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Adultery MUMMY SE PREM KON KARTA HAI COMENT KARIYE...
#10
दोपहर का समय था। गर्मियों की धूप घर के बाहर के आँगन में तप रही थी, लेकिन बेडरूम के अंदर का माहौल उस धूप से भी ज़्यादा सूना था। ममता खिड़की के पास बैठी थीं, उनकी नज़रें बाहर कहीं खोई हुई थीं, पर वे कुछ देख नहीं रही थीं। उनकी आँखें नम थीं, गालों पर आँसुओं के सूखे निशान अभी भी दिख रहे थे। उन्होंने आज पहनने के लिए हल्का नीला सूट पहना था, जो उनके उजले रंग पर बेहद खूबसूरत लग रहा था, लेकिन उनके चेहरे का दर्द उस पहनावे की खूबसूरती पर भारी पड़ रहा था। बयालीस साल की उम्र में भी ममता उस उम्र की महिलाओं से कहीं ज़्यादा आकर्षक लगती थीं। उनके काले, लंबे और घने बाल उनके कंधों पर लहरा रहे थे। उनकी बड़ी-बड़ी गहरी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो शायद माँ बनने के बाद भी कम नहीं हुई थी। उनके होंठ मुलायम और गुलाबी थे, थोड़े फटे हुए—जैसे उन्होंने उन्हें बहुत देर तक दबाए रखा हो। उनकी गर्दन लंबी और सुरीली थी, जिस पर सुहागन का लाल चूड़ा और थोड़ी-सी हल्दी की रस्मों का निशान था, लेकिन सुहाग की सजावट उनके जीवन में मायने नहीं रखती थी।

उनके सामने पलंग पर सुरेश का कुर्ता पड़ा हुआ था, जिसे उन्होंने आज सुबह ही धोकर इस्त्री किया था। लेकिन सुरेश ने उसे पहनने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। वे ऑफिस जाते समय एक चप्पल उठाकर निकल लिए थे, जैसे ममता की मौजूदगी एक फर्नीचर के टुकड़े जितनी ही महत्वहीन हो। ममता ने कितनी बार उनसे बात करने की कोशिश की थी—रसोई में, खाने की मेज पर, बेडरूम में। उन्होंने कितने यत्न से रात में अपने बालों में तेल लगाया था, अपनी साड़ी का पल्लू अच्छी तरह से समेटा था, और उम्मीद से सुरेश का इंतज़ार किया था। लेकिन सुरेश तो बस अपने मोबाइल स्क्रीन में खोए रहते थे, और सोने से पहले सिर्फ एक ही काम करते थे—उसे पीठ करके सो जाना, मानो उनके बीच एक अदृश्य दीवार हो।

ममता की उंगलियाँ अपनी साड़ी के पल्लू के किनारे को बेहोशी से सहला रही थीं। वह सोच रही थीं—क्या मैं अब उतनी आकर्षक नहीं रही? क्या मेरी उम्र ने मुझे बेकार कर दिया? उनकी आँखों से फिर से आँसू बह निकले। उन्होंने झट से आँखें पोंछ लीं, जैसे कोई उन्हें देख लेगा तो वे शर्मिंदा होंगी।

ठीक उसी समय, दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। ममता चौंक गईं और अपनी आँखों के कोर को एक बार हाथ से साफ़ करते हुए बोलीं, "…आओ।"

दरवाज़ा खुला और नील अंदर आया। इक्कीस साल का जवान बेटा। कॉलेज से लौटा था, उसके कंधे पर बैग लटका हुआ था। उसने आज आकस्मिक रूप से एक सफेद टी-शर्ट और जींस पहनी थी, उसकी बाँहों की मांसपेशियाँ साफ़ दिख रही थीं। उसके चेहरे पर एक चिंतित भाव था—वह ममता की उदासी को अच्छी तरह पहचानता था, क्योंकि वह कई महीनों से इस घर में इसी उदासी को चुपचाप देख रहा था। उसने अपने पिता के व्यवहार को छुपते-छुपते जाना था। रात के खाने पर सुरेश बस फोन में लगे रहते, ममता की ओर नज़र तक नहीं डालते। वही, जो कभी ममता को फूल लाकर देते थे, उन्हें घुमाने ले जाते थे, उनके बालों की खुशबू से बातें करते थे। अब वह सब कहीं खो गया था।

नील कुछ पल द्वार पर रुका, ममता की आँखों की नमी को देखता रहा। फिर उसने धीरे से बैग नीचे रखा और कमरे में अंदर आ गया। उसने दरवाज़ा पूरा नहीं बंद किया, बस आधा सा बंद कर दिया—इस भाव के साथ कि अगर ज़रूरत पड़े तो बातें खुलकर हों, पर घर के दूसरे लोग सुन न सकें।

"माँ…" नील ने हल्के स्वर में कहा, उसकी आवाज़ में कोमलता थी। "आप रोई थीं।"

ममता ने अपनी आँखें झुका लीं और ज़बरदस्ती हँसने की कोशिश की। "कौन रोया, नील? मैं तो बस… बाहर की धूप देख रही थी। थोड़ी आँखों में तेज़ी हुई।"

नील ममता के पास आया और उनके सामने बिछे पलंग के किनारे बैठ गया। उसके चेहरे पर स्नेह और गहरी समझ थी। "माँ, मैं आपका बेटा हूँ। मैं जानता हूँ कि जब आप रोती हैं तो आपकी आँखों का रंग बदल जाता है। पापा…" वह कहते-कहते रुका, फिर सीधे से बोला, "पापा आपको समय नहीं दे पा रहे हैं। मैं यह सब देख रहा हूँ, माँ। महीनों से।"

ममता का चेहरा एक पल के लिए काँपा। उनकी आँखों में फिर से नमी आ गई, पर उन्होंने उसे रोक लिया। "नील, तुम छोटे हो। इन बातों का तुमसे कोई वास्ता नहीं।"

"मैं छोटा नहीं हूँ। मैं इक्कीस साल का हूँ।" नील ने आगे झुककर ममता का हाथ कोमलता से पकड़ लिया। "माँ, मैं जानता हूँ कि पापा ने अब आपकी तरफ देखना बंद कर दिया है। मैं जानता हूँ कि आप अकेली हैं। मैं जानता हूँ कि आप एक स्त्री हैं—सिर्फ मेरी माँ नहीं। आपकी ज़रूरतें हैं, आपकी चाहतें हैं, आपका अपना शरीर है जो प्यार चाहता है। और जब वह प्यार नहीं मिलता…"

"नील!" ममता ने झटके से अपना हाथ खींच लिया, उनकी आवाज़ में सख्ती और डर मिला हुआ था। "ये बातें मत करो। पारिवारिक मर्यादा की बात समझो। तुम मेरे बेटे हो।"

"हाँ, मैं आपका बेटा हूँ," नील ने दृढ़ता से कहा, पर उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बस गहरा प्रेम था। "लेकिन मेरा यह होना मुझे आपका दर्द देखने से नहीं रोकता। आप जब रात में रोती हैं, तो मुझे नींद नहीं आती। आप जब सुबह उठकर अकेले चाय बनाती हैं, तो मुझे लगता है कि यह घर आपके लिए जेल बन गया है। क्या आपको याद है, माँ, जब मैं बच्चा था, आप मुझे गोद में लेकर बैठती थीं और कहती थीं कि 'नील, जब तुम बड़े होगे तो मुझे संभालोगे।' मैं अब बड़ा हो गया हूँ। मैं आपको अकेले नहीं रहने दूँगा।"

ममता की आँखों से फिर आँसू बह निकले। वे इतने दिनों से अपने दर्द को दबाए हुए थीं कि उनके बेटे की यह कोमलता उनके लिए अचानक एक दीवार ढहाने जैसी थी। उनका सिर धीरे से नीचे झुका, और वे सिसकने लगीं। नील ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा और उन्हें अपनी ओर खींच लिया। ममता ने एक पल विरोध किया, अपने शरीर को सख्त किया, लेकिन फिर सिसकियों के साथ उन्होंने अपना चेहरा नील के कंधे पर टेक दिया। उसके कंधे चौड़े थे, मज़बूत थे—और पुरुष की खुशबू आ रही थी। वह खुशबू ममता को उन दिनों की याद दिला रही थी जब सुरेश भी ऐसे ही जवान और मज़बूत थे। नील ने धीरे से उनकी पीठ सहलाई, उनके बालों को छुआ, और फुसफुसाया, "माँ, रो लीजिए। यहाँ कोई नहीं है। यह मैं हूँ, आपका नील।"

ममता ज़ोर से रोईं, अपना सारा दर्द बहा दिया। उनके आँसू नील की शर्ट को भिगो रहे थे, पर नील को उसकी परवाह नहीं थी। वह बस उन्हें अपनी बाँहों में लिए रहा। कुछ देर बाद, ममता ने धीरे से अपना चेहरा हटाया, अपनी आँखें पोंछीं, और हल्की सी मुस्कान के साथ बोलीं, "तुमने मेरी शर्ट भिगो दी, बेटा।"

"इससे क्या फर्क पड़ता है?" नील ने हल्की स्माइल के साथ कहा, "माँ के आँसू तो मेरे लिए अनमोल हैं।"

ममता ने धीरे से नील का चेहरा देखा। उसकी आँखों में एक गहरा आकर्षण था, कुछ ऐसा जो एक माँ को अपने बेटे में कभी नहीं देखना चाहिए—पर वह देख रही थीं। उन्होंने नज़र हटा ली, लेकिन उनकी गर्दन के पीछे गर्माहट बढ़ रही थी। उनके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी। वह सोच रही थीं कि यह सिर्फ उनके बेटे की सहानुभूति है, कुछ और नहीं। पर शरीर के नीचे के हिस्से में एक बेचैनी, एक तरल गर्मी, जो कई महीनों से सोई हुई थी, वह धीरे-धीरे जाग रही थी।

"नील…" ममता ने अपनी आवाज़ को सख्त करने की कोशिश की, पर वह काँप रही थी। "तुम्हें अब जाकर अपना काम करना चाहिए। कॉलेज में बहुत काम होगा।"

"मैं आज कुछ नहीं पढ़ूँगा, माँ," नील ने शांति से कहा। "मैं आज आपके साथ रहूँगा। और नहीं, यह सिर्फ इसलिए नहीं कि मुझे आप पर तरस आता है। मैं आपके साथ रहना चाहता हूँ क्योंकि… मैं इन दिनों बहुत अकेला महसूस कर रहा हूँ।" उसने नीचे देखा, फिर उठकर ममता की आँखों में सीधे देखा। "मुझे किसी से बात करनी है। और कौन समझेगा मुझे, अगर आप नहीं?"

ममता एक पल रुकीं, फिर धीरे से बोलीं, "अच्छा। मैं सुन रही हूँ।"

नील चुप रहा। उसकी आँखें गहरी हो गईं। उसने ममता का हाथ फिर से पकड़ा, इस बार मज़बूती से। ममता ने उसे हटाने की कोशिश नहीं की। "माँ, मैंने कई लड़कियों को देखा है कॉलेज में। सुंदर हैं वे। पर…" उसकी आवाज़ गहरी हुई, "उनमें वह बात नहीं है जो आपमें है। आप अंदर से चमकती हैं। आपकी आँखों में एक अजीब सी गहराई है। आपकी आवाज़ में एक ऐसी मिठास है जो मुझे रात में सोते हुए भी सुनाई देती है। मैं जब छोटा था, आप मुझे गोद में लेती थीं… और मैं आपकी बाँहों में इसलिए सोता था क्योंकि मुझे लगता था कि दुनिया में सबसे सुरक्षित जगह आपकी गोद है। अब भी मुझे लगता है कि सबसे सुरक्षित जगह आपकी गोद है, बल्कि पहले से अधिक।"

ममता की साँसें धीमी हो गईं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू हाथों में कसा और धीरे से बोलीं, "नील… यह सब मत कहो। बेटे के मुँह से यह सब सुनकर माँ को बुरा लगता है।"

"बुरा लगता है क्योंकि यह सच है?" नील ने चुनौती से पूछा। "माँ, मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, और मुझे उम्मीद है कि आप मुझसे झूठ नहीं बोलेंगी। जब पापा रात में आपके करीब आते थे… क्या आप खुश रहती थीं? क्या आपको कभी अपनी ज़रूरतों का एहसास हुआ?"

ममता का चेहरा गर्म हो गया। वे अपनी जगह से हिलना चाहती थीं, लेकिन नील ने उनका हाथ इतनी मज़बूती से पकड़ा था कि वे हिल नहीं पाईं। "यह… यह ऐसी बातें हैं जो एक माँ अपने बेटे से नहीं करती।"

"आप मेरी माँ हैं," नील ने कोमलता से कहा, "और मैं आपका बेटा हूँ। लेकिन मैं अब एक आदमी हूँ, माँ। मैं जानता हूँ कि जब एक स्त्री का शरीर प्यार और स्पर्श के बिना सूख जाता है, तो उसका दर्द किसी से छिपता नहीं है। मैंने आपको पिछले छह महीनों में बदलते देखा है। आप रात में अकेले बैठकर रोती हैं, बिस्तर पर करवटें बदलती हैं। मैंने देखा है कि आप रात को जब सोती हैं तो आपका हाथ अपने शरीर पर इस तरह फिरता है जैसे उसे स्पर्श की याद आ रही हो। क्या मैं ग़लत हूँ?"

ममता का चेहरा पूरी तरह लाल हो गया। नील ने उनकी आँखों में सच्चाई देखी। वे झुक गईं, अपने घुटनों पर हाथ रखा और बहुत धीमी आवाज़ में बोलीं, "तुम… तुमने यह सब देखा?"

नील ने उनकी ठुड्डी पकड़कर उनका चेहरा उठाया। उसकी उँगलियाँ उनकी कोमल त्वचा पर पड़ीं, और ममता को उस स्पर्श से बिजली जैसी कौंध महसूस हुई। "हाँ, देखा," उसने धीमी, गहरी आवाज़ में कहा। "और मुझे भी रातों को अपने अकेलेपन का एहसास होता है। हम दोनों अकेले हैं, माँ। पापा ने आपको छोड़ दिया है। मैं किसी से कभी प्यार नहीं कर पाया। हमारे पास एक-दूसरे हैं। क्या ग़लत है इसमें?"

"सब कुछ ग़लत है, नील!" ममता ने अपनी आवाज़ उठाई पर वह टूटी हुई थी। "यह विपरीत है। समाज… धर्म… परिवार की इज़्ज़त…"

"समाज?" नील ने हल्का उपहास किया। "वही समाज जिसने आपकी उपेक्षा को देखा और चुप रहा? वही धर्म जो सिर्फ स्त्री से बलिदान की उम्मीद करता है? और परिवार की इज़्ज़त…" उसने नीचे देखा, फिर गहराई से ममता की आँखों में देखा। "क्या पापा ने आपके साथ जो किया है, उससे परिवार की इज़्ज़त बची है? आपका सारा स्नेह, आपका सारा लावण्य, आपकी सुंदरता, वह यहाँ अकेली सड़ रही है। मैं उसे सड़ने नहीं दूँगा।"

ममता की आँखें फिर भर आईं, पर इस बार आँसू दर्द के नहीं थे। उनके अंदर एक अजीब सी बेचैनी, एक खतरनाक लालसा जाग रही थी। वे सोच रही थीं—यह मेरा बेटा है। यह ग़लत है। लेकिन उनका शरीर नील के कंधे के पास झुका हुआ था, उनकी साँसें गहरी हो रही थीं, और उनके सीने में दिल की धड़कन उन्हें बतला रही थी—तुम सालों से प्यासी हो, और यहाँ एक जवान आदमी खड़ा है जो तुम्हें वह प्यार देना चाहता है जो तुम्हारा हक है।

"नील…" ममता की आवाज़ काँप रही थी। "हम… हमें रुक जाना चाहिए। यह हद है।"

नील ने उनका हाथ और कोमलता से दबाया, उसके चेहरे पर कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। "माँ, आप पूरे जीवन परिवार के लिए जीती रहीं। आज, थोड़ी देर के लिए, अपने बारे में सोचिए। क्या आपको अपने शरीर की गर्मी महसूस होती है? क्या आपके नीचे का हिस्सा अब भी सोया हुआ है? या वह जाग रहा है?"

ममता ने अपने होठों को दबाया, अपनी जाँघों को सिकोड़ा और एक लंबी साँस ली। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं, और बहुत धीरे से, लगभग फुसफुसाहट में बोलीं, "…जाग रहा है।"

वह कबूलनामा हवा में लटक गया। नील की आँखों में एक गहरी, गरम चमक आ गई। उसने धीरे से ममता के गाल को अपनी हथेली से सहलाया, और उनके कान के पास झुककर फुसफुसाया, "तो आज रात इसे सोने नहीं देंगे, माँ। मैं आपका बेटा हूँ, और आप मेरी माँ हैं… लेकिन इस दीवार को आज ढहना ही होगा।"

ममता की साँसें रुक गईं। उनके अंदर मर्यादा और लालसा के बीच एक भयंकर संघर्ष चल रहा था। उन्होंने नील को देखा—उसकी जवानी, उसकी मज़बूत बाँहें, उसके होंठों पर वह प्यास। उन्होंने सोचा—यह मेरे बेटे के होंठ हैं। पर ये मुझे उन होंठों की याद दिला रहे हैं जिन्होंने मुझसे कई साल पहले प्यार किया था। और उस पल, पारिवारिक मर्यादा की सारी दीवारें टूटती हुई लगीं।

"थोड़ी देर…" ममता ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, "थोड़ी देर मुझे बस अकेला रहने दो। मैं सोचना चाहती हूँ।"

नील ने सर हिलाया, एक कोमल मुस्कान के साथ। उसने ममता की उँगलियों को अपने होठों से छुआ, सिर्फ एक बार, धीरे से, जैसे एक सपने का चुंबन हो। फिर वह उठा और दरवाज़े के पास जाकर खड़ा हो गया, आधा मुड़कर बोला, "माँ, आप कितनी भी सोचें, यह सच है। आप अकेली नहीं हैं। मैं हूँ।" उसने पल भर रुककर कहा, "और मैं आपकी ख़ातिर दुनिया से दुश्मनी मोल ले सकता हूँ।"

दरवाज़ा बंद हुआ और ममता अकेली रह गईं। उन्होंने अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया, पर वह गर्माहट, वह रोमांच, वह डर, वह चाहत—उनके शरीर में अब ऐसे घुल चुकी थी कि वे उसे हटा नहीं सकती थीं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा समेटा, अपनी गर्दन पर गिरे बालों को हटाया और शीशे में अपना अक्स देखा। वे अभी भी खूबसूरत थीं। बयालीस साल की उम्र में भी, उनके शरीर की लचक बरकरार थी। उनकी आँखों में एक अजीब सी चिंगारी थी। उन्होंने खुद से कहा—यह पागलपन है। लेकिन उनके दिल ने कहा—यह प्यास है… और नील वह पानी है जो आज मेरी सारी सूखी ज़मीन को हरा-भरा कर देगा।

और उसी पल, बाहर से नील की आवाज़ आई, "माँ, आज शाम चाय मैं बनाऊँगा। और मैं आपके पास बैठूँगा। जब तक आप चाहें।"

ममता ने नीचे देखा और बहुत धीमी, लगभग आत्म-समर्पण वाली मुस्कान के साथ सोचा—काश, वह सिर्फ चाय ही नहीं, मेरे जीवन में चाहत भी लौटा दे।
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RE: MUMMY SE PREM KON KARTA HAI COMENT KARIYE... - by rajusethzee - 16-10-2026, 09:17 AM



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