Today, 04:15 AM
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SARLA
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[/img]सुबह अमन की आँखें खुलीं तो सबसे पहले कल रात का फैसला दिमाग में तैर गया।
सरला चाची।
वह औरत जिसे वह बचपन से माँ की तरह मानता आया था। जो हमेशा शरीफ, नरम और देखभाल करने वाली रहीं। जब भी वह बीमार पड़ता, सबसे पहले सरला चाची ही उसके सिरहाने बैठती थीं। और अब वह खुद… उनके साथ वह सब करने जा रहा था जो एक बेटा कभी अपनी चाची के साथ सोच भी नहीं सकता। अमन ने आँखें बंद करके माथे पर हाथ रखा। मन बहुत भारी था।
वह धीरे से उठा। नहा-धोकर तैयार हुआ। नाश्ते के समय सब मेज पर थे। माँ रसोई से रोटी ला रही थीं। कमला चाची चाय बना रही थीं। कविता और मीना एक तरफ बैठी हँस रही थीं। सरला चाची मेज के कोने में बैठी थीं। उनका चेहरा थोड़ा उदास और थका हुआ लग रहा था। अमन की निगाह उन पर गई तो चाची ने जल्दी से नज़रें झुका लीं। जैसे वे किसी अपराध भाव में हों। अमन ने भी नज़र हटा ली और चुपचाप नाश्ता करने लगा।
नाश्ता खत्म करके वह कॉलेज के लिए निकला। गली में राधा पहले से इंतजार कर रही थी। आज उसने हल्के पीले रंग का सूट पहना था। बाल खुले थे। अमन को देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
“आज देर कर दी तुमने,” राधा ने हल्के से शिकायत की।
अमन पास जाकर मुस्कुराया। “सोचता रह गया कुछ। तू सुंदर लग रही है आज।”
राधा के गाल हल्के लाल हो गए। “रोज़ की तरह बातें बना रहे हो।”
“बना नहीं रहा,” अमन ने उसका हाथ हल्के से पकड़ लिया। “सच कह रहा हूँ। ये पीला रंग तुम पर बहुत अच्छा लग रहा है।”
राधा ने हाथ तो नहीं छुड़ाया, लेकिन नज़रें झुका लीं। दोनों साथ-साथ कॉलेज की तरफ चलने लगे। रास्ते भर अमन हल्की-फुल्की बातें करता रहा। कभी उसके बालों में उड़ते हुए बालों को पीछे किया, कभी उसके कंधे से हल्के से टकराया। राधा शर्माती रही लेकिन उसके चेहरे से मुस्कान नहीं हट रही थी। कॉलेज पहुँचते-पहुँचते दोनों के बीच की दूरी काफी कम हो चुकी थी।
कॉलेज में ब्रेक के समय राजिया फिर से उसके पास आई। इस बार वह सीधा बोली, “तुम बार-बार टाल रहे हो। कब आ रहे हो सच-सच बताओ।”
अमन ने चारों तरफ देखा। फिर धीमे स्वर में कहा, “राजिया… सब्र करो। मैं वादा करता हूँ जल्दी आता हूँ। अभी थोड़ा उलझा हुआ हूँ घर की कुछ बातों में। तुम्हें निराश नहीं करूँगा।”
राजिया ने उसकी आँखों में देखा। कुछ पल तक कुछ नहीं बोली। फिर धीरे से बोली, “एक हफ्ते से ज्यादा मत लगाना। वरना मैं खुद आ जाऊँगी।” इतना कहकर वह चली गई। अमन उसकी पीठ देखता रह गया।
कॉलेज के बाद अमन घर लौटा। रास्ते में रुक्साना नहीं मिलीं। शायद अभी भी आराम कर रही थीं। घर पहुँचते ही आँगन में कविता और मीना दोनों बैठी थीं। कविता बाल खोलकर सुलझा रही थी। मीना उसके पास बैठी हँस रही थी।
अमन उनके पास जाकर बैठ गया। “दोनों बहनें आज काफी फ्री लग रही हो।”
मीना बोली, “भैया आ गए! सुना है शहर से नए कपड़े लाए थे तुम?”
अमन मुस्कुराया। “हाँ। तुम्हारे लिए भी कुछ लाया था लेकिन अभी पैक पड़ा है।” फिर उसने कविता की तरफ देखा। “तू आज बाल खुले रखकर और प्यारी लग रही है दीदी।”
कविता की कंघी रुक गई। वह थोड़ा शर्माई। “तू भी न… हमेशा ऐसी बातें करता है।”
अमन थोड़ा और करीब खिसक गया। “क्या करूँ, अब आदत सी हो गई है। तुम्हें देखकर बात निकले बिना नहीं रहती।”
कविता ने हल्के से उसकी बांह पर मार दिया लेकिन मुस्कान रोक नहीं पाई। मीना हँसने लगी। थोड़ी देर तीनों बातें करते रहे। अमन जानबूझकर कविता के करीब बैठकर हल्की शरारत भरी बातें करता रहा। कविता कभी शर्माती, कभी हँस देती।
थोड़ी देर बाद कमला चाची आँगन में आईं। उन्होंने अमन को देखा और आँखें सिकोड़ लीं। अमन उठा और उनके पास गया। चारों तरफ देखकर धीमे स्वर में बोला, “चाची, सुबह से तुम्हारा मन नहीं लग रहा था खाने में।”
कमला चाची ने आँखें उठाईं। “तू बहुत ध्यान रखने लगा है मेरा।”
अमन ने उनकी साड़ी के पल्लू को हल्के से ठीक करते हुए कहा, “आपका ध्यान रखना तो मेरा काम है।” इतना कहकर उसने जानबूझकर अपनी उंगलियाँ उनकी कमर पर थोड़ी देर टिकाईं। कमला चाची की साँस थोड़ी तेज हुई। उन्होंने आँखों से डपटा लेकिन होंठों पर मुस्कान आ गई।
“शैतान… यहाँ किसी के सामने…” उन्होंने धीमे से कहा।
अमन मुस्कुराते हुए पीछे हट गया। “जा रहा हूँ कमरे में। थकान है।”
रात का खाना खाकर अमन सीधे अपने कमरे में चला गया। बिस्तर पर लेटकर रेणु का इंतजार करने लगा। दिमाग में सरला चाची का उदास चेहरा बार-बार आ रहा था।
लगभग एक बजने पर दरवाजे पर हल्की दस्तक हुई। रेणु अंदर आईं। लालटेन की रोशनी कम रखी हुई थी। उन्होंने दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
अमन सीधे उठकर बैठ गया। “दीदी, अब बताओ… आगे क्या करना है? कैसे होगा यह सब?”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। आवाज बहुत धीमी और गंभीर थी।
“मैं सरला चाची को स्टोर रूम में बुला लूँगी। वहाँ कोई नहीं आता। लाइट पूरी तरह बंद रहेगी। घना अँधेरा होगा। तुम पहले से अंदर किसी कोने में छुपकर बैठे रहना। वे तुम्हें देख नहीं पाएँगी। तुम भी एक शब्द मत बोलना। साँस तक सावधानी से लेना। वरना आवाज से पहचान जाएँगी।”
अमन चुपचाप सुन रहा था।
“वे अँधेरे में जाकर नंगी लेट जाएँगी,” रेणु ने आगे कहा। “तुम्हें बस चुपचाप जाकर… काम पूरा करना है। कोई प्यार नहीं, कोई बात नहीं, कोई सहलाना नहीं। सिर्फ जरूरत का काम। और यह सिलसिला एक हफ्ते तक हर रात चलना है। एक हफ्ते बाद टेस्ट करवाएँगे। देखेंगे कि गर्भ ठहरा या नहीं।”
अमन की आवाज थोड़ी भारी हो गई। “हर रात… एक हफ्ते तक?”
“हाँ,” रेणु ने सिर हिलाया। “जितने ज्यादा मौके, उतना जल्दी चांस। तुम तैयार हो न?”
अमन ने गहरी साँस ली। फिर धीरे से सिर हिलाया। “हाँ दीदी… तैयार हूँ।”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ लिया। “कल रात से शुरू करते हैं। मैं तुम्हें समय बता दूँगी कब स्टोर रूम में पहुँचना है।”
वह उठ खड़ी हुईं। अमन के माथे पर हल्का चुंबन करके बोलीं, “सो जाओ। कल से तुम्हारी जिम्मेदारी सच में भारी हो जाएगी।”
रेणु चली गईं। अमन अँधेरे में लेटा रहा।
सरला चाची… स्टोर रूम का अँधेरा… और एक हफ्ते तक हर रात चुपचाप वह सब करना।
नींद बहुत देर से आई।
अगली सुबह अमन जब उठा तो नींद अधूरी लग रही थी। रात भर आँखों में सरला चाची का चेहरा घूमता रहा था। वह उठा, नहाया और चुपचाप नाश्ते पर बैठ गया। घर का माहौल सामान्य था, लेकिन उसके लिए कुछ भी सामान्य नहीं रह गया था।
सरला चाची आज और भी चुप थीं। वे नाश्ता करते हुए बार-बार अपनी थाली में झुकी रहतीं। अमन की तरफ एक बार भी पूरा मुँह करके नहीं देखा। जब माँ ने उनसे कुछ पूछा तो उन्होंने सिर्फ हल्के स्वर में जवाब दिया। अमन को लगा जैसे वे किसी बड़े फैसले के बोझ तले दबी हों। जो सच था भी।
कॉलेज जाते समय राधा फिर मिली। आज अमन थोड़ा ज्यादा चुप था। राधा ने नोटिस किया।
“क्या हुआ तुम्हें? आज मन नहीं लग रहा?” उसने पूछा।
अमन ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ नहीं। घर की छोटी-मोटी उलझनें हैं। तुम बताओ, आज सुंदर तो लग ही रही हो हमेशा की तरह।”
राधा थोड़ा शर्माई, लेकिन उसने बात आगे नहीं बढ़ाई। दोनों साथ चले। अमन ने जानबूझकर उसका हाथ कुछ देर तक पकड़े रखा। राधा ने नहीं छुड़ाया। कॉलेज पहुँचते-पहुँचते दोनों के बीच फिर से वह हल्की सी मिठास आ गई थी।
कॉलेज में राजिया ने दूर से ही अमन को घूरा। ब्रेक में पास आकर बोली, “तुमने कहा था जल्दी आओगे। कितने दिन और?”
अमन ने धीमे से कहा, “राजिया, अभी दो-तीन दिन और Sabr कर लो। वादा करता हूँ, उसके बाद आऊँगा।”
राजिया ने कुछ नहीं कहा। बस भारी निगाहों से देखती रही और चली गई।
घर लौटकर अमन ने बहनों के साथ कुछ देर बिताया। कविता से हल्की शरारत की, मीना के साथ मजाक किया। कमला चाची जब पास आईं तो अमन ने उनकी कमर पर हाथ रखकर धीमे से कहा, “चाची, आजकल तुम कम बोलने लगी हो।”
कमला चाची ने आँखें उठाईं। “तू बहुत बात बनाने लगा है। जा अपने कमरे में जा।” लेकिन उनकी आवाज में गुस्सा नहीं था। बल्कि एक थकी हुई शरारत थी।
रात का खाना खत्म होने के बाद अमन अपने कमरे में चला गया। उसने लाइट बुझा दी और अँधेरे में लेट गया। दिल की धड़कन तेज थी। कल रात से असली परीक्षा शुरू होने वाली थी।
लगभग एक बजने पर दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु अंदर आईं। इस बार उनके चेहरे पर平时 वाली नर्म मुस्कान नहीं थी। गंभीर थीं।
वे बिस्तर के किनारे बैठीं और सीधे बोलीं, “कल रात से शुरू कर रहे हैं।”
अमन उठकर बैठ गया। “बताइए दीदी… पूरा तरीका।”
रेणु ने धीमी आवाज में कहा, “कल रात ठीक एक बजे तुम स्टोर रूम पहुँच जाना। मैं पहले जाकर लाइट बंद कर दूँगी और चाची को बुला लूँगी। तुम अंदर सबसे कोने में, पुराने बक्सों के पीछे छुपकर बैठे रहना। जब वे आ जाएँगी और दरवाजा बंद हो जाएगा… तब मैं बाहर से सिटकिनी लगाकर चली जाऊँगी। उसके बाद तुम्हारा काम शुरू।”
अमन ने पूछा, “वे… पूरी तरह तैयार होंगी?”
“हाँ,” रेणु ने सिर हिलाया। “वे खुद कपड़े उतारकर लेट जाएँगी। तुम्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं। कुछ छूने की भी जरूरत नहीं सिवाय जरूरत के। काम पूरा करके चुपचाप निकल जाना। हर रात यही करना है। एक हफ्ते तक।”
अमन की आवाज थोड़ी काँपी। “दीदी… मुझे डर लग रहा है।”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ लिया। “किस बात का?”
“उनके प्रति,” अमन ने ईमानदारी से कहा। “मैं उन्हें माँ की तरह मानता आया हूँ। और अब… अँधेरे में जाकर… बिना बोले…”
रेणु ने उसका हाथ जोर से दबाया। “इसीलिए तो तुझे चुना है। कोई और होता तो सिर्फ शरीर देखता। तू उनकी इज्जत समझता है। इसलिए तू यह कर सकता है। डर के साथ कर… लेकिन कर।”
अमन ने गहरी साँस ली। “ठीक है दीदी। मैं तैयार हूँ।”
रेणु ने उसके माथे पर होंठ रखे। “एक बजे। देर मत करना। और अंदर जाने के बाद कोई आवाज नहीं।”
वे उठकर खड़ी हो गईं। दरवाजे तक जाकर बोलीं, “सो जाओ। कल रात लंबी होने वाली है।”
रेणु चली गईं। अमन अँधेरे में लेटा रहा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। एक तरफ डर था, दूसरी तरफ एक अजीब सी जिम्मेदारी की भारी उत्तेजना।
वह छत की तरफ देखता रहा।
कल रात… स्टोर रूम… सरला चाची… और पूरा अँधेरा।
नींद इस रात भी बहुत देर से आई।
सुबह अमन की नींद अधूरी टूटी। आँखें खुलते ही कल रात रेणु वाली बात दिमाग में घूम गई। आज रात से असली परीक्षा शुरू होने वाली थी। वह कुछ देर बिस्तर पर ही पड़ा रहा, फिर धीरे से उठा।
नहा-धोकर जब वह आँगन में आया तो माँ चाय बना रही थीं। सरला चाची कोने में बैठी सब्जी छील रही थीं। अमन ने नमस्ते किया। सरला चाची ने सिर तो उठाया लेकिन आँखें मिलाई नहीं। उनका चेहरा और भी थका और उदास लग रहा था। अमन ने जल्दी से नज़र हटा ली और माँ के पास जाकर चाय ले ली।
नाश्ते के समय सब मेज पर बैठे। कमला चाची आज थोड़ी नॉर्मल थीं। उन्होंने अमन को देखा और हल्की मुस्कान दी। कविता और मीना बातें कर रही थीं। अमन चुपचाप नाश्ता करता रहा। मन भारी था।
कॉलेज जाने का समय हुआ। रास्ते में राधा मिली। आज वह थोड़ी चिंता में लग रही थी।
“तुम पिछले कुछ दिनों से उदास से लगते हो,” राधा ने धीमे स्वर में कहा। “कुछ परेशानी है क्या?”
अमन ने मुस्कुराकर उसके बालों में उड़ते बाल पीछे किए। “घर की छोटी-मोटी बातें हैं। तुम टेंशन मत लो। तुम्हें देखकर तो मन हल्का हो जाता है।”
राधा थोड़ा शर्माई। दोनों साथ-साथ कॉलेज तक गए। अमन ने जानबूझकर उसका हाथ थोड़ी देर तक पकड़े रखा। राधा ने नहीं छुड़ाया। कॉलेज पहुँचते-पहुँचते माहौल थोड़ा हल्का हो गया था।
कॉलेज में राजिया ने ब्रेक में फिर से अमन को ढूँढ निकाला। इस बार उसकी आवाज में थोड़ी नाराजगी थी।
“तुमने कहा था दो-तीन दिन में आओगे। आज तीसरा दिन है।”
अमन ने चारों तरफ देखा और बहुत धीमे बोला, “राजिया, थोड़ा और सब्र कर लो। घर में कुछ महत्वपूर्ण उलझन चल रही है। जल्द ही आऊँगा। वादा।”
राजिया ने उसकी आँखों में देखा। कुछ कहना चाहती थी लेकिन रह गई। बस बोली, “ज्यादा दिन मत लगाना,” और चली गई।
कॉलेज के बाद अमन घर लौटा। रास्ते में रुक्साना नहीं मिलीं। घर पहुँचकर आँगन में कविता अकेली बैठी थी। मीना अंदर सो रही थी। अमन उसके पास जाकर बैठ गया।
“आज अकेली?” उसने पूछा।
कविता ने सिर हिलाया। “मीना सो गई है।”
अमन थोड़ा करीब खिसका। “तू इन दिनों खामोश रहती हो। सब ठीक है न?”
कविता ने हल्की मुस्कान दी। “हाँ। तू ही ज्यादा बदल गया है। पहले इतना व्यस्त नहीं रहता था।”
अमन ने उसके कंधे पर हल्का हाथ रखा। “बहनें हो तुम दोनों। तुम्हारा ख्याल तो रखना ही पड़ता है।” कविता की आँखें थोड़ी नरम पड़ीं। दोनों कुछ देर चुपचाप बैठे रहे।
थोड़ी देर बाद कमला चाची आँगन में आईं। अमन ने उठकर उनकी तरफ देखा। कमला चाची पास आईं तो अमन ने धीमे स्वर में कहा, “चाची, आजकल सरला चाची बहुत उदास रहती हैं।”
कमला चाची ने आँखें सिकोड़ीं। “तू बहुत ध्यान रखने लगा है सबका।” फिर हल्के से मुस्कुराईं। “शाम को अपने कमरे में रहना। बात करनी है।”
अमन ने सिर हिलाया। कमला चाची चली गईं। उनके जाने के बाद भी उनकी खुशबू और शरारत भरी मुस्कान अमन के दिमाग में रह गई।
रात का खाना परिवार के साथ खाया। सरला चाची ने बहुत कम खाया। अमन की निगाह बार-बार उनकी तरफ जाती। खाना खत्म होने के बाद सब अपने-अपने कमरों में चले गए।
अमन अपने कमरे में आकर लेट गया। घड़ी की तरफ देखा। अभी रात के बारह बजे तक का समय था। एक बजे स्टोर रूम पहुँचना था। दिल की धड़कन धीरे-धीरे तेज होने लगी। वह छत की तरफ देखता रहा।
आज की रात… पहली रात।
वह इंतजार करते हुए लेटा रहा।
एक बजने से ठीक पहले अमन स्टोर रूम पहुँच चुका था। वह कोने में, पुराने बक्सों के पीछे छुपकर बैठा था। थोड़ी देर बाद रेणु की हल्की आहट आई। फिर सरला चाची के धीमे कदम। रेणु कुछ पल रुकीं, फिर बाहर चली गईं। सिटकिनी लगने की आवाज आई। अब कमरे में सिर्फ घना अँधेरा और दो साँसें थीं।
अमन ने सुना कि सरला चाची कपड़े उतार रही हैं। साड़ी, ब्लाउज, साया… सब धीरे-धीरे उतर रहा था। फिर हल्की सी आवाज आई जैसे वे चटाई पर लेट गई हों। उनकी साँसें तेज और डरी हुई थीं।
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[/img]अमन धीरे-धीरे बक्सों के पीछे से निकला। अँधेरे में हाथ आगे किए हुए बढ़ा। जब उसका हाथ सरला चाची की गरम जाँघ से टकराया तो उनका शरीर जोर से सिहर उठा। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। अमन ने धीरे से उनके पैरों को फैलाया। फिर झुक गया।
रेणु ने मना किया था… लेकिन अमन खुद को रोक नहीं पाया। वह सरला चाची को जरा भी दर्द नहीं देना चाहता था। उसने धीरे से उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रखा और मुँह उनके बीच ले गया। पहले हल्की साँस फूँकी, फिर जीभ निकालकर उनकी चूत पर रखा।
सरला चाची की लंबी, दबी हुई सिसकारी अँधेरे में गूँज गई। उनका शरीर मचल उठा। अमन ने धीरे-धीरे जीभ से चाटना शुरू किया। कभी ऊपर वाली घुंडी को चूसता, कभी जीभ अंदर तक ले जाता। सरला चाची के मुँह से सिर्फ सिसकारियाँ निकल रही थीं—कोई शब्द नहीं। उनकी जाँघें काँप रही थीं। अमन ने उनकी गाँड के नीचे दोनों हाथ रखे और और गहराई तक जीभ घुसेड़ दी। थोड़ी देर बाद सरला चाची का शरीर अकड़ गया। एक लंबी सिसकारी के साथ उनका पहला पानी अमन के मुँह पर छूट गया। अमन ने सब कुछ शांत भाव से चाट लिया।
वह ऊपर उठा। अँधेरे में झुककर उनके चेहरे के पास गया। उनके गाल पर हाथ फेरा। फिर धीरे से उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। सरला चाची पहले सहम गईं, लेकिन अमन के होंठों के नरम दबाव ने उन्हें ढीला कर दिया। अमन ने बहुत धीरे-धीरे उन्हें चूमा। जीभ से उनके होंठ सहलाए। सरला चाची की साँसें उसके मुँह में मिल रही थीं।
उसी समय अमन ने अपना लंड उनकी गीली चूत पर रखा। बहुत धीरे से दबाव दिया। सरला चाची की सिसकारी चुंबन के बीच में दब गई। अमन रुक गया। फिर और धीरे से अंदर धकेलने लगा। एक-एक इंच। जितना हो सके उतना आराम से। जब आधा लंड अंदर गया तो उसने फिर चुंबन गहरा कर दिया ताकि चाची का ध्यान बँटा रहे। आखिरकार पूरा लंड धीरे-धीरे उनके अंदर समा गया। दोनों की साँसें एक साथ रुक गईं।
अमन कुछ पल बिना हिले पड़ा रहा। सरला चाची के अंदर पूरी तरह धंसा हुआ। फिर उसने बहुत धीमे धक्के शुरू किए। जितना हो सके उतना कोमल। हर धक्के के साथ सरला चाची की हल्की सिसकारी निकलती। अमन ने उनका एक स्तन हाथ में लिया और धीरे से मसलते हुए चोदता रहा। फिर मुँह बढ़ाकर उनके निप्पल को होंठों में ले लिया और चूसने लगा। सरला चाची की सिसकारियाँ अब थोड़ी तेज हो गई थीं, लेकिन अभी भी कोई शब्द नहीं निकला उनके मुँह से।
अमन की रफ्तार धीरे-धीरे थोड़ी बढ़ी। लेकिन कभी भी इतनी नहीं कि चाची को दर्द हो। वह उनके दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसता रहा और नीचे धीमे-तेज धक्के मारता रहा। सरला चाची का शरीर अब मिलकर हिलने लगा था। उनकी साँसें अमन के कंधे पर गर्म पड़ रही थीं।
लगभग बीस मिनट बाद सरला चाची का शरीर फिर से अकड़ गया। दूसरा पानी उनके अंदर ही छूट गया। अमन रुका नहीं। वह उसी धीमी लेकिन लगातार रफ्तार से उन्हें चोदता रहा। अँधेरे में सिर्फ उनकी मिली-जुली साँसें और हल्की सिसकारियाँ गूँज रही थीं।
अमन की रफ्तार अब थोड़ी और बढ़ चुकी थी, लेकिन अभी भी काबू में थी। वह सरला चाची के ऊपर लेटा हुआ था। उनके दोनों स्तनों को बारी-बारी से मुँह में लेकर चूस रहा था और नीचे धीमे-तेज धक्के मार रहा था। सरला चाची की सिसकारियाँ अब और साफ सुनाई दे रही थीं। कभी-कभी उनका हाथ अमन की पीठ पर जाकर रुक जाता, जैसे वे कुछ कहना चाहती हों, लेकिन शब्द नहीं निकाल पा रहीं थीं।
अमन ने उनका चेहरा अँधेरे में टटोलकर पकड़ा और फिर से उनके होंठों पर होंठ रख दिए। इस बार चुंबन थोड़ा गहरा था। सरला चाची ने भी हल्के से जवाब दिया। उनके होंठ काँप रहे थे। अमन ने चुंबन के बीच में ही धक्के जारी रखे। हर धक्के के साथ उनका शरीर हल्का सा ऊपर उठता।
लगभग आधे घंटे के आसपास सरला चाची का शरीर तीसरी बार अकड़ गया। इस बार उनकी सिसकारी थोड़ी लंबी निकली। पानी की गर्मी अमन के लंड पर साफ महसूस हुई। अमन ने रफ्तार नहीं रोकी। वह उनके गले और कंधों पर हल्के चुंबन करते हुए चोदता रहा। सरला चाची की साँसें अब पूरी तरह बिखर चुकी थीं।
अमन खुद भी अब अपनी सीमा के करीब पहुँच रहा था। उसने दोनों हाथों से उनकी कमर कसकर पकड़ी और धक्के थोड़े गहरे कर दिए। फिर भी दर्द देने वाला जोर नहीं लगाया। सिर्फ गहराई बढ़ाई। सरला चाची की चौथी सिसकारी निकली—इस बार थोड़ी जोरदार। उनका शरीर बार-बार काँप रहा था। अमन समझ गया कि वे चौथी बार पानी छोड़ चुकी हैं।
अब वह खुद को और ज्यादा देर नहीं रोक सकता था। उसने गहरी साँस ली और कुछ अंतिम, गहरे लेकिन नियंत्रित धक्के लगाए। फिर उनका पूरा पानी सरला चाची की कोख में छोड़ दिया। गर्म धार उनके अंदर भरती गई। अमन के शरीर में भी लहरें दौड़ गईं। वह कुछ पल तक उनके ऊपर ही पड़ा रहा। दोनों की धड़कनें एक-दूसरे से टकरा रही थीं।
बहुत देर तक कोई नहीं हिला। अँधेरे में सिर्फ उनकी भारी साँसें चल रही थीं। अमन ने धीरे से अपना लंड बाहर निकाला। सरला चाची की हल्की सी सिसकारी निकली। अमन उनके पास लेटा रहा। एक हाथ से उनके बालों को सहलाया, फिर उनके माथे पर बहुत हल्का सा होंठ रखा। कोई शब्द नहीं बोला।
थोड़ी देर बाद वह धीरे से उठा। अँधेरे में ही अपने कपड़े ठीक किए। सरला चाची अभी भी चटाई पर लेटी हुई थीं। उनकी साँसें अब थोड़ी सामान्य हो रही थीं। अमन ने एक आखिरी बार अँधेरे में उनकी तरफ देखा—हालाँकि कुछ नहीं दिख रहा था—फिर चुपचाप दरवाजे की तरफ बढ़ा।
सिटकिनी हल्के से खुली। वह गलियारे में निकल आया और अपने कमरे की तरफ चल दिया। पीछे स्टोर रूम में सरला चाची अँधेरे में अकेली रह गईं। उनके अंदर अमन का पानी अभी भी गर्म था… और आँखों में अज्ञात मर्द के कोमल व्यवहार का अजीब सा उलझा हुआ भाव।
अमन अपने कमरे में पहुँचा। दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर गिर गया। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन और भी उलझा हुआ था। पहली रात पूरी हो चुकी थी।
बाकी रातें अभी बाकी थीं।
स्टोर रूम में अँधेरा अभी भी घना था।
सरला चाची चटाई पर लेटी हुई थीं। शरीर में थकान थी, लेकिन दर्द नहीं। बल्कि एक अजीब सी कोमल गर्माहट थी। उन्होंने धीरे से आँखें बंद कीं।
वह लड़का… कौन था?
रेणु ने सिर्फ इतना कहा था कि वह विश्वसनीय है। लेकिन उन्होंने सोचा नहीं था कि वह इतना… नर्म होगा। इतना सब्र वाला। जब उसने पहली बार छुआ था तो ऐसा लगा जैसे कोई सहला रहा हो, न कि इस्तेमाल कर रहा हो। और जब उसने मुँह लगाया था… तब तो सरला की आँखों में आँसू आ गए थे। इतने प्यार से, इतनी धीरज से।
चुंबन के समय तो लगा जैसे वह सिर्फ शरीर नहीं, उन्हें पूरा महसूस करना चाहता हो। और जब अंदर आया था… एक-एक पल रुक-रुककर, जैसे डरता हो कि कहीं उन्हें दर्द न हो जाए।
सरला ने हल्की सी साँस ली। पैरों को सिकोड़ा। अंदर अभी भी उसकी गर्माहट बाकी थी।
“यह चुदाई नहीं थी…” उन्होंने मन ही मन सोचा।
“जैसे कोई मुझसे प्यार कर रहा हो।”
अँधेरे में उनकी आँखें नम हो गईं।
वह लड़का कौन था… जो अजनबी होकर भी इतना अपना लग रहा था?
Fuckuguy
albertprince547;
albertprince547;


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