हिस्सा पलंग पर था। उसने मेरी एक टांग पकड़ कर शरीर टेढ़ा किया और एक टांग ऊपर 90 डिग्री पर खड़ी कर दी जब की दूसरी टांग नीचे जमीन पर।

मैंने अब टेडी होकर लेटी थी। मेरी दोनों टाँगे विपरीत दिशा में थी जिससे छेद पूरा खुल गया था। रौनक ने अपना एक पाँव मोड़ कर पलंग के किनारे पर टिकाते हुए अपना लंड मेरे अंदर एक बार फिर घुसा दिया।

उधर संदीप मेरे चेहरे के पास आया और मेरे गालो को दबा कर मुँह खोलते हुए अपना नरम चूसा पड़ा लंड मेरे मुँह में डाल दिया। इधर संदीप मेरे मुँह में नरम छोटा लंड अंदर बाहर कर रहा था तो नीचे के छेद में रौनक अपना मोटा लंड झटके मारते हुए दर्द के साथ आनंद दे रहा था।

नीचे अब मेरे पानी के रिसने के साथ ही रौनक का पानी भी आ मिला था और फचाक फचाक की आवाज़े कमरे में गूंजने लगी। इन सब के दौरान मेरी आँखें लगातार बंद थी और पलकों के नीचे झिर्री से थोड़ा बहुत देख रही थी।

संदीप ने अपना लंड मेरे मुँह में लगाए रखते हुए मेरे वक्षो को दबाना शुरु कर दिया। साथ ही बेरहमी से मेरे निपल दबा रहा था। ऊपर और नीचे दोनों तरफ बराबर दर्द हो रहा था।

रौनक के चरम के नजदीक पहुंचते हुए इतनी जोर के झटके मारे कि मेरी तो जान ही निकल गयी थी। उसके मोटे लंबे लंड में इतना पानी भरा था कि सब मेरे अंदर खाली होने लगा था। फिर उसने एक जोर की हुंकार भरी और उसका किला ढह गया।

रौनक ने काम ख़त्म कर कपडे पहनना शुरू कर दिया था पर संदीप अभी भी अपना नरम लंड मेरे मुँह में फिरा रहा था। रौनक ने उसको भी कपडे पहनने की हिदायत दी। फिर दोनों ने मिलकर मुझे मेरा गाउन फिर से पहना दिया और सीधा लेटा दिया।

संदीप ने बोला चल निकलते हैं, पर रौनक ने कहा बाहर से पानी का गिलास ले कर आ, इनको उठाना तो पड़ेगा। संदीप पानी ले आया और रौनक को दिया। उसने उंगलिया गीली कर हल्का हल्का पानी मरे मुँह पर दो बार छिड़का। मैंने अपनी आँखें मिचमिचाई और फिर बंद कर ली।

संदीप झल्लाया ला मुझे दे और अगले ही सेकंड मेरे मुँह पर बहुत सारा पानी आकर गिरा। उसने तो पूरा गिलास ही मुँह पर उंढेल दिया। थोड़ा पानी नाक में भी चला गया तो मेरी सांस रुक गयी और मैं तुरंत खांसते हुए बैठ गयी। अपना मुंह हाथों से पौंछते हुए उनकी तरफ आश्चर्य से देखा जैसे पहली बार देखा हो।

मैं जिस हड़बड़ाहट से उठी दोनों झेंप गए। तुरंत अपनी सफाई देने लगे कि मैं वहां बाहर नशे में पड़ी थी तो वो लोग मुझे अंदर ले आये और पानी छिड़क कर उठाने की कोशिश कर रहे थे।

मैंने दोनों को अविश्वास की नजरो से देखा। रौनक ने बोला कि अशोक का फ़ोन आया था आप फ़ोन नहीं उठा नहीं थी तो मुझे देखने के लिए भेजा था। वो बोले अब हम चलते हैं आप आराम करो।

अब नाटक के दूसरे भाग की बारी थी। मैंने अपने हाथ से अपना पेट पकड़ा, बदन में दर्द तो वैसे भी थोड़ा हो ही रहा था तो ओर दर्द के भाव लाते हुए उनसे कहा एक मिनट रुको, तुमने क्या किया यहाँ। वो घबरा गए। हकलाते हुए बोले कुछ नहीं बस आपको लेटाया और पानी छिड़का।

मैं आवाज़ में दर्द लाते हुए उन पर चिल्लाने लगी, मुझे बेवक़ूफ़ मत बनाओ, तुमने मेरे साथ कुछ तो गलत किया हैं। चारो तरफ नज़रे फेराते हुए एक दो जो भी हलकी फुलकी गाली आती थी देते हुए कहा तुम लोगो ने मेरे अंदर कोई तो डंडा या ऐसी कोई चीज़ डाली हैं।

दोनों की सिट्टी पिट्टी घूम हो गयी। मैंने चिल्लाना जारी रखा, सच सच बोलो क्या किया तुम लोगो ने, मैं अभी सबको इकठ्ठा करती हूँ। दोनों हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगते हुए बोले डंडा नहीं डाला,, वो हमने,, हमने खुद ही सेक्स किया था आपको ऐसी हालत में देख कर बहक गए थे। पर आप हमको माफ़ कर दो हमारा करियर जस्ट शुरू ही हुआ हैं सब बर्बाद हो जायेगा।

मैंने उनको डराना जारी रखा, तुम लोगो ने मेरी ऐसी वैसी फोटो वीडियो निकाली हैं न, ताकि बाद में मुझे बदनाम कर सको। दोनों गिड़गिड़ाने लगे, फ़ोन मेरी तरफ बढ़ा कर बोले आप हमारा फ़ोन चेक कर लो कुछ नहीं हैं। मैंने दोनों के फ़ोन लिए और चेक करने लगी, हालांकि मुझे पता था की कुछ फोटो वीडियो नहीं लिया हैं।

मैंने फोन लौटाते हुए कहा अकेली देख कर जबरदस्ती कर रहे थे। मेरे पति को पता चल गया तो तुम्हारा खैर नहीं। तुम्हारे खिलाफ केस चलेगा। मुझे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हो तुम दोनों।

दोनों घुटनो के बल बैठ गए, और हाथ जोड़ कर बोले ऐसा कुछ नहीं हैं। हम किसी को कुछ नहीं कहेंगे। हम तो वैसे भी अपने होम टाउन के पास ट्रांसफर लेने वाले हैं। अपना छोटा भाई समझ कर माफ़ कर दो दीदी।

मैंने कहा दीदी बोल के ऐसा काम करते हो। मैं ये कपडे संभल कर रखने वाली हूँ जिसमे तुम्हारा सीमेन लगा हैं, अगर मैं कभी मुसीबत में फंसी तुम्हारी वजह से तो ये सबूत हैं तुमको नहीं छोडूंगी। फिर एक दो गाली देकर कहा दोनों यहाँ से जल्दी से फुट लो और कभी मेरे सामने मत आना।

दोनों फिर दुम दबा कर भाग गए। मैंने बाहर जाकर चेक किया वो जा चुके थे। मैं बैडरूम में आयी और पति को कहा कि बाहर आ जाओ रास्ता साफ़ हैं।

पति बाहर आये और मेरी तारीफ़ करने लगे सब गड़बड़ हो जाती अगर तुम संभालती नहीं तो। हमने सोचा ही नहीं कि दोनों दोस्त आ जायेंगे।

खैर हमने तो एक बार में एक को फंसाने का प्लान किया था पर एक साथ दो मुर्गे फंस गए, हालांकि मेरी हालत बहुत खराब हुई थी। दो तीन दिन तक शरीर में बहुत दर्द रहा। इस तरह हमारी साजिश का दुसरा पड़ाव पूरा हुआ।
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#6
एक औलाद पाने के लिए हम पति पत्नी ने साजिश का पहला जाल बुना और एक शिकार को फंसाया।

फिर जब हमने दूसरा जाल फैलाया तो कही न कही मैं खुद ही फंस गयी और लेने के देने पड़ गए। हालांकि हमारा प्लान दोनों बार कामयाब रहा, पर कुछ दिनों तक बदन में बहुत दर्द रहा।

प्रैग्नैंसी टेस्ट तो चार पांच हफ्तों से पहले हो नहीं सकता था, इस बीच हम इंतज़ार करें या एक बार और साजिश करके किसी को फंसाया जाए ये निश्चित नहीं कर पा रहे थे।

मेरे शरीर के साथ रौनक और संदीप ने जैसे मजे लिए थे और जो मेरे साथ बीता इसके बाद मेरी तो हिम्मत नहीं हो रही थी।

इस बीच मेरे ससुराल से फ़ोन आया कि घर में एक फंक्शन हैं तो छुट्टी लेकर आ जाओ। ट्रैन के टिकट नहीं मिल रहे थे। दोनों शहरो के बीच ओवरनाइट स्लीपर बस की सर्विस थी, तो पति ने एक डबल स्लीपर बुक करवा दिया। इन चार पांच दिनों में मेरा दर्द धीरे धीरे कम पड़ते हुए ख़त्म हो गया था और मैं सामान्य होती जा रही थी।

अगले दिन होम टाउन जाना था और शाम को पति ने आकर बताया कि आज रंजन का फ़ोन आया था। रंजन मेरे पति का दूर के रिश्ते में भाई लगता हैं।

मैं शादी के पहले से उसको जानती थी, क्यों कि कॉलेज में मेरी क्लास में ही पढता था। उसका घर भी हमारे होम टाउन में ही हैं।

पति ने बताया कि रंजन कल हमारे शहर आने वाला हैं वीसा स्टांपिंग के लिए। उसकी कंपनी उसको अपने विदेश वाली ब्रांच में शिफ्ट कर रही थी।

पति ने आगे बताया कि रंजन ने फ़ोन करके कहा था कि उसको कल वापस घर जाने के लिए कोई ट्रैन या बस की रिजर्वेशन नहीं मिल रही हैं। वो एक दिन के लिए हमारे घर में रुकने के लिए कह रहा था। मैंने बताया कि मगर कल तो हम बस से घर के लिए निकलने वाले है। तो उसने पूछा कि क्या हम उसे अपने साथ उस डबल स्लीपर में एडजस्ट कर सकते हैं क्या।

पति ने मुझसे पूछ कर उसको जवाब देने के लिए समय मांग लिया। उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हे कोई तकलीफ तो नहीं उसे हमारे साथ ही ले जाने में। वैसे भी तुम तो उसको पहले से जानती हो कॉलेज टाइम से।

मैंने कहा डबल स्लीपर में तीन लोग होंगे तो जगह की समस्या से हमें असुविधा तो होगी। अभी आप ही सोच लो आपका ही रिश्तेदार हैं।

पति ने कहा मैं रंजन की माँ को भुआजी कहता हूँ, ऐसे कैसे उसको मना बोल दू। पहली बार उसने मदद मांगी हैं, एक रात की ही तो बात हैं, जैसे तैसे एडजस्ट कर लेंगे। मैंने कहा ठीक हैं जो आपकी इच्छा।

रात को सोते वक़्त पति ने पूछा ये रंजन कैसा लड़का हैं। मैंने कहा क्या मतलब कैसा लड़का हैं। उन्होंने कहा कि अब तुम्हारी तबियत भी ठीक हैं, और हम वैसे भी चार हफ्ते इंतज़ार करने वाले हैं प्रेग्नेंसी टेस्ट के लिए। अगर रौनक और संदीप से पिछली बार कुछ नहीं हुआ होगा तो हमें फिर सब शुरू से करना पड़ेगा।

पति ने पूछा कि क्यों ना हम रंजन का इस्तेमाल कर ले अपने काम के लिए। वो तो तुम्हारे साथ पढ़ा हुआ हैं तो उसका तुम्हारे प्रति कोई झुकाव रहा होगा। ऐसे में उसको फंसाना आसान होगा।

मैंने कहा कॉलेज के टाइम पर इतना कहा पता होता हैं। वो पढ़ने में तेज था तो सिर्फ नोट्स मांगने के लिए बात होती थी। कॉलेज के बाद वो कॉलेज के लिए बड़े शहर चला गया। उसके बाद तो कभी कभार ही दिखता था। हालांकि मेरी सहेलिया कहती थी कि रंजन का मुझमे इंटरेस्ट हैं, पर उस उम्र में कभी ध्यान नहीं दिया।

पति ने कहा कि रंजन हमारे लिए सही शिकार हैं। वो वैसे भी कुछ दिनों बाद विदेश चला जायेगा। नजदीकी रिश्तेदार हैं तो शर्म और झिझक के मारे किसी को ये राज बताएगा भी नहीं। अगर तुम्हे पहले से थोड़ा बहुत चाहता होगा तो आसानी से फंस भी जायेगा।

मैंने सवाल उठाया मगर करेंगे कहाँ?

उन्होंने बताया कि बस में, वैसे भी जगह कम होगी तो उसको तुम्हारे नजदीक लाना मुश्किल नहीं होगा। बस में ही करवा लेंगे उससे अपना काम।

मैंने कहा तुम्हारे वहा होते हुए उसकी हिम्मत तो नहीं होगी मुझे हाथ लगाने की।

उन्होंने कहा कि उसके बारे में प्लान कर लेते हैं, कोशिश करने में कोई बुराई नहीं।

हमारे पास ज्यादा समय नहीं था प्लान बनाने का। आधी रात तक हमने सोच विचार किया पर ज्यादा कुछ बना नहीं पाए। फिर सबकुछ किस्मत पर छोड़ दिया। बस में देखा जाएगा क्या करना हैं। जैसी परिस्तिथि होगी वैसे करते जायेंगे।

अगली सुबह तक जो भी दिमाग में आया हमने आपस में विचार विमर्श कर लिया। अब रात की बारी थी। रंजन हमें बस स्टॉप पर ही मिलने वाला था। साडी से सफर में दिक्कत होती हैं तो मैंने बटन डाउन शार्ट शर्ट पहना और नीचे केपरी पैंट थी।

रात आठ बजे की बस थी तो हम वहा पहुंच गए, रंजन पहले से हमारा इंतज़ार कर रहा था। हमने टिकट चेक करवा कर कंडक्टर को थोड़े एक्स्ट्रा रुपये देकर एडजस्ट कर लिया ताकि तीसरे आदमी की अनुमति दे दे।

स्लीपर बस में दो टियर होते हैं। हमारा स्लीपर ऊपर की तरफ था। गैलरी के एक तरफ डबल स्लीपर तो दूसरी तरफ सिंगल स्लीपर होते हैं।

हम तीनो ने हमारे डबल स्लीपर के केबिन में चढ़ कर उसका शटर बंद कर दिया। अब हम तीनो आपस में बातें करने लगे। थोड़ी देर में बस रवाना हो गयी।

उसके आगे के क्या फ्यूचर प्लान हैं वो बताने लगा। उसका प्लान विदेश में ही बसने का था, जो की हमारे राज को बनाये रखने के लिए भी ठीक ही था।

बातें करते करते साढ़े नौ बज चुके थे, तो प्लान के मुताबिक पति ने कहा कि उनको अब नींद आ रही हैं तो सो जाते हैं।

मैंने कहा कि इतनी जल्दी क्या हैं, रोज तो देर से सोते हैं।

रंजन ने भी हां में हां मिलाई कि थोड़ी देर और बात करते हैं।

पति ने कहा कि आज ऑफिस में काम बहुत था तो थकान हो रही हैं तो बैठे बैठे नींद की झपकी आ रही हैं उनको तो सोना हैं।

हमें तो सोना था नहीं तो वो खिड़की के पास एक तरफ सो गए ताकि बाकी की जगह में हम बातें कर सके। उन्होंने एक छोटा चद्दर लिया और ओढ़ कर सोने का नाटक करने लगे।

मैं और रंजन अब कॉलेज के समय की बातें करने लगे, अपने टीचर और अपने क्लासमेट को याद करने लगे। पता नहीं नहीं चला कब समय निकल गया।

मैंने अब रंजन से कहा अब सो जाते हैं, तुम भी थक गए होंगे।

रंजन ने कहा ठीक हैं, पर जगह बहुत कम हैं, तीनो को एक करवट सोना पड़ेगा। भैया को जगा देते हैं वो बीच में सो जायेंगे।

मैंने उसको टोकते हुए कहा, नहीं, इनको सोने दो गहरी नींद में उठाना ठीक नहीं हैं, उठाया तो वापस नींद मुश्किल से आएगी।

मैंने कहा मैं इनके पास सो जाती हूँ यहाँ बीच में और तुम मेरे पीछे सो जाना। एक रात की ही तो बात हैं हम एडजस्ट कर लेंगे।

रंजन ने पूछा कुछ ओढ़ने के लिए हैं क्या?

मैंने एक थोडी बडी चद्दर उसको देते हुए कहा कि छोटी वाली सिंगल चद्दर तुम्हारे भैया ने ओढ़ रखी है, मेरे पास ये डबल वाली चद्दर हैं ये तुम ओढ़ लो।

रंजन ने आनाकानी की, नहीं आप ओढ़ लो, आप क्या करोगे?

मैंने कहा चिंता मत करो मुझे वैसे भी जरुरत नहीं पड़ेगी। अगर जरुरत पड़ी तो तुमसे मांग लुंगी।

अब मैं पति की तरफ मुँह करके करवट लेकर सो गयी। मैंने अपने और पति के बीच में थोड़ी जगह छोड़ दी ताकि मेरे पीछे रंजन के सोने के लिए ज्यादा जगह ना बचे।

अब रंजन मेरे पीछे बची हुई जगह में लेट गया। ज्यादा जगह थी नहीं तो वो मुझसे सिर्फ चार इंच की दुरी पर रहा होगा।

अगर वो जोर की सांस लेता तो मुझे पीछे छोड़ी हुई सांस महसूस होती इतना नजदीक था। केबिन की लाइट पहले ही बंद कर दी थी, रास्ते में रोड लाइट की रोशनी कभी कभार हमारे केबिन में खिड़की के कांच से आती।

मैं अब इंतज़ार करने लगी कब वो पहली हरकत करेगा। एक दो बार वो हिला भी जब उसका शरीर मुझसे थोड़ा छू गया पर इसके अलावा कुछ हुआ नहीं।

अब मैंने ठण्ड लगने की एक्टिंग की और थोड़ा सिकुड़ गयी। रंजन ने चद्दर ओढ़ रखा था तो उसको लंबा करते हुए मुझे भी ओढ़ा दिया।

मैंने पलटते हुए कहा तुमको पूरी आ रही हैं न चद्दर। मुझे ओढ़ाने के चक्कर में खुद से मत हटा लेना।

उसने कहा नहीं ठीक हैं मेरे पास भी हैं।

मैंने उसको कहा थोड़ा ओर पास में खिसक जाओ पर पूरा ओढ़ कर रखना।

अब हम दोनों एक ही चद्दर में थे और मेरे कहे अनुसार वो ओर भी पास में खिसक कर लेटा था।

अब रह रह कर हमारी बॉडी टच हो रही थी। बीच बीच में, मैं ही थोड़ा हिल कर अपने शरीर को थोड़ा छुआ देती उससे। इस छूने वाला खेल काम कर रहा था। वो उत्तेजित होकर जानबूझ कर अब वो एक बार छू जाने के बाद शरीर वही चिपकाये रख रहा था।

मैंने अब तेज गहरी सांसें निकालना शुरू कर दिया, जिससे उसे लगे कि मैं सो रही हूँ। अब उसके नाक से निकलती सांसें मैं अपने गर्दन पर महसूस कर रही थी, वह मेरे बहुत नजदीक आ चूका था। थोड़ी ही देर में उसके होठ मेरे गर्दन और कान के नीचे चुमते और दूर हो जाते।

अगली बार जैसे ही वो अपने होठ मेरे गर्दन के पास लाया, मैंने अपनी गर्दन थोड़ी सी घुमाई जिससे उसके होठ तेजी से मेरी गर्दन पर टकरा कर छू गए और चुम्मा ले लिया। उसके होठ वही चिपक गए, उसने हटाए नहीं। उसको मजा आ रहा था।

थोड़ी देर ऐसे ही वो अपने होठ मेरी गर्दन पर हलके हलके फेरता रहा। मुझे एक मीठी गुदगुदी हो रही थी।

उसने अपना शरीर मेरे पिछवाड़े से चिपका दिया, मैं उसकी पैंट के अंदर के अंग को महसूस कर पा रही थी। वो अंग अब कड़क हो चूका था, मतलब वो तैयार था बस हिम्मत करने की देर थी। वो अपने शरीर को अब हल्का सा ऊपर नीचे कर मेरे पिछवाड़े पर रगड़ रहा था।

उसने अब हिम्मत करके अपना हाथ मेरी पतली कमर पर रख दिया। मेरे हाथ ऊपर आगे की तरफ थे जिससे मेरा शार्ट शर्ट कमर से थोड़ा ऊपर उठ चूका था।

जिससे उसका हाथ मेरी नंगी कमर पर छू रहा था। मेरी पतली कमर उसके हाथ की उंगलियों और अंगूठे के बीच आराम से समा गयी। कमर को पकडे हुए उसकी उंगलिया मेरे कमर पर चल रही थी।

उसके हौंसले अब थोड़े और बढे तो उसने कमर पर रखा हाथ धीरे धीरे खिसका कर शर्ट के अंदर डाल कर ऊपर की तरफ बढ़ाना शरू किया।

कुछ ही देर में उसकी एक ऊँगली मेरे ब्रा को छू गयी और अंदर के वक्ष थोड़े दब गए। उसके हाथ वही रुक गए और वो ऊँगली कुछ देर वक्षो को ऐसे ही छूती रही।

वो एक बार फिर हाथ को खिसकाते हुए मेरे नाभी तक ले आया और अपना पंजा पूरा मेरे पेट पर फैला दिया। काफी देर तक वह हाथ मेरे पेट पर फेराता रहा, शायद पति के पास लेटे होने से उसकी हिम्मत नहीं पा रही थी आगे बढ़ने की।

मैंने सोचा अब मुझे ही कुछ करना पड़ेगा। अब तक हमारी साजिश का एक रूल था कि सारी हरकते सामने वाले को ही करनी थी, मुझे तो सिर्फ ब्लेम गेम खेलना था काम होते ही। पर आज बात अलग थी।

मैंने उसको थोड़ा सा ग्रीन सिग्नल देने के लिए अपना हाथ उसके हाथ पर रखने के लिए नीचे खिसकाया। मुझमे हरकत होते देख वो डर गया और अपना हाथ तुरंत मेरे पेट से हटा लिया और पीछे से थोड़ा दूर भी हट गया। मुझे अफ़सोस हुआ, मैंने तो उल्टा काम बिगाड़ कर उसको डरा दिया।

मुझे पता था कि उसको मजा तो आया होगा, इसलिए वो फिर से कोशिश जरूर करेगा। उसको सरप्राइज के साथ ग्रीन सिग्नल देने के लिए मैंने अपने शर्ट के सारे बटन खोल कर शर्ट को सामने से पूरा पीछे हटा दिया। अब मैंने अपने हाथ फिर से पुरानी स्तिथि में ऊपर की तरफ ले गयी।

ज्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा, रंजन जल्द ही फिर मुझसे चिपक गया और अपना हाथ मेरे कूल्हे पर रख दिया, जहा मेरी कैपरी कमर से बंधी हुइ थी।

अब वो अपना हाथ धीरे धीरे खिसकाते हुए कमर से होते हुए नाभी तक ले आया। पिछली बार की तरह फिर उसने अपना हाथ शर्ट में घुसाने की कोशिश की। पर शर्ट तो उसको छुआ ही नहीं, वो तो मैं पहले ही हटा चुकी थी।

वो दो तीन इंच और आगे बढ़ा पर शर्ट का नामोनिशान नहीं था। चद्दर ओढ़े होने से वो देख भी नहीं पा रहा था कि शर्ट कहाँ हैं।

उसको अब अहसास हो गया था कि शर्ट तो हैं ही नहीं, मैंने ही निकाला होगा। वो खुश हो गया मेरे सिग्नल को देख कर। एक झटके में उसने अपना पंजा मेरे ब्रा पर मारा और मेरा एक वक्ष दबोच लिया और मसलने लगा, जैसे अपनी जीत का जश्न मना रहा हो।

पर किला तो अभी फतह करना बाकी था। उसने मेरे ब्रा में हाथ डाल कर मेरे वक्षो को छूने की कोशिश की। पर ज्यादा कामयाबी नहीं मिली तो अपने हाथ पीछे ले जाकर मेरे आधे खुले शर्ट में घुसा कर ब्रा का हुक खोलने की कोशिश करने लगा।

पर उसकी आदत तो थी नहीं तो थोड़ी देर संघर्ष करता रहा एक हाथ से वो टाइट हुक खोलने की।

जैसे ही उसने हुक खोला तो शायद बहुत खुश हुआ और इसी ख़ुशी में मेरी बगल से होते हुए अपना हाथ मेरे ब्रा में डाल दिया और मेरे वक्ष को भींच लिया।

शायद पहली बार रंजन ने किसी लड़की के वक्ष छुए थे, तो वो बावरा होकर बहुत देर तक उनको दबाने का ही मजे लेता रहा। उसने मेरे ऊपर के हाथ में फंसा आधा खुला शर्ट और ब्रा भी निकाल दिया और एक बार फिर वक्षो को दबाने का आनद लेने लगा।

मुझसे इतना इंतज़ार नहीं हुआ। मैं अपना फ्री हाथ पीछे की तरफ ले गयी और उसकी जींस का बटन खोल दिया। फिर उसकी चैन नीचे करके उसके अंतवस्त्र में हाथ डाल दिया।

मेरा हाथ उसके कड़क अंग को छू गया। मैंने उसको पकड़ा और अपने हाथ से उसको ऊपर नीचे रगड़ने लगी। उसको तो जैसे करंट लगा। उसके होठ मेरी गर्दन और कंधो को चूमने लगे।

मैंने अपना हाथ बाहर निकाल कर उसकी जीन्स को नीचे खींचने लगी, पर हाथ पीछे होने से इतना जोर नहीं लगा पाई। उसने मेरे वक्षो को छोड़ा और मेरी मदद के लिए अपने अंतवस्त्र सहित जींस नीचे खिसका दी। उसका लंड अब जींस के बंधन से मुक्त हो गया था, और मेरे तैयार होंने के संकेत भी मिल गए।

अब उसने मेरी केपरी के बटन और चैन खोल दी और नीचे खिसका कर घुटनो तक ले गया। उसके बाद मैंने ही अपने दोनों टांगो को झटकते हुए केपरी सहित अंतवस्त्र अपनी एक टांग से पूरा निकाल दिया।

उसने हाथ मेरे नंगे कूल्हों पर रख दिए और मेरे फिगर को महसूस करने लगा। वो घुटनो से लेकर मेरे चुचियों तक अपने हाथो को मेरे बदन के ऊपर नीचे रास्तो की सैर करवा रहा था। इस बीच उसका कड़क लंड मेरे पिछवाड़े को छू रहा था।

उसने अब हाथ मलना छोड़ा और अपना लंड पकड़ कर मेरी दोनों टांगो के बीच डाल कर धक्का मारने लगा। मैं अपना हाथ नीचे ले गयी और उसके लंड को पकड़ कर सही रास्ता दिखाते हुए आगे के छेद में लगा दिया। इतनी देर की मालिश से वैसे भी पानी बनाने लगा था। वो तेजी से मेरे अंदर प्रवेश कर गया।

एक बार अंदर डालने के बाद तो उसका नियंत्रण ही नहीं रहा। वो झटके पर झटके मारने लगा। हमारे पास हिलने को ज्यादा जगह नहीं थी तो वो जोर से नहीं मार पा रहा था, पर फिर भी काफी गहराई में उतर रहा था। इन सबके बीच उसका एक हाथ बराबर मेरे चुचों को दबा रहा था।

मैंने भी बदन दर्द के मारे पिछले कुछ दिनों से नहीं किया था तो मैं वैसे भी तड़प रही थी। अगले दस बारह मिनट तक वो ऐसे ही मजे लेता रहा। अब उसने अपने आप को मुझसे अलग कर लिया।

मेरे कंधो पर हाथ रख अपनी तरफ घुमाया। मैं पलट कर अब उसकी तरफ मुँह करके लेट गयी। जिससे चद्दर मेरे ऊपर से हट गयी।

अब उसने मेरे दूसरे हाथ से भी शर्ट और ब्रा पूरा निकाल दी जिससे मैं टॉपलेस हो गयी। उसने मेरे होठों पर अपने होठ रख दिए और चूसने लगा। मैंने भी उसके होठों को चूसना शुरू किया। हम दोनों को नशा चढ़ने लगा।

उसने एक बार फिर अपना लंड पकड़ा और मेरे अंदर डालना शुरू किया। मैने अपनी ऊपर वाली एक टांग उठा कर उसकी जांघो पर रख दी, जिससे मेरा छेद ओर खुल जाये और उसको अंदर डालने की ज्यादा जगह मिल सके।

एक बार फिर वो मेरे अंदर था और झटके पे झटके मार रहा था। हम दोनों के होठ चिपके हुए थे और रासपान कर रहे थे साथ ही बीच बीच में उसका हाथ मेरी चुचियों को दबा रहा था।

मैंने अपनी पीठ पर एक हाथ फिरते हुए महसूस किया। रंजन का एक हाथ नीचे दबा था और दूसरा मेरे सीने पर तो पीठ वाला हाथ पति का ही था। शायद वो बताने की कोशिश कर रहे थे कि हमारी साजिश सही जा रही हैं।

जैसे ही रंजन ने अपना हाथ मेरी कमर पर रखा मेरे पति ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। थोड़ी देर में जैसे ही रंजन चरम की तरफ बढ़ा तो उसने मुझे पीठ से कस कर पकड़ अपने सीने से चिपका दिया और ओर भी गहरे झटके मारने लगा। बस के तेज चलने की आवाज़ों के बीच हमारी आवाज़े दब सी गयी थी।

मेरा भी पानी निकलने लगा था और उसके पानी से संगम होने लगा। चरम पे पहुचते ही उसने पता नहीं कब से संभाल कर रखा हुआ ढेरो चिपचिपा पानी मेरे अंदर पूरा खाली कर दिया।

पानी इतना था कि खाली होने में ही कुछ सेकंड लग गए। थोड़ी देर ऐसे रहने के बाद उसने लंड बाहर निकाला।
इतना पानी निकला था कि मेरे नीचे पूरा गंदा हो गया था। मैं खुश थी कि इतने पानी से मेरा काम तो हो ही गया होगा। मैंने सर के पास रखे पर्स में पहले से रखे पेपर नैपकिन निकाले और थोड़े उसको दिए।

अब हम दोनों अपने अपने अंगो को साफ़ करने लगे। फिर गंदे नैपकिन एक थैली में रखकर कोने में रख दिए।

हमने अपने कपडे वापिस पहन लिए, और फिर से पहले वाली पोजीशन में चद्दर ओढ़ कर सो गए।

आधी रात के करीब रास्ते में एक ढाबे पर बस रुकी तो रंजन वो नैपकिन की थैली बाहर फेंक आया और एक बार फिर सो गया।

सुबह छह बजे मेरी नींद खुली मैंने घडी देखी। बाहर अभी भी अँधेरा था। मुझे याद आया कि सुबह का सेक्स गर्भवती होने के लिए ज्यादा फायदेमंद हैं। मैंने सोचा मुझे एक बार फिर से करना चाहिए। परन्तु पति तो सो रहे थे उनकी इजाजत कैसे लेती।

उनको उठाने के चक्कर में रंजन को पता चल जाता तो। मैंने पलट कर देखा रंजन भी रात की मेहनत के बाद चैन से सो रहा था। ये आखरी मौका था मेरे लिए। माँ बनने का लालच मेरे दिल पर हावी हो गया और सो मैंने उसको जगाने का फैसला किया।

मैं अपना हाथ पीछे ले गयी और एक बार फिर उसकी जीन्स का बटन और चैन खोल कर उसके अंगवस्त्र में अपना हाथ डाल दिया। उसका लंड भी रात की मेहनत के बाद सोया पड़ा था।

मैं अब उसकी छोटी नरम चीज़ को हाथ से ऊपर नीचे कर मसलने लगी। रंजन की आँख खुली और उसने अपना हाथ मेरी जांघो पर रख दिया।

थोड़ी देर रगड़ने के बाद ही उसका लंड धीरे धीरे विशाल रूप धारण करने लगा। थोड़ी देर पहले मैं अपनी दो तीन उंगलितो से उसको रगड़ पा रही थी अब एक पूरी हथेली भी छोटी पड़ रही थी।

जैसे ही वो काम करने लायक कड़क हुआ तो मैं उसको छोड़ दिया और उसकी जींस नीचे खिसकाने का इशारा किया। जब तक उसने अपनी जीन्स नीचे की मैंने भी अपनी केपरी और अंतवस्त्र खोल कर नीचे कर दिए।

मेरे कपडे खोलते ही उसका लंड मेरे नग्न पिछवाड़े से टकरा गया। उसने बिना इंतज़ार करे अपना लंड पकड़ कर मेरे पीछे वाले छेद में डालने का प्रयास करने लगा। मुझे तो उसका माल आगे वाले छेद में चाहिए था न कि पीछे वाले में।

मैं अपना हाथ पीछे ले जाकर उसको रोकती तब तक तो उसने एक दो इंच अंदर डाल ही दिया और आगे पीछे मारने भी लगा। मुझे दर्द हुआ, और अपने शरीर को उससे थोड़ा दूर कर दिया जिससे उसका लंड बाहर निकल गया।

मैंने अब खुद ही बिना देर किया उसका लिंग फिर पकड़ा और एक टांग उठा कर अपने आगे के छेद में घुसा दिया। उसकी मशीन एक बार फिर चालु हो गयी और झटके मारने लगी।

सुबह के समय थोड़े सेंसेशन कम होते हैं तो उसको मजा कम आ रहा था। ज्यादा मजे के लिए उसको जोर से झटके मारने थे। पर उतनी जगह तो वह थी नहीं। मुझे एक ऊपर सुझा।

अगर आपको यह कहानी पसंद आ रही है, तो सबसे पहली हिन्दी सेक्स की कहानी जरुर पढियेगा। वह भी आपको जरुर पसंद आएगी।

मैंने उसका पिछवाड़ा एक हाथ से पकड़ा और अपनी तरफ खींचते हुए मैं मुँह के बल उल्टा लेट गयी और वो मेरे ऊपर सवार हो गया। चद्दर ऊपर से हट कर मेरे और पति के बीच आ गिरी। मेरी पैंट घुटनो पर अटकी थी तो मैंने जितना हो सकता था दोनों पाव थोड़े से फैला दिए।

उसने अपने दोनों हाथ मेरे हाथों पर रखे और अब वो ऊपर नीचे होते हुए जोर से मेरे पीछे झटके मारने लगा। उसको इस बात की भी परवाह नहीं रही कि मेरे पति पास में सो रहे हैं।

वो इतनी जोर से मेरे पिछवाड़े से टकरा रहा था कि जोर जोर से आवाज़ हो रही थी। जोर के झटको की वजह से थोड़ी ही देर में हम छूटने की हालत में आ गए।

तभी इन आवाज़ों से मेरे पति की नींद में व्यवधान आया और वो थोड़े से हिले। उन्हें तो पता नहीं भी था कि हम दोनों सुबह भी करने वाले थे।

रंजन घबरा कर मेरे ऊपर से हटा और लुढ़क कर अपनी जगह वापस लेट गया। मैंने भी पति की तरफ करवट करते हुए पास रखा चद्दर ओढ़ लिया। रंजन ने भी पीछे से चद्दर अपने ऊपर ओढ़ लिया।

रंजन एक बार फिर मेरे पिछवाड़े से चिपक गया। रंजन चरम के काफी नजदीक जाकर बाहर निकला था सो उस ने एक बार फिर मेरे अंदर प्रवेश किया। उसके झटके फिर से शुरू हो गए। उसने अपना एक हाथ भी मेरे शर्ट में घुसाते हुए मेरे ब्रा को दबोच लिया।

पति ने अब आँख खोली और मेरी तरफ देखा। मेरी आँखें खुली थी। रंजन को भी पता चल गया तो उसने झटके मारना बंद कर दिया पर लंड अभी भी मेरे अंदर ही था। अब वो बहुत ही होले होले अंदर बाहर कर रहा था, इतना धीरे की मैं बिलकुल ना हिलु और पति को शक न हो।

पति ने पूछा नींद कैसी आयी, मैंने कहा ठीक। रंजन के धीरे धीरे ही सही, अंदर बाहर लंड के रगड़ने से मैं अब चरम की तरफ बढ़ने लगी, रंजन की भी यही हालत थी।

पति के इन्ही सवालों जवाबो के बीच रंजन छूट गया और साथ में मैं भी। उसने तो अपनी आवाज़ दबा ली, पर मेरे मुँह से एक जोर की आह निकल ही गयी।

अगले ही क्षण मैंने अपनी आह को चालाकी से उबासी में तब्दील कर दिया और पति को शक न होने दिया कि पीछे से रंजन मेरे साथ क्या कर रहा हैं।

रंजन ने मेरे अंदर से अपना सामान बाहर निकाला और बिना ज्यादा हिले चद्दर के अंदर ही अपनी जीन्स ऊपर खिसका के पहन ली।

मैंने भी हाथ नीचे ले जाकर अपनी पैंट ऊपर खिंच कर पहन ली। रात को ही उसने अपना बहुत सारा पानी निकाल दिया था तो अभी सुबह ज्यादा पानी नहीं निकला, जिससे साफ़ सफाई की ज्यादा चिंता नहीं थी।

थोड़ी देर ऐसे ही लेटे लेटे बात करने के बाद हम सब उठ बैठे। थोड़ी ही देर में मंजिल आने वाली थी तो अपने आप को व्यवस्थित कर तैयार होंने लगे।

पता नहीं पति को मेरे और रंजन के बीच सुबह बने सम्बन्धो का पता चला कि नहीं, मैंने भी आगे बढ़कर कभी पूछा नहीं। बस से उतर कर हमने रंजन से विदा ली, उसके बाद उससे कभी मिलना नहीं हुआ वह बहुत दूर जा चूका था।

इस तरह हमारी साजिश का आखिरी पड़ाव ख़त्म हुआ। इसके बाद हमको इसकी जरुरत नहीं पड़ी। मेरे अगले पीरियड नहीं आये, और प्रेग्नेंसी टेस्ट भी पॉजिटिव आया।

मुझे आज तक नहीं पता कि उसका असली जैविक पिता कौन हैं संजीव, रौनक या रंजन। क्या फर्क पड़ता हैं, बच्चे की माँ तो मैं ही थी।

पति और मैंने शपथ ले ली थी की अब हम कभी ये साजिश नहीं रचेंगे और एक ही बच्चा काफी हैं।
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