28-09-2019, 02:59 PM
एक बार कहीं से एक जोगी घूमता फिरता न जाने कहाँ से उस गाँव में आ गया। उसने लाल जी के घर का पता पूछा। और लाल जी के घर पहुँच गया। लाल जी ने जब एक अनजान आदमी को देखा तो वो तुरंत तैयार हो गए की फिर से उसी ने किसी को पकड़ा होगा जिससे ये जोगी बुलाने आया है।
"लाल जी आपसे एक बात करनी है। क्या आप मेरे साथ थोड़ी देर के लिए बाहर आएंगे ?" जोगी ने लाल जी से कहा। लाल जी को उनके बड़े भाई को भी थोड़ी हैरानी हुयी के बुलाने नहीं आय सिर्फ बात करने आये हैं। जोगी लाल जी को एक किनारे ले गए।
"मैंने एक पहलवान जेसे आदमी को वहां रेल की पटरी पर देखा है वो मर चुका है। उसने मुझे तुम तक ये सन्देश देने को कहा है की तुम उसे दारू पिलाओ एक निश्चित समय अंतराल पर। क्या तुम जानते हो उसे?" जोगी ने लाल जी से कहा।
इतना कहना की लाल जी ने सारी अपनी व्यथा जोगी को सुना दी और कहा की" शायद ये मेरी भाग्य ही है जो मुझे अपने आलस्य की सज़ा इस कदर मिल रही है।"
जोगी ने सारी बात सुनी और कहा के "मैं तुम्हे इससे निजात दिल सकता हूँ मगर तुम्हे इसके लिए एक दारू की बोतल के साथ मेरे साथ आना होगा वहीँ पर।"
लाल जी को तो जैसे भगवान् मिल गए आखिर किसी ने तो कहा की वो उन्हें निजात दिला सकता है। लाल जी फिर उस जोगी के कहने पर छत से भी कूद जाते। वो इस बात के लिए राज़ी हो गए। लाल जी ने उन्हें अपने घर में ही ठहराया। वो एक विचरण करते जोगी थे। उस वक़्त में इस तरह के साधू अक्सर हुआ करते थे। जो अपना ठिकाना एक जगह नहीं बनाते थे और जन कल्याण में जीवन समर्पित कर देते थे।
वो लाल जी के घर एक दिन रुके और सिर्फ फलाहार किया। रात में उन्होंने लाल जी उस पहलवान के स्थान पर जाकर एक बोतल शराब रख आने को कहा और फिर लाल जी सो जाने के लिए कह कर खुद रात भर जागते रहे और न जाने बिना किसी सामग्री के कौन सी क्रिया करी।
सुबह उठ कर उन्होंने एक डिबिया सी दिखाई लाल जी को उनके बड़े भाई को और कहा के इसे रख लो जब कभी पहलवान से कोई काम करवाना हो तो ये डिबिया खोल कर थोड़ी सी शराब पिला देना, तुम्हारा सारा कहा मानेगा। लेकिन इस डिबिया को कभी खाली मत करना। लेकिन लाल जी और उनके बड़े भाई दोनों ने उसे रखने से मना कर दिया और भेंट स्वरुप जोगी बाबा को नए वस्त्र दिए। जिसे उन्होंने ख़ुशी से स्वीकार किया और अपने रस्ते चल दिए।
लाल जी के लिए तो वो साक्षात् भगवान् का अवतार थे। तब से लाल जी ने निर्णय लिया की आलस्य को दुबारा हावी नहीं होने देंगे। और न ही बिना जाने कहीं भी किसी को भी भोग देंगे।
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दोस्तों इस घटना को जानने के बाद ये सीख मिली है कई लोगों को की, कहीं भी किसी के भी नाम से भोग नहीं देना चाहिए। क्योकि हम नहीं जानते की उसे कौन ले रहा है। कई लोग इस तरह से भोग अर्पित करते हैं। याद रखिये हर भोग विधिवत होना चाहिए। यूँ ही बिना जानकारी के सिर्फ नाम लेकर अर्पित किया गया भोग अक्सर दूसरी शक्तियां ही ग्रहण करती हैं और इसकी आदि हो जाती हैं। इसलिए बिना किसी जानकार की सलाह के इसे कार्य बिलकुल न करें।
धन्यवाद।
"लाल जी आपसे एक बात करनी है। क्या आप मेरे साथ थोड़ी देर के लिए बाहर आएंगे ?" जोगी ने लाल जी से कहा। लाल जी को उनके बड़े भाई को भी थोड़ी हैरानी हुयी के बुलाने नहीं आय सिर्फ बात करने आये हैं। जोगी लाल जी को एक किनारे ले गए।
"मैंने एक पहलवान जेसे आदमी को वहां रेल की पटरी पर देखा है वो मर चुका है। उसने मुझे तुम तक ये सन्देश देने को कहा है की तुम उसे दारू पिलाओ एक निश्चित समय अंतराल पर। क्या तुम जानते हो उसे?" जोगी ने लाल जी से कहा।
इतना कहना की लाल जी ने सारी अपनी व्यथा जोगी को सुना दी और कहा की" शायद ये मेरी भाग्य ही है जो मुझे अपने आलस्य की सज़ा इस कदर मिल रही है।"
जोगी ने सारी बात सुनी और कहा के "मैं तुम्हे इससे निजात दिल सकता हूँ मगर तुम्हे इसके लिए एक दारू की बोतल के साथ मेरे साथ आना होगा वहीँ पर।"
लाल जी को तो जैसे भगवान् मिल गए आखिर किसी ने तो कहा की वो उन्हें निजात दिला सकता है। लाल जी फिर उस जोगी के कहने पर छत से भी कूद जाते। वो इस बात के लिए राज़ी हो गए। लाल जी ने उन्हें अपने घर में ही ठहराया। वो एक विचरण करते जोगी थे। उस वक़्त में इस तरह के साधू अक्सर हुआ करते थे। जो अपना ठिकाना एक जगह नहीं बनाते थे और जन कल्याण में जीवन समर्पित कर देते थे।
वो लाल जी के घर एक दिन रुके और सिर्फ फलाहार किया। रात में उन्होंने लाल जी उस पहलवान के स्थान पर जाकर एक बोतल शराब रख आने को कहा और फिर लाल जी सो जाने के लिए कह कर खुद रात भर जागते रहे और न जाने बिना किसी सामग्री के कौन सी क्रिया करी।
सुबह उठ कर उन्होंने एक डिबिया सी दिखाई लाल जी को उनके बड़े भाई को और कहा के इसे रख लो जब कभी पहलवान से कोई काम करवाना हो तो ये डिबिया खोल कर थोड़ी सी शराब पिला देना, तुम्हारा सारा कहा मानेगा। लेकिन इस डिबिया को कभी खाली मत करना। लेकिन लाल जी और उनके बड़े भाई दोनों ने उसे रखने से मना कर दिया और भेंट स्वरुप जोगी बाबा को नए वस्त्र दिए। जिसे उन्होंने ख़ुशी से स्वीकार किया और अपने रस्ते चल दिए।
लाल जी के लिए तो वो साक्षात् भगवान् का अवतार थे। तब से लाल जी ने निर्णय लिया की आलस्य को दुबारा हावी नहीं होने देंगे। और न ही बिना जाने कहीं भी किसी को भी भोग देंगे।
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दोस्तों इस घटना को जानने के बाद ये सीख मिली है कई लोगों को की, कहीं भी किसी के भी नाम से भोग नहीं देना चाहिए। क्योकि हम नहीं जानते की उसे कौन ले रहा है। कई लोग इस तरह से भोग अर्पित करते हैं। याद रखिये हर भोग विधिवत होना चाहिए। यूँ ही बिना जानकारी के सिर्फ नाम लेकर अर्पित किया गया भोग अक्सर दूसरी शक्तियां ही ग्रहण करती हैं और इसकी आदि हो जाती हैं। इसलिए बिना किसी जानकार की सलाह के इसे कार्य बिलकुल न करें।
धन्यवाद।
