9 hours ago
अगली सुबह
अमन की नींद बहुत देर से खुली। आँखें खुलते ही शरीर में हल्की थकान और मन में एक अजीब सा बोझ दोनों महसूस हुए। कल रात का अँधेरा, सरला चाची की दबी सिसकारियाँ और खुद का चुपचाप निकल जाना—सब कुछ ताजा था।
वह उठा। नहाते समय आईने में अपना चेहरा देखा। आँखों में नींद से ज्यादा उलझन थी। कपड़े पहनकर जब वह बाहर आया तो आँगन में माँ और कमला चाची पहले से बैठी थीं। सरला चाची रसोई की तरफ से निकलीं। अमन की निगाह उन पर गई।
सरला चाची ने सिर उठाया। एक पल के लिए उनकी निगाहें अमन से मिलीं। पहले जैसी घबराहट नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी शर्म और उलझन थी। उन्होंने जल्दी से नज़रें झुका लीं और चुपचाप चाय का कप उठाकर एक तरफ बैठ गईं। अमन ने महसूस किया कि उनका चलना थोड़ा धीमा है। शायद कल रात की थकान बाकी हो।
नाश्ते के समय माहौल सामान्य बनाने की कोशिश में सब लगे हुए थे। लेकिन अमन और सरला चाची दोनों ही चुप थे। कमला चाची ने अमन की तरफ देखकर भौंहें चढ़ाईं, जैसे पूछ रही हों कि सब ठीक है या नहीं। अमन ने हल्के से सिर हिला दिया।
नाश्ता करके वह कॉलेज के लिए निकला। रास्ते में मन भारी था। राधा मिली तो उसने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन राधा ने तुरंत पहचान लिया।
“आज और भी उदास लग रहे हो,” राधा ने धीमे स्वर में कहा।
अमन ने उसका हाथ हल्के से दबाया। “कुछ घर की बातें हैं। तुम टेंशन मत लो।” राधा ने और नहीं पूछा। बस उसके साथ चलती रही।
कॉलेज में राजिया ने दूर से देखा, लेकिन आज पास नहीं आई। शायद अमन के चेहरे पर लिखी थकान देखकर उसने दूरी रखी।
घर लौटने के बाद अमन ने ज्यादा देर आँगन में नहीं रुका। कविता ने कुछ कहा तो सिर्फ हल्की मुस्कान देकर आगे बढ़ गया। कमला चाची ने भी उसे बुलाया लेकिन उसने “थकान है चाची” कहकर कमरे में प्रवेश कर लिया।
शाम होते-होते रेणु ने मौका निकाला। गलियारे में अमन को रोककर बहुत धीमे स्वर में पूछा, “कल रात… कैसी रही?”
अमन ने चारों तरफ देखा। फिर फुसफुसाया, “मैंने… थोड़ा प्यार से किया दीदी। दर्द नहीं दिया।”
रेणु की आँखों में हल्की नमी थी। उन्होंने उसका हाथ दबाया। “अच्छा किया। वे आज सुबह से अजीब व्यवहार कर रही हैं। शायद महसूस कर गईं कि वह व्यक्ति अलग था।”
अमन ने पूछा, “अब? दूसरी रात भी वैसे ही?”
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन अब वे शायद इतनी डरी हुई नहीं होंगी। तुम वैसा ही रहना… कोमल। एक हफ्ता पूरा करना है।”
रेणु चली गईं। अमन अपने कमरे में आकर बिस्तर पर बैठ गया।
खिड़की से बाहर देखते हुए उसने धीरे से साँस छोड़ी।
आज रात फिर जाना था।
उसी अँधेरे में।
उसी औरत के पास… जो अब शायद उसे थोड़ा अलग अंदाज से महसूस करेंगी।
अमन फिर से उसी तरह स्टोर रूम पहुँचा। बक्सों के पीछे छुपकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद रेणु की आहट आई। फिर सरला चाची के कदम। इस बार उनके कदमों में पहली रात वाला डर नहीं था। हल्की घबराहट जरूर थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी तैयारी भी। रेणु बाहर गईं। सिटकिनी लगी। अँधेरा और गहरा हो गया।
अमन ने सुना कि सरला चाची इस बार ज्यादा देर तक खड़ी रहीं। जैसे हिम्मत जुटा रही हों। फिर कपड़ों के सरसराने की आवाज आई। धीरे-धीरे सब उतरा। और फिर वे चटाई पर लेट गईं।
अमन बक्सों के पीछे से निकला। इस बार उसके कदमों में थोड़ा ज्यादा भरोसा था। जब वह उनके पास पहुँचा तो सरला चाची की साँसें तेज हो गईं, लेकिन शरीर नहीं काँपा। अमन ने धीरे से उनका हाथ छुआ। इस बार उन्होंने हाथ नहीं हटाया।
अमन झुक गया। पहले उनके माथे पर हल्का सा होंठ रखा। फिर गाल पर। सरला चाची की साँस रुक गई। अमन ने धीरे से उनके होंठों को छुआ। इस बार सरला चाची ने हल्के से जवाब दिया। उनके होंठ काँप रहे थे, लेकिन वे मुँह नहीं फेर रहीं थीं।
अमन ने धीरे-धीरे नीचे सरका। उनके स्तनों को हाथों में लिया। अँधेरे में भी उनका वजन और गर्माहट महसूस हो रही थी। उसने एक निप्पल को मुँह में ले लिया और बहुत धीरे से चूसने लगा। सरला चाची की लंबी सिसकारी निकली—पहली रात से थोड़ी साफ। अमन ने दूसरा स्तन भी वैसा ही चूसा। उनके शरीर में हल्की सिहरन दौड़ रही थी।
फिर वह और नीचे गया। जाँघों को फैलाया और मुँह उनकी चूत पर रख दिया। इस बार सरला चाची की प्रतिक्रिया तेज थी। उनकी कमर हल्की सी उठ गई। अमन ने जीभ से धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। कभी घुंडी चूसता, कभी जीभ अंदर ले जाता। सरला चाची के मुँह से लगातार हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं। कोई शब्द नहीं, लेकिन आवाज़ में पहली रात वाला डर अब नहीं था। बल्कि एक दबी हुई स्वीकृति थी।
थोड़ी देर बाद उनका शरीर अकड़ गया। पानी की गर्मी अमन की जीभ पर फैल गई। अमन ने सब कुछ शांत भाव से स्वीकार किया। फिर ऊपर उठा।
इस बार जब उसने अपना लंड उनकी गीली चूत पर रखा तो सरला चाची ने खुद हल्के से पैर और फैला दिए। अमन ने धीरे से प्रवेश किया। एक-एक पल रुक-रुककर। जब पूरा अंदर गया तो दोनों की साँसें एक साथ निकलीं। अमन ने उनका चेहरा दोनों हाथों में लिया और फिर से चूमा। इस बार चुंबन थोड़ा लंबा था। सरला चाची के होंठ अब थोड़े जवाब दे रहे थे।
अमन ने धीमे धक्के शुरू किए। सरला चाची की सिसकारियाँ अब हर धक्के के साथ निकल रही थीं। कभी-कभी उनका हाथ अमन की पीठ पर जाकर टिक जाता। जैसे वे उसे रोकना नहीं चाहतीं। अमन उनके स्तन चूसता रहा और नीचे लगातार लेकिन कोमल धक्के मारता रहा। समय धीरे-धीरे बीत रहा था। अँधेरे में सिर्फ उनकी मिली-जुली साँसें और शरीर की हल्की आवाज़ें थीं।
लगभग चालीस मिनट बाद अमन ने महसूस किया कि वह अपनी सीमा के करीब है। उसने धक्के थोड़े गहरे किए। सरला चाची की सिसकारी इस बार थोड़ी जोर से निकली। उनका शरीर काँप रहा था। अमन ने आखिरी कुछ धक्के लगाए और फिर अपना पानी उनकी कोख में छोड़ दिया। गरम धार के साथ सरला चाची का शरीर भी एक लंबी सिहरन में काँप गया।
अमन कुछ देर उनके ऊपर पड़ा रहा। उनके बालों में हाथ फेरता रहा। फिर धीरे से बाहर निकला। कपड़े ठीक किए। उठते समय उसने अँधेरे में उनका हाथ एक बार फिर दबाया—जैसे बिना शब्दों के कह रहा हो कि वह यहाँ है।
फिर वह चुपचाप दरवाजे की तरफ बढ़ा और गलियारे में निकल गया।
पीछे स्टोर रूम में सरला चाची अँधेरे में लेटी रहीं। आँखें खुली हुईं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
वह लड़का… फिर से आया था।
और इस बार… उसने और भी प्यार से छुआ था।
अगला दिन
सुबह सरला चाची जब उठीं तो उनके चेहरे पर पिछले कई दिनों की उदासी थोड़ी कम थी। आँखों में हल्की सी थकान जरूर थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी शांत संतुष्टि भी झलक रही थी। पिछले दो रातों की कोमल चुदाई ने उनके शरीर को थकाया जरूर था, लेकिन मन को एक अनोखा सुकून भी दिया था। वे शरीफ और पतिव्रता औरत थीं। इसलिए ज्यादा गहराई में जाकर सोचती नहीं थीं। बस इतना महसूस कर रही थीं कि वह अज्ञात लड़का… अब उनके अंदर एक हल्की सी जगह बना चुका है। उसका स्पर्श, उसकी साँस, उसकी नर्मी—सब याद आ रहा था।
अमन जब नाश्ते पर बैठा तो उसने सरला चाची को गौर से देखा। आज वे थोड़ी हल्की लग रही थीं। माँ से बात करते समय उनकी आवाज में पहले जितनी भारीपन नहीं थी। अमन ने नज़रें झुका लीं और चुपचाप नाश्ता करने लगा।
कॉलेज जाते समय राधा मिली। दोनों की बातें नॉर्मल रहीं। अमन ने हल्की मुस्कान दी और उसके साथ थोड़ी देर चला। कॉलेज में राजिया ने ब्रेक में अमन को एक तरफ खींचा। इस बार उसकी आँखों में असल बेचैनी थी।
“मेरी जान जा रही है अमन,” राजिया ने बहुत धीमे लेकिन तीखे स्वर में कहा। “तुमने वादा किया था। अब और नहीं सह सकती।”
अमन ने चारों तरफ देखा। फिर उसकी आँखों में आँखें डालकर बोला, “राजिया… बस चार दिन और। सिर्फ चार दिन। उसके बाद एक दिन भी देर नहीं करूँगा। पक्का वादा। मेरी कसम।”
राजिया ने उसकी आँखों में देखा। बहुत देर तक कुछ नहीं बोली। फिर नाक सुड़कते हुए बोली, “चार दिन… सिर्फ चार दिन। उससे एक घंटा भी ज्यादा हुआ तो मैं खुद तुम्हारे घर आ जाऊँगी।” इतना कहकर वह चली गई। अमन ने राहत की साँस ली।
घर लौटकर अमन ने बहनों के साथ थोड़ी मस्ती की। कविता के बाल खींचे, मीना के साथ मजाक किया। दोनों हँसने लगीं। कमला चाची जब पास से गुजरीं तो अमन ने उनकी कमर पर हल्का हाथ रखकर आँख मारी। कमला चाची ने आँखें नचते हुए धमकी दी, “शाम को बात करते हैं,” और आगे बढ़ गईं।
रात का खाना खत्म होने के बाद अमन अपने कमरे में चला गया। घड़ी की सुई धीरे-धीरे एक बजे के करीब पहुँच रही थी। दिल की धड़कन फिर से तेज होने लगी। आज तीसरी रात थी।
वह उठकर स्टोर रूम की तरफ चल दिया।
आज सरला चाची शायद थोड़ी कम डरी हुई होंगी… और थोड़ी ज्यादा अपनी।
चार दिन बाद
चार रातें और बीत चुकी थीं।
स्टोर रूम का अँधेरा अब सरला चाची के लिए डरावना नहीं रह गया था। बल्कि एक अजीब सी लत बन चुका था। हर रात एक बजे जब रेणु उन्हें बुलातीं, तो उनका दिल जोर से धड़कने लगता। डर के साथ-साथ एक बेचैन उत्सुकता भी होती। वह अज्ञात लड़का हर रात आता… और हर रात पहले से थोड़ा ज्यादा अपना लगता।
लेकिन सुबह होते ही गुनाह का बोझ सिर पर चढ़ जाता।
आज सुबह सरला चाची बहुत देर तक बिस्तर पर पड़ी रहीं। आँखें छत पर टिकी थीं। मन में एक ही बात घूम रही थी—
“मैं क्या कर रही हूँ…?”
पति के रहते हुए किसी और मर्द के साथ सोना… बार-बार… और अब तो शरीर ही नहीं, मन भी उस अजनबी के स्पर्श को तरसने लगा है। यह सोचकर उनके माथे पर पसीना आ गया। वे शरीफ घर की औरत थीं। मंदिर जाती थीं, व्रत रखती थीं। और अब…?
फिर भी जब रात आती, तो शरीर खुद स्टोर रूम की तरफ खिंच जाता।
अमन ने भी इन चार दिनों में बदलाव महसूस किया था। सरला चाची अब अँधेरे में उसके छूते ही काँपती नहीं थीं। बल्कि कभी-कभी उनका हाथ खुद अमन की पीठ पर चला जाता। चुंबन का जवाब पहले से ज्यादा मिलने लगा था। एक रात तो उन्होंने अमन का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया था—बिना कुछ बोले।
लेकिन सुबह होते ही वे अमन से आँखें मिलाने से भी कतरातीं। जैसे खुद से शर्मिंदा हों।
आज नाश्ते के समय सरला चाची ने बहुत कम खाया। माँ ने पूछा तो बस इतना कहा, “सिर में दर्द है।” अमन की निगाह उन पर गई तो चाची ने जल्दी से नज़रें फेर लीं। उनकी आँखों में हल्की नमी थी।
रात का एक बजा।
अमन फिर स्टोर रूम पहुँचा। इस बार जब सरला चाची अंदर आईं तो उनके कदमों में एक अजीब सी थकान और हार थी। कपड़े उतारते समय उनके हाथ काँप रहे थे। लेटते समय उन्होंने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया—जैसे खुद से आँखें चुरा रही हों।
अमन पास गया। इस बार उसने पहले उनका हाथ पकड़ा। सरला चाची का शरीर सिहर उठा, लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। अमन ने धीरे से उनका चेहरा अपनी तरफ मोड़ा और माथे पर लंबा चुंबन किया। फिर आँखों पर। फिर होंठों पर।
इस बार सरला चाची की आँखों से आँसू बह निकले। अँधेरे में भी अमन को उनकी नम गालों का अहसास हो गया। उसने आँसू पोंछे… और फिर भी वे रुकीं नहीं।
“माफ करना…” अमन के मुँह से हल्की सी फुसफुसाहट निकल गई। पहली बार उसने अँधेरे में आवाज निकाली थी—बहुत धीमी।
सरला चाची का शरीर एक पल के लिए तन गया। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अमन के कंधे पर अपना माथा टिका दिया। आँसू अभी भी बह रहे थे।
अमन ने उन्हें गले से लगा लिया। बहुत देर तक सिर्फ पकड़े रखा। कोई जल्दबाजी नहीं की। जब सरला चाची की साँसें थोड़ी शांत हुईं, तभी उसने धीरे-धीरे आगे बढ़ाया।
आज की रात भी शरीर मिले।
लेकिन इस बार मिलन के साथ-साथ एक भारी, चुपचाप गुनाह का बोझ भी दोनों के बीच पड़ा रहा।
सरला चाची आँसू बहाते हुए भी उसे कसकर पकड़े रहीं।
क्योंकि अब वे समझ चुकी थीं—
यह शरीर की जरूरत नहीं रह गई थी।
अब यह दिल की कमजोरी बन चुकी थी।
स्टोर रूम
अँधेरा घना था।
सरला चाची पहले से नंगी लेटी हुई थीं। अमन पास पहुँचा तो उन्होंने खुद उसके हाथ को पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया। अमन झुका और उनके होंठों को जोर से चूसने लगा। इस बार चुंबन में कोमलता के साथ भूख भी थी। सरला चाची ने भी मुँह खोल दिया। दोनों की जीभ मिल गईं।
अमन ने उनके दोनों स्तन मुँह में भर-भरकर चूसे। निप्पल को दाँतों से हल्के काटा तो सरला चाची की लंबी सिसकारी निकल गई। वह नीचे गया। जाँघें फैलाईं और जीभ उनकी चूत पर रख दी। इस बार सरला चाची की प्रतिक्रिया तेज थी। उन्होंने अमन का सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया और अपनी चूत पर और जोर से दबाने लगीं। अमन ने जीभ अंदर तक डालकर चूसा। थोड़ी देर में ही सरला चाची का पानी उसके मुँह में छूट गया। वे काँपती रहीं।
अमन ऊपर आया। लंड उनके गीले छेद पर रखा और एक ही धक्के में अंदर तक घुसा दिया। सरला चाची की चीख दब गई। अमन ने उनकी दोनों टाँगें अपनी कमर पर चढ़ाईं और जोर-जोर से चोदने लगा। अब नर्मी कम थी, भूख ज्यादा। हर धक्के के साथ सरला चाची की सिसकारियाँ निकल रही थीं। उनके नाखून अमन की पीठ पर गड़ गए।
“आह्ह… और… जोर से…” पहली बार उनके मुँह से अधूरे शब्द निकले।
अमन ने रफ्तार बढ़ा दी। स्तनों को मसलते हुए, निप्पलों को चूसते हुए वह उन्हें बुरी तरह पेले जा रहा था। सरला चाची का शरीर बार-बार काँप रहा था। तीसरी बार पानी छोड़ते समय उन्होंने अमन को इतनी जोर से पकड़ा कि उसके कंधे में नाखून धँस गए।
अमन खुद भी अब सीमा पर था। उसने उनकी गाँड के नीचे दोनों हाथ डाले और गहरे-गहरे धक्के मारते हुए अपना पूरा पानी उनकी कोख में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से चिपके काँपते रहे।
थोड़ी देर बाद अमन ने लंड बाहर निकाला। सरला चाची की चूत से उसका पानी रिस रहा था। अमन ने झुककर उनके होंठों पर एक लंबा चुंबन किया… फिर चुपचाप उठकर चला गया।
पीछे अँधेरे में सरला चाची लेटी रहीं।
टाँगें फैली हुईं।
साँसें उखड़ी हुईं।
और आँखों में वह अज्ञात लड़का जिसने उन्हें फिर से बर्बाद कर दिया था।
बाकी के दिन और रातें
तीसरी रात के बाद से सिलसिला नियमित हो गया था।
हर रात ठीक एक बजे अमन स्टोर रूम पहुँच जाता। सरला चाची अब डरती नहीं थीं। बल्कि जब अमन अँधेरे में उनके पास जाता तो वे खुद उसके हाथ को पकड़कर अपने शरीर पर रख देतीं। कुछ रातों में अमन बहुत कोमल रहता—धीमे चुंबन, लंबे समय तक चूसना, और बहुत आराम से अंदर जाना। कुछ रातों में भूख ज्यादा होती। वह उनकी टाँगें फैलाकर जोर से पेलता, स्तनों को मसलता और गहरी सिसकारियाँ सुनता। हर रात के आखिर में वह अपना पानी उनकी कोख में छोड़कर चुपचाप निकल जाता। सरला चाची अँधेरे में लेटी रहतीं—कभी आँसू बहातीं, कभी सिर्फ भारी साँसें लेतीं।
दिन का रूटीन लगभग एक जैसा था।
सुबह अमन उठता, सरला चाची को देखता तो पाता कि उनके चेहरे पर थकान के साथ एक अजीब सी शांत चमक भी है। नाश्ते में वे कम बोलतीं, लेकिन अब अमन से आँखें चुराना थोड़ा कम हो गया था। कभी-कभी उनकी निगाहें अमन पर ठहर जातीं और फिर जल्दी से हट जातीं—जैसे कुछ याद आ गया हो।
कॉलेज में राधा के साथ हल्की मीठी बातें होतीं। राजिया अब रोज ब्रेक में आकर सिर्फ इतना पूछती—“कितने दिन बाकी हैं?” अमन हर बार कहता, “जल्दी।” घर लौटकर बहनों के साथ थोड़ी मस्ती करता, कमला चाची के साथ आँख-मिचौली और हल्की छेड़खानी। रात का खाना खाकर अपने कमरे में चला जाता और एक बजे का इंतजार करता।
पाँचवीं रात को सरला चाची ने पहली बार अमन का हाथ पकड़कर अपने नीचे दबा लिया था—जैसे कह रही हों कि और गहराई तक आओ। छठी रात को जब अमन उन पर झुका तो उन्होंने खुद अपना मुँह उसके मुँह पर रख दिया था। चुंबन अब एकतरफा नहीं रह गया था।
सातवीं और आखिरी रात सबसे लंबी रही। अमन ने लगभग एक घंटे तक उन्हें अलग-अलग अंदाज में लिया। सरला चाची की सिसकारियाँ अब दब नहीं पा रही थीं। आखिर में जब अमन ने अपना पानी छोड़ा तो दोनों के शरीर लंबे समय तक काँपते रहे। उठते समय सरला चाची ने उसका हाथ कुछ पल तक पकड़कर रखा। फिर धीरे से छोड़ दिया।
अगली सुबह रेणु ने अमन को गलियारे में रोक लिया। हाथ में वही छोटा सफेद पैकेट था—प्रेग्नेंसी टेस्ट किट।
“आज टेस्ट होगा,” रेणु ने बहुत धीमी आवाज में कहा। “अब पता चल जाएगा कि सात रातों का नतीजा क्या निकला।”
अमन ने सिर हिलाया। दिल जोर से धड़क रहा था।
सात रातें खत्म हो चुकी थीं।
अब इंतजार था सिर्फ एक लकीर का—नेगेटिव या पॉजिटिव।
सुबह का समय सामान्य लग रहा था। अमन नाश्ता कर रहा था जब रेणु ने सरला चाची को धीरे से आँगन के कोने में बुलाया। दोनों कुछ देर के लिए अंदर चली गईं। लगभग बीस-पच्चीस मिनट बाद जब वे लौटीं तो सरला चाची के चेहरे का रंग ही बदल चुका था। आँखें लाल थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक तैर रही थी। होंठ काँप रहे थे। रेणु ने सबसे पहले माँ सुशीला के पास जाकर बहुत धीमे स्वर में कुछ कहा।
माँ की आँखें एकदम फटी रह गईं। “सच में…?” उनकी आवाज काँप गई।
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ माँ। पॉजिटिव आया है।”
माँ का हाथ मुँह पर चला गया। आँसू आ गए। वे तुरंत सरला चाची के पास गईं और उन्हें जोर से गले लगा लिया। “बहू… भगवान ने सुन लिया…” दोनों महिलाएँ एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगीं। खुशी के आँसू थे।
खबर आग की तरह फैली। कमला चाची दौड़ती हुई आईं। कविता और मीना भी आ गईं। घर में एक साथ हँसी और रोना दोनों चल रहा था। तभी चाचा रमेश अंदर आए। उन्होंने देखा सब लोग सरला चाची के चारों तरफ जमा हैं तो हैरानी से पूछा, “क्या हुआ?”
माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, “रमेश… बहू गर्भवती है।”
चाचा रमेश जैसे पत्थर होकर रह गए। कुछ पल तक वे हिले तक नहीं। फिर अचानक उनके चेहरे पर वह मुस्कान फैली जो अमन ने कभी नहीं देखी थी। वे लपककर सरला चाची के पास गए और उनका माथा बार-बार चूमने लगे। “सच में? सच में हो गया?” उनकी आवाज भर गई थी। “भगवान… तुमने सुन लिया आखिरकार!”
वे बार-बार सरला चाची का पेट देख रहे थे, जैसे वहाँ अभी कुछ दिख जाए। फिर अचानक वे उठे और बोले, “लड्डू… अभी लड्डू बँटवाने जाना है पूरे गाँव में!” इतना कहकर वे लगभग दौड़ते हुए बाहर निकल गए। उनकी खुशी देखकर पूरा घर हँसने लगा।
अमन सब कुछ चुपचाप देख रहा था। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह बाप बनने जा रहा था… और यहाँ सब लोग किसी और की खुशी में झूम रहे थे।
रेणु धीरे से उसके पास आईं। सबके बीच से गुजरती हुई उसके कान के बिल्कुल पास मुँह ले जाकर बहुत हल्के स्वर में बोलीं, “बधाई हो… बाप जी।” फिर दबी हुई हँसी में थोड़ा काँपते हुए आगे बढ़ गईं।
अमन का चेहरा गर्म हो गया। लेकिन वह मुस्कुरा दिया। अंदर ही अंदर एक अजीब सा तूफान उठ रहा था—खुशी, गर्व, और एक भारी सच का बोझ।
चाचा लगभग एक घंटे बाद लौटे। हाथ में लड्डू के बड़े-बड़े पैकेट थे। उन्होंने खुद अमन को दो लड्डू थमाए और उसकी पीठ थपथपाई। “खा बेटा! आज तेरे चाचा बाप बनने वाले हैं!” अमन ने लड्डू लिए और सिर हिलाया। कुछ बोल नहीं पाया।
पूरे दिन घर में आने-जाने वालों का ताँता लगा रहा। रिश्तेदार, पड़ोसी, सब बधाई देने आ रहे थे। सरला चाची बार-बार अपना हाथ पेट पर रखतीं। उनकी आँखों में एक नई रोशनी थी। कभी-कभी उनकी निगाह अमन पर ठहर जाती। एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलतीं… और फिर सरला चाची जल्दी से नज़रें झुका लेतीं। जैसे कोई अधूरी बात कहना चाहती हों, लेकिन शब्द न मिल रहे हों।
शाम को जब थोड़ी शांति हुई तो माँ ने अमन के बाल सहलाते हुए कहा, “आज तुम कॉलेज नहीं गए, अच्छा किया। परिवार की खुशी में शामिल होना भी जरूरी है।”
अमन ने सिर्फ मुस्कुराकर सिर हिलाया।
रात होते-होते घर थोड़ा शांत हुआ। अमन अपने कमरे में आया तो दरवाजा बंद करके बिस्तर पर बैठ गया। बाहर अभी भी कभी-कभी हँसी की आवाजें आ रही थीं। उसने अपना हाथ मुट्ठी में बंद किया।
वह सच में बाप बनने जा रहा था।
अपनी ही चाची का।
और पूरी दुनिया को लग रहा था कि खुशी किसी और की है।
अमन ने आँखें बंद कीं।
इस बार नींद बहुत देर से आई।
अमन की नींद बहुत देर से खुली। आँखें खुलते ही शरीर में हल्की थकान और मन में एक अजीब सा बोझ दोनों महसूस हुए। कल रात का अँधेरा, सरला चाची की दबी सिसकारियाँ और खुद का चुपचाप निकल जाना—सब कुछ ताजा था।
वह उठा। नहाते समय आईने में अपना चेहरा देखा। आँखों में नींद से ज्यादा उलझन थी। कपड़े पहनकर जब वह बाहर आया तो आँगन में माँ और कमला चाची पहले से बैठी थीं। सरला चाची रसोई की तरफ से निकलीं। अमन की निगाह उन पर गई।
सरला चाची ने सिर उठाया। एक पल के लिए उनकी निगाहें अमन से मिलीं। पहले जैसी घबराहट नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी शर्म और उलझन थी। उन्होंने जल्दी से नज़रें झुका लीं और चुपचाप चाय का कप उठाकर एक तरफ बैठ गईं। अमन ने महसूस किया कि उनका चलना थोड़ा धीमा है। शायद कल रात की थकान बाकी हो।
नाश्ते के समय माहौल सामान्य बनाने की कोशिश में सब लगे हुए थे। लेकिन अमन और सरला चाची दोनों ही चुप थे। कमला चाची ने अमन की तरफ देखकर भौंहें चढ़ाईं, जैसे पूछ रही हों कि सब ठीक है या नहीं। अमन ने हल्के से सिर हिला दिया।
नाश्ता करके वह कॉलेज के लिए निकला। रास्ते में मन भारी था। राधा मिली तो उसने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन राधा ने तुरंत पहचान लिया।
“आज और भी उदास लग रहे हो,” राधा ने धीमे स्वर में कहा।
अमन ने उसका हाथ हल्के से दबाया। “कुछ घर की बातें हैं। तुम टेंशन मत लो।” राधा ने और नहीं पूछा। बस उसके साथ चलती रही।
कॉलेज में राजिया ने दूर से देखा, लेकिन आज पास नहीं आई। शायद अमन के चेहरे पर लिखी थकान देखकर उसने दूरी रखी।
घर लौटने के बाद अमन ने ज्यादा देर आँगन में नहीं रुका। कविता ने कुछ कहा तो सिर्फ हल्की मुस्कान देकर आगे बढ़ गया। कमला चाची ने भी उसे बुलाया लेकिन उसने “थकान है चाची” कहकर कमरे में प्रवेश कर लिया।
शाम होते-होते रेणु ने मौका निकाला। गलियारे में अमन को रोककर बहुत धीमे स्वर में पूछा, “कल रात… कैसी रही?”
अमन ने चारों तरफ देखा। फिर फुसफुसाया, “मैंने… थोड़ा प्यार से किया दीदी। दर्द नहीं दिया।”
रेणु की आँखों में हल्की नमी थी। उन्होंने उसका हाथ दबाया। “अच्छा किया। वे आज सुबह से अजीब व्यवहार कर रही हैं। शायद महसूस कर गईं कि वह व्यक्ति अलग था।”
अमन ने पूछा, “अब? दूसरी रात भी वैसे ही?”
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन अब वे शायद इतनी डरी हुई नहीं होंगी। तुम वैसा ही रहना… कोमल। एक हफ्ता पूरा करना है।”
रेणु चली गईं। अमन अपने कमरे में आकर बिस्तर पर बैठ गया।
खिड़की से बाहर देखते हुए उसने धीरे से साँस छोड़ी।
आज रात फिर जाना था।
उसी अँधेरे में।
उसी औरत के पास… जो अब शायद उसे थोड़ा अलग अंदाज से महसूस करेंगी।
अमन फिर से उसी तरह स्टोर रूम पहुँचा। बक्सों के पीछे छुपकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद रेणु की आहट आई। फिर सरला चाची के कदम। इस बार उनके कदमों में पहली रात वाला डर नहीं था। हल्की घबराहट जरूर थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी तैयारी भी। रेणु बाहर गईं। सिटकिनी लगी। अँधेरा और गहरा हो गया।
अमन ने सुना कि सरला चाची इस बार ज्यादा देर तक खड़ी रहीं। जैसे हिम्मत जुटा रही हों। फिर कपड़ों के सरसराने की आवाज आई। धीरे-धीरे सब उतरा। और फिर वे चटाई पर लेट गईं।
अमन बक्सों के पीछे से निकला। इस बार उसके कदमों में थोड़ा ज्यादा भरोसा था। जब वह उनके पास पहुँचा तो सरला चाची की साँसें तेज हो गईं, लेकिन शरीर नहीं काँपा। अमन ने धीरे से उनका हाथ छुआ। इस बार उन्होंने हाथ नहीं हटाया।
अमन झुक गया। पहले उनके माथे पर हल्का सा होंठ रखा। फिर गाल पर। सरला चाची की साँस रुक गई। अमन ने धीरे से उनके होंठों को छुआ। इस बार सरला चाची ने हल्के से जवाब दिया। उनके होंठ काँप रहे थे, लेकिन वे मुँह नहीं फेर रहीं थीं।
अमन ने धीरे-धीरे नीचे सरका। उनके स्तनों को हाथों में लिया। अँधेरे में भी उनका वजन और गर्माहट महसूस हो रही थी। उसने एक निप्पल को मुँह में ले लिया और बहुत धीरे से चूसने लगा। सरला चाची की लंबी सिसकारी निकली—पहली रात से थोड़ी साफ। अमन ने दूसरा स्तन भी वैसा ही चूसा। उनके शरीर में हल्की सिहरन दौड़ रही थी।
फिर वह और नीचे गया। जाँघों को फैलाया और मुँह उनकी चूत पर रख दिया। इस बार सरला चाची की प्रतिक्रिया तेज थी। उनकी कमर हल्की सी उठ गई। अमन ने जीभ से धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। कभी घुंडी चूसता, कभी जीभ अंदर ले जाता। सरला चाची के मुँह से लगातार हल्की सिसकारियाँ निकल रही थीं। कोई शब्द नहीं, लेकिन आवाज़ में पहली रात वाला डर अब नहीं था। बल्कि एक दबी हुई स्वीकृति थी।
थोड़ी देर बाद उनका शरीर अकड़ गया। पानी की गर्मी अमन की जीभ पर फैल गई। अमन ने सब कुछ शांत भाव से स्वीकार किया। फिर ऊपर उठा।
इस बार जब उसने अपना लंड उनकी गीली चूत पर रखा तो सरला चाची ने खुद हल्के से पैर और फैला दिए। अमन ने धीरे से प्रवेश किया। एक-एक पल रुक-रुककर। जब पूरा अंदर गया तो दोनों की साँसें एक साथ निकलीं। अमन ने उनका चेहरा दोनों हाथों में लिया और फिर से चूमा। इस बार चुंबन थोड़ा लंबा था। सरला चाची के होंठ अब थोड़े जवाब दे रहे थे।
अमन ने धीमे धक्के शुरू किए। सरला चाची की सिसकारियाँ अब हर धक्के के साथ निकल रही थीं। कभी-कभी उनका हाथ अमन की पीठ पर जाकर टिक जाता। जैसे वे उसे रोकना नहीं चाहतीं। अमन उनके स्तन चूसता रहा और नीचे लगातार लेकिन कोमल धक्के मारता रहा। समय धीरे-धीरे बीत रहा था। अँधेरे में सिर्फ उनकी मिली-जुली साँसें और शरीर की हल्की आवाज़ें थीं।
लगभग चालीस मिनट बाद अमन ने महसूस किया कि वह अपनी सीमा के करीब है। उसने धक्के थोड़े गहरे किए। सरला चाची की सिसकारी इस बार थोड़ी जोर से निकली। उनका शरीर काँप रहा था। अमन ने आखिरी कुछ धक्के लगाए और फिर अपना पानी उनकी कोख में छोड़ दिया। गरम धार के साथ सरला चाची का शरीर भी एक लंबी सिहरन में काँप गया।
अमन कुछ देर उनके ऊपर पड़ा रहा। उनके बालों में हाथ फेरता रहा। फिर धीरे से बाहर निकला। कपड़े ठीक किए। उठते समय उसने अँधेरे में उनका हाथ एक बार फिर दबाया—जैसे बिना शब्दों के कह रहा हो कि वह यहाँ है।
फिर वह चुपचाप दरवाजे की तरफ बढ़ा और गलियारे में निकल गया।
पीछे स्टोर रूम में सरला चाची अँधेरे में लेटी रहीं। आँखें खुली हुईं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
वह लड़का… फिर से आया था।
और इस बार… उसने और भी प्यार से छुआ था।
अगला दिन
सुबह सरला चाची जब उठीं तो उनके चेहरे पर पिछले कई दिनों की उदासी थोड़ी कम थी। आँखों में हल्की सी थकान जरूर थी, लेकिन साथ में एक अजीब सी शांत संतुष्टि भी झलक रही थी। पिछले दो रातों की कोमल चुदाई ने उनके शरीर को थकाया जरूर था, लेकिन मन को एक अनोखा सुकून भी दिया था। वे शरीफ और पतिव्रता औरत थीं। इसलिए ज्यादा गहराई में जाकर सोचती नहीं थीं। बस इतना महसूस कर रही थीं कि वह अज्ञात लड़का… अब उनके अंदर एक हल्की सी जगह बना चुका है। उसका स्पर्श, उसकी साँस, उसकी नर्मी—सब याद आ रहा था।
अमन जब नाश्ते पर बैठा तो उसने सरला चाची को गौर से देखा। आज वे थोड़ी हल्की लग रही थीं। माँ से बात करते समय उनकी आवाज में पहले जितनी भारीपन नहीं थी। अमन ने नज़रें झुका लीं और चुपचाप नाश्ता करने लगा।
कॉलेज जाते समय राधा मिली। दोनों की बातें नॉर्मल रहीं। अमन ने हल्की मुस्कान दी और उसके साथ थोड़ी देर चला। कॉलेज में राजिया ने ब्रेक में अमन को एक तरफ खींचा। इस बार उसकी आँखों में असल बेचैनी थी।
“मेरी जान जा रही है अमन,” राजिया ने बहुत धीमे लेकिन तीखे स्वर में कहा। “तुमने वादा किया था। अब और नहीं सह सकती।”
अमन ने चारों तरफ देखा। फिर उसकी आँखों में आँखें डालकर बोला, “राजिया… बस चार दिन और। सिर्फ चार दिन। उसके बाद एक दिन भी देर नहीं करूँगा। पक्का वादा। मेरी कसम।”
राजिया ने उसकी आँखों में देखा। बहुत देर तक कुछ नहीं बोली। फिर नाक सुड़कते हुए बोली, “चार दिन… सिर्फ चार दिन। उससे एक घंटा भी ज्यादा हुआ तो मैं खुद तुम्हारे घर आ जाऊँगी।” इतना कहकर वह चली गई। अमन ने राहत की साँस ली।
घर लौटकर अमन ने बहनों के साथ थोड़ी मस्ती की। कविता के बाल खींचे, मीना के साथ मजाक किया। दोनों हँसने लगीं। कमला चाची जब पास से गुजरीं तो अमन ने उनकी कमर पर हल्का हाथ रखकर आँख मारी। कमला चाची ने आँखें नचते हुए धमकी दी, “शाम को बात करते हैं,” और आगे बढ़ गईं।
रात का खाना खत्म होने के बाद अमन अपने कमरे में चला गया। घड़ी की सुई धीरे-धीरे एक बजे के करीब पहुँच रही थी। दिल की धड़कन फिर से तेज होने लगी। आज तीसरी रात थी।
वह उठकर स्टोर रूम की तरफ चल दिया।
आज सरला चाची शायद थोड़ी कम डरी हुई होंगी… और थोड़ी ज्यादा अपनी।
चार दिन बाद
चार रातें और बीत चुकी थीं।
स्टोर रूम का अँधेरा अब सरला चाची के लिए डरावना नहीं रह गया था। बल्कि एक अजीब सी लत बन चुका था। हर रात एक बजे जब रेणु उन्हें बुलातीं, तो उनका दिल जोर से धड़कने लगता। डर के साथ-साथ एक बेचैन उत्सुकता भी होती। वह अज्ञात लड़का हर रात आता… और हर रात पहले से थोड़ा ज्यादा अपना लगता।
लेकिन सुबह होते ही गुनाह का बोझ सिर पर चढ़ जाता।
आज सुबह सरला चाची बहुत देर तक बिस्तर पर पड़ी रहीं। आँखें छत पर टिकी थीं। मन में एक ही बात घूम रही थी—
“मैं क्या कर रही हूँ…?”
पति के रहते हुए किसी और मर्द के साथ सोना… बार-बार… और अब तो शरीर ही नहीं, मन भी उस अजनबी के स्पर्श को तरसने लगा है। यह सोचकर उनके माथे पर पसीना आ गया। वे शरीफ घर की औरत थीं। मंदिर जाती थीं, व्रत रखती थीं। और अब…?
फिर भी जब रात आती, तो शरीर खुद स्टोर रूम की तरफ खिंच जाता।
अमन ने भी इन चार दिनों में बदलाव महसूस किया था। सरला चाची अब अँधेरे में उसके छूते ही काँपती नहीं थीं। बल्कि कभी-कभी उनका हाथ खुद अमन की पीठ पर चला जाता। चुंबन का जवाब पहले से ज्यादा मिलने लगा था। एक रात तो उन्होंने अमन का हाथ पकड़कर अपने स्तन पर रख दिया था—बिना कुछ बोले।
लेकिन सुबह होते ही वे अमन से आँखें मिलाने से भी कतरातीं। जैसे खुद से शर्मिंदा हों।
आज नाश्ते के समय सरला चाची ने बहुत कम खाया। माँ ने पूछा तो बस इतना कहा, “सिर में दर्द है।” अमन की निगाह उन पर गई तो चाची ने जल्दी से नज़रें फेर लीं। उनकी आँखों में हल्की नमी थी।
रात का एक बजा।
अमन फिर स्टोर रूम पहुँचा। इस बार जब सरला चाची अंदर आईं तो उनके कदमों में एक अजीब सी थकान और हार थी। कपड़े उतारते समय उनके हाथ काँप रहे थे। लेटते समय उन्होंने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया—जैसे खुद से आँखें चुरा रही हों।
अमन पास गया। इस बार उसने पहले उनका हाथ पकड़ा। सरला चाची का शरीर सिहर उठा, लेकिन हाथ नहीं छुड़ाया। अमन ने धीरे से उनका चेहरा अपनी तरफ मोड़ा और माथे पर लंबा चुंबन किया। फिर आँखों पर। फिर होंठों पर।
इस बार सरला चाची की आँखों से आँसू बह निकले। अँधेरे में भी अमन को उनकी नम गालों का अहसास हो गया। उसने आँसू पोंछे… और फिर भी वे रुकीं नहीं।
“माफ करना…” अमन के मुँह से हल्की सी फुसफुसाहट निकल गई। पहली बार उसने अँधेरे में आवाज निकाली थी—बहुत धीमी।
सरला चाची का शरीर एक पल के लिए तन गया। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अमन के कंधे पर अपना माथा टिका दिया। आँसू अभी भी बह रहे थे।
अमन ने उन्हें गले से लगा लिया। बहुत देर तक सिर्फ पकड़े रखा। कोई जल्दबाजी नहीं की। जब सरला चाची की साँसें थोड़ी शांत हुईं, तभी उसने धीरे-धीरे आगे बढ़ाया।
आज की रात भी शरीर मिले।
लेकिन इस बार मिलन के साथ-साथ एक भारी, चुपचाप गुनाह का बोझ भी दोनों के बीच पड़ा रहा।
सरला चाची आँसू बहाते हुए भी उसे कसकर पकड़े रहीं।
क्योंकि अब वे समझ चुकी थीं—
यह शरीर की जरूरत नहीं रह गई थी।
अब यह दिल की कमजोरी बन चुकी थी।
स्टोर रूम
अँधेरा घना था।
सरला चाची पहले से नंगी लेटी हुई थीं। अमन पास पहुँचा तो उन्होंने खुद उसके हाथ को पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिया। अमन झुका और उनके होंठों को जोर से चूसने लगा। इस बार चुंबन में कोमलता के साथ भूख भी थी। सरला चाची ने भी मुँह खोल दिया। दोनों की जीभ मिल गईं।
अमन ने उनके दोनों स्तन मुँह में भर-भरकर चूसे। निप्पल को दाँतों से हल्के काटा तो सरला चाची की लंबी सिसकारी निकल गई। वह नीचे गया। जाँघें फैलाईं और जीभ उनकी चूत पर रख दी। इस बार सरला चाची की प्रतिक्रिया तेज थी। उन्होंने अमन का सिर दोनों हाथों से पकड़ लिया और अपनी चूत पर और जोर से दबाने लगीं। अमन ने जीभ अंदर तक डालकर चूसा। थोड़ी देर में ही सरला चाची का पानी उसके मुँह में छूट गया। वे काँपती रहीं।
अमन ऊपर आया। लंड उनके गीले छेद पर रखा और एक ही धक्के में अंदर तक घुसा दिया। सरला चाची की चीख दब गई। अमन ने उनकी दोनों टाँगें अपनी कमर पर चढ़ाईं और जोर-जोर से चोदने लगा। अब नर्मी कम थी, भूख ज्यादा। हर धक्के के साथ सरला चाची की सिसकारियाँ निकल रही थीं। उनके नाखून अमन की पीठ पर गड़ गए।
“आह्ह… और… जोर से…” पहली बार उनके मुँह से अधूरे शब्द निकले।
अमन ने रफ्तार बढ़ा दी। स्तनों को मसलते हुए, निप्पलों को चूसते हुए वह उन्हें बुरी तरह पेले जा रहा था। सरला चाची का शरीर बार-बार काँप रहा था। तीसरी बार पानी छोड़ते समय उन्होंने अमन को इतनी जोर से पकड़ा कि उसके कंधे में नाखून धँस गए।
अमन खुद भी अब सीमा पर था। उसने उनकी गाँड के नीचे दोनों हाथ डाले और गहरे-गहरे धक्के मारते हुए अपना पूरा पानी उनकी कोख में उड़ेल दिया। दोनों एक-दूसरे से चिपके काँपते रहे।
थोड़ी देर बाद अमन ने लंड बाहर निकाला। सरला चाची की चूत से उसका पानी रिस रहा था। अमन ने झुककर उनके होंठों पर एक लंबा चुंबन किया… फिर चुपचाप उठकर चला गया।
पीछे अँधेरे में सरला चाची लेटी रहीं।
टाँगें फैली हुईं।
साँसें उखड़ी हुईं।
और आँखों में वह अज्ञात लड़का जिसने उन्हें फिर से बर्बाद कर दिया था।
बाकी के दिन और रातें
तीसरी रात के बाद से सिलसिला नियमित हो गया था।
हर रात ठीक एक बजे अमन स्टोर रूम पहुँच जाता। सरला चाची अब डरती नहीं थीं। बल्कि जब अमन अँधेरे में उनके पास जाता तो वे खुद उसके हाथ को पकड़कर अपने शरीर पर रख देतीं। कुछ रातों में अमन बहुत कोमल रहता—धीमे चुंबन, लंबे समय तक चूसना, और बहुत आराम से अंदर जाना। कुछ रातों में भूख ज्यादा होती। वह उनकी टाँगें फैलाकर जोर से पेलता, स्तनों को मसलता और गहरी सिसकारियाँ सुनता। हर रात के आखिर में वह अपना पानी उनकी कोख में छोड़कर चुपचाप निकल जाता। सरला चाची अँधेरे में लेटी रहतीं—कभी आँसू बहातीं, कभी सिर्फ भारी साँसें लेतीं।
दिन का रूटीन लगभग एक जैसा था।
सुबह अमन उठता, सरला चाची को देखता तो पाता कि उनके चेहरे पर थकान के साथ एक अजीब सी शांत चमक भी है। नाश्ते में वे कम बोलतीं, लेकिन अब अमन से आँखें चुराना थोड़ा कम हो गया था। कभी-कभी उनकी निगाहें अमन पर ठहर जातीं और फिर जल्दी से हट जातीं—जैसे कुछ याद आ गया हो।
कॉलेज में राधा के साथ हल्की मीठी बातें होतीं। राजिया अब रोज ब्रेक में आकर सिर्फ इतना पूछती—“कितने दिन बाकी हैं?” अमन हर बार कहता, “जल्दी।” घर लौटकर बहनों के साथ थोड़ी मस्ती करता, कमला चाची के साथ आँख-मिचौली और हल्की छेड़खानी। रात का खाना खाकर अपने कमरे में चला जाता और एक बजे का इंतजार करता।
पाँचवीं रात को सरला चाची ने पहली बार अमन का हाथ पकड़कर अपने नीचे दबा लिया था—जैसे कह रही हों कि और गहराई तक आओ। छठी रात को जब अमन उन पर झुका तो उन्होंने खुद अपना मुँह उसके मुँह पर रख दिया था। चुंबन अब एकतरफा नहीं रह गया था।
सातवीं और आखिरी रात सबसे लंबी रही। अमन ने लगभग एक घंटे तक उन्हें अलग-अलग अंदाज में लिया। सरला चाची की सिसकारियाँ अब दब नहीं पा रही थीं। आखिर में जब अमन ने अपना पानी छोड़ा तो दोनों के शरीर लंबे समय तक काँपते रहे। उठते समय सरला चाची ने उसका हाथ कुछ पल तक पकड़कर रखा। फिर धीरे से छोड़ दिया।
अगली सुबह रेणु ने अमन को गलियारे में रोक लिया। हाथ में वही छोटा सफेद पैकेट था—प्रेग्नेंसी टेस्ट किट।
“आज टेस्ट होगा,” रेणु ने बहुत धीमी आवाज में कहा। “अब पता चल जाएगा कि सात रातों का नतीजा क्या निकला।”
अमन ने सिर हिलाया। दिल जोर से धड़क रहा था।
सात रातें खत्म हो चुकी थीं।
अब इंतजार था सिर्फ एक लकीर का—नेगेटिव या पॉजिटिव।
सुबह का समय सामान्य लग रहा था। अमन नाश्ता कर रहा था जब रेणु ने सरला चाची को धीरे से आँगन के कोने में बुलाया। दोनों कुछ देर के लिए अंदर चली गईं। लगभग बीस-पच्चीस मिनट बाद जब वे लौटीं तो सरला चाची के चेहरे का रंग ही बदल चुका था। आँखें लाल थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक तैर रही थी। होंठ काँप रहे थे। रेणु ने सबसे पहले माँ सुशीला के पास जाकर बहुत धीमे स्वर में कुछ कहा।
माँ की आँखें एकदम फटी रह गईं। “सच में…?” उनकी आवाज काँप गई।
रेणु ने सिर हिलाया। “हाँ माँ। पॉजिटिव आया है।”
माँ का हाथ मुँह पर चला गया। आँसू आ गए। वे तुरंत सरला चाची के पास गईं और उन्हें जोर से गले लगा लिया। “बहू… भगवान ने सुन लिया…” दोनों महिलाएँ एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगीं। खुशी के आँसू थे।
खबर आग की तरह फैली। कमला चाची दौड़ती हुई आईं। कविता और मीना भी आ गईं। घर में एक साथ हँसी और रोना दोनों चल रहा था। तभी चाचा रमेश अंदर आए। उन्होंने देखा सब लोग सरला चाची के चारों तरफ जमा हैं तो हैरानी से पूछा, “क्या हुआ?”
माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, “रमेश… बहू गर्भवती है।”
चाचा रमेश जैसे पत्थर होकर रह गए। कुछ पल तक वे हिले तक नहीं। फिर अचानक उनके चेहरे पर वह मुस्कान फैली जो अमन ने कभी नहीं देखी थी। वे लपककर सरला चाची के पास गए और उनका माथा बार-बार चूमने लगे। “सच में? सच में हो गया?” उनकी आवाज भर गई थी। “भगवान… तुमने सुन लिया आखिरकार!”
वे बार-बार सरला चाची का पेट देख रहे थे, जैसे वहाँ अभी कुछ दिख जाए। फिर अचानक वे उठे और बोले, “लड्डू… अभी लड्डू बँटवाने जाना है पूरे गाँव में!” इतना कहकर वे लगभग दौड़ते हुए बाहर निकल गए। उनकी खुशी देखकर पूरा घर हँसने लगा।
अमन सब कुछ चुपचाप देख रहा था। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह बाप बनने जा रहा था… और यहाँ सब लोग किसी और की खुशी में झूम रहे थे।
रेणु धीरे से उसके पास आईं। सबके बीच से गुजरती हुई उसके कान के बिल्कुल पास मुँह ले जाकर बहुत हल्के स्वर में बोलीं, “बधाई हो… बाप जी।” फिर दबी हुई हँसी में थोड़ा काँपते हुए आगे बढ़ गईं।
अमन का चेहरा गर्म हो गया। लेकिन वह मुस्कुरा दिया। अंदर ही अंदर एक अजीब सा तूफान उठ रहा था—खुशी, गर्व, और एक भारी सच का बोझ।
चाचा लगभग एक घंटे बाद लौटे। हाथ में लड्डू के बड़े-बड़े पैकेट थे। उन्होंने खुद अमन को दो लड्डू थमाए और उसकी पीठ थपथपाई। “खा बेटा! आज तेरे चाचा बाप बनने वाले हैं!” अमन ने लड्डू लिए और सिर हिलाया। कुछ बोल नहीं पाया।
पूरे दिन घर में आने-जाने वालों का ताँता लगा रहा। रिश्तेदार, पड़ोसी, सब बधाई देने आ रहे थे। सरला चाची बार-बार अपना हाथ पेट पर रखतीं। उनकी आँखों में एक नई रोशनी थी। कभी-कभी उनकी निगाह अमन पर ठहर जाती। एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलतीं… और फिर सरला चाची जल्दी से नज़रें झुका लेतीं। जैसे कोई अधूरी बात कहना चाहती हों, लेकिन शब्द न मिल रहे हों।
शाम को जब थोड़ी शांति हुई तो माँ ने अमन के बाल सहलाते हुए कहा, “आज तुम कॉलेज नहीं गए, अच्छा किया। परिवार की खुशी में शामिल होना भी जरूरी है।”
अमन ने सिर्फ मुस्कुराकर सिर हिलाया।
रात होते-होते घर थोड़ा शांत हुआ। अमन अपने कमरे में आया तो दरवाजा बंद करके बिस्तर पर बैठ गया। बाहर अभी भी कभी-कभी हँसी की आवाजें आ रही थीं। उसने अपना हाथ मुट्ठी में बंद किया।
वह सच में बाप बनने जा रहा था।
अपनी ही चाची का।
और पूरी दुनिया को लग रहा था कि खुशी किसी और की है।
अमन ने आँखें बंद कीं।
इस बार नींद बहुत देर से आई।
Fuckuguy
albertprince547;
albertprince547;


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