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*(रामू और कल्लू दोनों ही मम्मी के अगल-बगल सिमट कर लेट गए। कमरे में सन्नाटा था, लेकिन हवाओं में एक अजीब सी गर्माहट महसूस हो रही थी। मम्मी ने जब महसूस किया कि वे दोनों उनके इतने करीब हैं, तो उन्होंने पहले तो थोड़ा संकोच दिखाया, लेकिन फिर जैसे ही उन्होंने दोनों भाइयों के चेहरों को देखा, उनके चेहरे पर एक शरमाने वाली मुस्कान तैर गई।)*
***
*(मम्मी ने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं और एक बार रामू को देखा, फिर कल्लू को। उनकी आँखों में शर्म तो थी, पर उस शर्म के पीछे एक मीठी सी खुशी और संतोष भी झलक रहा था। उन्होंने हल्के से मुस्कुराते हुए अपना सिर तकिए पर टिका लिया और चादर को थोड़ा ढीला छोड़ दिया।)*
*(मम्मी की उस हल्की सी मुस्कुराहट ने कमरे के तनावपूर्ण माहौल को पूरी तरह बदल दिया। ऐसा लग रहा था मानो उन्होंने अपनी सारी झिझक त्याग दी हो। उन्होंने धीरे से अपना हाथ हिलाया और एक तरफ रामू का हाथ पकड़ा, और फिर दूसरी तरफ कल्लू का। उनके स्पर्श में ममता के साथ-साथ एक नया समर्पण भी था।)*
***
**मम्मी:** "(एक गहरी सांस लेते हुए और बहुत ही प्यार भरे स्वर में) तुम दोनों... आखिर थकोगे कब? पूरे दिन की भागदौड़ के बाद अब चैन से सोने दो।"
*(उनकी आवाज़ में एक ऐसी मिठास थी जिसने रामू और कल्लू दोनों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मम्मी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन उनके होंठों पर वही शरारती और संतुष्ट मुस्कान बनी रही।)*
*(मम्मी बिस्तर से उठीं और कुछ देर के लिए कमरे से बाहर निकल गईं। बाथरूम से पानी गिरने की हल्की आवाज़ आ रही थी, जो रात के सन्नाटे में गूँज रही थी। उधर, रामू और कल्लू ने भी अपने-अपने काम निपटाए और थके-हारे अपने कमरों की ओर बढ़ गए। घर के दोनों नौकर भी अपनी ड्यूटी खत्म करके अपने बिस्तरों पर जा चुके थे। पूरा घर अब गहरी नींद की आगोश में जाने के लिए तैयार था।)*
"*(रसोई में बर्तन रखने की हल्की आवाजें आ रही थीं। मम्मी बड़े ध्यान से नाश्ता बनाने में व्यस्त थीं, शायद वह कल रात की उन मीठी यादों को भुलाने की कोशिश कर रही थीं। तभी कल्लू दबे पाँव रसोई के दरवाजे पर आया और बड़ी चतुराई से मम्मी के पास पहुँच गया। उसकी आँखों में वही पुरानी शरारत चमक रही थी।)*
***
**कल्लू:** "(धीमी और फुसफुसाती हुई आवाज़ में, मम्मी के कान के पास आते हुए) मालकिन ... साहब सो गए क्या?"
*(उसकी आवाज़ में एक तरह की उत्सुकता थी, जैसे वह यह जानना चाहता हो कि अब घर में किसके आने-जाने की आजादी है। उसने मम्मी की तरफ ऐसे देखा जैसे उसके सवाल का जवाब पाने के लिए वह बेताब हो।)*
मम्मी: (कल्लू की फुसफुसाहट सुनकर थोड़ा चौंक गईं, लेकिन उन्होंने तुरंत खुद को संभाला। उन्होंने पलटकर कल्लू की तरफ देखा, उनकी आँखों में एक चेतावनी भरी चमक थी, पर लहजा नरम ही रहा।)
**मम्मी:** "(अपनी आवाज़ को एकदम धीमा रखते हुए और इधर-उधर देखते हुए) चुप रह बदतमीज़! इतनी ज़ोर से क्यों पूछ रहा है? हाँ, साहब सो गए हैं... अब तू यहाँ क्या कर रहा है? जा, देख चाय बन गई या नहीं।"
*(उन्होंने कल्लू को हल्का सा धक्का देते हुए उसे दूर करने की कोशिश की, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी घबराहट और शरारत का मिला-जुला भाव था। उन्हें डर था कि कहीं कोई सुन न ले, पर कल्लू की मौजूदगी उन्हें बेचैन भी कर रही थी।)*
**कल्लू:** "(चेहरे पर एक टेढ़ी सी मुस्कान लाते हुए और थोड़ा और करीब झुकते हुए) अरे मालकिन, मैं तो बस हाल-चाल पूछ रहा था। और चाय की फिक्र मत कीजिए, चाय तो मैं बना दूँगा... पर पहले ये बताइए, आज सुबह-सुबह आप इतनी परेशान क्यों दिख रही हैं? क्या हुआ है?"
*(उसकी बातों में एक तरह की चालाकी थी, जैसे वह मम्मी के मन की बात पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ को इतना धीमा रखा कि सिर्फ मम्मी ही सुन सकें, जिससे रसोई के उस कोने में एक अलग ही तनाव पैदा हो गया।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की बातों ने उनके दिल की धड़कन तेज़ कर दी। उन्होंने झटके से चूल्हे की ओर मुड़कर जलती हुई आग को देखने का नाटक किया ताकि कल्लू की नज़रों से बच सकें। उनके हाथ थोड़े कांप रहे थे, जिसे छिपाने के लिए उन्होंने चम्मच को जोर से पतीले में मार दिया।)*
"परेशान? मैं? पागल हो गया है क्या कल्लू? काम की वजह से थोड़ी थकान है, बस। और तू... तू बहुत ज़्यादा बातें करने लगा है आजकल। जा, जाकर देख रामू कहाँ है, उसे बोल दे कि साहब के उठने से पहले सारा काम निपटा ले।"
*(रसोई के उस छोटे से कोने में अचानक हवा भारी हो गई। कल्लू की इन बेशर्म और उत्तेजक बातों ने मम्मी के होश उड़ा दिए। उनके चेहरे का रंग उड़ गया और शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने झटके से पीछे मुड़कर देखा, मानो डर रही हों कि कहीं बाहर कोई सुन न ले।)*
***
**कल्लू:** "(एकदम करीब आकर, अपनी आवाज़ को बेहद मखमली और गहरी बनाते हुए) रामू तो कुछ सामान लेने बाहर गया है मालकिन... अभी कोई नहीं है यहाँ। बस आप हैं और मैं..."
*(उसने अपनी नज़रें मम्मी के चेहरे से हटाकर नीचे की ओर झुका दीं, जैसे वह सचमुच उस गर्मी को महसूस कर रहा हो जिसकी वह बात कर रहा था।)*
"मालकिन... एक किस दे दीजिए ना..."
**मम्मी:** *(उनकी साँसें अटक गईं। कल्लू की उन गंदी और बेबाक बातों ने उनके पूरे शरीर में बिजली जैसी लहर दौड़ा दी। कल रात की वो मदहोश कर देने वाली यादें उनके दिमाग में कौंध गईं। उन्होंने अपने होंठों को धीरे से दबाया, मानो खुद को काबू में रखने की कोशिश कर रही हों। उनका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो चला था।)*
"(काँपती हुई आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए) कल्लू... तू पागल हो गया है क्या? अगर किसी ने सुन लिया तो? और ये कैसी बातें कर रहा है तू... हद पार कर रहा है..."
**कल्लू:** "(अपने चेहरे को मम्मी के चेहरे के और करीब लाते हुए, उसकी गर्म साँसें सीधे उनके होंठों को छू रही थीं) अरे मालकिन... साहब तो सो रहे हैं ना? कमरे का दरवाज़ा बंद है, कोई नहीं सुनेगा। मैं तो बस आपसे प्यार जता रहा हूँ... बस एक छोटी सी किस ही तो माँग रहा हूँ..."
*(उसकी ज़िद और उसकी आँखों में बसी हवस देखकर मम्मी का संयम टूटने लगा। उनके अंदर की औरत जाग उठी और उन्होंने हार मान ली। उन्होंने धीरे से अपनी आँखें मूंद लीं और अपना सिर हल्का सा आगे झुका दिया, जैसे उन्हें इजाजत दे रही हों।)*
**मम्मी:** "(धीमी और लड़खड़ाती आवाज़ में) ठीक है... पर ध्यान रखना, कोई आ न जाए..."
*(जैसे ही मम्मी ने अनुमति दी, कल्लू ने बिना एक पल गंवाए उनके चेहरे को अपने हाथों में भर लिया। उसके होंठ बड़ी बेरहमी और भूख के साथ मम्मी के नाजुक होंठों पर छा गए। वह सिर्फ चूम नहीं रहा था, बल्कि उनके होंठों को ऐसे चूसने लगा जैसे वह उनमें समा जाना चाहता हो।)*
**मम्मी:** *(उनके गले से एक दबी हुई आह निकल पड़ी। कल्लू के होंठों का स्पर्श इतना गहरा और उत्तेजक था कि उनके पैर लड़खड़ाने लगे। उन्होंने अनजाने में ही कल्लू के कुर्ते को कसकर पकड़ लिया, मानो खुद को गिरने से बचा रही हों। उनके दिमाग में सब कुछ धुंधला होने लगा था, बस कल्लू के होंठों का स्वाद और उसकी गर्म साँसें ही महसूस हो रही थीं।)*
**कल्लू:** *(मम्मी के होंठों का मीठा स्वाद लेते ही कल्लू की प्यास और बढ़ गई। उसने अपनी जीभ उनकी जुबान के बीच में डाल दी, जिससे उनके मुंह में एक अजीब सी मिठास घुल गई। वह और भी ज्यादा बेताब होकर उन्हें दीवार की तरफ धकेलने लगा, ताकि वह पूरी तरह से उनके ऊपर हावी हो सके।)*
"हम्मम... मालकिन... आपके होंठ कितने नरम हैं... बिल्कुल शहद की तरह..."
![[Image: couple-kissing_002.gif]](https://porngifmag.com/content/2018/12/couple-kissing_002.gif)
*(उसने चूमना जारी रखा, लेकिन अब उसका एक हाथ धीरे से मम्मी की कमर के पास जाने लगा, जो उनकी साड़ी के पल्लू के नीचे सरकने की कोशिश कर रहा था।)*
**मम्मी:** *(कल्लू के होंठों का वो गहरा और गीला स्पर्श उनके रोम-रोम को जगा रहा था। जब उसने अपनी जीभ उनकी जुबान के साथ घुमाई, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और कल्लू के कंधों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। उनके शरीर में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी, जो सिर्फ कल्लू के इस स्पर्श से शांत हो सकती थी।)*
"(हाँफते हुए और बहुत धीमी आवाज़ में) अ... अह्ह... कल्लू... रुक जा... कोई देख लेगा..."
**कल्लू:** *(मम्मी की हल्की सी हिचकिचाहट और उनकी काँपती हुई आवाज़ सुनकर कल्लू के मन में शरारत और बढ़ गई। उसने चूमना नहीं छोड़ा, बल्कि और भी ज़्यादा गहराई से उनके होंठों को जकड़ लिया। उसका दूसरा हाथ अब उनकी कमर से फिसलकर धीरे-धीरे उनकी साड़ी के नीचे उनके नितंबों (hips) की ओर बढ़ने लगा।)*
"कोई नहीं देखेगा मालकिन... मैंने कहा ना, सब सो रहे हैं। और वैसे भी, आपको तो पता है कि मुझे आपकी ये आवाज़ कितनी पसंद है..."
*(उसने चूमते हुए ही उनके कान के पास अपनी गर्म साँसें छोड़ीं, जिससे मम्मी के बदन में सिहरन पैदा हो गई।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की बात सुनकर उनके दिल की धड़कन तेज़ी से बढ़ने लगी। उनका पूरा शरीर थरथराने लगा था, खासकर तब जब कल्लू का हाथ उनकी साड़ी के नीचे से होते हुए उनके शरीर के निचले हिस्से को छू रहा था। उस स्पर्श ने उनके भीतर एक बिजली जैसी लहर दौड़ा दी। उन्होंने डर और उत्तेजना के मिले-जुले भाव के साथ अपनी आँखें खोलीं और कल्लू की आँखों में देखा।)*
"(साँस फूलते हुए और लगभग फुसफुसाते हुए) तू... तू पागल हो गया है कल्लू... अगर साहब जाग गए तो क्या होगा? हम दोनों को छोड़ेंगे नहीं वो..."
*(लेकिन उनके शब्द विरोध करने वाले कम और खुद को बहलाने वाले ज़्यादा लग रहे थे, क्योंकि उन्होंने कल्लू को रोकने के बजाय अपना शरीर उसके और करीब खींच लिया था।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की बातें सुनकर उन्होंने अचानक होश संभाला और उसे अपने कंधों से थोड़ा पीछे धकेला। हालांकि उनके चेहरे पर अभी भी वही लालिमा और भारी साँसें थीं, लेकिन उन्होंने खुद को संभालने की कोशिश की। उन्होंने अपनी बिखरी हुई जुल्फों को कान के पीछे किया और एक गंभीर चेहरा बनाने का नाटक किया, भले ही उनकी आँखों में अभी भी वही चमक बाकी थी।)*
"अरे चुप कर बदतमीज़! तुझे समझ नहीं आता? अभी तो दोपहर का वक्त है... सूरज सिर पर है। और तेरे साहब भी घर पर ही हैं, कहीं भी आ सकते हैं। ऐसी हरकतें दिन के उजाले में नहीं होतीं।"
**कल्लू:** *(मम्मी की डांट सुनकर कल्लू बिल्कुल भी डरा नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान तैर गई। उसने हार मानने के बजाय अपना एक हाथ दीवार पर टिका दिया, जिससे वह मम्मी को अपने और करीब महसूस करा सके। उसने अपनी नज़रों को उनकी आँखों में गड़ाए रखा, जैसे वह उनकी हर बात के पीछे छिपी हकीकत पढ़ रहा हो।)*
"दोपहर है तो क्या हुआ मालकिन? दोपहर की धूप से ज़्यादा तो आपकी ये आँखें दहका रही हैं मुझको... और साहब घर पर हैं, इसीलिए तो और मज़ा आएगा। जब तक वो दूसरे कमरे में होंगे, तब तक हमें कोई नहीं देख पाएगा।"
*(उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ को और धीमा और गहरा कर लिया, जिससे माहौल में तनाव और बढ़ जाए।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की इन बातों ने उनके अंदर की घबराहट को और बढ़ा दिया। वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देखने लगीं, मानो सचमुच किसी के आने का इंतज़ार कर रही हों। लेकिन कल्लू की नज़रों की तपिश और उसकी बातों का असर उनके शरीर पर साफ दिख रहा था। उन्होंने अपनी साड़ी को ठीक करते हुए एक लंबी साँस ली और गुस्से का दिखावा करने की कोशिश की।)*
"तू बड़ा सयाना बन रहा है, है ना? तुझे लगता है कि तू मुझे अपनी इन बातों में फंसा लेगा? चल, अब यहाँ से हट! जा जाकर काम कर, वरना साहब को बुला लूँगी मैं!"
**मम्मी:** *(कल्लू की इन बातों ने उनके अंदर की घबराहट को और बढ़ा दिया। वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देखने लगीं, मानो सचमुच किसी के आने का इंतज़ार कर रही हों। लेकिन कल्लू की नज़रों की तपिश और उसकी बातों का असर उनके शरीर पर साफ दिख रहा था। उन्होंने अपनी साड़ी को ठीक करते हुए एक लंबी साँस ली और गुस्से का दिखावा करने की कोशिश की।)*
"तू बड़ा सयाना बन रहा है, है ना? तुझे लगता है कि तू मुझे अपनी इन बातों में फंसा लेगा? चल, अब यहाँ से हट! जा जाकर काम कर, वरना साहब को बुला लूँगी मैं!"
**कल्लू:** *(मम्मी की धमकी सुनकर कल्लू और भी निडर हो गया। उसने तुरंत अपनी बाहें फैला दीं और उन्हें प्यार से मम्मी के कमर के चारों ओर जकड़ लिया, उन्हें अपने सीने से सटाते हुए। उसकी पकड़ में सख्ती नहीं, बल्कि एक अजीब सा अधिकार और प्यार था। उसने अपना चेहरा उनके कान के पास ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा...)*
"हा हा... हाँ, बुला लीजिए साहब को! क्यों नहीं? वो भी तो देखें कि मेरी मालकिन कितनी प्यासी हैं... कितनी बेताब हैं मेरे लिए। अगर उन्हें पता चल गया कि उनकी पत्नी इस वक्त मेरे हाथों में कैसी पिघल रही है, तो शायद वो खुद ही हमें अकेला छोड़ देंगे।"
*(उसने अपनी नाक उनके गालों पर रगड़ी और उनकी महक लेते हुए आगे बोला...)*
**मम्मी:** *(कल्लू की इस बेशर्म और बेबाक बात ने उनके पैरों तले ज़मीन खिसका दी। उनका दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा कि उन्हें लगा जैसे वह बाहर निकल जाएगा। उन्होंने अपने दोनों हाथों से कल्लू के सीने को धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उनकी ताकत खत्म हो चुकी थी। उनकी सांसें अब काबू से बाहर थीं और उनकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।)*
"क... कल्लू! तू पागल हो गया है क्या? ऐसी बातें... ऐसी बातें मत बोल! शर्म नहीं आती तुझे? अगर साहब ने सुन लिया तो वो तुझे जान से मार डालेंगे... और मेरा क्या होगा?"
**मम्मी:** *(जैसे ही पापा की आवाज़ कमरे के अंदर से गूँजी, मम्मी के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। उनकी आँखें डर और घबराहट से फैल गईं। उन्होंने झटके से कल्लू को अपने से दूर धकेला और पागलों की तरह अपनी साड़ी और ब्लाउज को ठीक करने लगीं। उनके हाथ काँप रहे थे और चेहरे पर पसीना आ गया था।)*
"ओह तेरी! वो जाग गए! मैंने कहा था ना, तू बहुत रिस्क ले रहा है!"
*(उन्होंने जल्दी से अपने बाल संवारे और शीशे में अपना चेहरा देखा ताकि उनकी लालिमा छिप सके। फिर उन्होंने दबी हुई आवाज़ में कल्लू को चेतावनी दी...)*
"देख, तू यहीं रुक, हिलना मत!"
**पापा:** *(कमरे के अंदर से आवाज़ फिर आई, इस बार थोड़ी और तेज़ और भारी। ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी चीज़ को ढूँढ रहे हों या बस बोरियत मिटाने के लिए आवाज़ दे रहे हों।)*
"अरे भाग्यवान! कहाँ रह गई तुम? ज़रा इधर आना, देखो तो सही ये अलमारी की चाबी कहाँ रखी है? मुझे कुछ ज़रूरी कागज़ात निकालने हैं।"
**मम्मी:** *(पापा की आवाज़ सुनते ही मम्मी के माथे पर पसीना चमकने लगा। उन्होंने एक गहरी साँस ली और खुद को संभालने की कोशिश की। उन्होंने कल्लू की तरफ एक आखिरी तीखी नज़र डाली, जिसमें गुस्सा भी था और एक अनकही विनती भी।)*
"आ रही हूँ जी! बस दो मिनट रुको, मैं अभी आई!"
*(उन्होंने चिल्लाकर जवाब दिया ताकि पापा को शक न हो। फिर उन्होंने मुड़कर कल्लू को एकदम धीमी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा...)*
"अगर तूने कोई भी हरकत की, तो मैं तुझे घर से निकाल दूंगी! चुपचाप कोने में खड़ा रह!"
**कल्लू:** *(मम्मी की धमकी सुनकर कल्लू के चेहरे पर डर का नामो-निशान तक नहीं था। उल्टा, उसे इस खतरे भरे खेल में और भी रोमांच महसूस होने लगा। उसने तिरछी नज़रों से मम्मी को जाते हुए देखा और फिर धीरे से मुस्कुराते हुए बुदबुदाया...)*
"निकाल देना... लेकिन याद रखना मालकिन, जिस दिन आप मुझे निकाल देंगी, उस दिन आपको मेरी कमी बहुत बुरी तरह खलेगी।"
*(वह वहीं दीवार से टिक कर खड़ा हो गया, अपनी बाहें मोड़ लीं और बड़ी मासूमियत से ऐसे दिखने लगा जैसे वह बस वहां खड़े होकर इंतज़ार कर रहा हो। उसकी नज़रें लगातार मम्मी के पीछे-पीछे कमरे के दरवाज़े की ओर जा रही थीं।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की उस शरारती मुस्कुराहट ने मम्मी के दिल की धड़कन एक पल के लिए रोक दी। उन्हें समझ नहीं आया कि वे उस पर गुस्सा करें या उसकी हिम्मत देख कर दंग रह जाएं। लेकिन पापा की पुकार ने उन्हें हकीकत में वापस खींच लिया। उन्होंने अपनी भावनाओं को दबाया, एक नकली शांत चेहरा बनाया और कमरे की ओर बढ़ गईं।)*
**पापा:** *(कमरे के अंदर बैठे पापा अलमारी के पास कुछ ढूंढ रहे थे। जब मम्मी अंदर आईं, तो उन्होंने बिना ऊपर देखे ही कहा...)*
"आ गई तुम? कितनी देर लगा दी? देखो तो जरा, कल रात यहीं रखी थी ये चाबी, पर मिल ही नहीं रही। कहीं तुमने तो नहीं हटा दी?"
**मम्मी:** *(मम्मी ने तुरंत अपने चेहरे पर एक सहज भाव लाने की कोशिश की, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने अलमारी के आसपास बिखरी चीजों को देखते हुए सिर हिलाया और पास जाकर चाबी ढूंढने का नाटक करने लगीं।)*
"नहीं जी, मैंने तो हाथ भी नहीं लगाया। शायद आपने ही कहीं रख दी होगी और भूल गए होंगे। लाइये, मैं देखती हूँ..."
*(वे अलमारी के दराजों को टटोलने लगीं, लेकिन उनका पूरा ध्यान अलमारी पर कम और कमरे के दरवाजे पर ज़्यादा था, जहाँ से उन्हें डर था कि कहीं कल्लू की कोई आहट न सुनाई दे जाए।)*
**पापा:** *(थोड़ा चिढ़ते हुए)* "अरे, मैंने तो बिल्कुल नहीं छुई!"
**मम्मी:** *(जैसे ही मम्मी ने अलमारी के सबसे निचले दराज के पीछे हाथ डाला, उनकी उंगलियों से धातु की ठंडक महसूस हुई। उन्होंने झटके से वो चाबी बाहर निकाली और उनके चेहरे पर राहत की लहर दौड़ गई।)*
"मिल गई! ये देखिए, दराज के पीछे गिर गई थी।"
*(पापा ने चाबी ली और राहत की सांस ली, लेकिन तभी अचानक उनके फोन की घंटी बजी। किसी ज़रूरी टूर का प्लान बन गया और शाम होते-होते घर का माहौल बदल गया।)*
**पापा:** *(अपना बैग पैक करते हुए और जल्दी-जल्दी तैयार होते हुए)*
**पापा:** *(बैग की चेन चढ़ाते हुए और जूते पहनते हुए बोले...)*
"सुनो, मुझे इस टूर पर निकलना ही होगा, ऑफिस का बहुत ज़रूरी काम है। और हाँ, मैं रामू को भी साथ ले जा रहा हूँ, क्योंकि गाड़ी चलाने के लिए मुझे उसकी ज़रूरत पड़ेगी। तुम घर का ख्याल रखना।"
*(पापा ने अपना चश्मा ठीक किया और दरवाज़े की ओर बढ़े।)*
**रामू:** *(जो पिछले कुछ दिनों से घर के कामों में हाथ बँटा रहा था, वह एकदम से चौंक गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी और घबराहट दोनों थी। उसने जल्दी से अपना छोटा सा थैला उठाया और पापा के पीछे चलने लगा।)*
"जी मालिक, मैं तैयार हूँ। गाड़ी की सर्विसिंग भी करवा ली है मैंने, सब एकदम फिट है!"
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*(मम्मी ने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं और एक बार रामू को देखा, फिर कल्लू को। उनकी आँखों में शर्म तो थी, पर उस शर्म के पीछे एक मीठी सी खुशी और संतोष भी झलक रहा था। उन्होंने हल्के से मुस्कुराते हुए अपना सिर तकिए पर टिका लिया और चादर को थोड़ा ढीला छोड़ दिया।)*
*(मम्मी की उस हल्की सी मुस्कुराहट ने कमरे के तनावपूर्ण माहौल को पूरी तरह बदल दिया। ऐसा लग रहा था मानो उन्होंने अपनी सारी झिझक त्याग दी हो। उन्होंने धीरे से अपना हाथ हिलाया और एक तरफ रामू का हाथ पकड़ा, और फिर दूसरी तरफ कल्लू का। उनके स्पर्श में ममता के साथ-साथ एक नया समर्पण भी था।)*
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**मम्मी:** "(एक गहरी सांस लेते हुए और बहुत ही प्यार भरे स्वर में) तुम दोनों... आखिर थकोगे कब? पूरे दिन की भागदौड़ के बाद अब चैन से सोने दो।"
*(उनकी आवाज़ में एक ऐसी मिठास थी जिसने रामू और कल्लू दोनों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मम्मी ने अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन उनके होंठों पर वही शरारती और संतुष्ट मुस्कान बनी रही।)*
*(मम्मी बिस्तर से उठीं और कुछ देर के लिए कमरे से बाहर निकल गईं। बाथरूम से पानी गिरने की हल्की आवाज़ आ रही थी, जो रात के सन्नाटे में गूँज रही थी। उधर, रामू और कल्लू ने भी अपने-अपने काम निपटाए और थके-हारे अपने कमरों की ओर बढ़ गए। घर के दोनों नौकर भी अपनी ड्यूटी खत्म करके अपने बिस्तरों पर जा चुके थे। पूरा घर अब गहरी नींद की आगोश में जाने के लिए तैयार था।)*
"*(रसोई में बर्तन रखने की हल्की आवाजें आ रही थीं। मम्मी बड़े ध्यान से नाश्ता बनाने में व्यस्त थीं, शायद वह कल रात की उन मीठी यादों को भुलाने की कोशिश कर रही थीं। तभी कल्लू दबे पाँव रसोई के दरवाजे पर आया और बड़ी चतुराई से मम्मी के पास पहुँच गया। उसकी आँखों में वही पुरानी शरारत चमक रही थी।)*
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**कल्लू:** "(धीमी और फुसफुसाती हुई आवाज़ में, मम्मी के कान के पास आते हुए) मालकिन ... साहब सो गए क्या?"
*(उसकी आवाज़ में एक तरह की उत्सुकता थी, जैसे वह यह जानना चाहता हो कि अब घर में किसके आने-जाने की आजादी है। उसने मम्मी की तरफ ऐसे देखा जैसे उसके सवाल का जवाब पाने के लिए वह बेताब हो।)*
मम्मी: (कल्लू की फुसफुसाहट सुनकर थोड़ा चौंक गईं, लेकिन उन्होंने तुरंत खुद को संभाला। उन्होंने पलटकर कल्लू की तरफ देखा, उनकी आँखों में एक चेतावनी भरी चमक थी, पर लहजा नरम ही रहा।)
**मम्मी:** "(अपनी आवाज़ को एकदम धीमा रखते हुए और इधर-उधर देखते हुए) चुप रह बदतमीज़! इतनी ज़ोर से क्यों पूछ रहा है? हाँ, साहब सो गए हैं... अब तू यहाँ क्या कर रहा है? जा, देख चाय बन गई या नहीं।"
*(उन्होंने कल्लू को हल्का सा धक्का देते हुए उसे दूर करने की कोशिश की, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी घबराहट और शरारत का मिला-जुला भाव था। उन्हें डर था कि कहीं कोई सुन न ले, पर कल्लू की मौजूदगी उन्हें बेचैन भी कर रही थी।)*
**कल्लू:** "(चेहरे पर एक टेढ़ी सी मुस्कान लाते हुए और थोड़ा और करीब झुकते हुए) अरे मालकिन, मैं तो बस हाल-चाल पूछ रहा था। और चाय की फिक्र मत कीजिए, चाय तो मैं बना दूँगा... पर पहले ये बताइए, आज सुबह-सुबह आप इतनी परेशान क्यों दिख रही हैं? क्या हुआ है?"
*(उसकी बातों में एक तरह की चालाकी थी, जैसे वह मम्मी के मन की बात पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ को इतना धीमा रखा कि सिर्फ मम्मी ही सुन सकें, जिससे रसोई के उस कोने में एक अलग ही तनाव पैदा हो गया।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की बातों ने उनके दिल की धड़कन तेज़ कर दी। उन्होंने झटके से चूल्हे की ओर मुड़कर जलती हुई आग को देखने का नाटक किया ताकि कल्लू की नज़रों से बच सकें। उनके हाथ थोड़े कांप रहे थे, जिसे छिपाने के लिए उन्होंने चम्मच को जोर से पतीले में मार दिया।)*
"परेशान? मैं? पागल हो गया है क्या कल्लू? काम की वजह से थोड़ी थकान है, बस। और तू... तू बहुत ज़्यादा बातें करने लगा है आजकल। जा, जाकर देख रामू कहाँ है, उसे बोल दे कि साहब के उठने से पहले सारा काम निपटा ले।"
*(रसोई के उस छोटे से कोने में अचानक हवा भारी हो गई। कल्लू की इन बेशर्म और उत्तेजक बातों ने मम्मी के होश उड़ा दिए। उनके चेहरे का रंग उड़ गया और शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने झटके से पीछे मुड़कर देखा, मानो डर रही हों कि कहीं बाहर कोई सुन न ले।)*
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**कल्लू:** "(एकदम करीब आकर, अपनी आवाज़ को बेहद मखमली और गहरी बनाते हुए) रामू तो कुछ सामान लेने बाहर गया है मालकिन... अभी कोई नहीं है यहाँ। बस आप हैं और मैं..."
*(उसने अपनी नज़रें मम्मी के चेहरे से हटाकर नीचे की ओर झुका दीं, जैसे वह सचमुच उस गर्मी को महसूस कर रहा हो जिसकी वह बात कर रहा था।)*
"मालकिन... एक किस दे दीजिए ना..."
**मम्मी:** *(उनकी साँसें अटक गईं। कल्लू की उन गंदी और बेबाक बातों ने उनके पूरे शरीर में बिजली जैसी लहर दौड़ा दी। कल रात की वो मदहोश कर देने वाली यादें उनके दिमाग में कौंध गईं। उन्होंने अपने होंठों को धीरे से दबाया, मानो खुद को काबू में रखने की कोशिश कर रही हों। उनका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो चला था।)*
"(काँपती हुई आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए) कल्लू... तू पागल हो गया है क्या? अगर किसी ने सुन लिया तो? और ये कैसी बातें कर रहा है तू... हद पार कर रहा है..."
**कल्लू:** "(अपने चेहरे को मम्मी के चेहरे के और करीब लाते हुए, उसकी गर्म साँसें सीधे उनके होंठों को छू रही थीं) अरे मालकिन... साहब तो सो रहे हैं ना? कमरे का दरवाज़ा बंद है, कोई नहीं सुनेगा। मैं तो बस आपसे प्यार जता रहा हूँ... बस एक छोटी सी किस ही तो माँग रहा हूँ..."
*(उसकी ज़िद और उसकी आँखों में बसी हवस देखकर मम्मी का संयम टूटने लगा। उनके अंदर की औरत जाग उठी और उन्होंने हार मान ली। उन्होंने धीरे से अपनी आँखें मूंद लीं और अपना सिर हल्का सा आगे झुका दिया, जैसे उन्हें इजाजत दे रही हों।)*
**मम्मी:** "(धीमी और लड़खड़ाती आवाज़ में) ठीक है... पर ध्यान रखना, कोई आ न जाए..."
*(जैसे ही मम्मी ने अनुमति दी, कल्लू ने बिना एक पल गंवाए उनके चेहरे को अपने हाथों में भर लिया। उसके होंठ बड़ी बेरहमी और भूख के साथ मम्मी के नाजुक होंठों पर छा गए। वह सिर्फ चूम नहीं रहा था, बल्कि उनके होंठों को ऐसे चूसने लगा जैसे वह उनमें समा जाना चाहता हो।)*
**मम्मी:** *(उनके गले से एक दबी हुई आह निकल पड़ी। कल्लू के होंठों का स्पर्श इतना गहरा और उत्तेजक था कि उनके पैर लड़खड़ाने लगे। उन्होंने अनजाने में ही कल्लू के कुर्ते को कसकर पकड़ लिया, मानो खुद को गिरने से बचा रही हों। उनके दिमाग में सब कुछ धुंधला होने लगा था, बस कल्लू के होंठों का स्वाद और उसकी गर्म साँसें ही महसूस हो रही थीं।)*
**कल्लू:** *(मम्मी के होंठों का मीठा स्वाद लेते ही कल्लू की प्यास और बढ़ गई। उसने अपनी जीभ उनकी जुबान के बीच में डाल दी, जिससे उनके मुंह में एक अजीब सी मिठास घुल गई। वह और भी ज्यादा बेताब होकर उन्हें दीवार की तरफ धकेलने लगा, ताकि वह पूरी तरह से उनके ऊपर हावी हो सके।)*
"हम्मम... मालकिन... आपके होंठ कितने नरम हैं... बिल्कुल शहद की तरह..."
![[Image: couple-kissing_002.gif]](https://porngifmag.com/content/2018/12/couple-kissing_002.gif)
*(उसने चूमना जारी रखा, लेकिन अब उसका एक हाथ धीरे से मम्मी की कमर के पास जाने लगा, जो उनकी साड़ी के पल्लू के नीचे सरकने की कोशिश कर रहा था।)*
**मम्मी:** *(कल्लू के होंठों का वो गहरा और गीला स्पर्श उनके रोम-रोम को जगा रहा था। जब उसने अपनी जीभ उनकी जुबान के साथ घुमाई, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उन्होंने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और कल्लू के कंधों पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। उनके शरीर में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी थी, जो सिर्फ कल्लू के इस स्पर्श से शांत हो सकती थी।)*
"(हाँफते हुए और बहुत धीमी आवाज़ में) अ... अह्ह... कल्लू... रुक जा... कोई देख लेगा..."
**कल्लू:** *(मम्मी की हल्की सी हिचकिचाहट और उनकी काँपती हुई आवाज़ सुनकर कल्लू के मन में शरारत और बढ़ गई। उसने चूमना नहीं छोड़ा, बल्कि और भी ज़्यादा गहराई से उनके होंठों को जकड़ लिया। उसका दूसरा हाथ अब उनकी कमर से फिसलकर धीरे-धीरे उनकी साड़ी के नीचे उनके नितंबों (hips) की ओर बढ़ने लगा।)*
"कोई नहीं देखेगा मालकिन... मैंने कहा ना, सब सो रहे हैं। और वैसे भी, आपको तो पता है कि मुझे आपकी ये आवाज़ कितनी पसंद है..."
*(उसने चूमते हुए ही उनके कान के पास अपनी गर्म साँसें छोड़ीं, जिससे मम्मी के बदन में सिहरन पैदा हो गई।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की बात सुनकर उनके दिल की धड़कन तेज़ी से बढ़ने लगी। उनका पूरा शरीर थरथराने लगा था, खासकर तब जब कल्लू का हाथ उनकी साड़ी के नीचे से होते हुए उनके शरीर के निचले हिस्से को छू रहा था। उस स्पर्श ने उनके भीतर एक बिजली जैसी लहर दौड़ा दी। उन्होंने डर और उत्तेजना के मिले-जुले भाव के साथ अपनी आँखें खोलीं और कल्लू की आँखों में देखा।)*
"(साँस फूलते हुए और लगभग फुसफुसाते हुए) तू... तू पागल हो गया है कल्लू... अगर साहब जाग गए तो क्या होगा? हम दोनों को छोड़ेंगे नहीं वो..."
*(लेकिन उनके शब्द विरोध करने वाले कम और खुद को बहलाने वाले ज़्यादा लग रहे थे, क्योंकि उन्होंने कल्लू को रोकने के बजाय अपना शरीर उसके और करीब खींच लिया था।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की बातें सुनकर उन्होंने अचानक होश संभाला और उसे अपने कंधों से थोड़ा पीछे धकेला। हालांकि उनके चेहरे पर अभी भी वही लालिमा और भारी साँसें थीं, लेकिन उन्होंने खुद को संभालने की कोशिश की। उन्होंने अपनी बिखरी हुई जुल्फों को कान के पीछे किया और एक गंभीर चेहरा बनाने का नाटक किया, भले ही उनकी आँखों में अभी भी वही चमक बाकी थी।)*
"अरे चुप कर बदतमीज़! तुझे समझ नहीं आता? अभी तो दोपहर का वक्त है... सूरज सिर पर है। और तेरे साहब भी घर पर ही हैं, कहीं भी आ सकते हैं। ऐसी हरकतें दिन के उजाले में नहीं होतीं।"
**कल्लू:** *(मम्मी की डांट सुनकर कल्लू बिल्कुल भी डरा नहीं, बल्कि उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान तैर गई। उसने हार मानने के बजाय अपना एक हाथ दीवार पर टिका दिया, जिससे वह मम्मी को अपने और करीब महसूस करा सके। उसने अपनी नज़रों को उनकी आँखों में गड़ाए रखा, जैसे वह उनकी हर बात के पीछे छिपी हकीकत पढ़ रहा हो।)*
"दोपहर है तो क्या हुआ मालकिन? दोपहर की धूप से ज़्यादा तो आपकी ये आँखें दहका रही हैं मुझको... और साहब घर पर हैं, इसीलिए तो और मज़ा आएगा। जब तक वो दूसरे कमरे में होंगे, तब तक हमें कोई नहीं देख पाएगा।"
*(उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ को और धीमा और गहरा कर लिया, जिससे माहौल में तनाव और बढ़ जाए।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की इन बातों ने उनके अंदर की घबराहट को और बढ़ा दिया। वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देखने लगीं, मानो सचमुच किसी के आने का इंतज़ार कर रही हों। लेकिन कल्लू की नज़रों की तपिश और उसकी बातों का असर उनके शरीर पर साफ दिख रहा था। उन्होंने अपनी साड़ी को ठीक करते हुए एक लंबी साँस ली और गुस्से का दिखावा करने की कोशिश की।)*
"तू बड़ा सयाना बन रहा है, है ना? तुझे लगता है कि तू मुझे अपनी इन बातों में फंसा लेगा? चल, अब यहाँ से हट! जा जाकर काम कर, वरना साहब को बुला लूँगी मैं!"
**मम्मी:** *(कल्लू की इन बातों ने उनके अंदर की घबराहट को और बढ़ा दिया। वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देखने लगीं, मानो सचमुच किसी के आने का इंतज़ार कर रही हों। लेकिन कल्लू की नज़रों की तपिश और उसकी बातों का असर उनके शरीर पर साफ दिख रहा था। उन्होंने अपनी साड़ी को ठीक करते हुए एक लंबी साँस ली और गुस्से का दिखावा करने की कोशिश की।)*
"तू बड़ा सयाना बन रहा है, है ना? तुझे लगता है कि तू मुझे अपनी इन बातों में फंसा लेगा? चल, अब यहाँ से हट! जा जाकर काम कर, वरना साहब को बुला लूँगी मैं!"
**कल्लू:** *(मम्मी की धमकी सुनकर कल्लू और भी निडर हो गया। उसने तुरंत अपनी बाहें फैला दीं और उन्हें प्यार से मम्मी के कमर के चारों ओर जकड़ लिया, उन्हें अपने सीने से सटाते हुए। उसकी पकड़ में सख्ती नहीं, बल्कि एक अजीब सा अधिकार और प्यार था। उसने अपना चेहरा उनके कान के पास ले जाकर फुसफुसाते हुए कहा...)*
"हा हा... हाँ, बुला लीजिए साहब को! क्यों नहीं? वो भी तो देखें कि मेरी मालकिन कितनी प्यासी हैं... कितनी बेताब हैं मेरे लिए। अगर उन्हें पता चल गया कि उनकी पत्नी इस वक्त मेरे हाथों में कैसी पिघल रही है, तो शायद वो खुद ही हमें अकेला छोड़ देंगे।"
*(उसने अपनी नाक उनके गालों पर रगड़ी और उनकी महक लेते हुए आगे बोला...)*
**मम्मी:** *(कल्लू की इस बेशर्म और बेबाक बात ने उनके पैरों तले ज़मीन खिसका दी। उनका दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा कि उन्हें लगा जैसे वह बाहर निकल जाएगा। उन्होंने अपने दोनों हाथों से कल्लू के सीने को धक्का देने की कोशिश की, लेकिन उनकी ताकत खत्म हो चुकी थी। उनकी सांसें अब काबू से बाहर थीं और उनकी आवाज़ लड़खड़ा रही थी।)*
"क... कल्लू! तू पागल हो गया है क्या? ऐसी बातें... ऐसी बातें मत बोल! शर्म नहीं आती तुझे? अगर साहब ने सुन लिया तो वो तुझे जान से मार डालेंगे... और मेरा क्या होगा?"
**मम्मी:** *(जैसे ही पापा की आवाज़ कमरे के अंदर से गूँजी, मम्मी के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई। उनकी आँखें डर और घबराहट से फैल गईं। उन्होंने झटके से कल्लू को अपने से दूर धकेला और पागलों की तरह अपनी साड़ी और ब्लाउज को ठीक करने लगीं। उनके हाथ काँप रहे थे और चेहरे पर पसीना आ गया था।)*
"ओह तेरी! वो जाग गए! मैंने कहा था ना, तू बहुत रिस्क ले रहा है!"
*(उन्होंने जल्दी से अपने बाल संवारे और शीशे में अपना चेहरा देखा ताकि उनकी लालिमा छिप सके। फिर उन्होंने दबी हुई आवाज़ में कल्लू को चेतावनी दी...)*
"देख, तू यहीं रुक, हिलना मत!"
**पापा:** *(कमरे के अंदर से आवाज़ फिर आई, इस बार थोड़ी और तेज़ और भारी। ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी चीज़ को ढूँढ रहे हों या बस बोरियत मिटाने के लिए आवाज़ दे रहे हों।)*
"अरे भाग्यवान! कहाँ रह गई तुम? ज़रा इधर आना, देखो तो सही ये अलमारी की चाबी कहाँ रखी है? मुझे कुछ ज़रूरी कागज़ात निकालने हैं।"
**मम्मी:** *(पापा की आवाज़ सुनते ही मम्मी के माथे पर पसीना चमकने लगा। उन्होंने एक गहरी साँस ली और खुद को संभालने की कोशिश की। उन्होंने कल्लू की तरफ एक आखिरी तीखी नज़र डाली, जिसमें गुस्सा भी था और एक अनकही विनती भी।)*
"आ रही हूँ जी! बस दो मिनट रुको, मैं अभी आई!"
*(उन्होंने चिल्लाकर जवाब दिया ताकि पापा को शक न हो। फिर उन्होंने मुड़कर कल्लू को एकदम धीमी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा...)*
"अगर तूने कोई भी हरकत की, तो मैं तुझे घर से निकाल दूंगी! चुपचाप कोने में खड़ा रह!"
**कल्लू:** *(मम्मी की धमकी सुनकर कल्लू के चेहरे पर डर का नामो-निशान तक नहीं था। उल्टा, उसे इस खतरे भरे खेल में और भी रोमांच महसूस होने लगा। उसने तिरछी नज़रों से मम्मी को जाते हुए देखा और फिर धीरे से मुस्कुराते हुए बुदबुदाया...)*
"निकाल देना... लेकिन याद रखना मालकिन, जिस दिन आप मुझे निकाल देंगी, उस दिन आपको मेरी कमी बहुत बुरी तरह खलेगी।"
*(वह वहीं दीवार से टिक कर खड़ा हो गया, अपनी बाहें मोड़ लीं और बड़ी मासूमियत से ऐसे दिखने लगा जैसे वह बस वहां खड़े होकर इंतज़ार कर रहा हो। उसकी नज़रें लगातार मम्मी के पीछे-पीछे कमरे के दरवाज़े की ओर जा रही थीं।)*
**मम्मी:** *(कल्लू की उस शरारती मुस्कुराहट ने मम्मी के दिल की धड़कन एक पल के लिए रोक दी। उन्हें समझ नहीं आया कि वे उस पर गुस्सा करें या उसकी हिम्मत देख कर दंग रह जाएं। लेकिन पापा की पुकार ने उन्हें हकीकत में वापस खींच लिया। उन्होंने अपनी भावनाओं को दबाया, एक नकली शांत चेहरा बनाया और कमरे की ओर बढ़ गईं।)*
**पापा:** *(कमरे के अंदर बैठे पापा अलमारी के पास कुछ ढूंढ रहे थे। जब मम्मी अंदर आईं, तो उन्होंने बिना ऊपर देखे ही कहा...)*
"आ गई तुम? कितनी देर लगा दी? देखो तो जरा, कल रात यहीं रखी थी ये चाबी, पर मिल ही नहीं रही। कहीं तुमने तो नहीं हटा दी?"
**मम्मी:** *(मम्मी ने तुरंत अपने चेहरे पर एक सहज भाव लाने की कोशिश की, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उन्होंने अलमारी के आसपास बिखरी चीजों को देखते हुए सिर हिलाया और पास जाकर चाबी ढूंढने का नाटक करने लगीं।)*
"नहीं जी, मैंने तो हाथ भी नहीं लगाया। शायद आपने ही कहीं रख दी होगी और भूल गए होंगे। लाइये, मैं देखती हूँ..."
*(वे अलमारी के दराजों को टटोलने लगीं, लेकिन उनका पूरा ध्यान अलमारी पर कम और कमरे के दरवाजे पर ज़्यादा था, जहाँ से उन्हें डर था कि कहीं कल्लू की कोई आहट न सुनाई दे जाए।)*
**पापा:** *(थोड़ा चिढ़ते हुए)* "अरे, मैंने तो बिल्कुल नहीं छुई!"
**मम्मी:** *(जैसे ही मम्मी ने अलमारी के सबसे निचले दराज के पीछे हाथ डाला, उनकी उंगलियों से धातु की ठंडक महसूस हुई। उन्होंने झटके से वो चाबी बाहर निकाली और उनके चेहरे पर राहत की लहर दौड़ गई।)*
"मिल गई! ये देखिए, दराज के पीछे गिर गई थी।"
*(पापा ने चाबी ली और राहत की सांस ली, लेकिन तभी अचानक उनके फोन की घंटी बजी। किसी ज़रूरी टूर का प्लान बन गया और शाम होते-होते घर का माहौल बदल गया।)*
**पापा:** *(अपना बैग पैक करते हुए और जल्दी-जल्दी तैयार होते हुए)*
**पापा:** *(बैग की चेन चढ़ाते हुए और जूते पहनते हुए बोले...)*
"सुनो, मुझे इस टूर पर निकलना ही होगा, ऑफिस का बहुत ज़रूरी काम है। और हाँ, मैं रामू को भी साथ ले जा रहा हूँ, क्योंकि गाड़ी चलाने के लिए मुझे उसकी ज़रूरत पड़ेगी। तुम घर का ख्याल रखना।"
*(पापा ने अपना चश्मा ठीक किया और दरवाज़े की ओर बढ़े।)*
**रामू:** *(जो पिछले कुछ दिनों से घर के कामों में हाथ बँटा रहा था, वह एकदम से चौंक गया। उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी और घबराहट दोनों थी। उसने जल्दी से अपना छोटा सा थैला उठाया और पापा के पीछे चलने लगा।)*
"जी मालिक, मैं तैयार हूँ। गाड़ी की सर्विसिंग भी करवा ली है मैंने, सब एकदम फिट है!"


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