24-10-2026, 01:18 PM
ऋचा बाबाजी के कंधे पर सिर रखे हुए, काँपती हुई आवाज में आगे बोलने लगी। उसकी साँसें अब और भारी हो चुकी थीं।
“उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा… मेरा बैलेंस नहीं बना और मैं सीधे उनकी गोद में गिर गई। उनका हाथ… सीधा मेरी स्तन पर आ गया। पहले तो मुझे लगा गलती से लग गया होगा… लेकिन फिर उन्होंने मेरी स्तन को दबाना शुरू कर दिया। जोर-जोर से। मुझे समझ आ गया कि वो जानबूझकर कर रहे हैं। मैं डर गई। मैंने अपनी सहेलियों से सुना था कि मर्द और औरत बच्चा बनाने के लिए ऐसा करते हैं। वो बात याद आते ही मैं बेचैन हो गई कि पिताजी मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं…”
उसकी आवाज रुक-रुककर निकल रही थी।
“मैं उठने लगी और मम्मी को आवाज देना चाहती थी, लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ लिया और मुझे जोर से चूमने लगे। उनके मुंह से शराब की तेज़ और गंदी महक आ रही थी। उनकी मूँछें मेरे नाजुक होंठों में चुभ रही थीं। वो बहुत बेदर्दी से मेरे होंठ चूस रहे थे… काट रहे थे… और दूसरा हाथ मेरे स्तनों को लगातार दबाता जा रहा था। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। मेरी आँखों से आँसू निकलने लगे थे… लेकिन उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वो मुझे मेरा रस चूसते रहे… दबाते रहे… कहीं-कहीं चिपककर चूमते रहे…”
बाबाजी ने धीरे से पूछा,
“मतलब तुम्हें वो सब अच्छा नहीं लग रहा था?”
ऋचा थोड़ा सकुचाई, फिर बहुत धीमी आवाज में बोली,
“तब तक तो अच्छा नहीं लग रहा था… लेकिन फिर… उन्होंने अपना एक हाथ मेरी फ्रॉक के अंदर डाल दिया… और… अपने पंजे से मेरी… वो शू-शू वाली जगह को पकड़ लिया…”
बाबाजी की साँस अटक गई। उनकी आँखें सिकुड़ गईं। वे बिल्कुल शांत होकर सुन रहे थे।
ऋचा ने एक-दो तेज साँसें लीं और आगे बोली,
“उनकी उँगलियाँ वहाँ घूम रही थीं… मालिश कर रही थीं… और वो जगह पूरी गीली हो चुकी थी। मुझे लगा शायद डर की वजह से मेरा पेशाब निकल गया है… लेकिन बाहर नहीं निकला। मुझे बहुत अजीब-सा… गर्म और सिहरन भरा एहसास हो रहा था। बाबाजी आपसे झूठ नहीं बोलूंगी, पहली बार मुझे वहाँ कुछ अच्छा लगने लगा था… पर तभी मम्मी अंदर आ गईं और जोर से चिल्लाने लगीं। मैं भागकर अपने कमरे में चली गई और बिस्तर में घुस गई। बाहर माँ-पिताजी के लड़ने की आवाजें आ रही थीं…मुझे ऐसा लगा की मम्मी पापा को बीभत्स गालिया दे रही थी, लेकिन मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मैंने डरते हुए अपना हाथ नीचे ले जाकर वहाँ लगाया तो बहुत चिपचिपा-सा कुछ निकल रहा था। मैं बाथरूम में जाकर सब साफ़ किया… लेकिन उसके बाद से मुझे बहुत डर लगने लगा कि कहीं मुझे बच्चा न हो जाए…”
बाबाजी ने उसकी पूरी कहानी सुनकर एक गहरी साँस ली। फिर उन्होंने ऋचा का चेहरा अपने हाथों में लिया और बहुत प्यार से बोले,
“देखो ऋचा… तुम जो सोच रही हो, वो सब गलत है। बच्चा ऐसे नहीं होता। उसके लिए तो कुछ और करना पड़ता है, जिसे संभोग कहते हैं। और जो तुम्हारे साथ हुआ, वो तो संभोग से पहले की क्रियाएँ हैं। उससे बच्चा होना नामुमकिन है।”
ऋचा मुँह फाड़े उनकी बात सुन रही थी। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी हो गई थीं।
आखिर में उसने बहुत ही मासूम और काँपती हुई आवाज में पूछा,
“ये… ये संभोग क्या होता है बाबाजी जी…?”
बाबाजी ने उसके बालों को सहलाते हुए, बहुत धीरे और गहरी आवाज में कहा,
“चुदाई… चुदाई को ही संभोग कहते हैं।”
“चुदाई” शब्द सुनते ही ऋचा का पूरा चेहरा लाल सुर्ख हो गया। उसकी गर्दन तक लाली छा गई। उसकी आँखें शर्म से नीचे झुक गईं, लेकिन उसकी साँसें और तेज हो गई थीं।
बाबाजी ने उसके कान के पास मुँह ले जाकर, बहुत कामुक और धीमी आवाज में पूछा,
“और पता है… चुदाई कैसे होती है…?”
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रचयिता मैत्री पटेल.
“उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींचा… मेरा बैलेंस नहीं बना और मैं सीधे उनकी गोद में गिर गई। उनका हाथ… सीधा मेरी स्तन पर आ गया। पहले तो मुझे लगा गलती से लग गया होगा… लेकिन फिर उन्होंने मेरी स्तन को दबाना शुरू कर दिया। जोर-जोर से। मुझे समझ आ गया कि वो जानबूझकर कर रहे हैं। मैं डर गई। मैंने अपनी सहेलियों से सुना था कि मर्द और औरत बच्चा बनाने के लिए ऐसा करते हैं। वो बात याद आते ही मैं बेचैन हो गई कि पिताजी मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं…”
उसकी आवाज रुक-रुककर निकल रही थी।
“मैं उठने लगी और मम्मी को आवाज देना चाहती थी, लेकिन उन्होंने मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ लिया और मुझे जोर से चूमने लगे। उनके मुंह से शराब की तेज़ और गंदी महक आ रही थी। उनकी मूँछें मेरे नाजुक होंठों में चुभ रही थीं। वो बहुत बेदर्दी से मेरे होंठ चूस रहे थे… काट रहे थे… और दूसरा हाथ मेरे स्तनों को लगातार दबाता जा रहा था। मेरा पूरा शरीर काँपने लगा था। समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। मेरी आँखों से आँसू निकलने लगे थे… लेकिन उन पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वो मुझे मेरा रस चूसते रहे… दबाते रहे… कहीं-कहीं चिपककर चूमते रहे…”
बाबाजी ने धीरे से पूछा,
“मतलब तुम्हें वो सब अच्छा नहीं लग रहा था?”
ऋचा थोड़ा सकुचाई, फिर बहुत धीमी आवाज में बोली,
“तब तक तो अच्छा नहीं लग रहा था… लेकिन फिर… उन्होंने अपना एक हाथ मेरी फ्रॉक के अंदर डाल दिया… और… अपने पंजे से मेरी… वो शू-शू वाली जगह को पकड़ लिया…”
बाबाजी की साँस अटक गई। उनकी आँखें सिकुड़ गईं। वे बिल्कुल शांत होकर सुन रहे थे।
ऋचा ने एक-दो तेज साँसें लीं और आगे बोली,
“उनकी उँगलियाँ वहाँ घूम रही थीं… मालिश कर रही थीं… और वो जगह पूरी गीली हो चुकी थी। मुझे लगा शायद डर की वजह से मेरा पेशाब निकल गया है… लेकिन बाहर नहीं निकला। मुझे बहुत अजीब-सा… गर्म और सिहरन भरा एहसास हो रहा था। बाबाजी आपसे झूठ नहीं बोलूंगी, पहली बार मुझे वहाँ कुछ अच्छा लगने लगा था… पर तभी मम्मी अंदर आ गईं और जोर से चिल्लाने लगीं। मैं भागकर अपने कमरे में चली गई और बिस्तर में घुस गई। बाहर माँ-पिताजी के लड़ने की आवाजें आ रही थीं…मुझे ऐसा लगा की मम्मी पापा को बीभत्स गालिया दे रही थी, लेकिन मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मैंने डरते हुए अपना हाथ नीचे ले जाकर वहाँ लगाया तो बहुत चिपचिपा-सा कुछ निकल रहा था। मैं बाथरूम में जाकर सब साफ़ किया… लेकिन उसके बाद से मुझे बहुत डर लगने लगा कि कहीं मुझे बच्चा न हो जाए…”
बाबाजी ने उसकी पूरी कहानी सुनकर एक गहरी साँस ली। फिर उन्होंने ऋचा का चेहरा अपने हाथों में लिया और बहुत प्यार से बोले,
“देखो ऋचा… तुम जो सोच रही हो, वो सब गलत है। बच्चा ऐसे नहीं होता। उसके लिए तो कुछ और करना पड़ता है, जिसे संभोग कहते हैं। और जो तुम्हारे साथ हुआ, वो तो संभोग से पहले की क्रियाएँ हैं। उससे बच्चा होना नामुमकिन है।”
ऋचा मुँह फाड़े उनकी बात सुन रही थी। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी हो गई थीं।
आखिर में उसने बहुत ही मासूम और काँपती हुई आवाज में पूछा,
“ये… ये संभोग क्या होता है बाबाजी जी…?”
बाबाजी ने उसके बालों को सहलाते हुए, बहुत धीरे और गहरी आवाज में कहा,
“चुदाई… चुदाई को ही संभोग कहते हैं।”
“चुदाई” शब्द सुनते ही ऋचा का पूरा चेहरा लाल सुर्ख हो गया। उसकी गर्दन तक लाली छा गई। उसकी आँखें शर्म से नीचे झुक गईं, लेकिन उसकी साँसें और तेज हो गई थीं।
बाबाजी ने उसके कान के पास मुँह ले जाकर, बहुत कामुक और धीमी आवाज में पूछा,
“और पता है… चुदाई कैसे होती है…?”
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रचयिता मैत्री पटेल.



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