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Misc. Erotica सुपरस्टीशन
बाबाजी ने ऋचा का सिर अपने कंधे पर रखे हुए ही बहुत प्यार और गंभीरता से कहा,

“देखो ऋचा… तुम मुझे अपना हितैषी समझो। तुम अभी जवानी की उस देहलीज पर खड़ी हो जहाँ मन में बहुत सारी उलझनें, सवाल और भय आते हैं। अगर इनका निवारण समय पर न हुआ तो तुम गलतफहमियों में फंस सकती हो। मुझे पता है कि तुम ये सब बातें अपनी माँ से भी नहीं कर पातीं, और न ही तुम्हारी कोई सहेली इतनी समझदार है कि इन गहरी बातों को विस्तार से समझा सके। इसलिए बेझिझक बोलो। तुम्हारे मन में कोई भी भय, शंका या सवाल हो, मुझे बताओ। मैं उसका उचित निवारण करूँगा।”

बाबाजी की मुलायम, विश्वास भरी आवाज और उनके कंधे की गर्माहट ने ऋचा को थोड़ा ढांढस बँधाया। उसने सोचा कि इनसे डरने की कोई वजह नहीं। वे तो उसकी मदद ही करना चाहते हैं। शर्म छोड़कर सब बताना ही पड़ेगा।

ऋचा ने कुछ पल हिचकिचाते हुए धीरे-धीरे कहा,

“दरअसल… बाबाजी जी… वो… मुझे बस इतना जानना है कि… जो पिताजी ने किया… उसकी वजह से… मुझे… बच्चा तो नहीं हो जाएगा ना…?”

बाबाजी की होंठों पर अनायास ही एक मुस्कान आ गई। उन्होंने खुद को रोका नहीं। ऋचा की इस बचकानी और मासूम बात पर उन्हें हँसी आ गई।

‘बेचारी… कॉलेज में भी ये नहीं सिखाते कि असल में क्या करने से बच्चा होता है।’

बाबाजी ने कोमल स्वर में कहा,

“अरे ऋचा… तुम ये कैसी बातें कर रही हो? लगता है तुम्हें इन सब बातों का बिल्कुल ज्ञान नहीं है। कोई बात नहीं… मैं तुम्हें सब कुछ विस्तार से समझा दूँगा। लेकिन उससे पहले तुम मुझे उस दिन की पूरी बात बताओ - जब गोपाल ने तुम्हें पकड़ा था… सब कुछ… बिल्कुल विस्तार से।”

ऋचा का चेहरा फिर से शर्म से लाल हो गया। उसकी नजरें नीचे झुक गईं। उसकी उँगलियाँ अपनी स्कर्ट के किनारे को मरोड़ रही थीं। बाबाजी कुछ बोलने ही वाले थे कि ऋचा ने बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज में शुरू किया:

“उस दिन… पिताजी हमेशा की तरह अपने कमरे में बैठकर शराब पी रहे थे। माँ किचन में थी। पिताजी ने मुझे कुछ सामान मंगवाया। मैं जैसे ही उनके पास गई, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। ये पहले भी होता था, पर उस दिन उनकी पकड़ बहुत जोरदार थी। उन्होंने कहा, ‘तुम ही हो जो मेरा पूरा ध्यान रखती हो… ऋचा, आओ… इधर आओ… मेरे पास…’ और उन्होंने मेरी कमर से पकड़कर मुझे अपने पास खींच लिया।”

बाबाजी बीच में ही धीरे से पूछे,

“उस दिन तुमने क्या पहना हुआ था?”

ऋचा शर्म से और भी सिकुड़ गई, फिर फुसफुसाकर बोली,

“जी… मैंने एक लंबी फ्रॉक पहनी हुई थी… वो वाली जो मैं अक्सर रात को पहनकर सोती हूँ।”

बाबाजी की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने और करीब खींचते हुए पूछा,

“फिर क्या हुआ? उन्होंने तुम्हें खींचकर अपने गोद में बिठाया या…?”

ऋचा ने गहरी साँस ली। उसकी आवाज अब और धीमी हो गई थी,

“वे मुझे अपनी गोद में खींचकर बैठा लिया… उनकी साँसें शराब की वजह से बहुत तेज और गर्म थीं। उन्होंने मुझे अपनी बाहों में कस लिया… मेरी छाती उनकी छाती से दब गई थी। फिर उन्होंने मेरे गाल पर… फिर मेरे होंठों पर… जोर से किस किया। मैं छूटने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वे बहुत जोर से पकड़े हुए थे। उनकी एक हाथ मेरी कमर पर था और दूसरा हाथ… मेरी पीठ पर… धीरे-धीरे नीचे सरक रहा था…”

बाबाजी अब ऋचा की कमर को हल्के-हल्के सहला रहे थे। उनकी उँगलियाँ उसके ब्लाउज के ऊपर से ही उसकी नाजुक कमर की नरमाई को महसूस कर रही थीं।

“और तुम्हें कैसा लगा जब उन्होंने तुम्हारे होंठ चूसे?” बाबाजी ने बहुत धीरे, कामुक स्वर में पूछा।

ऋचा की साँसें अब अनियमित हो चुकी थीं। उसके छोटे स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। वह बाबाजी के कंधे पर सिर रखे हुए ही काँप रही थी।

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प्रस्तुतकर्ता मैत्री पटेल.
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सुपरस्टीशन - by maitripatel - 10-04-2026, 03:59 PM
RE: सुपरस्टीशन - by Glenlivet - 10-04-2026, 05:01 PM
RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 25-04-2026, 07:06 PM
RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 29-04-2026, 01:06 AM
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RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 07-05-2026, 07:42 PM
RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 19-05-2026, 09:54 AM
RE: सुपरस्टीशन - by naree - 22-05-2026, 04:12 AM
RE: सुपरस्टीशन - by naree - 22-05-2026, 04:14 AM
RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 09-06-2026, 03:40 PM
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RE: सुपरस्टीशन - by Rizzi1198 - 30-07-2026, 12:21 AM
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RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 22-09-2026, 05:39 PM
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RE: सुपरस्टीशन - by Tadpole - 23-09-2026, 07:12 PM
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RE: सुपरस्टीशन - by Bumchod - 05-10-2026, 05:27 AM
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RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 10-10-2026, 07:50 PM
RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 21-10-2026, 06:40 PM
RE: सुपरस्टीशन - by sarit11 - 22-10-2026, 08:35 PM
RE: सुपरस्टीशन - by maitripatel - 24-10-2026, 01:15 PM
RE: सुपरस्टीशन - by rajeev13 - 24-10-2026, 08:15 PM
RE: सुपरस्टीशन - by Adonis - 27-10-2026, 12:20 PM



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