31-10-2026, 11:31 AM
हम कुछ देर यूँ ही एक-दूसरे को चूमते रहे..
फिर आंटी के दिमाग में पता नहीं क्या सूझा वो उठकर गई और फ्रिज से बर्फ के टुकड़े ले आई।
यार सच कहूँ तो मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि ये सब क्या करने वाली है।
फिर उसने मेरे लंड को पकड़कर उसकी अच्छे से सिकाई की..
यार दर्द तो चला गया पर बर्फ का अधिक प्रयोग हो जाने से वो सुन्न सा पड़ गया था।
मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे मतवाले लंड को किसी ने मार दिया हो और अन्दर ही अन्दर बहुत डर सा गया था कि अब क्या होगा.. अगर इसमें तनाव आना ख़त्म हो गया.. तो क्या होगा?
मेरे चेहरे के चिंता के भावों को पढ़कर शालिनी बोली- अरे अनुज क्या हुआ.. तुम इतना उलझन में क्यों लग रहे हो?
तो मैंने बोला- मेरा दर्द तो ठीक हो गया.. पर मुझे अब ये डर है कि इसमें जान भी बची है कि नहीं?
तो शालिनी मुस्कुरा दी और हँसते हुए बोली- तुमने कभी सुना है.. ‘अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना..’ अब तुमने मेरे मुँह में जबरदस्ती सब कुछ किया.. तो तुम भुगत रहे हो.. पर अब जो मैं तुम्हारे दर्द को दूर करने के लिए कर रही हूँ.. उससे शायद मैं खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जा रही हूँ।
मैं उसकी बातों को सुनकर आश्चर्य में पड़ गया कि आखिर शालिनी के कहने का मतलब क्या है.. सब कुछ मेरी समझ के बाहर था।
तो मैंने उससे बोला- साफ़-साफ़ बोलो.. कहना क्या चाहती हो?
आंटी बोली- अरे जान.. तुम्हें नहीं मालूम.. अगर बर्फ से सिकाई अच्छे से की जाए.. जब तक की लंड की गर्मी न शांत हो जाए और उसके बाद जो सेक्स करने का समय होता है.. वो बढ़ जाता है और अब तुम परेशान न हो.. परेशान तो मुझे होना चाहिए कि पता नहीं आज मेरा क्या होने वाला है.. और अब मुझे पता है कि इसमें कैसे तनाव आएगा.. पर मेरी एक शर्त है।
तो मैं बोला- क्या?
तो शालिनी आंटी बोली- पहले बोलो कि मान जाओगे..
मैंने भी बोला- ठीक है.. मान जाऊँगा।
तो शालिनी आंटी बोली- एक तो आज तक पीछे छेद में मैंने किसी के साथ सेक्स नहीं किया है.. तो तुम फिर से मेरे मुँह की तरह वहाँ जबरदस्ती कुछ नहीं करोगे और पहले मेरी चूत की खुजली मिटाओगे.. तुम्हें नहीं मालूम ये साली छिनाल.. बहुत देर से कुलबुला रही है..
तो मेरे दिमाग में भी एक हरकत सूझी कि बस एक बार किसी तरह शालिनी मेरा ‘लंड ’ खड़ा कर दे.. तो इसको भी बर्फ का मज़ा चखाता हूँ।
मैंने उससे बोला- ठीक है.. मुझे मंजूर है..
तो वो बर्फ ट्रे लेकर जाने लगी और बोली- अभी आई।
तो मैंने बोला- अरे ये ट्रे मुझे दे दो.. तब तक मैं इससे अपनी सिकाई करता हूँ।
वो मुझे ट्रे देकर चली गई।
अब आखिर उसे कैसे पता चलता कि उसके साथ अब क्या होने वाला है।
फिर कुछ ही देर में वो मक्खन का डिब्बा लेकर आ गई और बोली- जानू.. अब तैयार हो जाओ.. देखो मैं कैसे अपने राजाबाबू को अपने इशारे पर ठुमके लगवाती हूँ।
तो मैंने हल्की सी मुस्कान देकर अपनी सहमति जता दी।
अब बारी उसकी थी तो उसने अपने गाउन की डोरी खोली और उसे अपने बदन से लटका रहने दिया और फिर वो एक हलकी पट्टीनुमा चड्डी को दिखाते हुए ही मेरे पास आ गई और मेरे सीने से चिपक कर गर्मी देने लगी और मेरे होंठों को चूसते हुए मेरे बदन पर हाथों को फेरने लगी..
जिससे मेरे बदन में प्रेम की लहर दौड़ने लगी।
उसकी इस क्रिया में मैंने सहयोग देते हुए और कस कर अपनी बाँहों में कस लिया.. फिर उसके होंठों को चूसना प्रारम्भ कर दिया।
देखते ही देखते हम लोग आनन्द के सागर में डुबकी लगाने लगे और फिर शालिनी ने अचानक से अपना हाथ मेरे लौड़े पर रखकर देखा.. जो कि अभी भी वैसा ही था।
तो वो अपने होंठों को मेरे होंठों से हटाकर बोली- लगता है इसको स्पेशल ट्रीटमेंट देना होगा।
मैं बोला- कुछ भी कर यार.. पर जल्दी कर।
तो शालिनी उठी और मुझे पलंग के कोने पर बैठने को बोला.. तो मैं जल्दी से उठा और बैठ गया।
मेरे इस उतावलेपन को देखकर आंटी हँसते हुए बोली- अरे अनुज.. अब होश में रहना.. नहीं तो यूँ ही रात निकल जाएगी.. फिर बाद में कुछ भी न कहना।
मैं बोला- यार वो एक बार हो गया… अब ऐसे कभी नहीं करूँगा.. पर दर्द तो जरूर दूँगा.. जब तुझे दर्द में सिसियाते हुए देखता हूँ और तेरी दर्द भरी चीखें मेरे कानों में जाती हैं.. तो मेरा जोश और बढ़ जाता है.. पर अब दर्द देने वाली जगह पर ही दर्द दूँगा।
तो वो हँसते हुए बोली- बड़ा मर्द बनने का शौक है तुझे.. चल देखती हूँ कि तू कितना दर्द देता है.. मुझे भी तेरे दर्द देने वाली जगह पर दर्द देने में एक अजीब से प्यार की अनुभूति होती है.. जो कि मुझे तेरा दीवाना बनाए हुए है।
यह कहते हुए उसने मक्खन निकाला और मेरे लौड़े पर मलने लगी।
फिर ऊपरी सतह पर लगाने के बाद उसने थोड़ा मक्खन और निकाला और मेरे लौड़े की खाल को खींचकर सुपाड़े पर हल्के-हल्के नर्म उँगलियों का स्पर्श देते हुए मलने लगी।
मैंने ध्यान से देखा तो सुपाड़े का रंग गुलाबी न होकर कुछ कुछ बैंगनी सा हो गया था.. तो मैं चिंता में पड़कर सोचने लगा कि ये गुलाबी से बैंगनी कैसे हो गया?
तो मेरे दिमाग में आया या तो यह चोट के कारण है.. या फिर बर्फ की ठंडक का कमाल है?
खैर.. अब सब कुछ मैंने शालिनी पर छोड़ दिया था।
फिर उसने सहलाते हुए मेरे लौड़े को फिर से अपने मुख में ढेर सारा थूक भर कर ले लिया और अपने होंठों से मेरे लौड़े पर पकड़ मजबूत बना दी.. जिससे मुझे मेरे सामान पर गर्मी का अहसास होने लगा।
फिर कुछ देर यूँ ही रखने के बाद शालिनी बिना होंठों को खोले अन्दर ही अन्दर मेरे लौड़े के सुपाड़े को चूसने लगी.. जैसे कोई हाजमोला की गोली चूस रही हो।
उसकी इस चुसाई से मेरे लौड़े में जगी नई तरंगें मुझे महसूस होने लगीं और समय के गुजरने के साथ साथ मेरा लौड़े ने फिर से शालिनी के मुँह की गर्मी पाकर हिलोरे मारने शुरू कर दिए..
जिसे शालिनी ने भी महसूस किया और मुझसे हँसते हुए बोली- अब होश मत खोना.. बस थोड़ा समय और दो.. देखो कैसे अभी इसे लोहे सा सख्त करती हूँ।
वो फिर से मेरे लौड़े को मुँह में भरकर चूसने लगी और चूसते हुए उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ कर अपनी दोनों चूचियों पर रख दिए।
मैंने उसके इस इशारे को समझ कर धीरे-धीरे उसके चूची मसलने लगा और कुछ ही देर में मैंने महसूस किया कि मेरे लौड़े का हाल पहले ही जैसा और सख्त हो चुका था।
तो मैंने शालिनी के मुँह से अपने लौड़े को निकला जो कि उसके थूक और मक्खन से सना होने के कारण काफी चमकदार और सुन्दर महसूस हो रहा था.. जैसे उस पर पॉलिश की गई हो।
अब सुपाड़ा भी अपने रंग में वापसी कर चुका था.. जो कि शायद बर्फ की ठंडक के कारण नीला सा हो गया था।
फिर धीरे से मैंने शालिनी के माथे को चूमा और उसे ‘थैंक्स’ बोला.. तो शालिनी आंटी बोली- अरे इसमें थैंक्स की क्या बात है.. ये तो सब चलता है.. और किसी का भी ‘आइटम’ इतनी जल्दी खराब नहीं होता.. तभी भगवान ने इसमें हड्डियां नहीं दीं..
ये कह कर वो हँसने लगी।
तो मैंने शालिनी के कन्धों को पकड़ा और उसे उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और उसके दोनों हाथों को सर के नीचे ले जाकर उसे चूमते हुए.. उसके चुचियों को भींचने लगा।
जबकि शालिनी अभी तक इससे अनजान होते हुए बंद आँखों से मेरे होंठों का रस चूस रही थी.. उसे क्या पता की आज मैं उसे कौन सा दर्द देने वाला हूँ और फिर मैंने उसके हाथों पर थोड़ा पकड़ मजबूत की.. तो शालिनी बोली- अरे हाथों को इतना न कसो.. दर्द होता है।
तो मैंने बोला- जानेमन.. अभी तो बहुत बोल रही थीं कि दर्द में मज़ा आता है.. अब क्या हुआ.. अब तू देखती जा.. तेरे साथ क्या होने वाला है।
तो मारे आश्चर्य के उसकी दोनों आँखें बाहर निकल आईं और बहुत सहमे हुए तरीके से बोली- अब कैसा दर्द देने वाले हो.. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।
तो मैंने बोला- समझ जाओगी.. बस आँखें बंद करो और ऐसे ही लेटी रहो..
अब क्योंकि मैं उसके ऊपर था.. तो मैंने उसके ऊपर अपने शरीर का भार डाल दिया और डोरी को पहले आहिस्ते से पलंग की रैक को खींचने वाले छल्ले में बाँध दिया जिसमें कि पहले से ही लॉक लगा हुआ था।
जिसका शालिनी को बिल्कुल भी अहसास न था कि क्या हो रहा.. बल्कि वो भूखी शेरनी की तरह वासना की आग से तड़पती हुई मेरी गर्दन और छाती को चूसने और चाटने में लगी हुई थी।
फिर मैंने धीरे से अपने पैरों को सिकोड़ लिया और उसकी छाती पर ही बैठ गया ताकि वो कुछ भी न कर सके।
वो जब तक कुछ समझ पाती.. मैंने उसके हाथों में रस्सी का फन्दा सा बनाकर मज़बूती से कस दिया और उसके ऊपर से हटकर उसके होंठों को चूसने लगा.. जिससे शालिनी जो बोलना चाह रही थी.. वो बोल ही न सकी।
मैं इसी तरह निरंतर उसके होंठों को चूसते हुए उसके चुचियों को रगड़े जा रहा था जिसमें शालिनी का अंग-अंग उमंग में भरकर नाचने लगा था।
तो मैंने सोचा.. अब मौका सही है.. अब ये कुछ मना नहीं करेगी।
मैंने उसके होंठों को आज़ाद करके जैसे ही उठा और बर्फ की ट्रे हाथों में पकड़ी.. वो तुरंत ही चीखकर बोली- अरे ऊ.. अब क्या करने वाले हो.. मुझे बहुत डर लग रहा है.. प्लीज़ पहले रस्सी खोलो.. आज हो क्या गया है तुम्हें..?
पर उसे क्या पता कि आज मैं उसे दर्द ही दर्द देने वाला हूँ।
फिर मैंने शालिनी के बगल में लेटते हुए उसके दूसरे ओर ट्रे रख दी। शालिनी आंटी मुझे लगातार हाथ खोलने को बोले जा रही थी..
पर मैं उसकी बातों को अनसुना करते हुए उसके होंठों को चूसते हुए एक बर्फ के टुकड़े को लेकर उसकी गर्दन से लेकर उसकी नाभि तक धीरे-धीरे चला कर उसके बदन की गर्मी को ठंडा करने लगा।
शालिनी को भी अजीब सा लग रहा था.. उसने नहीं सोचा था कि ऐसा भी कुछ होगा। उसे एक आनन्द के साथ-साथ सर्दी का भी एहसास होने लगा था।
जब मैंने उसकी चूचियों पर बर्फ रखी तो क्या बताऊँ यार.. उसके चूची इतने गर्म और सख्त हो चुके थे कि उसकी गर्माहट पाकर बर्फ तीव्रता के साथ घुल गई और शालिनी का तनबदन तड़पने लगा , ‘अह्ह्ह ह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह..’ से सिसियाते हुए शालिनी बोली- अनुज बस कर.. अब और न तड़पा.. दे दे मुझे अपना प्यार..
मैं बोला- आज तुझे सब दूँगा.. पर थोड़ा तड़पाने के बाद..
फिर मैंने उसकी कुछ भी बिना सुने उसके चुचियों को बर्फ से सेंकने लगा। कभी एक उसका एक दूद्धू मुँह में रहता और दूसरे को बर्फ से सेंकता.. तो कभी दूसरे को मुँह में भरता और पहले वाले को बर्फ से सेंकता..
और उधर शालिनी की मादक आवाजें मुझे पागल सा बनाने के लिए काफी थीं। वो अब कमर उठाकर ‘आआआ… अह्हहह्ह श्ह्ह्ह्ह्हह उउउ..म्म्म्म्म.. अनुज बसकर.. तूने तो पूरे बदन में आज चीटियाँ दौड़ा दीं..अब मान भी जा..
पर मैंने उसकी एक न सुनी और बर्फ के टुकड़े को जैसे ही उसकी गर्दन से लगाता या कमर पर लगाता.. तो वो एक जोर की ‘आआअह्ह्ह्ह’ के साथ चिहुंक उठती।
फिर मैंने शालिनी की चड्डी एक ही झटके में हाथों से पकड़ कर उतार दी और जैसे ही मैंने फिर से बर्फ का टुकड़ा दोबारा से उठाया.. तो वो आँखें बाहर निकालते हुए बोली- अनुज.. अब बहुत हो गया.. मारेगा क्या मुझे?
तो मैं बोला- तुम बस मज़े लो.. बाक़ी का मैं लूँगा.. और अब मना करने के लिए मुँह खोला तो तुम्हारा मुँह भी बंद कर दूँगा।
अब शालिनी चुप हो गई फिर मैंने उसकी जाँघों पर.. धीरे-धीरे बर्फ रगड़ते हुए उसकी चूत के दाने पर मुँह लगाकर उसे चूसना चालू किया..
जिससे शालिनी के मुँह से दर्द के साथ मीठी.. और कानों को मधुर लगने वाली सीत्कार ‘श्ह्ह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह..’ निकलने लगी और मैं उसके चेहरे की ओर देखने लगा।
जब कुछ देर उसने मेरी जुबान का एहसास अपनी चूत पर नहीं पाया तो उसने आँखें खोलीं और मेरी ओर देखते हुए लज़्ज़ा भरे स्वर में बोली- अब क्या हुआ.. रुक क्यों गए.. करो न.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।
तो मैंने कटीली मुस्कान दी और आँख मारते हुए बोला- तुम बस मज़ा लो..
अब फिर बर्फ के टुकड़े को उसकी चूत के भीतर सरका दिया जो कि कुछ घुल सा गया था.. बर्फ का टुकड़ा लगभग आधा इंच का रहा होगा.. जिसे शालिनी की लपलपाती चूत आराम से निगल गई। पर शालिनी की चूत में बर्फ ने ऐसी खलबली मचाई कि वो जोर-जोर से ‘आअह्हह.. उम्म्म स्स्स्स्स्श्ह्ह’ के साथ अपनी कमर बिस्तर पर पटकने लगी।
सबसे ताज्जुब वाली बात तो यह थी कि उसकी चूत में इतनी गर्मी थी कि जल्द बर्फ का दम घुट गया और रिस कर बाहर बह गई.. पर इतनी देर में बर्फ ने शालिनी की चूत में जलन को बढ़ा दिया था।
मैं अभी देख ही रहा था कि शालिनी आंटी बोली- चल अब और न सता.. डाल दे अन्दर.. और मिटा दे चूत की गर्मी..
तो मैं बोला- पहले इसकी गर्मी बर्फ से शांत करता हूँ.. फिर मैं कुछ करूँगा।
वो बोली- अनुज इसकी गर्मी तो इससे और बढ़ती ही जा रही है.. अगर कोई शांत कर सकता है तो वो तेरा छोटा लंड बाबू है।
तो मैंने बोला- चलो ये भी देखते हैं..
मैंने फिर से दूसरा टुकड़ा उठाया जो कि करीब दो इंच लम्बा और ट्रे के गोल खांचे के हिसाब से मोटा था.. वो समूचा टुकड़ा मैंने आंटी की चूत में घुसेड़ दिया और उसके चूत के दाने को रगड़ते हुए उसे चूसने लगा।
यार सच बता रहा हूँ जरा भी देर न लगी.. देखते ही देखते शालिनी की चूत उसे भी डकार गई।
अबकी बार उसकी चूत में से बर्फ और चूत दोनों का मिला हुआ पानी झड़ने लगा.. जिसे मैंने उसकी चड्डी से साफ़ किया।
अब शालिनी आंटी बोली- अनुज अब अन्दर डाल दे.. मुझे बर्दाश्त नहीं होता।
तो मैंने भी सोचा वैसे भी समय बर्बाद करने से क्या फायदा.. चल अब काम पर लग ही जाते हैं।
वैसे भी अभी गांड भी मारनी है गांड मारने का ख़याल आते ही मेरा ध्यान उसके छेद पर गया जो कि काफी कसा हुआ था। मैं सोच में पड़ गया कि मेरा लौड़ा आखिर इतने छोटे और कैसे छेद को कैसे भेदेगा।
इतने में ही मेरे दिमाग में एक और खुराफात ने जन्म लिया और वो यह था कि शालिनी की गांड का छेद बर्फ से बढ़ाया जाए.. क्योंकि उसमें किसी भी तरह का कोई रिस्क भी नहीं था.. अन्दर रह भी गई तो घुल कर निकल जाएगी.. पर शालिनी तैयार होगी भी या नहीं इसी उलझन में था।
इतने में शालिनी खुद ही बोल पड़ी- अब क्या हुआ जान.. क्या सोचने लगे?
तो मैंने उससे बोला- मुझे तो पीछे करना था.. पर तुमने पहले आगे की शर्त रखी है.. पर मैं ये सोच रहा हूँ.. अगर आगे करते हुए तुम्हारी गांड में अगर बर्फ ही डालता रहूँ तो उसका छेद आसानी से फ़ैल सकता है।
वो आंटी बोली- यार तेरे दिमाग में इतने वाइल्ड और रफ आईडिया आते कहाँ से हैं?
तो मैं हँसते हुए बोला- चलो बन जाओ घोड़ी.. अब मैं तेरी सवारी भी करूँगा और तेरी गांड भी चौड़ी करूँगा।
तो वो बोली- पहले हाथ तो खोल दे.. अब मेरे हाथों में भी दर्द सा हो रहा है।
मैंने उसके हाथों की रस्सी खोली और रस्सी खुलते ही उसने मेरे सीने से चिपक कर मेरे होंठों को चूसा और मेरा लंड सहलाती हुई मेरी गर्दन पर अपनी गर्म साँसों का एहसास कराते हुए मेरे लौड़े तक पहुँच गई।
फिर से उसे मुँह में लेकर कुछ देर चूसा और फिर बिस्तर से उतार कर बिस्तर का कोना पकड़ कर घोड़ी की तरह झुक गई।
मैंने भी मक्खन लेकर अच्छे से उसकी गांड के छेद में भर दिया और अपनी ऊँगली उसकी गांड में घुसेड़ कर अच्छे से मक्खन अन्दर तक लगा दिया.. जिससे आराम से ऊँगली अन्दर-बाहर होने लगी।
फिर मैंने एक बर्फ का टुकड़ा लिया और उसकी गांड में घुसड़ने के लिए छेद पर दबाने लगा.. पर इससे शालिनी को तकलीफ होने लगी..
अब मेरा आईडिया मुझे फेल होता नज़र आ रहा था.. तो मैंने सोचा क्यों न कुछ और किया जाए।
फिर मैंने अपने लंड को पीछे से ही आंटी की चूत में डाल दिया और उसे धीरे-धीरे पीछे से लंड को गहराई तक पेलते हुए चोदने लगा.. जिससे मेरा लंड उसकी बच्चेदानी से टकरा जाता और शालिनी के मुँह से ‘आआआह स्स्स्स्स्स्स्श’ की सीत्कार फूट पड़ती।
मैं लौड़ा पेलना के साथ ही साथ उसके चूची को ऐसे दाब रहा था.. जैसे कोई हॉर्न बजा रहा हूँ।
जब मैंने देखा कि शालिनी पूरी तरह मदहोश हो चुकी थी तो मैंने फिर से ऊँगली उसके गांड के छेद में डाल दी.. जो कि आराम से अन्दर-बाहर हो रही थी।
इसी तरह दो ऊँगलियाँ एक साथ डालीं.. वो भी जब आराम से आने जाने लगीं.. तो मैंने फिर से उसकी गांड में बर्फ का टुकड़ा डाला..
पर इस बार उसकी गांड अपने आप ही खुल बंद हो रही थी और बर्फ का ठंडा स्पर्श पाते ही शालिनी का रोम-रोम रोमांचित हो उठा। उसकी सीत्कार ‘आआह्ह्ह स्स्स्श्ह्ह्ह ष्ह्ह उउउम’ उसके अन्दर हो रहे आनन्द मंथन को साफ़ ब्यान कर रही थी।
उसकी गांड की गर्मी पाकर बर्फ जब घुलने सी लगी तो उसकी ठंडी बूँदें उसकी चूत तक जा रही थीं.. जिससे शालिनी को अद्भुत आनन्द मिल रहा था, वो मस्तानी चुदक्कड़ सी सिसिया रही थी, ‘बस ऐसे ही.. अह्ह्हह्ह उउउउम.. और तेज़ करो अनुज.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.. आआआअह...
वो अपनी चूत से गर्म रस-धार छोड़ने लगी.. जिससे मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था।
एक तो बाहर बर्फ का ठंडा पानी जो कि लौड़े पर गिर रहा था और अन्दर शालिनी के जलते हुए बदन का जलता हुआ गर्म काम-रस..
मुझसे भी अब रहा नहीं जा रहा था।
जैसे रेस का घोड़ा अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए पूरी ताकत लगा देता है.. वैसे ही मैं पूरी ताकत और रफ़्तार के साथ उसकी चूत में अपना लौड़ा पेलने लगा।
जिससे शालिनी लौड़े की हर ठोकर पर ‘आआअह… अह्ह्ह् उउम्म्म ष्ह्ह स्स्स्श्ह्ह्ह’ के साथ जवाब देते-देते चोटें झेलने लगी।
उसकी आवाज़ों ने मुझे इतना मदहोश कर दिया था कि मैंने फिर से अपने होश को खो दिया और जो बर्फ का टुकड़ा उसकी गांड के छेद पर टिका रखा था, उसे किसी बटन की तरह उसकी गांड में पूरी ताकत से अंगूठे से दबा दिया.. जिससे एक ही बार में उसकी गांड में बर्फ का टुकड़ा चला गया।
अब शालिनी गहरी पीड़ा भरी आवाज़ के साथ चिल्लाने लगी- आआह्ह्ह म्मा.. माँ मार.. डाला..
उसकी तो जैसे जान ही निकल गई हो.. पर अब क्या हो सकता था उसे तो निकाला भी नहीं जा सकता था और उसकी आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया जो कि मुझे बाद में पता चला।
खैर.. अब तो मेरा काम हो ही चुका था.. और शालिनी उसी तरह अपनी टाँगें फैलाए बिस्तर पर सर रखकर झुकी-झुकी ही दर्द पर काबू पाते हुए ‘आआअह... आआआह... उउउम्म्म्म्म’ कराहने लगी।
उसके अनुभव के अनुसार उसे उस वक़्त चूत चुदाई का आनन्द और गांड में बर्फ का दर्द दोनों का मिला-जुला अहसास हो रहा था।
खैर मैंने उसी तरह शालिनी की ठुकाई करते हुए उसकी चूत में ही अपना वीर्य उगल दिया..
जिससे शालिनी को अपनी चूत में तो राहत सी मिल गई किन्तु उसकी गांड में अब खुजली बढ़ चुकी थी।
उसकी गांड की गर्मी का साफ़ पता चल रहा था क्योंकि बर्फ का टुकड़ा लगभग एक मिनट में ही पिघल कर आधा रह गया था।
तो मैंने भी वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए सोचा.. अभी लोहा गर्म है बेटा.. मार ले हथौड़ा.. नहीं तो चूक जाएगा।
मैंने तुरंत ही झुककर उसकी पीठ सहलाते हुए उसे चुम्बन भी करना चालू कर दिया और बर्फ के पिघलने से शालिनी का दर्द भी कम सा हो गया था।
उसके शरीर में रोमांच की तरंगें फिर से उमड़ने लगी थीं..
तो मैंने फिर से उसे यूँ ही प्यार देते हुए जहाँ तक ऊँगलियां जा सकती थीं.. से बचे हुए बर्फ के टुकड़े को और अन्दर करने लगा।
फिर मैं अपनी दोनों ऊँगलियां अन्दर-बाहर करते हुए आश्चर्य में था कि पहले जो आराम से नहीं हो रहा था.. पर वो अब आराम से हो रहा था।
तो मैंने फिर से एक बर्फ का टुकड़ा लिया और उसकी गांड में दबा दिया जो कि अन्दर नहीं जा पा रहा था और शालिनी फिर से ‘आआअह’ कराह उठी।
मैंने बर्फ के टुकड़े को मक्खन में सान कर फिर से उसकी गांड में झटके से दबा दिया.. तो इस बार फिर से बर्फ का टुकड़ा गांड में आराम से चला गया और ख़ास बात यह थी कि अबकी बार शालिनी को भी दर्द न हुआ।
जैसा कि उसने बाद में बताया था कि पहली बार जब अन्दर घुसा था तो उसे ऐसा लगा जैसे उसे चक्कर सा आ रहा है..
उसकी आँखें भी बंद हो चुकी थीं और काफी देर तक उसकी आँखों में अधेरा छाया रहा था.. जैसे किसी ने उसकी जान ही ले ली हो।
उसे सुनाई तो दे रहा था.. पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
खैर मैंने यूँ ही बर्फ के टुकड़े डाल डाल कर शालिनी की गांड को अच्छे से फैला दिया था।
जब बर्फ का टुकड़ा आराम से अन्दर-बाहर होने लगा.. तो मैंने भी देर न करते हुए शालिनी को चूमा और उसे उठाकर.. फिर से उसके होंठों का रसपान किया और उसके चुचियों को रगड़-रगड़ कर मसलते हुए उसकी चुदाई की आग को हवा देने लगा।
मेरा लौड़ा भी पूरे शवाब में आकर लहराते हुए उसके पेट पर उम्मीदवारी की दस्तक देने लगा.. जिसे शालिनी ने बड़े प्यार से पकड़ा और उसे चूमते हुए शालिनी बोली- बहुत जालिम हो गए हो.. अब अपनी गुड़िया को दर्द दिए बिना भी नहीं मानते।
वो कुछ इस तरह से बोल रही थी कि उसके शब्द थे तो मेरे लिए.. पर वो मेरे लौड़े के लिए लग रहे थे।
मैंने भी अपने लौड़े को लहराते हुए उससे बोला- जान बस आखिरी इच्छा और पूरी कर दे.. फिर जब तू कहेगी तेरी हर तमन्ना खुशी से पूरी कर दूँगा।
तो वो उसे मुँह में भरकर कुछ देर चूसने के बाद बोली- ले अब मार ले बाजी.. लेकिन प्यार से..
..….........
तो मैंने झट से उसे घुमाया और सर नीचे बिस्तर पर छुआने को बोला.. उसने ठीक वैसा ही किया, जिससे उसकी गांड ऊपर को उठकर मेरे सामने ऐसे आई जैसे शालिनी बोल रही हो- गॉड तुस्सी ग्रेट हो तोहफा कबूल करो..
मैंने भी फिर से मक्खन लिया और अच्छे से अपने लौड़े पर मल लिया.. फिर थोड़ा और लिया और उसकी गांड के छेद के चारों ओर मलते हुए उँगलियों से गहराई में भरने लगा।
फिर मैंने अच्छे से ऊँगलियाँ अन्दर-बाहर कीं.. जब दो ऊँगलियाँ आराम से आने-जाने लगीं.. तो मैंने शालिनी आंटी से बोला- अब तुम्हारे सब्र के इम्तिहान की घड़ी आ चुकी है.. अपनी कुंवारी गाण्ड के उद्घाटन के लिए तैयार हो जाओ और मेरे लिए दर्द सहन करना।
तो शालिनी ने दबी आवाज़ में मुँह भींचते हुए ‘हम्म’ बोला और सहमी हुई आँखें बंद किए हुए सर को बिस्तर पर टिका लिया।
फिर मैंने धीरे से अपने लौड़े को पकड़ कर उसके छेद पर दबाव बनाया लेकिन लंड अन्दर करने में नाकाम रहा।
तो मैंने आंटी से मदद मांगी।
उसने सर टिकाए हुए अपने दोनों हाथों को पीछे लाकर अपनी गांड के छेद को फैला लिया।
मैंने फिर से प्रयास किया.. इस बार कुछ सफलता मिली ही थी कि आंटी टोपे के हल्का सा अन्दर जाते ही आगे को उचक गई.. जिससे फिर से मेरा लौड़ा बाहर आ गया।
तो मैंने शालिनी से तीखे शब्दों में बोला- क्या यार.. ऐसे थोड़ी न करते हैं..
तो शालिनी सहमी हुई बोली- यार डर लग रहा है.. मैं कैसे झेलूँगी?
मैंने उसके चूतड़ों पर हाथों से चटाका लगाते हुए बोला- जैसे आगे झेलती है..
और उसकी कमर को सख्ती से पकड़ कर फिर से लौड़ा टिकाया।
तो वो फिर से उचकने लगी इसी तरह जब तीन-चार बार हो गया तो मैंने फिर से बर्फ का एक टुकड़ा लिया और उसकी गांड के छेद में जबरदस्त तरीके से चिड़चिड़ाहट के साथ दाब दिया.. जिससे शालिनी को बहुत दर्द हुआ और वो पैर सिकोड़ कर लेट सी गई.. पर बर्फ का टुकड़ा तो अन्दर अब फंस चुका था।
तो मैंने उससे बोला- अब देख.. जो दर्द होना था.. वो हो चुका.. अब बर्दास्त करके चुपचाप उसी तरह से हो जाओ.. वर्ना फिर से यही करूँगा।
वो बोली- ठीक है.. पर आराम से करना..
वो फिर उसी तरह से गांड उठाकर लेट गई.. फिर मैंने उसी बर्फ के टुकड़े के सहारे अपने लौड़े को धीरे-धीरे उसकी गांड में दबाव देते हुए डालने लगा और कमाल की बात यह थी कि उसकी गांड भी आराम से पूरा लौड़ा खा गई और अब मेरे सामान की गर्मी और शालिनी की गांड की गर्मी पाकर बर्फ अपना दम तोड़ चुकी थी।
उसकी गांड का कसाव मेरे लौड़े पर साफ़ पता चल रहा था।
फिर मैंने उसकी कमर को मजबूती से पकड़ कर अपने लंड को बाहर की ओर खींचा.. तो शालिनी के मुख से दर्द भरी घुटी सी ‘अह्ह…ह्ह’ निकल गई।
पर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे तरबूज़ के अन्दर चाकू डाल कर निकाला जाता है।
फिर मैं फिर से धीरे-धीरे उसकी गांड़ में लंड अन्दर-बाहर करने लगा जिसमे मुझे भी उसकी गांड़ के कसाव के कारण अपने लौड़े पर रगड़ महसूस हो रही थी।
शालिनी का तो पूछो ही नहीं.. उसका दर्द से बुरा हाल हो गया था.. पर मेरे कारण वो अपने असहनीय दर्द को बर्दास्त किए हुए आँखों से आँसू बहाते हुए लेटी रही।
फिर मैंने अपने लंड को टोपे से कुछ भाग अन्दर रखते हुए बाकी का बाहर निकाला और उसमें थोड़ा सा मक्खन लगाया और फिर से अन्दर डाला।
इस तरह यह प्रक्रिया 5 से 6 बार दोहराई तो मैंने महसूस किया कि अब चिकनाई के कारण लौड़ा आराम से अन्दर-बाहर आ-जा रहा था।
फिर मैंने आंटी की ओर देखा.. तो अब उसे भी राहत मिल चुकी थी। जो कि उसके चेहरे से समझ आ रही थी।
मैंने इसी तरह चुदाई करते हुए अपने लौड़े को बाहर निकाला और इस बार जब पूरा निकाल कर अन्दर डाला.. तो लौड़ा ‘सट’ की आवाज करता हुआ आराम से अन्दर चला गया.. जैसे कि उसका अब यही अड्डा हो।
इस बार शालिनी को भी तकलीफ न हुई।
मैं शालिनी आंटी से कुछ बोलता कि इसके पहले ही आंटी बोली- क्यों अब हो गई न इच्छा पूरी?
तो मैंने बोला- अभी काम आधा हुआ है।
वो आंटी बोली- चलो फिर पूरा कर लो.. तो मैंने फिर से उसकी गांड से लौड़ा निकाला और तेज़ी के साथ लौड़े को फिर से अन्दर पेल दिया जो कि उसकी जड़ तक एक ही बार में पहुँच गया।
जिससे आंटी के मुख से दर्द भरी सीत्कार, ‘अह्ह्ह ह्ह.. आआआह मार डाला स्स्स्स्श्ह्ह्ह्ह’ फूट पड़ी और आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया।
और मैं उस पर रहम खाते हुए कुछ देर यूँ ही रुका रहा और आगे को झुककर मैंने उसकी पीठ को चूमते हुए उसकी चूत में ऊँगली डालकर अन्दर-बाहर करने लगा। इसके कुछ देर बाद ही आंटी सामान्य होते हुए चूत में उँगलियों का मज़ा लेते सीत्कार करने लगी।
अब मैंने भी इसी तरह उसकी चूत में ऊँगली देते हुए उसकी गांड में लंड अन्दर-बाहर करने लगा फिर कुछ ही समय बाद चूत की खुजली मिटाने के चक्कर में शालिनी खुद ही कमर चलाते हुए तेज़ी से आगे-पीछे होने लगी और उसके स्वर अब दर्द से आनन्द में परिवर्तित हो चुके थे।
मैंने वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए अपनी भी गति बढ़ा दी और अब मेरा पूरा ‘सामान’ बिना किसी रुकावट के.. उसको दर्द दिए बिना ही आराम से अन्दर-बाहर होने लगा।
जिससे मुझे भी एक असीम आनन्द की प्राप्ति होने लगी थी.. जिसको शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है।
देखते ही देखते शालिनी की चूत रस से मेरी ऊँगलियां ऐसे भीगने लगीं जैसे किसी ने अन्दर पानी की टोंटी चालू कर दी हो।
पूरे कमरे उसकी सीत्कारें गूंज रही थी- आआआअह्ह्ह..उउम्म्म्म.. स्स्स्स..ज्ज्ज्जाअण.. आआअह.. आआइ जान बहुत मज़ा आ रहा है.. मुझे नहीं मालूम था कि इतना मज़ा भी आएगा.. शुरू में तो तूने फाड़ ही दी थी.. पर अब अच्छा लग रहा है.. तुम बस अन्दर-बाहर करते रहो.. लूट लो इसके कुंवारेपन का मज़ा..
तो मैं भी बेधड़क हो उसकी गांड में बिना रुके ऐसे लंड ठूँसने लगा.. जैसे ओखली में मूसल चल रहा हो।
उसकी चीखने की आवाजें, ‘उउउम्म्म आआअह्ह्ह् श्ह्ह्ह्ह् अह्ह्हह आह आआह’ मेरे कानों में पड़ कर मेरा जोश बढ़ाने लगीं।
जिससे मेरी रफ़्तार और तेज़ हो गई और मैं अपनी मंजिल के करीब पहुँच गया। अति-उत्तेजना मैंने अपने लौड़े को ऐसे ठेल दिया जैसे कोई दलदल में खूटा गाड़ दिया हो।
इस कठोर चोट के बाद मैंने अपना सारा रस उसकी गाण्ड के अंतिम पड़ाव में छोड़ने लगा और तब तक ऐसे ही लगा रहा.. जब तक उसकी पूरी नली खाली न हो गई।
फिर मैंने उसकी गांड को मुट्ठी में भरकर कसके भींचा और रगड़ा.. जिससे काफी मज़ा आ रहा था। और आए भी क्यों न.. शालिनी की गांड किसी स्पंज के गद्दे से काम न थी।
फिर इस क्रीड़ा के बाद मैं आगे को झुका और उसकी पीठ का चुम्बन लेते हुए.. उसकी बराबरी में जाकर लेट गया।
अब उसका सर नीचे था और गांड ऊपर को उठी थी.. तो मैं उसके गालों पर चुम्बन करते हुए उसकी चूचियों को छेड़ने लगा.. पर वो वैसे ही रही।
मैंने पूछा- क्या हुआ.. सीधी हो जाओ.. अब तो हो चुका जो होना था।
तो शालिनी अपना सर मेरी ओर घुमाते हुए बोली- अनुज तूने कचूमर निकाल दिया।
उस समय तो जोश में मैंने भी रफ़्तार बढ़ा दी थी.. पर अब जरा भी हिला नहीं जा रहा है।
तो मैंने उसे सहारा देते हुए आहिस्ते से लिटाया और मेरे लिटाते ही शालिनी की गांड मेरे लावे के साथ-साथ खून भी उलट रही थी जो कि उसके अंदरुनी भाग के छिल जाने से हो रहा था।
मैंने शालिनी के चेहरे की ओर देखा जो कि इस बात से अनजान थी। उसकी आँखें बंद और चेहरे पर ओस की बूंदों के समान पसीने की बूँदें चमक रही थीं और मुँह से दर्द भरी आवाज लगातार ‘आआआअह अह्ह्हह श्ह्ह्ह्ह’ निकाले जा रही थी।
मैं उसकी इस हालत तरस खाते हुए वाशरूम गया और सोख्ता पैड और गुनगुना पानी लाकर उसकी गांड और चूत की सफाई की.. जिससे शालिनी ने मेरे प्यार के आगोश में आकर मुझे अपने दोनों हाथ खोलकर अपनी बाँहों में लेने का इशारा किया।
तो मैं भी अपने आपको उसके हवाले करते हुए उसकी बाँहों में चला गया।
उसने मुझे बहुत ही आत्मीयता के साथ प्यार किया और बोली- तुम मेरा इतना ख़याल रखते हो.. मुझे बहुत अच्छा लगता है.. आज से मेरा सब कुछ तुम्हारा अनुज.. आई लव यू.. आई लव यू.. सो मच.. मुझे बस इसी तरह प्यार देते रहना।
फिर आंटी के दिमाग में पता नहीं क्या सूझा वो उठकर गई और फ्रिज से बर्फ के टुकड़े ले आई।
यार सच कहूँ तो मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि ये सब क्या करने वाली है।
फिर उसने मेरे लंड को पकड़कर उसकी अच्छे से सिकाई की..
यार दर्द तो चला गया पर बर्फ का अधिक प्रयोग हो जाने से वो सुन्न सा पड़ गया था।
मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे मतवाले लंड को किसी ने मार दिया हो और अन्दर ही अन्दर बहुत डर सा गया था कि अब क्या होगा.. अगर इसमें तनाव आना ख़त्म हो गया.. तो क्या होगा?
मेरे चेहरे के चिंता के भावों को पढ़कर शालिनी बोली- अरे अनुज क्या हुआ.. तुम इतना उलझन में क्यों लग रहे हो?
तो मैंने बोला- मेरा दर्द तो ठीक हो गया.. पर मुझे अब ये डर है कि इसमें जान भी बची है कि नहीं?
तो शालिनी मुस्कुरा दी और हँसते हुए बोली- तुमने कभी सुना है.. ‘अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना..’ अब तुमने मेरे मुँह में जबरदस्ती सब कुछ किया.. तो तुम भुगत रहे हो.. पर अब जो मैं तुम्हारे दर्द को दूर करने के लिए कर रही हूँ.. उससे शायद मैं खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जा रही हूँ।
मैं उसकी बातों को सुनकर आश्चर्य में पड़ गया कि आखिर शालिनी के कहने का मतलब क्या है.. सब कुछ मेरी समझ के बाहर था।
तो मैंने उससे बोला- साफ़-साफ़ बोलो.. कहना क्या चाहती हो?
आंटी बोली- अरे जान.. तुम्हें नहीं मालूम.. अगर बर्फ से सिकाई अच्छे से की जाए.. जब तक की लंड की गर्मी न शांत हो जाए और उसके बाद जो सेक्स करने का समय होता है.. वो बढ़ जाता है और अब तुम परेशान न हो.. परेशान तो मुझे होना चाहिए कि पता नहीं आज मेरा क्या होने वाला है.. और अब मुझे पता है कि इसमें कैसे तनाव आएगा.. पर मेरी एक शर्त है।
तो मैं बोला- क्या?
तो शालिनी आंटी बोली- पहले बोलो कि मान जाओगे..
मैंने भी बोला- ठीक है.. मान जाऊँगा।
तो शालिनी आंटी बोली- एक तो आज तक पीछे छेद में मैंने किसी के साथ सेक्स नहीं किया है.. तो तुम फिर से मेरे मुँह की तरह वहाँ जबरदस्ती कुछ नहीं करोगे और पहले मेरी चूत की खुजली मिटाओगे.. तुम्हें नहीं मालूम ये साली छिनाल.. बहुत देर से कुलबुला रही है..
तो मेरे दिमाग में भी एक हरकत सूझी कि बस एक बार किसी तरह शालिनी मेरा ‘लंड ’ खड़ा कर दे.. तो इसको भी बर्फ का मज़ा चखाता हूँ।
मैंने उससे बोला- ठीक है.. मुझे मंजूर है..
तो वो बर्फ ट्रे लेकर जाने लगी और बोली- अभी आई।
तो मैंने बोला- अरे ये ट्रे मुझे दे दो.. तब तक मैं इससे अपनी सिकाई करता हूँ।
वो मुझे ट्रे देकर चली गई।
अब आखिर उसे कैसे पता चलता कि उसके साथ अब क्या होने वाला है।
फिर कुछ ही देर में वो मक्खन का डिब्बा लेकर आ गई और बोली- जानू.. अब तैयार हो जाओ.. देखो मैं कैसे अपने राजाबाबू को अपने इशारे पर ठुमके लगवाती हूँ।
तो मैंने हल्की सी मुस्कान देकर अपनी सहमति जता दी।
अब बारी उसकी थी तो उसने अपने गाउन की डोरी खोली और उसे अपने बदन से लटका रहने दिया और फिर वो एक हलकी पट्टीनुमा चड्डी को दिखाते हुए ही मेरे पास आ गई और मेरे सीने से चिपक कर गर्मी देने लगी और मेरे होंठों को चूसते हुए मेरे बदन पर हाथों को फेरने लगी..
जिससे मेरे बदन में प्रेम की लहर दौड़ने लगी।
उसकी इस क्रिया में मैंने सहयोग देते हुए और कस कर अपनी बाँहों में कस लिया.. फिर उसके होंठों को चूसना प्रारम्भ कर दिया।
देखते ही देखते हम लोग आनन्द के सागर में डुबकी लगाने लगे और फिर शालिनी ने अचानक से अपना हाथ मेरे लौड़े पर रखकर देखा.. जो कि अभी भी वैसा ही था।
तो वो अपने होंठों को मेरे होंठों से हटाकर बोली- लगता है इसको स्पेशल ट्रीटमेंट देना होगा।
मैं बोला- कुछ भी कर यार.. पर जल्दी कर।
तो शालिनी उठी और मुझे पलंग के कोने पर बैठने को बोला.. तो मैं जल्दी से उठा और बैठ गया।
मेरे इस उतावलेपन को देखकर आंटी हँसते हुए बोली- अरे अनुज.. अब होश में रहना.. नहीं तो यूँ ही रात निकल जाएगी.. फिर बाद में कुछ भी न कहना।
मैं बोला- यार वो एक बार हो गया… अब ऐसे कभी नहीं करूँगा.. पर दर्द तो जरूर दूँगा.. जब तुझे दर्द में सिसियाते हुए देखता हूँ और तेरी दर्द भरी चीखें मेरे कानों में जाती हैं.. तो मेरा जोश और बढ़ जाता है.. पर अब दर्द देने वाली जगह पर ही दर्द दूँगा।
तो वो हँसते हुए बोली- बड़ा मर्द बनने का शौक है तुझे.. चल देखती हूँ कि तू कितना दर्द देता है.. मुझे भी तेरे दर्द देने वाली जगह पर दर्द देने में एक अजीब से प्यार की अनुभूति होती है.. जो कि मुझे तेरा दीवाना बनाए हुए है।
यह कहते हुए उसने मक्खन निकाला और मेरे लौड़े पर मलने लगी।
फिर ऊपरी सतह पर लगाने के बाद उसने थोड़ा मक्खन और निकाला और मेरे लौड़े की खाल को खींचकर सुपाड़े पर हल्के-हल्के नर्म उँगलियों का स्पर्श देते हुए मलने लगी।
मैंने ध्यान से देखा तो सुपाड़े का रंग गुलाबी न होकर कुछ कुछ बैंगनी सा हो गया था.. तो मैं चिंता में पड़कर सोचने लगा कि ये गुलाबी से बैंगनी कैसे हो गया?
तो मेरे दिमाग में आया या तो यह चोट के कारण है.. या फिर बर्फ की ठंडक का कमाल है?
खैर.. अब सब कुछ मैंने शालिनी पर छोड़ दिया था।
फिर उसने सहलाते हुए मेरे लौड़े को फिर से अपने मुख में ढेर सारा थूक भर कर ले लिया और अपने होंठों से मेरे लौड़े पर पकड़ मजबूत बना दी.. जिससे मुझे मेरे सामान पर गर्मी का अहसास होने लगा।
फिर कुछ देर यूँ ही रखने के बाद शालिनी बिना होंठों को खोले अन्दर ही अन्दर मेरे लौड़े के सुपाड़े को चूसने लगी.. जैसे कोई हाजमोला की गोली चूस रही हो।
उसकी इस चुसाई से मेरे लौड़े में जगी नई तरंगें मुझे महसूस होने लगीं और समय के गुजरने के साथ साथ मेरा लौड़े ने फिर से शालिनी के मुँह की गर्मी पाकर हिलोरे मारने शुरू कर दिए..
जिसे शालिनी ने भी महसूस किया और मुझसे हँसते हुए बोली- अब होश मत खोना.. बस थोड़ा समय और दो.. देखो कैसे अभी इसे लोहे सा सख्त करती हूँ।
वो फिर से मेरे लौड़े को मुँह में भरकर चूसने लगी और चूसते हुए उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ कर अपनी दोनों चूचियों पर रख दिए।
मैंने उसके इस इशारे को समझ कर धीरे-धीरे उसके चूची मसलने लगा और कुछ ही देर में मैंने महसूस किया कि मेरे लौड़े का हाल पहले ही जैसा और सख्त हो चुका था।
तो मैंने शालिनी के मुँह से अपने लौड़े को निकला जो कि उसके थूक और मक्खन से सना होने के कारण काफी चमकदार और सुन्दर महसूस हो रहा था.. जैसे उस पर पॉलिश की गई हो।
अब सुपाड़ा भी अपने रंग में वापसी कर चुका था.. जो कि शायद बर्फ की ठंडक के कारण नीला सा हो गया था।
फिर धीरे से मैंने शालिनी के माथे को चूमा और उसे ‘थैंक्स’ बोला.. तो शालिनी आंटी बोली- अरे इसमें थैंक्स की क्या बात है.. ये तो सब चलता है.. और किसी का भी ‘आइटम’ इतनी जल्दी खराब नहीं होता.. तभी भगवान ने इसमें हड्डियां नहीं दीं..
ये कह कर वो हँसने लगी।
तो मैंने शालिनी के कन्धों को पकड़ा और उसे उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया और उसके दोनों हाथों को सर के नीचे ले जाकर उसे चूमते हुए.. उसके चुचियों को भींचने लगा।
जबकि शालिनी अभी तक इससे अनजान होते हुए बंद आँखों से मेरे होंठों का रस चूस रही थी.. उसे क्या पता की आज मैं उसे कौन सा दर्द देने वाला हूँ और फिर मैंने उसके हाथों पर थोड़ा पकड़ मजबूत की.. तो शालिनी बोली- अरे हाथों को इतना न कसो.. दर्द होता है।
तो मैंने बोला- जानेमन.. अभी तो बहुत बोल रही थीं कि दर्द में मज़ा आता है.. अब क्या हुआ.. अब तू देखती जा.. तेरे साथ क्या होने वाला है।
तो मारे आश्चर्य के उसकी दोनों आँखें बाहर निकल आईं और बहुत सहमे हुए तरीके से बोली- अब कैसा दर्द देने वाले हो.. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।
तो मैंने बोला- समझ जाओगी.. बस आँखें बंद करो और ऐसे ही लेटी रहो..
अब क्योंकि मैं उसके ऊपर था.. तो मैंने उसके ऊपर अपने शरीर का भार डाल दिया और डोरी को पहले आहिस्ते से पलंग की रैक को खींचने वाले छल्ले में बाँध दिया जिसमें कि पहले से ही लॉक लगा हुआ था।
जिसका शालिनी को बिल्कुल भी अहसास न था कि क्या हो रहा.. बल्कि वो भूखी शेरनी की तरह वासना की आग से तड़पती हुई मेरी गर्दन और छाती को चूसने और चाटने में लगी हुई थी।
फिर मैंने धीरे से अपने पैरों को सिकोड़ लिया और उसकी छाती पर ही बैठ गया ताकि वो कुछ भी न कर सके।
वो जब तक कुछ समझ पाती.. मैंने उसके हाथों में रस्सी का फन्दा सा बनाकर मज़बूती से कस दिया और उसके ऊपर से हटकर उसके होंठों को चूसने लगा.. जिससे शालिनी जो बोलना चाह रही थी.. वो बोल ही न सकी।
मैं इसी तरह निरंतर उसके होंठों को चूसते हुए उसके चुचियों को रगड़े जा रहा था जिसमें शालिनी का अंग-अंग उमंग में भरकर नाचने लगा था।
तो मैंने सोचा.. अब मौका सही है.. अब ये कुछ मना नहीं करेगी।
मैंने उसके होंठों को आज़ाद करके जैसे ही उठा और बर्फ की ट्रे हाथों में पकड़ी.. वो तुरंत ही चीखकर बोली- अरे ऊ.. अब क्या करने वाले हो.. मुझे बहुत डर लग रहा है.. प्लीज़ पहले रस्सी खोलो.. आज हो क्या गया है तुम्हें..?
पर उसे क्या पता कि आज मैं उसे दर्द ही दर्द देने वाला हूँ।
फिर मैंने शालिनी के बगल में लेटते हुए उसके दूसरे ओर ट्रे रख दी। शालिनी आंटी मुझे लगातार हाथ खोलने को बोले जा रही थी..
पर मैं उसकी बातों को अनसुना करते हुए उसके होंठों को चूसते हुए एक बर्फ के टुकड़े को लेकर उसकी गर्दन से लेकर उसकी नाभि तक धीरे-धीरे चला कर उसके बदन की गर्मी को ठंडा करने लगा।
शालिनी को भी अजीब सा लग रहा था.. उसने नहीं सोचा था कि ऐसा भी कुछ होगा। उसे एक आनन्द के साथ-साथ सर्दी का भी एहसास होने लगा था।
जब मैंने उसकी चूचियों पर बर्फ रखी तो क्या बताऊँ यार.. उसके चूची इतने गर्म और सख्त हो चुके थे कि उसकी गर्माहट पाकर बर्फ तीव्रता के साथ घुल गई और शालिनी का तनबदन तड़पने लगा , ‘अह्ह्ह ह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह..’ से सिसियाते हुए शालिनी बोली- अनुज बस कर.. अब और न तड़पा.. दे दे मुझे अपना प्यार..
मैं बोला- आज तुझे सब दूँगा.. पर थोड़ा तड़पाने के बाद..
फिर मैंने उसकी कुछ भी बिना सुने उसके चुचियों को बर्फ से सेंकने लगा। कभी एक उसका एक दूद्धू मुँह में रहता और दूसरे को बर्फ से सेंकता.. तो कभी दूसरे को मुँह में भरता और पहले वाले को बर्फ से सेंकता..
और उधर शालिनी की मादक आवाजें मुझे पागल सा बनाने के लिए काफी थीं। वो अब कमर उठाकर ‘आआआ… अह्हहह्ह श्ह्ह्ह्ह्हह उउउ..म्म्म्म्म.. अनुज बसकर.. तूने तो पूरे बदन में आज चीटियाँ दौड़ा दीं..अब मान भी जा..
पर मैंने उसकी एक न सुनी और बर्फ के टुकड़े को जैसे ही उसकी गर्दन से लगाता या कमर पर लगाता.. तो वो एक जोर की ‘आआअह्ह्ह्ह’ के साथ चिहुंक उठती।
फिर मैंने शालिनी की चड्डी एक ही झटके में हाथों से पकड़ कर उतार दी और जैसे ही मैंने फिर से बर्फ का टुकड़ा दोबारा से उठाया.. तो वो आँखें बाहर निकालते हुए बोली- अनुज.. अब बहुत हो गया.. मारेगा क्या मुझे?
तो मैं बोला- तुम बस मज़े लो.. बाक़ी का मैं लूँगा.. और अब मना करने के लिए मुँह खोला तो तुम्हारा मुँह भी बंद कर दूँगा।
अब शालिनी चुप हो गई फिर मैंने उसकी जाँघों पर.. धीरे-धीरे बर्फ रगड़ते हुए उसकी चूत के दाने पर मुँह लगाकर उसे चूसना चालू किया..
जिससे शालिनी के मुँह से दर्द के साथ मीठी.. और कानों को मधुर लगने वाली सीत्कार ‘श्ह्ह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह..’ निकलने लगी और मैं उसके चेहरे की ओर देखने लगा।
जब कुछ देर उसने मेरी जुबान का एहसास अपनी चूत पर नहीं पाया तो उसने आँखें खोलीं और मेरी ओर देखते हुए लज़्ज़ा भरे स्वर में बोली- अब क्या हुआ.. रुक क्यों गए.. करो न.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।
तो मैंने कटीली मुस्कान दी और आँख मारते हुए बोला- तुम बस मज़ा लो..
अब फिर बर्फ के टुकड़े को उसकी चूत के भीतर सरका दिया जो कि कुछ घुल सा गया था.. बर्फ का टुकड़ा लगभग आधा इंच का रहा होगा.. जिसे शालिनी की लपलपाती चूत आराम से निगल गई। पर शालिनी की चूत में बर्फ ने ऐसी खलबली मचाई कि वो जोर-जोर से ‘आअह्हह.. उम्म्म स्स्स्स्स्श्ह्ह’ के साथ अपनी कमर बिस्तर पर पटकने लगी।
सबसे ताज्जुब वाली बात तो यह थी कि उसकी चूत में इतनी गर्मी थी कि जल्द बर्फ का दम घुट गया और रिस कर बाहर बह गई.. पर इतनी देर में बर्फ ने शालिनी की चूत में जलन को बढ़ा दिया था।
मैं अभी देख ही रहा था कि शालिनी आंटी बोली- चल अब और न सता.. डाल दे अन्दर.. और मिटा दे चूत की गर्मी..
तो मैं बोला- पहले इसकी गर्मी बर्फ से शांत करता हूँ.. फिर मैं कुछ करूँगा।
वो बोली- अनुज इसकी गर्मी तो इससे और बढ़ती ही जा रही है.. अगर कोई शांत कर सकता है तो वो तेरा छोटा लंड बाबू है।
तो मैंने बोला- चलो ये भी देखते हैं..
मैंने फिर से दूसरा टुकड़ा उठाया जो कि करीब दो इंच लम्बा और ट्रे के गोल खांचे के हिसाब से मोटा था.. वो समूचा टुकड़ा मैंने आंटी की चूत में घुसेड़ दिया और उसके चूत के दाने को रगड़ते हुए उसे चूसने लगा।
यार सच बता रहा हूँ जरा भी देर न लगी.. देखते ही देखते शालिनी की चूत उसे भी डकार गई।
अबकी बार उसकी चूत में से बर्फ और चूत दोनों का मिला हुआ पानी झड़ने लगा.. जिसे मैंने उसकी चड्डी से साफ़ किया।
अब शालिनी आंटी बोली- अनुज अब अन्दर डाल दे.. मुझे बर्दाश्त नहीं होता।
तो मैंने भी सोचा वैसे भी समय बर्बाद करने से क्या फायदा.. चल अब काम पर लग ही जाते हैं।
वैसे भी अभी गांड भी मारनी है गांड मारने का ख़याल आते ही मेरा ध्यान उसके छेद पर गया जो कि काफी कसा हुआ था। मैं सोच में पड़ गया कि मेरा लौड़ा आखिर इतने छोटे और कैसे छेद को कैसे भेदेगा।
इतने में ही मेरे दिमाग में एक और खुराफात ने जन्म लिया और वो यह था कि शालिनी की गांड का छेद बर्फ से बढ़ाया जाए.. क्योंकि उसमें किसी भी तरह का कोई रिस्क भी नहीं था.. अन्दर रह भी गई तो घुल कर निकल जाएगी.. पर शालिनी तैयार होगी भी या नहीं इसी उलझन में था।
इतने में शालिनी खुद ही बोल पड़ी- अब क्या हुआ जान.. क्या सोचने लगे?
तो मैंने उससे बोला- मुझे तो पीछे करना था.. पर तुमने पहले आगे की शर्त रखी है.. पर मैं ये सोच रहा हूँ.. अगर आगे करते हुए तुम्हारी गांड में अगर बर्फ ही डालता रहूँ तो उसका छेद आसानी से फ़ैल सकता है।
वो आंटी बोली- यार तेरे दिमाग में इतने वाइल्ड और रफ आईडिया आते कहाँ से हैं?
तो मैं हँसते हुए बोला- चलो बन जाओ घोड़ी.. अब मैं तेरी सवारी भी करूँगा और तेरी गांड भी चौड़ी करूँगा।
तो वो बोली- पहले हाथ तो खोल दे.. अब मेरे हाथों में भी दर्द सा हो रहा है।
मैंने उसके हाथों की रस्सी खोली और रस्सी खुलते ही उसने मेरे सीने से चिपक कर मेरे होंठों को चूसा और मेरा लंड सहलाती हुई मेरी गर्दन पर अपनी गर्म साँसों का एहसास कराते हुए मेरे लौड़े तक पहुँच गई।
फिर से उसे मुँह में लेकर कुछ देर चूसा और फिर बिस्तर से उतार कर बिस्तर का कोना पकड़ कर घोड़ी की तरह झुक गई।
मैंने भी मक्खन लेकर अच्छे से उसकी गांड के छेद में भर दिया और अपनी ऊँगली उसकी गांड में घुसेड़ कर अच्छे से मक्खन अन्दर तक लगा दिया.. जिससे आराम से ऊँगली अन्दर-बाहर होने लगी।
फिर मैंने एक बर्फ का टुकड़ा लिया और उसकी गांड में घुसड़ने के लिए छेद पर दबाने लगा.. पर इससे शालिनी को तकलीफ होने लगी..
अब मेरा आईडिया मुझे फेल होता नज़र आ रहा था.. तो मैंने सोचा क्यों न कुछ और किया जाए।
फिर मैंने अपने लंड को पीछे से ही आंटी की चूत में डाल दिया और उसे धीरे-धीरे पीछे से लंड को गहराई तक पेलते हुए चोदने लगा.. जिससे मेरा लंड उसकी बच्चेदानी से टकरा जाता और शालिनी के मुँह से ‘आआआह स्स्स्स्स्स्स्श’ की सीत्कार फूट पड़ती।
मैं लौड़ा पेलना के साथ ही साथ उसके चूची को ऐसे दाब रहा था.. जैसे कोई हॉर्न बजा रहा हूँ।
जब मैंने देखा कि शालिनी पूरी तरह मदहोश हो चुकी थी तो मैंने फिर से ऊँगली उसके गांड के छेद में डाल दी.. जो कि आराम से अन्दर-बाहर हो रही थी।
इसी तरह दो ऊँगलियाँ एक साथ डालीं.. वो भी जब आराम से आने जाने लगीं.. तो मैंने फिर से उसकी गांड में बर्फ का टुकड़ा डाला..
पर इस बार उसकी गांड अपने आप ही खुल बंद हो रही थी और बर्फ का ठंडा स्पर्श पाते ही शालिनी का रोम-रोम रोमांचित हो उठा। उसकी सीत्कार ‘आआह्ह्ह स्स्स्श्ह्ह्ह ष्ह्ह उउउम’ उसके अन्दर हो रहे आनन्द मंथन को साफ़ ब्यान कर रही थी।
उसकी गांड की गर्मी पाकर बर्फ जब घुलने सी लगी तो उसकी ठंडी बूँदें उसकी चूत तक जा रही थीं.. जिससे शालिनी को अद्भुत आनन्द मिल रहा था, वो मस्तानी चुदक्कड़ सी सिसिया रही थी, ‘बस ऐसे ही.. अह्ह्हह्ह उउउउम.. और तेज़ करो अनुज.. मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.. आआआअह...
वो अपनी चूत से गर्म रस-धार छोड़ने लगी.. जिससे मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था।
एक तो बाहर बर्फ का ठंडा पानी जो कि लौड़े पर गिर रहा था और अन्दर शालिनी के जलते हुए बदन का जलता हुआ गर्म काम-रस..
मुझसे भी अब रहा नहीं जा रहा था।
जैसे रेस का घोड़ा अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए पूरी ताकत लगा देता है.. वैसे ही मैं पूरी ताकत और रफ़्तार के साथ उसकी चूत में अपना लौड़ा पेलने लगा।
जिससे शालिनी लौड़े की हर ठोकर पर ‘आआअह… अह्ह्ह् उउम्म्म ष्ह्ह स्स्स्श्ह्ह्ह’ के साथ जवाब देते-देते चोटें झेलने लगी।
उसकी आवाज़ों ने मुझे इतना मदहोश कर दिया था कि मैंने फिर से अपने होश को खो दिया और जो बर्फ का टुकड़ा उसकी गांड के छेद पर टिका रखा था, उसे किसी बटन की तरह उसकी गांड में पूरी ताकत से अंगूठे से दबा दिया.. जिससे एक ही बार में उसकी गांड में बर्फ का टुकड़ा चला गया।
अब शालिनी गहरी पीड़ा भरी आवाज़ के साथ चिल्लाने लगी- आआह्ह्ह म्मा.. माँ मार.. डाला..
उसकी तो जैसे जान ही निकल गई हो.. पर अब क्या हो सकता था उसे तो निकाला भी नहीं जा सकता था और उसकी आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया जो कि मुझे बाद में पता चला।
खैर.. अब तो मेरा काम हो ही चुका था.. और शालिनी उसी तरह अपनी टाँगें फैलाए बिस्तर पर सर रखकर झुकी-झुकी ही दर्द पर काबू पाते हुए ‘आआअह... आआआह... उउउम्म्म्म्म’ कराहने लगी।
उसके अनुभव के अनुसार उसे उस वक़्त चूत चुदाई का आनन्द और गांड में बर्फ का दर्द दोनों का मिला-जुला अहसास हो रहा था।
खैर मैंने उसी तरह शालिनी की ठुकाई करते हुए उसकी चूत में ही अपना वीर्य उगल दिया..
जिससे शालिनी को अपनी चूत में तो राहत सी मिल गई किन्तु उसकी गांड में अब खुजली बढ़ चुकी थी।
उसकी गांड की गर्मी का साफ़ पता चल रहा था क्योंकि बर्फ का टुकड़ा लगभग एक मिनट में ही पिघल कर आधा रह गया था।
तो मैंने भी वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए सोचा.. अभी लोहा गर्म है बेटा.. मार ले हथौड़ा.. नहीं तो चूक जाएगा।
मैंने तुरंत ही झुककर उसकी पीठ सहलाते हुए उसे चुम्बन भी करना चालू कर दिया और बर्फ के पिघलने से शालिनी का दर्द भी कम सा हो गया था।
उसके शरीर में रोमांच की तरंगें फिर से उमड़ने लगी थीं..
तो मैंने फिर से उसे यूँ ही प्यार देते हुए जहाँ तक ऊँगलियां जा सकती थीं.. से बचे हुए बर्फ के टुकड़े को और अन्दर करने लगा।
फिर मैं अपनी दोनों ऊँगलियां अन्दर-बाहर करते हुए आश्चर्य में था कि पहले जो आराम से नहीं हो रहा था.. पर वो अब आराम से हो रहा था।
तो मैंने फिर से एक बर्फ का टुकड़ा लिया और उसकी गांड में दबा दिया जो कि अन्दर नहीं जा पा रहा था और शालिनी फिर से ‘आआअह’ कराह उठी।
मैंने बर्फ के टुकड़े को मक्खन में सान कर फिर से उसकी गांड में झटके से दबा दिया.. तो इस बार फिर से बर्फ का टुकड़ा गांड में आराम से चला गया और ख़ास बात यह थी कि अबकी बार शालिनी को भी दर्द न हुआ।
जैसा कि उसने बाद में बताया था कि पहली बार जब अन्दर घुसा था तो उसे ऐसा लगा जैसे उसे चक्कर सा आ रहा है..
उसकी आँखें भी बंद हो चुकी थीं और काफी देर तक उसकी आँखों में अधेरा छाया रहा था.. जैसे किसी ने उसकी जान ही ले ली हो।
उसे सुनाई तो दे रहा था.. पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
खैर मैंने यूँ ही बर्फ के टुकड़े डाल डाल कर शालिनी की गांड को अच्छे से फैला दिया था।
जब बर्फ का टुकड़ा आराम से अन्दर-बाहर होने लगा.. तो मैंने भी देर न करते हुए शालिनी को चूमा और उसे उठाकर.. फिर से उसके होंठों का रसपान किया और उसके चुचियों को रगड़-रगड़ कर मसलते हुए उसकी चुदाई की आग को हवा देने लगा।
मेरा लौड़ा भी पूरे शवाब में आकर लहराते हुए उसके पेट पर उम्मीदवारी की दस्तक देने लगा.. जिसे शालिनी ने बड़े प्यार से पकड़ा और उसे चूमते हुए शालिनी बोली- बहुत जालिम हो गए हो.. अब अपनी गुड़िया को दर्द दिए बिना भी नहीं मानते।
वो कुछ इस तरह से बोल रही थी कि उसके शब्द थे तो मेरे लिए.. पर वो मेरे लौड़े के लिए लग रहे थे।
मैंने भी अपने लौड़े को लहराते हुए उससे बोला- जान बस आखिरी इच्छा और पूरी कर दे.. फिर जब तू कहेगी तेरी हर तमन्ना खुशी से पूरी कर दूँगा।
तो वो उसे मुँह में भरकर कुछ देर चूसने के बाद बोली- ले अब मार ले बाजी.. लेकिन प्यार से..
..….........
तो मैंने झट से उसे घुमाया और सर नीचे बिस्तर पर छुआने को बोला.. उसने ठीक वैसा ही किया, जिससे उसकी गांड ऊपर को उठकर मेरे सामने ऐसे आई जैसे शालिनी बोल रही हो- गॉड तुस्सी ग्रेट हो तोहफा कबूल करो..
मैंने भी फिर से मक्खन लिया और अच्छे से अपने लौड़े पर मल लिया.. फिर थोड़ा और लिया और उसकी गांड के छेद के चारों ओर मलते हुए उँगलियों से गहराई में भरने लगा।
फिर मैंने अच्छे से ऊँगलियाँ अन्दर-बाहर कीं.. जब दो ऊँगलियाँ आराम से आने-जाने लगीं.. तो मैंने शालिनी आंटी से बोला- अब तुम्हारे सब्र के इम्तिहान की घड़ी आ चुकी है.. अपनी कुंवारी गाण्ड के उद्घाटन के लिए तैयार हो जाओ और मेरे लिए दर्द सहन करना।
तो शालिनी ने दबी आवाज़ में मुँह भींचते हुए ‘हम्म’ बोला और सहमी हुई आँखें बंद किए हुए सर को बिस्तर पर टिका लिया।
फिर मैंने धीरे से अपने लौड़े को पकड़ कर उसके छेद पर दबाव बनाया लेकिन लंड अन्दर करने में नाकाम रहा।
तो मैंने आंटी से मदद मांगी।
उसने सर टिकाए हुए अपने दोनों हाथों को पीछे लाकर अपनी गांड के छेद को फैला लिया।
मैंने फिर से प्रयास किया.. इस बार कुछ सफलता मिली ही थी कि आंटी टोपे के हल्का सा अन्दर जाते ही आगे को उचक गई.. जिससे फिर से मेरा लौड़ा बाहर आ गया।
तो मैंने शालिनी से तीखे शब्दों में बोला- क्या यार.. ऐसे थोड़ी न करते हैं..
तो शालिनी सहमी हुई बोली- यार डर लग रहा है.. मैं कैसे झेलूँगी?
मैंने उसके चूतड़ों पर हाथों से चटाका लगाते हुए बोला- जैसे आगे झेलती है..
और उसकी कमर को सख्ती से पकड़ कर फिर से लौड़ा टिकाया।
तो वो फिर से उचकने लगी इसी तरह जब तीन-चार बार हो गया तो मैंने फिर से बर्फ का एक टुकड़ा लिया और उसकी गांड के छेद में जबरदस्त तरीके से चिड़चिड़ाहट के साथ दाब दिया.. जिससे शालिनी को बहुत दर्द हुआ और वो पैर सिकोड़ कर लेट सी गई.. पर बर्फ का टुकड़ा तो अन्दर अब फंस चुका था।
तो मैंने उससे बोला- अब देख.. जो दर्द होना था.. वो हो चुका.. अब बर्दास्त करके चुपचाप उसी तरह से हो जाओ.. वर्ना फिर से यही करूँगा।
वो बोली- ठीक है.. पर आराम से करना..
वो फिर उसी तरह से गांड उठाकर लेट गई.. फिर मैंने उसी बर्फ के टुकड़े के सहारे अपने लौड़े को धीरे-धीरे उसकी गांड में दबाव देते हुए डालने लगा और कमाल की बात यह थी कि उसकी गांड भी आराम से पूरा लौड़ा खा गई और अब मेरे सामान की गर्मी और शालिनी की गांड की गर्मी पाकर बर्फ अपना दम तोड़ चुकी थी।
उसकी गांड का कसाव मेरे लौड़े पर साफ़ पता चल रहा था।
फिर मैंने उसकी कमर को मजबूती से पकड़ कर अपने लंड को बाहर की ओर खींचा.. तो शालिनी के मुख से दर्द भरी घुटी सी ‘अह्ह…ह्ह’ निकल गई।
पर मुझे ऐसा लग रहा था जैसे तरबूज़ के अन्दर चाकू डाल कर निकाला जाता है।
फिर मैं फिर से धीरे-धीरे उसकी गांड़ में लंड अन्दर-बाहर करने लगा जिसमे मुझे भी उसकी गांड़ के कसाव के कारण अपने लौड़े पर रगड़ महसूस हो रही थी।
शालिनी का तो पूछो ही नहीं.. उसका दर्द से बुरा हाल हो गया था.. पर मेरे कारण वो अपने असहनीय दर्द को बर्दास्त किए हुए आँखों से आँसू बहाते हुए लेटी रही।
फिर मैंने अपने लंड को टोपे से कुछ भाग अन्दर रखते हुए बाकी का बाहर निकाला और उसमें थोड़ा सा मक्खन लगाया और फिर से अन्दर डाला।
इस तरह यह प्रक्रिया 5 से 6 बार दोहराई तो मैंने महसूस किया कि अब चिकनाई के कारण लौड़ा आराम से अन्दर-बाहर आ-जा रहा था।
फिर मैंने आंटी की ओर देखा.. तो अब उसे भी राहत मिल चुकी थी। जो कि उसके चेहरे से समझ आ रही थी।
मैंने इसी तरह चुदाई करते हुए अपने लौड़े को बाहर निकाला और इस बार जब पूरा निकाल कर अन्दर डाला.. तो लौड़ा ‘सट’ की आवाज करता हुआ आराम से अन्दर चला गया.. जैसे कि उसका अब यही अड्डा हो।
इस बार शालिनी को भी तकलीफ न हुई।
मैं शालिनी आंटी से कुछ बोलता कि इसके पहले ही आंटी बोली- क्यों अब हो गई न इच्छा पूरी?
तो मैंने बोला- अभी काम आधा हुआ है।
वो आंटी बोली- चलो फिर पूरा कर लो.. तो मैंने फिर से उसकी गांड से लौड़ा निकाला और तेज़ी के साथ लौड़े को फिर से अन्दर पेल दिया जो कि उसकी जड़ तक एक ही बार में पहुँच गया।
जिससे आंटी के मुख से दर्द भरी सीत्कार, ‘अह्ह्ह ह्ह.. आआआह मार डाला स्स्स्स्श्ह्ह्ह्ह’ फूट पड़ी और आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया।
और मैं उस पर रहम खाते हुए कुछ देर यूँ ही रुका रहा और आगे को झुककर मैंने उसकी पीठ को चूमते हुए उसकी चूत में ऊँगली डालकर अन्दर-बाहर करने लगा। इसके कुछ देर बाद ही आंटी सामान्य होते हुए चूत में उँगलियों का मज़ा लेते सीत्कार करने लगी।
अब मैंने भी इसी तरह उसकी चूत में ऊँगली देते हुए उसकी गांड में लंड अन्दर-बाहर करने लगा फिर कुछ ही समय बाद चूत की खुजली मिटाने के चक्कर में शालिनी खुद ही कमर चलाते हुए तेज़ी से आगे-पीछे होने लगी और उसके स्वर अब दर्द से आनन्द में परिवर्तित हो चुके थे।
मैंने वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए अपनी भी गति बढ़ा दी और अब मेरा पूरा ‘सामान’ बिना किसी रुकावट के.. उसको दर्द दिए बिना ही आराम से अन्दर-बाहर होने लगा।
जिससे मुझे भी एक असीम आनन्द की प्राप्ति होने लगी थी.. जिसको शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता है।
देखते ही देखते शालिनी की चूत रस से मेरी ऊँगलियां ऐसे भीगने लगीं जैसे किसी ने अन्दर पानी की टोंटी चालू कर दी हो।
पूरे कमरे उसकी सीत्कारें गूंज रही थी- आआआअह्ह्ह..उउम्म्म्म.. स्स्स्स..ज्ज्ज्जाअण.. आआअह.. आआइ जान बहुत मज़ा आ रहा है.. मुझे नहीं मालूम था कि इतना मज़ा भी आएगा.. शुरू में तो तूने फाड़ ही दी थी.. पर अब अच्छा लग रहा है.. तुम बस अन्दर-बाहर करते रहो.. लूट लो इसके कुंवारेपन का मज़ा..
तो मैं भी बेधड़क हो उसकी गांड में बिना रुके ऐसे लंड ठूँसने लगा.. जैसे ओखली में मूसल चल रहा हो।
उसकी चीखने की आवाजें, ‘उउउम्म्म आआअह्ह्ह् श्ह्ह्ह्ह् अह्ह्हह आह आआह’ मेरे कानों में पड़ कर मेरा जोश बढ़ाने लगीं।
जिससे मेरी रफ़्तार और तेज़ हो गई और मैं अपनी मंजिल के करीब पहुँच गया। अति-उत्तेजना मैंने अपने लौड़े को ऐसे ठेल दिया जैसे कोई दलदल में खूटा गाड़ दिया हो।
इस कठोर चोट के बाद मैंने अपना सारा रस उसकी गाण्ड के अंतिम पड़ाव में छोड़ने लगा और तब तक ऐसे ही लगा रहा.. जब तक उसकी पूरी नली खाली न हो गई।
फिर मैंने उसकी गांड को मुट्ठी में भरकर कसके भींचा और रगड़ा.. जिससे काफी मज़ा आ रहा था। और आए भी क्यों न.. शालिनी की गांड किसी स्पंज के गद्दे से काम न थी।
फिर इस क्रीड़ा के बाद मैं आगे को झुका और उसकी पीठ का चुम्बन लेते हुए.. उसकी बराबरी में जाकर लेट गया।
अब उसका सर नीचे था और गांड ऊपर को उठी थी.. तो मैं उसके गालों पर चुम्बन करते हुए उसकी चूचियों को छेड़ने लगा.. पर वो वैसे ही रही।
मैंने पूछा- क्या हुआ.. सीधी हो जाओ.. अब तो हो चुका जो होना था।
तो शालिनी अपना सर मेरी ओर घुमाते हुए बोली- अनुज तूने कचूमर निकाल दिया।
उस समय तो जोश में मैंने भी रफ़्तार बढ़ा दी थी.. पर अब जरा भी हिला नहीं जा रहा है।
तो मैंने उसे सहारा देते हुए आहिस्ते से लिटाया और मेरे लिटाते ही शालिनी की गांड मेरे लावे के साथ-साथ खून भी उलट रही थी जो कि उसके अंदरुनी भाग के छिल जाने से हो रहा था।
मैंने शालिनी के चेहरे की ओर देखा जो कि इस बात से अनजान थी। उसकी आँखें बंद और चेहरे पर ओस की बूंदों के समान पसीने की बूँदें चमक रही थीं और मुँह से दर्द भरी आवाज लगातार ‘आआआअह अह्ह्हह श्ह्ह्ह्ह’ निकाले जा रही थी।
मैं उसकी इस हालत तरस खाते हुए वाशरूम गया और सोख्ता पैड और गुनगुना पानी लाकर उसकी गांड और चूत की सफाई की.. जिससे शालिनी ने मेरे प्यार के आगोश में आकर मुझे अपने दोनों हाथ खोलकर अपनी बाँहों में लेने का इशारा किया।
तो मैं भी अपने आपको उसके हवाले करते हुए उसकी बाँहों में चला गया।
उसने मुझे बहुत ही आत्मीयता के साथ प्यार किया और बोली- तुम मेरा इतना ख़याल रखते हो.. मुझे बहुत अच्छा लगता है.. आज से मेरा सब कुछ तुम्हारा अनुज.. आई लव यू.. आई लव यू.. सो मच.. मुझे बस इसी तरह प्यार देते रहना।


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