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अध्याय 41: दोहरा मन
होटल के कमरे का भारी लकड़ी का दरवाज़ा मैंने जैसे ही अपने पीछे बंद किया, मेरे माथे से पसीना बहकर मेरी पलकों पर आ गिरा था। कमरे की सेंट्रल एयर-कंडीशनिंग की ठंडी, बासी हवा सीधे मेरे चेहरे पर लगी, लेकिन मेरे भीतर जो आग सुलग रही थी, वो किसी भी तापमान से शांत होने वाली नहीं थी।
मैंने अपने जूते तक ठीक से नहीं खोले। ब्रीफकेस को सीधे कालीन पर पटका और अपने कांपते हुए हाथों से सीधे डेस्क की तरफ लपका।
लैपटॉप का ढक्कन उठाते ही उसकी नीली स्क्रीन पानी उठी। मेरी उंगलियां कीबोर्ड पर इतनी तेज़ी से चलीं कि पासवर्ड दो बार गलत टाइप हुआ। तीसरी बार में जब ऑथेंटिकेशन हुआ, तो पुणे के बानेर स्थित फ्लैट के क्लोज़्ड-सर्किट सर्विलांस का रिमोट सॉफ्टवेयर स्क्रीन पर खुल गया।
चार विंडो।
@@Cam_MainDoor_01@@, @@Cam_Living_01@@, @@Cam_MasterBed_01@@, और @@Cam_Kitchen_01@@।
स्क्रीन पर अभी सन्नाटा था। फ्लैट ९०३ का लिविंग रूम खाली पड़ा था। सोफे के कुशन थोड़े अस्त-बिज़ी थे, और सेंटर टेबल पर पानी का एक खाली जग रखा था, वही मंज़र जो दोपहर के उस भयानक हादसे के वक़्त छूटा था जब काव्या बदहवास हालत में ताऊजी और अनु को लेकर हॉस्पिटल भागी थी।
टाइमस्टैम्प दिखा रहा था: रात के ७:४२।
मेरी धड़कनें मेरे कानों में हथौड़ों की तरह बज रही थीं। मैं अपनी घूमने वाली कुर्सी के किनारे पर टिका हुआ, अपनी दोनों हथेलियों को डेस्क पर गड़ाए स्क्रीन को घूर रहा था।
और ठीक ७:४७ पर... Cam_MainDoor_01 के मोशन सेंसर ने बीप की।
दरवाज़े की भारी कुंडी बाहर से खुली।
सबसे पहले काव्या अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ा हुआ था। सुबह जो लैवेंडर रंग का रेशमी सलवार-सूट उसने करीने से पहना था, वो अब बुरी तरह सिलवटों से भरा था। उसका बादामी कश्मीरी शॉल एक कंधे से बेतरतीब ढलका हुआ था, और माथे की लटें पसीने से चिपक गयी थीं।
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लेकिन उसकी नज़रें पीछे थीं, पूरी तरह किसी की हिफाज़त में जुटी हुईं।
"आराम से ताऊजी... चौखट पर पैर संभालिए... धीरे..." काव्या की आवाज़ में एक अजीब सा, हलक चीर देने वाला खिंचाव था।
और फिर वो विशाल, देहाती जिस्म चौखट के भीतर आया।
उनको देखते ही मेरे सीने में एक भयानक कंपकंपी दौड़ गई।
सुखदेव ताऊजी... छह फीट एक इंच का वो अखाड़े का शेर... आज दोनों घुटनों से थोड़ा झुककर चल रहा था। उनके दोनों हाथ... कलाई से लेकर पूरी कोहनी के ऊपर तक... मोटे, खुरदुरे और भारी सफेद प्लास्टर में जकड़े हुए थे। दोनों बाहें काली मेडिकल स्लिंग्स (पट्टियों) के सहारे उनकी चौड़ी गर्दन से लटकी हुई थीं। उनकी उंगलियां प्लास्टर के सिरे से बाहर निकली थीं, नीली, सूजी हुई और पूरी तरह बेजान।
वो अपनी उंगलियों का एक पोर तक नहीं हिला पा रहे थे।
सफेद खादी का कुर्ता जो वो सुबह पहनते थे, वो हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने कैंची से काटकर अलग कर दिया होगा, क्योंकि इस टाइम उनके बदन पर सिर्फ एक बिना आस्तीन की सफेद कॉटन बनियान थी। बनियान पर जगह-जगह खून और ज़ंग लगे लोहे के भूरे दाग थे। उनकी चौड़ी, रोएंदार छाती हर सांस के साथ भारी धौंकनी की तरह फूल और पिचक रही थी। उनके माथे पर दर्द की गहरी, काली लकीरें खिंची थीं, और होंठ सूखे पापड़ की तरह फटे हुए थे।
उनके ठीक पीछे, अनु दबे पांव अंदर आई। उसकी गुलाबी फ्रॉक धूल से सनी थी, और उसकी आंखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। वो काव्या के कुर्ते का कोना पकड़ना चाहती थी, लेकिन काव्या का पूरा वजूद सिर्फ और सिर्फ ताऊजी को संभालने में लगा था।
"यहाँ बैठिए... दीवान पर... हाँ, टेक लगाइए..." काव्या ने ताऊजी के भारी, मांसल कंधे को सहारा दिया।
ताऊजी के बदन का पूरा भार जब काव्या के नाज़ुक बदन पर आया, तो काव्या के पैर एक पल के लिए लड़खड़ाए, लेकिन उसने अपने पूरे वजूद का ज़ोर लगाकर उस विशाल जिस्म को दीवान पर टिकने में मदद की। ताऊजी के मुंह से एक दबी हुई, कराहती हुई चीख निकली, "आह्ह... भगवान...!"
"दर्द बहुत ज़्यादा है ना ताऊजी?" काव्या उनके सामने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई। उसने अपने कांपते हाथों से ताऊजी के पैरों से चमड़े की चप्पलें उतारीं। "डॉक्टर ने कहा है कि रात को इंजेक्शन का असर कम होगा तो टीस बढ़ेगी... मैं अभी गर्म हल्दी का दूध बनाती हूँ और पेनकिलर देती हूँ।"
ताऊजी ने अपनी बंद आंखों से धीरे से सिर हिलाया। उनके माथे से पसीने की एक मोटी बूंद ढलकर उनकी दाढ़ी में समा गई।
"तू... तू परेशान मत हो, बहू..." ताऊजी की भारी, देहाती आवाज़ दर्द की वजह से कांप रही थी। "हड्डी ही तो चटकी है... अखाड़े में इससे बुरी मार सही है मैंने। तू बस बैठ जा... दिन भर से दौड़ी है तू।"
"आप चुप रहिए ताऊजी!" काव्या की आवाज़ में अचानक एक ऐसा अधिकार, एक ऐसी सख्त ममता उभरी जो मैंने अपनी आठ साल की शादी में कभी नहीं सुनी थी। "दो-दो जगह से हड्डियां चकनाचूर हुई हैं आपकी... और आप कहते हैं कुछ नहीं हुआ? अगर ज़रा सी भी देर हो जाती तो..."
काव्या का गला रुंध गया। उसने अपनी दोनों हथेलियों में अपना चेहरा छिपा लिया और दीवान के पाए से सिर टिकाकर सिसक पड़ी।
मैं हैदराबाद में स्क्रीन के सामने बैठा अपनी सांसें रोक चुका था। काव्या का वो रोना किसी औपचारिकता का नहीं था; वो उस भयानक सदमे का रेचन था जो उसने पिछले चार घंटों से हॉस्पिटल के गलियारों में अकेले झेला था।
और तभी... वो हुआ जिसने उस पूरे घर की हवा को ज़हरीला बना दिया।
अनु, जो अब तक लिविंग रूम के कालीन पर सहमी हुई खड़ी थी, ऊब और भूख से मचलने लगी। उसने सेंटर टेबल के पास जाकर अपने पैर से एक स्टील का गिलास हिला दिया।
झन... झन... खड़खड़खड़!
खाली स्टील का गिलास संगमरमर के ठंडे फर्श पर गोल-गोल घूमता हुआ तेज़ आवाज़ के साथ गूंज उठा।
ताऊजी दर्द के मारे चौंक गये, उनकी घायल बांह स्लिंग में हल्का सा झटका खा गयी और उनके मुंह से एक तीखी सिसकारी निकली, "उफ़्फ़...!"
अनु ने उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। उसने अपने दोनों छोटे हाथ अपनी कमर पर रखे और एक चिड़चिड़ी, बचकानी ज़िद के साथ रोनी सूरत बनाकर बोली, "मम्मा! मुझे भूख लगी है... मुझे कार्टून देखना है! रिमोट कहाँ है? कब से हॉस्पिटल में बैठे-बैठे मेरे पैर दुख रहे हैं... मुझे टीवी चला कर दो ना!"
उस एक पल में... काव्या का पूरा शरीर पत्थर की तरह सख्त हो गया।
उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
भगवान गवाह है, Cam_Living_01 के हाई-डेफिनिशन लेंस से मैंने काव्या की जो आंखें उस पल देखीं, उनसे मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ की एक धार उतर गई।
वो मेरी शांत, संस्कारी, कोरगांव पार्क की नफीस और नर्मदिल पत्नी काव्या नहीं थी।
उसकी आंखों की पुतलियां सिकुड़कर कोयले की तरह सुलग रही थीं। उसके नथुने फड़क रहे थे, और जब वो फर्श से उठी, तो उसकी चाल में एक खूंखार, ज़हरीला तनाव था।
"चुप करो अनु!"
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काव्या की आवाज़ में ऐसी ठंडी, हिंसक कड़वाहट थी कि अनु वहीं की वहीं सहमकर दो कदम पीछे हट गई।
"मम्मा...?" अनु की आवाज़ गले में ही अटक गई।
"एक शब्द और नहीं निकलेगा तुम्हारे मुंह से!" काव्या अपनी बेटी के बिलकुल करीब आ खड़ी हुई। उसने अपनी उंगली अनु के चेहरे के सामने तान दी। उसकी आवाज़ भले ही चीखने वाली नहीं थी, लेकिन उस धीमी, फुसफुसाती हुई डांट में जो ज़हर था, उसने कमरे की सारी ऑक्सीजन सोख ली थी। "तुमको ज़रा भी शर्म नहीं आती? ज़रा सा भी अहसास है कि तुम्हारी उस बेहूदा, लापरवाह ज़िद की वजह से आज इस घर में क्या हो गया है?!"
"काव्या... बहू..." ताऊजी ने दीवान से अपनी भारी गर्दन उठाने की कोशिश की। "अनु है... अभी नादान है... छोड़ उसे..."
"नहीं ताऊजी, आप बीच में मत बोलिए!" काव्या ने मुड़कर देखे बिना कहा, उसकी पूरी नफरत उस टाइम अपनी ही बेटी पर केंद्रित थी। "अगर आज इस लड़की ने उस भारी गेट के नीचे गेंद के पीछे दौड़ने की बदतमीज़ी न की होती... तो आज आपके हाथ सलामत होते! सौ बार मना किया था मैंने कि मेन गेट के पास मत खेला करो... लेकिन नहीं! वही ढीठपन, वही गैर-ज़िम्मेदाराना बचकानापन!"
काव्या की आंखें लाल अंगारे जैसी हो चुकी थीं। और फिर उसने जो लफ्ज़ कहे, उन्होंने हैदराबाद के होटल में बैठे मेरे सीने पर किसी ने गर्म खंजर घोंप दिया:
"तुम्हारा ये लापरवाह, मतलबी रवैया बिलकुल तुम्हारे पापा जैसा है, अनु! बिलकुल वही खून! किसी की क़ुर्बानी, किसी के दर्द की कोई क़दर नहीं है तुम लोगों को! बस अपनी भूख, अपना टीवी, अपना आराम दिखता है! अगर आज ताऊजी ने अपना शरीर उस तीन सौ किलो के लोहे के नीचे न झोंका होता ना... तो आज तुम इस दुनिया में ज़िंदा खड़ी होकर टीवी मांगने लायक नहीं बचतीं! लाश बन चुकी होतीं तुम!"
"काव्या!" ताऊजी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी एक प्लास्टर बंधी बांह उठाई, चेहरे पर बेपनाह तकलीफ उभर आई। "बहू, बस कर! मेरी लाडली पर इतना जुल्म मत ढा... उस गेट की कमानी टूटी थी, मेरी गुड़िया की कोई खता नहीं है! भगवान के लिए चुप हो जा!"
अनु की आंखें फटी की फटी रह गयी थीं। उसकी मासूम समझ में ये बात नहीं आ रही थी कि जो मां उसे हर रात सीने से लगाकर परियों की कहानियां सुनाती थी, वो अचानक उसे ऐसे क्यों देख रही थी जैसे वो कोई पराई, घिनौनी बला हो।
अनु का निचला होंठ बुरी तरह कांपने लगा। उसकी आंखों से आंसुओं के दो बड़े-बड़े धारे बहे, और वो मुंह पर हाथ रखकर बेतहाशा सिसकती हुई सीधे मास्टर बेडरूम की तरफ भागी और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया।
लिविंग रूम में सन्नाटा छा गया। सिर्फ ताऊजी की भारी, दर्दनाक सांसें और एसी की धीमी घुरघुराहट बची थी।
काव्या वहीं खड़ी रही। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके चेहरे पर अपनी बेटी को इतनी बेरहमी से दुत्कारने का कोई पछतावा उस टाइम नहीं दिख रहा था। उसके चेहरे पर सिर्फ एक भयानक, आदिम हिफाज़त का भाव था, एक ऐसी शेरनी का भाव जो अपने घायल शेर के इर्द-गिर्द खड़ी होकर किसी भी तीसरे वजूद को, चाहे वो उसकी अपनी बेटी ही क्यों न हो, एक खतरे की तरह देखने लगती है।
और मैं?
मैं अपनी स्क्रीन के सामने सुन्न पड़ा था।
“तुम्हारा ये लापरवाह, मतलबी रवैया बिलकुल तुम्हारे पापा जैसा है... बिलकुल वही खून!”
काव्या के वो शब्द मेरे कानों में किसी सीसे की तरह पिघल रहे थे। वो डांट सिर्फ अनु के लिए नहीं थी; वो एक गहरा, अचेतन थप्पड़ था जो काव्या ने परोक्ष रूप से मेरे मुंह पर मारा था। उसके अवचेतन ने अनु की उस लापरवाही को मेरे उस कायर, दफ्तर में दुबके हुए वजूद से जोड़ दिया था जो हर संकट के टाइम अपनी बीस साल की होम लोन की ईएमआई और कॉरपोरेट नौकरी का रोना रोकर भाग खड़ा होता था। उसके ज़ेहन में ताऊजी की अखाड़े वाली मर्दानगी और मेरा खोखला, शहरी वजूद आमने-सामने खड़े थे... और उस तुलना में मैं और मेरी बेटी, दोनों ताऊजी के पैरों की धूल के बराबर भी नहीं ठहर रहे थे।
मेरा खून खौल उठा। मेरा दिल चाहा कि मैं अभी फोन मिलाऊं और काव्या पर चीख पड़ूं, 'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी मासूम बेटी को ये बोलने की कि वो लाश बन जाती?! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे खून को मतलबी कहने की?!'
लेकिन... मेरे हाथ फोन तक जाकर रुक गए।
कायरता। नामर्दगी।
मैं कैसे फोन करता? मैं किस मुंह से काव्या पर चिल्लाता?
क्या ये सच नहीं था कि ताऊजी ने मेरी ही बेटी को बचाने के लिए अपनी दोनों बाहें तुड़वाई थीं? क्या ये सच नहीं था कि इस टाइम जब ताऊजी अपाहिज बनकर दर्द से तड़प रहे थे, मैं हैदराबाद के एक फाइव-स्टार होटल के वातानुकूलित कमरे में बैठकर चुपचाप कैमरे से अपनी बीवी की जासूसी कर रहा था? काव्या नैतिक रूप से उस हिमालय की चोटी पर खड़ी थी जहां से मैं सिर्फ एक कीड़े की तरह रेंगता हुआ दिखाई देता था। अगर मैंने आवाज़ उठाई, तो काव्या सीधे कह सकती थी, 'अगर इतना ही दर्द है बेटी का, तो छोड़िए अपनी वो वीपी की नौकरी और आइए अभी ट्रेन पकड़कर! संभालिए ताऊजी का पेशाब-पाखाना!'
और मैं नहीं आ सकता था। मैं उस बीस साल के होम लोन के जाल में बंधा हुआ एक नपुंसक कॉरपोरेट गुलाम था।
स्क्रीन पर, काव्या ने गहरी सांस ली। उसने अपने चेहरे पर गिरे बालों को पीछे झटका, अपने बादामी दुपट्टे का छोर कमर में खोंसा और सीधे रसोई की तरफ बढ़ गई।
अब मौका था।
रसोई में जाते ही काव्या का रुख दीवान और बेडरूम से हट गया था।
मैंने तुरंत अपने फोन से मास्टर बेडरूम में रखे उस सैमसंग टैबलेट का गुप्त वीडियो-कॉल नंबर डायल किया, जिसे मैंने अनु के ऑनलाइन कॉलेज और गेम्स के लिए सेट किया था।
कॉल दो बार बजी। फिर स्क्रीन हिली।
अनु ने रोते-रोते, कांपते हाथों से टैबलेट उठाया था। वो मास्टर बेड के भारी रज़ाई के नीचे दुबकी हुई थी। उसका चेहरा आंसुओं और नाक के पानी से भीगा हुआ था, और उसके गाल तमतमा रहे थे।
"पापा..." उसकी आवाज़ इतनी धीमी, इतनी टूटी हुई थी कि मेरा कलेजा मुंह को आ गया।
"अनु... मेरी लाडली..." मैंने फुसफुसाते हुए कहा, अपनी आवाज़ को जितना हो सके संयत रखते हुए। "रो मत बेटा... पापा हैं ना... रोते नहीं, मेरी गुड़िया..."
"पापा... मम्मा मुझसे प्यार नहीं करतीं..." अनु की हिचकी बंधी हुई थी। उसने अपनी छोटी नाक अपनी बांह से पोंछी। "मम्मा बहुत गंदी हैं... वो मुझे ऐसे देख रही थीं... जैसे... जैसे मैं कोई पराई हूँ... उन्होंने कहा कि मैं लाश बन जाती... पापा, मम्मा मुझसे नफरत करती हैं!"
मेरे हलक में आंसुओं का एक भारी घूंट अटक गया। मैं एक बाप था, लेकिन अपनी ही बेटी के आंसुओं को पोंछने के लिए सात सौ किलोमीटर दूर स्क्रीन के पीछे कैद था।
"नहीं बेटा... ऐसा नहीं बोलते..." मैंने झूठ की चाशनी में लिपटी वही खोखली, कॉरपोरेट तसल्ली दी। "मम्मा बहुत परेशान हैं अनु। बाऊजी को इतनी बड़ी चोट लगी है ना... मम्मा हॉस्पिटल में डर गयी थीं। वो तुमसे बहुत प्यार करती हैं बेटा..."
और तभी, मेरी उस मासूम बेटी ने जो कहा, उसने मेरे भीतर के बचे-खुचे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ा दीं।
अनु ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं, और उसके नन्हे कंधे ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगे।
"पापा... मेरी ही वजह से बाऊजी के हाथ टूटे हैं ना?" उसकी मासूमियत में एक ऐसा भयानक, आत्मघाती अपराधबोध था जो उस छोटी सी उम्र के ज़ेहन में कभी नहीं होना चाहिए था। "वो गेट... वो गेट बहुत बड़ा था पापा... बहुत भारी था। जब वो गिर रहा था, तो बाऊजी दौड़कर आए और उन्होंने मुझे अपनी छाती के नीचे दबा लिया... फिर बहुत ज़ोर की आवाज़ आई: कड़क!... और बाऊजी चीख पड़े... उनकी आंखों से आंसू निकल रहे थे पापा... सॉरी पापा... आई एम सॉरी... मेरी वजह से बाऊजी बीमार हो गये... सॉरी..."
"अनु, चुप हो जाओ बेटा... तुम्हारी कोई गलती नहीं थी..."
लेकिन मेरे शब्द हवा में तैरते रह गए। दूर कॉरिडोर से काव्या की भारी, तेज़ पायल की आवाज़ आई, छम... छम... छम...
"अनु, फोन रखो! मम्मा आ रही हैं... फोन तकिए के नीचे छिपाओ, तुरंत!" मैंने घबराकर फुसफुसाया।
अनु ने झटके से स्क्रीन बंद कर दी। कनेक्शन कट गया।
मैं अपने होटल के कमरे में हांफ रहा था। वो दरार पड़ चुकी थी। वो ज़हरीला बीज बोया जा चुका था। अनु के मासूम दिल में अपनी मां के प्रति एक ऐसा अजनबी खौफ और खुद के वजूद के प्रति ऐसा अपराधबोध बैठ चुका था, जो आने वाले बरसों में भी शायद कभी नहीं भरने वाला था।
और काव्या?
Cam_Living_01 पर मैंने देखा, काव्या पीतल के एक भारी कटोरे में गर्म, हल्दी वाला पीला दूध लेकर दीवान के पास आई थी।
"ताऊजी... ये पी लीजिए।" उसकी आवाज़ अब फिर से उसी रेशमी, अगाध समर्पण में ढल चुकी थी।
ताऊजी ने लाचारी से अपने दोनों प्लास्टर चढ़े हाथ देखे। "बहू... हाथ तो उठेंगे नहीं... तू रख दे, जब थोड़ा ठंडा होगा तो मैं मुंह लगाकर..."
"मुंह लगाकर पिएंगे आप?!" काव्या ने लगभग डांटते हुए, लेकिन बेपनाह प्यार से कहा। वो दीवान की कोर पर बिलकुल उनके सटकर बैठ गई। उसकी जांघ ताऊजी की धोती से ढकी भारी, रोएंदार जांघ से पूरी तरह छू रही थी। "जब तक आपकी बहू ज़िंदा है, आपको किसी कटोरे में मुंह मारने की ज़रूरत नहीं है ताऊजी। मैं पिलाऊंगी।"
उसने चम्मच भरा। दूध पर तैरती हुई मलाई को हल्के से फूंका, और चम्मच सीधे ताऊजी के सूखे, चौड़े होंठों पर टिका दिया।
![[Image: img-01511-cleaned.png]](https://i.ibb.co/Xrdnfv8Q/img-01511-cleaned.png)
ताऊजी की आंखों में कृतज्ञता और लाचारी के आंसू छलक आए। उस छप्पन साल के विशाल पहलवान ने एक अबोध की तरह अपना मुंह खोला और काव्या के हाथ से घूंट-घूंट दूध पीने लगा। काव्या की नज़रें सिर्फ और सिर्फ उनके चेहरे पर थीं, उस चेहरे पर जहाँ दर्द की जगह अब धीरे-धीरे एक अजीब सा, विवश सुकून उतर रहा था।
दूध खत्म कराने के बाद, काव्या ने अपने दुपट्टे के छोर से ताऊजी की मूंछों पर लगी दूध की लकीर को इतने सहज भाव से पोंछा जैसे ये उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो।
फिर उसने अपना फोन निकाला।
रात के ९:१५ बज रहे थे।
उसने अपनी मां, सुमित्रा शर्मा, को फोन लगाया।
"हाँ माँ... मैं ठीक हूँ।" काव्या की आवाज़ में अब एक नपी-तुली, व्यावहारिक कॉरपोरेट जैसी कठोरता थी। "नहीं, ताऊजी को डिस्चार्ज कराकर घर ले आई हूँ। दोनों हाथों में फ्रैक्चर है... डॉक्टर ने सौ दिन का कम्प्लीट इमोबिलाइज़ेशन बोला है। एक गिलास पानी भी खुद नहीं पी सकते।"
दूसरी तरफ से मेरी सास की घबराई हुई आवाज़ मुझे सुनाई नहीं दे रही थी, लेकिन काव्या का जवाब साफ था:
"हाँ माँ, इसीलिए फोन किया है। राजेश हैदराबाद में फंसा है, उसका प्रोजेक्ट तीन हफ्ते और खिंच गया है। इस घर में ताऊजी को चौबीस घंटे तीमारदारी की ज़रूरत है... मुझे बुटीक से छुट्टी लेनी पड़ रही है। और अनु... वो इस पूरे हादसे से बुरी तरह सहमी हुई है। उसकी छुट्टियों के जो दो दिन बचे थे, वो यहाँ इस दवाइयों और कराहों के माहौल में काटने का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी मंडे से उसका कॉलेज शुरू है और उसे आपके पास कोरगांव पार्क ही रहना था... आप और पापा अभी गाड़ी लेकर आ जाइए। उसका वेकेशन बैग लेकर उसे आज रात ही अपने पास ले जाइए, ताकि वो अपने शांत रूटीन में लौट सके।"
मेरी सास ने शायद कुछ पूछा, क्योंकि काव्या ने तुरंत बात काटी:
"नहीं माँ, कोई बहस नहीं। यहाँ इस टाइम मुकम्मल शांति चाहिए। आप बस आ जाइए... मैं सब संभाल लूँगी।"
कॉल कट गई।
फैसला हो चुका था।
ठीक पैंतालीस मिनट बाद, रात के ठीक दस बजे, कोरगांव पार्क से मेरी सास सुमित्रा और ससुर श्रीकांत शर्मा अपनी होंडा सिटी से हमारे बानेर वाले फ्लैट पर पहुंचे।
ससुर जी ने दीवान पर लेटे ताऊजी के दोनों प्लास्टर चढ़े हाथों को देखकर हाथ जोड़ लिए, उनकी आंखों में अपने दामाद के उस देहाती ताऊ के प्रति भगवान जैसी श्रद्धा थी। "सुखदेव जी... आपने हमारी फूल जैसी नातिन के लिए अपनी दोनों बाहें दांव पर लगा दीं... हम आपका ये अहसान सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते!"
ताऊजी ने बड़ी मुश्किल से सिर झुकाकर उनका अभिवादन एक्सेप्ट किया। "समधी जी... हमारी लाडली हमारे कुल का दीपक है... उसके आगे इस बूढ़े शरीर की क्या औकात है।"
काव्या ने पहले ही अनु का वो छोटा लाल वेकेशन बैग और कॉलेज की किताबें पैक करके दरवाज़े पर रख दिया था।
जब मेरी सास अनु का हाथ पकड़कर दरवाज़े की तरफ बढ़ीं, तो अनु चौखट पर एक पल के लिए रुकी। उसने मुड़कर अपनी मां को देखा। उसकी आंखों में एक याचना थी, कि शायद मम्मा दौड़कर आएगी, उसे गले लगाएगी और कहेगी कि 'मत जाओ बेटा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।'
लेकिन काव्या दरवाज़े के पास सीधी, तनी हुई खड़ी रही। उसके चेहरे पर एक सपाट, बर्फीला अनुशासन था। उसने सिर्फ एक बार अपनी पलकें झपकाईं और बहुत संक्षेप में कहा, "नानी की बात मानना अनु। और मन लगाकर पढ़ना।"
अनु का चेहरा बुझ गया। उसने अपना सिर झुकाया और नानी की उंगली पकड़कर लिफ्ट की तरफ बढ़ गई।
क्लिक।
फ्लैट ९०३ का भारी सुरक्षा दरवाज़ा बंद हो गया।
ताला लग गया।
और उस एक आवाज़ के साथ... फ्लैट ९०३ की पूरी दुनिया हमेशा-हमेशा के लिए बदल गई।
घर पूरी तरह खाली हो चुका था।
अनु जा चुकी थी। सास-ससुर लौट चुके थे। मैं, कानूनी पति, सैकड़ों मील दूर हैदराबाद के कॉरपोरेट पिंजरे में कैद था।
उस नौवीं मंजिल के आलीशान, बंद फ्लैट में अब सिर्फ दो ही रूहें बची थीं, एक छप्पन साल का, दोनों हाथों से लाचार, घायल देहाती पहलवान... और उसकी तीस साल की, हुस्न के शबाब पर दहकती हुई, अकेली बहू!
और तभी...
हैदराबाद के उस ठंडे होटल के कमरे में बैठे-बैठे, मेरे दिमाग की किसी अंधेरी नस में एक ऐसा भयानक, बिजली जैसा तीखा झटका लगा कि मेरी रीढ़ की हड्डी सुन्न पड़ गई।
मैं कितना बड़ा मूर्ख था! कितना अंधा और नादान था मैं!
अभी कुछ ही घंटे पहले, हैदराबाद के उस कॉन्फ्रेंस रूम से बाहर निकलते वक़्त मैं अपने मन को क्या तसल्ली दे रहा था? मैं यही सोचकर राहत की ठंडी सांसें ले रहा था ना कि ताऊजी के दोनों हाथ टूट जाने से खतरा टल गया है... कि दोनों हाथों पर भारी सफेद प्लास्टर चढ़ जाने के बाद अब किसी शारीरिक स्पर्श, किसी अंतरंगता का सवाल ही नहीं उठता... कि अब मर्यादा की दीवार फौलाद की बन चुकी है!
लेकिन हे भगवान... मेरा वो शहरी, कॉरपोरेट दिमाग कितना खोखला और बेवकूफ था!
एक ऐसी नंगी, बेरहम और बायोलॉजिकल सच्चाई जो अब तक मेरे दिमाग से ओझल थी, अचानक पूरी नग्नता के साथ मेरे सामने आ खड़ी हुई!
ताऊजी के दोनों हाथ... कलाई से लेकर कोहनी के ऊपर तक भारी, सख्त प्लास्टर में जकड़े हुए हैं!
वो अपनी उंगलियों का एक पोर तक नहीं हिला सकते!
इसका मतलब?
हे भगवान... इसका सीधा, व्यावहारिक मतलब क्या था?!
खाना? ताऊजी अपने हाथ से पानी का एक गिलास तक नहीं उठा सकते थे। वो रोटी का एक निवाला नहीं तोड़ सकते थे, दाल में चम्मच नहीं डुबो सकते थे। अगले पूरे तीन हफ़्तों तक... काव्या को अपने नाज़ुक, गोरे हाथों से हर एक कौर उनके मुंह में डालना होगा... गिलास उनके होंठों पर टिकाकर पानी पिलाना होगा!
नहाना? प्लास्टर पर पानी की एक बूंद भी नहीं पड़नी चाहिए थी। ताऊजी अपने बदन पर साबुन कैसे लगाएंगे? अपनी चौड़ी, पसीने से भीगी पीठ कैसे धोएंगे? काव्या को उस विशाल, नंगे पहलवान के बदन से बनियान उतारनी होगी... प्लास्टिक की थैलियों से उनके प्लास्टर को बांधना होगा... और अपने हाथों से गीले तौलिये और Lifebuoy साबुन से उस पूरे अखाड़े के बदन को स्पंज-बाथ कराना होगा!
और... और सबसे भयानक... सबसे रूह कंपा देने वाला सवाल...
वॉशरूम?!
नंबर एक और नंबर दो?!
मेरी सांस मेरी छाती में ही घुटकर रह गई। मेरी हथेलियों से ठंडा पसीना छूटने लगा।
एक मर्द... एक छप्पन साल का विशाल, देहाती पहलवान... जब उसे पेशाब लगेगी, तो वो क्या करेगा? वो अपनी धोती की गांठ खुद कैसे खोलेगा? वो अपने हाथ से अपनी लुंगी का छोर तक नहीं पकड़ सकता!
उसे पेशाब करने के लिए... कमोड के सामने खड़े होकर... अपनी बहू को आवाज़ देनी होगी!
काव्या को उस बंद बाथरूम में उनके साथ जाना होगा... अपने नाज़ुक, कांपते हाथों से उस देहाती मर्द की धोती की गांठ खोलनी होगी... कपड़े के भीतर हाथ डालकर उस भारी, रोएंदार और विशाल अंग को अपनी उंगलियों में थामना होगा... और कमोड के ऊपर सीधा पकड़कर तब तक खड़े रहना होगा जब तक उस पहलवान की पेशाब की धार खत्म न हो जाए!
और नंबर दो? शौच?
जब ताऊजी को पेट साफ करना होगा... तो वो कमोड पर कैसे बैठेंगे? और उससे भी आगे... शौच के बाद वो खुद को धोएंगे कैसे?! एक भारतीय घर में कोई भी शौच के बाद बिना धोए नहीं रह सकता! ताऊजी अपनी दोनों प्लास्टर बंधी बाहों से न तो जेट-स्प्रे उठा सकते थे, न पानी का लोटा, न ही पीछे हाथ ले जा सकते थे!
काव्या को... मेरी उस नफीस, कोरगांव पार्क की रईस और संस्कारी बीवी को... अपने हाथों से पानी और साबुन लेकर, उस विशाल ससुर के पिछले हिस्से को, उनके अंगों को साफ़ करना होगा... धोना होगा!
ओह शिट... ओह गॉड...!
मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे। मेरे गले में थूक सूख चुका था।
ये कोई नॉर्मल सेवा नहीं थी। ये कोई बीमार ससुर को दवाई देने जैसा नहीं था। ये इंसान के जिस्म की वो सबसे निचली, सबसे आदिम और सबसे नग्न जैविक लाचारी थी जहाँ शर्म, हया, रिश्ते और मर्यादा की हर एक दीवार ढहकर राख बन जाती है!
अगर कोई औरत किसी पराए मर्द के पेशाब के अंग को दिन में चार बार अपने हाथों में थामेगी... अगर वो उसके शौच के बाद उसके अंगों को अपने हाथों से धोएगी... तो फिर उन दोनों के बीच ऐसा कौन सा पर्दा, ऐसी कौन सी मर्यादा बाकी रह जाएगी जिसे लांघने में उनको ज़रा भी हिचक हो?!
जिस हाथ टूटने को मैं खतरा टलना समझ रहा था... वो तो असल में इस घर की हर एक दीवार, हर एक पर्दे को नंगा करके गिरा देने वाला सबसे भयानक तूफान बन चुका था!
उस एक विचार ने... उस भयानक, कामुक और वर्जित अहसास ने मेरे दिमाग को एक ऐसी आग में झोंक दिया जिसने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था!
दरवाज़ा बंद होते ही काव्या ने अपनी पीठ उस भारी लकड़ी के पल्ले से टिका दी।
उसने अपनी दोनों आंखें मूंद लीं। कमरे में छाया सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की सुइयों की टिक-टिक भी किसी चाबुक की तरह सुनाई दे रही थी।
काव्या लगभग घिसटते हुए कदमों से सीधे मास्टर बेडरूम के भीतर गयी और अंदर से बाथरूम का दरवाज़ा बंद करके कुंडी चढ़ा दी।
Cam_MasterBed_01 से मुझे सिर्फ बाथरूम का बंद दरवाज़ा दिखाई दे रहा था, लेकिन उस सन्नाटे में वेंटिलेशन ग्रिल से छनकर आती हुई आवाज़ें मेरे हेडफोन में बिलकुल साफ थीं।
काव्या बेसिन के नल को पूरी ताकत से खोल चुकी थी। पानी के तेज़ बहाव की आवाज़ के बीच... उसके सिसकने की आवाज़ आई।
वो रो रही थी।
वो भयानक, बेकाबू होकर रो रही थी।
बेसिन के काले ग्रेनाइट पर अपने दोनों हाथ टिकाए, वो आईने के सामने खड़ी अपने ही अक्स को देखकर घिन और खौफ से कांप रही थी।
"हे भगवान... ये मुझे क्या हो गया था?" उसकी टूटी हुई, सिसकती हुई फुसफुसाहट पानी की आवाज़ के साथ मेरे कानों में पड़ी। "मैंने अपनी ही लाडली को... अपनी अनु को उस तरह देखा? वो मेरी जान है... मैंने उसे ऐसे डांटा जैसे वो मेरी सौतन हो, मेरी दुश्मन हो... मुझे क्या होता जा रहा है? क्या मैं पागल हो रही हूँ...?"
उसने अपनी हथेलियों में ठंडा पानी भरा और पागलों की तरह अपने चेहरे, अपनी आंखों और अपनी गर्दन पर मारा। वो अपनी उस संस्कारी, ममतालु पहचान को ढूंढने की कोशिश कर रही थी जो कोरगांव पार्क के बंगले में पली-बढ़ी थी, जो मंदिर में दीया जलाती थी और अपनी बेटी को खरोंच आने पर भी रो पड़ती थी।
लेकिन फिर...
पानी की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।
काव्या ने अपना सिर उठाया।
आईने में उसने अपने उस भीगे हुए, तमतमाते चेहरे को देखा। और उस पल... उसके आंसुओं की धार थम गई।
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उसकी सांसों की गति धीमी हुई। उसकी आंखों की वो नम, लाचार पुतलियां अचानक एक अजीब, ठंडे और आदिम पत्थर में बदलने लगीं।
एक दूसरी औरत... जो शायद इस घर की दीवारों में, ताऊजी के उस पसीने और सरसों के तेल की गंध में पिछले कई हफ्तों से धीरे-धीरे जाग रही थी... उसने काव्या के वजूद की कमान अपने हाथों में ले ली।
काव्या ने आईने में अपने ही होठों को हल्का सा तनते हुए देखा।
“नहीं... जो हुआ, वही होना था।”
वो फुसफुसाहट अब रोने वाली काव्या की नहीं थी। वो उस दूसरी काव्या की थी जिसकी ज़बान पर कोई ताला नहीं था।
“राजेश हैदराबाद में है... उसे अपनी नौकरी और लोन प्यारा है। अनु कोरगांव पार्क चली गयी... वो सेफ़ है। अब इस घर में मेरे और ताऊजी के बीच कोई तीसरा नहीं है। जिस मर्द ने मेरी बेटी के लिए अपनी हड्डियां तुड़वा लीं... उसका हक़ है मेरे हर कतरे पर। अब मुझे किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है... अब इस जिस्म की, इस घर की मालकिन सिर्फ मैं हूँ।”
उसने नल बंद किया। तौलिये से अपना चेहरा पोंछा।
जब वो बाथरूम से बाहर निकली, तो उसकी चाल में वो पहले वाली हिचकिचाहट, वो घबराहट पूरी तरह गायब थी। उसके कंधे सीधे थे, उसकी चाल में एक नशीला, गहरा ठहराव था।
उसने दीवान पर जाकर देखा, ताऊजी दर्द की भारी दवाइयों के असर से गहरी, खर्राटों भरी नींद में डूब चुके थे। उनका मुंह हल्का सा खुला था और प्लास्टर बंधे हाथ उनके सीने पर धरे थे।
काव्या ने झुककर बहुत धीरे से उनकी चादर उनके सीने तक खींची। उसकी उंगलियां एक पल के लिए ताऊजी के चौड़े, पसीने से भीगे माथे पर टिकीं। उसने अपनी सांस उनकी सांसों के करीब महसूस की, और फिर बिना एक भी आवाज़ किए, वो वापस मास्टर बेडरूम में आ गई।
उसने बेडरूम की बत्तियां बुझा दीं।
सिर्फ खिड़की से आती हुई शहर की हल्की पीली रोशनी कमरे में थी।
काव्या बिस्तर की कोर पर बैठ गई। उसने अपने तकिए के नीचे से अपना वो सैमसंग टैबलेट निकाला।
उसकी स्क्रीन की ठंडी, नीली रोशनी काव्या के खूबसूरत, संगमरमरी चेहरे पर पड़ी।
उसने एक ऐप खोला।
वही ऐप... वही सीक्रेट टम्बलर ब्लॉग, @pinklily_confessions।
हैदराबाद के होटल में बैठे मेरे फोन पर एक तीखी, हल्की नोटिफिकेशन वाइब्रेट हुई:
[pink lily just posted a new entry: "दो औरतें"]
मेरी उंगलियां कांपने लगीं। मैंने अपने फोन की स्क्रीन खोली।
रात के १०:२४ पर काव्या ने अपने उस गुप्त पते से, अंधेरे कमरे में बैठकर, वो अल्फाज़ टाइप किए थे जिन्होंने मेरी आत्मा को हमेशा के लिए झकझोर कर रख दिया:
मैंने फोन को अपनी डेस्क पर रख दिया।
मेरी हथेलियां पसीने से लथपथ थीं। मेरी गर्दन के पीछे के सारे बाल खड़े हो चुके थे।
काव्या को खुद नहीं पता था कि उसके ज़ेहन में क्या टूट चुका है। वो किसी मनोरोग की शिकार नहीं थी, वो तो बस उस आदिम, वर्जित वासना और कृतज्ञता के उस दोराहे पर खड़ी थी जहाँ एक औरत अपने सारे सामाजिक खोल उतारकर फेंक देती है।
और मैं?
मैं स्क्रीन पर उस अंधेरे बेडरूम में नीली रोशनी में चमकते उसके चेहरे को देख रहा था... ये जानते हुए कि कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो उस फ्लैट ९०३ में कोई बहू अपने ससुर की सेवा नहीं कर रही होगी... बल्कि एक भूखी, आज़ाद और निडर औरत, अपने उस घायल, लाचार मर्द को अपनी उंगलियों पर नचा रही होगी।
और उस खेल का पहला पर्दा... अब उठने ही वाला था।
--- To Be Continued ---
होटल के कमरे का भारी लकड़ी का दरवाज़ा मैंने जैसे ही अपने पीछे बंद किया, मेरे माथे से पसीना बहकर मेरी पलकों पर आ गिरा था। कमरे की सेंट्रल एयर-कंडीशनिंग की ठंडी, बासी हवा सीधे मेरे चेहरे पर लगी, लेकिन मेरे भीतर जो आग सुलग रही थी, वो किसी भी तापमान से शांत होने वाली नहीं थी।
मैंने अपने जूते तक ठीक से नहीं खोले। ब्रीफकेस को सीधे कालीन पर पटका और अपने कांपते हुए हाथों से सीधे डेस्क की तरफ लपका।
लैपटॉप का ढक्कन उठाते ही उसकी नीली स्क्रीन पानी उठी। मेरी उंगलियां कीबोर्ड पर इतनी तेज़ी से चलीं कि पासवर्ड दो बार गलत टाइप हुआ। तीसरी बार में जब ऑथेंटिकेशन हुआ, तो पुणे के बानेर स्थित फ्लैट के क्लोज़्ड-सर्किट सर्विलांस का रिमोट सॉफ्टवेयर स्क्रीन पर खुल गया।
चार विंडो।
@@Cam_MainDoor_01@@, @@Cam_Living_01@@, @@Cam_MasterBed_01@@, और @@Cam_Kitchen_01@@।
स्क्रीन पर अभी सन्नाटा था। फ्लैट ९०३ का लिविंग रूम खाली पड़ा था। सोफे के कुशन थोड़े अस्त-बिज़ी थे, और सेंटर टेबल पर पानी का एक खाली जग रखा था, वही मंज़र जो दोपहर के उस भयानक हादसे के वक़्त छूटा था जब काव्या बदहवास हालत में ताऊजी और अनु को लेकर हॉस्पिटल भागी थी।
टाइमस्टैम्प दिखा रहा था: रात के ७:४२।
मेरी धड़कनें मेरे कानों में हथौड़ों की तरह बज रही थीं। मैं अपनी घूमने वाली कुर्सी के किनारे पर टिका हुआ, अपनी दोनों हथेलियों को डेस्क पर गड़ाए स्क्रीन को घूर रहा था।
और ठीक ७:४७ पर... Cam_MainDoor_01 के मोशन सेंसर ने बीप की।
दरवाज़े की भारी कुंडी बाहर से खुली।
सबसे पहले काव्या अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ा हुआ था। सुबह जो लैवेंडर रंग का रेशमी सलवार-सूट उसने करीने से पहना था, वो अब बुरी तरह सिलवटों से भरा था। उसका बादामी कश्मीरी शॉल एक कंधे से बेतरतीब ढलका हुआ था, और माथे की लटें पसीने से चिपक गयी थीं।
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लेकिन उसकी नज़रें पीछे थीं, पूरी तरह किसी की हिफाज़त में जुटी हुईं।
"आराम से ताऊजी... चौखट पर पैर संभालिए... धीरे..." काव्या की आवाज़ में एक अजीब सा, हलक चीर देने वाला खिंचाव था।
और फिर वो विशाल, देहाती जिस्म चौखट के भीतर आया।
उनको देखते ही मेरे सीने में एक भयानक कंपकंपी दौड़ गई।
सुखदेव ताऊजी... छह फीट एक इंच का वो अखाड़े का शेर... आज दोनों घुटनों से थोड़ा झुककर चल रहा था। उनके दोनों हाथ... कलाई से लेकर पूरी कोहनी के ऊपर तक... मोटे, खुरदुरे और भारी सफेद प्लास्टर में जकड़े हुए थे। दोनों बाहें काली मेडिकल स्लिंग्स (पट्टियों) के सहारे उनकी चौड़ी गर्दन से लटकी हुई थीं। उनकी उंगलियां प्लास्टर के सिरे से बाहर निकली थीं, नीली, सूजी हुई और पूरी तरह बेजान।
वो अपनी उंगलियों का एक पोर तक नहीं हिला पा रहे थे।
सफेद खादी का कुर्ता जो वो सुबह पहनते थे, वो हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने कैंची से काटकर अलग कर दिया होगा, क्योंकि इस टाइम उनके बदन पर सिर्फ एक बिना आस्तीन की सफेद कॉटन बनियान थी। बनियान पर जगह-जगह खून और ज़ंग लगे लोहे के भूरे दाग थे। उनकी चौड़ी, रोएंदार छाती हर सांस के साथ भारी धौंकनी की तरह फूल और पिचक रही थी। उनके माथे पर दर्द की गहरी, काली लकीरें खिंची थीं, और होंठ सूखे पापड़ की तरह फटे हुए थे।
उनके ठीक पीछे, अनु दबे पांव अंदर आई। उसकी गुलाबी फ्रॉक धूल से सनी थी, और उसकी आंखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। वो काव्या के कुर्ते का कोना पकड़ना चाहती थी, लेकिन काव्या का पूरा वजूद सिर्फ और सिर्फ ताऊजी को संभालने में लगा था।
"यहाँ बैठिए... दीवान पर... हाँ, टेक लगाइए..." काव्या ने ताऊजी के भारी, मांसल कंधे को सहारा दिया।
ताऊजी के बदन का पूरा भार जब काव्या के नाज़ुक बदन पर आया, तो काव्या के पैर एक पल के लिए लड़खड़ाए, लेकिन उसने अपने पूरे वजूद का ज़ोर लगाकर उस विशाल जिस्म को दीवान पर टिकने में मदद की। ताऊजी के मुंह से एक दबी हुई, कराहती हुई चीख निकली, "आह्ह... भगवान...!"
"दर्द बहुत ज़्यादा है ना ताऊजी?" काव्या उनके सामने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई। उसने अपने कांपते हाथों से ताऊजी के पैरों से चमड़े की चप्पलें उतारीं। "डॉक्टर ने कहा है कि रात को इंजेक्शन का असर कम होगा तो टीस बढ़ेगी... मैं अभी गर्म हल्दी का दूध बनाती हूँ और पेनकिलर देती हूँ।"
ताऊजी ने अपनी बंद आंखों से धीरे से सिर हिलाया। उनके माथे से पसीने की एक मोटी बूंद ढलकर उनकी दाढ़ी में समा गई।
"तू... तू परेशान मत हो, बहू..." ताऊजी की भारी, देहाती आवाज़ दर्द की वजह से कांप रही थी। "हड्डी ही तो चटकी है... अखाड़े में इससे बुरी मार सही है मैंने। तू बस बैठ जा... दिन भर से दौड़ी है तू।"
"आप चुप रहिए ताऊजी!" काव्या की आवाज़ में अचानक एक ऐसा अधिकार, एक ऐसी सख्त ममता उभरी जो मैंने अपनी आठ साल की शादी में कभी नहीं सुनी थी। "दो-दो जगह से हड्डियां चकनाचूर हुई हैं आपकी... और आप कहते हैं कुछ नहीं हुआ? अगर ज़रा सी भी देर हो जाती तो..."
काव्या का गला रुंध गया। उसने अपनी दोनों हथेलियों में अपना चेहरा छिपा लिया और दीवान के पाए से सिर टिकाकर सिसक पड़ी।
मैं हैदराबाद में स्क्रीन के सामने बैठा अपनी सांसें रोक चुका था। काव्या का वो रोना किसी औपचारिकता का नहीं था; वो उस भयानक सदमे का रेचन था जो उसने पिछले चार घंटों से हॉस्पिटल के गलियारों में अकेले झेला था।
और तभी... वो हुआ जिसने उस पूरे घर की हवा को ज़हरीला बना दिया।
अनु, जो अब तक लिविंग रूम के कालीन पर सहमी हुई खड़ी थी, ऊब और भूख से मचलने लगी। उसने सेंटर टेबल के पास जाकर अपने पैर से एक स्टील का गिलास हिला दिया।
झन... झन... खड़खड़खड़!
खाली स्टील का गिलास संगमरमर के ठंडे फर्श पर गोल-गोल घूमता हुआ तेज़ आवाज़ के साथ गूंज उठा।
ताऊजी दर्द के मारे चौंक गये, उनकी घायल बांह स्लिंग में हल्का सा झटका खा गयी और उनके मुंह से एक तीखी सिसकारी निकली, "उफ़्फ़...!"
अनु ने उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। उसने अपने दोनों छोटे हाथ अपनी कमर पर रखे और एक चिड़चिड़ी, बचकानी ज़िद के साथ रोनी सूरत बनाकर बोली, "मम्मा! मुझे भूख लगी है... मुझे कार्टून देखना है! रिमोट कहाँ है? कब से हॉस्पिटल में बैठे-बैठे मेरे पैर दुख रहे हैं... मुझे टीवी चला कर दो ना!"
उस एक पल में... काव्या का पूरा शरीर पत्थर की तरह सख्त हो गया।
उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
भगवान गवाह है, Cam_Living_01 के हाई-डेफिनिशन लेंस से मैंने काव्या की जो आंखें उस पल देखीं, उनसे मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ की एक धार उतर गई।
वो मेरी शांत, संस्कारी, कोरगांव पार्क की नफीस और नर्मदिल पत्नी काव्या नहीं थी।
उसकी आंखों की पुतलियां सिकुड़कर कोयले की तरह सुलग रही थीं। उसके नथुने फड़क रहे थे, और जब वो फर्श से उठी, तो उसकी चाल में एक खूंखार, ज़हरीला तनाव था।
"चुप करो अनु!"
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काव्या की आवाज़ में ऐसी ठंडी, हिंसक कड़वाहट थी कि अनु वहीं की वहीं सहमकर दो कदम पीछे हट गई।
"मम्मा...?" अनु की आवाज़ गले में ही अटक गई।
"एक शब्द और नहीं निकलेगा तुम्हारे मुंह से!" काव्या अपनी बेटी के बिलकुल करीब आ खड़ी हुई। उसने अपनी उंगली अनु के चेहरे के सामने तान दी। उसकी आवाज़ भले ही चीखने वाली नहीं थी, लेकिन उस धीमी, फुसफुसाती हुई डांट में जो ज़हर था, उसने कमरे की सारी ऑक्सीजन सोख ली थी। "तुमको ज़रा भी शर्म नहीं आती? ज़रा सा भी अहसास है कि तुम्हारी उस बेहूदा, लापरवाह ज़िद की वजह से आज इस घर में क्या हो गया है?!"
"काव्या... बहू..." ताऊजी ने दीवान से अपनी भारी गर्दन उठाने की कोशिश की। "अनु है... अभी नादान है... छोड़ उसे..."
"नहीं ताऊजी, आप बीच में मत बोलिए!" काव्या ने मुड़कर देखे बिना कहा, उसकी पूरी नफरत उस टाइम अपनी ही बेटी पर केंद्रित थी। "अगर आज इस लड़की ने उस भारी गेट के नीचे गेंद के पीछे दौड़ने की बदतमीज़ी न की होती... तो आज आपके हाथ सलामत होते! सौ बार मना किया था मैंने कि मेन गेट के पास मत खेला करो... लेकिन नहीं! वही ढीठपन, वही गैर-ज़िम्मेदाराना बचकानापन!"
काव्या की आंखें लाल अंगारे जैसी हो चुकी थीं। और फिर उसने जो लफ्ज़ कहे, उन्होंने हैदराबाद के होटल में बैठे मेरे सीने पर किसी ने गर्म खंजर घोंप दिया:
"तुम्हारा ये लापरवाह, मतलबी रवैया बिलकुल तुम्हारे पापा जैसा है, अनु! बिलकुल वही खून! किसी की क़ुर्बानी, किसी के दर्द की कोई क़दर नहीं है तुम लोगों को! बस अपनी भूख, अपना टीवी, अपना आराम दिखता है! अगर आज ताऊजी ने अपना शरीर उस तीन सौ किलो के लोहे के नीचे न झोंका होता ना... तो आज तुम इस दुनिया में ज़िंदा खड़ी होकर टीवी मांगने लायक नहीं बचतीं! लाश बन चुकी होतीं तुम!"
"काव्या!" ताऊजी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर अपनी एक प्लास्टर बंधी बांह उठाई, चेहरे पर बेपनाह तकलीफ उभर आई। "बहू, बस कर! मेरी लाडली पर इतना जुल्म मत ढा... उस गेट की कमानी टूटी थी, मेरी गुड़िया की कोई खता नहीं है! भगवान के लिए चुप हो जा!"
अनु की आंखें फटी की फटी रह गयी थीं। उसकी मासूम समझ में ये बात नहीं आ रही थी कि जो मां उसे हर रात सीने से लगाकर परियों की कहानियां सुनाती थी, वो अचानक उसे ऐसे क्यों देख रही थी जैसे वो कोई पराई, घिनौनी बला हो।
अनु का निचला होंठ बुरी तरह कांपने लगा। उसकी आंखों से आंसुओं के दो बड़े-बड़े धारे बहे, और वो मुंह पर हाथ रखकर बेतहाशा सिसकती हुई सीधे मास्टर बेडरूम की तरफ भागी और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया।
लिविंग रूम में सन्नाटा छा गया। सिर्फ ताऊजी की भारी, दर्दनाक सांसें और एसी की धीमी घुरघुराहट बची थी।
काव्या वहीं खड़ी रही। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके चेहरे पर अपनी बेटी को इतनी बेरहमी से दुत्कारने का कोई पछतावा उस टाइम नहीं दिख रहा था। उसके चेहरे पर सिर्फ एक भयानक, आदिम हिफाज़त का भाव था, एक ऐसी शेरनी का भाव जो अपने घायल शेर के इर्द-गिर्द खड़ी होकर किसी भी तीसरे वजूद को, चाहे वो उसकी अपनी बेटी ही क्यों न हो, एक खतरे की तरह देखने लगती है।
और मैं?
मैं अपनी स्क्रीन के सामने सुन्न पड़ा था।
“तुम्हारा ये लापरवाह, मतलबी रवैया बिलकुल तुम्हारे पापा जैसा है... बिलकुल वही खून!”
काव्या के वो शब्द मेरे कानों में किसी सीसे की तरह पिघल रहे थे। वो डांट सिर्फ अनु के लिए नहीं थी; वो एक गहरा, अचेतन थप्पड़ था जो काव्या ने परोक्ष रूप से मेरे मुंह पर मारा था। उसके अवचेतन ने अनु की उस लापरवाही को मेरे उस कायर, दफ्तर में दुबके हुए वजूद से जोड़ दिया था जो हर संकट के टाइम अपनी बीस साल की होम लोन की ईएमआई और कॉरपोरेट नौकरी का रोना रोकर भाग खड़ा होता था। उसके ज़ेहन में ताऊजी की अखाड़े वाली मर्दानगी और मेरा खोखला, शहरी वजूद आमने-सामने खड़े थे... और उस तुलना में मैं और मेरी बेटी, दोनों ताऊजी के पैरों की धूल के बराबर भी नहीं ठहर रहे थे।
मेरा खून खौल उठा। मेरा दिल चाहा कि मैं अभी फोन मिलाऊं और काव्या पर चीख पड़ूं, 'तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी मासूम बेटी को ये बोलने की कि वो लाश बन जाती?! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे खून को मतलबी कहने की?!'
लेकिन... मेरे हाथ फोन तक जाकर रुक गए।
कायरता। नामर्दगी।
मैं कैसे फोन करता? मैं किस मुंह से काव्या पर चिल्लाता?
क्या ये सच नहीं था कि ताऊजी ने मेरी ही बेटी को बचाने के लिए अपनी दोनों बाहें तुड़वाई थीं? क्या ये सच नहीं था कि इस टाइम जब ताऊजी अपाहिज बनकर दर्द से तड़प रहे थे, मैं हैदराबाद के एक फाइव-स्टार होटल के वातानुकूलित कमरे में बैठकर चुपचाप कैमरे से अपनी बीवी की जासूसी कर रहा था? काव्या नैतिक रूप से उस हिमालय की चोटी पर खड़ी थी जहां से मैं सिर्फ एक कीड़े की तरह रेंगता हुआ दिखाई देता था। अगर मैंने आवाज़ उठाई, तो काव्या सीधे कह सकती थी, 'अगर इतना ही दर्द है बेटी का, तो छोड़िए अपनी वो वीपी की नौकरी और आइए अभी ट्रेन पकड़कर! संभालिए ताऊजी का पेशाब-पाखाना!'
और मैं नहीं आ सकता था। मैं उस बीस साल के होम लोन के जाल में बंधा हुआ एक नपुंसक कॉरपोरेट गुलाम था।
स्क्रीन पर, काव्या ने गहरी सांस ली। उसने अपने चेहरे पर गिरे बालों को पीछे झटका, अपने बादामी दुपट्टे का छोर कमर में खोंसा और सीधे रसोई की तरफ बढ़ गई।
अब मौका था।
रसोई में जाते ही काव्या का रुख दीवान और बेडरूम से हट गया था।
मैंने तुरंत अपने फोन से मास्टर बेडरूम में रखे उस सैमसंग टैबलेट का गुप्त वीडियो-कॉल नंबर डायल किया, जिसे मैंने अनु के ऑनलाइन कॉलेज और गेम्स के लिए सेट किया था।
कॉल दो बार बजी। फिर स्क्रीन हिली।
अनु ने रोते-रोते, कांपते हाथों से टैबलेट उठाया था। वो मास्टर बेड के भारी रज़ाई के नीचे दुबकी हुई थी। उसका चेहरा आंसुओं और नाक के पानी से भीगा हुआ था, और उसके गाल तमतमा रहे थे।
"पापा..." उसकी आवाज़ इतनी धीमी, इतनी टूटी हुई थी कि मेरा कलेजा मुंह को आ गया।
"अनु... मेरी लाडली..." मैंने फुसफुसाते हुए कहा, अपनी आवाज़ को जितना हो सके संयत रखते हुए। "रो मत बेटा... पापा हैं ना... रोते नहीं, मेरी गुड़िया..."
"पापा... मम्मा मुझसे प्यार नहीं करतीं..." अनु की हिचकी बंधी हुई थी। उसने अपनी छोटी नाक अपनी बांह से पोंछी। "मम्मा बहुत गंदी हैं... वो मुझे ऐसे देख रही थीं... जैसे... जैसे मैं कोई पराई हूँ... उन्होंने कहा कि मैं लाश बन जाती... पापा, मम्मा मुझसे नफरत करती हैं!"
मेरे हलक में आंसुओं का एक भारी घूंट अटक गया। मैं एक बाप था, लेकिन अपनी ही बेटी के आंसुओं को पोंछने के लिए सात सौ किलोमीटर दूर स्क्रीन के पीछे कैद था।
"नहीं बेटा... ऐसा नहीं बोलते..." मैंने झूठ की चाशनी में लिपटी वही खोखली, कॉरपोरेट तसल्ली दी। "मम्मा बहुत परेशान हैं अनु। बाऊजी को इतनी बड़ी चोट लगी है ना... मम्मा हॉस्पिटल में डर गयी थीं। वो तुमसे बहुत प्यार करती हैं बेटा..."
और तभी, मेरी उस मासूम बेटी ने जो कहा, उसने मेरे भीतर के बचे-खुचे आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ा दीं।
अनु ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं, और उसके नन्हे कंधे ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगे।
"पापा... मेरी ही वजह से बाऊजी के हाथ टूटे हैं ना?" उसकी मासूमियत में एक ऐसा भयानक, आत्मघाती अपराधबोध था जो उस छोटी सी उम्र के ज़ेहन में कभी नहीं होना चाहिए था। "वो गेट... वो गेट बहुत बड़ा था पापा... बहुत भारी था। जब वो गिर रहा था, तो बाऊजी दौड़कर आए और उन्होंने मुझे अपनी छाती के नीचे दबा लिया... फिर बहुत ज़ोर की आवाज़ आई: कड़क!... और बाऊजी चीख पड़े... उनकी आंखों से आंसू निकल रहे थे पापा... सॉरी पापा... आई एम सॉरी... मेरी वजह से बाऊजी बीमार हो गये... सॉरी..."
"अनु, चुप हो जाओ बेटा... तुम्हारी कोई गलती नहीं थी..."
लेकिन मेरे शब्द हवा में तैरते रह गए। दूर कॉरिडोर से काव्या की भारी, तेज़ पायल की आवाज़ आई, छम... छम... छम...
"अनु, फोन रखो! मम्मा आ रही हैं... फोन तकिए के नीचे छिपाओ, तुरंत!" मैंने घबराकर फुसफुसाया।
अनु ने झटके से स्क्रीन बंद कर दी। कनेक्शन कट गया।
मैं अपने होटल के कमरे में हांफ रहा था। वो दरार पड़ चुकी थी। वो ज़हरीला बीज बोया जा चुका था। अनु के मासूम दिल में अपनी मां के प्रति एक ऐसा अजनबी खौफ और खुद के वजूद के प्रति ऐसा अपराधबोध बैठ चुका था, जो आने वाले बरसों में भी शायद कभी नहीं भरने वाला था।
और काव्या?
Cam_Living_01 पर मैंने देखा, काव्या पीतल के एक भारी कटोरे में गर्म, हल्दी वाला पीला दूध लेकर दीवान के पास आई थी।
"ताऊजी... ये पी लीजिए।" उसकी आवाज़ अब फिर से उसी रेशमी, अगाध समर्पण में ढल चुकी थी।
ताऊजी ने लाचारी से अपने दोनों प्लास्टर चढ़े हाथ देखे। "बहू... हाथ तो उठेंगे नहीं... तू रख दे, जब थोड़ा ठंडा होगा तो मैं मुंह लगाकर..."
"मुंह लगाकर पिएंगे आप?!" काव्या ने लगभग डांटते हुए, लेकिन बेपनाह प्यार से कहा। वो दीवान की कोर पर बिलकुल उनके सटकर बैठ गई। उसकी जांघ ताऊजी की धोती से ढकी भारी, रोएंदार जांघ से पूरी तरह छू रही थी। "जब तक आपकी बहू ज़िंदा है, आपको किसी कटोरे में मुंह मारने की ज़रूरत नहीं है ताऊजी। मैं पिलाऊंगी।"
उसने चम्मच भरा। दूध पर तैरती हुई मलाई को हल्के से फूंका, और चम्मच सीधे ताऊजी के सूखे, चौड़े होंठों पर टिका दिया।
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ताऊजी की आंखों में कृतज्ञता और लाचारी के आंसू छलक आए। उस छप्पन साल के विशाल पहलवान ने एक अबोध की तरह अपना मुंह खोला और काव्या के हाथ से घूंट-घूंट दूध पीने लगा। काव्या की नज़रें सिर्फ और सिर्फ उनके चेहरे पर थीं, उस चेहरे पर जहाँ दर्द की जगह अब धीरे-धीरे एक अजीब सा, विवश सुकून उतर रहा था।
दूध खत्म कराने के बाद, काव्या ने अपने दुपट्टे के छोर से ताऊजी की मूंछों पर लगी दूध की लकीर को इतने सहज भाव से पोंछा जैसे ये उसका जन्मसिद्ध अधिकार हो।
फिर उसने अपना फोन निकाला।
रात के ९:१५ बज रहे थे।
उसने अपनी मां, सुमित्रा शर्मा, को फोन लगाया।
"हाँ माँ... मैं ठीक हूँ।" काव्या की आवाज़ में अब एक नपी-तुली, व्यावहारिक कॉरपोरेट जैसी कठोरता थी। "नहीं, ताऊजी को डिस्चार्ज कराकर घर ले आई हूँ। दोनों हाथों में फ्रैक्चर है... डॉक्टर ने सौ दिन का कम्प्लीट इमोबिलाइज़ेशन बोला है। एक गिलास पानी भी खुद नहीं पी सकते।"
दूसरी तरफ से मेरी सास की घबराई हुई आवाज़ मुझे सुनाई नहीं दे रही थी, लेकिन काव्या का जवाब साफ था:
"हाँ माँ, इसीलिए फोन किया है। राजेश हैदराबाद में फंसा है, उसका प्रोजेक्ट तीन हफ्ते और खिंच गया है। इस घर में ताऊजी को चौबीस घंटे तीमारदारी की ज़रूरत है... मुझे बुटीक से छुट्टी लेनी पड़ रही है। और अनु... वो इस पूरे हादसे से बुरी तरह सहमी हुई है। उसकी छुट्टियों के जो दो दिन बचे थे, वो यहाँ इस दवाइयों और कराहों के माहौल में काटने का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी मंडे से उसका कॉलेज शुरू है और उसे आपके पास कोरगांव पार्क ही रहना था... आप और पापा अभी गाड़ी लेकर आ जाइए। उसका वेकेशन बैग लेकर उसे आज रात ही अपने पास ले जाइए, ताकि वो अपने शांत रूटीन में लौट सके।"
मेरी सास ने शायद कुछ पूछा, क्योंकि काव्या ने तुरंत बात काटी:
"नहीं माँ, कोई बहस नहीं। यहाँ इस टाइम मुकम्मल शांति चाहिए। आप बस आ जाइए... मैं सब संभाल लूँगी।"
कॉल कट गई।
फैसला हो चुका था।
ठीक पैंतालीस मिनट बाद, रात के ठीक दस बजे, कोरगांव पार्क से मेरी सास सुमित्रा और ससुर श्रीकांत शर्मा अपनी होंडा सिटी से हमारे बानेर वाले फ्लैट पर पहुंचे।
ससुर जी ने दीवान पर लेटे ताऊजी के दोनों प्लास्टर चढ़े हाथों को देखकर हाथ जोड़ लिए, उनकी आंखों में अपने दामाद के उस देहाती ताऊ के प्रति भगवान जैसी श्रद्धा थी। "सुखदेव जी... आपने हमारी फूल जैसी नातिन के लिए अपनी दोनों बाहें दांव पर लगा दीं... हम आपका ये अहसान सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते!"
ताऊजी ने बड़ी मुश्किल से सिर झुकाकर उनका अभिवादन एक्सेप्ट किया। "समधी जी... हमारी लाडली हमारे कुल का दीपक है... उसके आगे इस बूढ़े शरीर की क्या औकात है।"
काव्या ने पहले ही अनु का वो छोटा लाल वेकेशन बैग और कॉलेज की किताबें पैक करके दरवाज़े पर रख दिया था।
जब मेरी सास अनु का हाथ पकड़कर दरवाज़े की तरफ बढ़ीं, तो अनु चौखट पर एक पल के लिए रुकी। उसने मुड़कर अपनी मां को देखा। उसकी आंखों में एक याचना थी, कि शायद मम्मा दौड़कर आएगी, उसे गले लगाएगी और कहेगी कि 'मत जाओ बेटा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती।'
लेकिन काव्या दरवाज़े के पास सीधी, तनी हुई खड़ी रही। उसके चेहरे पर एक सपाट, बर्फीला अनुशासन था। उसने सिर्फ एक बार अपनी पलकें झपकाईं और बहुत संक्षेप में कहा, "नानी की बात मानना अनु। और मन लगाकर पढ़ना।"
अनु का चेहरा बुझ गया। उसने अपना सिर झुकाया और नानी की उंगली पकड़कर लिफ्ट की तरफ बढ़ गई।
क्लिक।
फ्लैट ९०३ का भारी सुरक्षा दरवाज़ा बंद हो गया।
ताला लग गया।
और उस एक आवाज़ के साथ... फ्लैट ९०३ की पूरी दुनिया हमेशा-हमेशा के लिए बदल गई।
घर पूरी तरह खाली हो चुका था।
अनु जा चुकी थी। सास-ससुर लौट चुके थे। मैं, कानूनी पति, सैकड़ों मील दूर हैदराबाद के कॉरपोरेट पिंजरे में कैद था।
उस नौवीं मंजिल के आलीशान, बंद फ्लैट में अब सिर्फ दो ही रूहें बची थीं, एक छप्पन साल का, दोनों हाथों से लाचार, घायल देहाती पहलवान... और उसकी तीस साल की, हुस्न के शबाब पर दहकती हुई, अकेली बहू!
और तभी...
हैदराबाद के उस ठंडे होटल के कमरे में बैठे-बैठे, मेरे दिमाग की किसी अंधेरी नस में एक ऐसा भयानक, बिजली जैसा तीखा झटका लगा कि मेरी रीढ़ की हड्डी सुन्न पड़ गई।
मैं कितना बड़ा मूर्ख था! कितना अंधा और नादान था मैं!
अभी कुछ ही घंटे पहले, हैदराबाद के उस कॉन्फ्रेंस रूम से बाहर निकलते वक़्त मैं अपने मन को क्या तसल्ली दे रहा था? मैं यही सोचकर राहत की ठंडी सांसें ले रहा था ना कि ताऊजी के दोनों हाथ टूट जाने से खतरा टल गया है... कि दोनों हाथों पर भारी सफेद प्लास्टर चढ़ जाने के बाद अब किसी शारीरिक स्पर्श, किसी अंतरंगता का सवाल ही नहीं उठता... कि अब मर्यादा की दीवार फौलाद की बन चुकी है!
लेकिन हे भगवान... मेरा वो शहरी, कॉरपोरेट दिमाग कितना खोखला और बेवकूफ था!
एक ऐसी नंगी, बेरहम और बायोलॉजिकल सच्चाई जो अब तक मेरे दिमाग से ओझल थी, अचानक पूरी नग्नता के साथ मेरे सामने आ खड़ी हुई!
ताऊजी के दोनों हाथ... कलाई से लेकर कोहनी के ऊपर तक भारी, सख्त प्लास्टर में जकड़े हुए हैं!
वो अपनी उंगलियों का एक पोर तक नहीं हिला सकते!
इसका मतलब?
हे भगवान... इसका सीधा, व्यावहारिक मतलब क्या था?!
खाना? ताऊजी अपने हाथ से पानी का एक गिलास तक नहीं उठा सकते थे। वो रोटी का एक निवाला नहीं तोड़ सकते थे, दाल में चम्मच नहीं डुबो सकते थे। अगले पूरे तीन हफ़्तों तक... काव्या को अपने नाज़ुक, गोरे हाथों से हर एक कौर उनके मुंह में डालना होगा... गिलास उनके होंठों पर टिकाकर पानी पिलाना होगा!
नहाना? प्लास्टर पर पानी की एक बूंद भी नहीं पड़नी चाहिए थी। ताऊजी अपने बदन पर साबुन कैसे लगाएंगे? अपनी चौड़ी, पसीने से भीगी पीठ कैसे धोएंगे? काव्या को उस विशाल, नंगे पहलवान के बदन से बनियान उतारनी होगी... प्लास्टिक की थैलियों से उनके प्लास्टर को बांधना होगा... और अपने हाथों से गीले तौलिये और Lifebuoy साबुन से उस पूरे अखाड़े के बदन को स्पंज-बाथ कराना होगा!
और... और सबसे भयानक... सबसे रूह कंपा देने वाला सवाल...
वॉशरूम?!
नंबर एक और नंबर दो?!
मेरी सांस मेरी छाती में ही घुटकर रह गई। मेरी हथेलियों से ठंडा पसीना छूटने लगा।
एक मर्द... एक छप्पन साल का विशाल, देहाती पहलवान... जब उसे पेशाब लगेगी, तो वो क्या करेगा? वो अपनी धोती की गांठ खुद कैसे खोलेगा? वो अपने हाथ से अपनी लुंगी का छोर तक नहीं पकड़ सकता!
उसे पेशाब करने के लिए... कमोड के सामने खड़े होकर... अपनी बहू को आवाज़ देनी होगी!
काव्या को उस बंद बाथरूम में उनके साथ जाना होगा... अपने नाज़ुक, कांपते हाथों से उस देहाती मर्द की धोती की गांठ खोलनी होगी... कपड़े के भीतर हाथ डालकर उस भारी, रोएंदार और विशाल अंग को अपनी उंगलियों में थामना होगा... और कमोड के ऊपर सीधा पकड़कर तब तक खड़े रहना होगा जब तक उस पहलवान की पेशाब की धार खत्म न हो जाए!
और नंबर दो? शौच?
जब ताऊजी को पेट साफ करना होगा... तो वो कमोड पर कैसे बैठेंगे? और उससे भी आगे... शौच के बाद वो खुद को धोएंगे कैसे?! एक भारतीय घर में कोई भी शौच के बाद बिना धोए नहीं रह सकता! ताऊजी अपनी दोनों प्लास्टर बंधी बाहों से न तो जेट-स्प्रे उठा सकते थे, न पानी का लोटा, न ही पीछे हाथ ले जा सकते थे!
काव्या को... मेरी उस नफीस, कोरगांव पार्क की रईस और संस्कारी बीवी को... अपने हाथों से पानी और साबुन लेकर, उस विशाल ससुर के पिछले हिस्से को, उनके अंगों को साफ़ करना होगा... धोना होगा!
ओह शिट... ओह गॉड...!
मेरे रोंगटे खड़े हो चुके थे। मेरे गले में थूक सूख चुका था।
ये कोई नॉर्मल सेवा नहीं थी। ये कोई बीमार ससुर को दवाई देने जैसा नहीं था। ये इंसान के जिस्म की वो सबसे निचली, सबसे आदिम और सबसे नग्न जैविक लाचारी थी जहाँ शर्म, हया, रिश्ते और मर्यादा की हर एक दीवार ढहकर राख बन जाती है!
अगर कोई औरत किसी पराए मर्द के पेशाब के अंग को दिन में चार बार अपने हाथों में थामेगी... अगर वो उसके शौच के बाद उसके अंगों को अपने हाथों से धोएगी... तो फिर उन दोनों के बीच ऐसा कौन सा पर्दा, ऐसी कौन सी मर्यादा बाकी रह जाएगी जिसे लांघने में उनको ज़रा भी हिचक हो?!
जिस हाथ टूटने को मैं खतरा टलना समझ रहा था... वो तो असल में इस घर की हर एक दीवार, हर एक पर्दे को नंगा करके गिरा देने वाला सबसे भयानक तूफान बन चुका था!
उस एक विचार ने... उस भयानक, कामुक और वर्जित अहसास ने मेरे दिमाग को एक ऐसी आग में झोंक दिया जिसने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था!
दरवाज़ा बंद होते ही काव्या ने अपनी पीठ उस भारी लकड़ी के पल्ले से टिका दी।
उसने अपनी दोनों आंखें मूंद लीं। कमरे में छाया सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की सुइयों की टिक-टिक भी किसी चाबुक की तरह सुनाई दे रही थी।
काव्या लगभग घिसटते हुए कदमों से सीधे मास्टर बेडरूम के भीतर गयी और अंदर से बाथरूम का दरवाज़ा बंद करके कुंडी चढ़ा दी।
Cam_MasterBed_01 से मुझे सिर्फ बाथरूम का बंद दरवाज़ा दिखाई दे रहा था, लेकिन उस सन्नाटे में वेंटिलेशन ग्रिल से छनकर आती हुई आवाज़ें मेरे हेडफोन में बिलकुल साफ थीं।
काव्या बेसिन के नल को पूरी ताकत से खोल चुकी थी। पानी के तेज़ बहाव की आवाज़ के बीच... उसके सिसकने की आवाज़ आई।
वो रो रही थी।
वो भयानक, बेकाबू होकर रो रही थी।
बेसिन के काले ग्रेनाइट पर अपने दोनों हाथ टिकाए, वो आईने के सामने खड़ी अपने ही अक्स को देखकर घिन और खौफ से कांप रही थी।
"हे भगवान... ये मुझे क्या हो गया था?" उसकी टूटी हुई, सिसकती हुई फुसफुसाहट पानी की आवाज़ के साथ मेरे कानों में पड़ी। "मैंने अपनी ही लाडली को... अपनी अनु को उस तरह देखा? वो मेरी जान है... मैंने उसे ऐसे डांटा जैसे वो मेरी सौतन हो, मेरी दुश्मन हो... मुझे क्या होता जा रहा है? क्या मैं पागल हो रही हूँ...?"
उसने अपनी हथेलियों में ठंडा पानी भरा और पागलों की तरह अपने चेहरे, अपनी आंखों और अपनी गर्दन पर मारा। वो अपनी उस संस्कारी, ममतालु पहचान को ढूंढने की कोशिश कर रही थी जो कोरगांव पार्क के बंगले में पली-बढ़ी थी, जो मंदिर में दीया जलाती थी और अपनी बेटी को खरोंच आने पर भी रो पड़ती थी।
लेकिन फिर...
पानी की आवाज़ अचानक धीमी हो गई।
काव्या ने अपना सिर उठाया।
आईने में उसने अपने उस भीगे हुए, तमतमाते चेहरे को देखा। और उस पल... उसके आंसुओं की धार थम गई।
![[Image: img-01513-cleaned.png]](https://i.ibb.co/YFg97tnk/img-01513-cleaned.png)
उसकी सांसों की गति धीमी हुई। उसकी आंखों की वो नम, लाचार पुतलियां अचानक एक अजीब, ठंडे और आदिम पत्थर में बदलने लगीं।
एक दूसरी औरत... जो शायद इस घर की दीवारों में, ताऊजी के उस पसीने और सरसों के तेल की गंध में पिछले कई हफ्तों से धीरे-धीरे जाग रही थी... उसने काव्या के वजूद की कमान अपने हाथों में ले ली।
काव्या ने आईने में अपने ही होठों को हल्का सा तनते हुए देखा।
“नहीं... जो हुआ, वही होना था।”
वो फुसफुसाहट अब रोने वाली काव्या की नहीं थी। वो उस दूसरी काव्या की थी जिसकी ज़बान पर कोई ताला नहीं था।
“राजेश हैदराबाद में है... उसे अपनी नौकरी और लोन प्यारा है। अनु कोरगांव पार्क चली गयी... वो सेफ़ है। अब इस घर में मेरे और ताऊजी के बीच कोई तीसरा नहीं है। जिस मर्द ने मेरी बेटी के लिए अपनी हड्डियां तुड़वा लीं... उसका हक़ है मेरे हर कतरे पर। अब मुझे किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है... अब इस जिस्म की, इस घर की मालकिन सिर्फ मैं हूँ।”
उसने नल बंद किया। तौलिये से अपना चेहरा पोंछा।
जब वो बाथरूम से बाहर निकली, तो उसकी चाल में वो पहले वाली हिचकिचाहट, वो घबराहट पूरी तरह गायब थी। उसके कंधे सीधे थे, उसकी चाल में एक नशीला, गहरा ठहराव था।
उसने दीवान पर जाकर देखा, ताऊजी दर्द की भारी दवाइयों के असर से गहरी, खर्राटों भरी नींद में डूब चुके थे। उनका मुंह हल्का सा खुला था और प्लास्टर बंधे हाथ उनके सीने पर धरे थे।
काव्या ने झुककर बहुत धीरे से उनकी चादर उनके सीने तक खींची। उसकी उंगलियां एक पल के लिए ताऊजी के चौड़े, पसीने से भीगे माथे पर टिकीं। उसने अपनी सांस उनकी सांसों के करीब महसूस की, और फिर बिना एक भी आवाज़ किए, वो वापस मास्टर बेडरूम में आ गई।
उसने बेडरूम की बत्तियां बुझा दीं।
सिर्फ खिड़की से आती हुई शहर की हल्की पीली रोशनी कमरे में थी।
काव्या बिस्तर की कोर पर बैठ गई। उसने अपने तकिए के नीचे से अपना वो सैमसंग टैबलेट निकाला।
उसकी स्क्रीन की ठंडी, नीली रोशनी काव्या के खूबसूरत, संगमरमरी चेहरे पर पड़ी।
उसने एक ऐप खोला।
वही ऐप... वही सीक्रेट टम्बलर ब्लॉग, @pinklily_confessions।
हैदराबाद के होटल में बैठे मेरे फोन पर एक तीखी, हल्की नोटिफिकेशन वाइब्रेट हुई:
[pink lily just posted a new entry: "दो औरतें"]
मेरी उंगलियां कांपने लगीं। मैंने अपने फोन की स्क्रीन खोली।
रात के १०:२४ पर काव्या ने अपने उस गुप्त पते से, अंधेरे कमरे में बैठकर, वो अल्फाज़ टाइप किए थे जिन्होंने मेरी आत्मा को हमेशा के लिए झकझोर कर रख दिया:
Quote:"मेरी ही चमड़ी के नीचे कोई अजनबी औरत जाग उठी है... वो जब सामने आती है, तो मुझे अपनी ही फूल जैसी बेटी एक दुश्मन की तरह लगने लगती है। जैसे वो लाडली उस लाचार मर्द का खून चूसने आई हो।
एक मैं हूँ जो अपने सिंदूर, अपनी शादी और अपनी ममता के लिए तकिए में मुँह छिपाकर रोती है... और दूसरी वो है जो उस घायल मर्द की चौड़ी, पसीने से भीगी छाती और टूटी बाहों को देखकर अपनी सारी मर्यादा, सारी शर्म भूल जाती है। जब मैं उनकी पट्टियों को छूती हूँ, तो मेरे अंदर से दया नहीं... एक खौफनाक, हठीला अधिकार निकलता है।
मुझे डर लग रहा है कि वो दूसरी औरत मुझे धीरे-धीरे पूरा निगल लेगी... और सबसे डरावनी बात ये है कि मेरा मन अब उस दूसरी औरत से ही प्यार करने लगा है। आज की रात... ये घर खाली है। और मैं उस अजनबी औरत के हवाले हूँ..."
मैंने फोन को अपनी डेस्क पर रख दिया।
मेरी हथेलियां पसीने से लथपथ थीं। मेरी गर्दन के पीछे के सारे बाल खड़े हो चुके थे।
काव्या को खुद नहीं पता था कि उसके ज़ेहन में क्या टूट चुका है। वो किसी मनोरोग की शिकार नहीं थी, वो तो बस उस आदिम, वर्जित वासना और कृतज्ञता के उस दोराहे पर खड़ी थी जहाँ एक औरत अपने सारे सामाजिक खोल उतारकर फेंक देती है।
और मैं?
मैं स्क्रीन पर उस अंधेरे बेडरूम में नीली रोशनी में चमकते उसके चेहरे को देख रहा था... ये जानते हुए कि कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो उस फ्लैट ९०३ में कोई बहू अपने ससुर की सेवा नहीं कर रही होगी... बल्कि एक भूखी, आज़ाद और निडर औरत, अपने उस घायल, लाचार मर्द को अपनी उंगलियों पर नचा रही होगी।
और उस खेल का पहला पर्दा... अब उठने ही वाला था।
--- To Be Continued ---


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