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Adultery Mother and Son : A taboo affair 3
#21

फिर मैं और शालिनी दोनों एक-दूसरे की बाँहों में लेटे रहे।

जब शालिनी का दर्द कुछ कम हुआ तो वो उठी और वाशरूम जाने लगी और पांच मिनट बाद जब वापस आई तो चहकते हुए बोली- ओए अनुज तूने तो शादी की पहली रात याद दिला दी।

तो मैंने भी उत्सुकता से पूछा- वो कैसे?

तो आंटी बोली- अरे जब मैंने पति के साथ पहली बार किया था तब भी मुझे बहुत दर्द हुआ था और खून से तो मेरे कपड़े भी खराब हो गए थे.. पर कुंवारी चूत और कुंवारी गांड फड़वाने में थोड़ा अंतर लगा।

तो मैंने भी मुस्कुराते हुए पूछा- क्या?

शालिनी आंटी बोली- उस दिन बहुत खून बहा था जिसके थोड़ी देर बाद में वाशरूम गई तो खून हल्का-हल्का बह रहा था.. पर आज तो सिर्फ हल्का-हल्का ही निकला.. मैं यही देखने गई थी।

तो मैं उसकी बात सुनकर ताली बजाकर हँसने लगा।

आंटी मुझसे बोली- तुम्हें हँसी क्यों आई?

तो मैंने बोला- सच में.. तुम्हें कुछ मालूम नहीं पड़ा।

आंटी बोली- क्यों.. क्या हुआ?

तो मैंने उसे उसका गाउन दिखाया जिस पर खून की दो-चार बूँदें टपकी हुई थीं। क्योंकि उसका गाउन नीचे ही पड़ा था और पहले मैंने ही उसे देखा था और एक तरफ कर दिया था।

फिर उसे वो सोख्ता पैड दिखाया जो कि मेरे वीर्य और उसके खून से सना हुआ था।

तो आंटी आश्चर्यचकित होते हुए मेरे पास आई और ‘आई लव यू’ कहते हुए मुझे चूमते हुए बोली- अनुज तुम सच में मेरा बहुत ख़याल रखते हो.. तुम तो मुझे तो मालूम ही न चलने देते.. अगर मैं कुछ न कहती।

फिर वो अपने गाउन को उठा कर बोली- जान फिर तो उस दिन की तरह मुझे आज भी अपनी गांड भी फिर से मरवानी पड़ेगी.. ताकि अब दुबारा चूत की तरह गांड में भी दर्द न हो.. तुम एक काम करो.. मोबाइल में एक गेम और खेलो और मैं तुम्हारे लिए चाय लाती हूँ.. पर पहले इसे धोने के लिए डाल दूँ

यह बोलकर शालिनी आंटी चली गई।

फिर थोड़ी देर बाद शालिनी आंटी चाय लेकर आते ही बोली- लो चाय पियो और दिमाग फ्रेश करो और फिर अपना खेल चालू करो।

फिर मैं बोला- अरे वाह मेरी जानू.. तुम तो बहुत अच्छे से मुझे जान चुकी हो कि मुझे गर्म चाय पसंद हैं।

फिर हम दोनों ने चाय पी और कुछ देर बैठे ही बैठे एक-दूसरे को बाँहों में लेकर प्यार भरी बातें करने लगे जिससे कुछ ही देर में शालिनी फिर से गर्माते हुए बोली- अनुज मैं सोच रही हूँ जैसे मैंने शादी की पहली रात को तीन-चार बार किया था.. वैसे ही आज भी करूँ.. पता नहीं ये समा फिर कब इस तरह रंगीन हो।

ये कहते हुए उसने अपना हाथ मेरे लौड़े पर रख दिया और मेरी आँखों में देखते हुए मुझसे बात करते-करते मेरे लौड़े को मुठियाने लगी।

उसकी इस अदा पर में’ फ़िदा ही हो गया था.. आज भी जब कल्पना करता हूँ.. उसके खुले रेशमी बाल.. बड़ी आँखें उसके होंठ.. समझ लो आज भी बस यही सोचकर मुट्ठ मार लेता हूँ।

खैर.. अब कहानी में आते हैं..

तो मैं उसके इस रूप पर इतना मोहित हो गया कि बिना कुछ बोले बस एकटक उसे ही देखता रहा… जैसे कि मैं उसे अपनी कल्पनाओं में चोदे जा रहा हूँ.. और देखते ही देखते मैंने उसके होंठों पर अपने होंठों से आक्रमण कर दिया और उसे बेतहाशा मदहोशी के आगोश में आकर चूमने चाटने लगा।
जिससे शालिनी का भी स्वर बदल गया और उसकी बोलती बंद हो गई और बीच-बीच में बस ‘आआह्ह्ह श्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. ऊऊम्म’ के स्वर निकालने लगी।

मैं उसके चूची ऐसे चूसे जा रहा था जैसे गाय के पास जाकर उसका बछड़ा उसके थनों से दूध चूसता है।

फिर कुछ देर बाद देखा तो वो भी मेरी ही तरह से पूरी तरह से मदहोशी के आगोश में आकर अपने दूसरे निप्पल को रगड़कर दबाते हुए, ‘आह्ह्ह्ह्ह श्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. उउउउउम..’ की ध्वनि निकाल रही थी.. जिससे कि मेरा जोश और बढ़ गया।

मैंने उसे वैसे ही लिटाया और उसके पैरों के बीच खड़ा होकर.. उसकी चूत में एक ही बार में लंड डालकर.. उसे जबरदस्त तरीके से गर्दन को बाएं हाथ से पलंग पर दबाकर तेज़ ठोकरों के साथ चोदने लगा।

शालिनी की सीत्कार ‘आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह’ चीत्कार में बदल गई।

‘अह्ह्हह्ह.. बहुत मज़ा आ रहा है अनुज.. बस ऐसे ही करते आह्ह्ह्ह रहो..।’

देखते ही देखते आंटी का शरीर ढीला पड़ गया और मैं भी उसके साथ तो नहीं… पर उसके शांत होते ही अपने लौड़े का गर्म उबाल.. उगल दिया।

फिर उसके चुचियों पर सर रखकर आराम करने लगा।

सच बताऊँ दोस्तों इसमें हम दोनों को बहुत मज़ा आया था।

थोड़ी देर यू हीं लेटे रहने के बाद शालिनी आंटी मेरे सर को अपने हाथों से सहलाते हुए चूमने लगी और बोली- अनुज तुम मेरे साथ जब भी.. कैसे भी.. करते हो, मुझे बहुत अच्छा लगता है और सुकून मिलता है.. मुझे अपना प्यार इसी तरह देते रहना।

मैंने बोला- तुमसे भी मुझे बहुत सुकून मिलता है.. तुम परेशान मत होना जान.. मैं हमेशा तुम्हें ऐसे ही प्यार देता रहूँगा।

फिर वो मुझे चूमते हुए बोली- आगे की तो जंग छुड़ाकर ऑयलिंग कर दी.. पर अब पीछे की बारी है।

तो मैंने हैरान होते हुए उसकी आँखों में झाँका.. तो वो तुरंत बोली- क्यों क्या हुआ.. ऐसा मैंने क्या बोल दिया.. जो इतना हैरान हो गए?

तो मैंने बोला- अरे कुछ नहीं..

वो बोली- है तो कुछ.. मुझसे न छिपाओ.. अब बोल भी दो।

तो मैंने बोला- अरे तुम्हारे पीछे दर्द होगा.. तो क्या बर्दास्त कर लोगी? मैंने देखा था.. महसूस भी किया था तुम्हें बहुत तकलीफ हुई थी।

तो मुस्कुराते हुए बोली- अले मेले भोलू लाम.. तुम सच में बहुत प्यारे हो.. मेरा बहुत ख़याल रखते हो.. पर तुम्हें जानकर ख़ुशी होगी कि अब तालाब समुन्दर हो गई है.. चाहो तो खुद देख लो।

वो मेरा हाथ पकड़ कर अपनी गांड के छेद पर रखते हुए बोली- खुद ही अपनी ऊँगली डालकर देख लो..

तो मैंने उसकी गांड में दो ऊँगलियां डालीं.. जो कि आराम से चली गईं।

कुछ देर बाद फिर जब मैंने तीन डालीं तो उसे हल्का सा दर्द महसूस हुआ..
पर वो बोली- चलो अब जल्दी से इस दर्द को भी दूर कर दो।

मैंने बोला- अच्छा.. फिर से तेल या मक्खन लगा लो।

तो वो बोली- अरे अब उसकी जरुरत नहीं है.. मैं हूँ न.. बस तुम सीधे होकर लेट जाओ।

फिर मैं सीधा ही लेट गया.. शालिनी अपने हाथ से मेरे लंड को मुठियाते हुए मुँह में भरकर चूसने लगी.. जिससे मेरा लौड़ा फिर आनन्द की किश्ती में सवार होकर झूम उठा और जब उसके मुँह से लौड़ा निकलता तो उसके माथे पर ऐसे टीप मारता.. जैसे कहता हो, ‘पगली.. ठीक से चूस..’

फिर मैंने शालिनी को बोला- जल्दी से इसे ले लो.. वरना ये ऐसे ही उबाल खाकर भावनाओं के सागर में बह जाएगा।

तो आंटी ने भी वैसा ही किया और मुँह में ज्यादा सा थूक भरकर.. मेरे लौड़े को तरबतर करके.. खुद ही मैदान सम्हालते हुए मेरे ऊपर आ गई।

वो मेरे लौड़े को अपनी गांड के छेद पर टिकाकर धीरे-धीरे नीचे को बैठने लगी और उसकी थूक की चिकनाई के कारण आराम से उसकी गांड ने मेरा पूरा लौड़ा निगल सा लिया था।

उसकी गांड की गर्माहट पाकर मेरे अन्दर मनोभावनाओं में फिर से तूफ़ान सा जाग उठा और मैं भी कमर चलाकर उसे नीच से ठोकते हुए लंड की जड़ तक उसकी गांड में डालने लगा।

इतना आनन्द भरा समा चल रहा था कि दोनों सब कुछ भूलकर एक-दूसरे को ठोकर मारने में लगे थे।

शालिनी ऊपर से नीचे.. तो मैं नीचे से ऊपर की ओर कमर चला रहा था।

शालिनी लगातार ‘अह्ह्हह्ह उउउउम..’ करते-करते चूत से पानी बहाए जा रही थी.. जिसकी कुछेक बूँदें मेरे पेट पर गिर चुकी थीं।
उसको इतना मज़ा आ रहा था कि बिना चूत में कुछ डाले ही चरमोत्कर्ष के कारण स्वतः ही उसकी चूत का बाँध छूट गया और उसका कामरस मेरे पेट पर ही गिरने लगा।

और देखते ही देखते शालिनी ने निढाल सा होकर पलंग पर घुटने टिका कर.. लंड को अन्दर लिए ही मेरी छाती पर सर रख दिया और अपने हाथों से मेरे कंधों को सहलाने लगी।

जिससे मेरा जोश भी बढ़ने लगा और मैंने अपने हाथों से उसके चूतड़ों को पकड़ा और मज़बूती से पकड़ते हुए नीचे से जबरदस्त स्ट्रोक लगाते हुए उसकी गांड मारने लगा।

जिससे वो सीत्कार ‘श्ह्ह्ह्ह्ह्ह आआआअह..’ करते हुए जोश में आने लगी और मेरी छातियों को चूमने चाटने लगी।

मैंने रफ़्तार बढ़ा कर उसे चोदते हुए उसकी गांड में अपनी कामरस की बौछार कर दी।

झड़ने के साथ ही शालिनी को अपनी बाँहों में जकड़ कर उसके सर को चूमते हुए उसे प्यार करने लगा।

ऐसा लग रहा था.. जैसे सारी दुनिया का सुख भोगकर आया हूँ।

फिर उस रात मैंने थोड़ी-थोड़ी देर रुक रूककर शालिनी की गांड और चूत मारी.. करीब पांच बजे के आस-पास हम दोनों एक-दूसरे की बाँहों में निर्वस्त्र ही लिपटकर सो गए।
...........

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अब फिर करीब 11 बजे के आस-पास मेरी आँख खुली तो देखा शालिनी कमरे में नहीं थी, तो मैं उठा और उसको आवाज़ दी।

जब कोई जवाब न मिला तो मैंने सोचा कहीं शुभम आ तो नहीं गया.जल्दबाज़ी में बिना चड्डी के ही लोअर डाला और चड्डी को लोअर की जेब में रख ली।
मैं फ्रेश होने सीधा वाशरूम गया.. फिर फ्रेश होकर बाहर के कमरे की ओर चल दिया और देखने का प्रयास करने लगा कि ये लोग आए कि नहीं पर घर की शांति माहौल बता रही थी कि अभी शुभम नहीं आया हैं।

तो मैं बिना किसी आवाज़ किए रसोई की ओर चल दिया.. तो पाया कि शालिनी बालों को खोले और बहुत ही सरीके से साड़ी पहने हुए खाना पकाने में जुटी थी।
गर्दन से लेकर कमर तक का उसका हिस्सा खुला था.. जिस पर ब्लाउज की मात्र तीन इंची पट्टी थी।
उसके खुले बाल भीगे नज़र आ रहे थे.. जैसे कुछ ही देर पहले नहा कर आई हो..

उफ.. क्या माल दिख रही थी.. जैसे कि कोई हुस्न की परी जन्नत से उतर आई हो..

मैं उसके इस रूप-सौंदर्य को देखते ही अपना आपा खो बैठा और जाते ही लपककर उसको पीछे से अपनी बाँहों में भर लिया.. उसकी भीगी गर्दन पर जीभ फिराते हुए चुम्बन करने लगा।
उसके बालों से आ रही मादक खुशबू ने मुझे इतना मदहोश कर दिया कि मैं उसे अपनी ओर घुमाकर उसके सर को पकड़कर उसके होंठों को चूसते हुए तो कभी उसके कानों और गालों में चूमते हुए उसकी पीठ सहलाते-सहलाते.. उसके ब्लाउज में पीछे की ओर से ऊँगलियां डालते हुए उसकी ब्रा का हुक खोलने लगा.. जो कि कुछ ही पलों में खुल गया।

जिसका पता शालिनी को भी तभी चला, जब ब्रा का हुक खुलते ही उसकी पीठ पर थोड़ा रगड़ सा गया।

वो भी मेरी इस क्रिया में मेरा साथ देते-देते इतना मदहोश हो चुकी थी कि वो भी अपना होश खोकर मुझे अपने सीने से लगाकर.. अपनी चूचियों को मेरी छाती से रगड़ते हुए मेरे होंठों को चूसे जा रही थी।

फिर जब उसे हुक की रगड़ से होश आया तो मुझसे बोली- अनुज जाओ.. जल्दी जाकर नहा लो.. शुभम अभी आता ही होंगा।
तो मैंने बोला- क्या उनसे बात की?
आंटी बोली- नहीं.. अभी नहीं की।
तो मैंने पूछा- अच्छा मेरा फ़ोन कहाँ है रात को तो बिस्तर पर ही था.. पर जब सोकर उठा तो वहाँ मेरा फ़ोन नहीं दिखाई दिया।

शालिनी बोली- अरे वो शुभम के कमरे में चार्जिंग पर लगा है.. तुम्हारा बैग वहीं था और सुबह जब उठी तो तुम्हारा फोन ‘लो-बैटरी’ की वार्निंग दे रहा था। तो मैंने उसे चार्जिंग पर लगा दिया।

खैर.. मैंने शालिनी से बोला- ओके.. मैं अभी देखता हूँ कि शुभम कहाँ पहुँचा है।

तो शालिनी बोली- हाँ.. पूछ लो वक्त तो हो गया.. पर अभी तक नहीं आए..

मैंने आंटी को फिर से गले लगाया और उसके होंठ को चुम्बन देते हुए बोला- शालिनी ये हसीन पल.. पता नहीं कब मेरी जिंदगी में आएंगे.. मैं बहुत ही याद करूँगा।

तो शालिनी ने मेरे लहराते हुए मदमस्त नाग के समान लौड़े को पकड़ते हुए मुझसे बोली- अनुज तुम्हें नहीं पता.. तुमने इन दो दिनों में मुझे क्या दिया है.. आज इतना अच्छा लग रहा है, जितना कि पहले कभी न लगा, काश.. हम साथ रह पाते.. पर तुम परेशान न हो, तुम्हें मैं कैसे भी करके मज़ा देती और लेती रहूँगी।

यह कहते हुए उसने अपनी आँखों को बंद करते हुए गर्मजोशी के साथ मेरे लबों पर अपने लबों को चुभाते हुए चुम्बन करने लगी।

मैं और वो दोनों एक-दूसरे को बाँहों में जकड़े हुए प्यार कर रहे थे.. तभी शालिनी ने अचानक अपनी आँखें खोलीं और बोली- अनुज तुम्हारा तो नहीं पता.. पर मेरा छोटा अनुज (यानि मेरा लंड ) हमेशा मेरे लिए बेकरार रहता है.. देखो कैसे तुम्हारे लोअर के अन्दर से ही फुदक-फुदककर मेरे पेट को छेड़ रहा है।

मैंने बोला- सही ही तो है.. अब पता नहीं कब मौका मिले.. चलो एक बार मिलन करवा ही दें।

तो शालिनी डरते हुए लहज़े में बोली- अरे नहीं.. अभी नहीं.. उनका आने का समय हो चुका है।

तो मैंने बोला- तो कौन सा शुभम आ गए.. तुम तो बेकार ही घबरा रही हो.. अब एक काम करो.. मैं फ़ोन करने जा रहा हूँ.. अगर मैं पांच मिनट में न आऊँ.. तो समझ लेना अपना मिलन होकर ही रहेगा।

तुम गैस बंद करके वहीं शुभम के कमरे में आ जाना।

तो आंटी बोली- हाँ.. ये सही रहेगा.. तुम शुभम की लोकेशन लो.. तब तक मैं बचे काम खत्म करके आती हूँ।

फिर मैं ख़ुशी से झूमते हुए मतवाले हाथी के समान शुभम के कमरे की ओर चल पड़ा और जाते ही फ़ोन लगाया और काल की.. तो शूभम ने ही फ़ोन उठाया।

मैंने उससे पूछा- अबे तू अभी तक नहीं आया.. कहाँ फंसा है?

तो शुभम बोला- अरे कोई नहीं यार.. आ तो गया हूँ.. पर पिछले दस मिनट से गाड़ी आउटर पर खड़ी है.. प्लेटफॉर्म में पहुँचे.. तो काम बने।

तो मैंने पूछा- अरे कोई सिग्नल हुआ अभी कि नहीं?

तो शुभम बोला- शायद मालगाड़ी की वजह से रुकी पड़ी है.अब देखो कितना समय लगता है.. हो सकता है तीस मिनट और लग जाएँ।

मेरा मन उसकी यह बात सुनकर ख़ुशी में झूम उठा और मैंने मन ही मन खुश होकर शुभम से बोला- अरे कोई बात नहीं आराम से आओ वैसे भी आज का खाना मैं खाकर ही जाऊँगा..

इस तरह दो-अर्थी शब्दों में बाते करते हुए मैंने फोन रख दिया.. तब तक शालिनी आई और मेरे चेहरे के भावों से भांप गई कि शुभम को अभी और देर लगेगा आने में ।

आंटी मुझसे बोली- क्या बात है.. लगता है तुम्हें अब मन चाहा फल देना ही पड़ेगा..

तो मैंने भी उससे झूट बोलते हुए कहा- अभी उनको दो घंटे और लगेंगे.. उनकी ट्रेन शहर से दूर कहीं सिग्नल न मिलने के कारण खड़ी हो गई है.अब अगर मैं ये कहता कि गाड़ी स्टेशन के आउटर पर खड़ी है.. तो शायद वो मना भी कर सकती थी और डरते हुए चुदाई करने में वो मज़ा कहाँ.. जो पूरे इत्मीनान के साथ करने में मिलता है।

खैर.. शालिनी भी ख़ुशी से फूली न समाई और आकर मुझे अपनी बाँहों में भींच लिया और अपने होंठों से मेरे होंठों को चूमने लगी।

मैं भी उसे अपनी बाँहों में जकड़े हुए प्यार से चूमने-चाटने लगा और उसकी गर्दन पर जैसे ही चूमा.. वैसे ही उसके बालों से आ रही खुश्बू जो कि आज ही उसने धोए थे. से मैं मदहोश सा हो गया और उसे अपनी गोद में उठाकर उसे शुभम वाले बिस्तर पर लिटा दिया।

अब मैं उसके भीगे बालों की खुशबू लेने लगा। उसके बाल भीगे होने से तकिया भी गीला होने लगा.. मैं उसे और वो मुझे बस पागलों की ही तरह चूमे-चाटे जा रहा था।

फिर उसने मुझे ऊपर की ओर धकेला और मुझे नीचे लेटने को बोला।

मैं कुछ समझ पाता.. उसके पहले ही उसने अपनी पैंटी निकाली और फिर मेरा लोअर हटा के वहीं पलंग के नीचे डाल दी और मेरे ऊपर आकर मेरी जांघों पर बैठते हुए अपने ब्लाउज के हुक खोलने लगी।

मैं इतना बेताब हो गया कि बिना उसके खोले ही उसके चूची नोचने-दबाने लगा। जिससे उसके मुँह से चीख निकल गई और बोली- यार दो मिनट रुक नहीं सकते।

तो मैंने बोला- इतना मदहोश कर देती हो कि होश ही नहीं रहता।

तभी शालिनी ने ब्लाउज निकाल दिया और मेरे होंठों को चूसते हुए मेरा सर सहलाने लगी। फिर मैंने अपने दोनों हाथों को उसकी पीठ पर ले जाकर उसकी ब्रा का हुक खोल दिया और उसकी पीठ सहलाते हुए सके चूतड़ों को रगड़ते हुए उन पर चाटें मारने लगा..
जिससे शालिनी चिहुँक उठी।

अब तो उसे भी मेरी इस अदा पर मज़ा आने लगा था और मेरे हर तरीके का मज़े से स्वागत करने लगी थी.. जैसे कि वो मेरी आदी हो चुकी हो।

उधर मेरा लंड जो कि अब बेकरार हो चुका उसकी चूत से रगड़ खाते हुए उसकी चूत के मुहाने पर तन्नाते हुए अपना सर पटकने लगा था.. मानो कह रहा हो कि अब तुम लोगों का हो गया हो तो अब मेरी बारी आ गई है।

तभी मुझे भी होश आया कि वो लोग कभी भी घर पहुँच सकते हैं.. तो मैंने धीरे से अपने हाथों से उसके चुचियों दबाने चालू किए.. जिससे शालिनी की सीत्कार निकलने लगी।

वो भी गर्म जोशी के साथ अपनी गर्दन उठा कर लहराती हुई जुल्फों से पानी की बूँदें टपकाती हुई ‘आआह.. उउउम्म्म्म और जोर से अनुज.. आआआह.. ऐसे ही करो.. आआअह..’ बोलने लगी।

तभी मैंने महसूस किया कि शालिनी की चूत का पानी रिस कर मेरी जांघों और लौड़े के अगल-बगल बह रहा है।

फिर मैंने शालिनी के चूतड़ों को पकड़कर थोड़ा सा ऊपर उठाया और अपना सीधे हाथ से लौड़े को पकड़कर उसकी चूत पर सैट करने लगा। तो शालिनी ने मोर्चा सम्हालते हुए खुद ही अपने हाथ से मेरे पप्पू को पकड़ा और उस पर अपनी चूत टिका एक ही बार में ‘गच्च’ से बैठ गई।

चूत के रसिया जाने से मेरा लंड भी बिना किसी रुकावट के उसकी चूत में लैंड हो गया और अब बल खाते हुए अपनी कमर चला-चला कर हुमक के ऊपर-नीचे होने लगी।
यार.. मैं तो उसका चेहरा ही देखता रह गया।
उसके जोश को देखकर एक पल के लिए मैं तो थम सा गया कि आखिर आज शालिनी को क्या हो गया है.. वो एक भूखी शेरनी की तरह एक के बाद एक मेरे लौड़े पर अपनी चूत से वार करने लगी और निरंतर उसकी गति बढ़ती चली गई।

जैसे रेल की चाल चलती है.. कभी धीमे-धीमे और बीच में तेज़ और जब रूकती है तो फिर धीमे-धीमे.. ठीक उसी तरह शालिनी कि भी गति अब बढ़ चुकी थी। वो इतनी मदहोशी के साथ सब कर रही थी कि उसका अब खुद पर कोई काबू नहीं रहा था और वो अपनी आँखों को बंद किए हुए अपने निचले होंठों को मुँह से दाबे हुए दबी आवाज़ में ‘श्ह्ह्ह्ह्ह्ह.. आआआअह.. उम्म्म्म्म्..’ करती हुई मेरे सीने को अपने हाथों से सहला रही थी..
जिससे मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था और मैं भी उससे बोलने लगा- शालिनी.. अब कर दो मेरे लंड पर प्यार की बरसात.. अब मेरा लंड अन्दर की और गर्मी बर्दास्त नहीं कर सकता..

इतना कहते ही मैंने उसकी पीठ को सहलाते हुए उसके तरबूज सामान चूतड़ों को भींचते हुए कसकर पकड़ लिया।

अब मैं भी अपनी कमर चलाने लगा.. जिससे शालिनी का बांध कुछ ही धक्कों के बाद टूट गया और वो हाँफते हुए मेरे सीने पर सर टिका कर झुक गई। अब वो इस स्थिति में अपनी गांड उठाए हुए मेरा लंड अपनी चूत में खाने लगी.. जिससे मुझे भी मज़ा आने लगा और मैं भी नीचे से तेज़ी के साथ कमर चलाते हुए उसकी चूत बजाने लगा।

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि मैंने ये बजाना शब्द क्यों प्रयोग किया.. तो आपको बता दूँ कि उसकी चूत से इतना ज्यादा पानी डिस्चार्ज हुआ था.. और मेरे लौड़े के बार-बार अन्दर-बाहर होने से गप्प-गप्प और चप्प-चप्प की आवाजें आ रही थीं.. जो कि एक अलग प्रकार के जोश को बढ़ाने के लिए काफी थी। उधर शालिनी की भी कराहें भी बढ़ गईं और प्यार भरी सीत्कार ‘आआआह.. आह.. उम..उम्म्म..’ के साथ भारी-भारी सांसें मेरे सीने पर गिर रही थीं।

उसकी गर्म सांसें मेरे रोम-रोम से टकरा कर कह रही थीं कि अब आ जाओ और पानी डाल कर बुझा दो.. इन गर्म साँसों को.. और कर दो ठंडा..

मैं भी पूरी तल्लीनता के साथ अपने चरमोत्कर्ष के मार्ग पर आगे बढ़ता हुआ उसकी चूत पर लंड की ठोकर जड़ने लगा। इतने में ही डोर बेल बजी.. जिससे शालिनी सकते में आ गई और घबरा गई।

वास्तव में हम दोनों पसीने से लथपथ तो थे ही.. अब आँखों में घबराहट के डोरे भी साफ़ दिखने लगे और उधर लगातार डोर-बेल बजे ही जा रही थी।

मेरा मन तो कर रहा था जाऊँ और जाकर उस बेल को तोड़ दूँ.. पर करता भी तो क्या? मेरा अभी भी हुआ नहीं था तो मैं जल्दी से उठा और अपना लोअर पहना और उसी से जुड़े हुए बाथरूम में चला गया।

जल्द-बाज़ी में शालिनी ने भी अपनी साड़ी सही की जो अस्तव्यस्त हो गई थी और चड्डी वहीं पलंग के ऊपर पड़ी भूल गई थी।
वो अपने कपड़े सुधारने के बाद बिस्तर बिना सही किए ही चिल्लाते हुए चली गई।

‘आ रही हूँ.. पता नहीं कौन है.. बार-बार परेशान कर रहा है..’

उधर मैं भी अपना हाथ जगन्नाथ करने में जुटा था और अपना पानी बहाते हुए मैं थोड़ी देर वहीं बैठ गया.. अब मुझे क्या पता कि जल्दबाजी में लोअर उठाने के चक्कर में मेरी चड्डी जो कि शुभम के पलंग के नीचे रह गई थी और शालिनी की चूत रस से भीगी चड्डी बिस्तर पर ही पड़ी थी।

खैर.. तब तक मुझे कमरें में कुछ हलचल महसूस हुई.. तो मैंने सोचा अब निकलना चाहिए ताकि बहाना बना सकूँ कि मैं फ्रेश हो रहा था और मैं कैसे दरवाज़ा खोलता।

खैर.. मैं धीरे से अपना मुँह धोते हुए बाहर निकला.. तो मैं हक्का-बक्का सा रह गया क्योंकि अभी अभी कॉलेज से आई , अंकिता के हाथों में मेरी और शालिनी की चड्डी थीं.. उसके दाए हाँथ में मेरी और बाएं हाथ में शालिनी की.. और वो बड़े ही गौर से मेरी चड्डी को बिस्तर पर रखकर शालिनी की चड्डी के गीले भाग को बड़े ही गौर से देखते हुए सूंघने लगी और अपनी ऊँगली से छूकर शायद ये देख रही थी कि ये चिपचिपा-चिपचिपा सा क्या है?

इतने में मैंने अपनी मौजूदगी को जाहिर करते हुए तेज़ी से बाथरूम का गेट बंद किया.. जिससे अंकिता भी हड़बड़ा गई और उस चड्डी को बिस्तर पर फेंकते हुए मुझसे बोली- तुम यहाँ क्या कर रहे थे?

तो मैंने बाथरूम की ओर इशारा करते हुए बोला- यहाँ क्या करते हैं?

वो अंकिता बोली- मैं उसकी बात नहीं कर रही हूँ।

‘तो किसकी बात कर रही हो?’

वो बेड को दिखाते हुए बोली- यहाँ की..!

तो मैंने सोचा.. इसको तो अब कुछ तो बताना ही होगा.. मैं बहुत असमंजस में पड़ते हुए बोला- यहाँ सोता था..

तो अंकिता मेरी और शालिनी की चड्डी उठाते हुए बोली- ये सब क्या है?

वो गीला तकिया जो कि शालिनी के गीले बालों से भीगा सा लग रहा था।

अब मैंने मन ही मन सोचा कि शुभम के यहाँ आने के पहले इसका कुछ तो करना ही पड़ेगा..
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Messages In This Thread
Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 18-04-2025, 02:37 PM
Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 13-10-2026, 08:09 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 14-10-2026, 06:40 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 17-10-2026, 03:10 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 17-10-2026, 03:15 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 18-10-2026, 03:15 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Raghu - 18-10-2026, 09:22 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 20-10-2026, 05:06 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 20-10-2026, 05:15 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 22-10-2026, 01:10 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 22-10-2026, 06:45 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 22-10-2026, 06:57 PM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 27-10-2026, 11:51 AM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 31-10-2026, 11:19 AM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 31-10-2026, 11:23 AM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 31-10-2026, 11:31 AM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Dhamakaindia108 - 31-10-2026, 11:52 AM
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 10 hours ago
RE: Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 10 hours ago
Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 19-04-2025, 08:57 AM
Mother secret Affair episode 2 - by Puja3567853 - 19-04-2025, 10:01 PM
Mother and Son : A taboo affair 3 - by Puja3567853 - 20-04-2025, 10:20 AM



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