17-10-2026, 11:32 AM
रिया की शादी
उन उथल-पुथल और संघर्षों के तीन साल बीत चुके हैं, जिन्होंने कभी उनकी जिंदगी को जकड़ रखा था। रिया, जो अब एक बेहद खूबसूरत युवती के रूप में निखर चुकी है, तुषार नाम के एक आकर्षक नवयुवक से शादी कर रही है, जिसका कद 5 फीट 9 इंच है। शादी की तैयारियाँ जोरों पर हैं, और घर का हर कोना चहल-पहल, हँसी-खुशी और नई शुरुआत के उत्साह से गूँज रहा है।
मीरा, जो पहले से कहीं अधिक निखरी, कामुक और बेहद खूबसूरत लग रही थी, उसने शादी की हर छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी खुद संभाल रखी थी। आज उसने लाल रंग की झीनी शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी, जिसके साथ सफ़ेद रंग का स्लीवलेस ब्लाउज़ उसके सुडौल बदन पर कसकर बैठा हुआ था।
साड़ी के पल्लू को उसने अपनी पतली कमर में इस तरह ठूँस रखा था कि उसकी गोरी, चिकनी कमर और नाभि का कातिलाना हिस्सा पूरी तरह उघड़ा हुआ नज़र आ रहा था। वहाँ मौजूद मर्दों की निगाहें अनजाने में ही उसके उस गोरे, नंगे पेट और पतली कमर की सुराहीदार लचक पर बार-बार जाकर टिक जाती थीं। इस ख़ूबसूरती और देह की मादकता से बेखबर, मीरा सजावट चुनने से लेकर मेहमानों की ख़ातिरदारी सुनिश्चित करने तक, खुद को रिया के इस खास दिन की खुशियों में पूरी तरह डुबो चुकी थी।
इन तैयारियों के बीच, मीरा ने अपने तमाम अज़ीज़ों और करीबियों को शादी के न्योते भेजे थे—उन सभी को, जिन्होंने कभी न कभी उनकी ज़िंदगी की राहों में अपना निशान छोड़ा था।
और उन्हीं ख़ास लिफ़ाफ़ों में से एक लिफ़ाफ़ा सरताज सिंह के नाम भी गया था। सरताज की मौजूदगी उसके दिलों में एक अलग ही मुक़ाम रखती थी—फ़क़त इसलिए नहीं कि उन्होंने कभी रिया की जान बचाकर हमेशा के लिए उस घर के रक्षक का दर्जा हासिल कर लिया था, बल्कि इसलिए भी कि मीरा की हर साँस, उसकी देह की हर हरक़त में सरताज का एक अनकहा, गहरा अहसास बसा हुआ था।
निमंत्रण भेजे हफ़्तों बीत चुके थे, मगर सरताज की तरफ़ से आने या न आने की कोई ख़बर नहीं आई थी।
मीरा लाल शिफॉन की साड़ी का पल्लू अपनी उँगलियों में लपेटते हुए, एक गहरी और बेचैन साँस भरकर अपने दिल से फुसफुसाई, "तुम जानते हो न सरताज... तुम्हारी यह ख़ामोशी मुझे अंदर तक तोड़ देती है। अपने उन उसूलों, अपनी उन मर्यादाओं की दीवारों के पीछे कब तक छिपोगे तुम?"
वह जानती थी कि अपने फ़र्ज़ और अनुशासन से बँधा उसका सीना शायद उसे इस महफ़िल में आने से रोके। मगर अपने झीने लिबास के नीचे धड़कते हुए अपने गरम-गरम जिस्म की हर थरथराहट में, वह सिर्फ़ उसी की मौजूदगी की प्यासी थी।
आज सुबह जब वह आईने के सामने खड़ी होकर ख़ुद को देख रही थी, तब अपनी गोरी उघड़ी कमर पर मखमली उँगलियाँ फेरते हुए उसने अपने रसीले होंठों को धीरे से भींचा। उसकी साँसों में एक अजीब सी तपन थी। उसने आहिस्ता से बड़बड़ाते हुए कहा, "चाहे तुम्हारे उसूल तुमको कितना भी रोकें... पर मैं जानती हूँ, तुम्हारा दिल भी इस तड़प से अछूता नहीं है। क्या सिर्फ़ एक बार... बस एक बार मुझे इस रूप में देखने नहीं आओगे तुम? तीन साल हो गए हैं तुम्हें देखे..."
अपने काम निपटाते हुए, मीरा का ध्यान बार-बार सरताज की ओर भटक जाता है। वह जानती है कि उसकी ज़िंदगी में उनका स्थान अतुलनीय है, जो सम्मान और ख़ामोश मोहब्बत के सबसे ऊँचे पायदान पर है।
जबकि वह शादी के हर इंतज़ाम पर नज़र रखे हुए है, उसके दिल का एक हिस्सा खामोशी से यह दुआ कर रहा है कि वे बस एक बार चौखट पार करके अंदर आ जाएँ—रिया की खुशी में शामिल होने के लिए, और यह देखने के लिए कि मीरा अब कितनी बदल चुकी है।
तभी उसका पति आरव उसकी तरफ़ आता है और मीरा की नंगी, नाज़ुक कमर पर अपना हाथ डालते हुए धीरे से उसके कान में फुसफुसाता है, "आज बहुत प्यारी लग रही हो, मीरा..."
मीरा ने शोख़ी से अपनी पलकें मटकाते हुए कहा, "क्या मतलब है तुम्हारा? क्या मैं वैसे प्यारी नहीं लगती?"
आरव ने हँसते हुए उसे और क़रीब खींचा और कहा, "मुझे अपने शब्दजाल में मत फँसाओ... मैं तो पहली नज़र में ही तुम्हारे प्यार में घायल हो गया था।"
आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, "थैंक्स मीरा..."
मीरा ने हैरान होकर पूछा, "किसलिए?"
आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "इस पूरी शादी की ज़िम्मेदारी को इतनी ख़ूबसूरती से संभालने के लिए।"
मीरा ने अपना नाज़ुक हाथ उसके सीने पर रखा और धीरे से कहा, "अपनों को थैंक्स नहीं कहते आरव... वैसे भी रिया मेरी ननद कम और बहन ज़्यादा है।"
फिर उसकी निगाहें सामने खड़ी रिया की तरफ़ घूम गईं, जो गुलाबी शादी के जोड़े में परी जैसी सज-धजकर खड़ी थी। मीरा के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई और उसने फुसफुसाते हुए कहा, "देखो तो... कितनी प्यारी लग रही है न!"
इस चकाचौंध और चहल-पहल से भरे माहौल के बीच, अचानक एक तीखी आवाज़ ने जश्न की हर गूँज को चीर दिया— सिक्युरिटी के सायरन की सनसनाती घंटी। जैसे-जैसे वह आवाज़ नज़दीक आती गई, महफ़िल में मौजूद हर शख्स के कदम थम गए। भीड़ के चेहरे पर उत्सुकता, हैरानी और एक अनजाने खौफ़ की लहर दौड़ गई।
तभी घर के मुहाने पर, चमकती हुई लाल-नीली बत्तियों वाली तीन चमचमाती सिक्युरिटी गाड़ियाँ आकर रुकीं।
मीरा जहाँ खड़ी थी, वहीं की वहीं ठिठक कर रह गई। उसकी साँसें अटक गईं और सीने के भीतर दिल बेकाबू होकर धड़कने लगा।
क्या... क्या यह सचमुच हो सकता है? क्या सरताज आ गए हैं?
उसका मन अब भी इस बात पर यक़ीन करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, लेकिन जिस्म की रग-रग में दौड़ी एक तीखी, अनजानी उतावली ने उसके सारे सब्र के बाँध तोड़ दिए। उसका उघड़ा हुआ पेट और नाज़ुक कमर हर गहरी साँस के साथ तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगी, मानो उसका पूरा वजूद सिर्फ़ उसी एक इंसान के दीदार की तड़प में पिघल रहा हो।
आरव के मुँह से अचानक निकला, "कौन हो सकता है... शायद पापा के कोई क़रीबी मंत्री या बड़े अफ़सर होंगे। तुम रुको, मैं ख़ुद जा कर चेक करता हूँ।"
यह कहते हुए आरव तेज़ क़दमों से पोर्टिको की तरफ़ बढ़ गया, जबकि मीरा वहीं बेसुध सी खड़ी रही। उसका हाथ अनायास ही अपनी साड़ी के लाल शिफॉन के आँचल को ज़ोर से भींच चुका था।
उसकी बेकाबू धड़कनें और उतावली साँसें साफ़ चुगली कर रही थीं कि उसके दिल को अच्छी तरह मालूम था कि गाड़ियों के दरवाज़े खुलते ही कौन बाहर आने वाला है।
आगे और पीछे की गाड़ियों के दरवाज़े खुले, और उनमें से चार वर्दीवाले सिक्युरिटीकर्मी बाहर निकलकर बीच वाली कार की तरफ़ बढ़े।
उनमें से एक ने आगे बढ़कर बीच वाली गाड़ी का दरवाज़ा खोला, और फिर मीरा की नज़रें सीधे उसी इंसान पर जाकर टिक गईं। सरताज सिंह—उसकी नज़रों में दुनिया के सबसे सम्मानीय इंसान—गाड़ी से बाहर निकले। ६ फ़ीट २ इंच लंबे, वे उतने ही प्रभावशाली, गंभीर और शांत दिख रहे थे, जितने वे हमेशा हुआ करते थे।
अपनी उस रोबीली वर्दी में उनके चेहरे से अदम्य ताकत, अनुशासन और गरिमा का अहसास साफ़ झलक रहा था। मगर इस बार माहौल में कुछ अलग था, सरताज ने अपने मज़बूत हाथ में एक नन्ही सी बच्ची की नाज़ुक उँगलियाँ थाम रखी थीं, जिसकी उम्र 7 या 8 साल से ज़्यादा नहीं लग रही थी। सामने दुल्हन की तरह सजे घर के भव्य नज़ारे और जगमगाती रोशनियों को देखकर, उस बच्ची की मासूम आँखें बेइंतहा उत्सुकता और घबराहट से चौड़ी हो गई थीं।
यह नज़ारा देखते ही मीरा की धड़कनें एक पल के लिए मानो थम सी गईं। भावनाओं का एक बेकाबू बवंडर उसके सीने में उमड़ पड़ा—राहत, बेइंतहा ख़ुशी, और साथ ही उलझन की एक गहरी लकीर।
वे अपने साथ इस बच्ची को क्यों लाए हैं? यह कौन है? सरताज के साथ इसका क्या रिश्ता हो सकता है... जहाँ तक मैं जानती हूँ, सरताज ने तो अभी तक शादी ही नहीं की है?
सवालों का बवंडर उसके ज़हन में घुमड़ ही रहा था कि तभी सरताज ने चारों ओर निगाहें दौड़ाईं। उनकी रोबीली नज़रें आखिरकार लाल शिफॉन की साड़ी में सजी मीरा पर जाकर ठहर गईं।
उस एक पल के लिए मानो आस-पास का सारा शोर, जमावड़ा और पूरी दुनिया वहीं थम गई। सरताज की उन संजीदा आँखों में एक अनजानी नरमी उतर आई—दोनों के बीच बरसते उस ख़ामोश प्यार का एक गहरा, अनकहा इकरार।
सरताज जैसे ही आगे बढ़े, वह नन्ही बच्ची उनके पहलू से चिपकी हुई साथ-साथ चलने लगी। उनकी मर्दाना शख्सियत और वर्दी के रोब को देखकर भीड़ ने ख़ुद-ब-ख़ुद सिमटकर उन्हें रास्ता दे दिया।
मीरा के कदम अपने आप उनकी ओर उठने लगे। उसने अपने अंदर एक अजीब सी गर्मजोशी और बेकरारी महसूस की; उसका दिल उम्मीद, प्यार और असमंजस के मिले-जुले अहसास से ज़ोरों से धड़क रहा था।
सरताज बेहद शालीनता और ग्रेस के साथ मीरा के परिवार की ओर बढ़े। दरवाज़े पर मीरा के ससुर जी खड़े थे, और तब तक आरव भी अपने पिता के पास पहुँच चुका था। मीरा उनके पीछे थोड़ी दूरी पर खड़ी थी। उसका दिल अब भी सीने में बेकाबू होकर धड़क रहा था, और उसकी नज़रें सरताज के हर कदम को नाप रही थीं।
सरताज को उस नन्ही बच्ची के साथ इस तरह आते देखना मीरा के भीतर भावनाओं का एक ऐसा बवंडर उठा रहा था जिसे वह कोई नाम नहीं दे पा रही थी। उसने सरताज के आने की कल्पना न जाने कितनी बार की थी, लेकिन कभी इस रूप में नहीं—एक बच्ची का हाथ थामे हुए, एक ऐसा मोड़ जिसकी उसने दूर-दूर तक उम्मीद नहीं की थी।
जब सरताज उस परिवार के पास पहुँचे, तो उन्होंने बेहद विनम्र और सम्मानजनक अंदाज़ में अपना सिर झुकाया। अपने उसी शांत और गंभीर लहजे में उन्होंने बात शुरू की, "गुड इवनिंग... मैं सरताज सिंह, मीरा का सहपाठी और पुराना दोस्त।" उनके शब्द बेहद सादे थे। उसमें उनके बड़े पद या वर्दी का कोई दंभ या दिखावा नहीं था।
मीरा के ससुर जी ने बड़ी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया; आरव ने भी आगे बढ़कर उनका इस्तकबाल किया और अपना परिचय देते हुए कहा, "मैं आरव... मीरा का पति।"
सरताज ने बेहद गर्मजोशी से उससे हाथ मिलाया और कहा, "जी, मैं जानता हूँ।"
सरताज की रोबीली शख्सियत, उनके चेहरे के तेज़ और वर्दी के रोब को देखकर हर कोई उनकी ओर आकर्षित था और उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक था।
फिर, अपने होंठों पर एक हल्की सी सादगी भरी मुस्कान लाते हुए, उन्होंने अपने साथ खड़ी उस नन्ही बच्ची का परिचय कराया। "यह मेरी बेटी है, ज्योति," उन्होंने बड़े प्यार से बच्ची के कंधे को सहलाते हुए कहा। ज्योति ने ऊपर उठाकर उन सभी को देखा, उसकी चमकती हुई मासूम आँखें उस भीड़ और अजनबी चेहरों को थोड़ी शर्म और बेहद उत्सुकता से निहार रही थीं।
मीरा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई जब यह सच सामने आया कि ज्योति सरताज की बेटी है। इस अप्रत्याशित मोड़ ने सरताज के आने के बाद से उसकी सारी भावनाओं को झकझोर कर रख दिया था। उसकी निगाहें अब सरताज और उसके परिवार के बीच हो रही हर बात को और ज़्यादा गहराई से नापने लगी थीं।
आख़िरकार, सरताज मीरा के ठीक सामने आ खड़े हुए। दोनों के बीच की फ़ज़ा हज़ारों अनकहे अलफ़ाज़ों, गुज़रे ज़माने की सुलगती यादों और हवा में तैरते अनसुलझे सवालों से भारी हो चुकी थी। एक पल के लिए, मीरा की कजरारी आँखों ने सरताज की गहरी निगाहों में झाँका—उस मासूम बच्ची की हक़ीक़त को तलाशने के लिए जो अब भी सरताज के पहलू से चिपकी हुई थी।
सरताज एक कदम आगे बढ़े और मीरा को अपनी मर्मस्पर्शी, दोस्ताना आगोश में भर लिया। वह आलिंगन बेहद सादा और छोटा सा था, मगर उसमें एक ऐसी गहरी आत्मीयता और गर्माहट थी जिसे सिर्फ़ वे दोनों ही महसूस कर सकते थे।
मीरा की लाल शिफॉन की साड़ी के पार सरताज के फौलादी सीने की तपन साफ़ महसूस हो रही थी। मीरा को पीछे हटाते हुए, सरताज थोड़ा सा झुके और उसके कानों के पास अपने होंठ लाकर धीरे से फुसफुसाए, "ज्योति के बारे में तुम्हें बाद में सब बताऊंगा..." उनकी आवाज़ शांत थी—मीरा के चेहरे पर उतरी हैरानी का एक-एक जवाब देने का वादा।
सीधे खड़े होकर, सरताज ने नन्ही बच्ची के नाज़ुक कंधे पर हाथ रखकर उसे हल्के से आगे बढ़ाया।
"ज्योति," उन्होंने एक ख़ामोश फ़ख़्र के साथ कहा, "मैं तुम्हें एक बहुत ही ख़ास इंसान से मिलाना चाहता हूँ। यह मीरा है... मेरी सबसे अज़ीज़ दोस्त।"
सरताज ने मीरा की ओर ऐसी नरमी से देखा कि मीरा की धड़कनें बेकाबू हो गईं, और उसके जिस्म में एक मीठी सी सिहरन दौड़ गई।
ज्योति ने अपनी बड़ी-बड़ी, उत्सुक आँखों से मीरा को देखा, जिसके चेहरे पर हल्की सी हया और झिझक थी। मीरा अपनी लाल साड़ी की सिलवटों को समेटते हुए नीचे झुकी। उसकी निगाहें सरताज के रौबदार चेहरे से हटकर उस मासूम बच्ची पर आ टिकीं।
उसने एक बेहद दिलकश और गरमजोशी भरी मुस्कान के साथ कहा, "हेलो ज्योति... तुमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा।"
मीरा ने एक पल के लिए सरताज की तरफ़ देखा—उसकी आँखों में सवालों का समंदर था, मगर साथ ही एक गहरा इकरार भी। वह जानती थी कि ज्योति की मौजूदगी के पीछे चाहे जो भी कहानी हो, वक्त आने पर वह सरताज के मुख से ही उसे सुनेगी।
मीरा ने ज्योति की नन्ही, कोमल उँगलियों को अपनी गोरी हथेली में थाम लिया। उस मासूम सी छुअन को महसूस करते हुए, वह सरताज और उसकी बेटी को मेहमानों की भीड़ के बीच से आगे ले जाने लगी।
दिल में उठे तूफ़ान के बावजूद, मीरा के हर कदम में एक ग़ज़ब की नज़ाकत थी—वह पूरी शिद्दत से उन दोनों को अपने परिवार की इन खुशियों में शामिल करने के लिए तैयार थी।
सबसे पहले मीरा ने सरताज और उनकी बेटी को अपने पति आरव से दुबारा औपचारिक रूप से मिलवाया। आरव ने एक बार फिर बेहद सम्मान और गर्माहट के साथ सरताज से हाथ मिलाया।
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आरव... सरताज कॉलेज में मेरे क्लासमेट हुआ करते थे और बाद में इन्होंने IPS जॉइन कर लिया। कॉलेज के दिनों में यह बहुत रिज़र्व्ड और कम बोलने वाले इंसान हुआ करते थे।"
मगर मीरा के दिल के भीतर एक अलग ही कसक उठी। उसने मन ही मन सोचा, 'इतने रिज़र्व्ड... कि पूरे कॉलेज में कभी यह हिम्मत ही नहीं जुटा पाए कि मुझे बता सकें कि यह मुझसे कितना प्यार करते हैं...'
आरव ने उत्सुकता से पूछा, "तो फिर कॉलेज के बाद आप दोनों की मुलाकात कब हुई?"
सरताज ने बेहद संजीदगी और समझदारी से बात संभालते हुए कहा, "आई थिंक, करीब तीन साल पहले हम किसी कॉमन फ्रेंड की पार्टी में मिले थे।"
मीरा ने सिर हिलाया, "हाँ आरव, वहीं हमारी दोबारा बात शुरू हुई थी।"
सरताज ने आगे जोड़ा, "लेकिन उसके बाद मेरी सर्विस की व्यस्तताओं की वजह से हमारा संपर्क नहीं हो सका। फिर जब मुझे शादी का कार्ड मिला, तो लगा कि मिलने का इससे बेहतर मौका और कोई नहीं हो सकता।"
सरताज के इन संभले हुए शब्दों को सुनकर मीरा का दिल भीतर तक सिहर उठा। उसकी लाल शिफॉन की साड़ी के नीचे छिपा सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगा।
वह मन ही मन आरव की ओर देखते हुए सोचने लगी:
'आरव... तुम्हें कैसे समझाऊँ कि यह इंसान मेरे और तुम्हारे परिवार के लिए क्या मायने रखता है? जब तुम्हारी पत्नी और तुम्हारी बहन को वह दरिंदा शंकर ब्लैकमेल कर रहा था... जब हमारी ज़िंदगी नीलाम होने की कगार पर थी...'
'तब अपनी इज़्ज़त और परिवार को बचाने का कोई रास्ता न पाकर मैंने आखिरी उम्मीद की तरह इन्हें ही पुकारा था। और इन्होंने क्या किया? अपनी जान, अपना करियर, अपना सब कुछ दांव पर लगाकर तुम्हारी बीवी और बहन को उस नरक की आग से सही-सलामत बाहर निकाला...'
'और बदले में? कभी एक लफ़्ज़ या एक अहसान तक का दावा नहीं किया...यह वह इंसान है, जिसे उस अहसान के बदले मैं अपना पूरा शरीर सौंपने के लिए राज़ी थी...'
'लेकिन इन्होंने साफ़ इंकार कर दिया... जबकि मैं अच्छी तरह जानती थी कि यह मुझे कॉलेज के दिनों से बेइंतहा चाहते थे।'
तभी आरव का फोन बज उठा। शोरगुल से बचते हुए उसने कहा, "एक्सक्यूज मी," और कॉल अटेंड करने के लिए बाहर की तरफ बढ़ गया।
जाते-जाते उसने मीरा की तरफ देखकर प्यार से मुस्कुराते हुए कहा, "मीरा, अपने दोस्त का ख्याल रखना... मैं बस पांच मिनट में आता हूँ।"
मीरा ने जब आरव के मुँह से 'दोस्त' शब्द सुना, तो उसके मन के भीतर से एक तड़पती हुई आवाज़ निकली:
'दोस्त? तुम्हें कैसे बताऊँ आरव कि सरताज का मेरी ज़िंदगी में क्या दर्जा है...'
'बस उसी दिन के बाद इस इंसान का दर्जा मेरे दिल में सबसे ऊपर हो गया... शायद तुमसे भी ऊपर, आरव! क्योंकि तुम मेरे लिए जो कुछ भी करोगे, वह सिर्फ़ इसलिए करोगे क्योंकि मैं तुम्हारी पत्नी हूँ... यह तुम्हारा फर्ज़ है।'
'लेकिन सरताज? रिश्ता न होते हुए भी उन्होंने मेरे लिए जो किया, उसने मुझे हमेशा-हमेशा के लिए उनका बना दिया...'
जैसे ही आरव दूर गया, मीरा और सरताज के बीच का फासला अचानक और गहरा, और ज़्यादा सुलगता हुआ महसूस होने लगा।
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, "आइए सरताज, मैं आपको परिवार के बाकी लोगों से मिलवाती हूँ।"
सरताज बेहद शांत, शालीन और संजीदा अंदाज़ में मीरा के साथ आगे बढ़े। जैसे-जैसे वे एक-एक करके घर के बड़ों और रिश्तेदारों से मिल रहे थे, नन्ही ज्योति मीरा के पास ही रही।
माहौल की गर्माहट और अपनों के प्यार को देखकर वह धीरे-धीरे घुलने-मिलने लगी थी और उत्सुकता से इस ज़श्न का नज़ाकत भरा मज़ा ले रही थी। हर किसी ने सरताज और ज्योति का स्वागत बेहद प्यार और सम्मान के साथ किया, जिससे वे दोनों पल भर में ही उस पारिवारिक उत्सव का अहम हिस्सा बन गए।
आख़िरकार, मीरा उन्हें लेकर सीधे रिया की तरफ़ बढ़ी, जो महफ़िल के बीचों-बीच खड़ी आँखों में उत्सुकता और बेकरारी लिए इंतज़ार कर रही थी। रिया ने सरताज के बारे में कहानियाँ सुन रखी थीं—वह बहादुर इंसान, जिसने उसकी ज़िंदगी के सबसे खौफ़नाक और काले दौर में ढाल बनकर उसकी आबरू और जान बचाई थी। आज उन्हें अपने सामने खड़ा देखना उसके लिए बेहद भावुक और किसी ख़्वाब जैसा महसूस हो रहा था।
मीरा ने एक ख़ास नज़ाकत, फ़ख़्र और अपनायत भरे लहजे में कहा, "रिया... ये सरताज हैं। जिनके बारे में मैंने तुम्हें बताया था।"
रिया ने एक गहरी साँस ली और सरताज के रौबदार चेहरे की ओर देखा। उसकी आँखें आदर और बेइंतहा एहसानमंदी से छलक आई थीं। उसने बेहद धीमे और काँपते स्वर में कहा, "मैंने आपके बारे में बहुत कुछ सुना है... आपने हमारे लिए जो कुछ भी किया, उसके लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।"
सरताज ने अपनी संजीदा मुस्कान के साथ धीरे से अपना सिर हिलाया।
वे एक कदम आगे आए और बेहद भारी आवाज़ में बोले, "उन दिनों को याद करने की कोई ज़रूरत नहीं है, रिया। वह दौर बहुत पीछे छूट चुका है। अब तुम्हें सिर्फ़ आगे देखना है और अपनी नई ज़िंदगी को गले लगाना है... बहन।"
रिया की आँखों से आंसुओं की दो नम बूंदे छलककर उसकी गुलाबी गालों पर ढलक गईं। उसने भारी दिल से अपना सिर झुका लिया।
वह मन ही मन सोच रही थी, 'सरताज जी को हमारी हक़ीक़त पता है... वे जानते हैं कि हम किस भयानक दलदल में फँसे थे, हमारी आबरू पर क्या गुज़री थी... फिर भी वे मुझे इतना पवित्र, इतना बड़ा 'बहन' का दर्जा दे रहे हैं! अगर आज मेरे अपने भाई को हमारा अतीत पता चल जाता, तो शायद वह अपने परिवार की तथाकथित इज़्ज़त बचाने के लिए हमें गोली ही मार देता...'
रिया ने अपनी रोती हुई, डबडबाई आँखों से सरताज की तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे। उसने बेहद भावुक होकर कहा, "आज मैं शादी करने जा रही हूँ सरताज जी... और यह सब सिर्फ़ और सिर्फ़ आपकी वजह से मुमकिन हो पाया है।"
रिया का दिल कर रहा था कि वह सब कुछ भूलकर, भरी महफ़िल के सामने सरताज के चौड़े सीने से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े।
शायद सरताज को उसकी आँखों की तड़प और दिल के इस उबाल का इल्म पल भर में हो गया था। माहौल को ज़्यादा भावुक होने से बचाते हुए, सरताज ने तुरंत बात का रुख पलटा।
उन्होंने मीरा की तरफ़ देखते हुए एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "मीरा, ज़रा अपनी ननद का चेहरा साफ़ करो... और इसे समझाओ कि शादी के दिन रोना बिल्कुल मना है, वरना सारा मेकअप बिगड़ जाएगा और दुल्हन का निखार ख़राब हो जाएगा!"
फिर जल्दी से रिया के सर पर अपना हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, और ज्योति का नन्हा हाथ थामकर दूसरी तरफ़ बढ़ गए।
मीरा ने तुरंत आगे बढ़कर रोती हुई रिया को संभाला, अपने लाल शिफॉन के पल्लू से उसके आँसू पोंछे और बड़े लाड़ से कहा, "मैं उन्हें तुम्हारे पास यहाँ रुलाने के लिए नहीं लाई थी, रिया... और देख रही हो न तुम? जब भी कोई उनका शुक्रिया अदा करना चाहता है, या उनके आगे अपना दिल खोलना चाहता है, तो वे कैसे बड़ी खामोशी से दूर चले जाते हैं... बिना कोई अहसान जताए।"
मीरा वहीं खड़ी सरताज को दूर जाते हुए देख रही थी। उसकी लाल शिफॉन की साड़ी के पार तेज़ी से धड़कता हुआ उसका सीना और उघड़ी कमर पर आती-जाती उतावली साँसें साफ़ गवाही दे रही थीं कि वह सरताज के इस निष्काम व्यक्तित्व को देखकर एक बार फिर उनकी मोहब्बत में और गहरी उतरने लगी थी।
वह मन ही मन सोच रही थी, 'क्या इंसान हैं यह... लोग छोटी सी मदद करके सौ बार अहसान जताते हैं, और एक यह हैं जो अपनी जान पर खेलकर भी एक बार शुक्रिया तक सुनना नहीं चाहते...'
Deepak Kapoor
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