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Adultery Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej
#51
अध्याय 40: अप्रत्याशित हादसा

हैदराबाद के टेक कॉरिडोर स्थित रीजनल हेडक्वार्टर में, शाम के ठीक सवा छह बज रहे थे। 

पूरे नौ घंटे की लगातार, थका देने वाली ऑडिट मैराथन के बाद अब जाकर कॉन्फ्रेंस रूम की भारी कांच की खिड़कियों के पार सन्नाटा उतरा था। टेबल पर बिखरी हुई बैलेंस शीट्स, रीजनल वेयरहाउस के इन्वेंट्री चार्ट्स और ईआरपी इंटीग्रेशन के दर्जनों पन्नों पर क्लाइंट्स और डायरेक्टर्स के नीली स्याही वाले दस्तखत चमक रहे थे। 

दिन भर की इस जानलेवा मसरूफियत में मेरे पास एक पल के लिए भी सांस लेने या अपनी जेब से फोन निकालकर फ्लैट ९०३ के कैमरों को चेक करने की फुरसत नहीं मिली थी। सुबह की वो चाय, ताऊजी के वो संजीदा लफ्ज़ और काव्या का वो मौन समर्पण... सब कुछ दिन भर मेरे दिमाग के किसी अंधेरे कोने में एक खौलता हुआ कांटा बनकर चुभता रहा था। 

लेकिन अब... सब कुछ खत्म हो चुका था। 

"ग्रेट जॉब, राजेश! आज का क्लोजर वाकई सॉलिड रहा," मेरे सीनियर कलीग ने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा और अपना लैपटॉप बैग समेटने लगा। "चलो, लॉबी में चलते हैं। आज रात का डिनर कंपनी की तरफ से बंजारा हिल्स में है।" 

"थैंक्स समीर, पर मैं डिनर के लिए नहीं रुक पाऊँगा," मैंने एक फीकी, थकी हुई मुस्कान के साथ जवाब दिया और अपनी मेज़ पर रखा लेदर का ब्रीफकेस बंद करने लगा। "मेरी रात की ट्रेन का टाइम हो रहा है। बस होटल जाकर बैग उठाना है और सीधे सिकंदराबाद स्टेशन निकलना है।" 

"अरे हां, तुम्हारी आज रात की वापसी तय थी ना? ठीक है भाई, सेफ जर्नी। कल पुणे पहुँचकर बात करते हैं।" 

समीर मुस्कुराते हुए बाहर निकल गया। 

कॉन्फ्रेंस रूम की दूधिया ट्यूबलाइट्स के नीचे अकेला खड़ा मैं, गहरी राहत की एक ठंडी सांस ले रहा था। 

मेरी ट्रेन रात के ठीक नौ बजे थी। इसका मतलब था कि मैं अगले बारह घंटों में पुणे पहुँचने वाला था। आज सुबह से लेकर अब तक मेरे दिल पर जो एक भयानक, दमघोंटू खौफ हावी था कि मेरे गैर-हाज़िरी में फ्लैट ९०३ की मर्यादा पर कोई नई आंच न आ जाए... वो खौफ अब खत्म होने वाला था। मैं आज रात ही अपने घर पहुँचकर अपनी उस ठंडी गृहस्थी की कमान दोबारा अपने हाथों में ले लूँगा। 

मैंने मुस्कुराते हुए अपनी जैकेट की ज़िप खींची और जैसे ही ब्रीफकेस उठाकर दरवाजे की तरफ बढ़ा...

मेरी पैंट की जेब में रखा फोन बेतहाशा कांप उठा। 

वाइब्रेशन... थरथराहट... और लाउड रिंगटोन! 

स्क्रीन पर काव्या का नाम चमक रहा था। 

काव्या का फोन इस टाइम? आमतौर पर काव्या मुझे रात को आठ या साढ़े आठ बजे, बुटीक बंद करके घर लौटने के बाद ही कॉल किया करती थी। अभी तो शाम के सवा छह ही बजे थे। 

मैंने तुरंत स्क्रीन स्वाइप करके फोन कान से लगाया: 

"हेलो काव्या? मैं बस अभी ऑफिस से निकल ही रहा था, आज रात की ट्रेन..." 

"रा... राजेश!" 

काव्या की आवाज़ सुनते ही मेरे कदम चौखट पर ही जम गए। 

वो आवाज़ काव्या की कॉमन, मीठी और संजीदा आवाज़ नहीं थी। काव्या बुरी तरह हांफ रही थी। उसकी सांसें किसी फटी हुई धौंकनी की तरह चल रही थीं, और उसकी आवाज़ में एक भयानक, बेकाबू चीख और आंसुओं का सैलाब घुला हुआ था। पृष्ठभूमि से किसी बड़े हॉस्पिटल के अनाउंसमेंट सिस्टम की गूंज और मॉनिटर्स की तीखी टीं... टीं... की आवाज़ें साफ आ रही थीं। 

"काव्या?! क्या हुआ? तुम रो क्यों रही हो? तुम कहाँ हो?!" मेरी रीढ़ में बर्फ की सनसनाहट दौड़ गई। 

"राजेश... बहुत बड़ा अनर्थ हो गया... ताऊजी... ताऊजी का एक्सीडेंट..." 


[Image: img-01512-cleaned.png]


काव्या का गला बुरी तरह रुंध गया। वो हिचकियों के बीच पूरी बात भी नहीं कह पाई थी कि...

बीप... बीप... बीप! 

मेरे फोन की स्क्रीन पर कॉल-वेटिंग की तीखी, भारी बीप बजी। 

स्क्रीन की काली पट्टी पर बड़े-बड़े अक्षरों में कंपनी के रीजनल वाइस प्रेसिडेंट (सप्लाई चेन व लॉजिस्टिक्स ऑपरेशंस) का ऑफिशियल नंबर चमक रहा था: राघवन सर (वीपी - नेशनल ऑपरेशंस)। 

कॉरपोरेट की दुनिया में वीपी का कॉल किसी जनरल के इमरजेंसी फरमान जैसा होता था, जिसे इग्नोर करने का मतलब सीधे अपनी नौकरी से हाथ धोना था। 

मुझे लगा कि शायद आज के सफल क्लोजर के बाद समीर ने वीपी को ब्रीफ कर दिया है और वो केवल दो शब्दों की फॉर्मल बधाई या मेरे ट्रैवल वाउचर की क्लीयरेंस के लिए लाइन पर हैं। 

"काव्या, सुनो! एक सेकंड रुको, वीपी सर की अर्जेंट लाइन आ रही है, मैं बस दो सेकंड में बात करके काटता हूँ... प्लीज होल्ड करना!" 

"नहीं राजेश, मेरी बात सुनो! यहाँ ताऊजी..." 

लेकिन इससे पहले कि काव्या का अगला वाक्य पूरा होता, मैंने घबराहट और हड़बड़ाहट में कॉल-वेटिंग का बटन दबाकर वीपी की लाइन कनेक्ट कर दी। 

"गुड इवनिंग सर, मैं राजेश बोल रहा हूँ..." 

"राजेश, कट द फॉर्मैलिटीज एंड लिसन टू मी वेरी केयरफुली!" दूसरी तरफ से राघवन सर की भारी, सख्त और तनाव से भरी आवाज़ गूंजी। 

कॉन्फ्रेंस रूम के सन्नाटे में मेरे कान सुन्न पड़ गए। 

"सर? सब ठीक तो है? आज का रीजनल ऑडिट तो पूरी तरह साइन-ऑफ हो चुका है..." 

"ऑडिट गया भाड़ में, राजेश! अभी आधे घंटे पहले हेडक्वार्टर से रेड-अलर्ट आया है। साउथ-वेस्टर्न रीजन के तीन बड़े वेयरहाउस क्लस्टर्स, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद में पूरा ईआरपी और सप्लाई चेन नेटवर्क पूरी तरह क्रैश कर गया है। करोड़ों का शिपमेंट पोर्ट्स और हाईवे पर अटका हुआ है। क्लाइंट्स ने पेनल्टी क्लॉज ट्रिगर करने की धमकी दी है!" 

मेरी छाती में एक भयानक धक-धक शुरू हो गयी: 

"सर... लेकिन मेरी तो आज रात की पुणे की ट्रेन..." 

"कोई ट्रेन नहीं, राजेश! तुम्हारी सारी छुट्टियां और ट्रैवल टिकट्स इमीडिएट इफेक्ट से कैंसिल कर दी गयी हैं। मैनेजमेंट ने फैसला किया है कि तुम अगले पूरे तीन हफ्तों तक यहीं साउथ रीजन में डिप्लॉयड रहोगे। तुमको आज रात ही चेन्नई के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़नी होगी, फिर बेंगलुरु और वापस हैदराबाद का सारा लॉजिस्टिक्स ग्राउंड जीरो पर रहकर अपनी देखरेख में रिस्टोर करना होगा। ये नॉन-नेगोशिएबल है, राजेश! अगर तुमने ये क्राइसिस संभाल लिया तो तुम्हारा प्रमोशन पक्का है, लेकिन अगर तुमने इस टाइम साइट छोड़ी... तो कल सुबह तक टर्मिनेशन लेटर तुम्हारी टेबल पर होगा!" 

फ्लाइट... चेन्नई... बेंगलुरु... तीन हफ्ते! 

टर्मिनेशन लेटर! 

मेरे पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन ही खिसक गई। 

'फ्लाइट' शब्द सुनते ही मेरे हलक में थूक सूख गया। मुझे बचपन से हवाई जहाज़ में बैठने का एक भयानक, लकवा मार देने वाला डर था... एक ऐसा दमघोंटू एवियोफोबिया (प्लेन-फोबिया) जिसमें फ़्लाइट का दरवाज़ा बंद होते ही मेरा दम घुटने लगता था, आंखों के आगे अंधेरा छा जाता था और पैनिक अटैक से मेरी जान हलक में अटक जाती थी। यही वजह थी कि मैं कंपनी के हर टूर पर चौदह-चौदह घंटे की ट्रेन यात्रा चुनता था ताकि मेरे पैर ज़मीन पर रहें! 

मेरा दिल चाहा कि मैं वीपी के सामने गिड़गिड़ाकर कह दूँ कि सर, मुझे ट्रेन से जाने दो... लेकिन कॉरपोरेट की इस बेरहम, टारगेट-ड्रिवन दुनिया में अपनी इस कमज़ोरी का ज़िक्र करने का मतलब था अपनी ही कब्र खुद खोदना! संकट के इस टाइम कंपनी को रिजल्ट चाहिए थे, किसी मैनेजर का फोबिया नहीं। अगर मैंने बहाना बनाया, तो वीपी मुझे उसी सेकंड नौकरी से बाहर फेंक देता। 

"सर... लेकिन मेरी फैमिली... घर पर..." 

"फैमिली बाद में, राजेश! कंपनी का फ्यूचर दांव पर लगा है। एचआर को मैंने इन्स्ट्रक्ट कर दिया है, तुम्हारा पूरा रिवाइज्ड शेड्यूल मेल पर आ रहा है। डोंट लेट मी डाउन!" 

क्लिक! 

फोन कट गया। 

लाइन पूरी तरह डेड हो चुकी थी। 

मैं उस खाली कॉन्फ्रेंस रूम में किसी लावारिस लाश की तरह खड़ा रह गया। मेरे हाथ बुरी तरह कांप रहे थे। मेरा बीस साल का होम लोन, मेरी नौकरी, मेरा पूरा कॉरपोरेट करियर... और उसके ऊपर अगले इक्कीस दिनों तक एक शहर से दूसरे शहर उड़ने वाली वो खौफनाक फ्लाइट्स! सब कुछ एक ही झटके में उस तीन हफ्ते के फरमान की ज़द में आ चुका था। कंपनी ने मुझे अपने करियर और अपने सबसे बड़े फोबिया की आग में एक साथ झोंक दिया था! 

लेकिन अगले ही पल, मेरे दिमाग में बिजली की तरह एक भयानक खौफ कौंधा...

काव्या! 

काव्या रो रही थी... ताऊजी का एक्सीडेंट! 

मैंने पागलों की तरह कांपती उंगलियों से काव्या का नंबर दोबारा डायल किया। 

फोन की पहली ही घंटी पर कॉल उठ गया। 

लेकिन फोन उठते ही, दूसरी तरफ से जो आवाज़ आई, उसने मेरे सीने को छलनी कर दिया। 

"राजेश! तुम... तुम इंसान हो या पत्थर के बने हो?!" 

काव्या की आवाज़ गुस्से, घबराहट और आंसुओं के एक भयानक तूफ़ान में फट पड़ी थी: 

"तुमने मेरा फोन काट दिया?! तुमको अंदाज़ा भी है कि मैं इस टाइम कहाँ खड़ी हूँ? यहाँ मेरी रूह कांप रही है, मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ चुके हैं, और तुमने अपने उस मनहूस दफ्तर के लिए मेरी बात बीच में ही काट दी?!" 



"काव्या... मुझे माफ कर दो, भगवान के लिए मेरी बात सुनो!" मैं कॉरीडोर में पागलों की तरह टहलते हुए गिड़गिड़ाने लगा, मेरी अपनी सांसें उखड़ रही थीं। "वो... वो वीपी का इमरजेंसी कॉल था... तुम पहले बताओ कि हुआ क्या है? तुम रो क्यों रही हो? ताऊजी को क्या हुआ?!" 

काव्या ने एक बहुत भारी, हिचकियों से भरी सांस खींची। उसके रोने की आवाज़ इतनी बेबस और दर्दनाक थी कि मेरा कलेजा मुंह को आ गया: 

"राजेश... आज दोपहर को... हमारी बेटी... हमारी अनु..." 

अनु?! 

मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मेरा ब्रीफकेस मेरे हाथ से छूटकर नीचे मार्बल के फर्श पर गिर पड़ा: 

"अनु?! अनु को क्या हुआ काव्या?! भगवान के लिए सच बताओ, मेरी बेटी ठीक तो है ना?!" 

"अनु... अनु बिलकुल सेफ़ है राजेश... भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि मेरी बेटी को एक खरोंच तक नहीं आई!" काव्या ने सुबकते हुए कहा, और फिर उसकी आवाज़ में एक गहरा, कंपकंपाता हुआ दर्द गूंजा। "लेकिन... ताऊजी... ताऊजी ने अनु को बचाने के लिए अपनी दोनों बाहें तुड़वा लीं राजेश!" 

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरा पूरा बदन पसीने से भीग गया: 

"क्या?! कैसे?!" 

काव्या ने रोते हुए जो कुछ बताया, उसने मेरी रूह को अंदर तक कंपा दिया। 

दोपहर के करीब चार बजे, हमारी हाई-राइज सोसाइटी के भारी लोहे वाले मेन स्लाइडिंग गेट के पास अनु खेल रही थी। तभी अचानक, वो कई सौ किलो का भारी, जंग लगा लोहे का गेट अपने ऊपरी ट्रैक से फिसल गया और पूरी रफ्तार से सीधे नीचे अनु की तरफ गिरने लगा! 

सोसाइटी के कंपाउंड में टहल रहे ताऊजी ने जैसे ही उस लोहे के पहाड़ को हमारी लाडली पर गिरते देखा, उस छप्पन साल के बूढ़े पहलवान के भीतर का अखाड़े वाला खून खौल उठा। ताऊजी ने न अपनी उम्र देखी, न अपनी जान की परवाह की। वो किसी बिजली की रफ्तार से छलांग लगाकर उस गिरते हुए गेट के नीचे कूद पड़े! 

ताऊजी ने अनु को झपटकर अपने विशाल सीने के नीचे पूरी तरह छुपा लिया... और उस कई सौ किलो वजनी लोहे के गेट का पूरा जानलेवा प्रहार सीधे अपने दोनों फैले हुए हाथों और कलाइयों पर झेल लिया! 

अनु नीचे पूरी तरह महफूज़ बच गयी, लेकिन उस भारी लोहे की चोट ने ताऊजी की दोनों कलाइयों और अग्रभुजाओं की हड्डियों को बुरी तरह चकनाचूर कर दिया! 

"सोसाइटी के लोग दौड़े... सिक्योरिटी गार्ड्स ने मिलकर उस भारी गेट को हटाया," काव्या की आवाज़ में आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। "ताऊजी दर्द से तड़प रहे थे, उनके दोनों हाथ बेजान होकर लटक रहे थे राजेश! मैं पागलों की तरह उनको लेकर शहर के इस बड़े मल्टी-स्पेशियलिटी हॉस्पिटल भागी। डॉक्टरों ने तुरंत उनको इमरजेंसी में लिया..." 

"डॉक्टर... डॉक्टर क्या कह रहे हैं काव्या?! चोट कितनी गहरी है?!" मेरी आवाज़ कांप रही थी। 

"दोनों हाथों की हड्डियां मल्टीपल फ्रैक्चर हो गयी हैं राजेश... कलाई से लेकर कोहनी तक की हड्डियां टूट चुकी हैं," काव्या ने नाक सुड़कते हुए, बहुत ही रुआंसी आवाज़ में बताया। "ऑर्थोपेडिक सर्जन ने पिछले दो घंटे से उनको ऑपरेशन थिएटर में रखकर दोनों हाथों पर उंगलियों से लेकर कोहनी के ऊपर तक भारी, सफेद प्लास्टर चढ़ा दिया है। दोनों हाथों में पट्टियां और गले में स्लिंग्स बांध दी हैं। डॉक्टर ने साफ कह दिया है कि हड्डियों को दोबारा जुड़ने में पूरे सौ दिन का टाइम लगेगा! अगले एक महीने तक वो अपनी उंगलियां तक नहीं हिला पाएंगे... वो अपने हाथों से पानी का एक घूंट तक नहीं पी सकते राजेश!" 

मेरी आंखों से आंसुओं की दो बूंदें टपक कर मेरे गालों पर ढुलक गईं। 

मेरे सीने में ताऊजी के लिए एक ऐसा बेपनाह, असीम आदर और कर्ज का समंदर उमड़ पड़ा जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। 

वो बूढ़ा देहाती शेर... जिसे मैंने अपनी वहशी हवस और घटिया वोयूरिज्म का मोहरा बनाने की कोशिश की थी... उसने आज मेरी कुल की एकमात्र संतान, मेरी मासूम बेटी की ज़िंदगी बचाने के लिए अपने दोनों फौलादी हाथ कुर्बान कर दिए थे! अगर आज ताऊजी वहां न होते, तो मेरी लाडली... मेरी अनु... उस लोहे के नीचे दबकर खत्म हो चुकी होती! 

और उसी पल, मेरे सीने में एक भयानक अपराधबोध और पश्चाताप की आग भड़क उठी। 

"काव्या... सुनो!" मैंने फोन को दोनों हाथों से भींचते हुए बदहवास आवाज़ में कहा। "तुम बिलकुल मत घबराओ। मैं... मैं अभी इसी टाइम अपनी कंपनी के वीपी के पैर पड़ता हूँ। मुझे इस नौकरी की, इस प्रमोशन की कोई परवाह नहीं है! मैं अभी जाकर इमरजेंसी लीव मांगता हूँ और चाहे जो हो जाए, मैं आज रात की पहली ट्रेन पकड़कर सुबह तक सीधे हॉस्पिटल पहुँच रहा हूँ! तुम ताऊजी को संभालो, मैं आ रहा हूँ!" 

"नहीं राजेश!" 

काव्या की आवाज़ अचानक चीखते हुए गूंजी। 

उसकी आवाज़ में अब वो रोने वाली लाचारी नहीं थी। एक औरत, एक पत्नी और एक गृहलक्ष्मी की वो फौलादी, संजीदा और सख्त आवाज़ फोन के स्पीकर से निकली, जिसने मुझे वहीं का वहीं पत्थर की मूरत बना दिया: 

"तुम ऐसी बेवकूफी करने की हिम्मत भी मत करना, राजेश!" 

"काव्या... तुम समझ नहीं रही हो, ताऊजी लाचार हैं..." 

"मैं सब समझ रही हूँ राजेश, और तुम जो करने जा रहे हो, वो सरासर पागलपन है!" काव्या ने एक बहुत भारी, सख्त सांस भरकर कहा। "तुम अपनी नौकरी को दांव पर लगाओगे? तुम्हारे उस फ्लैट का बीस साल का होम लोन कौन भरेगा? हमारे घर का राशन, बेटी की इतनी महंगी कॉलेज फीस और इस हॉस्पिटल के लाखों के मेडिकल बिल्स... ये सब तुम्हारी सैलरी से आते हैं राजेश! अगर इस टाइम तुम्हारी नौकरी चली गयी, तो हम रोड पर आ जाएंगे। क्या तुम इस मुश्किल टाइम में हमको बर्बाद करना चाहते हो?!" 

"लेकिन काव्या... घर पर ताऊजी की देखभाल कौन करेगा? उनके दोनों हाथ बंधे हैं!" 

"मैं करूँगी!" काव्या की आवाज़ में एक ऐसा गहरा, अटूट और पवित्र संकल्प गूंजा जिसने मुझे अंदर तक हिला दिया। "ताऊजी ने मेरे कलेजे के टुकड़े को, मेरी बच्ची को अपनी जान देकर बचाया है राजेश। आज अगर मेरी बेटी ज़िंदा है, तो वो उस बुजुर्ग की बदौलत है। अब उनकी सेवा करना, उनके इस टूटे हुए जिस्म को संभालना... ये किसी और का नहीं, ये मेरा पहला और सबसे बड़ा धर्म है!" 

काव्या ने एक पल का ठहराव लिया, उसकी सांसों की धड़कन साफ सुनाई दे रही थी: 

"अनु पूरी तरह ठीक है... वो मेरे साथ हॉस्पिटल में ही है, बहुत सहमी हुई है। मैंने मम्मी सुमित्रा को बोल दिया है, वो बाद में अनु को अपने घर ले जाने के लिए हमारे फ्लैट पर आ जाएंगी। और मैंने... मैंने अपने बुटीक से अगले पूरे महीने की छुट्टी ले ली है। मैं अपना सारा काम अपनी असिस्टेंट को सौंप चुकी हूँ।" 

"काव्या... लेकिन तुम अकेले..." 

"मैं कोई बच्ची नहीं हूँ राजेश, मैं इस घर की बहू हूँ!" काव्या की आवाज़ में एक अजीब सा संजीदा ठहराव आ गया था। "डॉक्टर ने कहा है कि आधे घंटे में प्लास्टर सूखने के बाद वो ताऊजी को डिस्चार्ज कर देंगे। मैं उनको टैक्सी से लेकर सीधे अपने फ्लैट जा रही हूँ। तुम अपने उस दफ्तर की जिम्मेदारी पूरी करो। जो भी तुम्हारी कंपनी का काम है, उसे पूरी निष्ठा से खत्म करो और जब तुम्हारा असाइनमेंट पूरा हो, तभी वापस लौटना। इस घर की, ताऊजी की और मेरी फिक्र तुम बिलकुल छोड़ दो। जब तक ये बहू ज़िंदा है, ताऊजी को किसी बात की तकलीफ नहीं होने देगी।" 

काव्या के उन सीधे, सच्चे और फौलादी शब्दों ने मेरे मुंह पर ताला लगा दिया था। 

काव्या ने मुझे पुणे लौटने से पूरी तरह, कड़ाई से रोक दिया था। उसने मुझे अपने उस तीन हफ्ते के कॉरपोरेट निर्वासन में रहने का एक ऐसा नैतिक लाइसेंस, एक ऐसा सामाजिक सुरक्षा-कवच थमा दिया था जिसे दुनिया का कोई भी इंसान झुठला नहीं सकता था। 

"डॉक्टर मुझे बुला रहे हैं राजेश, मुझे डिस्चार्ज पेपर्स पर साइन करना है। अपना ख्याल रखना। फोन रखता हूँ।" 

क्लिक। 

फोन कट गया। 

कॉन्फ्रेंस रूम की सुनसान, ठंडी हवा में सिर्फ मेरी अपनी उखड़ी हुई सांसों की आवाज़ गूंज रही थी। 

मैं वहीं चौखट के सहारे खड़ा रह गया। 

शुरुआत में जो मेरे सीने में एक भयानक घबराहट और हड़बड़ाहट थी... वो धीरे-धीरे, बहुत आहिस्ता से एक अजीब सी, शांत राहत में बदलने लगी। 

और फिर... 

उस सन्नाटे के भीतर, मेरे थके हुए दिमाग में एक बात बहुत साफ होकर उभरी:

ताऊजी के दोनों हाथ... कलाई से लेकर कोहनी के ऊपर तक... भारी, सफेद प्लास्टर में जकड़े हुए हैं! 

वो अपनी उंगलियां तक नहीं हिला सकते! 

डॉक्टर ने साफ कह दिया है कि हड्डियों को दोबारा जुड़ने में पूरे सौ दिन का टाइम लगेगा... वो एक लाचार मरीज की तरह बिस्तर पर पड़े रहने वाले हैं! 

मेरी छाती से एक बहुत भारी, ठंडी सांस बाहर निकली। 

इसका मतलब... इसका सीधा सा मतलब ये था कि जिस भयानक, वर्जित आग से मैं पिछले कई दिनों से खौफजदा था... वो आग अब हमेशा के लिए बुझ चुकी थी! 

जिस अखाड़े वाली फौलादी मर्दानगी, जिस बाहुबल और जिस शारीरिक ताक़त से मैं डर रहा था... आज के इस हादसे ने उस पूरी ताक़त को एक ही वार में पंगु बना दिया था। जब मर्द के दोनों हाथ ही टूट चुके हों, जब वो हिलने-डुलने के काबिल ही न बचा हो, तो फिर किसी अंतरंगता, किसी शारीरिक स्पर्श का सवाल ही कहाँ उठता था?! 

एक लाचार, घायल बुजुर्ग जिसके दोनों हाथ गले में स्लिंग्स से बंधे हों, वो किसी औरत को छूने का हौसला कैसे कर सकता था? 

काव्या भले ही घर पर रहे, लेकिन अब उनके बीच जो कुछ भी होगा, वो सिर्फ और सिर्फ दवा-गोली, खिचड़ी और एक संस्कारी बहू की तीमारदारी तक सीमित रहेगा। मर्यादा की जिस दीवार को सुबह की उस चाय ने मुश्किल से खड़ा किया था, ताऊजी के इस प्लास्टर ने उस दीवार को फौलाद का बना दिया था! अब उस बंद फ्लैट ९०३ में किसी अनहोनी, किसी पाप की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी। 

"चलो..." मैंने एक गहरी राहत की सांस खींचते हुए खुद से फुसफुसाया, "कम से कम पुणे के मोर्चे पर अब कोई खतरा नहीं है। सब कुछ सेफ़ है।" 

अब जो कुछ झेलना था, वो सिर्फ मुझे झेलना था। 

मेरी अपनी कॉरपोरेट मुसीबत, वीपी का वो सख्त फरमान, और अगले इक्कीस दिनों तक साउथ के अलग-अलग शहरों के बीच उड़ने वाली वो मनहूस फ्लाइट्स! मुझे अपनी नौकरी और बीस साल के होम लोन को बचाने के लिए अपने उस खौफनाक एवियोफोबिया की आग से गुज़रना था, अपनी जान को मुट्ठी में लेकर उन हवाई सफरों को झेलना था। 

लेकिन दिल के किसी कोने में ये तसल्ली ज़रूर थी कि मेरे घर की आबरू पर अब कोई आंच नहीं आने वाली थी। 

डिनर की भूख मेरे भीतर से पूरी तरह मर चुकी थी। 

मैंने नीचे फर्श से अपना ब्रीफकेस उठाया। अपने बिखरे हुए बालों को ठीक किया, और तेज़ी से उस कॉरपोरेट बिल्डिंग की सीढ़ियां उतरकर बाहर आ गया। 

रोड पर शाम की बत्तियां पानी चुकी थीं। मैंने पहली ही ऑटो को हाथ दिया और सीधे अपने होटल की तरफ रवाना हो गया। 

होटल के कमरे में पहुँचकर मुझे तुरंत अपना बैग पैक करना था, चेन्नई की उस रात वाली कनेक्टिंग फ्लाइट के लिए निकलना था, और उससे पहले बस एक नज़र लैपटॉप खोलकर तसल्ली कर लेनी थी कि काव्या और ताऊजी हॉस्पिटल से घर सही-सलामत पहुँच जाएं। 

पुणे का खतरा अब हमेशा के लिए टल चुका था... या कम से कम, उस बेवकूफ, नादान पति को यही लग रहा था! 


Chapter 40: Apratyashit Haadsa

Hyderabad ke tech corridor sthit regional headquarters mein, shaam ke theek sava chhah baj rahe the.

Poore nau ghante ki lagataar, thaka dene wali audit marathon ke baad ab jaakar conference room ki bhaari kaanch ki khidkiyon ke paar sannaata utra tha. Table par bikhri hui balance sheets, regional warehouse ke inventory charts aur ERP integration ke darjanon pannon par clients aur directors ke neeli syaahi wale dastakhat chamak rahe the.

Din bhar ki is jaanleva masroofiyat mein mere paas ek pal ke liye bhi saans lene ya apni jeb se phone nikaalkar flat 903 ke cameron ko check karne ki fursat nahi mili thi. Subah ki woh chai, Tauji ke woh sanjeeda lafz aur Kavya ka woh maun samarpan... sab kuch din bhar mere dimaag ke kisi andhere kone mein ek khoulta hua kaanta bankar chubhta raha tha.

Lekin ab... sab kuch khatam ho chuka tha.

"Great job, Rajesh! Aaj ka closure waqai solid raha," mere senior colleague ne meri peeth thapthapaate hue kaha aur apna laptop bag sametne laga. "Chalo, lobby mein chalte hain. Aaj raat ka dinner company ki taraf se Banjara Hills mein hai."

"Thanks Sameer, par main dinner ke liye nahi ruk paaoonga," maine ek pheeki, thaki hui muskaan ke saath jawaab diya aur apni mez par rakha leather ka briefcase band karne laga. "Meri raat ki train ka time ho raha hai. Bas hotel jaakar bag uthaana hai aur seedhe Secunderabad station nikalna hai."

"Are haan, tumhaari aaj raat ki waapsi tay thi na? Theek hai bhai, safe journey. Kal Pune pahunchkar baat karte hain."

Sameer muskuraate hue baahar nikal gaya.

Conference room ki doodhiya tubelights ke neeche akela khada main, gehri raahat ki ek thandi saans le raha tha.

Meri train raat ke theek nau baje thi. Iska matlab tha ki main agle baarah ghanton mein Pune pahunchne wala tha. Aaj subah se lekar ab tak mere dil par jo ek bhayanak, damghontu khauf haavi tha ki mere gair-haaziri mein flat 903 ki maryaada par koi nayi aanch na aa jaaye... woh khauf ab khatam hone wala tha. Main aaj raat hi apne ghar pahunchkar apni us thandi grihasthi ki kamaan dobaara apne haathon mein le loonga.

Maine muskuraate hue apni jacket ki zip kheenchi aur jaise hi briefcase uthaakar darwaze ki taraf badha...

Meri pant ki jeb mein rakha phone betahaasha kaanp utha.

Vibration... thartharaahat... aur loud ringtone!

Screen par Kavya ka naam chamak raha tha.

Kavya ka phone is time? Aamtaur par Kavya mujhe raat ko aath ya saadhe aath baje, boutique band karke ghar lautne ke baad hi call kiya karti thi. Abhi to shaam ke sava chhah hi baje the.

Maine turant screen swipe karke phone kaan se lagaya:

"Hello Kavya? Main bas abhi office se nikal hi raha tha, aaj raat ki train..."

"Ra... Rajesh!"

Kavya ki aawaaz sunte hi mere kadam chaukhat par hi jam gaye.

Woh aawaaz Kavya ki common, meethi aur sanjeeda aawaaz nahi thi. Kavya buri tarah haanph rahi thi. Uski saansein kisi phati hui dhaunkani ki tarah chal rahi thiin, aur uski aawaaz mein ek bhayanak, beqaaboo cheekh aur aansuon ka sailaab ghula hua tha. Prishthabhoomi se kisi bade hospital ke announcement system ki goonj aur monitors ki teekhi teen... teen... ki aawaazein saaf aa rahi thiin.

"Kavya?! Kya hua? Tum ro kyon rahi ho? Tum kahan ho?!" Meri reedh mein baraf ki sansanaahat daud gayi.

"Rajesh... bahut bada anarth ho gaya... Tauji... Tauji ka accident..."

[Image: img-01512-cleaned.png]

Kavya ka gala buri tarah rundh gaya. Woh hichkiyon ke beech poori baat bhi nahi keh paayi thi ki...

Beep... beep... beep!

Mere phone ki screen par call-waiting ki teekhi, bhaari beep baji.

Screen ki kaali patti par bade-bade aksharon mein company ke regional vice president (supply chain wa logistics operations) ka official number chamak raha tha: Raghavan Sir (VP - National Operations).

Corporate ki duniya mein VP ka call kisi general ke emergency farmaan jaisa hota tha, jise ignore karne ka matlab seedhe apni naukri se haath dhona tha.

Mujhe laga ki shaayad aaj ke safal closure ke baad Sameer ne VP ko brief kar diya hai aur woh keval do shabdon ki formal badhaai ya mere travel voucher ki clearance ke liye line par hain.

"Kavya, suno! Ek second ruko, VP sir ki urgent line aa rahi hai, main bas do second mein baat karke kaatta hoon... please hold karna!"

"Nahi Rajesh, meri baat suno! Yahan Tauji..."

Lekin isse pehle ki Kavya ka agla vaakya poora hota, maine ghabrahat aur hadbadaahat mein call-waiting ka button dabakar VP ki line connect kar di.

"Good evening sir, main Rajesh bol raha hoon..."

"Rajesh, cut the formalities and listen to me very carefully!" Doosri taraf se Raghavan sir ki bhaari, sakht aur tanaav se bhari aawaaz goonji.

Conference room ke sannaate mein mere kaan sunn pad gaye.

"Sir? Sab theek to hai? Aaj ka regional audit to poori tarah sign-off ho chuka hai..."

"Audit gaya bhaad mein, Rajesh! Abhi aadhe ghante pehle headquarters se red-alert aaya hai. South-Western region ke teen bade warehouse clusters, Chennai, Bengaluru aur Hyderabad mein poora ERP aur supply chain network poori tarah crash kar gaya hai. Karodon ka shipment ports aur highway par atka hua hai. Clients ne penalty clause trigger karne ki dhamki di hai!"

Meri chhaati mein ek bhayanak dhak-dhak shuru ho gayi:

"Sir... lekin meri to aaj raat ki Pune ki train..."

"Koi train nahi, Rajesh! Tumhari saari chhuttiyan aur travel tickets immediate effect se cancel kar di gayi hain. Management ne faisla kiya hai ki tum agle poore teen hafton tak yahin South region mein deployed rahoge. Tumko aaj raat hi Chennai ke liye connecting flight pakadni hogi, phir Bengaluru aur waapas Hyderabad ka saara logistics ground zero par rehkar apni dekhrekh mein restore karna hoga. Yeh non-negotiable hai, Rajesh! Agar tumne yeh crisis sambhaal liya to tumhara promotion pakka hai, lekin agar tumne is time site chhodi... to kal subah tak termination letter tumhari table par hoga!"

Flight... Chennai... Bengaluru... teen hafte!

Termination letter!

Mere pairon ke neeche se jaise zameen hi khisak gayi.

'Flight' shabd sunte hi mere halaq mein thook sookh gaya. Mujhe bachpan se hawaai jahaaz mein baithne ka ek bhayanak, lakwa maar dene wala dar tha... ek aisa damghontu aviophobia (plane-phobia) jismein flight ka darwaza band hote hi mera dam ghutne lagta tha, aankhon ke aage andhera chha jaata tha aur panic attack se meri jaan halaq mein atak jaati thi. Yahi wajah thi ki main company ke har tour par chaudah-chaudah ghante ki train yaatra chunta tha taaki mere pair zameen par rahein!

Mera dil chaaha ki main VP ke saamne gidgidaakar keh doon ki sir, mujhe train se jaane do... lekin corporate ki is berahm, target-driven duniya mein apni is kamzori ka zikr karne ka matlab tha apni hi qabr khud khodna! Sankat ke is time company ko result chahiye the, kisi manager ka phobia nahi. Agar maine bahaana banaya, to VP mujhe usi second naukri se baahar phenk deta.

"Sir... lekin meri family... ghar par..."

"Family baad mein, Rajesh! Company ka future daanv par laga hai. HR ko maine instruct kar diya hai, tumhara poora revised schedule mail par aa raha hai. Don't let me down!"

Click!

Phone kat gaya.

Line poori tarah dead ho chuki thi.

Main us khaali conference room mein kisi laawaaris laash ki tarah khada reh gaya. Mere haath buri tarah kaanp rahe the. Mera bees saal ka home loan, meri naukri, mera poora corporate career... aur uske oopar agle ikkees dinon tak ek shehar se doosre shehar udne wali woh khaufnaak flights! Sab kuch ek hi jhatke mein us teen hafte ke farmaan ki zad mein aa chuka tha. Company ne mujhe apne career aur apne sabse bade phobia ki aag mein ek saath jhonk diya tha!

Lekin agle hi pal, mere dimaag mein bijli ki tarah ek bhayanak khauf kaundha...

Kavya!

Kavya ro rahi thi... Tauji ka accident!

Maine paaglon ki tarah kaanpti ungliyon se Kavya ka number dobaara dial kiya.

Phone ki pehli hi ghanti par call uth gaya.

Lekin phone uthte hi, doosri taraf se jo aawaaz aayi, usne mere seene ko chhalni kar diya.

"Rajesh! Tum... tum insaan ho ya patthar ke bane ho?!"

Kavya ki aawaaz gusse, ghabrahat aur aansuon ke ek bhayanak toofaan mein phat padi thi:

"Tumne mera phone kaat diya?! Tumko andaaza bhi hai ki main is time kahan khadi hoon? Yahan meri rooh kaanp rahi hai, mere haath-pair thande pad chuke hain, aur tumne apne us manhoos daftar ke liye meri baat beech mein hi kaat di?!"

"Kavya... mujhe maaf kar do, bhagwan ke liye meri baat suno!" Main corridor mein paaglon ki tarah tehalte hue gidgidaane laga, meri apni saansein ukhad rahi thiin. "Woh... woh VP ka emergency call tha... tum pehle batao ki hua kya hai? Tum ro kyon rahi ho? Tauji ko kya hua?!"

Kavya ne ek bahut bhaari, hichkiyon se bhari saans kheenchi. Uske rone ki aawaaz itni bebas aur dardnaak thi ki mera kaleja munh ko aa gaya:

"Rajesh... aaj dopahar ko... humari beti... humari Anu..."

Anu?!

Meri aankhon ke aage andhera chha gaya. Mera briefcase mere haath se chhootkar neeche marble ke farsh par gir pada:

"Anu?! Anu ko kya hua Kavya?! Bhagwan ke liye sach batao, meri beti theek to hai na?!"

"Anu... Anu bilkul safe hai Rajesh... bhagwan ka laakh-laakh shukr hai ki meri beti ko ek kharonch tak nahi aayi!" Kavya ne subakte hue kaha, aur phir uski aawaaz mein ek gehra, kampkampaata hua dard goonja. "Lekin... Tauji... Tauji ne Anu ko bachaane ke liye apni dono baahein tudwa leen Rajesh!"

Mere rongte khade ho gaye. Mera poora badan paseene se bheeg gaya:

"Kya?! Kaise?!"

Kavya ne rote hue jo kuch bataaya, usne meri rooh ko andar tak kampa diya.

Dopahar ke qareeb chaar baje, humari high-rise society ke bhaari lohe wale main sliding gate ke paas Anu khel rahi thi. Tabhi achanak, woh kai sau kilo ka bhaari, jang laga lohe ka gate apne oopri track se fisal gaya aur poori raftaar se seedhe neeche Anu ki taraf girne laga!

Society ke compound mein tehal rahe Tauji ne jaise hi us lohe ke pahaad ko humari laadli par girte dekha, us chhappan saal ke boodhe pehalwaan ke bheetar ka akhaade wala khoon khoul utha. Tauji ne na apni umr dekhi, na apni jaan ki parwaah ki. Woh kisi bijli ki raftaar se chhalaang lagaakar us girte hue gate ke neeche kood pade!

Tauji ne Anu ko jhapatkar apne vishaal seene ke neeche poori tarah chhupa liya... aur us kai sau kilo wazani lohe ke gate ka poora jaanleva prahaar seedhe apne dono phaile hue haathon aur kalaiyon par jhel liya!

Anu neeche poori tarah mehfooz bach gayi, lekin us bhaari lohe ki chot ne Tauji ki dono kalaiyon aur agrabhujaon ki haddiyon ko buri tarah chaknachoor kar diya!

"Society ke log daude... security guards ne milkar us bhaari gate ko hataaya," Kavya ki aawaaz mein aansoo thamne ka naam nahi le rahe the. "Tauji dard se tadap rahe the, unke dono haath bejaan hokar latak rahe the Rajesh! Main paaglon ki tarah unko lekar shehar ke is bade multi-speciality hospital bhaagi. Doctoron ne turant unko emergency mein liya..."

"Doctor... doctor kya keh rahe hain Kavya?! Chot kitni gehri hai?!" Meri aawaaz kaanp rahi thi.

"Dono haathon ki haddiyan multiple fracture ho gayi hain Rajesh... kalaayi se lekar kohani tak ki haddiyan toot chuki hain," Kavya ne naak sudakte hue, bahut hi ruaansi aawaaz mein bataaya. "Orthopedic surgeon ne pichhle do ghante se unko operation theater mein rakhkar dono haathon par ungliyon se lekar kohani ke oopar tak bhaari, safed plaster chadha diya hai. Dono haathon mein pattiyan aur gale mein slings baandh di hain. Doctor ne saaf keh diya hai ki haddiyon ko dobaara judne mein poore sau din ka time lagega! Agle ek maheene tak woh apni ungliyan tak nahi hila paayenge... woh apne haathon se paani ka ek ghoont tak nahi pee sakte Rajesh!"

Meri aankhon se aansuon ki do boondein tapak kar mere gaalon par dhulak gayiin.

Mere seene mein Tauji ke liye ek aisa bepanaah, aseem aadar aur qarz ka samandar umad pada jise shabdon mein bayaan nahi kiya ja sakta tha.

Woh boodha dehati sher... jise maine apni wehshi hawas aur ghatiya voyeurism ka mohra banaane ki koshish ki thi... usne aaj meri kul ki ekmaatra santaan, meri maasoom beti ki zindagi bachaane ke liye apne dono faulaadi haath qurbaan kar diye the! Agar aaj Tauji wahan na hote, to meri laadli... meri Anu... us lohe ke neeche dabkar khatam ho chuki hoti!

Aur usi pal, mere seene mein ek bhayanak apraadhbodh aur pashchaataap ki aag bhadak uthi.

"Kavya... suno!" Maine phone ko dono haathon se bheenchte hue badhawaas aawaaz mein kaha. "Tum bilkul mat ghabraao. Main... main abhi isi time apni company ke VP ke pair padta hoon. Mujhe is naukri ki, is promotion ki koi parwaah nahi hai! Main abhi jaakar emergency leave maangta hoon aur chaahe jo ho jaaye, main aaj raat ki pehli train pakadkar subah tak seedhe hospital pahunch raha hoon! Tum Tauji ko sambhaalo, main aa raha hoon!"

"Nahi Rajesh!"

Kavya ki aawaaz achanak cheekhte hue goonji.

Uski aawaaz mein ab woh rone wali laachaari nahi thi. Ek aurat, ek patni aur ek grihalakshmi ki woh faulaadi, sanjeeda aur sakht aawaaz phone ke speaker se nikli, jisne mujhe wahin ka wahin patthar ki moorat bana diya:

"Tum aisi bewakoofi karne ki himmat bhi mat karna, Rajesh!"

"Kavya... tum samajh nahi rahi ho, Tauji laachaar hain..."

"Main sab samajh rahi hoon Rajesh, aur tum jo karne ja rahe ho, woh saraasar paagalpan hai!" Kavya ne ek bahut bhaari, sakht saans bharkar kaha. "Tum apni naukri ko daanv par lagaaoge? Tumhaare us flat ka bees saal ka home loan kaun bharega? Humare ghar ka ration, beti ki itni mehengi college fees aur is hospital ke laakhon ke medical bills... yeh sab tumhari salary se aate hain Rajesh! Agar is time tumhari naukri chali gayi, to hum road par aa jaayenge. Kya tum is mushkil time mein humko barbaad karna chahte ho?!"

"Lekin Kavya... ghar par Tauji ki dekhbhaal kaun karega? Unke dono haath bandhe hain!"

"Main karoongi!" Kavya ki aawaaz mein ek aisa gehra, atoot aur pavitra sankalp goonja jisne mujhe andar tak hila diya. "Tauji ne mere kaleje ke tukde ko, meri bachhi ko apni jaan dekar bachaaya hai Rajesh. Aaj agar meri beti zinda hai, to woh us bujurg ki badaulat hai. Ab unki sewa karna, unke is toote hue jism ko sambhaalna... yeh kisi aur ka nahi, yeh mera pehla aur sabse bada dharm hai!"

Kavya ne ek pal ka thehraav liya, uski saanson ki dhadkan saaf sunai de rahi thi:

"Anu poori tarah theek hai... woh mere saath hospital mein hi hai, bahut sahmi hui hai. Maine mummy Sumitra ko bol diya hai, woh baad mein Anu ko apne ghar le jaane ke liye humare flat par aa jaayengi. Aur maine... maine apne boutique se agle poore maheene ki chhutti le li hai. Main apna saara kaam apni assistant ko saump chuki hoon."

"Kavya... lekin tum akele..."

"Main koi bachhi nahi hoon Rajesh, main is ghar ki bahu hoon!" Kavya ki aawaaz mein ek ajeeb sa sanjeeda thehraav aa gaya tha. "Doctor ne kaha hai ki aadhe ghante mein plaster sookhne ke baad woh Tauji ko discharge kar denge. Main unko taxi se lekar seedhe apne flat ja rahi hoon. Tum apne us daftar ki zimmedaari poori karo. Jo bhi tumhari company ka kaam hai, use poori nishtha se khatam karo aur jab tumhara assignment poora ho, tabhi waapas lautna. Is ghar ki, Tauji ki aur meri fikr tum bilkul chhod do. Jab tak yeh bahu zinda hai, Tauji ko kisi baat ki takleef nahi hone degi."

Kavya ke un seedhe, sachhe aur faulaadi shabdon ne mere munh par taala laga diya tha.

Kavya ne mujhe Pune lautne se poori tarah, kadaayi se rok diya tha. Usne mujhe apne us teen hafte ke corporate nirvaasan mein rehne ka ek aisa naitik license, ek aisa saamaajik suraksha-kavach thama diya tha jise duniya ka koi bhi insaan jhuthla nahi sakta tha.

"Doctor mujhe bula rahe hain Rajesh, mujhe discharge papers par sign karna hai. Apna khayaal rakhna. Phone rakhti hoon."

Click.

Phone kat gaya.

Conference room ki sunsaan, thandi hawa mein sirf meri apni ukhdi hui saanson ki aawaaz goonj rahi thi.

Main wahin chaukhat ke sahaare khada reh gaya.

Shuruaat mein jo mere seene mein ek bhayanak ghabrahat aur hadbadaahat thi... woh dheere-dheere, bahut aahista se ek ajeeb si, shaant raahat mein badalne lagi.

Aur phir...

Us sannaate ke bheetar, mere thake hue dimaag mein ek baat bahut saaf hokar ubhri:

Tauji ke dono haath... kalaayi se lekar kohani ke oopar tak... bhaari, safed plaster mein jakde hue hain!

Woh apni ungliyan tak nahi hila sakte!

Doctor ne saaf keh diya hai ki haddiyon ko dobaara judne mein poore sau din ka time lagega... woh ek laachaar mareez ki tarah bistar par pade rehne wale hain!

Meri chhaati se ek bahut bhaari, thandi saans baahar nikli.

Iska matlab... iska seedha sa matlab yeh tha ki jis bhayanak, varjit aag se main pichhle kai dinon se khaufzada tha... woh aag ab hamesha ke liye bujh chuki thi!

Jis akhaade wali faulaadi mardaangi, jis baahubal aur jis shareerik taaqat se main dar raha tha... aaj ke is haadse ne us poori taaqat ko ek hi waar mein pangu bana diya tha. Jab mard ke dono haath hi toot chuke hon, jab woh hilne-dulne ke qaabil hi na bacha ho, to phir kisi antarangata, kisi shareerik sparsh ka sawaal hi kahan uthta tha?!

Ek laachaar, ghaayal bujurg jiske dono haath gale mein slings se bandhe hon, woh kisi aurat ko chhoone ka hausla kaise kar sakta tha?

Kavya bhale hi ghar par rahe, lekin ab unke beech jo kuch bhi hoga, woh sirf aur sirf dawa-goli, khichdi aur ek sanskaari bahu ki teemaardaari tak seemit rahega. Maryaada ki jis deewaar ko subah ki us chai ne mushkil se khada kiya tha, Tauji ke is plaster ne us deewaar ko faulaad ka bana diya tha! Ab us band flat 903 mein kisi anhoni, kisi paap ki koi gunjaaish hi nahi bachi thi.

"Chalo..." Maine ek gehri raahat ki saans kheenchte hue khud se fusfusaaya, "Kam se kam Pune ke morche par ab koi khatra nahi hai. Sab kuch safe hai."

Ab jo kuch jhelna tha, woh sirf mujhe jhelna tha.

Meri apni corporate museebat, VP ka woh sakht farmaan, aur agle ikkees dinon tak South ke alag-alag sheharon ke beech udne wali woh manhoos flights! Mujhe apni naukri aur bees saal ke home loan ko bachaane ke liye apne us khaufnaak aviophobia ki aag se guzarna tha, apni jaan ko mutthi mein lekar un hawaai safaron ko jhelna tha.

Lekin dil ke kisi kone mein yeh tasalli zaroor thi ki mere ghar ki aabroo par ab koi aanch nahi aane wali thi.

Dinner ki bhookh mere bheetar se poori tarah mar chuki thi.

Maine neeche farsh se apna briefcase uthaya. Apne bikhre hue baalon ko theek kiya, aur tezi se us corporate building ki seedhiyan utarkar baahar aa gaya.

Road par shaam ki battiyan jal chuki thiin. Maine pehli hi auto ko haath diya aur seedhe apne hotel ki taraf rawaana ho gaya.

Hotel ke kamre mein pahunchkar mujhe turant apna bag pack karna tha, Chennai ki us raat wali connecting flight ke liye nikalna tha, aur usse pehle bas ek nazar laptop kholkar tasalli kar leni thi ki Kavya aur Tauji hospital se ghar sahi-salaamat pahunch jaayein.

Pune ka khatra ab hamesha ke liye tal chuka tha... ya kam se kam, us bewakoof, naadaan pati ko yahi lag raha tha!
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RE: Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej - by wofeloh916 - 6 hours ago



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