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Misc. Erotica संग वो गर्मी की शाम
#1
कहानी का नाम: "संग वो गर्मी की शाम"

पात्र:

तुम (राहुल) – 24 साल का, पढ़ाई के बाद पहली बार गांव लौटा।

नेहा – 22 साल की, मामा की बेटी, बचपन में दोस्त थी... अब कुछ और लगती है।



---

? भाग 1: मुलाक़ात

गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने ननिहाल गया। जैसे ही आंगन में कदम रखा, एक जानी-पहचानी आवाज़ आई:

"राहुल? तू कितना बदल गया है!"

वो दोपहर याद है — जब गांव के बाकी लोग किसी रिश्तेदार की शादी में गए थे। घर में सिर्फ़ मैं और नेहा ही थे।

मैं बरामदे में लेटा था, किताब पढ़ने की कोशिश कर रहा था, मगर दिमाग कहीं और था।

नेहा हल्के से चाय की ट्रे लेकर आई। कुर्ता थोड़ा ढीला था, उसके गीले बाल अब सूखने लगे थे। चाय से ज़्यादा उसका आना महसूस हुआ।
मैंने उसे ऊपर से नीचे तक देखा...
वो वही नेहा थी, जिसे मैं बचपन से जानता था —
पर उस शाम, कुछ अलग था।

उस पीले सूट की कलीदार झालरें हवा से खेल रही थीं,
जैसे हर कली उसकी मुस्कराहट पर थिरक रही हो।

उसके खुले बाल — जैसे किसी पुराने गीत की धुन बनकर लहराए हों।
चेहरे पर कोई सजावट नहीं थी,
सिर्फ़ सादगी की चमक थी… जो किसी भी श्रृंगार से कहीं ज़्यादा गहरी थी।

उसकी आँखें — बड़ी, शांत, और जाने क्या कहती हुईं —
मानो पूरे दिन की थकान को सिर्फ़ एक नज़र में मिटा देतीं।


---

उसकी आवाज़ जब मेरे कानों तक पहुँची —
"ठीक लग रही हूँ?"
तो मैं कुछ पल तक कुछ कह ही नहीं पाया।

कैसे कहता — कि आज तू सिर्फ़ ‘ठीक’ नहीं लग रही,
तू वैसी लग रही है… जैसी कोई अपने ख्वाबों में देखे,
और फिर आंख खुलने के बाद भी भूल न पाए।
पूजा ख़त्म हो गई थी।
लोगों की भीड़ मंदिर से निकल रही थी, पर हमारे बीच अब एक अजीब-सी ख़ामोशी थी।

हम साथ-साथ चले — वही धूल-भरी पगडंडी, वही रास्ता…
लेकिन अब हर क़दम जैसे दिल की धड़कनों से जुड़ा हुआ था।

मैं चुप था।
वो भी… पर उसकी चुप्पी अब भारी नहीं, भीतर तक उतरती हुई लग रही थी।


---जैसे ही आंगन में कदम रखा, वो रुक गई।
थोड़ी थकी-सी, पर चेहरा अब भी उजला।

"बहुत लोग थे मंदिर में," उसने कहा, और पल्लू पीछे सरकाते हुए बालों को ठीक किया।

पीला सूट धूप में कुछ ज़्यादा ही चमक रहा था,
और उसके खुले बाल अब माथे पर हल्की नमी छोड़ चुके थे।

मैंने महसूस किया —
वो बस वहीं खड़ी थी, कुछ कहे बिना,
लेकिन उस एक नज़र में जैसे पूरे दिन की बात छिपी थी।

थक गया?" उसने पूछा, मुस्कराकर।

"हाँ…" मैंने कहा, लेकिन शायद मेरा जवाब थकान का नहीं था।

उसने हल्के से मुस्कान दी और बिना कुछ कहे कमरे की ओर चल दी।

मैं वहीं खड़ा रह गया…
क्योंकि अब वो मामा की बेटी नेहा नहीं रही थी।

वो कोई ऐसी बन गई थी…
जिसकी चुप्पी भी मेरे अंदर कुछ कह रही थी।



रात का खाना हो चुका था। नानी ने कहा, "नेहा, राहुल को ऊपर वाला कमरा दिखा देना… वहीं पंखा ठीक है।"

नेहा ने चुपचाप सिर हिलाया।

मैं उसके पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। हर क़दम, हर दरवाज़े की चरमराहट जैसे मुझे भीतर तक महसूस हो रही थी।

कमरे में पहुँचकर उसने खिड़की खोल दी —
बाहर हल्की हवा थी, और कुछ दूर मंदिर की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं।

"यहाँ से पूरा गाँव दिखता है," उसने कहा।

मैंने कुछ नहीं कहा… बस उसे देखा।
वो खिड़की के पास खड़ी थी, पीले सूट में, बाल अब भी खुले।
उसका चेहरा चाँदनी से हल्का चमक रहा था।

"तेरे जाने के बाद यहाँ बहुत कुछ बदला," वो बोली।

"और तू?" मैंने पूछा।

वो पल भर को चुप रही… फिर धीमे से कहा —
"मैं भी शायद बदल गई हूँ। लेकिन तू देखता नहीं… समझता भी नहीं…"

मैंने उसकी ओर एक क़दम बढ़ाया —
"नेहा… अगर मैं कुछ समझने लगा हूँ, तो शायद अब… बहुत ग़लत वक़्त पर समझ रहा हूँ।"

उसने मेरी तरफ देखा — आँखों में हल्की नमी थी, पर वो मुस्कुरा रही थी।

"कभी-कभी सही चीज़ें भी ग़लत वक़्त पर मिलती हैं…" उसने कहा।

मैं और कुछ नहीं कह पाया।
बस उसी चुप्पी में खड़ा रहा —
जहाँ एक तरफ दिल धड़क रहा था, और दूसरी तरफ रिश्तों की दीवारें खड़ी थीं।

उसने जाते-जाते सिर्फ़ एक बात कही —

"रिश्ते अगर ज़्यादा क़रीब आ जाएं, तो या तो बहुत खूबसूरत हो जाते हैं… या बहुत मुश्किल।"

और फिर वो दरवाज़ा बंद कर गई।


---

? उस रात

मैं खिड़की से बाहर देखता रहा…
और सोचता रहा —
क्या नेहा को भी वही महसूस हुआ जो मुझे हो रहा है?
या मैं सिर्फ़ एक ख़्वाब को थामे बैठा हूँ?
रात को सब अपने-अपने कमरों में थे। बिजली चली गई थी। खिड़की से चांदनी अंदर आ रही थी। मैं बाहर आंगन में बैठा था… और नेहा वहीं पीछे बरामदे की चौखट पर।

हम दोनों चुप थे — लेकिन उस चुप्पी में इतनी बातें थीं, जितनी शब्द कभी कह नहीं सकते।

"याद है," उसने अचानक कहा, "जब तू पाँच साल पहले यहां से गया था, तो रोया नहीं था। पर मैं बहुत रोई थी।"

मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में वो बचपन था, वो भरोसा... और कुछ ऐसा भी, जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल था।

"तब शायद समझ नहीं पाई थी क्यूँ... अब समझ आती है," उसने कहा।

मैंने धीरे से पूछा, "अब क्या समझ आती है?"

उसने थोड़ी देर देखा, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली:

"कि कभी-कभी कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसास से बनते हैं।"

बिजली अब तक नहीं आई थी।

गाँव की रातें वैसे भी खामोश होती हैं — ऊपर तारों भरा आसमान, और नीचे टिमटिमाती जुगनुओं की परछाइयाँ।

मैंने अपनी बैग से टॉर्च निकाली — एक हल्की पीली रौशनी सीधी सामने ज़मीन पर पड़ी।

"बड़ा शहर वाला है, सब कुछ साथ लाता है," नेहा ने हँसते हुए कहा और पास बैठ गई।

मैंने टॉर्च उसकी ओर घुमाई — रौशनी उसके चेहरे पर पड़ी।

वो झेंप गई, “ऐसे क्या देख रहा है?”

मैंने टॉर्च थोड़ा नीचे किया, लेकिन नज़रें नहीं हटीं।

उसके चेहरे पर टॉर्च की हल्की सी झिलमिलाहट थी — उसकी आँखें चमक रही थीं, और बालों की कुछ लटें गालों पर गिर रही थीं।

"तुझे कभी इतने पास से नहीं देखा," मेरे मुँह से खुद-ब-खुद निकल गया।

वो चौंकी, लेकिन कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ नज़रे झुका लीं।

एक लंबा सन्नाटा… लेकिन वो सन्नाटा बोला।

मैंने टॉर्च ज़मीन पर रख दी — ताकि अब सिर्फ चांदनी बचे।

"नेहा..." मैंने धीरे से उसका नाम लिया, जैसे उसे पुकारा नहीं, महसूस किया।

वो उठी नहीं। बस हल्के से बोली —
"कभी-कभी कुछ एहसास... बोलने नहीं पड़ते।"

मैं कुछ कहता, उससे पहले उसने मेरी तरफ देखा…
वो नज़रें अब सवाल नहीं थीं, जवाब थीं।

टॉर्च अब भी ज़मीन पर रखी थी। उसका हल्का-सा उजाला हमारी परछाइयों को दीवार पर बड़ा बनाकर नाचा रहा था।

नेहा ने उसे देखा और हँसते हुए बोली,
"देख, दीवार पर कितनी डरावनी लग रही हूँ मैं!"

मैंने उसकी तरफ देखा, मुस्कराया,
"डरावनी नहीं... दीवार भी सोच रही होगी, काश मैं भी इंसान होती।"

वो ठहाका मारकर हँस पड़ी।
"तू अब भी वैसा ही है — बातों-बातों में लाइन मारने वाला!"

"और तू अब भी वैसी ही है — मुस्कुरा देती है, तो पूरा दिन ठीक लगने लगता है।"

कुछ देर दोनों चुप रहे... बस पंखे की जगह रात की ठंडी हवा चल रही थी।

"याद है बचपन में तू कितना मोटा था?" नेहा बोली।

"और तू हर बार छुपन-छुपाई में बर्तन में छुपती थी!"

"क्योंकि सबसे ज़्यादा डर तुझसे लगता था।" उसने आँखें तरेरकर कहा।

"डर? मुझसे? तू तो मेरी हील में रोती थी!"
मैंने चिढ़ाया।

हम दोनों अब ज़ोर से हँस रहे थे।
लेकिन फिर अचानक वो चुप हो गई।

उसकी आँखें थोड़ी देर के लिए झील जैसी शांत हो गईं।

"राहुल..." उसने धीमे से कहा, "सब कुछ कितना बदल गया है ना। पहले हम बस खेलते थे... अब हर बात में कोई ख़ास सा मतलब महसूस होता है।"

मैंने उसकी तरफ देखा — वो पलकों से कुछ छुपा रही थी। शायद कोई पुरानी याद या नई उलझन।

"नेहा," मैंने कहा, "बचपन के दिन तो लौट नहीं सकते... पर शायद, हम फिर से वैसे ही बेपरवाह हो सकते हैं।"

उसने मेरी तरफ देखा। थोड़ी सी नमी, थोड़ी सी हँसी… और फिर वही हल्की सी शरारती मुस्कान।

"तो फिर कल सुबह नदी पर चलते हैं? जैसे पहले जाते थे?"

"हाँ, लेकिन इस बार मैं तुझे धक्का दूँगा… पानी में!"

"अच्छा! तो मैं तेरी टॉर्च ले लूँगी!"

"नेहा! वो टॉर्च बहुत महंगी है!"
रात की टॉर्च की हल्की रोशनी में नेहा की आँखें चमक रही थीं। वो मामा की बेटी थी, बचपन की दोस्त, लेकिन आज उसकी हर हँसी मेरे दिल में कुछ मचलन पैदा कर रही थी।

मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मुस्कुराते हुए बोला, "तुम्हारे ये बाल… आज कुछ ज़्यादा ही खूबसूरत लग रहे हैं।"

नेहा ने शरारत से मेरी तरफ़ नज़र उठाई, "ओह, क्या तुम्हें सच में पसंद आए?"

मैंने झूठ नहीं बोला, "हाँ, और तुम्हारा ये सूट भी... लगता है, तुम जानती हो कि तुम्हें कैसे खूबसूरत दिखना है।"

वो हँसी, और अपने बालों को एक तरफ़ झटकते हुए बोली, "तुम्हें देखकर तो मैं भी शरमाने लगती हूँ… क्या मेरे साथ ये सब महसूस करना तुम्हारे लिए भी नया है?"

मैं थोड़ा करीब जाकर बोला, "नेहा, ये सब कुछ नया नहीं, बस अब हम दोनों इसे महसूस करने लगे हैं। और शायद… ये थोड़ा सा मज़ेदार भी है।"

उसने आँखें चमकाते हुए कहा, "तो बताओ, अब क्या होगा? क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि ये सब… कुछ गलत हो जाएगा?"

मैंने धीमे से कहा, "डर तो है, पर उससे ज़्यादा है ये चाहत कि तुम्हें मैं अपने दिल से कभी जाने न दूँ।"

नेहा ने शरारती मुस्कान दी, और अपनी उँगली से मेरी ठोड़ी पर हल्का सा थपथपाया, "तो फिर, ये नई शुरुआत हो सकती है — जो बचपन की दोस्ती को एक नए सफर पर ले जाए।"

और उसी पल, टॉर्च की रोशनी में, हम दोनों की परछाइयाँ दीवार पर मिलकर एक हो गईं — जैसे हमारी दिलों की दहलीज़ पर एक नई कहानी शुरू हो रही हो।
टॉर्च की रोशनी में उसके चेहरे पर एक चमक थी, और वह थोड़ी नर्वस लेकिन उत्साहित लग रही थी।

हम दोनों धीरे-धीरे खेत की ओर बढ़े,
जहां गाय शांतिपूर्वक घास चर रही थी।

"देखो, यह मेरी सबसे प्यारी गाय है," नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा।
"रात में जब बिजली नहीं होती, तो मैं इसे देखती रहती हूं कि वह ठीक से है या नहीं।"

उस पल, उसकी मासूमियत और स्नेह देखकर, मेरा दिल एक अलग ही तरह से धड़क उठा।
रात की ठंडी हवा, टॉर्च की चमक, और नेहा का वो स्नेहिल भाव — सब कुछ एक खूबसूरत याद बन गया।

.रात के ठहरे हुए सन्नाटे में, खेत की हरियाली और चाँद की चाँदनी के बीच मैं और नेहा खड़े थे। हवा में हल्की सी ठंडक थी, लेकिन मेरे दिल की धड़कनें ऐसा महसूस करा रही थीं जैसे कोई आग जल रही हो।

मैंने अपनी हिम्मत जुटाई, और धीरे से नेहा का हाथ थामा। उसकी नज़रें मेरे चेहरे से टकराईं, लेकिन वह कुछ कह नहीं रही थी, बस मुझे सुनने के लिए तैयार थी।

"नेहा," मैंने धीरे से कहा, "तुम मेरे लिए सिर्फ मेरी मामा की बेटी या मेरी बचपन की दोस्त नहीं हो। तुम वो हो, जिसके बिना मेरी दुनिया अधूरी है। क्या तुम मेरी जिंदगी में हमेशा के लिए साथ चलोगी?"

कुछ पल के लिए चाँद की रौशनी ने हमें अपनी छाया में छुपा लिया। नेहा की आँखों में कुछ भाव उमड़ रहे थे — एक तरफ शर्मिंदगी, दूसरी तरफ खुशी।
नेहा (थोड़ी नाराज़गी और उलझन में):
"राहुल, तुम मुझसे ऐसी बात कैसे कह सकते हो?"
"तुम मेरी बुआ के बेटे हो… यही सोचते हो मेरे बारे में?"
"क्या सब कुछ इतने सालों की दोस्ती के बाद भी बस 'रिश्ता' ही दिखता है तुम्हें?"
नेहा कुछ पल चुप रही। आँखों में नमी थी, मगर चेहरा सख़्त।
फिर अचानक उसने मुँह मोड़ लिया, जैसे कुछ छुपाना चाह रही हो।

नेहा:
"तुम समझते क्यों नहीं, राहुल?"
"लोग क्या कहेंगे? मामा का बेटा... मेरी माँ को क्या जवाब दूंगी मैं?"

राहुल धीरे से उसके पास आया, मगर दूरी बनाए रखी। उसकी आवाज़ शांत थी, मगर गहराई से भरी हुई।

राहुल:
"लोगों ने तो हमें बचपन से साथ देखा है, नेहा। पर क्या किसी ने कभी हमारे बीच की बातें समझीं?"
"तू सिर्फ़ मेरी मामा की बेटी नहीं है... तू वो है जो मेरी हर मुस्कान की वजह बनी है।"
"मैंने तुझे रिश्ते के नाम से नहीं, एहसास से चाहा है।"

नेहा ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों से एक आँसू चुपचाप नीचे गिरा।

राहुल थोड़ा और पास आया, मगर अभी भी बिना छुए।

राहुल:
"अगर तुझे सच में लगता है कि ये सब ग़लत है... तो मैं कभी कुछ नहीं कहूँगा दोबारा। बस... एक बार बता दे, कि तुझे भी कुछ महसूस नहीं होता मेरे लिए।"

नेहा ने धीरे-धीरे उसकी ओर देखा। उसकी आँखें भीग चुकी थीं, पर उनमें अब डर नहीं था — सिर्फ़ सच्चाई थी।

नेहा (धीरे से):
"मुश्किल है... पर झूठ भी नहीं कह सकती..."
"तू जब मंदिर में मेरे लिए इंतज़ार कर रहा था… जब तूने टॉर्च की उस मस्त हवा में बस मुझे देखा… तब मैं कुछ और ही महसूस कर रही थी।"
"हाँ, डरती हूँ... पर तेरे साथ वो डर भी अच्छा लगता है।"

राहुल ने पहली बार हल्की-सी मुस्कान दी।
नेहा उसके पास आई, और उसकी आँखों में देखते हुए बोली:

"हाँ राहुल… अब जो है, जैसा है... मैं बस तेरे साथ चलना चाहती हूँ।"


---कई देर तक खेत में बैठकर बातें करने के बाद, हम दोनों चुपचाप घर की ओर लौटे।

गाँव की पगडंडी पर बस हमारे कदमों की आहट थी… और कभी-कभी कोई कुत्ता दूर से भौंक उठता। आकाश में चाँद आधा था, लेकिन नेहा की आँखों में पूरा चाँद झलक रहा था।

राहुल (धीरे से): "तू थक गई है?"

नेहा (हल्की मुस्कान के साथ): "थक तो गई हूँ... पर पहली बार अच्छा लग रहा है थकना।"

हमने बिना कुछ कहे रास्ता पूरा किया। दरवाज़े पर पहुँचते ही वो रुकी, और एक पल के लिए मेरी तरफ देखा।

नेहा: "आज कुछ बदला है, है ना?"

मैंने सिर हिलाया।

राहुल: "हाँ... लेकिन अच्छा बदला है।"

वो मुस्कराई, और बोली:

नेहा: "अब डर लगना थोड़ा कम हो गया है।"

राहुल: "और मैं वादा करता हूँ, जब तक तू साथ है — डर कभी अकेला नहीं होगा।"

वो धीरे से सर हिलाकर अंदर चली गई।

मैं वहीं थोड़ी देर खड़ा रहा... उसी दरवाज़े पर, जहाँ से बचपन में हम लुका-छुपी खेलते थे। अब यहाँ पर कोई खेल नहीं था — सिर्फ़ एहसास था।

उस रात पहली बार लगा —

"प्यार तब नहीं होता जब कोई साथ आता है...
प्यार तब होता है जब कोई रुकता नहीं, फिर भी ठहर जाता है।"

रात गहरी हो चुकी थी।
खेत से लौटते वक्त मन में जितनी हलचल थी, घर के आंगन में कदम रखते ही उतना ही बोझ महसूस हुआ।

दरवाज़े पर नेहा की माँ खड़ी थी — आँचल सिर पर, माथे पर चिंता की रेखाएं और आँखों में माँ वाली बेचैनी।

नेहा कुछ कहे बिना अंदर चली गई। सिर झुकाए, कदम हल्के, जैसे जानती हो — माँ कुछ पूछे बिना भी बहुत कुछ कह देगी।

मैं वहीं रुक गया।

नेहा की माँ, यानी मेरी मामी, मेरी ओर नहीं देख रही थीं। उनका चेहरा मेरे मामा की ओर था — पर आवाज़ पूरे आंगन में गूंज रही थी।

"बेटी जवान है, और ये... ये भी अब बच्चा नहीं रहा।"
"क्या ज़रूरत थी रात के वक़्त खेतों में अकेले जाने की?"

मामा कुछ नहीं बोले। बस खाट पर बैठे-बैठे अपनी लाठी को ज़मीन पर धीरे-धीरे घसीटते रहे।

"समझा दो इन्हें..."
"कभी कुछ हो गया तो बात सिर्फ़ बदनामी की नहीं रहेगी... बेटी की ज़िंदगी है ये!"

उनका गला हल्का कांपा। शायद आवाज़ ऊँची थी, पर दर्द बहुत गहरा था।

मामा अब भी चुप थे, मगर उनकी आँखों में मैं एक साफ़ शब्द पढ़ पा रहा था — "विश्वास"।


---

? एक माँ की चिंता

एक माँ जब अपनी जवान होती बेटी को देखती है, तो उसके मन में कई तरह के डर घर कर जाते हैं।
वो जानती है कि बेटियाँ फूल होती हैं — महकती हैं, पर एक तेज़ हवा से बिखर भी सकती हैं।

वो न नेहा को दोष दे रही थी, न मुझे।
बस वो वो हर मुमकिन खतरा सोच रही थी, जो एक माँ हर रोज़ अनदेखे सपनों में देखती है।
रात ढल चुकी थी।
गाँव की छतें जैसे तारों से बातें कर रही थीं।

मैं और नेहा का भाई — दोनों वहीं छत पर लेटे थे। हवा में गेहूं की खुशबू थी, और दूर कहीं कोई ट्रैक्टर की धीमी-सी गूंज आ रही थी।

दूसरे कोने में, मेरी माँ और बहन लेटी थीं।
उनके पास नेहा थी — चुपचाप, अपनी चादर में सिमटी हुई।

मैंने करवट बदली। और एक पल को नेहा की तरफ देखा — वो शायद मुझे देख रही थी, या फिर सोच रही थी कि मैं देख रहा हूँ।

हमारे बीच शब्द नहीं थे।
पर एक अपनापन, एक अनकहा जुड़ाव था — जो अब रिश्तों के नामों से परे जा चुका था।

कुछ रिश्ते होते हैं — जो नाम से नहीं, एहसास से जुड़ते हैं।


---
रात गहरा चुकी थी। घर के हर कोने में सन्नाटा पसरा था, बस छत की मटमैली दीवारों पर जुगनुओं की परछाइयाँ तैर रही थीं।

मैं चटाई पर लेटा था, मगर आँखों में नींद नहीं थी। न जाने क्यों, हर बार करवट लेते हुए निगाहें वहीं चली जातीं — उस तरफ़ जहाँ नेहा लेटी थी।

वो चुप थी, गहरी नींद में भी नहीं — बस आँखें मूँदे, एक अजीब सी शांति के साथ।

उसका चेहरा — आधी चाँदनी में कुछ और ही लग रहा था। जैसे वो वही नेहा हो ही नहीं सकती जिसे मैंने बचपन में मिट्टी के घरौंदों के बीच हँसते देखा था।

अब वो बड़ी हो गई थी। और शायद… मैं भी।

हर बार जब उसकी तरफ़ देखता, कुछ सवाल उठते —
"क्या ये सिर्फ़ अतीत की दोस्ती है? या कुछ ऐसा... जो अब नाम नहीं चाहता?"

मैंने खुद को समझाने की कोशिश की।
"बस आकर्षण है। नींद नहीं है... और उसका होना बस एक एहसास को जागा रहा है।"

लेकिन कहीं न कहीं दिल मानने को तैयार नहीं था।
क्योंकि वो सिर्फ़ दिखती नहीं थी — महसूस होती थी। हर सांस में, हर धड़कन में।

छत पर आधी रात का वो शांत सन्नाटा अब भारी लगने लगा था।
मैंने करवट बदली, आँखें मूँदी, और अपने भीतर की उस आवाज़ को चुप करवाने की कोशिश की।

क्योंकि कभी-कभी...
सिर्फ़ आकर्षण भी बहुत कुछ कह जाता है।


---खामोश रात थी। आंगन में पत्तों की सरसराहट थी और ऊपर तारे शांत खड़े थे।

मैं कब से करवटें बदल रहा था — नींद जैसे आंखों से दूर भागी जा रही थी। उठकर बैठ गया। सामने वो थी — नेहा, छत पर एक कोने में, मां और बहन के बीच लेटी हुई।

चांद की हल्की रोशनी उसके चेहरे पर आ रही थी… और मैं बस देखता रहा।

वो करवट बदलती, तो उसके बाल थोड़े चेहरे पर आ जाते… मैं अनजाने में मुस्करा उठता।

दिल कह रहा था — बस एक बार उससे बात कर लूं, जान लूं कि वो भी ऐसे ही सोच रही है या नहीं।

धीरे-धीरे उठा, बिना किसी आहट के उसकी ओर बढ़ा। घुटनों के बल उसके पास बैठा और बहुत हल्के से फुसफुसाया —

"नेहा..."

उसने आंखें खोलीं। कुछ सेकंड लगे उसे समझने में… और फिर वो चौंक गई।

"तू अभी तक जाग रहा है?" उसने धीमे से पूछा।

मैंने बस इतना कहा —
"दिल भारी है… तेरे बिना कुछ अधूरा सा लग रहा है।"

उसने मेरी ओर देखा… कुछ कहने को हुआ, फिर रुक गई।

उसने खुद को उठाया और खिसक कर थोड़ा किनारे हुई।
"बैठ जा," उसने धीरे से कहा।

हम दोनों अब चुपचाप बैठे थे… रात के उस शांत टुकड़े में, जैसे सिर्फ़ दिलों की धड़कनों की आवाज़ थी।
वो मेरी बगल में बैठी थी, लेकिन उसके हाथ बार-बार अपनी चुन्नी को ठीक कर रहे थे। नज़रें मुझसे नहीं मिल रही थीं।

चाँदनी उसकी पलकों पर ठहर गई थी, और वो हर पल जैसे कुछ छुपाने की कोशिश कर रही थी — अपने जज़्बात… अपनी उलझन… और शायद वो धड़कनें, जो अब थोड़ी तेज़ हो गई थीं।

मैंने उसका नाम धीरे से पुकारा —
"नेहा..."

उसने बिना देखे बस इतना कहा —
"तू ना... पागल है।"

मैं हल्के से मुस्कराया,
"तू भी ना… इतनी प्यारी लग रही है कि खुद से संभाल नहीं पा रहा खुद को।"

उसने धीरे से मेरी ओर देखा। वो नज़र कुछ कह रही थी — न पूरी हाँ थी, न पूरी ना।
बस एक शर्म की हल्की परत, और अंदर कुछ तूफ़ान सा।

वो बोली, बहुत धीमे, जैसे खुद को भी सुनाना नहीं चाहती हो —
"राहुल… ये सब ठीक नहीं है… पर जब तू पास होता है ना, तो कुछ भी ठीक-ग़लत समझ नहीं आता…"

मैंने उसके हाथों को छुआ नहीं, बस पास रखे…
"मैं तुझे कोई तक़लीफ़ नहीं देना चाहता, नेहा। बस तेरे पास रहना चाहता हूँ।"

वो कुछ पल चुप रही… फिर अपनी उंगलियाँ मेरे हाथ के पास सरकाने लगी।

शर्म अभी भी थी, लेकिन अब दूरी नहीं थी।

मैंने उसकी आँखों में झाँकते हुए थोड़ा मज़ाकिया अंदाज़ में कहा,
"अब तो तेरा भाई भी मुझे ‘भाई’ नहीं, ‘जीजा जी’ बोलेगा!"

नेहा पहले तो चौंकी, फिर हँसी रोकने की कोशिश की… लेकिन उसकी मुस्कान आँखों तक पहुँच चुकी थी।

"तू सुधरेगा नहीं कभी," उसने हल्की झिड़की दी — मगर उसमें गुस्सा नहीं, शरारत थी।

मैंने धीरे से कहा,
"सच कह रहा हूँ, सोच — तेरा भाई जब मुझे शादी के कार्ड का पहला लिफाफा देगा और बोलेगा, 'लो जीजा जी, आपकी शादी का न्योता है'…"

नेहा की हँसी अब खुलकर बाहर आ चुकी थी।

"पागल!" उसने धीरे से मेरी तरफ तकिया फेंका।

मैंने उसे पकड़ते हुए मुस्कराकर कहा,
"तेरी मुस्कान के लिए ही तो ये सब करता हूँ… बाकी तो तेरा प्यार ही मेरी सबसे बड़ी जीत है।"

वो अब शांत थी — लेकिन उसके चेहरे पर जो सुकून था, वो किसी जवाब से कहीं ज़्यादा था।
नेहा भी मुस्कुरा पड़ी, आँखें घुमा कर बोली —
"ओहो! तू भी कम नहीं है... तो फिर तू भी मेरे भाई को 'जीजा जी' बोल सकता है!"
नेहा ने मुस्कराते हुए कहा —
"राहुल, तेरी बहन भी तो मेरी उम्र की है... और मेरा भाई भी!
चल, दोनों की सेटिंग करवा दे — घर में दो-दो शादी के ढोल बजेंगे!"

राहुल ने आँखें चौड़ी कीं, जैसे कोई बहुत बड़ा प्लान सुन लिया हो —
"मतलब तू प्लानिंग करके आई है पूरा कुनबा जोड़ने की?"

नेहा शरारती अंदाज़ में बोली —
"कम से कम कोई और भी तो 'जीजा जी' बुलाए तुझे, मैं अकेली थक जाती हूँ!"

राहुल हँसते-हँसते बोला —
"तू सच में कमाल की है, नेहा... शादी से पहले ही रिश्तेदार बढ़ाने लगी!"
राहुल की आँखों में एक हल्की चमक थी,
जैसे चुपचाप कुछ कह रही हो।
वो कुछ बोल नहीं रहा था, मगर उसकी नज़रें बहुत कुछ बयां कर रही थीं।

नेहा उस नज़र को महसूस कर रही थी,
और बार-बार अपनी चुन्नी को संभाल रही थी —
कभी कंधे पर, कभी गर्दन के पास, जैसे उस नज़रों की गर्माहट से बच रही हो।

उसका चेहरा गुलाबी हो रहा था,
आँखें नीची और होठों पर एक अजीब-सी मुस्कान थी —
वो मुस्कान, जो शर्म से भी भरी थी और एक मीठी बेचैनी से भी।

राहुल ने धीरे से कहा,
"नेहा... तू जब ऐसे शरमाती है ना, तो लगता है जैसे पूरा गाँव चुप हो गया हो... बस तुझे ही देख रहा हो।"

नेहा ने आँखें उठाकर देखा,
थोड़ी देर कुछ कहना चाहा... पर शब्द गले में अटक गए।
बस मुस्कराई — और फिर से अपनी चुन्नी से चेहरा आधा ढक लिया।
यहाँ एक शालीन, भावनात्मक और हल्की रोमांटिक शैली में आपकी कहानी को आगे बढ़ाया गया है:

रात का वो पल... जब सब सो चुके थे, पर हमारी नींद कहीं दूर भटक रही थी।

मैं और नेहा छत पर खड़े थे, परिवार से थोड़ा दूर। चारों तरफ़ सन्नाटा था, बस दूर कहीं पत्तों की सरसराहट और रात की ठंडी हवा हमारे साथ थी।

नेहा बालों को कानों के पीछे कर रही थी और अपनी चुनरी को ठीक कर रही थी, जो हवा में बार-बार उड़ रही थी।

उसने मेरी ओर देखा, फिर तुरंत नज़रें झुका लीं। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, मगर आंखों में एक संकोच भी।

मैंने चुपचाप उससे कहा,
"ठंडी हवा बड़ी जिद्दी है, लेकिन तू उससे भी ज़्यादा खूबसूरत लग रही है इस वक़्त।"

वो हँसी, लेकिन धीमे से। जैसे मन में कोई ख़्याल आकर चुपचाप बैठ गया हो।

"ऐसे मत देख," उसने फुसफुसाते हुए कहा,
"सब जाग गए तो?"

"तो क्या?" मैंने मुस्कराकर कहा,
"हम तो बस आसमान के तारे गिन रहे थे..."

वो फिर हँसी, इस बार थोड़ी खुलकर।

उस रात कुछ कहे बिना भी बहुत कुछ कहा गया।
नीचे देखा तो नेहा के मम्मी-पापा एक खाट पर साथ सोए थे।

उनकी थकी हुई आंखें बंद थीं, पर चेहरों पर शांति थी — जैसे पूरे दिन की जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल गई हो।

पापा की बाजू माँ के कंधे पर रखी थी, और माँ का सिर हल्के से उनके सीने पर टिका था।

कोई कुछ नहीं कह रहा था, पर उस खामोशी में एक पूरी ज़िंदगी की कहानी छुपी थी।

नेहा ने धीमे से कहा, "यही असली प्यार होता है ना?"

मैंने सिर हिलाया, "हाँ... जिसमें शब्द नहीं, पर साथ होता है।"


---
नेहा की हल्की गुलाबी चूनरी फड़फड़ाती हुई उड़ गई — और छत की मुंडेर से नीचे गिर गई।

वो चौंककर पीछे हटी, आँखों में घबराहट थी।
"अरे मेरी चूनरी!" उसने जल्दी से कहा और झुककर नीचे देखने लगी।

मैंने मुस्कराते हुए कहा,
"रुक, मैं लेकर आता हूँ। उड़ने की आदत सिर्फ़ तेरी नहीं, तेरी चूनरी की भी है।"

वो हँस दी — थोड़ी झेंपी हुई, थोड़ी शर्माई हुई।

नीचे खाट पर सोए नेहा के मम्मी-पापा अब भी उसी तरह एक-दूसरे की बाँहों में थे। चूनरी उनके पास जाकर एक किनारे रुक गई थी — जैसे वो भी सुकून ढूंढ़ रही हो।

मैंने नीचे उतरते हुए सोचा…
शायद कुछ चीज़ें उड़ती हैं, बस ये याद दिलाने के लिए कि उन्हें थामने वाला कोई हो।


---"मैंने नेहा की उड़ती हुई चुन्नी पकड़कर उसे लौटाई, मगर जब उसने ओढ़ने को हाथ बढ़ाया, तो मैंने हल्के से कहा — 'रहने दे नेहा... हवा से मत लड़, कभी-कभी खुद को बस महसूस करने दे।'

वो पल भर को ठिठकी, मेरी तरफ देखा… और बिना कुछ कहे मुस्कराकर नजरें झुका लीं। उसके गालों पर शर्म की लाली थी, और उस लम्हे में शायद... एक एहसास ने जन्म लिया था।"
नेहा ने चुपचाप अपनी चुन्नी उतारी और पास ही छत के कोने में रख दी।

राहुल ने देखा, पर कुछ कहा नहीं।

हवा अब भी चल रही थी — हल्की, ठंडी, और रात की स्याही में लिपटी।

नेहा बालों को कानों के पीछे करती हुई छत की मुंडेर तक चली गई।

"कभी-कभी… सब कुछ छोड़कर बस यहीं रह जाने का मन करता है," उसने धीमे से कहा।

राहुल ने उसकी बात सुनी, और बग़ैर कुछ बोले पास जाकर खड़ा हो गया।
नेहा ने उस दिन पीला पटियाला सूट पहना था — हल्की कढ़ाई वाला, जिसकी किनारियाँ हवा में हल्के-हल्के लहर रही थीं।
उसके बाल खुले थे, हवा से बार-बार आंखों के आगे आ जाते… और वो हर बार उन्हें सलीके से कानों के पीछे कर लेती।

राहुल ने एक नज़र उसकी तरफ देखा, और फिर तुरंत नज़रें फेर लीं।
पर उस एक पल में शायद बहुत कुछ महसूस हो चुका था।

वो कोई सज-धज नहीं थी, कोई दिखावा नहीं — सिर्फ़ सादगी। और उसी सादगी में एक अलग सी खूबसूरती थी।

नेहा ने मुस्कराते हुए पूछा,
"क्या देख रहे हो ऐसे?"

राहुल थोड़ा झेंप गया, फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,
"बस... वो पीला रंग तुम पर हमेशा से अच्छा लगता था।"

उसने कुछ नहीं कहा — बस थोड़ा और सिमटकर खड़ी हो गई।

शाम की हवा, खेतों की सोंधी महक, और छत पर खामोशी से खड़े दो दिल — ये शायद कहानी की सबसे नर्म शुरुआत थी।


---




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#2
उसके नीचे की गहरी लाल सलवार, पीले रंग के साथ एक खूबसूरत मेल बना रही थी।
राहुल की नज़र एक पल को ठहर गई — न तो गलत इरादे से, न ही बेशर्मी से... बस एक पहली बार महसूस हुए प्यार की मासूम सी जिज्ञासा थी।
दोनों ने एक-दूजे का हाथ थामा।
चाँदनी छत की मुंडेर पर टिक गई थी, और नीले आसमान की चुप्पी में सिर्फ़ उनकी साँसों की आहट थी।

नेहा की उंगलियाँ धीरे-धीरे राहुल की हथेली में समा गईं — जैसे किसी पुराने गीत की धुन वापस लौट आई हो।
कोई शब्द नहीं बोले गए… फिर भी हर स्पर्श में जैसे सौ कहानियाँ छिपी थीं।

राहुल ने हल्के से नेहा की ओर देखा।
वो कुछ कहने ही वाला था, लेकिन नेहा ने उसकी हथेली को थोड़ा और कसकर थाम लिया।
"कुछ मत बोल," उसकी आँखें जैसे कह रही थीं, "बस यूँ ही कुछ देर थामे रहो।"

उस रात, न कोई इज़हार ज़रूरी था… न कोई वादा।
बस एक साथ होना — बिना किसी शोर के, बिना किसी डर के — सब कुछ कह गया।
छत पर रात का वक्त है, सब सो चुके हैं। हल्की-सी ठंडी हवा चल रही है, और चाँदनी चारों ओर फैली है। नेहा और राहुल एक कोने में चुपचाप बैठे हैं… एक-दूसरे के बेहद पास।


---

राहुल धीरे से बोला,
"तुझे पता है नेहा... जब तू चुपचाप बैठी होती है ना, तब भी तेरे साथ बहुत कुछ बोलने का मन करता है।"

नेहा मुस्कराई, लेकिन उसकी नज़रें अब भी नीचे थीं।
उसके चेहरे पर हल्की शर्म थी, और वो अपनी चुन्नी को बार-बार ठीक कर रही थी।

नेहा धीमे से बोली,
"तू भी ना… कुछ ज़्यादा ही फ़िल्मी बातें करता है।"

राहुल हँसते हुए, उसके थोड़े और करीब आ गया।
"तो तू ही बता… जब सामने इतनी प्यारी हिरोइन बैठी हो, तो हीरो कैसे ना बोले!"

नेहा ने उसकी तरफ देखा — कुछ कहने वाली थी, पर शब्द नहीं निकले।
बस एक हल्का सा धक्का दिया राहुल को, और बोली,
"ज़्यादा लाइन मत मार, मैं अभी भी गुस्से में हूँ!"

राहुल उसका हाथ पकड़ता है — पहली बार थोड़ी देर के लिए।
"गुस्सा है, लेकिन ये हाथ पीछे क्यों नहीं खींचा तूने?"

नेहा चौंकती है, फिर धीरे से अपना हाथ उसकी उँगलियों में छोड़ देती है।

रात और गहरी हो जाती है…
पास बैठे दो दिलों की धड़कनें अब एक-दूसरे को साफ़ सुनाई दे रही हैं।
नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा:
"चलो अब सोते हैं, नहीं तो कोई जाग गया तो... सवाल शुरू हो जाएंगे।"

राहुल ने हौले से सिर हिलाया:
"हाँ, वरना सुबह माँ की नज़रें हमसे ज़्यादा सवाल पूछेंगी।"

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे। नज़रों में सैकड़ों बातें थीं, मगर लफ़्ज़ों में सिर्फ़ एक सुकून —
कि अब दोनों को एक-दूसरे का साथ मिल गया है।

नेहा अपनी जगह पर जाकर लेट गई, और राहुल भी चुपचाप अपनी चादर ओढ़कर लेट गया।
चाँदनी अब भी चुपचाप उन पर मुस्कुरा रही थी।
सुबह की हल्की धूप अब आँगन तक आ चुकी थी। सब लोग नहा-धोकर ताज़ा हो चुके थे और चाय के प्याले हाथों में थे।
नेहा बालों में तौलिया लपेटे, हाथ में गीले कपड़ों की टोकरी लिए छत की ओर बढ़ गई।

राहुल नीचे बैठा था, लेकिन उसकी नज़र अनायास ही सीढ़ियों की ओर चली गई।
वो जानता था — अब दिन की हलचल शुरू हो गई है... लेकिन कहीं ना कहीं, दिल अभी भी बीती रात की हल्की सी गर्माहट में उलझा था।
सुबह की हल्की धूप में नेहा छत पर आई — हाथ में बाल्टी थी, जिसमें कुछ भीगे हुए कपड़े रखे थे। उसने नहाने के बाद काले रंग का सूट पहन रखा था, जो उसकी शांत सुंदरता को और भी निखार रहा था।

मैं कुछ देर उसके पीछे छत तक चला आया, चुपचाप।

नेहा ने मुझे देखा, पर कुछ नहीं कहा। बस बाल्टी नीचे रखी और एक-एक कर कपड़े तार पर टांगने लगी।

हवा से उसके बाल बार-बार चेहरे पर आ जाते, और वो हल्के हाथों से उन्हें पीछे करती।

मैं उसे निहारता रहा — न किसी बुरी नज़र से, न किसी स्वार्थ से — बस उस शांत सुबह में, वो मुझे अपनेपन की सबसे प्यारी तस्वीर लग रही थी।

नेहा ने मेरी नज़रें महसूस कीं, फिर बिना देखे ही मुस्कुरा दी।

"क्या देख रहे हो?" उसने बिना मुड़े कहा।

"वो ही, जिसे पहली बार दिल से देखा है," मैंने जवाब दिया।

नेहा की मुस्कान और गहरी हो गई। वो पल, ना कोई शब्द, ना कोई दूरी — बस दो दिलों की खामोश समझ।
उसने अपने सूखे सूट के नीचे कुछ भीगे कपड़े रख लिए थे — शायद इसलिए ताकि हवा से उड़ न जाएँ, या कोई उन पर नज़र न डाले।

मैंने एक कोना पकड़ा और बस चुपचाप उसे देखता रहा। उसमें कोई आकर्षण नहीं था — बस एक गहरी समझ थी।

उसके इस छोटे-से व्यवहार में मानो पूरी स्त्री की मर्यादा थी। कपड़े सिर्फ कपड़े नहीं थे — वो उसकी निजता, उसकी गरिमा, उसकी परवरिश थे।
"वो नीचे चली गई, और मैं छत पर रह गया। हवा में लहराते उसके सूखने के लिए डाले गए कपड़े—जिन्हें उसने बड़ी संजीदगी और मर्यादा के साथ अपने सूट के नीचे दबाकर सुखाया था—उन्हें मैं कुछ पल देखता रहा।

हर कपड़े में जैसे उसकी परछाईं थी, उसकी सादगी थी, और एक लड़की की वो भावना जिसे वो दुनिया की नज़रों से बचाकर रखती है।

वो कपड़े सिर्फ़ कपड़े नहीं थे, वो उसकी पहचान, उसकी लाज और उसका आत्मसम्मान थे। उस पल मुझे पहली बार एहसास हुआ... कि किसी को चाहना सिर्फ़ देखने से नहीं, समझने से शुरू होता है।"

साँझ की हल्की रोशनी खिड़की से छनकर अंदर आ रही थी। उसके हाथों की हरकतें सधी हुई थीं — जैसे सालों से इस घर की जिम्मेदारी संभालती आई हो।

राहुल दूर खड़ा था, पर उसकी नज़रें नेहा की सरलता में कुछ खास देख रही थीं।

"तेरे हाथों की खुशबू आज रसोई में कुछ ज़्यादा ही महक रही है," राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा।

नेहा ने पलटकर देखा, हल्की सी झुंझलाहट आँखों में और होंठों पर एक छुपी मुस्कान।

"चुपचाप बैठ, वरना हल्दी की जगह मिर्ची डाल दूँगी तेरे खाने में," नेहा बोली।

राहुल हँस पड़ा।
उसके लिए ये लम्हा प्यार के सबसे सादे लेकिन सबसे गहरे एहसासों में से था।

नेहा सब्ज़ियों में तड़का लगाते-लगाते अचानक चुप हो गई।

"आज बहुत थक गई है तू…"
राहुल की आवाज़ में एक अलग ही कोमलता थी।

नेहा ने बिना देखे जवाब दिया,
"थक तो रोज़ती हूँ, लेकिन आज तेरा यूँ चुपचाप देखना… थोड़ा सुकून दे गया।"

कुछ पल के लिए सिर्फ़ बर्तन की खनक सुनाई दी।

फिर राहुल ने कहा,
"कभी-कभी लगता है… तू रसोई नहीं, मेरा मन सँवार रही है।"

नेहा ने पहली बार उसकी ओर देखा — लंबी पलकों के नीचे हलकी सी नमी, और मुस्कान में थकी हुई मिठास।

"अब बस कर राहुल… ज़्यादा मीठा बोलेगा तो नमक भूल जाऊँगी,"
उसने पलटकर कहा, लेकिन उसकी आँखें बता रही थीं — वो सुनना चाहती थी, बार-बार।

राहुल धीरे से अंदर आया, उसके पीछे खड़ा हुआ।
हाथ कुछ नहीं छूते, लेकिन उसकी मौजूदगी अब नेहा के साँसों में घुल चुकी थी।

"तू कहे तो… आज खाना हम बाहर खाएँ?"
राहुल ने धीरे से पूछा।

नेहा थोड़ी देर चुप रही… फिर मुस्कुराकर बोली,
"नहीं… आज खाना घर पर ही अच्छा लगेगा।
क्योंकि आज तू मेरे पास है।"
सब लोग खाना खा चुके थे। अब छत पर टहलने चले गए थे — हँसी, बच्चों की दौड़ और बातों की गूंज ऊपर से आ रही थी।

नीचे रसोई में सिर्फ़ नेहा थी — अकेली, बर्तनों की खनक और पानी की धारों के बीच।

उसकी पीठ पर पसीने की हल्की परत थी, बालों की कुछ लटें चेहरे से चिपकी हुई थीं।

वो झुकी हुई थी — दोनों हाथों में साबुन और पानी, लेकिन ध्यान कहीं और था।

तभी पीछे से किसी के कदमों की हल्की आहट आई।
नेहा ने पलटकर नहीं देखा — शायद उसे पता था, ये कौन है।

राहुल धीरे से पास आया।
उसके हाथ अब नेहा की कमर के बेहद करीब थे — लेकिन बिना छुए भी, जैसे उसकी साँसों से उसकी पीठ तपने लगी हो।

"इतना काम मत किया कर नेहा…" — उसने फुसफुसाकर कहा।
"वरना मेरे हिस्से की थकान भी तू ही ओढ़ लेगी।"

नेहा की उँगलियाँ थम गईं।
उसने सिर झुकाए ही धीमे से जवाब दिया —
"और अगर मैं तेरी थकान भी ओढ़ लूँ… तो क्या तू मेरे बदन की गर्मी बाँटेगा?"

राहुल अब और क़रीब था — सिर्फ़ एक साँस की दूरी।
उसने धीरे से नेहा के बालों को कान के पीछे सरकाया।

"अगर तू इजाज़त दे… तो मैं तेरा हर हिस्सा अपना समझूँ।"

नेहा ने धीरे से गर्दन मोड़ी — उसकी आँखें अब राहुल की आँखों से टकरा चुकी थीं।
साँसें धीमी, मगर भारी।

"तेरी उँगलियाँ… मेरे गले से टकरा रही हैं, राहुल…"
उसकी आवाज़ में न तो पूरी मनाही थी, न पूरी इजाज़त — बस एक काँपती हुई खामोशी।

राहुल ने हल्का सा मुस्कुराकर उसके गले के पास से एक बूँद पसीना अपनी उँगली से हटाई,
फिर फुसफुसाया —
"ये बूँद नहीं… तेरी गर्मी की पहली ख़बर है।"

नेहा की पलकों ने धीरे से झुककर जवाब दिया —
जैसे उसने खुद को रोकना छोड़ दिया हो।

नेहा की साँसें तेज़ थीं… राहुल की उंगलियाँ उसकी गर्दन से नीचे सरकने लगी थीं।
लेकिन तभी, उसके भीतर एक आवाज़ गूँजी —

"नेहा, पागल मत बन… कोई देख लेगा…"

उसने एक झटके में खुद को थोड़ा पीछे किया।
राहुल चौंका — उसकी आँखों में सवाल था।

"अभी… अभी हमारी उम्र नहीं है इस सबकी,"
नेहा ने काँपती आवाज़ में कहा।
"अभी तो मुझे बहुत कुछ बनना है… और ये सब… बाद में भी हो सकता है, अगर सही होगा तो।"

कमरे में सन्नाटा फैल गया।
लेकिन नेहा के चेहरे पर जो तेज़ था — वो किसी भी मोह से बड़ा था।

राहुल कुछ देर वहीं खड़ा रहा — चुप, उदास।
उसने न तो कुछ कहा, न नेहा को रोका… बस पलटकर बाहर चला गया।

नेहा वापस बर्तन साफ़ करने लगी, लेकिन हाथ रुक-रुककर चलते थे।
उसके ज़ेहन में राहुल की आँखें थीं… उसकी उँगलियों की वो गर्मी जो अब भी गर्दन पर महसूस हो रही थी।

कुछ पल बीते — फिर दस, फिर पंद्रह।
फिर नेहा ने गीला हाथ धोया, और धीमे से मुड़कर बाहर झाँका।

राहुल बालकनी की दीवार से टिका हुआ था — अकेला, चुपचाप।
उसकी आँखें कहीं दूर थीं… लेकिन नेहा जानती थी, वो सिर्फ़ एक पल की हाँ का इंतज़ार कर रहा है।

नेहा ने एक लंबी साँस ली।
फिर रसोई से बाहर आई — धीरे-धीरे, नखरे से।

"ऐ राहुल…" — उसकी आवाज़ में एक मुस्कान छुपी थी।
राहुल ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं।

"इतना उदास मत हुआ कर…
मैंने मना किया था, छोड़ने के लिए नहीं…"
उसने एक कदम और क़रीब आते हुए कहा।

राहुल की आँखों में हल्की चमक लौटी।
"तो फिर?" — उसने फुसफुसाकर पूछा।
राहुल ने नेहा की कमर थामी और उसे अपनी ओर खींच लिया।
उसका स्पर्श न तो अचानक था, न ज़बरदस्ती — बस इतना काफ़ी था कि नेहा की धड़कन दो कदम आगे भाग जाए।

"आज तो… ब्लैक सूट में एकदम हीरोइन लग रही हो,"
राहुल ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।

नेहा ने नज़रें झुका लीं — मुस्कान होंठों तक आई, लेकिन ज़बान से कुछ नहीं बोली।
उसकी लटें गालों पर लहराईं, और वो शर्म से थोड़ा और पास खिसक गई।

"देख रही है तू मुझे?"
राहुल ने फुसफुसाकर पूछा।
"या बस यूँ ही... दिल चुरा ले जाना तेरा रोज़ का काम है?"

नेहा ने उसकी छाती पर हल्का सा धक्का दिया — बहुत ही नाज़ुक सा।
"चुप कर… कोई सुन लेगा…"

राहुल हँसा, फिर धीरे से उसके कान के पास झुका —
"सुन भी लें… तो क्या? बता दें कि मेरी हीरोइन आज सिर्फ़ मेरी है?"

नेहा की साँसें गड़बड़ाने लगीं —
उसने एक हाथ से राहुल की शर्ट की बटन को थाम लिया, जैसे कोई वजह चाहिए हो संभलने की।

"राहुल…" — उसने धीरे से कहा,
"अब तू अगर और पास आया… तो मैं सच में खुद को नहीं रोक पाऊँगी।"

राहुल ने उसकी कमर थोड़ी और कस ली…
"तो मत रोक… आज नाटक नहीं… आज बस तू और मैं।"


---राहुल ने धीरे से नेहा का चेहरा थाम लिया — उसकी उँगलियाँ उसके गालों को छूते हुए बालों के पीछे सरक गईं।
नेहा की नज़रें काँपने लगीं, लेकिन वो दूर नहीं हुई… बस एक साँस थमी।

"तेरे होंठ…" राहुल फुसफुसाया, "हर बार जैसे कुछ कहने से रुक जाते हैं…"

और फिर — बिना और कुछ कहे — उसने अपना चेहरा आगे बढ़ाया,
धीरे-धीरे… जब तक कि उनके साँसें एक-दूसरे से उलझ न गईं।

नेहा की आँखें खुद-ब-खुद बंद हो गईं, और अगले ही पल —
राहुल ने उसके होंठों को अपने होंठों में ले लिया।

किस गहरा नहीं था, तेज़ नहीं था — बस एक धीमा, डूबा हुआ एहसास था,
जैसे दोनों पहली बार अपने जज़्बातों को ज़ुबान दे रहे हों।

नेहा ने उसकी शर्ट को हल्के से कसकर पकड़ा,
और खुद को उस पल में बहने दिया।

राहुल और नेहा अब उस एक किस में पूरी तरह डूब चुके थे।
होंठ एक-दूसरे से बंधे थे, साँसें उलझ रही थीं, और वक्त जैसे रुक गया था।

नेहा की उँगलियाँ अब राहुल की गर्दन के पीछे सरक चुकी थीं,
और उसका बदन — धीरे-धीरे, बेइंतहा गर्माहट में पिघलने लगा था।

राहुल ने उसकी कमर को कसकर पकड़ा — जैसे उसे खोने का डर हो,
और अपने होंठों की गहराई और बढ़ा दी।

किस अब धीमा नहीं रहा —
वो गहराता जा रहा था,
हर पल में एक नई बेक़रारी घुलती जा रही थी।

नेहा की पीठ दीवार से टकरा गई, लेकिन उसने कोई विरोध नहीं किया —
बल्कि आँखें बंद करके खुद को उस पल में पूरी तरह सौंप दिया।

उसकी साँसें तेज़ थीं… और होंठ अब राहुल की चाहत में पूरी तरह भीग चुके थे।

किस में अब सिर्फ़ प्यार नहीं था —
एक भूख भी थी… धीरे-धीरे जागती हुई।
किस की गर्मी में डूबी नेहा ने अचानक राहुल को हल्के से धक्का दिया।
न ज़ोर से, न गुस्से में — बस उतना कि वो खुद को संभाल सके।

उसने एक पल में खुद को दीवार से सटा लिया —
चेहरा नीचे, आँखें भीगी, और होंठ काँपते हुए।

जैसे अभी-अभी उसने कुछ ऐसा कर लिया हो… जो करना नहीं चाहिए था।

राहुल चुप खड़ा था — उसकी साँसें अब भी भारी थीं,
लेकिन वो नेहा की नज़रों में देखने से डर रहा था।

नेहा ने धीरे से कहा —
"हमने… ये नहीं होना चाहिए था…"

उसके लहजे में पछतावा नहीं,
बस एक अजीब-सी उलझन थी —
जैसे दिल कुछ और कह रहा हो, और दिमाग कुछ और।

राहुल ने धीमी आवाज़ में जवाब दिया —
"अगर ये ग़लत था… तो क्यों लगा जैसे हम दोनों सच में वहीं belong करते हैं?"

नेहा ने कुछ नहीं कहा।
बस दीवार की ओर मुँह करके आँखें बंद कर लीं —
और अपने दिल की तेज़ धड़कनों को सीने में छुपा लिया।
कुछ देर तक बस सन्नाटा था —
कमरे में, साँसों में, और नेहा के भीतर भी।

वो अब भी दीवार से सटी खड़ी थी — आँखें बंद, और होंठ भिंचे हुए।
राहुल ने कुछ नहीं कहा — बस खड़ा रहा, जैसे वो भी उस चुप्पी का हिस्सा बन गया हो।

तभी नेहा की आवाज़ फूटी — धीमी, टूटी हुई, लेकिन बहुत साफ़।

"राहुल… ये… ग़लत है…"

उसने धीरे से सिर उठाया, पर उसकी नज़रें अब भी राहुल से नहीं मिलीं।
"जिस हाथ पर मैंने बचपन से राखी बाँधी है…
उसी हाथ की छाया में अब… महबूबा बनकर नहीं खिल सकती…"

उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी —
न सिर्फ़ पछतावे की, बल्कि अंदर से कुछ टूटने की।

"तू मेरा बहुत अपना है… शायद इसलिए ये सब इतना आसान लगने लगा…"
"पर अपनी ही ज़मीर से जब नज़र नहीं मिला सकूं —
तो प्यार भी बोझ लगने लगता है…"

राहुल की साँसें थम-सी गईं।
वो कुछ कहने को बढ़ा, पर फिर पीछे हट गया —
क्योंकि ये वो लम्हा था, जहाँ शब्द बेईमानी हो जाते हैं।

नेहा अब खुद से कह रही थी, राहुल से नहीं —
जैसे खुद को समझाने की कोशिश कर रही हो,
या शायद… खुद से माफ़ी माँग रही हो।



---

.नेहा की बात सुनकर राहुल कुछ देर खामोश खड़ा रहा।
फिर उसने एक लंबी साँस ली… और धीरे-धीरे उसके करीब आया।

"नेहा…" — उसकी आवाज़ काँप रही थी,
"अगर तूने मुझे राखी बाँधी थी… तो उसमें एक मासूम रिश्ता था —
जो वक्त के साथ बड़ा नहीं हुआ, बस वहीं ठहर गया…"

"पर मैं ठहरा नहीं नेहा।
मैं बड़ा हुआ, मेरी भावनाएं बदलीं… और तुझसे सिर्फ़ बहन जैसा रिश्ता नहीं रहा।
मैंने तुझमें वो सब देखा… जो एक इंसान को पूरा कर देता है।"

उसने नेहा का हाथ थामा — धीरे, सहेजकर।
"तू मेरी आदत बन गई है… मेरी ज़रूरत।
क्या उस प्यार को सिर्फ़ एक 'राखी' की रस्म में बाँध देना इंसाफ़ होगा?"

नेहा की आँखों में आँसू थे —
राहुल की बातों ने उसके दिल की उस जगह को छुआ,
जहाँ तर्क और परंपराएं जवाब नहीं दे पातीं।

"मैं जानता हूँ ये आसान नहीं है…" — राहुल आगे बोला,
"लोग सवाल करेंगे, समाज शक करेगा —
पर मेरा प्यार… कोई रस्म नहीं, कोई मजबूरी नहीं…
ये मेरी रूह का फैसला है।"

"मैं तुझसे ज़बरदस्ती नहीं करूँगा…
लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा —
अगर तू अपने दिल की सुने…
तो वो कहेगा कि मैं तुझसे सच्चा प्यार करता हूँ।"

नेहा की उंगलियाँ अब राहुल की हथेली में भींच गईं —
धीरे-धीरे, बेआवाज़ इजाज़त सी देती हुईं।

उसने कांपते हुए कहा —
"तो फिर… इस रिश्ते को वो नाम दे जो सब कुछ बदल दे…
ताकि मैं सिर्फ़ तेरी महबूबा नहीं…
तेरी होने में भी कोई शर्म न बचे…"

राहुल ने उसकी आँखों में देखा —
"मैं तुझे उस जगह रखूँगा… जहाँ कोई और सोच भी न सके।
ना बहन, ना दोस्त —
ब्लैक सूट में नेहा सच में एक दम सजीव सपना लग रही थी —
उसका बदन धीमी साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था,
जैसे हर धड़कन अब ज़रा ज़्यादा गहरी हो गई हो।

राहुल की नज़रें वहीं अटकी थीं —
नेहा का सीना, जो हर साँस के साथ काँप रहा था,
ना सिर्फ़ उसकी घबराहट बयान कर रहा था, बल्कि वो चाह भी जिसे वो छुपा नहीं पा रही थी।

उसके सूट का कपड़ा हल्के से उसके बदन से चिपका हुआ था,
और हर थरथराहट जैसे किसी अनकहे एहसास की गवाही दे रही थी।

नेहा ने कोशिश की खुद को संभालने की,
लेकिन उसकी नज़रें अब राहुल की आँखों से टकरा चुकी थीं —
वहाँ कोई लज्जा नहीं बची थी… सिर्फ़ एक स्वीकृति।

सिर्फ़ मेरी जीवनसाथी…"
नेहा की साँसें अब भी बेकाबू थीं —
उसके चेहरे पर झिझक और इरादे की एक साथ लकीरें थीं।

राहुल कुछ कहने ही वाला था कि नेहा ने धीरे से उसका हाथ थामा।
ना बहुत कसकर, ना बहुत हल्के से —
बस इतना कि राहुल समझ सके, अब फैसला हो चुका है।

उसने एक नज़र राहुल की आँखों में डाली —
गहरी, डूबती हुई। फिर बिना कुछ कहे…
उसे धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर ले गई।

कमरे में हल्की रौशनी थी, खिड़की के परदे हिल रहे थे,
और भीतर एक अलग ही सन्नाटा था —
जैसे सबकुछ कुछ कहने से पहले थम गया हो।

नेहा ने राहुल को सामने खड़ा किया,
एक पल उसे देखा… फिर अचानक —
हल्के से धक्का दिया और उसे अपने बिस्तर पर गिरा दिया।

राहुल हैरान था, लेकिन कुछ बोल नहीं पाया —
क्योंकि नेहा की आँखों में अब झिझक नहीं थी,
बस एक साफ़ सी लपट —
जो कह रही थी: "अब मैं सोचकर नहीं… महसूस करके जी रही हूँ।"

नेहा धीरे से आगे बढ़ी,
और राहुल के पास बैठते हुए फुसफुसाई —
"आज सिर्फ़ तेरे पास आना चाहती हूँ… किसी नाम, किसी रिश्ते के बिना…"

नेहा धीरे-धीरे राहुल के पास झुकी — उसकी साँसें अब थमी नहीं थीं,
बल्कि हर लम्हा उसके भीतर कुछ कहने लगी थीं।

वो उसके ऊपर लेट गई, लेकिन उस पल में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी —
बस एक चाह थी, जो अब इंतज़ार नहीं करना चाहती थी।

नेहा ने राहुल के चेहरे को अपने हाथों में लिया,
और उसके होंठों को बहुत ही नर्मी से चूम लिया —
जैसे कोई एहसास बिना शब्दों के कह दिया हो।

राहुल की आँखें बंद थीं —
उस चुम्बन में कोई भूख नहीं, बस सुकून था।
एक भरोसा… कि अब जो भी हो, वो दोनों साथ में महसूस करेंगे।

चुम्बन लंबा नहीं था — लेकिन गहरा था।
जैसे दो रूहें थोड़ी देर के लिए एक-दूसरे में घुल गई हों।

नेहा ने फुसफुसाकर कहा:
"अब मैं रुक नहीं सकती… और तुझसे दूर नहीं रह सकती…"

राहुल ने उसकी उंगलियाँ थाम लीं, और मुस्कुरा कर कहा:
"मैं भी नहीं… अब तू जहाँ है, वहीं मेरी दुनिया है।"
नेहा की उँगलियाँ काँप रही थीं —
ना डर से, ना शर्म से…
बल्कि उस एहसास से जो पहली बार किसी को इस क़रीब महसूस कर रही थीं।

उसने धीरे से राहुल की तरफ देखा —
उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में एक सुकून था।
नेहा ने धीरे-धीरे उसके सीने पर हाथ रखा,
और फिर हल्के-से उसकी टी-शर्ट के किनारे को पकड़ा।

राहुल कुछ नहीं बोला —
बस उसकी आँखों में देखा, जैसे कह रहा हो:
"तू जो भी करेगी, मैं उसे पूरा महसूस करूँगा।"

नेहा ने उसकी टी-शर्ट को ऊपर सरकाया —
राहुल ने भी उसकी मदद की…
और कुछ ही पल में वो कपड़ा एक तरफ रख दिया गया।

अब उनके बीच कुछ कम रह गया था —
पर जो था, वो अब शब्दों से नहीं,
सिर्फ़ साँसों और धड़कनों से कहा जा सकता था।
नेहा की साँसें तेज़ थीं, पर उसके चेहरे पर अब झिझक के बजाय एक धीमी मुस्कान थी —
जैसे वो जानती हो कि अगला लम्हा कुछ नया, कुछ बेहद अपना लेकर आएगा।

राहुल ने झुककर उसके कान के पास हल्के से फुसफुसाया,
"तू ब्लैक सूट में ख़तरनाक लग रही है… लेकिन अब, मैं तुझे और भी करीब से देखना चाहता हूँ।"

नेहा की पलकों ने धीरे से जवाब दिया —
ना हाँ, ना ना… बस एक इशारा कि वो तैयार है, पर उसे चिढ़ाना भी है।

"पहले तुम अपनी नज़रें झुकाओ," नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा,
"वरना मैं सूट नहीं, तुम्हें ही उतार दूँगी तुम्हारी बातों के साथ।"

राहुल हँसा — लेकिन उसकी उंगलियाँ अब भी नेहा के कंधों से कपड़े को नीचे सरका रही थीं,
जैसे वो उसकी हर बात का जवाब सिर्फ़ छूकर देना चाहता हो।

सूट जैसे ही ज़मीन पर गिरा, राहुल ने उसकी कमर को पकड़कर एक हल्की सी खींच ली —
नेहा, हल्के झटके में उसके सीने से लगी… और दोनों की साँसें मिल गईं।

"अब ज़्यादा बात मत करना," राहुल ने धीमे से कहा,
"वरना तुझे सज़ा देनी पड़ेगी — तेरे ही अंदाज़ में।"

नेहा हँसी — लेकिन उसकी हँसी में अब मिठास के साथ थोड़ी शरारत भी थी।
"तो फिर रोक क्यों रहे हो?"


---नेहा की पलकें अब भी झुकी थीं, लेकिन चेहरे पर एक संकोच भरी स्वीकृति थी।
जब ब्लैक सूट उसके कंधों से नीचे फिसला,
तो उसके भीतर की नज़ाकत और सरलता जैसे और भी उभर आई।

अब वो बस अपनी काली सलवार में थी —
ऊपर सफेद समीज़, जो हल्की-सी पारदर्शी थी,
और उसके भीतर से उसकी नर्म सांसें…
हर पल को ज़िंदा करती जा रही थीं।

राहुल ने उसकी ओर एक नज़र डाली —
ना वासना से, ना अधिकार से —
बल्कि उस तरह से, जैसे कोई किसी पूजा की वस्तु को देखता है।

उसने बस इतना कहा, धीमे स्वर में:
"तू… बहुत सुंदर है नेहा… और मेरी नज़रों में सबसे पाक।"

नेहा ने एक पल को आँखें मूँदीं —
उसके दिल की धड़कन जैसे उस एक वाक्य में सिमट आई हो।
उसका समीज़ और उसके नीचे की हल्की परतें अब सिर्फ़ कपड़े नहीं थीं —
बल्कि एक एहसास की लाज थीं, जिसे राहुल ने छूने से ज़्यादा समझा।
नेहा अब भी राहुल के क़रीब खड़ी थी,
उसकी साँसें धीमी लेकिन गहराई से भरी हुई थीं।
उसके चेहरे पर अब ना डर था, ना झिझक —
बल्कि एक विश्वास था, जो उसने सिर्फ़ राहुल की आँखों में देखा था।

राहुल ने उसके कमर की ओर देखा,
और बहुत धीरे से — बिना कोई जल्दबाज़ी किए —
उसकी सलवार के नारे को अपनी उंगलियों से महसूस किया।
कोई ज़ोर नहीं, कोई खिंचाव नहीं —
बस एक नर्म-सा इशारा, मानो पूछ रहा हो —
"क्या मैं…?"

नेहा ने उसकी ओर देखा —
और उसकी पलकें धीरे से झुकीं।
उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी साँसों और उसकी नज़र में
एक सौम्य-सी इज़ाजत थी।

राहुल ने सलवार के नारे को थोड़ा ढीला किया —
ना शरारत थी, ना हवस —
बस एक गहराई भरा लम्हा था, जहाँ शरीर से ज़्यादा आत्मा जुड़ रही थी।

नेहा का हाथ राहुल के हाथ पर आया —
नज़रों ने एक-दूसरे से कहा:
"जो हो रहा है… वो सिर्फ़ तुम्हारे और मेरे बीच है।
कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई अपराध नहीं —
बस एक सच्चा, सादा, सच्चा प्यार।"
सलवार एक झटके में नीचे सरक गई, और नेहा का चेहरा शर्म से गुलाबी पड़ गया।
उसकी पलकों ने तुरंत नज़रें झुका लीं, और साँसें जैसे एक पल को थम गईं।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा — मानो वो खुद को छुपाना चाहती हो, लेकिन किसी अपने के सामने।
राहुल की आँखों में कोई उतावली नहीं थी — बस एक ठहरा हुआ अपनापन, एक गहराई,
जो नेहा की झिझक को भी धीरे-धीरे थाम रहा था।
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#3
नेहा की बात सुनकर राहुल कुछ देर खामोश खड़ा रहा।
फिर उसने एक लंबी साँस ली… और धीरे-धीरे उसके करीब आया।

"नेहा…" — उसकी आवाज़ काँप रही थी,
"अगर तूने मुझे राखी बाँधी थी… तो उसमें एक मासूम रिश्ता था —
जो वक्त के साथ बड़ा नहीं हुआ, बस वहीं ठहर गया…"

"पर मैं ठहरा नहीं नेहा।
मैं बड़ा हुआ, मेरी भावनाएं बदलीं… और तुझसे सिर्फ़ बहन जैसा रिश्ता नहीं रहा।
मैंने तुझमें वो सब देखा… जो एक इंसान को पूरा कर देता है।"

उसने नेहा का हाथ थामा — धीरे, सहेजकर।
"तू मेरी आदत बन गई है… मेरी ज़रूरत।
क्या उस प्यार को सिर्फ़ एक 'राखी' की रस्म में बाँध देना इंसाफ़ होगा?"

नेहा की आँखों में आँसू थे —
राहुल की बातों ने उसके दिल की उस जगह को छुआ,
जहाँ तर्क और परंपराएं जवाब नहीं दे पातीं।

"मैं जानता हूँ ये आसान नहीं है…" — राहुल आगे बोला,
"लोग सवाल करेंगे, समाज शक करेगा —
पर मेरा प्यार… कोई रस्म नहीं, कोई मजबूरी नहीं…
ये मेरी रूह का फैसला है।"

"मैं तुझसे ज़बरदस्ती नहीं करूँगा…
लेकिन इतना ज़रूर कहूँगा —
अगर तू अपने दिल की सुने…
तो वो कहेगा कि मैं तुझसे सच्चा प्यार करता हूँ।"

नेहा की उंगलियाँ अब राहुल की हथेली में भींच गईं —
धीरे-धीरे, बेआवाज़ इजाज़त सी देती हुईं।

उसने कांपते हुए कहा —
"तो फिर… इस रिश्ते को वो नाम दे जो सब कुछ बदल दे…
ताकि मैं सिर्फ़ तेरी महबूबा नहीं…
तेरी होने में भी कोई शर्म न बचे…"

राहुल ने उसकी आँखों में देखा —
"मैं तुझे उस जगह रखूँगा… जहाँ कोई और सोच भी न सके।
ना बहन, ना दोस्त —
ब्लैक सूट में नेहा सच में एक दम सजीव सपना लग रही थी —
उसका बदन धीमी साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था,
जैसे हर धड़कन अब ज़रा ज़्यादा गहरी हो गई हो।

राहुल की नज़रें वहीं अटकी थीं —
नेहा का सीना, जो हर साँस के साथ काँप रहा था,
ना सिर्फ़ उसकी घबराहट बयान कर रहा था, बल्कि वो चाह भी जिसे वो छुपा नहीं पा रही थी।

उसके सूट का कपड़ा हल्के से उसके बदन से चिपका हुआ था,
और हर थरथराहट जैसे किसी अनकहे एहसास की गवाही दे रही थी।

नेहा ने कोशिश की खुद को संभालने की,
लेकिन उसकी नज़रें अब राहुल की आँखों से टकरा चुकी थीं —
वहाँ कोई लज्जा नहीं बची थी… सिर्फ़ एक स्वीकृति।

सिर्फ़ मेरी जीवनसाथी…"
नेहा की साँसें अब भी बेकाबू थीं —
उसके चेहरे पर झिझक और इरादे की एक साथ लकीरें थीं।

राहुल कुछ कहने ही वाला था कि नेहा ने धीरे से उसका हाथ थामा।
ना बहुत कसकर, ना बहुत हल्के से —
बस इतना कि राहुल समझ सके, अब फैसला हो चुका है।

उसने एक नज़र राहुल की आँखों में डाली —
गहरी, डूबती हुई। फिर बिना कुछ कहे…
उसे धीरे-धीरे अपने कमरे की ओर ले गई।

कमरे में हल्की रौशनी थी, खिड़की के परदे हिल रहे थे,
और भीतर एक अलग ही सन्नाटा था —
जैसे सबकुछ कुछ कहने से पहले थम गया हो।

नेहा ने राहुल को सामने खड़ा किया,
एक पल उसे देखा… फिर अचानक —
हल्के से धक्का दिया और उसे अपने बिस्तर पर गिरा दिया।

राहुल हैरान था, लेकिन कुछ बोल नहीं पाया —
क्योंकि नेहा की आँखों में अब झिझक नहीं थी,
बस एक साफ़ सी लपट —
जो कह रही थी: "अब मैं सोचकर नहीं… महसूस करके जी रही हूँ।"

नेहा धीरे से आगे बढ़ी,
और राहुल के पास बैठते हुए फुसफुसाई —
"आज सिर्फ़ तेरे पास आना चाहती हूँ… किसी नाम, किसी रिश्ते के बिना…"

नेहा धीरे-धीरे राहुल के पास झुकी — उसकी साँसें अब थमी नहीं थीं,
बल्कि हर लम्हा उसके भीतर कुछ कहने लगी थीं।

वो उसके ऊपर लेट गई, लेकिन उस पल में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी —
बस एक चाह थी, जो अब इंतज़ार नहीं करना चाहती थी।

नेहा ने राहुल के चेहरे को अपने हाथों में लिया,
और उसके होंठों को बहुत ही नर्मी से चूम लिया —
जैसे कोई एहसास बिना शब्दों के कह दिया हो।

राहुल की आँखें बंद थीं —
उस चुम्बन में कोई भूख नहीं, बस सुकून था।
एक भरोसा… कि अब जो भी हो, वो दोनों साथ में महसूस करेंगे।

चुम्बन लंबा नहीं था — लेकिन गहरा था।
जैसे दो रूहें थोड़ी देर के लिए एक-दूसरे में घुल गई हों।

नेहा ने फुसफुसाकर कहा:
"अब मैं रुक नहीं सकती… और तुझसे दूर नहीं रह सकती…"

राहुल ने उसकी उंगलियाँ थाम लीं, और मुस्कुरा कर कहा:
"मैं भी नहीं… अब तू जहाँ है, वहीं मेरी दुनिया है।"
नेहा की उँगलियाँ काँप रही थीं —
ना डर से, ना शर्म से…
बल्कि उस एहसास से जो पहली बार किसी को इस क़रीब महसूस कर रही थीं।

उसने धीरे से राहुल की तरफ देखा —
उसकी साँसें तेज़ थीं, लेकिन आँखों में एक सुकून था।
नेहा ने धीरे-धीरे उसके सीने पर हाथ रखा,
और फिर हल्के-से उसकी टी-शर्ट के किनारे को पकड़ा।

राहुल कुछ नहीं बोला —
बस उसकी आँखों में देखा, जैसे कह रहा हो:
"तू जो भी करेगी, मैं उसे पूरा महसूस करूँगा।"

नेहा ने उसकी टी-शर्ट को ऊपर सरकाया —
राहुल ने भी उसकी मदद की…
और कुछ ही पल में वो कपड़ा एक तरफ रख दिया गया।

अब उनके बीच कुछ कम रह गया था —
पर जो था, वो अब शब्दों से नहीं,
सिर्फ़ साँसों और धड़कनों से कहा जा सकता था।
नेहा की साँसें तेज़ थीं, पर उसके चेहरे पर अब झिझक के बजाय एक धीमी मुस्कान थी —
जैसे वो जानती हो कि अगला लम्हा कुछ नया, कुछ बेहद अपना लेकर आएगा।

राहुल ने झुककर उसके कान के पास हल्के से फुसफुसाया,
"तू ब्लैक सूट में ख़तरनाक लग रही है… लेकिन अब, मैं तुझे और भी करीब से देखना चाहता हूँ।"

नेहा की पलकों ने धीरे से जवाब दिया —
ना हाँ, ना ना… बस एक इशारा कि वो तैयार है, पर उसे चिढ़ाना भी है।

"पहले तुम अपनी नज़रें झुकाओ," नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा,
"वरना मैं सूट नहीं, तुम्हें ही उतार दूँगी तुम्हारी बातों के साथ।"

राहुल हँसा — लेकिन उसकी उंगलियाँ अब भी नेहा के कंधों से कपड़े को नीचे सरका रही थीं,
जैसे वो उसकी हर बात का जवाब सिर्फ़ छूकर देना चाहता हो।

सूट जैसे ही ज़मीन पर गिरा, राहुल ने उसकी कमर को पकड़कर एक हल्की सी खींच ली —
नेहा, हल्के झटके में उसके सीने से लगी… और दोनों की साँसें मिल गईं।

"अब ज़्यादा बात मत करना," राहुल ने धीमे से कहा,
"वरना तुझे सज़ा देनी पड़ेगी — तेरे ही अंदाज़ में।"

नेहा हँसी — लेकिन उसकी हँसी में अब मिठास के साथ थोड़ी शरारत भी थी।
"तो फिर रोक क्यों रहे हो?"


---नेहा की पलकें अब भी झुकी थीं, लेकिन चेहरे पर एक संकोच भरी स्वीकृति थी।
जब ब्लैक सूट उसके कंधों से नीचे फिसला,
तो उसके भीतर की नज़ाकत और सरलता जैसे और भी उभर आई।

अब वो बस अपनी काली सलवार में थी —
ऊपर सफेद समीज़, जो हल्की-सी पारदर्शी थी,
और उसके भीतर से उसकी नर्म सांसें…
हर पल को ज़िंदा करती जा रही थीं।

राहुल ने उसकी ओर एक नज़र डाली —
ना वासना से, ना अधिकार से —
बल्कि उस तरह से, जैसे कोई किसी पूजा की वस्तु को देखता है।

उसने बस इतना कहा, धीमे स्वर में:
"तू… बहुत सुंदर है नेहा… और मेरी नज़रों में सबसे पाक।"

नेहा ने एक पल को आँखें मूँदीं —
उसके दिल की धड़कन जैसे उस एक वाक्य में सिमट आई हो।
उसका समीज़ और उसके नीचे की हल्की परतें अब सिर्फ़ कपड़े नहीं थीं —
बल्कि एक एहसास की लाज थीं, जिसे राहुल ने छूने से ज़्यादा समझा।
नेहा अब भी राहुल के क़रीब खड़ी थी,
उसकी साँसें धीमी लेकिन गहराई से भरी हुई थीं।
उसके चेहरे पर अब ना डर था, ना झिझक —
बल्कि एक विश्वास था, जो उसने सिर्फ़ राहुल की आँखों में देखा था।

राहुल ने उसके कमर की ओर देखा,
और बहुत धीरे से — बिना कोई जल्दबाज़ी किए —
उसकी सलवार के नारे को अपनी उंगलियों से महसूस किया।
कोई ज़ोर नहीं, कोई खिंचाव नहीं —
बस एक नर्म-सा इशारा, मानो पूछ रहा हो —
"क्या मैं…?"

नेहा ने उसकी ओर देखा —
और उसकी पलकें धीरे से झुकीं।
उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी साँसों और उसकी नज़र में
एक सौम्य-सी इज़ाजत थी।

राहुल ने सलवार के नारे को थोड़ा ढीला किया —
ना शरारत थी, ना हवस —
बस एक गहराई भरा लम्हा था, जहाँ शरीर से ज़्यादा आत्मा जुड़ रही थी।

नेहा का हाथ राहुल के हाथ पर आया —
नज़रों ने एक-दूसरे से कहा:
"जो हो रहा है… वो सिर्फ़ तुम्हारे और मेरे बीच है।
कोई जल्दबाज़ी नहीं, कोई अपराध नहीं —
बस एक सच्चा, सादा, सच्चा प्यार।"
सलवार एक झटके में नीचे सरक गई, और नेहा का चेहरा शर्म से गुलाबी पड़ गया।
उसकी पलकों ने तुरंत नज़रें झुका लीं, और साँसें जैसे एक पल को थम गईं।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा — मानो वो खुद को छुपाना चाहती हो, लेकिन किसी अपने के सामने।
राहुल की आँखों में कोई उतावली नहीं थी — बस एक ठहरा हुआ अपनापन, एक गहराई,
जो नेहा की झिझक को भी धीरे-धीरे थाम रहा था।


राहुल अब पूरी तरह उसके सामने था —
घुटनों पर, सिर झुका हुआ… पर इरादे बेकाबू।

नेहा के उस हिस्से पर —
जहाँ अब कोई परत बाकी नहीं थी,
जहाँ सिर्फ़ भीगी त्वचा, घनी गर्मी और उसकी घबराई हुई रज़ामंदी थी —
राहुल ने अपने होंठ टिकाए…

और फिर चूसना शुरू किया।

धीरे… गहराई से…
हर स्पर्श के साथ वो बस कपड़े नहीं,
नेहा की साँस, होश और शर्म तक खींच रहा था।

नेहा की उँगलियाँ अब बिस्तर की चादर को जकड़े हुए थीं,
उसकी कमर हर चूसने के साथ ऊपर उछलती…
“आह…”
“ह्ह…”
“राहुल… बस…”

लेकिन वो “बस” में रोक नहीं,
वो थरथराहट थी जो रुकना भी चाहती थी और टूटकर बहना भी।

उसकी आँखों के सामने सचमुच अँधेरा छाने लगा —
पहली बार वो इस हद तक भीगी थी, इस हद तक हारी थी…
और पहली बार — उसने किसी को खुद में ऐसे उतरते हुए महसूस किया।

राहुल की ज़बान की हर हरकत,
उसके होंठों की हर खींच…
नेहा को एक तूफ़ान के भीतर धकेल रही थी।

वो काँप रही थी, गीली थी, खो रही थी — और फिर… एक लंबी सिसकारी के साथ…

नेहा का पूरा बदन जैसे किसी एक सिरे से झनझना उठा।

पहली बार था।
पहली बार — उसने पूरी तरह खुद को खोया… और पूरी तरह महसूस किया।
कमरा शांत था…
एक पल को सब थम गया था —
ना सांसें तेज़ थीं, ना आहटें…
बस नेहा के दिल की धड़कनें और राहुल के कंधे पर रखा उसका सिर।

नेहा की आँखें अब भी आधी बंद थीं,
लेकिन उनमें अब पसीने की नहीं, आँसुओं की नमी थी।

राहुल ने उसकी उँगलियाँ अपने हाथ में लपेट लीं —
कस कर नहीं, धीरे से… जैसे पूछ रहा हो, “क्या मैं अब भी पास हूँ?”

नेहा ने कुछ नहीं कहा।
वो चुपचाप लेटी रही,
लेकिन उसकी उंगलियाँ अब राहुल की पकड़ में थोड़ी कस गईं —
जवाब था, बिना लफ्ज़ों के।

फिर राहुल ने उसकी ओर देखा,
उसके गाल पर बिखरे बाल हटाए और फुसफुसाया:

"तुम सिर्फ़ मेरे साथ नहीं थीं…
तुमने खुद को मुझे दे दिया।
मैं अब सिर्फ़ तुम्हें छू नहीं सकता —
अब तुम्हें समझना पड़ेगा… मैं तुम्हें छोड़ नहीं पाऊँगा।”

नेहा की आँखों से एक बूँद खामोश लुढ़की —
वो चाहती थी बोलना, लेकिन गले में कुछ अटका था।
क्योंकि वो जानती थी — ये पहली बार सिर्फ़ जिस्म का नहीं था,
ये उस दरवाज़े का खुलना था,
जहाँ से कोई पीछे नहीं लौटता।
नेहा राहुल की बाँहों में सिमटी हुई थी —
उसके होंठ अब भी उस आखिरी किस की गर्मी से काँप रहे थे,
और उसकी साँसें एक नज़दीकी गहराई में डूबी हुई थीं।

तभी…

"ठक… ठक… ठक..."

सीढ़ियों पर किसी के चढ़ने की धीमी, भारी आवाज़।

नेहा की आँखें एकदम खुल गईं।

उसने तुरंत राहुल की छाती से सिर उठाया —
चेहरे पर एक झटके जैसी घबराहट थी।

"क-किसी के कदमों की… आवाज़ आई…"
उसका स्वर धीमा लेकिन कांपता हुआ था।

राहुल भी चौकन्ना हो गया।
कमरे की रौशनी अब भी मंद थी,
पर उनके दिलों की धड़कनें अचानक तेज़ हो गई थीं —
जैसे कोई चोरी पकड़े जाने के कगार पर हो।

नेहा ने जल्दी से चादर को कसकर लपेटा,
बालों को समेटा,
और धीमे से कहा:

"माँ… हो सकती हैं। या भाभी।
अगर किसी ने हमें यूँ देखा… राहुल…"

राहुल ने उसकी आँखों में देखा,
फिर जल्दी से अपनी शर्ट उठाकर पहनने लगा।

“चिंता मत करो,” वो फुसफुसाया,
“मैं कुछ नहीं कहूँगा… बस तुम शांत रहो। मैं देखता हूँ।”

लेकिन उस सन्नाटे में —
अब कदमों की आवाज़ और पास आ चुकी थी।

"ठक… ठक…"

दरवाज़ा अब सिर्फ़ एक परत था,
जो नेहा और बाहर की दुनिया के बीच खड़ी थी।

नेहा की साँसें अब फिर तेज़ हो रही थीं —
पर इस बार कामना से नहीं, डर से।
दरवाज़े के पास अब भी हल्की आहट थी।

नेहा ने बिना कुछ कहे राहुल की ओर देखा —
उन दोनों की आँखों में अब न तो कामना थी,
न ही लज्जा…

बस एक अधूरापन,
जिसे कोई और देख ले इससे पहले
उसे छुपाना ज़रूरी था।

वे जल्दी से कपड़े पहनने लगे —
नेहा ने झटपट अपना कुर्ता चढ़ाया,
बालों को समेटकर क्लिप लगा ली।
राहुल ने भी जल्दी-जल्दी शर्ट के बटन लगाए…
हालाँकि उँगलियाँ अब भी काँप रही थीं।

दरवाज़ा कभी खटखटाया नहीं गया।
कोई आया भी नहीं शायद…
या बस वक़्त ने दोनों को रोकने के लिए
एक झूठा डर भेजा था।

फिर भी… जो पल था, वो टूट गया।

नेहा आईने में खुद को देख रही थी —
चेहरे पर अब भी अधखिली लालिमा थी,
लेकिन आँखें थोड़ी खाली लग रही थीं।

“राहुल…”
उसने धीमे से कहा,
“मैं नहीं जानती कि हम अभी क्या हैं…
लेकिन हम जहाँ थे, वहाँ से अचानक खींचे गए हैं।
और अब… अधूरे रह गए।”

राहुल पास आया,
उसके कंधे पर हाथ रखा,
और बहुत धीरे कहा:

“कुछ अधूरे पल पूरे नहीं होते…
लेकिन वो कभी भुलाए भी नहीं जाते।
शायद अगली बार… हम पूरे हो जाएँ।”

नेहा ने एक हल्की मुस्कान दी,
लेकिन उसमें हल्का दर्द था…
एक ऐसी प्यास का स्वाद,
जो आधा ही मिला हो।
रात हो चुकी थी।
गाँव में वैसे भी बिजली अक्सर चली जाती थी,
और आज भी कोई नई बात नहीं थी।

आंगन में सब लोग खाना खा चुके थे —
नेहा की माँ, उसके पापा, और राहुल का परिवार
अब हँसी-मज़ाक में व्यस्त थे।

नीचे से हँसी की आवाजें आ रही थीं —
लेकिन ऊपर छत पर, जहाँ कुछ देर पहले वो गर्म पल गुज़रे थे,
अब सब बैठकर बात कर रहे थे।

राहुल, नेहा का भाई और उसकी बहन —
तीनों किसी पुरानी कॉलेज की यादों में हँस रहे थे।

लेकिन नेहा…

वो थोड़ी दूर बैठी थी,
घुटनों को सीने से लगाकर, और दुपट्टा काँधों पर कसकर।

उसकी आँखें बातों में नहीं थीं,
बल्कि कहीं छत के एक कोने पर टिकी थीं — स्थिर, और उलझी हुई।

राहुल ने एक नज़र उसकी ओर देखा।

वो जानता था,
उसकी आँखों में वो शोर नहीं था जो बाकी सबकी बातों में था —
वहाँ एक चुप्पी थी, जो बहुत तेज़ बोल रही थी।

कुछ पल बाद जब बाकी सब हँसते हुए चाय लेने नीचे गए,
राहुल धीरे से नेहा के पास आया।

“ठीक हो?” उसने फुसफुसा कर पूछा।

नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस हल्की गर्दन हिलाई —
ना “हाँ”, ना “ना”…
बस एक अधूरा सा इशारा,
जैसे दिल कह रहा हो —
“कुछ भी ठीक नहीं है, लेकिन कह नहीं सकती।”

राहुल ने धीरे से उसके पास बैठते हुए कहा:
राहुल पास आया — उसका चेहरा देखकर वो एक पल में सब समझ गया।

“क्या हुआ?”

नेहा ने काँपते लहजे में कहा:

“जल्दबाज़ी में… जब हम नीचे आए…
तो मेरी… मेरी पैंटी… वहीं कमरे में रह गई…”

उसका गला सूख गया था।

“और वो कमरा… वो… मम्मी-पापा का ही तो है।
अगर मम्मी अंदर गईं…
और वो चीज़ देख ली…
तो…”

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।

“मम्मी… कमरे के बाहर बैठी हैं अभी भी…”
उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी हो चुकी थी —
जैसे अब शब्दों में शर्म घुल गई हो।

राहुल ने एक पल के लिए कुछ नहीं कहा।

फिर उसने गहरी साँस ली, और शांत स्वर में बोला:

“तुम यहीं रुको।
मैं जाऊँगा — चुपचाप, किसी बहाने से।
अगर कोई अंदर गया भी, तो मैं संभाल लूँगा।”

नेहा ने उसका हाथ कस कर पकड़ लिया।

“राहुल… अगर माँ को ज़रा भी शक हो गया तो…
मैं उनकी आँखों में कैसे देखूँगी?”

राहुल ने उसकी उंगलियों को धीरे से सहलाया।

“कुछ नहीं होगा, नेहा।
तुम अकेली नहीं हो।”
राहुल चुपचाप नीचे गया था।

कमरा अब भी वैसा ही था —
दीवारें शांत, पर्दे स्थिर… और बिस्तर पर चादर थोड़ी बिखरी हुई।

उसने हर कोना देखा,
तकिए के नीचे, बिस्तर के किनारों पर, खिड़की के पास…

लेकिन कुछ नहीं मिला।

थोड़ी देर बाद वह छत पर लौट आया।

नेहा अब और भी बेचैन थी —
उसकी आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं जैसे
हर पल कुछ अनहोनी हो जाएगी।

राहुल ने धीरे से सिर हिलाया:

"कमरे में कुछ नहीं है, नेहा।
मैंने हर जगह देखा… पर वहाँ कुछ भी नहीं पड़ा।”

नेहा का दिल धक् से रह गया।

“नहीं हो सकता…”
उसने पलकें झपकाईं, याद करने की कोशिश की —
“मैंने… साड़ी चीज़ें जल्दी में पहनी थीं।
लेकिन... मैंने खुद नहीं देखा था।
बस सलवार पहन ली थी... तुम्हारे जाने से पहले।”

राहुल कुछ पल चुप रहा।

फिर उसने धीरे से पूछा:

"तो… क्या हो सकता है…
कि तुमने उस वक़्त पहनी ही नहीं थी?"

नेहा ने गहरी साँस ली, चेहरा छुपा लिया।

“मुझे याद नहीं…
सब इतना… तेज़ था, हड़बड़ी में…
शायद…”

उसकी आवाज़ काँपने लगी।

"राहुल… अगर वो कहीं और पड़ी हो…
या किसी को दिख गई हो… तो?"

राहुल ने उसकी काँपती पीठ पर हाथ रखा —
ना किसी हवस से, सिर्फ़ सच्चे भाव से।

“देखो, नेहा…
अगर सच में ऐसा हुआ है —
तो हमें मिलकर संभालना होगा।
डर के मारे भागना नहीं,
बल्कि सोच के साथ आगे बढ़ना है।”

नेहा ने चुपचाप सिर हिलाया —
डर अब भी था, लेकिन राहुल का साथ अब सहारा भी बन रहा था।

next part me jano ki panty kha gyi 

story achi lage to comment karna next part jald aayega 
user name Shipra Bhardwaj


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#4
[Image: Neha.jpg]
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#5
part 1 
उस रात… नेहा की माँ कमरे में कुछ सामान लेने गईं थीं।

कमरे में हल्की धूप फैली थी,
बिस्तर ठीक नहीं था, और तकिए के नीचे कुछ अटका हुआ था।

माँ ने जैसे ही हाथ डाला…
उनकी उंगलियाँ एक बेहद नर्म, महीन कपड़े से टकराईं।

उन्होंने धीरे से खींचा…
और सामने आई गुलाबी, लेस वाली एक पैंटी।

कुछ देर तक उन्होंने बस उसे देखा —
कोई हड़बड़ी नहीं, कोई आवाज़ नहीं।

फिर उन्होंने वो चीज़ उठाई,
धीरे से तह किया… और अलमारी के एक कोने में रख दी।

ना कोई सवाल।
ना कोई आवाज़।

लेकिन चेहरे पर अब एक अजीब-सी चुप्पी और आँखों में हलकी सख्ती थी।


---

अगली सुबह...

नेहा माँ से नज़रें नहीं मिला पा रही थी।

माँ चुप थीं —
खाना बना रही थीं, आवाज़ में कोई फर्क नहीं,
लेकिन हर बात थोड़ी कम हो रही थी… थोड़ा ठंडी… और थोड़ी तीखी।

नेहा की घबराहट अब बेहद तेज़ हो गई थी।

उसे शक था — "माँ ने देख लिया है…"

लेकिन वो तय नहीं कर पा रही थी कि…

माँ जानती हैं… या माँ सब समझ कर इंतज़ार कर रही हैं कि मैं खुद कुछ कहूँ?"
दोपहर का वक़्त था।

घर में सब अपने-अपने कमरों में थे,
नेहा रसोई में थी और उसके पापा बाहर खेत की तरफ़ गए थे।

माँ — शालू — चुपचाप बरामदे में बैठी थीं।
उनकी आँखें छत की सीढ़ियों की ओर बार-बार उठ रही थीं।

फिर जैसे ही राहुल नीचे उतरा,
शालू ने उसे आवाज़ दी:

“राहुल बेटा, ज़रा इधर आओ।”

राहुल ने मुस्कुराकर सिर हिलाया,
पर शालू की मुस्कान गायब थी।

उसके बैठते ही माँ ने सीधा सवाल नहीं पूछा।
बस उसकी आँखों में देखा,
और धीरे से बोलीं:

“तुम्हारे घर में भी बहन है ना?”

राहुल थोड़ा चौंका।

“जी… है।”

“तो मान के चलो, कि मैं भी एक माँ हूँ…
जिसकी बेटी है।
और मैं सब कुछ ना देखकर भी बहुत कुछ देख लेती हूँ।”

राहुल अब थोड़ा गम्भीर हो गया।

माँ ने रुककर कहा:

“कल जब तुम कमरे से बाहर आए थे नेहा के साथ…
और फिर बाद में मुझे एक चीज़ मिली वहाँ,
जो वहाँ होनी नहीं चाहिए थी —
तब मुझे दो बातें साफ़ समझ में आ गईं।”

**“एक — तुमने मेरी बेटी की मासूमियत को छुआ है।”
“और दो — अब मैं तुम्हारे इरादे समझने जा रही हूँ।”
बरामदे के कोने में दोनों बैठे थे।

राहुल कुछ समझ नहीं पा रहा था —
शालू आंटी के चेहरे पर ना गुस्सा था, ना ममता… सिर्फ़ एक सख्त, पढ़ लेने वाली नज़र।

“राहुल… मुझे लगता है, तुम बहुत समझदार हो।
लेकिन कुछ बातें… आँखों से नहीं, हाथ से दिखानी पड़ती हैं।”

उन्होंने धीरे से पीछे देखा —
घर का पिछला हिस्सा सुनसान था।

फिर अपनी साड़ी के पल्लू को हल्का सा उठाया…
और उसकी तह में से नेहा की वही गुलाबी पैंटी बाहर निकाली —
साफ़ तह की हुई।

राहुल की साँस अटक गई।

"ये चीज़ मैंने कल कमरे में देखी थी।
मेरी बेटी के कमरे में, मेरे ही बिस्तर पर।
और वो भी उस दिन… जब तुम दोनों वहाँ अकेले थे।”

शालू अब उसके सामने पूरी तरह एक माँ की तरह खड़ी थीं,
ना डर, ना झिझक — सिर्फ़ एक माँ का साफ़ सवाल।

“अब बताओ —
क्या ये मेरी बेटी की ग़लती थी?
या ये तुम दोनों की मर्ज़ी थी?
या सिर्फ़ तुम्हारा खेल?”

राहुल के माथे पर पसीना आ गया।

उसने काँपती आवाज़ में कहा:

“मामी… माफ़ कीजिए,
मुझे ये सब बताना चाहिए था…
लेकिन मैं डर गया था।”

“नेहा ने कुछ भी जबरदस्ती नहीं किया,
ना मैंने… लेकिन जो हुआ, वो शायद नहीं होना चाहिए था।
पर मैं सिर्फ़ उसके साथ खेल नहीं रहा…”

"मैं… उसे चाहता हूँ।”
राहुल सिर झुकाए बैठा था।

शालू उसकी तरफ़ देख रही थीं — लेकिन उनकी नज़र में अब सिर्फ़ नाराज़गी नहीं थी।
अब वहाँ एक माँ का वो गुस्सा था जो तब आता है, जब बेटी की आत्मा को ठेस पहुँचती है।

उन्होंने धीरे से, पर ठोस आवाज़ में कहा:

“शहर में रहकर क्या इतना बदल गया है तुम्हारे अंदर, राहुल?”

“रिश्ते अब तुम्हारे लिए बस ‘मौका’ रह गए हैं?”

राहुल कुछ कहने ही वाला था कि शालू ने हाथ उठाकर रोक दिया।

"मैंने ये बात न तुम्हारी माँ से कही, न तुम्हारे मामा से।
क्योंकि मुझे अब भी उम्मीद है —
कि जो लड़का मेरी बेटी के करीब गया है,
उसमें इंसानियत बाकी है।”

“तुम्हारी भी एक बहन है, ना?”

“प्रिय्या…”

राहुल ने धीरे से सिर हिलाया।

शालू की आँखों में अब आँसू थे —
लेकिन आवाज़ अब भी फौलादी:

“कल को अगर किसी लड़के के हाथ में उसकी… कपड़े हों —
और वो हँसे, छुपाए, या उसे गलत नज़र से देखे —
तो बताओ राहुल, तुम्हारे सीने में क्या गुज़रेगा?”

राहुल की आँखें नीचे झुक गईं।

"नेहा, मेरी बेटी है — लेकिन उससे पहले वो भी एक बहन थी, एक इंसान थी।
उसे छूने से पहले तुमने एक बार भी उसकी इज़्ज़त की सोच की थी?”

“कपड़े सिर्फ़ शरीर नहीं ढँकते,
कई बार एक माँ की नींद, एक लड़की की गरिमा, और एक परिवार की मर्यादा भी उन्हीं धागों में बंधी होती है।”

अब शालू थोड़ा रुकीं, गहरी साँस लीं…
फिर शांत होकर बोलीं:

“गलतियाँ सभी करते हैं…
लेकिन हर कोई मर्द नहीं बनता —
जो अपनी ग़लती को समझकर उसे सही करे।”

“अब फैसला तुम्हारा है —
राहुल अब भी सिर झुकाए बैठा था।

शालू की आँखों में बहुत कुछ था —
गुज़रा हुआ विश्वास, हिल चुकी उम्मीद,
लेकिन सबसे ऊपर… एक माँ की कोमलता।

वो कुछ देर चुप रहीं।

फिर राहुल की तरफ़ देखा,
और बेहद धीमे स्वर में बोलीं:

"मैं जानती हूँ, राहुल…
तुम कोई बुरा लड़का नहीं हो।
बस… कुछ पल ऐसे आ जाते हैं ज़िंदगी में
जहाँ इंसान से गलती हो जाती है।”

“मुझे तुमसे गुस्सा है…
क्योंकि तुमने मेरी बेटी को उस मोड़ पर ले जाया,
जहाँ कोई माँ अपनी संतान को नहीं देखना चाहती।”

“लेकिन मैंने तुम्हारी आँखों में डर नहीं…
पछतावा देखा है।”

वो उठीं।

साड़ी को ठीक किया।
और बहुत शांत आवाज़ में बोलीं:

"इसलिए —
मैं तुम्हें एक बच्चा मानकर माफ़ कर रही हूँ।
लेकिन अगली बार अगर तुमने मेरी बेटी को सिर्फ़ पास आने लायक समझा,
साथ निभाने लायक नहीं…
तो मैं फिर माँ नहीं बनूँगी,
सिर्फ़ एक औरत बनकर जवाब दूँगी।”

वो मुड़ीं, दो क़दम चलीं…
फिर रुकीं और एक आखिरी बात कह गईं:
शालू धीरे से दो कदम चलीं,
फिर रुककर पीछे मुड़ीं —
राहुल अभी भी अपनी जगह जड़ था।

उनके हाथ में कुछ था —
वही गुलाबी पैंटी,
जो उन्होंने उस दिन कमरे से चुपचाप उठाई थी।

उन्होंने उसे राहुल की ओर बढ़ाया —
आवाज़ बहुत हल्की थी, लेकिन हर शब्द सटीक:

"इसे ले लो…"

राहुल ने काँपते हाथों से लिया, कुछ बोलना चाहा —
लेकिन शालू ने उसे रोका:

"कुछ मत कहो।
बस सुनो।”

"ये नेहा की है —
और उसे नहीं पता कि ये मुझे मिली थी।
उसे पता भी नहीं चलना चाहिए।”

“मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी को ये महसूस हो
कि उसकी माँ ने उसे उस नज़रों से देखा…
जिससे एक लड़की टूट जाती है।”

"वो मुझसे अब भी हँसकर बात करती है —
और मैं चाहती हूँ कि उसकी वो मासूम हँसी,
बची रहे।”

राहुल की आँखें भीगने लगीं।

शालू ने आँखें उसकी ओर नहीं,
बस ज़मीन की ओर टिकाईं —
जैसे अपने ही शब्दों से बच रही हों।

“मैंने तुम्हें माफ़ किया, क्योंकि मैं माँ हूँ —
लेकिन ये मत भूलना…
माफ़ी भरोसे की तरह होती है —
एक बार टूटे तो आवाज़ नहीं आती,
लेकिन दोबारा जोड़ने पर दरारें हमेशा दिखती हैं।”

फिर वो चुप हो गईं।

“नेहा से जाकर कह देना —
कि उसे वो चीज़ उसी कमरे से मिल गई,
उसी वक़्त, बस उसे ध्यान नहीं रहा।”

“और तुम…
अपने अंदर का आदमी अब जगा दो,
लड़का बहुत देख चुकी हूँ।”

शालू चली गईं —
धीरे-धीरे… लेकिन जैसे एक बड़ी आग को ठंडी राख में बदलकर।

रात के वक़्त, सब छत पर बैठे थे।

राहुल धीरे से उठा, और नेहा को इशारे से नीचे बुलाया।

नेहा थोड़ी झिझकी, लेकिन उसका चेहरा अब थोड़ा हल्का था —
जैसे कोई बड़ी आफ़त टल गई हो।

नीचे बरामदे में — चुपचाप…

राहुल ने चुपचाप जेब से कुछ निकाला।

वही पैंटी।

नेहा की आँखें चौड़ी हो गईं।

“मिली कहाँ?” उसने जल्दी से पूछा।

राहुल ने हल्के से मुस्कराकर कहा:

“कमरे में… कोने में ही थी शायद,
तुमने ध्यान नहीं दिया।”

नेहा ने राहत की साँस ली।

“थैंक गॉड… मम्मी को कुछ नहीं पता ना?”

राहुल कुछ देर चुप रहा।

फिर बोला:

“नहीं… कुछ नहीं पता…”
(पर उसकी आँखों ने कुछ और कहा)

नेहा चली गई, पैंटी को लेकर तेज़ी से ऊपर।

लेकिन राहुल वहीं रुका रहा… अंधेरे में, अकेला।

उसकी आँखों में शालू की छवि थी —
साड़ी की तह से चुपचाप पैंटी निकालती,
आँखों में ग़ुस्सा नहीं,
बल्कि एक ऐसा भाव…
जो माँ से ज़्यादा एक स्त्री की जागरूकता लिए हुए था।

उसकी आवाज़ गूँजी:

> “अगर दोबारा सिर्फ़ पास आने लायक समझा, साथ निभाने लायक नहीं… तो मैं माँ नहीं, सिर्फ़ औरत बनकर जवाब दूँगी।”



राहुल को कुछ समझ नहीं आ रहा था —

क्यों वो पल उसके भीतर से निकल ही नहीं रहा…

क्या ये डर था?
या सम्मान?
या कुछ और… जो वो खुद नहीं समझ पा रहा था?

part 2 गाँव की गर्म रात।

सब लोग छत पर अपनी-अपनी जगह पर चादरें बिछाए लेटे थे।
हल्की हवा बह रही थी… पंखे नहीं थे, लेकिन आसमान खुला था।

राहुल, नेहा, प्रिय्या — सब छत के एक किनारे।
दादी दीवार की ओर, और कुछ दूरी पर एक और चादर बिछी थी…

शालू भी आज ऊपर ही सोने आई थीं।

नेहा चौंकी थी, लेकिन कुछ बोली नहीं।

“गर्मी बहुत थी नीचे,” शालू ने हल्के से कहा —
जैसे खुद को ही यक़ीन दिला रही हों।

राहुल ने भी नज़रें नहीं उठाईं, लेकिन उसे उस चुप चादर की आहट ज़रूर महसूस हो रही थी।

कुछ देर तक सब सोने का बहाना करते रहे।
पर किसी की नींद नहीं आई थी…

छत पर चुपचाप लेटे हुए,
राहुल की आँखें खुली थीं — लेकिन वो आसमान नहीं, यादें देख रहा था।

शालू की आवाज़,
उसके हाथ से पैंटी देना,
वो निगाह जो माँ से ज़्यादा जानती-सी लगी…

“मैं फिर माँ नहीं बनूँगी…
सिर्फ़ औरत बनकर जवाब दूँगी…”

राहुल ने धीरे से करवट बदली —
लेकिन सामने ही कुछ दूर,
चादर के भीतर से एक हल्की आहट आई।

शालू ने भी शायद करवट बदली थी।

एक पल को दोनों की निगाहें मिलीं —
अँधेरे में… चुपचाप… बिना आवाज़ के।

कोई बात नहीं हुई —
लेकिन जो नहीं कहा गया,
वही सबसे बड़ा कह दिया गया।

राहुल की साँसें थोड़ी तेज़ थीं।
शालू की पलकों में अब भी वही सख़्त नरमी थी —
जैसे माँ होने और औरत होने के बीच की रेखा पर चल रही हों।
छत पर सब सोने की तैयारी में थे।

नेहा ने चादर सिर तक खींच ली थी —
उसका मन आज विचलित था।

माँ की उपस्थिति ने उसे संभाल दिया था,
लेकिन उस संभाल के साथ एक भीतर की दूरी भी आ गई थी।

राहुल की तरफ़ देखा तक नहीं उसने…

धीरे-धीरे उसकी साँसें भारी हुईं…
आँखें बंद… और वो सो गई।

लेकिन छत पर हर कोई नहीं सोया था।

राहुल…
आँखें खुली थीं उसकी,
मन जागता हुआ।

वो करवट लेता, फिर सीधा होता,
उसका दिल भारी था।

ना नेहा की कोई बात हुई,
ना उसकी झलक।

और फिर…

कुछ कदमों की धीमी-सी आवाज़।

हल्का सरकता हुआ पाँव…
किसी की चप्पल की आहट नहीं थी —
बस, चादर सरकने की धीमी सी खरखराहट।

राहुल की साँस रुक गई।

उसने देखा —
शालू उठी थीं।

धीरे से वो पानी की बोतल उठाकर बैठ गईं,
लेकिन उनकी नज़र एक पल के लिए ठीक राहुल पर पड़ी।

अँधेरे में,
जैसे दो साए एक-दूसरे को पहचानते हों —
लेकिन कुछ कहे बिना लौट जाते हों।

शालू ने कुछ नहीं कहा।
बस उठीं… और वहीं थोड़ी दूरी पर आकर फिर लेट गईं।

लेकिन अब तक,
छत पर सिर्फ़ हवा नहीं बह रही थी…
कुछ असहज, अनकहा भी तैर रहा था।
छत पर चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा था।
तारे चुप थे… हवा शांत।

राहुल सो रहा था — करवट के बल, हल्के खर्राटों के साथ।
उसके माथे पर पसीने की कुछ बूँदें थीं —
गाँव की गर्मी का असर।

और तभी…

एक छाया धीरे-धीरे उसके पास आई —
बिलकुल चुपचाप।

चप्पल नहीं, आहट नहीं —
सिर्फ़ एक साड़ी की सरसराहट।

वो झुकी…
और बहुत हल्के हाथ से राहुल के माथे से पसीना पोंछने लगी।

पहले ऊँगली से — फिर धीरे-से हथेली से।

राहुल गहरी नींद में था,
लेकिन छुअन का एहसास धीरे-धीरे उसके भीतर उतरने लगा।

थोड़ी देर बाद, उसकी आँखें खुलीं…
और जैसे ही सामने देखा — वो चौंक गया।

“मामी…?”

उसने फुसफुसाते हुए कहा —
थोड़ा डर, थोड़ा संकोच।

शालू की आँखें थोड़ी चमक रही थीं…
लेकिन चेहरा शांत था।

"नींद में थे… माथा बहुत गर्म था बेटा।
बस ऐसे ही…"
(उसकी आवाज़ धीमी थी, पर कुछ तो था उसमें जो माँ जैसा नहीं लगा।)

राहुल अब पूरी तरह जाग चुका था।
उसने चादर थोड़ी खींची, खुद को समेटा।

शालू बस एक पल देखती रही — फिर सीधी हुई।

"सो जाओ… बहुत कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं।
मैं तो माँ हूँ न।”
"आज मैंने तुम्हें बहुत डाँटा..."

वो थोड़ी देर चुप रहीं।
फिर खुद से बोलीं जैसे —
"शायद लहज़ा ज़्यादा सख़्त था... शायद डर ज़्यादा दिखा, प्यार कम।"

फिर राहुल की ओर देखा —
आँखों में अब ग़ुस्सा नहीं था,
बस एक थकी हुई ममता थी।

"मैं माँ हूँ, राहुल...
लेकिन उससे पहले मैं भी एक इंसान हूँ।
ग़लतियाँ मुझसे भी होती हैं..."

"तुमसे जो कहा — वो डर से कहा था,
पर जो नहीं कहा...
वो मेरी चिंता थी।"

राहुल कुछ नहीं बोला।
बस उसकी आँखें नम हो गईं।

शालू ने हल्के से उसका माथा छुआ —
इस बार डाँटने वाली माँ की तरह नहीं,
बल्कि माफ़ी माँगती और प्यार बाँटती इंसान की तरह।

"मुझे माफ़ कर सको तो करना..."

वो उठीं, वापस अपनी चादर पर चली गईं।

पर उस रात, राहुल की आँखें देर तक नहीं झपकीं…

शालू के चले जाने के कुछ देर बाद —
राहुल अपनी चादर से उठ बैठा।

उसका दिल भारी था,
मन उलझा हुआ…

वो धीरे से उठा,
और बिना आवाज़ किए छत के कोने में, दीवार पर जाकर बैठ गया।

रात का एक ठहरा हुआ पल —
जहाँ सिर्फ़ तारों की रोशनी थी और सोचों का शोर।

उसने छत के उस पार देखा —
दूर अंधेरे में गाँव की बत्तियाँ बुझी थीं,
पर उसके मन का उजाला और अँधेरा —
दोनों जाग रहे थे।

"मैंने क्या किया…?"
उसने खुद से पूछा।

"नेहा…?
और मामी…?
कहीं मैंने किसी की नज़रों में खुद को खो तो नहीं दिया…?"

हवा चल रही थी —
धीमी, गुनगुनाहट-सी…

पर राहुल के भीतर आँधी थी।

उसने सिर दोनों घुटनों पर रख लिया,
और आँखें बंद कर लीं।

उसे अब सबसे ज़्यादा डर खुद से लग रहा था।


part 3 रात गहरी थी, पर नींद कहीं नहीं थी।

राहुल अब भी छत की मुंडेर पर बैठा था —
नीचे झाँकता हुआ, जैसे अपने भीतर झाँक रहा हो।

पीछे से हल्की-सी चप्पल की आहट आई।

शालू।

धीरे-धीरे चलती हुई, वो उसके पास आई —
थोड़ी दूरी पर बैठ गईं।

"नींद नहीं आ रही?"
शालू ने धीमे से पूछा।

राहुल ने सिर हिलाया —
"नहीं मामी… बहुत कुछ सोच रहा हूँ।"

शालू चुप रहीं।
फिर एक लम्बी साँस लेते हुए बोलीं:

"मुझे भी नहीं आ रही… शायद इसलिए क्योंकि जो बात कहनी थी, वो कह नहीं पाई… और जो नहीं कहनी थी, वो दिल में ठहर गई।"

राहुल उसकी तरफ़ देखने लगा —
उनकी आँखों में आज माँ जैसी कोमलता भी थी, और एक थकी हुई औरत की सच्चाई भी।

"कभी-कभी रिश्तों की पहचान वक़्त से नहीं, एक पल से होती है," शालू ने कहा,
"और कभी एक ग़लत पल सबकुछ बदल भी देता है।"

वो थोड़ी देर चुप रहीं।

"मैं तुम्हारी मामी हूँ, राहुल… पर एक औरत भी हूँ, जिसकी अपनी भावनाएँ हैं, अपनी कमज़ोरियाँ…"

फिर उन्होंने अपनी नज़रें मोड़ लीं।

"मैंने तुम्हें डाँटा, माफ़ किया… पर मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाई।"

राहुल कुछ बोलना चाहता था, लेकिन शब्द नहीं मिले।

शालू उठीं।छत पर हवा थोड़ी ठंडी हो चली थी।
शालू, राहुल के पास बैठीं थीं — अब चुप्पी थोड़ा खुलने लगी थी।

एक लंबा मौन तोड़ते हुए उन्होंने कहा:

"राहुल… क्या कभी तुमने किसी औरत की चुप्पी सुनी है?"

राहुल चुप रहा।

शालू ने आसमान की तरफ़ देखा —
तारे भी जैसे थम से गए।

"कभी-कभी औरतें बहुत कुछ नहीं कहतीं,
क्योंकि उन्हें आदत होती है सब सहने की…
क्योंकि उन्हें कोई सुनने वाला नहीं मिलता।"

थोड़ी देर के बाद उन्होंने धीरे से कहा:

"तुम्हारी मामी होने के साथ-साथ मैं एक औरत भी हूँ…
और एक औरत जिसने कभी… मर्द का वो प्यार नहीं पाया जो सिर्फ़ शरीर नहीं, मन को भी छू जाए।"

"तुम्हारे मामा… एक सीधे-सादे इंसान हैं।
अच्छे हैं… पर कभी मेरी आँखों में नहीं देख पाए…
कभी ये नहीं पूछा कि मैं ठीक हूँ या सिर्फ़ निभा रही हूँ।”

शालू की आवाज़ नहीं काँप रही थी,
पर उसमें एक ठहर गया दर्द था।

राहुल कुछ कहना चाहता था,
पर उस वक्त शब्द छोटा और मौन भारी हो गया।

शालू ने नज़रें नीची कीं,
"कभी-कभी इंसान को इतना खाली छोड़ दिया जाता है… कि वो सिर्फ़ रिश्ते निभाता है, जीता नहीं।"

वो उठीं।

"मैं ये सब तुमसे इसलिए कह रही हूँ, क्योंकि तुम समझ सकते हो —
शायद इसलिए नहीं कि तुम जवाब दो… बस इसलिए कि कोई सुन ले।"शालू उठकर मुंडेर की ओर चली गईं।

राहुल अब भी चुप था।
उसके भीतर कुछ बदल रहा था —
किसी रिश्ते की परिभाषा, किसी भाव की समझ।

शालू अब मुंडेर से दूर आसमान की ओर देख रही थीं।
पीठ राहुल की तरफ़, पर मन... शायद उसके ही पास।

राहुल ने धीरे से आवाज़ दी —

"मामी…"

शालू पलटीं।

"आप ठीक हैं?"

शालू के चेहरे पर एक क्षण के लिए मुस्कान तैर गई —
थकी हुई, पर सच्ची।

"नहीं हूँ… लेकिन तुमसे कहकर थोड़ी हल्की हो गई हूँ।"

वो फिर बैठ गईं — इस बार थोड़ा और पास।

"राहुल, तुम्हें ये सब बताना शायद ग़लत हो सकता है…
पर मेरी ज़िंदगी में कोई और ऐसा नहीं जिससे मैं ये कह पाती।"

राहुल ने उनकी ओर देखा।

"आपकी बातों से डर नहीं लगा मामी…
बल्कि एक सवाल उठा —
क्या हम वाकई अपनों से इतनी दूर हो सकते हैं… कि उन्हें कुछ कहने के लिए कोई बाहर का सहारा लेना पड़े?"

शालू की आँखें नम हो गईं।
"हम औरतें सबकी होती हैं… बस खुद की नहीं होतीं।"

कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर राहुल ने धीरे से कहा:

"मैं आपकी बातें कभी किसी से नहीं कहूँगा…
पर अगर कभी फिर कुछ सुनना चाहें… तो कहिएगा ज़रूर।"

शालू ने उसका हाथ पकड़ा —
बस एक पल के लिए।
ना कोई गलत इरादा, ना कोई आग्रह…
बस एक मानवीय जुड़ाव — दो अकेलेपन के बीच।

फिर उन्होंने हाथ पीछे खींच लिया और बोलीं:

"चलो… बहुत रात हो गई है। अब सो जाएँ।"

और
कुछ देर की चुप्पी के बाद
राहुल ने शालू को थोड़ा मुस्कुराते हुए देखा।

फिर, हवा में थोड़ा नटखटपन घोलते हुए बोला:

"वैसे मामी… एक बात तो समझ में नहीं आई..."

शालू ने हल्के से पूछा,
"क्या?"

"अगर मामा जी इतने सीधे-सादे हैं, प्यार-व्यार जताते नहीं…
तो फिर आप दो-दो बच्चों की मम्मी कैसे बन गईं?"

?

शालू पहले तो चौक गईं —
फिर उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, हँसी थी।

"तेरी तो…! बद्तमीज़!"
उन्होंने पास पड़े तकिए से राहुल को हल्के से मारा।

"बातों-बातों में क्या-क्या सोचता है तू!"

राहुल अब खुलकर हँस रहा था।

"अरे मामी, अब आप इतना दिल खोलकर बात कर रही थीं,
तो सोचा थोड़ा माहौल हल्का कर दूँ।"

शालू भी मुस्कुरा पड़ीं।

"चलो… तू बड़ा हो गया है, पर अभी भी बच्चों जैसी बातें करता है।"

फिर थोड़ी देर बाद, शालू ने भी उसी लहज़े में मज़ाक किया:

"और सुनो भांजे राजा… एक दिन जब तू शादी करेगा,
और बीवी तुझसे कहेगी — 'तुम प्यार नहीं करते'…
तो ये सवाल खुद से पूछना मत भूलना!"

अब दोनों मुस्कुरा रहे थे —
छत की उस रात में, तारे थोड़े और पास लग रहे थे।

राहुल ने मज़ाक के साथ हल्के अंदाज़ में कहा:

"अच्छा मामी, फिर शादी के बाद नेहा से ही पूछूँगा ये सवाल…
क्योंकि शादी तो मैं उसी से करने वाला हूँ।"

उसका चेहरा मुस्कराहट से भरा था —
बिलकुल मासूम, लेकिन सच्चा।

शालू उसे एक पल देखती रहीं।

और फिर… उनके होंठों पर भी मुस्कान आ गई।
बहुत हल्की, लेकिन उसमें वो सारी थकावट थी जो सालों से उन्होंने छुपा रखी थी।

उस मुस्कान में कोई ताना नहीं था,
कोई दर्द भी नहीं —
बस एक माँ खो गई थी उस पल में…
कहीं उस उम्मीद में कि शायद उसकी बेटी को वो मिल जाए, जो उसे कभी नहीं मिला।

शालू ने कुछ नहीं कहा।
बस उठीं…
राहुल के सिर पर हल्के से हाथ फेरा,
और धीरे से बोलीं:

"तो फिर अब सो जा…
कल सुबह जब मेरी बेटी की आँख खुले,
तो उसे लगे — वो किसी के प्यार की नहीं,
किसी के इज़्ज़त की हक़दार है।”

और वो लौट
राहुल की बात पर शालू मुस्कुराई तो थी…
लेकिन कुछ सेकंड बाद, वो मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई।

वो ठिठकी… फिर धीमे से बोली:

"अच्छा… वो तो तुम्हारी बहन भी है ना — मेरी बेटी..."

राहुल
राहुल शालू की आँखों में देख रहा था —
वो आँखें जिनमें अभी-अभी माँ की झलक थी…
पर अब वो उसमें कुछ और ढूँढ रहा था।

धीरे से बोला:

"मामी… नहीं — अब तो मुझे आपको मम्मीजी कहने का हक़ है।
क्योंकि नेहा अब मेरी बहन नहीं… मेरी पत्नी है।
और मुझे सबसे प्यारी सास भी मिल गई है…"

उसके चेहरे पर कोई शरारत नहीं थी —
बस एक सच्चा विश्वास, एक अंदर से निकली रोशनी।

शालू उसे देखती रहीं।
कई भाव उनके चेहरे पर आए —
हैरानी, उलझन, डर, और फिर… एक नमी।

उनके पास कोई शब्द नहीं थे।

वो कुछ बोलना चाहती थीं… लेकिन गले से आवाज़ नहीं निकली।

बस अपने आँचल से आँखें पोंछीं,
फिर धीरे से राहुल का हाथ थामा —
बहुत हल्के से, पर पूरी माँ की ताक़त के साथ।

और कहा:

"तो फिर… अब जो भी हो,
सिर्फ़ प्यार नहीं, भरोसा भी निभाना पड़ेगा… बेटा।”

राहुल ने सिर झुका लिया —
"आपके आशीर्वाद के बिना तो ये रिश्ता अधूरा है, मम्मीजी…"
शालू के आशीर्वाद वाले शब्द सुनकर राहुल ने थोड़ा मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ लिए।
और फिर हल्के नटखट अंदाज़ में बोला:

"तो फिर मम्मीजी, आशीर्वाद दीजिए…
कभी बीवी प्यार न करे,
तो सास ही थोड़ा-बहुत प्यार दे दे!"

?

शालू एक पल को ठिठकीं।

उनके चेहरे पर पहले हँसी आई… फिर चुप्पी।

उनकी आँखों में जैसे कुछ चमका —
कोई याद? कोई भाव?
या शायद… एक अनकहा सवाल।

उन्होंने कुछ नहीं कहा,
बस हल्के से राहुल की ओर देखा —
न डाँट, न हँसी — बस एक गहराई।
राहुल ने धीरे से पूछा:

"क्या सोच रही हैं मम्मीजी?"

शालू मुस्कुराईं।
फिर बोलीं:

"सोच रही हूँ… कि अब मैं तुझे भांजा नहीं कह सकती!"

राहुल हँस पड़ा।

"क्यों? अब क्या बन गया मैं?"

शालू ने ज़रा झुककर, हल्के से आँखों में देखते हुए कहा:

"अब तू मेरा दामाद है… और मैं तेरी सास!"

"और तेरी माँ? जो मेरी ननद है — वो अब मेरी समधन!"
(और कह कर खुद ही हँसने लगीं)

राहुल ने भी हँसते हुए हाथ जोड़े:

"तो फिर मम्मीजी, आशीर्वाद दो… वरना समधन नाराज़ हो जाएँगी!"

शालू ने प्यार से उसके माथे पर हल्की चपत मारी:

"चल हट… बातों का बादशाह बन गया है।"

फिर कुछ देर चुप रहीं,
और धीमे से बोलीं:
हवा अब ठंडी चलने लगी थी।
शालू और राहुल अब थोड़े सहज हो चुके थे।
मूड हल्का था… कुछ सन्नाटा, कुछ मुस्कुराहटें।

शालू ने चुप्पी तोड़ी और मुस्कुराते हुए कहा:

"राहुल, एक बात पूछूँ… बिना नाराज़ हुए जवाब देगा?"

राहुल हँस पड़ा, "अब मामी, आप भी डराकर पूछेंगी तो सोचूंगा ज़रूर!"

शालू ने थोड़ी नज़दीक होकर हल्के से आँखें मटकाईं और बोली:

"ये जो तुम्हारे पापा हैं — जो मेरी ननद यानी तुम्हारी मम्मी के पति हैं —
वो प्यार करते हैं न अपनी पत्नी से, या बस निभा रहे हैं?"

राहुल ने थोड़ा चौंकते हुए देखा, फिर मुस्कुराया।
छत पर चाँदनी बिखरी थी — नर्म, चुप, और धीमे-धीमे जलती हुई… ठीक वैसे ही जैसे उनके भीतर कुछ सुलग रहा था।

शालू की उँगलियाँ जब राहुल की हथेलियों में ढीली पड़ीं, तो वो सिर्फ़ थकान नहीं थी — वो एक इशारा था… एक मौन स्वीकृति, कि अब वो पास आने दे रही है।

राहुल ने उसकी ओर देखा — उसकी आँखों में सवाल नहीं, अब प्यास थी।
ऐसी प्यास जो देह से नहीं, उस स्पर्श से बुझती है जिसमें सैकड़ों अधूरे पल छुपे हों।

चाँदनी अब और भी सफेद लग रही थी, पर उनके बीच का स्पर्श धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा था —
कपड़ों के पार, साँसों के आर-पार।

वासना वहाँ शब्द नहीं मांग रही थी,
बस मौजूद थी —
धीमी, धड़कनों के बीच छिपी हुई,
जैसे किसी अनकहे गीत की आखिरी सरगम।
मामी," राहुल की आवाज़ काँप रही थी,
"मुझे आपकी बेटी से प्यार है… ये आप जानती हैं।
लेकिन आज… न जाने क्यों… आपसे कुछ ऐसा महसूस हुआ… जो मैं खुद से भी छिपा नहीं पाया।"

वो चुप हो गया।

मामी की आँखें उसकी ओर उठीं — उनमें न तो ग़ुस्सा था, न ही कोई साफ़ जवाब।
बस एक लम्बा सन्नाटा था…
जिसमें दोनों ने शायद कुछ खोया भी, और खुद को थोड़ा समझा भी।
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#6
मामी ने उसकी बात सुनी, और कुछ पल बिना कुछ कहे उसकी आँखों में देखती रहीं।
उनके भीतर हलचल थी — सालों से दबा सूनापन, अनकहे एहसास, और अब… यह अनचाहा स्वीकार।

"राहुल…" उन्होंने धीरे से कहा, "तुम जानते हो न, ये कितना गलत है?"

राहुल ने सिर झुका लिया, लेकिन उसकी आँखें अब भी मामी के चेहरे को पढ़ रही थीं।

"गलत है… शायद," उसने फुसफुसाकर कहा, "लेकिन आज जो महसूस हुआ… वो झूठ नहीं था।"

मामी ने हल्की सी साँस छोड़ी। उनकी उंगलियाँ अपने पल्लू से खेलने लगीं — एक पुरानी आदत, जब वो बेचैन होती थीं।

चाँदनी अब ज़्यादा चमक रही थी, और उनके बीच की खामोशी भी ज़्यादा करीब लग रही थी।

उन्होंने राहुल का चेहरा अपने हाथों में थामा।
"तुम मेरी बेटी से प्यार करते हो," उन्होंने कहा, "और मैं… खुद से सवाल।"

राहुल कुछ कहने ही वाला था, जब उन्होंने उसकी उँगलियों को धीरे से छुआ।
"रिश्ते कभी-कभी नाम से नहीं… एहसास से बनते हैं।
पर हर एहसास निभाने लायक नहीं होता।"

उनकी आँखें भीग गईं, पर चेहरा शांत था।
राहुल ने उनका हाथ चूमा — इज़्ज़त से, भावना से, और एक अधूरी चाह से।
राहुल ने शालू का हाथ थामा — धीरे, लेकिन पूरी यकीन के साथ।

"चलो… बस कुछ देर चुपचाप मेरे पास बैठो," उसने कहा।

शालू ने पहले तो आँखें झुका लीं, पर फिर वो बिना विरोध सीढ़ियों की ओर बढ़ गई।

सीढ़ियाँ शांत थीं, जैसे वो भी उनकी थमी हुई धड़कनों की आवाज़ सुन रही हों।

राहुल उसके थोड़ा करीब आया — न ज़बरदस्ती, न जल्दबाज़ी… बस एक खामोश चाहत, जो धीरे-धीरे उसके हर अंदाज़ में घुल रही थी।

शालू की साँसें अब हल्की-हल्की तेज़ थीं, पर वो पीछे नहीं हटी।
उसने सिर उठाकर राहुल की आँखों में देखा — वहाँ अब सवाल नहीं थे, बस एक चुप भरोसा।

"तुम्हारे पास रहना… अच्छा लगता है," शालू ने धीरे से कहा।

राहुल ने उसके चेहरे को हल्के से छुआ —
जैसे कोई टूटे शीशे को सहला रहा हो, कि वो बिखरे नहीं।

उस रात, उन दोनों ने कुछ कहा नहीं — लेकिन उनके बीच सब कुछ कहा जा चुका था।
नज़दीकियाँ बढ़ीं, पर हर छुअन में इज़्ज़त थी, एहसास था… और एक अधूरी प्यास भी।
राहुल ने शालू की छुपी भूख को और गहराने के लिए, धीरे-धीरे उसे कल की रात का अधूरा क़िस्सा सुनाना शुरू किया — जब वो नेहा के साथ था… और प्यार अधूरा रह गया था, पर एहसास पूरे हो उठे थे।

हर शब्द में हल्की शरारत थी, हर जिक्र में एक आग — जो शालू की साँसों में धीरे-धीरे भरती जा रही थी।
सीढ़ियों पर राहुल के हाथ में मामी का पल्लू था।
वो पल, एक नज़दीकियों की खामोशी से भरा था — जहाँ ज़माना कुछ भी कहे, ये सिर्फ़ प्यार था, जो दिल से दिल तक पहुंचता है।
"बस यही तो प्यार है," राहुल ने धीरे से कहा, "जो समझदारी और वक्त के बीच खुद-ब-खुद हो जाता है।"


---राहुल और शालू अब सीढ़ियों पर पास-पास बैठे थे। हवा में हल्की ठंडक थी, पर उनके बीच गर्माहट साफ़ महसूस हो रही थी।

शालू की साँसें कुछ तेज़ थीं, और राहुल का हाथ अब भी उसकी उँगलियों में उलझा हुआ था। धीरे-धीरे उसने अपना सिर राहुल के कंधे पर रख दिया।

"तुम्हारे पास रहना… बहुत सुकून देता है," शालू ने आँखें बंद करते हुए कहा।

राहुल ने उसकी ओर देखा — उसके चेहरे की मासूमियत में एक छुपी हुई आग थी। उसकी लट हल्की हवा से उसके गालों को छू रही थी। राहुल ने धीरे से उसे हटाया — उसके गालों पर अपनी उँगलियों का स्पर्श छोड़ते हुए।

"मैं कुछ नहीं कहूँगा," राहुल फुसफुसाया, "पर हर छुअन से तुम्हें बता सकता हूँ कि मैं क्या महसूस करता हूँ।"

शालू ने आँखें खोलकर उसकी तरफ देखा — अब उन निगाहों में झिझक नहीं, एक चुप स्वीकृति थी।

राहुल ने उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया। बहुत धीरे से, उसने उसके माथे पर एक हल्का-सा चुंबन लिया — फिर उसकी नाक पर, और आखिर में होंठों के ठीक पास... लेकिन रुका।

शालू ने खुद ही अपनी आँखें बंद कर लीं — और वो एक सधी हुई, नर्म और लंबी सांस जैसी पहली किस थी, जिसमें कोई जल्दबाज़ी नहीं… बस एक गहरी प्यास थी, जो शब्दों से नहीं, स्पर्श से बुझाई जा रही थी।

उनके बीच की खामोशी अब और ज़्यादा बोलने लगी थी।

राहुल की उंगलियाँ अब उसकी पीठ पर चलने लगीं — कपड़े के ऊपर से ही, लेकिन हर लकीर जैसे दिल तक उतर रही थी।

शालू की साँस अब रुक-रुक कर चल रही थी। उसने राहुल के गले में अपनी बाहें डाल दीं, और उसके सीने से सट गई — जैसे कहना चाह रही हो, "अब रुकना मत…"

पर राहुल रुका — और मुस्कराया।

"आज नहीं…", उसने कहा।
"क्योंकि मैं सिर्फ़ तुम्हें छूना नहीं चाहता…
मैं तुम्हें पूरी तरह समझना चाहता हूँ।"

शालू ने उसकी ओर देखा — उसकी आँखें अब और भी भीगी थीं…
प्यार से। एहसास से। और एक इंतज़ार से।
राहुल की उंगलियाँ अब शालू की खुलती हुई साड़ी के साथ उसकी रूह को नहीं — उसकी दबी हुई इच्छाओं को पढ़ रही थीं।
हर तह जो नीचे उतरती, एक नयी सिहरन छोड़ जाती।

पल्लू पूरी तरह सरक गया… और सामने उसकी मखमली पीठ थी — गर्म, कांपती और बेहद आमंत्रित।

राहुल ने झुककर उसकी गर्दन पर होंठ रखे — पर ये चुंबन अब नर्म नहीं था, इसमें भूख थी।
एक धीमी, गहराती हुई भूख… जो सिर्फ़ महसूस करना नहीं चाहती थी — खुद में समा लेना चाहती थी।

शालू की पलकों पर कंपकंपी दौड़ गई। उसने खुद को राहुल के सीने से और कसकर चिपका लिया — जैसे कह रही हो, "अब मुझे पूरा जियो।"

"तुम्हारा हर हिस्सा..." राहुल ने गहराई से कहा, "मेरे अंदर जल रही इस आग का जवाब है।"

अब उंगलियाँ कमर से होती हुई पेट के उस हिस्से पर आ गईं, जहाँ छुअन का हर स्पर्श सांस रोक देता है।
कपड़े की आखिरी परत अब एक सीमा नहीं रही — बल्कि एक निमंत्रण थी।

शालू ने खुद राहुल का हाथ थामा… और उसे वहाँ सरकाया, जहाँ उसकी त्वचा अब और इंतज़ार नहीं कर रही थी।

"अब रुकना मत," उसने धीमे, लेकिन जिद में कहा।
"जो आज तक किसी ने नहीं छुआ… वो आज मैं तुम्हें देना चाहती हूँ।"
सीढ़ियों पर शालू खड़ी थी… उम्र 45, पर उसके तन से ज़्यादा उसकी नज़रों में लपटें थीं।
साड़ी उसके पैरों के पास थी — उसके बदन पर अब सिर्फ़ एक कसा हुआ काला ब्लाउज और लाल पेटीकोट था, जो उसकी साँसों की रफ़्तार के साथ हिल रहा था।

राहुल — सिर्फ़ 22 का, लेकिन उस पल उसकी आँखों में बचपना नहीं, आग थी।

वो धीरे से उसके पास आया, हर कदम जैसे एक परत और गिराता जा रहा था।
उसने ऊपर देखा — शालू के गले से नीचे उतरती ब्लाउज की गहराई, उसके पेटीकोट के भीतर थरथराती जांघें, और उन सबके बीच एक सिसकती हुई प्यास।

"तुम यूँ क्यों काँप रही हो?" राहुल ने गहराई से पूछा।
राहुल ने जैसे ही शालू के पेटीकोट का नाड़ा पकड़ा, उसके बदन में एक हल्का झटका दौड़ गया।
शालू की पलकों ने खुद-ब-खुद आँखें ढँक लीं, और उसके होठों से एक धीमी, थमी हुई सिसकी निकली —
जैसे वो छुअन उसकी रूह तक उतर गई हो।

उसका शरीर थम गया… मगर उसकी साँसें काँप रही थीं।
न वो पीछे हटी, न कुछ कहा — बस उसकी उंगलियाँ अब अपने ब्लाउज की किनारियों को मरोड़ने लगीं…
वो वही बेचैनी थी — जो पहली बार कोई औरत तब महसूस करती है, जब कोई उसे पूरी तरह देखने वाला होता है।

"शालू… क्या मैं रुक जाऊँ?" राहुल ने फुसफुसाते हुए पूछा,
लेकिन उसका हाथ अब भी नाड़े पर रुका था — बिना ज़ोर, बिना जल्दबाज़ी।

शालू ने धीमी आवाज़ में कहा,
"नहीं… पर तुम जैसे पकड़ रहे हो… ऐसा लग रहा है जैसे मेरी रूह भी किसी पहली बार के दरवाज़े पर है।"

राहुल ने उसकी कमर के पास झुककर अपनी साँसें छोड़ीं —
वो गर्म हवा शालू की त्वचा से लगी और उसने अपनी आँखें और कस कर भींच लीं।

"पहली बार जैसा ही है…" उसने धीरे से कहा,
"क्योंकि किसी ने कभी इस तरह नहीं छुआ… इस तरह नहीं चाहा… इस तरह नहीं समझा।"

और फिर…

राहुल ने नाड़ा हल्के से खींचा।
पेटीकोट सरकने लगा…
जैसे सालों से थमी हुई कोई परत अब खुद गिरना चाहती हो।

शालू की जाँघों से कपड़ा फिसलता गया —
और उसकी साँसें अब और भी गहरी हो चुकी थीं।

शालू…" राहुल ने उसकी कमर पर उँगलियाँ कसते हुए कहा,
"ये पेटीकोट तुम्हारे मामा ने भी कई बार उतारा होगा… पर बस कपड़े की तरह — जैसे लिबास उतारा जाता है।"

राहुल अब उसके कान के बेहद पास था, उसकी साँसें गर्म और तेज़।

"पर तुमने जो दिया… वो कपड़ा नहीं था शालू —
तुमने खुद को खोला… रूह तक, हर साँस तक।
तुम सिर्फ़ नंगी नहीं हुई मेरे सामने… तुम पूरी तरह उजागर हुई हो।"

"तुमने मुझे सिर्फ़ जाँघों तक नहीं बुलाया… तुमने मुझे अपने भीतर तक आने दिया —
वहाँ, जहाँ कोई नज़दीक तक भी नहीं गया।"

"ये सिर्फ़ पेटीकोट नहीं उतरा आज,
तुम्हारी सदीयों की छुपी आग… आज मेरी उँगलियों से भड़क गई है।"
शालू अब सीढ़ियों पर खड़ी थी — सिर्फ़ ब्लाउज़ और लाल पैंटी में।
उसके शरीर पर चाँदनी की सिलवटें थीं, और भीतर एक धीमी जलती आग —
जिसे कोई अब रोक नहीं रहा था… और बुझाने की कोई जल्दी भी नहीं थी।

राहुल उसके पैरों के पास बैठा था, उसकी जांघों के नज़दीक —
और हर सांस, हर स्पर्श अब एक औरत को पूरी तरह औरत बना रहा था।

उसने अपनी उंगलियों से पैंटी के किनारे को धीरे से छुआ —
जैसे कोई सबसे नाज़ुक रेखा पर कलम रख रहा हो।

शालू की साँसें भारी होने लगीं —
उसके बदन का हर भाग अब जैसे बोलने लगा था — बिना शब्दों के।

"मैं तुम्हें सिर्फ़ देख नहीं रहा…" राहुल ने कहा,
"मैं तुम्हें जी रहा हूँ — हर उस जगह से जहाँ कोई रुका, लेकिन कभी रुका नहीं था।"

उसने शालू की जांघों को अपने होंठों से छुआ — एक लंबा, गहराता हुआ चुंबन।
शालू ने अपनी आँखें बंद कीं, और उसकी उंगलियाँ अब सीढ़ियों की किनारी को कसकर थाम चुकी थीं।

उसका शरीर अब झुक रहा था… और आत्मा खुल रही थी।

राहुल ने शालू के कान के पास धीरे से कहा —
"तुम मेरी हो — पूरे एहसास के साथ। और आज… मैं तुम्हें कोई हिस्सा अधूरा नहीं छोड़ूँगा।"
शालू अब राहुल के सामने खड़ी थी — सिर्फ़ सफेद ब्लाउज़ और लाल पैंटी में।
उसकी साँसों में गर्मी थी, आँखों में बुझती हुई प्यास, और बदन पर चाँदनी का घूँघट — जो हर कटाव को और उभार रहा था।

राहुल की नज़रें उसके शरीर पर नीचे से ऊपर तक ठहर-ठहर कर जा रही थीं — जैसे वो उसे सिर्फ़ देख नहीं रहा, धीरे-धीरे खोल रहा हो।

उसकी आवाज़ गहराई से फिसली —
"मामी नहीं लग रही आज… आज तो लग रहा जैसे किसी अधूरी कल्पना की पूरी तस्वीर सामने खड़ी है।
अगर आप इतनी हॉट हैं… तो बेटी तो आग होगी।"

शालू के चेहरे पर शरम की एक परत उभरी, लेकिन पीछे उस मुस्कान में एक जली हुई तड़प भी थी।
"शब्दों से जलाओगे क्या, या हाथों से?" उसने धीमे से कहा,
"अगर मामी नहीं… तो अब मुझे वैसे ही छुओ, जैसे अपनी औरत को छूते हैं…"

राहुल का चेहरा अब बेहद पास था — उसके साँसों में साँसे मिलती जा रही थीं।

उसकी उंगलियाँ अब शालू की पैंटी के किनारे के पास थीं,
पर वो ठहरी थीं — जैसे अब इज़ाजत शब्दों से नहीं, उसकी आँखों से चाहिए।

"आज से तुम मामी नहीं," राहुल ने सधे हुए स्वर में कहा,
"तुम मेरी हो… हर उस जगह से, जहाँ किसी और ने सिर्फ़ कपड़े हटाए… मैंने एहसास छूए हैं।"
सीढ़ियों की दीवार से टिकी शालू — सिर्फ़ ब्लाउज़ और लाल पैंटी में — अब खुद को नज़रों से नहीं, एहसास से ढक रही थी।
राहुल का चेहरा बेहद करीब था, उसके होंठ उसके गले की गर्म साँसों को महसूस कर रहे थे।

तभी राहुल ने धीमे स्वर में कहा,
"शालू… नेहा से शादी करवा दोगी न मेरी?"

शालू की आँखें एक पल के लिए ठहर गईं।
फिर वो हल्के से मुस्कराई —
"वाह… कमाल का लड़का है तू। एक रात माँ को… ज़िंदगी बेटी को?"

राहुल थोड़ा झेंप गया, पर शरारत से उसकी कमर के पास उँगलियाँ फिरा दीं —
"क्या करूँ… चाहत तो आपसे शुरू हुई थी, अब मोहब्बत वहाँ जा रही है जहाँ आँखें सुकून पाती हैं।
लेकिन जो आग तुमने लगाई है… उसका कोई दूसरा बदन बुझा ही नहीं सकता।"

शालू ने उसकी गर्दन खींच ली, होंठों के बेहद पास आकर कहा —
"तो आज की रात… आग को जलने दो।
कल से तुम दामाद बन जाओगे,
आज… मेरी अधूरी प्यास बनो।"
yourockराहुल की उंगलियाँ अब शालू की पैंटी के नाज़ुक किनारे तक आ पहुँची थीं।
उसने धीरे से पकड़कर उसे हल्का सा नीचे खींचा… और वहीं रोक लिया।

"हम्म… कपड़ा तो बड़ा मासूम है," उसने मुस्कराकर कहा,
"पर इसके पीछे जो छुपा है, वो तो पूरी आग है… माँ में था सुकून — और तुम में जलन!"

शालू ने एक झटके में उसकी बात पर सिर उठाया — चेहरा शर्म से भरा हुआ, लेकिन आँखों में हल्की झुंझलाहट।
"बकवास मत करो, राहुल…" उसने कहा, और उसका हाथ पकड़ लिया।

राहुल उसकी आँखों में झाँकते हुए फुसफुसाया:
"बकवास नहीं कर रहा… तुम्हें छेड़ रहा हूँ — वैसे ही जैसे तुम्हारी पैंटी मेरे हाथों से कह रही है कि उसे हटाओ…"

शालू ने होंठ भींच लिए… उसकी सांसें अब गहरी हो चली थीं।
"तुम आज हद पार कर रहे हो…" वह धीमे से बोली।

"नहीं शालू…" राहुल ने मुस्कराकर कहा,
"आज मैं तुम्हारी झिझक की सारी हदें गिरा रहा हूँ —
और जब ये आख़िरी परत भी हटेगी,
तो सिर्फ़ बदन नहीं… तुम्हारा गुरूर भी मेरे सामने नंगा होगा
राहुल (शालू की कमर पर हाथ फेरते हुए, आँखों में शरारत):
"मामा ने तुम्हारी कमर नहीं बनाई… सीधा जलने-लड़कने का हॉटस्पॉट बना दिया है।
इतनी भरी हुई है कि लगता है मुझ जैसे छोरे की अक्ल सीधी यहीं आकर अटक जाए!"

शालू (साँसें थामकर, शर्म से आँखें फेरते हुए):
"ज़ुबान पर लगाम नहीं रही तुम्हारी…"

राहुल (हल्की मुस्कान के साथ, और पास आते हुए):
"लगाम तो अब तुम्हारी कमर पर लगानी है…
वरना मेरा होश, नजर और इरादा — सब भटक रहा है बस यहीं!"
राहुल ने टी-शर्ट उतारी… फिर पजामा भी। अब वो बस चड्डी में था — नज़रों में आग, और बदन पर चाहत की लपटें।
उसने शालू की कमर थामी और फुसफुसाया:
"अब पर्दा कुछ नहीं… बस मैं और तुम — अधूरी रात को पूरा करने के लिए तैयार।"

शालू ने उसकी ओर देखा — और खुद को उसकी बाँहों में सौंप दिया… चुपचाप, पूरे यकीन के साथ।
राहुल ने शालू को अपनी बाँहों में भींच लिया — अब उनके बीच कोई पर्दा नहीं था, न कपड़े का, न संकोच का।
उसके होठ शालू की गर्दन की गर्मी महसूस कर रहे थे… और उंगलियाँ कमर की गोलाई पर ठहर चुकी थीं।

"आज तुम मामी बनोगी, या सास...? या फिर मेरी ही बीवी?" राहुल ने फुसफुसाते हुए दोबारा पूछा।

शालू की साँसें उसकी गर्दन पर काँपीं। उसने राहुल की उंगलियाँ अपने बदन पर नीचे सरकाईं… और धीमे से कहा —
"आज मैं औरत हूँ… बस औरत। जो सिर्फ़ तुम्हारे इंतज़ार में सालों से अधूरी पड़ी थी।"

राहुल ने उसकी आँखों में झाँका, फिर उसके होंठों को अपने होंठों से चुप कर दिया —
चुम्बन धीमा था, लेकिन भीतर तक उतरता हुआ।

उसकी उँगलियाँ अब ब्लाउज़ की बंदिशों से खेल रही थीं…
और शालू ने बिना कुछ कहे उसकी उँगलियों की भाषा समझ ली थी।

कमरा नहीं था वहाँ — सिर्फ़ सीढ़ियों की खामोशी, और दो धड़कनों की रूहानी आवाज़।
शालू ने राहुल को पास खींचते हुए हौले से कान में कहा —
"अब ज़रा जल्दी करो ना... कहीं तुम्हारी माँ जाग गई तो?"
फिर मुस्कराकर उसने आँख मारी,
"उसकी नींद तो वैसे भी कच्ची है… देख लिया तो हो सकता है उसका भी मन मचल जाए!"

राहुल ने हैरानी और शरारत से उसकी ओर देखा —
"अरे शालू!"

शालू हँस दी, होंठ दाँतों के बीच दबाए —
"अरे मज़ाक था बाबा… पर तेरी मम्मी ने तुझे पैदा किया है, तू सोच, तू क्या करेगा अगर उन्होंने मुझे इस हाल में देख लिया!"
राहुल थोड़ा हँसा… लेकिन अगले ही पल उसकी मुस्कान धीमी पड़ गई।
उसने शालू की आँखों में देखा और फुसफुसाया:

"यार… माँ है वो मेरी…"
"तू तो मज़ाक में कह गई… पर मुझे सुनते ही अजीब सा लग गया…"

उसकी आँखें थोड़ी सी भीग गई थीं, लेकिन चेहरे पर झिझक नहीं… सिर्फ़ सच्चा भाव था।

"मैं जानता हूँ जो हमारे बीच है वो अलग है… पर कुछ रेखाएँ हैं जो खुद-ब-खुद खिंच जाती हैं।"

शालू ने
राहुल ने शालू की आँखों में देखा — उसकी साँसें तेज़ थीं, पर नज़रों में अब कोई संकोच नहीं… बस इंतज़ार।
उस इंतज़ार में एक बेचैनी भी थी — जैसे किसी अधूरे एहसास ने भीतर आग सुलगा दी हो।

राहुल ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में थामा और धीरे से कहा —
"तुम हर बार खुद को क्यों रोकती हो… जबकि तुम्हारी धड़कनें सब कह चुकी हैं?"

शालू कुछ कहने ही वाली थी, लेकिन उसके होंठों से पहले उसकी नज़रें झुक गईं…
जैसे मौन ही अब इज़हार था।

राहुल की उँगलियाँ उसके कंधे से फिसलती हुई पीछे गईं — और ब्रा के हुक को पकड़कर हल्की झुँझलाहट और चाह के साथ खींचा।
'चक' की हल्की सी आवाज़ आई — जैसे एक दरवाज़ा खुला हो।

शालू की साँस थमी… उसकी आँखें एक पल को खुलीं, फिर खुद ही उसने खुद को राहुल की छाती से सटा लिया — पूरी तरह, बेझिझक।

अब उनके बीच कोई परत नहीं थी… न कपड़ों की, न मन की।

राहुल ने उसके बालों में उंगलियाँ फिराईं, और फिर उसकी पीठ पर अपनी हथेली रख दी —
धीरे-धीरे नीचे उतरती हुई, जैसे हर स्पर्श से उसकी देह को पढ़ रहा हो।

शालू की साँसें अब उसके कान में गर्म भाप की तरह महसूस हो रही थीं।

उसने धीरे से फुसफुसाया —
"अब अधूरा मत छोड़ना… क्योंकि आज मैंने खुद को पूरा तुम्हारे हवाले किया है।"

राहुल ने उसका माथा चूमा — और फिर होंठों से उसकी रूह को।
उस रात, देह नहीं… दो आत्माएँ नज़दीक आईं।
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे — न कोई परत, न कोई पर्दा।
ना तन पर, ना मन में।

उनकी साँसें धीमी थीं, लेकिन भीतर एक तूफ़ान चल रहा था —
जैसे दो आत्माएँ पहली बार एक-दूसरे को पूरी तरह महसूस कर रही हों।

शालू ने राहुल के चेहरे को छूते हुए फुसफुसाया —
"अब कोई फासला नहीं बचा…"

राहुल ने उसके माथे को चूमा और कहा —
"और कोई डर भी नहीं…"

उस रात उन्होंने एक-दूसरे को केवल देखा नहीं…
समझा, छुआ, और अपनाया —
हर स्तर पर, पूरी तरह।


शालू के हाथों में अब वो था —
राहुल की देह का सबसे निजी, सबसे सच बोलता हिस्सा।

उसने उसे ऐसे थामा…
जैसे कोई पुरानी प्यास को हथेलियों से छूकर तसल्ली दे रही हो।
उंगलियाँ धीमे-धीमे चलीं…
कभी कसकर… कभी हल्के से…
हर छुअन के साथ राहुल की साँसों की गति तेज़ होती जा रही थी।

"तेरा ये हिस्सा… इतना ज़िंदा क्यों है?"
शालू ने गाल के पास से मुस्कराकर पूछा, आँखें नीची, मगर होंठों पर आग।

राहुल (धड़कती आवाज़ में):
"क्योंकि तूने इसे जागने की इजाज़त दी है…"

फिर शालू ने अपनी नज़दीकी और बढ़ा दी —
अब सिर्फ़ हाथ नहीं… उसके होठों की गर्मी भी राहुल की मर्दानगी को महसूस कर रही थी।

हर छुअन में कोई भूख थी…
हर सिसकी में कोई लहर उठ रही थी —
जैसे दोनों ने खुद को सालों से रोका हो, और अब इजाज़त मिल गई हो सब कुछ ख़त्म कर देने की,
हर परत, हर दूरी, हर लिहाज़।

"तेरे जिस्म की गर्मी अब मेरी साँसों से पिघल रही है, राहुल…"
शालू ने फुसफुसाया —
"अब तू बस रुक मत जाना… मैं तुझमें जलना चाहती हूँ, राख तक…"

राहुल ने उसका चेहरा थामा, और उसके होठों पर झपटता हुआ चुम्बन दे दिया —
अब वो चुम्बन कोई कोमल अभिव्यक्ति नहीं था…
वो भूख थी… लपट थी… अधिकार और प्यास थी।

उसने शालू को एक झटके में सीढ़ियों पर सीने से सटा लिया —
कमर को थामा, और ज़ोर से अपनी ओर खींचा।
उसका बदन अब काँप रहा था — लेकिन उस काँपने में डर नहीं… सिर्फ़ इजाज़त थी।

शालू (काँपती हुई):
"आज मेरा सब कुछ तेरा है… जिस रूप में चाहे, जैसे चाहे… छीन ले मुझे…"

fight to be continue........
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