3 hours ago
बाबाजी ने ऋचा की आँखों में गहरी नजर डालते हुए कहा,
“मुझे पता है कि तुम्हारे मन में अभी भी बहुत सारी उलझनें हैं। ये सब एक बार में नहीं समझ आएगा। इसके लिए मुझे तुम्हें विस्तार से, छू-छूकर, व्यावहारिक रूप में समझाना पड़ेगा। लेकिन ये फैसला तुम्हें लेना है। यहाँ कोई जबरजस्ती नहीं, सब कुछ तुम पर ही निरभर करता है बेटी।”
बाबाजी ने थोड़ा रुककर, उसकी प्रतिक्रिया देखते हुए आगे कहा,
“तुम अभी घर जाओ। रात भर सोचो। अगर तुम्हें लगे कि तुम ये जानना चाहती हो, कि चुदाई क्या होती है, कि शरीर को कैसा सुख मिलता है, तो कल ट्यूशन के बाद मुझे बता देना। मैं तुम्हें सब कुछ… प्रैक्टिकल रूप में समझा दूँगा।” रचयिता मैत्री पटेल है।
ऋचा को बात का पूरा मतलब समझ आ गया। उसके गाल इतने लाल हो गए कि लग रहा था वो फट जाएँगे। उसकी नजर अनायास ही बाबाजी की धोती की तरफ चली गई, जहाँ एक मोटी, लंबी हलचल साफ़ दिख रही थी। उसका दिल जोरों से धड़का। चूत में अचानक एक गर्म लहर उठी और उसने अपनी जाँघें कसकर दबा लीं।
बिना कुछ बोले, वह जल्दी-जल्दी अपना बैग समेटकर उठी और लगभग भागती हुई बाहर निकल गई।
रात - ऋचा का कमरा
रात के करीब 1 बजे थे। पूरा घर सो चुका था। ऋचा अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी। कमरे में सिर्फ एक छोटी नाइट लैंप जल रही थी। उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। बाबाजी की बातें उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थीं।
उसकी मनोवैज्ञानिक सोच:
‘बाबाजी ने कहा था कि सेक्स में रिश्ते मायने नहीं रखते… सिर्फ जिस्म मायने रखता है। लेकिन पापा… पापा तो मेरे पिता हैं। उन्होंने मुझे जन्म दिया। मुझे पाला। फिर उन्होंने मेरे साथ वो सब क्यों किया? क्या उन्हें भी मेरी चूत चाहिए थी? क्या उन्हें भी मेरे शरीर से आकर्षण था?’
उसने तकिए को कसकर सीने से लगाया। उसके छोटे स्तन दब गए।
‘जब पापा ने मेरी चूत को छुआ था… तब जो गर्मी हुई थी, वो अजीब-सी अच्छी लगी थी। डर के साथ-साथ एक मीठी सिहरन भी हुई थी। लेकिन वो शराब पीकर थे… बाबाजी तो शांत हैं, समझदार हैं… और… बहुत अनुभवी लगते हैं।’
उसने आँखें बंद कीं।
‘बाबाजी का लंड… धोती के ऊपर से भी बहुत मोटा दिख रहा था। पापा का तो मैंने सिर्फ हाथ से महसूस किया था… लेकिन बाबाजी तो कह रहे हैं कि वो मुझे सब कुछ सिखाएंगे। चुदाई सिखाएंगे। क्या वो मेरा पहला लंड बनेंगे? क्या मेरी चूत में पहली बार उनका मोटा लंड जाएगा?’ सहनिर्मात्री सौनी पटेल।
उसकी एक उँगली अनायास ही अपनी जाँघों के बीच चली गई। पैंटी पहले से ही हल्की गीली थी।
‘पापा के साथ तो गलत है… वो पाप है। लोग जान गए तो क्या कहेंगे? लेकिन बाबाजी… वो गुरु हैं। सब उन्हें मानते हैं। अगर उन्होंने मुझे चोदा भी तो कोई नहीं जानेगा। और उन्होंने कहा कि शरीर की भूख शांत करनी जरूरी है… वरना मन उलझता रहता है।’
उसने करवट बदली। अब उसकी साँसें भारी हो रही थीं।
‘पापा ने तो मुझे जबरदस्ती किया था… जबकि बाबाजी मुझे पूछ रहे हैं। मुझे चुनाव का मौका दे रहे हैं। बाबाजी के हाथ नरम हैं… उनकी गोद गर्म है… उनकी आवाज में एक आकर्षण है जो पापा में नहीं था। अगर मुझे किसी से चुदवाना ही है तो… बाबाजी से बेहतर कौन हो सकता है?’
फिर एक पल में शर्म का भाव आया।
‘नहीं… ये सब गलत है। मैं अभी छोटी हूँ। लेकिन… मेरी चूत तो बार-बार गीली हो रही है। जब बाबाजी ने “चुदाई” कहा था, तब मेरे शरीर में जो झुरझुरी आई थी… वो पापा के स्पर्श से भी नहीं आई थी।’
उसने तकिए में मुँह छुपा लिया। पथनिर्देशिका फनलवर।
‘कल अगर मैं हाँ कह दूँ… तो बाबाजी मुझे नंगी करके… मेरी चूत को छूएंगे… चूसेंगे… और फिर अपना लंड अंदर डालेंगे। क्या दर्द होगा? क्या मजा आएगा? क्या मैं रोऊँगी… या चीखूँगी?’
ऋचा के मन में दो हिस्से लड़ रहे थे:
डर और नैतिकता वाला हिस्सा: पापा के साथ हुआ वो गलत था। बाबाजी से भी गलत होगा।
जिज्ञासा और उत्तेजना वाला हिस्सा: शरीर को जो सुख चाहिए, वो पापा ने अधूरा छोड़ा था। बाबाजी उसे पूरा कर सकते हैं। और वो सुरक्षित भी लगते हैं।
आखिरकार रात के 3 बजे तक सोचते-सोचते उसका मन झुकने लगा - बाबाजी की तरफ।
क्योंकि बाबाजी में पावर थी, रहस्य था, अनुभव था… और सबसे बड़ी बात - उसकी सहमति थी।
*************************************************************************.
मैत्री पटेल की प्रस्तुति।
“मुझे पता है कि तुम्हारे मन में अभी भी बहुत सारी उलझनें हैं। ये सब एक बार में नहीं समझ आएगा। इसके लिए मुझे तुम्हें विस्तार से, छू-छूकर, व्यावहारिक रूप में समझाना पड़ेगा। लेकिन ये फैसला तुम्हें लेना है। यहाँ कोई जबरजस्ती नहीं, सब कुछ तुम पर ही निरभर करता है बेटी।”
बाबाजी ने थोड़ा रुककर, उसकी प्रतिक्रिया देखते हुए आगे कहा,
“तुम अभी घर जाओ। रात भर सोचो। अगर तुम्हें लगे कि तुम ये जानना चाहती हो, कि चुदाई क्या होती है, कि शरीर को कैसा सुख मिलता है, तो कल ट्यूशन के बाद मुझे बता देना। मैं तुम्हें सब कुछ… प्रैक्टिकल रूप में समझा दूँगा।” रचयिता मैत्री पटेल है।
ऋचा को बात का पूरा मतलब समझ आ गया। उसके गाल इतने लाल हो गए कि लग रहा था वो फट जाएँगे। उसकी नजर अनायास ही बाबाजी की धोती की तरफ चली गई, जहाँ एक मोटी, लंबी हलचल साफ़ दिख रही थी। उसका दिल जोरों से धड़का। चूत में अचानक एक गर्म लहर उठी और उसने अपनी जाँघें कसकर दबा लीं।
बिना कुछ बोले, वह जल्दी-जल्दी अपना बैग समेटकर उठी और लगभग भागती हुई बाहर निकल गई।
रात - ऋचा का कमरा
रात के करीब 1 बजे थे। पूरा घर सो चुका था। ऋचा अपने बिस्तर पर करवटें बदल रही थी। कमरे में सिर्फ एक छोटी नाइट लैंप जल रही थी। उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। बाबाजी की बातें उसके दिमाग में बार-बार घूम रही थीं।
उसकी मनोवैज्ञानिक सोच:
‘बाबाजी ने कहा था कि सेक्स में रिश्ते मायने नहीं रखते… सिर्फ जिस्म मायने रखता है। लेकिन पापा… पापा तो मेरे पिता हैं। उन्होंने मुझे जन्म दिया। मुझे पाला। फिर उन्होंने मेरे साथ वो सब क्यों किया? क्या उन्हें भी मेरी चूत चाहिए थी? क्या उन्हें भी मेरे शरीर से आकर्षण था?’
उसने तकिए को कसकर सीने से लगाया। उसके छोटे स्तन दब गए।
‘जब पापा ने मेरी चूत को छुआ था… तब जो गर्मी हुई थी, वो अजीब-सी अच्छी लगी थी। डर के साथ-साथ एक मीठी सिहरन भी हुई थी। लेकिन वो शराब पीकर थे… बाबाजी तो शांत हैं, समझदार हैं… और… बहुत अनुभवी लगते हैं।’
उसने आँखें बंद कीं।
‘बाबाजी का लंड… धोती के ऊपर से भी बहुत मोटा दिख रहा था। पापा का तो मैंने सिर्फ हाथ से महसूस किया था… लेकिन बाबाजी तो कह रहे हैं कि वो मुझे सब कुछ सिखाएंगे। चुदाई सिखाएंगे। क्या वो मेरा पहला लंड बनेंगे? क्या मेरी चूत में पहली बार उनका मोटा लंड जाएगा?’ सहनिर्मात्री सौनी पटेल।
उसकी एक उँगली अनायास ही अपनी जाँघों के बीच चली गई। पैंटी पहले से ही हल्की गीली थी।
‘पापा के साथ तो गलत है… वो पाप है। लोग जान गए तो क्या कहेंगे? लेकिन बाबाजी… वो गुरु हैं। सब उन्हें मानते हैं। अगर उन्होंने मुझे चोदा भी तो कोई नहीं जानेगा। और उन्होंने कहा कि शरीर की भूख शांत करनी जरूरी है… वरना मन उलझता रहता है।’
उसने करवट बदली। अब उसकी साँसें भारी हो रही थीं।
‘पापा ने तो मुझे जबरदस्ती किया था… जबकि बाबाजी मुझे पूछ रहे हैं। मुझे चुनाव का मौका दे रहे हैं। बाबाजी के हाथ नरम हैं… उनकी गोद गर्म है… उनकी आवाज में एक आकर्षण है जो पापा में नहीं था। अगर मुझे किसी से चुदवाना ही है तो… बाबाजी से बेहतर कौन हो सकता है?’
फिर एक पल में शर्म का भाव आया।
‘नहीं… ये सब गलत है। मैं अभी छोटी हूँ। लेकिन… मेरी चूत तो बार-बार गीली हो रही है। जब बाबाजी ने “चुदाई” कहा था, तब मेरे शरीर में जो झुरझुरी आई थी… वो पापा के स्पर्श से भी नहीं आई थी।’
उसने तकिए में मुँह छुपा लिया। पथनिर्देशिका फनलवर।
‘कल अगर मैं हाँ कह दूँ… तो बाबाजी मुझे नंगी करके… मेरी चूत को छूएंगे… चूसेंगे… और फिर अपना लंड अंदर डालेंगे। क्या दर्द होगा? क्या मजा आएगा? क्या मैं रोऊँगी… या चीखूँगी?’
ऋचा के मन में दो हिस्से लड़ रहे थे:
डर और नैतिकता वाला हिस्सा: पापा के साथ हुआ वो गलत था। बाबाजी से भी गलत होगा।
जिज्ञासा और उत्तेजना वाला हिस्सा: शरीर को जो सुख चाहिए, वो पापा ने अधूरा छोड़ा था। बाबाजी उसे पूरा कर सकते हैं। और वो सुरक्षित भी लगते हैं।
आखिरकार रात के 3 बजे तक सोचते-सोचते उसका मन झुकने लगा - बाबाजी की तरफ।
क्योंकि बाबाजी में पावर थी, रहस्य था, अनुभव था… और सबसे बड़ी बात - उसकी सहमति थी।
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मैत्री पटेल की प्रस्तुति।



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