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Adultery Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej
#48
=== Ajase Devnagari First Higlish Later ===

अध्याय 38: इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट और डिजिटल कन्फेशन

हैदराबाद के उस होटल के कमरे में रात के ठीक ग्यारह बज रहे थे। 

कमरे के भीतर की बत्तियां बुझी हुई थीं। केवल मेरे लैपटॉप की स्क्रीन से निकलती हुई ठंडी, नीली रोशनी मेरे चेहरे और बिस्तर पर बिखरे सिगरेट के राख-पात्र पर पड़ रही थी। एयर-कंडीशनर की लगातार, एकरस सनसनाहट कमरे के सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। 

अचानक, मेरे लैपटॉप के ब्राउज़र पर लगी गुप्त प्रॉक्सी स्क्रिप्ट से एक हल्की, तीखी बीप की आवाज़ गूंजी। 

स्क्रीन के निचले दाएं कोने पर एक हरी इन्फ़ॉर्मेशन चमकी:
[Alert: New Post Published on @pinklily_confessions]

मेरी सांसें एक पल के लिए हलक में ही अटक गईं। 

मेरे कांपते हाथ ने माउस को छुआ और मैंने तेजी से उस नोटिफिकेशन पर क्लिक कर दिया। 

पुणे के फ्लैट ९०३ के मास्टर बेडरूम में, काव्या अपने एंड्रॉइड टैबलेट की स्क्रीन बंद करके तकिए के सहारे आंखें मूंदे लेटी थी। लेकिन उसके द्वारा इंटरनेट के उस अनजान, गुमनाम फोरम पर पोस्ट किया गया वो डिजिटल कबूलनामा अब सीधे मेरी स्क्रीन पर, सफेद अक्षरों में पानी रहा था। 

पोस्ट का शीर्षक था:
"अधूरी रात का सच और सीने में सुलगता इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट"

मैंने अपनी कांपती उंगलियों से सिगरेट की डिब्बी से एक नई सिगरेट निकाली, लाइटर की लौ से उसे सुलगाया और एक बहुत गहरा, कड़वा कश खींचते हुए स्क्रीन के उन शब्दों को पढ़ना शुरू किया। 

काव्या ने लिखा था:


रात बहुत तेजी से ढल गयी... और चारों तरफ वही पुराना, गहरा सन्नाटा पसर गया है। कितना अच्छा होता अगर मेरी ज़िंदगी की हर रात इतनी ही शांत और बेदाग होती। लेकिन कल रात जो कुछ हुआ... हे भगवान, वो रात शायद मेरी रूह पर ताउम्र के लिए एक अमिट छाप छोड़ गयी है।

मैं पिछले कई महीनों से अपने भीतर की भूख और जिस्मानी प्यास को दबाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी। मैंने पूजा-पाठ में मन लगाया, बुटीक के काम में खुद को झोंक दिया, घर की जिम्मेदारियों में खुद को थका दिया... लेकिन ये बदन भी कितना अजीब है। जब जरूरत हद से ज्यादा बढ़ जाती है, तो इंसान का अपने ही वजूद पर कोई काबू नहीं रहता।

खासकर जब हर रोज़, सुबह से लेकर शाम तक, मुझे ताऊजी के उस विशाल, फौलादी और मर्दाना वजूद का सामना करना पड़ता है। मेरी उत्तेजना और बेचैनी हर बीतते दिन के साथ एक भयानक आग की तरह भड़कती जा रही थी। और फिर कल रात... कल रात ताऊजी ने मुझे जो सुख दिया, जो चरम आनंद मेरे रोम-रोम में भर दिया... मैं लाख चाहकर भी उसे अपने ज़हन से मिटा नहीं पा रही हूँ।

भले ही कल रात मर्यादा की वो आखिरी लकीर नहीं टूटी थी... भले ही उनका वो विशाल लंड मेरे भीतर नहीं समाया था... लेकिन जब वो चरम सुख का तूफ़ान मेरी जांघों पर टूटा था, तो मुझे ऐसा लगा था जैसे एक अरसे बाद मेरी बेजान रूह में किसी ने ज़िंदगी की सांसें फूंक दी हों। वो एक ऐसी मदहोश कर देने वाली याद बन चुका है, जिसे भूलना मेरे बस में नहीं है।


हैदराबाद के होटल में ये पढ़ते ही मेरे सीने में एक अजीब सा झटका लगा। 

काव्या... मेरी शर्मीली, संस्कारी काव्या, जो बेडरूम में बत्ती जलाने पर भी दुपट्टे से अपना बदन ढक लेती थी, वो आज एक अनजान फोरम पर अपने ससुर के साथ बिताए उस गैर-प्रवेशी संभोग के चरम सुख का गुणगान कर रही थी! 

मेरी जांघों के बीच का खून तेजी से खौलने लगा। उत्तेजना का एक भयानक करंट मेरी रीढ़ में दौड़ा, लेकिन उसी पल एक ज़हरीले खंजर ने मेरे दिल को चीर दिया। 

मैंने सिगरेट का धुंआ छोड़ते हुए आगे पढ़ना जारी रखा। 

काव्या ने आगे लिखा था:


राजेश को ऑफिस के काम से कुछ दिनों के लिए हैदराबाद जाना पड़ा। सच कहूं तो जब राजेश घर पर होते हैं, तो कम से कम उनका चेहरा देखकर, उनकी सेवा करके मैं अपने भीतर के शैतान को दबाए रखती हूँ। राजेश का मेरे बगल में होना ही मेरे लिए एक ढाल का काम करता है, जो मुझे होश में रखता है। लेकिन जब मुझे पता चला कि राजेश कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर जा रहे हैं और मुझे इस पूरे फ्लैट में ताऊजी के साथ अकेले रहना होगा... तो मेरा दिल एक तरफ अनजाने डर से कांप उठा था, और दूसरी तरफ... एक अजीब सी, पापी उम्मीद से धड़कने लगा था।

राजेश के जाने के बाद, मैंने उनको बेपनाह याद किया। मैंने दिन में कई बार उनको फोन किया... मुझे डर था कि कहीं वो ठंड में बिना स्वेटर के न निकल जाएं, कहीं बाहर का उल्टा-सीधा खाना खाकर उनकी तबीयत न बिगड़ जाए, कहीं वो टाइम पर अपनी दवाइयां लेना न भूल जाएं। एक पत्नी के तौर पर मेरा पूरा ध्यान, मेरी पूरी फिक्र राजेश पर ही टिकी थी। ऑफिस में भी काम करते टाइम मेरे दिमाग में सिर्फ राजेश का ही चेहरा घूमता रहता था।

लेकिन... जब शाम को मैं काम से थककर घर लौटती और दरवाज़ा खुलते ही मेरे सामने ताऊजी का वो चौड़ा, गठीला सीना और उनकी गहरी आंखें आ जातीं... तो पल भर के लिए राजेश की वो सारी यादें किसी धुंध की तरह उड़ जाती थीं। ससुर के साथ उस सन्नाटे भरे घर में अकेले रहना मेरी नसों की धड़कन को बेतहाशा तेज़ कर देता था।

कल रात जब मैंने ताऊजी के साथ रात का खाना खाया, तो उसके बाद मैं अपने मास्टर बेडरूम में सोने चली आई। जब मैं दरवाज़े की कुंडी लगाने के लिए हाथ बढ़ाने लगी... तो अचानक मेरे दिमाग में एक अजीब सा ख्याल कौंधा। राजेश घर पर नहीं हैं। इस बड़े से फ्लैट में सिर्फ हम दो बालिग इंसान हैं। मेरे भीतर की वो अधूरी प्यास, और उस रात ताऊजी की खाट पर की गयी वो मनचली गुस्ताखी... सब कुछ एक साथ मेरे सीने में उमड़ पड़ा।

मेरे हाथ दरवाज़े की कुंडी पर ही रुक गए।

मेरे पापी मन में ये भयानक सवाल उठा, 'क्या ताऊजी राजेश की गैर-मौजूदगी का फायदा उठाकर आज रात मेरे कमरे में आएंगे? क्या वो मुझे अपनी बाहों में भरने की हिम्मत करोगे?'

मेरा दिल एक साथ दो किनारों पर भटक रहा था, एक तरफ गहरी घबराहट और विरोध था, तो दूसरी तरफ एक भयानक, अनकही उम्मीद! उन दोनों के बीच ऐसा घमासान मचा कि मैं फैसला नहीं कर पाई। और आखिरकार... मैंने उस रात अपने बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं किया। मैंने कुंडी खुली छोड़ दी। मैंने सब कुछ किस्मत के भरोसे छोड़ दिया... हालांकि मुझे अच्छी तरह पता था कि ताऊजी जैसे सीधे, उसूलों वाले इंसान के मेरे कमरे में आने की उम्मीद न के बराबर थी।


स्क्रीन पर ये वाक्य पढ़ते ही हैदराबाद में मेरी सिगरेट मेरे हाथ से छूटते-छूटते बची! 

काव्या ने दरवाज़ा जानबूझकर खुला छोड़ा था! 

आज काव्या की अपनी कलम ने ये राज़ खोल दिया था: मेरी पत्नी ने उस रात अपने ससुर के स्वागत के लिए अपने बेडरूम का दरवाज़ा खुला रखा था! 

मेरी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी। मेरे माथे पर पसीने की बूंदें छलक आईं। मैंने बदहवास होकर स्क्रीन को और करीब खींचा। 

काव्या का कन्फेशन आगे बढ़ रहा था:


कमरे की बत्ती बुझाकर जब मैं बिस्तर पर लेटी, तो लाख कोशिशों के बाद भी मुझे नींद नहीं आई। मेरी आंखों के सामने बार-बार ताऊजी के गेस्ट रूम का वो मंज़र घूम रहा था, जब मैंने उनकी सोई हुई जिस्म के ऊपर बैठकर अपनी उंगलियों से खुद को छुआ था। उस याद ने मेरी जांघों के बीच ऐसी असहनीय खुजली और तपन पैदा कर दी कि मेरी सांसें फूलने लगीं।

मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही। मैं ख्यालों में ताऊजी को अपने कमरे में आते हुए देख रही थी। मेरी जिस्मानी हवस अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। मैंने अंधेरे में अपनी नाइटी ऊपर खिसकाई और अपनी ही उंगलियों से अपनी प्यास बुझाने लगी... लेकिन उस रात अपनी ही उंगलियों का वो स्पर्श मुझे बिलकुल अधूरा और बेमज़ा लग रहा था। मुझे उस सख्त, खुरदुरे और भारी स्पर्श की तलब थी, जो सिर्फ एक मर्द का जिस्म दे सकता था।

टाइम बीतता गया। और तभी... जब मैं अपनी ही उंगलियों के सहारे उस तड़प को शांत करने की कोशिश कर रही थी, मुझे बाहर गैलरी में भारी कदमों की हल्की सी आहट सुनाई दी!

ताऊजी अपने कमरे से बाहर निकल चुके थे। उनके कदमों की आवाज़ मेरे दरवाज़े की तरफ बढ़ रही थी।

मुझे लगा कि वो शायद पानी पीने या बाथरूम जा रहे होंगे... लेकिन मेरे दिल का एक कोना किसी चमत्कार की भीख मांग रहा था। और फिर... वो भारी कदम ठीक मेरे बेडरूम के दरवाज़े पर आकर रुक गये!

उस पल मेरा पूरा वजूद कांप उठा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं। मैं डर के मारे सिहर उठी। अपने आपको सेफ़ दिखाने के लिए, मैंने झटके से अपने हाथ अपनी नाइटी से बाहर निकाले, अपनी दोनों टांगों को पेट की तरफ मोड़कर एक तरफ करवट लेकर लेट गयी और गहरी नींद का नाटक करने लगी। मैंने अपनी आंखें ज़ोर से मींच लीं।

कुछ पलों के सन्नाटे के बाद... दरवाज़े के हैंडल के मुड़ने की वो धीमी सी 'क्लिक' आवाज़ आई!

दरवाज़ा खुला। मेरी सांसें जैसे हमेशा के लिए थम गईं। मेरी छाती के भीतर दिल किसी पंछी की तरह फड़फड़ाने लगा। मैंने आंखें कसकर बंद रखीं ताकि ताऊजी को ये न लगे कि मैं जाग रही हूँ। मेरा दिमाग बुरी तरह सुन्न हो चुका था, क्या मैं उठकर उनको डांट दूं? क्या मैं उनसे कहूं कि वो बाहर जाएं? या फिर चुपचाप सोने का नाटक करती रहूं? क्या ताऊजी ने शराब पी रखी है? क्या वो बहक गये हैं?

लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ सोच पाती... मैंने महसूस किया कि ताऊजी का वो बड़ा, झुर्रियों और गट्टों से भरा खुरदुरा हाथ मेरी नाइटी के निचले सिरे को बहुत आहिस्ता से ऊपर उठा रहा था!


[Image: krea-edit-custom-ratio-upsc-177-cleaned.png]


मेरी नंगी, गोरी जांघों पर ठंडी हवा का एक झोंका लगा, और फिर... उनका वो विशाल, गर्म और खुरदुरा हाथ सीधे मेरे कूल्हों पर आ टिका।


स्क्रीन पर ये पढ़ते ही मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं। 

काव्या जाग रही थी! वो पूरे टाइम जाग रही थी और केवल सोने का नाटक कर रही थी! 

और फिर, अगले पैराग्राफ ने तो मेरे पैरों तले से ज़मीन ही खिसका दी। काव्या ने लिखा था:


ताऊजी के उस खुरदुरे, पहलवान जैसे हाथ ने जब मेरे कूल्हों के मांस को अपनी भारी उंगलियों में भींचा, तो मेरे पूरे जिस्म में बिजली का एक ऐसा ज़ोरदार झटका लगा कि मैं हिल भी न सकी। भय, घबराहट और अनकही उलझन ने मेरे सोचने-समझने की ताकत छीन ली थी।

और फिर... अचानक...

मेरे नंगे, खुले हुए कूल्हों पर कोई बहुत ही गर्म, गीली और मांसल चीज़ आकर चिपक गयी!

पहले तो मुझे लगा कि शायद वो उनका अंग था... लेकिन अगले ही पल जब वो गीली चीज़ मेरे नितंबों के उभार पर रेंगने लगी, तो मुझे अहसास हुआ कि वो ताऊजी की जीभ थी!


[Image: krea-edit-custom-ratio-upsc-179-cleaned.png]


हे भगवान... ताऊजी अपनी जीभ से मेरे कूल्हों को नीचे से ऊपर तक चाट रहे थे!

उनकी खुरदुरी, गर्म जीभ मेरे गोरे कूल्हों के हर एक इंच को चूस रही थी, चाट रही थी, और बीच-बीच में उनके भारी होंठ मेरे मांस को अपनी पकड़ में लेकर चूम रहे थे। उस एक पल ने मेरे भीतर की बची-खुची सारी मर्यादा और सोचने की ताकत को राख के ढेर में बदल दिया। मेरे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। उठकर ताऊजी को धकेलने का वो सारा विचार कहीं हवा में उड़ गया। थोड़ी देर पहले जो प्यास मेरी उंगलियों से अधूरी रह गयी थी, उसे ताऊजी की उस गीली जीभ ने एक भयानक शोले में तब्दील कर दिया!

मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी ऐसा सुख महसूस नहीं किया था। सच कहूं तो... जब राजेश का जिस्म पूरी तरह तंदुरुस्त था, तब भी उन्होंने कभी मेरे कूल्हों को अपने मुंह से छूने या चाटने की जहमत नहीं उठाई थी। राजेश के लिए सेक्स हमेशा सिर्फ आगे से, कुछ मिनटों की जल्दबाज़ी का खेल हुआ करता था। लेकिन ताऊजी... एक पचपन साल का देहाती बुजुर्ग मेरी जिस्म के उस अनदेखे हिस्से को ऐसे चाट रहा था जैसे कोई भूखा शेर अपने शिकार का एक-एक कतरा चख रहा हो!

उस टाइम मैं दुनिया का हर कायदा भूल चुकी थी। मैं बस यही चाहती थी कि ताऊजी का वो गीला मुंह कभी मेरे जिस्म से अलग न हो।

फिर... ताऊजी की जीभ मेरे कूल्हों से हटी। वो नशा एक पल के लिए थमा, और इससे पहले कि मैं कोई सांस ले पाती, ताऊजी का मुंह आगे बढ़ा और उन्होंने मेरी पेंटी के पतले कॉटन कपड़े के ऊपर से ही मेरी योनि के उभरे हुए होठों को अपनी जीभ में भर लिया!

ये वो अहसास था जिसने मेरी रूह तक को कंपा दिया। राजेश ने आज तक कभी मेरे उस गुप्त हिस्से को अपने होंठों से नहीं छुआ था। लेकिन ताऊजी मेरी पेंटी के गीले कपड़े को चूस रहे थे, उनकी गर्म सांसें मेरी जांघों की जड़ों को झुलसा रही थीं। उस भयानक, अनूठे सुख के मारे मेरे मुंह से एक तीखी चीख निकलने ही वाली थी, लेकिन मैंने अपने दांतों से तकिए के कोने को कसकर भींच लिया ताकि ताऊजी को पता न चले कि मैं होश में हूँ।

मेरी योनि से काम-रस का एक दरिया बह निकला, लेकिन ताऊजी उसे अपनी जीभ से पेंटी के ऊपर से ही चाटकर साफ करते रहे।


"हरामज़ादी..." 

मेरे सूखे, कंपकंपी भरे होंठों से ये शब्द अनजाने में ही फिसल गया। 

मेरे हाथ की सिगरेट जलकर फिल्टर तक पहुंच चुकी थी, लेकिन मुझे उंगलियों में जलन का अहसास तक नहीं हुआ। मेरी छाती में ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा उड़ेल दिया हो! 

काव्या लिख रही थी कि मैंने उसे कभी वो सुख नहीं दिया... कि मैंने कभी उसके कूल्हों या उसकी योनि को अपने मुंह से नहीं छुआ... और ताऊजी ने पहली ही रात में मेरी पत्नी के उस सबसे नाज़ुक हिस्से को अपनी जीभ से चाटकर उसे मदहोश कर दिया था! 

एक पति के रूप में मेरी मर्दानगी की इससे भयानक, नंगी और शर्मनाक बेइज़्ज़ती और क्या हो सकती थी? 

लेकिन उसी ज़िल्लत के नीचे, एक बीमार, विकृत हवस मेरे पूरे बदन में ज़हर की तरह फैल रही थी। मेरा अपना लिंग पजामे के भीतर पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मैं अपनी पत्नी के इस बेबाक, गंदे और रसीले कबूलनामे को एक-एक लफ्ज़ पी जाना चाहता था! 

मैंने कांपते हाथों से पेज को नीचे स्क्रॉल किया। 

काव्या ने आगे लिखा था:


जब ताऊजी ने काफी देर तक मुझे चाटने के बाद अपना मुंह हटाया, तो वो तीव्र नशा धीरे-धीरे कम हुआ और मेरा सुन्न पड़ा दिमाग दोबारा जागने लगा। अब आगे क्या होगा? क्या ताऊजी मेरी पेंटी उतारकर अपना औजार मेरे भीतर ठोक देंगे? क्या मुझे उनको ऐसा करने देना चाहिए?

मैं अभी इसी कशमकश में थी कि तभी मुझे अपनी योनि के मुहाने पर, पेंटी के ऊपर से ही, एक बहुत ही मोटा, गर्म और भारी औजार आकर टिकता हुआ महसूस हुआ। वो इतना विशाल था कि उसकी सिर्फ नोक ही मेरी दोनों जांघों के बीच की जगह को पूरा भर रही थी। वो ताऊजी का फौलादी लंड था।

मुझे लगा कि शायद वो पेंटी के ऊपर से ही रगड़कर अपनी और मेरी हवस को शांत करेंगे। अगर सिर्फ बाहर-बाहर की रगड़ से हम दोनों को तसल्ली मिल जाती, तो मेरे दिल में कोई मलाल नहीं रहता... क्योंकि कम से कम उसे पूरा संभोग तो नहीं कहा जा सकता था। मैं अपने पति के अलावा किसी दूसरे मर्द को अपने भीतर उतारने के लिए कतई तैयार नहीं थी।

लेकिन तभी... एक अनहोनी घटी।

ताऊजी के भारी, खुरदुरे हाथ की उंगलियां मेरी पेंटी के किनारे में उलझीं। उनकी उंगलियों की पीठ ने मेरी योनि की गर्म, फूली हुई फांकों को छुआ और फिर... उन्होंने पूरी ताकत से मेरी पेंटी को ऊपर की तरफ खींचकर एक तरफ सरकाने की कोशिश की!

उनका वो लोहे जैसा सख्त औजार सीधे मेरी नंगी दरार के मुहाने पर दबाव बना रहा था। अगर पेंटी एक इंच भी और खिसक जाती, तो उनका वो विशाल लिंग बिना किसी रुकावट के सीधे मेरे भीतर धंस जाता!

खतरा सिर पर आ चुका था। मेरे पास सोचने का एक सेकंड भी नहीं बचा था। मर्यादा की वो आखिरी दीवार ढहने ही वाली थी। और तभी, अपने जिस्म के स्वाभाविक बचाव में, मैं झटके से बिस्तर पर उठकर बैठ गई। मैंने पूरी ताकत से ताऊजी के उस हाथ को झटक दिया जो मेरी पेंटी खींच रहा था, और मेरे मुंह से एक बेकाबू, तीखी चीख निकली:

'नहीं!'


हैदराबाद के कमरे में मैंने राहत की एक बहुत भारी सांस छोड़ी। 

तो ये था उस 'नहीं' का सच! 

कैमरे में मैंने सिर्फ काव्या को उठते और ताऊजी का हाथ झटकते देखा था। लेकिन उस 'नहीं' के पीछे का ये रोंगटे खड़े कर देने वाला संघर्ष मुझे आज पहली बार समझ में आया था। मेरी पत्नी ने सचमुच अपनी मर्यादा की आखिरी चौखट पर खड़े होकर अपने सतीत्व की रक्षा की थी! 

काव्या ने आगे लिखा था:


मेरी उस चीख ने ताऊजी के होश उड़ा दिए। वो बिस्तर के पास सहमकर खड़े हो गये, जैसे किसी बच्चे को चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया गया हो। कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे मौत आ गयी हो।

मैंने कांपती आवाज़ में उनसे पूछा, 'क्यों ताऊजी? आप मेरे कमरे में क्यों आए?'

और उसके बाद जो कुछ हुआ... उसने मेरी रूह को झकझोर कर रख दिया। ताऊजी फूट-फूटकर रोने लगे। उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। उन्होंने जो सच मुझे बताया, उसने मेरे पैरों तले की ज़मीन खींच ली। ताऊजी ने बताया कि उस रात जब मैंने उनकी खाट पर खुद को छुआ था, वो सोए नहीं थे... वो सब कुछ देख रहे थे! उनको ये भी पता चल चुका था कि राजेश की सर्जरी के बाद से हमारी शादीशुदा ज़िंदगी में क्या कमी चल रही है। उन्होंने रोते हुए कहा कि उनको डर था कि कहीं मैं अपनी जिस्मानी भूख से तंग आकर किसी बाहरी गैर-मर्द के चक्कर में न पड़ जाऊं, जिससे हमारे खानदान की इज़्ज़त और राजेश की ज़िंदगी हमेशा के लिए तबाह हो जाए।

ताऊजी बच्चों की तरह सिसक रहे थे। उन्होंने कहा कि वो कल सुबह की पहली बस से हमेशा के लिए गांव लौट जाओगे ताकि मुझे अपनी गंदी शक्ल दोबारा न दिखानी पड़े।

उस पचपन साल के बेबस बुजुर्ग को अपने सामने आंसुओं में डूबा देखकर, मेरा दिल तार-तार हो गया। जिस इंसान ने राजेश के बचपन में अपनी पूरी जवानी झोंक दी, जिसने अपनी ज़िंदगी में कभी शादी तक नहीं की और इस परिवार के लिए अपनी हर ख्वाहिश कुर्बान कर दी... आज वही इंसान मेरे सामने अपने घुटनों पर रो रहा था। मैं इतनी पत्थरदिल कैसे हो सकती थी?

जब वो मुड़कर जाने लगे, तो मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। मैंने उनसे कहा कि वो कहीं नहीं जाएंगे। अगर वो चले गये तो राजेश जीते जी मर जाएगा।

मैंने फैसला कर लिया कि इस लाचार, सीधे बुजुर्ग के लिए मुझे कुछ करना होगा। मैंने अपने हाथों से उनके उस विशाल अंग को सहलाना शुरू किया... लेकिन वो इतना भारी और फौलादी था कि मेरी नाज़ुक हथेलियां थकने लगीं। और मेरे अपने जिस्म के भीतर भी एक भयानक प्यास मचल रही थी।

तभी मुझे कुछ दिन पहले टैबलेट पर पढ़ी हुई वो कहानी याद आई... जांघों के बीच की वो रगड़, जिसमें बिना किसी प्रवेश के, बिना किसी पाप के, दोनों शरीरों को चरम सुख मिल सकता था!

मैंने अपनी दोनों गोरी जांघों को अपने ही काम-रस से चिकना किया और ताऊजी के उस विशाल, दहकते हुए अंग को अपनी दोनों रानों के बीच कसकर दबा लिया। ताऊजी तुरंत समझ गए। उन्होंने अपनी कमर को हिलाना शुरू किया। उनका वो भारी, विशाल लंड मेरी जांघों के रेशमी मांस और मेरी पेंटी के गीले मुहाने पर पूरी ताकत से रगड़ खाने लगा।

वो सुख इतना तीव्र था कि मैं अपनी सिसकियों को दबा नहीं पाई। जब ताऊजी ने अपना हाथ बढ़ाकर मेरे स्तनों को छूना चाहा, तो मैंने तुरंत उनकी कलाई पकड़कर रोक दिया। मैंने अपने मन में तय कर लिया था कि मेरे सीने का ये हिस्सा सिर्फ और सिर्फ मेरे पति राजेश का है... इस पर मैं किसी का हक नहीं बनने दूंगी। ताऊजी ने मेरी उस मर्यादा का सम्मान किया और अपना हाथ पीछे खींच लिया।

और फिर... ताऊजी के धक्कों की रफ्तार और ताकत इतनी बढ़ गयी कि हम दोनों एक साथ उस तूफ़ान में बह गए। मेरे पूरे बदन में चरम सुख का ऐसा ज़ोरदार धमाका हुआ कि मुझे लगा मैं हवा में उड़ रही हूँ। और उसी पल, ताऊजी के उस विशाल औजार से निकला गाढ़ा, खौलता हुआ वीर्य मेरी जांघों, मेरी पेंटी और उस हरी चादर पर किसी लावे की तरह बिखर गया!


स्क्रीन पर ये वाक्य पढ़ते हुए मेरी छाती की धड़कनें इतनी तेज़ हो चुकी थीं कि मुझे अपने कानों में खून के थपेड़े सुनाई दे रहे थे। 

काव्या ने एक-एक सांस, एक-एक झटके और उस वीर्य के एक-एक कतरे का ब्यौरा उस फोरम पर दर्ज कर दिया था! 

और फिर, उस पोस्ट का आखिरी हिस्सा आया... जिसने मेरे होश पूरी तरह उड़ा दिए। 

काव्या ने अपने कबूलनामे के अंत में लिखा था:


उस रात के बाद, मैंने सुबह उठकर अपने आंसुओं से उस चादर को धोया। शाम को जब मैं बुटीक से लौटी, तो ताऊजी के चेहरे पर वही पुराना अपराधबोध था। लेकिन मैंने पहल की। मैंने उनसे अपने लिए मूंग दाल की खिचड़ी बनाने को कहा। जब हम दोनों ने बैठकर खाना खाया, तो ताऊजी ने बहुत ही संजीदगी से हाथ जोड़कर मुझसे माफी मांगी। उन्होंने कहा कि जो कुछ हुआ वो बहक जाने का एक खौफनाक हादसा था... वो आगे से ऐसा कभी नहीं करेंगे और इस बात को एक बुरा सपना मानकर यहीं भूल जाना चाहते हैं ताकि इस घर की मर्यादा और राजेश का विश्वास बचा रहे।

मेरी एक रूह... जो एक संस्कारी, कुलवधू बहू की है... उसने तुरंत राहत की सांस ली। मैंने भी उनसे कह दिया कि ठीक है ताऊजी, जैसा आप कहें। हम इस परिवार की खातिर सब कुछ पहले जैसा कर लेंगे। एक अच्छी पत्नी होने के नाते मुझे इसी बात पर अड़े रहना चाहिए। मुझे अपने सिंदूर, अपनी आठ साल की शादी और इस खानदान की इज़्ज़त की खातिर मर्यादा का ये पर्दा बनाए रखना ही होगा। जो हुआ, वो महज़ एक कमज़ोरी थी, कोई प्यार या रिश्ता नहीं... सिर्फ एक जिस्मानी फिसलन थी।

लेकिन... हाय रे मेरा बदनसीब जिस्म!

रात को बर्तन धोते टाइम जब सिंक पर उनका हाथ मेरे हाथ से टकराया, तो मेरे रोएं-रोएं में वही बिजली दौड़ गयी। सोफे पर बैठते हुए जब मेरी नज़र उनके चौड़े, फौलादी सीने पर पड़ी, तो मेरी दूसरी रूह... वो प्यासी, बगावती औरत... जोर-जोर से चीखने लगी। वो मुझसे कह रही थी कि तू खुद से झूठ बोल रही है! क्या तू ताऊजी के उस विशाल, गर्म अंग की रगड़ को कभी भुला पाएगी? क्या उनकी उस खुरदुरी, मर्दानी जीभ के स्वाद के बाद तू दोबारा उस ठंडे, नाममात्र के रिश्ते में घुट-घुट कर जी सकती है?

मैं अंदर से दो टुकड़ों में बंट चुकी हूँ। मेरा दिमाग कहता है कि ताऊजी का पैर छूकर मर्यादा का दायरा कभी मत लांघो... लेकिन मेरी नसें उस अधूरी प्यास में जल रही हैं। ये कोई मोहब्बत नहीं है, मैं जानती हूँ... ये महज़ एक बेकाबू जिस्मानी भूख है। पर अब जब मैं इस अंधेरे में अकेली लेटी हूँ, तो ये सवाल मेरी जान ले रहा है:

क्या मुझे एक संस्कारी बहू की तरह मर्यादा की दीवार दोबारा खड़ी करके इस आग को यहीं दफन कर देना चाहिए? या फिर क्या मेरा ये भटकता हुआ मन उन्हें सिर्फ ससुर न मानकर अपना 'हमराज़' बनाने की भयानक भूल करने जा रहा है? आप लोग ही बताइए... क्या मुझे रुक जाना चाहिए, या इस आग में खुद को झोंक देना चाहिए?


पोस्ट यहीं पर खत्म हो गयी थी। 

स्क्रीन के सामने बैठा मैं... एक ज़िंदा लाश की तरह पत्थर बन चुका था। 

कमरे का एयर-कंडीशनर पूरी रफ्तार से चल रहा था, लेकिन मेरी पूरी पीठ और मेरी छाती पसीने से लथपथ थी। मेरे हाथ इतने ज़ोर से कांप रहे थे कि मैंने लैपटॉप की स्क्रीन को दोनों हाथों से पकड़ लिया। 

काव्या की वो आखिरी पंक्तियां मेरे दिमाग में हथौड़े की तरह बज रही थीं:
'क्या मुझे एक संस्कारी बहू की तरह मर्यादा की दीवार दोबारा खड़ी करके इस आग को यहीं दफन कर देना चाहिए? या फिर क्या मेरा ये भटकता हुआ मन उन्हें सिर्फ ससुर न मानकर अपना 'हमराज़' बनाने की भयानक भूल करने जा रहा है?'

लेकिन... मेरी रूह को छलनी करने वाला ये सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ था। 

पोस्ट पब्लिश हुए अभी मुश्किल से बीस मिनट भी नहीं बीते थे कि ब्राउज़र के निचले कोने में मौजूद 'कमेंट्स' का काउंटर अचानक किसी शेयर बाज़ार के टिकर की तरह तेजी से भागने लगा:
[New Comments: 14 ... 28 ... 43]

उस गुप्त, अनाम डिजिटल नेटवर्क पर, जहां सैकड़ों प्यासी, तन्हा और मर्यादा के बंधनों में घुटती औरतें और मर्द रात के अंधेरे में जागते थे, काव्या की इस रसीली, बेबाक दास्तान ने एक भयानक विस्फोट कर दिया था! 

लोग पागलों की तरह उस पोस्ट के नीचे अपनी प्रतिक्रियाएं लिख रहे थे। 

मेरे कांपते हाथ ने माउस का स्क्रॉल-व्हील नीचे घुमाया। जैसे-जैसे उन अनाम यूज़र्स के कमेंट्स मेरी आंखों के सामने से गुज़रने लगे, मेरे पैरों तले से बची-खुची ज़मीन भी खिसकती चली गयी! 

पहला कमेंट किसी @mumbai_desire_bahu का था:
Quote:"ओह माय गॉड! तुमने उस रात 'नहीं' बोलकर अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी कर दी! जब 55 साल का वो हट्टा-कट्टा पहलवान तुम्हारी नाइटी उठाकर तुम्हारे कूल्हों और पेंटी पर अपनी गर्म जीभ फिरा रहा था... तब मर्यादा कहाँ थी? एक बार जब मर्द की जीभ औरत के जिस्म के उस नाज़ुक हिस्से पर लग जाती है, तो समझो ताला हमेशा के लिए टूट चुका है! वो तो गाँव के शरीफ बुजुर्ग हैं इसलिए डरकर रुक गये... लेकिन अब गेंद तुम्हारे पाले में है सिस। कल रात जब वो तुम्हारे करीब आएँ तो अपनी पेंटी खुद अपने हाथों से सरका देना। उस साढ़े आठ इंच के औजार का पूरा मज़ा लो, अपनी जवानी को ऐसे कागज़ी पति के नाम पर मत सुखाओ!"

स्क्रीन पर ये पढ़ते ही मेरा चेहरा शर्म और अपमान की आग से तवे की तरह दहक उठा! 
'कागज़ी पति!' 
एक अनजान औरत इंटरनेट पर मेरी मर्दानगी को 'कागज़ी' कह रही थी और मेरी अपनी पत्नी को उकसा रही थी कि वो अपने ससुर के फौलादी अंग को अपने भीतर उतार ले! मेरी छाती पर जैसे किसी ने अंगारे रख दिए हों। 

दूसरा कमेंट किसी उम्रदराज़, पारंपरिक औरत का था, हैंडल था @rural_sanskari_sakhi:
Quote:"बहू, अपने दिल पर इतना बोझ मत डालो। हमारे पुराने देहाती परिवारों में ये कोई नई बात नहीं है। जब जवान पति किसी बीमारी या लाचारी से अधूरा रह जाता है, तो खानदान का बड़ा जेठ या ससुर ही उस सूनी बगिया को सींचता है ताकि खानदान की लाज बची रहे। ताऊजी तुम्हारे पति के अपने बड़े हैं, उन्हीं का खून हैं। उन्होंने पूरी ज़िंदगी बिना शादी किए, अखाड़े और परिवार के नाम पर अकेलेपन में काटी है... कभी किसी औरत का सुख नहीं देखा। अगर वो तुम्हारी प्यास बुझा रहे हैं और तुम उनकी तकलीफ हर रही हो, तो ये कोई पाप नहीं, बल्कि एक पुण्य का काम है। इसे ईश्वर की मर्जी समझकर एक्सेप्ट कर लो... अपने पति को कभी पता मत चलने देना और घर की सुख-शांति बनाए रखना।"

"पुण्य का काम?!"
मेरे हलक से एक दमघोंटू, कड़वी चीख निकली। 
इस बुज़ुर्ग औरत की नज़र में मेरी बीवी का मेरे ताऊजी की बाहों में जाना कोई व्यभिचार नहीं, बल्कि परिवार को बचाने वाला 'पुण्य' था! ये वही ज़हरीली, पारंपरिक दलील थी जिसे काव्या बचपन से सुनती आई थी... और यही दलील उसके दिल के आखिरी अपराधबोध को मोम की तरह पिघला देने के लिए काफी थी! काव्या अगर ये पढ़ेगी, तो उसका बचा-खुचा संकोच भी हमेशा के लिए मिट जाएगा! 

तभी तीसरा कमेंट सामने आया, जो किसी बेबाक और हवस से भरे पुरुष यूज़र का था, @wolf_in_shadows:
Quote:"वाह यार... क्या गजब की रसीली भाभी हो तुम! काश मेरे घर में भी तुम्हारे जैसी संस्कारी और प्यासी बहू होती! वो ताऊजी सचमुच किस्मत का धनी है जो 28 साल की गोरी, मखमली कली के नितंबों को चाटने का सुख पा गया। भाई, जब सिर्फ जांघों की रगड़ में ही तुम्हारी रूह कांप गयी और वीर्य की बाढ़ आ गयी, तो सोचो जब वो मोटा मूसल पहली बार तुम्हारी तंग सील को फाड़कर अंदर धंसेगा तब तुम्हारा क्या हाल होगा! अगली बार कमरे की लाइट जलाकर करना भाभी, ताकि ताऊजी तुम्हारी उस गोरी छाती को भी अपने मुंह में भर सकें!"

इस घिनौने, नंगे कमेंट ने मेरे पूरे वजूद को झकझोर कर रख दिया। 
कोई अनाम मर्द मेरी पत्नी की योनि, उसके कूल्हों और उसके स्तनों को 'तंग सील' और 'गोरी कली' कहकर हवस की गालियां बक रहा था, और मैं... एक नपुंसक की तरह हैदराबाद के होटल में बैठा अपनी ही बीवी की नग्नता पर दूसरों की लार टपकते देख रहा था! 

लेकिन सबसे ज़हरीला और तीखा वार चौथा कमेंट था, जिसे किसी @confused_metro_wife ने लिखा था:
Quote:"तुम जो अपनी पोस्ट में पूछ रही हो कि क्या तुम्हें मर्यादा बचाकर रुक जाना चाहिए या उन्हें अपना 'हमराज़' बनाने की भूल से बचना चाहिए... डियर, तुम खुद को बेवकूफ बनाना बंद करो! तुम जिस मर्यादा का नकाब ओढ़कर संस्कारी बहू बनने का दिखावा कर रही हो, वो दीवार तो उसी रात ढह चुकी थी जब तुमने उनकी जीभ और उनकी जांघों के बीच अपनी प्यास बुझाई थी। वो सिर्फ तुम्हारे ससुर नहीं हैं, उन्हें खुलकर अपना सच्चा 'हमराज़' बना लो! जब एक मर्द तुम्हारी उस भूख को शांत कर सकता है जिसे तुम्हारा कागज़ी पति आठ साल में छू भी नहीं पाया, तो फिर अपराधबोध कैसा? अगर तुमने ताऊजी को अपना हमराज़ नहीं बनाया और इस आग को दबाया, तो घुटकर मर जाओगी। मर्यादा का ढोंग छोड़ो और उन्हें पूरी तरह अपना बना लो!"

और पांचवां कमेंट था @silent_rebel_woman:
Quote:
"बहन, इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट छोड़ो और खुलकर जियो। ताऊजी ने जो आग लगाई है, वो अब सिर्फ उनके पूरे मिलन से ही बुझेगी। समाज की परवाह मत करो। गो फॉर इट!"

छठा कमेंट एक और शादीशुदा महिला @poonam_secret_diary का था:
Quote:"सच्चाई ये है कि हम औरतें हमेशा एक रक्षक, एक मजबूत साया ढूंढती हैं। जब पति बेडरूम में लाचार हो, तो दिल और जिस्म किसी फौलाद की तलाश करते हैं। तुम्हारे ताऊजी वही फौलाद हैं। डरो मत, जो सुख तुमको वहां मिल रहा है, वो तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे हसीन सच है।"


कमेंट्स की इस अंतहीन कतार ने मेरे सीने में बारूद का एक ऐसा धमाका किया कि मेरा पूरा जिस्म थर-थर कांपने लगा। 

ये कमेंट्स... ये अनाम आवाज़ें कोई मामूली प्रतिक्रियाएं नहीं थीं। ये काव्या के उस सुलगते हुए इन्टर्नल कॉन्फ्लिक्ट के लिए खाद और पानी का काम कर रही थीं!
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RE: Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej - by wofeloh916 - Today, 01:36 AM



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