15-10-2026, 10:54 PM
==Devnagari==
Chapter 37: शादी की तस्वीर और अनकहा सुलह
हैदराबाद के उस वीरान होटल के कमरे में, एयर कंडीशनर की लगातार सनसनाती आवाज़ के बीच, मैं लैपटॉप की स्क्रीन से एक पल के लिए भी अपनी नज़रें नहीं हटा पा रहा था।
स्क्रीन पर समय शाम के ठीक ६:०५ बजे का था।
फ्लैट ९०३ के बेडरूम के दरवाज़े पर खड़े होकर ताऊजी से गरमा गरम मूंग दाल की खिचड़ी की वो छोटी सी फरमाइश करने के बाद, काव्या ने जैसे ही दरवाज़ा अंदर से बंद किया, उसके पूरे बदन से एक बहुत गहरी, थकी हुई सांस बाहर निकली।
वो कुछ देर तक उसी बंद दरवाज़े की लकड़ी से अपनी पीठ टिकाए खड़ी रही।
उसकी छाती तेज़ तेज़ धड़क रही थी और उसके गोरे गालों पर दिन भर की थकान के बावजूद एक अजीब सी लालिमा तैर रही थी। वो पहल... वो ससुर के सामने झुककर अपनी भूख और मजबूरी का वो इज़हार... काव्या के लिए कोई आसान काम नहीं था। लेकिन उस एक कदम ने घर के भीतर जमी बर्फ की उस मोटी चादर को पिघला दिया था।
रसोई से अब प्रेशर कुकर की पहली सीटी की तीखी, जानी पहचानी आवाज़ गूंजी। साथ ही, देसी घी में कड़कती हींग और जीरे के बघार की सोंधी खुशबू पूरे फ्लैट में तैरने लगी।
काव्या ने अपनी आंखें धीरे से खोलीं।
कमरे के भीतर शाम का हल्का धुंधलका गहराने लगा था। बालकनी की तरफ वाली बड़ी कांच की खिड़की से दूर शहर की ऊंची इमारतों पर जलती पीली नीली बत्तियां चमक रही थीं। काव्या ने अपने दोनों हाथों से अपना बैग ड्रेसिंग टेबल पर रखा, अपने गले का पल्लू ढीला किया और बहुत भारी, लड़खड़ाते कदमों से डबल बेड के सिरहाने की तरफ बढ़ गई।
वो बिस्तर पर बैठने ही वाली थी कि उसकी नज़र अचानक साइड टेबल पर रखे उस चांदी के नक्काशीदार फ्रेम पर पड़ गई।
हमारी शादी की तस्वीर।
काव्या के कदम वहीं के वहीं जम गए।
उसकी सांस हलक में ही अटक कर रह गई।
काव्या ने बहुत धीमी, कांपती उंगलियों से उस फ्रेम को उठाया।
तस्वीर में आठ साल पहले का मैं चेहरे पर भरी जवानी का गुरूर, मूंछों पर ताव और सूट बूट में संवरा हुआ राजेश खिलखिलाकर मुस्कुरा रहा था। और मेरे बगल में, लाल बनारसी सिल्क की भारी साड़ी में सजी, मांग में गहरा सिंदूर भरे और झुकी हुई पलकों के साथ शरमाती हुई बीस साल की काव्या खड़ी थी।
काव्या की उंगलियां उस कांच की ठंडी सतह पर फिसलने लगीं। वो तस्वीर में मुस्कुराते हुए मेरे चेहरे को ऐसे सहला रही थी जैसे कोई मां अपने बिछड़े हुए बच्चे के निशान ढूंढ रही हो।
और फिर...
काव्या की बड़ी बड़ी, कजरारी आंखों के कोरों से आंसुओं की दो मोटी बूंदें अचानक टूटकर सीधे उस फ्रेम के कांच पर गिर पड़ीं।
चरम सुख का वो नशा, जांघों के बीच की वो आग, और ताऊजी के उस विशाल अंग से निकला वो गाढ़ा वीर्य... भले ही वो सब कुछ कल रात मर्यादा की पतली तलवार पर चलकर हुआ था, लेकिन उस संस्कारी, ऊंचे खानदान की बहू के लिए अपनी शादी की तस्वीर का सामना करना मौत की सजा जैसा लग रहा था।
उस तस्वीर में हंसते हुए मेरे मासूम चेहरे को देखकर, काव्या के सीने में अपराधबोध का ऐसा भयानक खंजर घोंप उठा कि उसकी सुबकी निकल गई।
उसने फ्रेम को दोनों हाथों से अपनी छाती से चिपका लिया। उसकी गर्दन झुकी, और उसके सूखे होंठों से एक बहुत ही बेबस, रुआंसी फुसफुसाहट निकली:
"राजेश... मुझे माफ कर देना... हे भगवान, मैं क्या कर बैठी..."
काव्या काफी देर तक उस तस्वीर को सीने से लगाए सिसकती रही।
फिर, जैसे किसी डूबते हुए इंसान को अचानक तिनके का सहारा याद आ जाए, काव्या ने झटके से अपनी आंखें पोंछीं। उसने कांपते हाथों से साइड टेबल पर रखा अपना फोन उठाया।
उसने एक लंबी, गहरी सांस ली, अपनी लड़खड़ाती सांसों को काबू में करने की भरपूर कोशिश की, और फिर स्क्रीन पर मेरे नंबर के डायल बटन पर अपनी उंगली दबा दी।
स्क्रीन पर ये दृश्य देखकर, हैदराबाद के होटल में मेरी छाती का खून बर्फ की तरह जम गया!
तो ये था उस फोन कॉल का सच!
कल रात जब मैं हैदराबाद के होटल में बैठा था और काव्या का वो अजीब, रुआंसा और लड़खड़ाता हुआ फोन आया था... जब उसने मुझसे पूछा था कि क्या मैंने खाना खा लिया, जब उसकी आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था, और जब उसने अचानक फोन पर किस मांगकर झटके से लाइन काट दी थी...
उस वक्त मैं सोच रहा था कि काव्या शराब के नशे में बहक रही थी।
लेकिन आज... इस कैमरे की रिकॉर्डिंग ने उस फोन कॉल की असली, दहला देने वाली हकीकत मेरे सामने खोलकर रख दी थी!
वो फोन कॉल किसी हवस या नशे का नहीं था... वो एक टूटी हुई, पश्चाताप की आग में जलती हुई पतिव्रता पत्नी की वो आखिरी, बेबस चीख थी जो अपने पति की आवाज़ सुनकर अपने भीतर के पाप को मिटा देना चाहती थी!
वीडियो में, काव्या फोन को कान से सटाए खड़ी थी।
"हेलो... राजेश?" काव्या की आवाज़ में वही कांपती हुई, भीगी मिठास थी जिसे मैंने कल रात फोन पर सुना था।
"हाँ राजेश... आपने खाना खा लिया? आपकी तबियत तो ठीक है ना?"
काव्या बात करते करते अपनी दूसरी हथेली से अपने गालों पर बहते आंसुओं को पोंछ रही थी। वो अपनी आवाज़ में बनावटी खिलखिलाहट भरने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी सांसों की टूटन और पलकों की कंपकंपी साफ बता रही थी कि उसका दिल अंदर से चीत्कार कर रहा था।
"मुझे... मुझे बस आपकी आवाज़ सुननी थी राजेश... आप बहुत याद आ रहे हैं..."
काव्या ने भरे गले से कहा था, और फिर बहुत ही शर्मीले, रोते हुए अंदाज़ में उसने मुझसे एक वर्चुअल किस मांगी थी:
"एक बार... एक बार फोन पर मुझे वो किस दे दीजिए ना..."
और उधर हैदराबाद में बैठे मैंने फोन पर एक लंबी किस की आवाज़ निकाली थी।
लेकिन ठीक उसी सेकंड
स्क्रीन पर, मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा अचानक हल्के से खुला!
"बहू..."
ताऊजी की भारी, खुरदरी और गंभीर आवाज़ कमरे के सन्नाटे में गूंजी। ताऊजी अपनी सफेद सूती बनियान और घुटनों तक बंधी धोती में चौखट पर खड़े थे। उनके हाथ में एक साफ किचन नैपकिन था जिससे वे अपने हाथ पोंछ रहे थे:
"बहू, खिचड़ी तैयार हो गई है... गरमा गरम है, बाहर आकर खा ले।"
ताऊजी की आवाज़ सुनते ही, बिस्तर के पास खड़ी काव्या के पूरे बदन में करंट दौड़ गया!
उसका चेहरा खौफ और घबराहट से एक पल में सफेद पड़ गया।
उसने बिना एक सेकंड की देरी किए, बदहवास होकर अपने फोन की लाल स्क्रीन पर उंगली दबा दी और कॉल झटके से काट दिया!
हैदराबाद के होटल में बैठा मैं अवाक रह गया।
तो इस वजह से काव्या ने वो कॉल काटा था!
मैं कल रात सोच रहा था कि काव्या ने मुझे कोई संकेत दिया था, या शायद नेटवर्क चला गया था... लेकिन असलियत ये थी कि ऐन वक्त पर ताऊजी के कमरे में दाखिल होने से वो ऐसी घबरा गई थी जैसे कोई चोर रंगे हाथों पकड़ा गया हो!
काव्या ने बिजली की फुर्ती से अपना फोन तकिए के नीचे छिपाया। उसने झटके से अपनी पीठ ताऊजी की तरफ मोड़ी और अपनी दोनों हथेलियों से अपने आंसुओं को बेरहमी से रगड़कर पोंछ डाला।
उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सलीके से अपने सीने पर लपेटा, एक गहरी सांस भरकर खुद को संभाला, और फिर बहुत सहज बनने का नाटक करते हुए मुड़ी:
"हाँ... हाँ ताऊजी, बस आ ही रही थी। हाथ मुँह धो रही थी।"
काव्या की आवाज़ में अभी भी एक हल्की सी कंपकंपी थी, लेकिन ताऊजी ने शायद उस पर ध्यान नहीं दिया या फिर उन्होंने देखकर भी अनदेखा कर दिया।
ताऊजी ने अपनी नज़रें बहुत अदब से ज़मीन पर झुका रखी थीं।
"चल, ठंडी हो जाएगी तो स्वाद नहीं रहेगा।" ताऊजी ने धीमी आवाज़ में कहा, और मुड़कर डाइनिंग एरिया की तरफ बढ़ गए।
काव्या ने एक पल के लिए उस खाली चौखट को देखा, अपनी साड़ी की सिलवटें ठीक कीं, और फिर दबे पाँव कमरे से बाहर निकल आई।
डाइनिंग टेबल पर पसरा हुआ वो सन्नाटा किसी भारी, दमघोंटू कोहरे की तरह था।
हॉल में सिर्फ छत के पंखे की मद्धम, घरघराती आवाज़ गूंज रही थी और टेबल के ऊपर लटके वॉर्म व्हाइट पेंडेंट लैंप का पीला उजाला दोनों की थालियों पर पड़ रहा था।
टेबल पर दो भारी पीतल की थालियां सजी थीं।
थालियों के बीचों बीच, भाप उड़ाती हुई सुनहरी मूंग दाल की पतली खिचड़ी परोसी हुई थी, जिसके ऊपर ताऊजी ने गांव के शुद्ध देसी घी का एक एक बड़ा चम्मच पिघलाकर डाला था। घी की वो तीखी, सोंधी महक पूरे कमरे में फैली हुई थी। बगल में घर का बना आम का तीखा अचार और तवे पर सेके हुए दो पापड़ रखे थे।
काव्या और ताऊजी आमने सामने की कुर्सियों पर बैठे थे।
शुरुआत के दस मिनट तक, पूरे कमरे में सिर्फ चम्मचों के पीतल की थाली से टकराने की हल्की सी खनक और खिचड़ी के घूंट भरने की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं था।
काव्या अपनी नज़रें पूरी तरह अपनी थाली पर गड़ाए बैठी थी। उसने दिन भर से कुछ नहीं खाया था, लेकिन हर निवाला उसके गले में कांटे की तरह अटक रहा था। वो चम्मच को बहुत धीमे धीमे चला रही थी, जैसे सिर्फ खाने का नाटक कर रही हो।
और उधर सामने बैठे ताऊजी की हालत भी कुछ अलग नहीं थी।
वे ५६ साल के फौलादी पहलवान, जो आम तौर पर चार चार रोटियां एक सांस में निगल जाते थे, आज खिचड़ी के छोटे छोटे टुकड़े अपनी उंगलियों से ऐसे तोड़ रहे थे मानो कोई मुजरिम अपनी आखिरी खुराक ले रहा हो।
ताऊजी बार बार अपनी भारी पलकें उठाते, काव्या के झुके हुए, मुरझाए चेहरे को एकटक देखते, और फिर एक गहरी सांस भरकर अपनी नज़रें वापस थाली पर टिका लेते।
उनके चेहरे पर एक भयानक कशमकश, एक अनकही बेचैनी साफ झलक रही थी। वे कुछ बोलना चाहते थे... उनके सूखे होंठ दो बार हिले, लेकिन आवाज़ गले में ही घुटकर रह गई।
आखिरकार, जब काव्या की थाली आधी खाली हो चुकी थी, तो ताऊजी से रहा नहीं गया।
ताऊजी ने बहुत आहिस्ता से अपनी चम्मच थाली के किनारे टिका दी।
उन्होंने एक गहरा घूंट भरा। अपनी भारी, खुरदरी हथेलियों को टेबल के किनारे पर जमाया, और फिर बहुत ही रुंधे हुए, भरभराए गले से बोले:
"बहू..."
वो एक पुकार...
डाइनिंग टेबल के उस सन्नाटे में जैसे कोई गहरा सन्नाटा और खिंच गया।
काव्या के हाथ में पकड़ी चम्मच वहीं की वहीं हवा में ठहर गई।
काव्या ने अपनी पलकें नहीं उठाईं। उसकी सांसें तेज़ हो गईं, और उसके कान शर्म और घबराहट की लाली से तपने लगे।
ताऊजी ने अपनी नज़रें काव्या की झुकी हुई पलकों पर टिकाईं। उनकी सांवली, झुर्रियों भरी आंखों में एक ऐसा गहरा, सच्चा दर्द और पश्चाताप तैर रहा था जिसे देखकर किसी भी इंसान का कलेजा पसीज जाए:
"बहू... कल रात जो कुछ भी हुआ... मैं हाथ जोड़कर तुझसे माफी मांगता हूँ।"
ताऊजी की भारी, मर्दाना आवाज़ में इतनी थरथराहट थी कि ऐसा लग रहा था मानो वो बूढ़ा शेर अपने ही आंसुओं के बोझ तले दबकर टूट चुका हो।
"कल रात... शराब के नशे में मुझसे बहुत भारी भूल हो गई बहू। मुझे अपनी मर्यादा, अपनी उम्र और अपने रिश्ते का ज़रा भी होश नहीं रहा। तू... तू उस बात को अपने दिल पर बोझ मत बनाना। उसे बस एक बहुत बुरा सपना समझकर भूल जाना मेरी बच्ची। भगवान साक्षी है... तेरा ये ताऊ अपनी इस मनहूस देह को आगे कभी तेरी तरफ नहीं बढ़ाएगा। ऐसी हरकत मैं अपनी ज़िंदगी में दोबारा कभी नहीं करूँगा..."
ताऊजी के मुंह से निकले उन एक एक लफ्जों ने काव्या के सीने में जैसे किसी ने खौलता हुआ तेल उड़ेल दिया हो!
काव्या का पूरा बदन थर थर कांप उठा।
उसने एक झटके में अपनी चम्मच थाली में छोड़ दी। चम्मच के गिरने से पीतल पर एक तीखी झनझनाहट हुई।
काव्या ने अपनी बड़ी बड़ी, भीगी हुई कजरारी आंखें उठाईं और सीधे ताऊजी के चेहरे में देखा। उसकी आंखों में कोई गुस्सा नहीं था... एक ऐसी अंधी, तड़पती हुई बेबसी और अपनापन था जिसने उस कमरे की हवा को और ज्यादा भारी बना दिया।
"ताऊजी... आप... आप ये कैसी बातें कर रहे हैं?!" काव्या की आवाज़ रुआंसी हो गई, उसके होंठ बुरी तरह कांप रहे थे।
"मैंने... मैंने कब आपको दोषी ठहराया ताऊजी? कल रात बिस्तर पर... क्या हमारी बात नहीं हुई थी? क्या मैंने आपके आगे हाथ नहीं जोड़े थे कि आप खुद को पापी मत समझिए?"
काव्या ने एक लंबी, लड़खड़ाती सांस खींची, उसकी आंखों से दो आंसू छलक कर उसके गालों पर बह निकले:
"सच तो ये है ताऊजी... कि कसूरवार आप नहीं हैं। कसूर हमारा है। मैंने और राजेश ने कभी आपकी उस खामोशी को, आपके उस अकेलेपन को समझने की कोशिश ही नहीं की। जब से माँ जी का देहांत हुआ... आपने अपने अनाथ भतीजे को पालने के लिए अपनी पूरी जवानी कुंवारे रहकर होम कर दी। कभी अपनी कोई ख्वाहिश ज़ाहिर नहीं की, कभी एक पैसे का लालच नहीं किया। और हम... हम अपनी दुनिया में, अपने बुटीक और दफ्तर के कामों में इतने मशगूल रहे कि हमें अंदाज़ा ही नहीं हुआ कि इस बुढ़ापे में एक भरे पूरे मर्द का दिल अंदर से कितना सूना और तन्हा होता है!"
काव्या ने अपनी दोनों हथेलियां टेबल पर आगे बढ़ाईं, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा रूहानी खिंचाव था:
"कल रात जो हुआ... वो कोई पाप नहीं था ताऊजी। मैं कोई गैर औरत नहीं हूँ, आपकी अपनी बहू हूँ। अगर मेरी वजह से आपकी उस ढलती उम्र की थोड़ी सी तकलीफ दूर हो गई, अगर आपके सीने का वो बोझ थोड़ा हल्का हो गया... तो इसमें कौन सा अनर्थ हो गया? मैंने कल भी कहा था और आज भी कह रही हूँ... आगे भी जब कभी आपको ज़रूरत महसूस हो, आपकी ये बहू बिना किसी झिझक के आपकी सेवा के लिए हाज़िर रहेगी..."
काव्या के होंठों से निकले उन शब्दों को सुनकर
ताऊजी का चेहरा अविश्वास, दर्द और एक गहरी आत्मग्लानि से भर गया।
उन्होंने बहुत आहिस्ता से अपने दोनों हाथ उठाए, और काव्या के सामने जोड़ लिए:
"नहीं बहू... ऐसा मत कह। तू बहुत भली है, बहुत नेक दिल है... पर मैं जानता हूँ कि तू अपने दिल पर कितना बड़ा पत्थर रखकर ये सब कह रही है।"
ताऊजी की आंखों से आंसुओं की दो मोटी धारें निकलकर उनकी सफेद दाढ़ी में गुम होने लगीं:
"मैंने दिन भर... उस खाली कमरे में बैठकर सिर्फ और सिर्फ इसी बात के बारे में सोचा है बहू। जब तक कोई बहुत बड़ा अनर्थ नहीं हुआ है... जब तक वो आखिरी मर्यादा बची हुई है... तब तक इस भूल को सुधारा जा सकता है।"
ताऊजी ने रुककर एक गहरी सांस भरी, उनकी आवाज़ में एक पिता का बेइंतहा दर्द छलक उठा:
"और अभी... जब मैं तुझे खाने के लिए बुलाने तेरे बेडरूम में आया था ना बहू... तो मैंने तुझे उस शादी की तस्वीर को सीने से लगाकर रोते देखा था।"
ताऊजी के मुंह से ये बात निकलते ही
काव्या का चेहरा एक पल में बिल्कुल सुन्न पड़ गया!
उसकी सांसें जहां की तहां थम गईं। वो फटी आंखों से ताऊजी को देखने लगी।
"मेरा कलेजा अंदर तक फट गया बहू," ताऊजी ने भरभराए गले से कहा, "जब मैंने तुझे राजेश की तस्वीर के आगे रोते देखा... तो मुझे समझ आ गया कि मैं क्या करने जा रहा था। मैं अपने उस अनाथ बच्चे के सुहाग पर डाका डालने चला था जिसने मुझे भगवान से बढ़कर माना है! मैं नहीं चाहता बहू कि मेरी इस बूढ़ी हवस की वजह से तेरी ये पवित्र मांग सूनी हो जाए, या तेरे चेहरे की ये मुस्कान हमेशा के लिए छिन जाए। मैं ऐसा पाप अपने सिर लेकर मरना नहीं चाहता!"
ताऊजी ने टेबल पर अपना सिर थोड़ा झुका लिया:
"राजेश मेरा बच्चा है बहू। वो जैसा भी है, लाचार है, बीमार है... पर वो तेरा सुहाग है। और तू इस घर की इज़्ज़त है। जो कुछ कल रात हुआ, उसे हम दोनों यहीं दफन कर देंगे। हम दोबारा उसी तरह रहेंगे जैसे पहले रहते थे एक ससुर और एक संस्कारी बहू की तरह। तू बस... तू बस मुझे माफ कर देना मेरी बच्ची।"
ताऊजी के उस एकतरफा, अटल फैसले ने
हैदराबाद के उस होटल के कमरे में बैठे मेरे पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया!
मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ की एक ठंडी सनसनाहट दौड़ गई।
नहीं! ऐसा नहीं हो सकता!
मेरे दिमाग की नसें पागलों की तरह फड़कने लगीं। मेरी हथेलियों में पसीना छूट गया।
अगर ताऊजी इस तरह पीछे हट गए... अगर उन्होंने मर्यादा का ये ढोंग दोबारा ओढ़ लिया... तो मेरी ये सारी साज़िश, मेरी महीनों की मेहनत और मेरी वो वहशी वोयूरिस्टिक भूख एक झटके में खाक में मिल जाएगी!
मैं अपनी कुर्सी पर आगे झुक गया। स्क्रीन पर ताऊजी का वो झुका हुआ सिर मुझे किसी मुजरिम का नहीं, बल्कि मेरे अपने खेल को बिगाड़ने वाले एक दुश्मन का लग रहा था!
और उधर स्क्रीन पर...
काव्या ने ताऊजी के उस दर्द भरे इक़रार को सुना।
उसकी आंखों में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। उसकी पलकों के कोनों में एक बहुत बारीक, अनकही मायूसी की हल्की सी परछाईं कौंधी वो मायूसी जो किसी औरत के चेहरे पर तब आती है जब उसे मिलने वाली वो पहली, अंधी संतुष्टि अचानक उससे दोबारा छीन ली जाती है।
लेकिन साथ ही... उसके दिल के किसी कोने में एक हल्की सी राहत भी थी। उसके पति का हक, उसकी मर्यादा बच गई थी।
काव्या ने कुछ पल तक अपनी कांपती उंगलियों को देखा, फिर अपनी भीगी पलकें उठाकर बहुत ही धीमी, आज्ञाकारी आवाज़ में कहा:
"ठीक है ताऊजी... जैसा आप ठीक समझें। अगर आपको इसी में सुकून मिलता है... तो मैं आपकी बात मानूंगी। बस... आप इस बात को लेकर अपनी सेहत मत बिगाड़िए। खाना ठंडा हो रहा है, खा लीजिए।"
ताऊजी ने एक बहुत ही भारी, ठंडी सांस भरी। उनके चेहरे पर छाई वो भयानक बेचैनी थोड़ी शांत हुई। उन्होंने अपनी चम्मच दोबारा उठाई और बहुत धीरे धीरे खिचड़ी खाने लगे।
कमरे में दोबारा वही सन्नाटा छा गया... लेकिन इस बार, उस सन्नाटे में कल रात वाली कड़वाहट नहीं थी।
उसमें एक अनकहा, गहरा और पवित्र सुलहनामा था।
रात के करीब पौने नौ बज रहे थे।
डिनर खत्म हो चुका था। दोनों ने मिलकर डाइनिंग टेबल से खाली थालियां और कटोरियां समेटीं।
काव्या थालियां लेकर रसोई की तरफ बढ़ी, लेकिन तभी ताऊजी भी उसके पीछे पीछे किचन में आ गए।
"बहू, तू हट... तू बुटीक में थकी है। बर्तन मैं धो देता हूँ," ताऊजी ने बड़े अधिकार से कहा और सिंक की तरफ हाथ बढ़ाया।
"अरे नहीं ताऊजी! कैसी बातें करते हैं आप?" काव्या ने चौंककर थालियां सिंक में रखीं और ताऊजी के आगे आ गई, "ससुर होकर आप मेरे जूठे बर्तन धोएंगे? मुझे पाप का भागीदार मत बनाइए। आप जाइए, हॉल में आराम कीजिए।"
"तू भी तो मेरी बेटी जैसी है बहू, इसमें पाप कैसा?" ताऊजी ने हंसने की नाकाम कोशिश की और विम बार का साबुन उठाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
काव्या ने भी उसी पल साबुन उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया
और ठीक उसी सेकंड...
किचन के उस तंग, चिकने स्लैब पर... सिंक के बहते नल के ठीक नीचे...
काव्या की गोरी, मुलायम और लोशन से महकती उंगलियां सीधे ताऊजी की उस विशाल, खुरदरी और अखाड़े की मिट्टी से पकी गर्म हथेली से टकरा गईं!
सरर्र...!
एक बिजली का भयानक, नशीला झटका दोनों के जिस्मों में एक साथ दौड़ा!
पानी की ठंडी धार उन दोनों के जुड़े हुए हाथों पर गिर रही थी, लेकिन उस छुअन में जो आग थी, उसने पानी की ठंडक को एक सेकंड में भाप बना दिया!
दोनों के हाथ वहीं के वहीं जम गए।
न काव्या ने अपना हाथ पीछे खींचा, और न ही ताऊजी अपनी हथेली हटा पाए।
काव्या की सांसें एक झटके में उखड़ गईं। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर नीचे होने लगी, और उसकी गर्दन से लेकर उसके कानों तक एक गहरा, धधकता हुआ सिंदूरी रंग फैल गया। उसने अपनी पलकें झुका लीं, लेकिन उसकी उंगलियों में जो कंपकंपी थी, वो ताऊजी की पकड़ में साफ महसूस हो रही थी।
और ताऊजी...
उस छप्पन साल के पहलवान की सांसें भी धौंकनी की तरह चलने लगीं।
उनकी जो उंगलियां अभी टेबल पर संन्यास लेने की कसमें खा रही थीं... वे उंगलियां काव्या के उस मखमली, नाजुक मांस के स्पर्श पर बेकाबू होकर हल्की सी भींच उठीं! उन्होंने एक सेकंड के लिए काव्या की उस गोरी हथेली को अपनी मुट्ठी में दबाया मानो वे उस छुअन के जादू को हमेशा के लिए अपनी नसों में कैद कर लेना चाहते हों।
कमरे में सिर्फ नल से गिरते पानी की छप छप आवाज़ गूंज रही थी।
कुछ सेकंड तक दोनों उसी तरह बुत बने खड़े रहे।
फिर, ताऊजी को जैसे अचानक अपनी मर्यादा का होश आया। उन्होंने बहुत ही घबराकर, लगभग झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
ताऊजी ने अपनी मुट्ठी को अपनी जांघ पर कसकर दबाया, जैसे वे अपनी ही हथेली से उठती उस आग को दबाने की कोशिश कर रहे हों। उनका चेहरा शर्म से लाल पड़ चुका था।
"त... तू ही धो ले बहू। मैं... मैं बाहर हॉल में हूँ," ताऊजी ने लड़खड़ाती जुबान से कहा।
वे एक पल भी वहां नहीं रुके। वे तेज़ी से मुड़े और लंबे लंबे कदम भरते हुए किचन से बाहर निकलकर सीधे लिविंग रूम के सोफे पर जाकर बैठ गए।
उधर किचन में, काव्या सिंक के सहारे खड़ी हांफ रही थी।
उसकी हथेली अभी भी उसी जगह से तप रही थी जहां ताऊजी की खुरदरी त्वचा ने उसे छुआ था।
काव्या के होंठों पर एक बहुत ही धीमी, कांपती हुई मुस्कान बिखर गई।
ताऊजी चाहे जितना भी खुद को रोक लें... लेकिन इस जिस्म की प्यास अब किसी उसूल की मोहताज नहीं रही थी।
काव्या ने नल बंद किया, साबुन लगाया और बहुत तसल्ली से बर्तनों को धोकर स्टैंड पर सजा दिया।
बर्तन धोने के बाद, आम तौर पर काव्या का नियम था कि वो सीधे अपने मास्टर बेडरूम में चली जाती थी, दरवाज़ा बंद करके अपने टैबलेट में खो जाती थी या सो जाती थी।
लेकिन आज...
रसोई की लाइट बंद करके जब काव्या बाहर निकली, तो वो बेडरूम की तरफ नहीं गई।
वो धीरे धीरे कदमों से चलकर सीधे लिविंग रूम में आई।
सोफे पर ताऊजी बैठे थे। उनके हाथ में टीवी का रिमोट था और स्क्रीन पर कोई पुराना हिंदी पारिवारिक धारावाहिक चल रहा था। ताऊजी टीवी की स्क्रीन को ऐसे घूर रहे थे जैसे बहुत ध्यान से देख रहे हों, लेकिन उनकी खिंची हुई भौहें और माथे की लकीरें साफ बता रही थीं कि उनका ध्यान कहीं और ही भटका हुआ था।
काव्या ने कुछ पल तक ताऊजी के उस विशाल, गठीले साए को देखा।
फिर, बिना किसी झिझक के, काव्या आगे बढ़ी और ताऊजी जिस बड़े एल शेप सोफे पर बैठे थे, उसी सोफे के दूसरे कोने पर उनसे बमुश्किल दो फीट की दूरी पर आकर बैठ गई!
काव्या के बैठते ही सोफे का गद्देदार स्पंज हल्का सा दबा।
ताऊजी का पूरा बदन एक झटके में सतर्क होकर सीधा हो गया। उन्होंने चौंककर अपनी गर्दन मोड़ी।
काव्या ने पल्लू को बहुत सलीके से अपनी गोद में समेट रखा था। उसके चेहरे पर अब न कोई खौफ था, न कोई घबराहट। उसकी बड़ी बड़ी आंखों में एक ऐसी घरेलू सहजता और अपनापन था जो पिछले आठ सालों में कभी देखने को नहीं मिला था।
"ताऊजी... ये क्या देख रहे हैं आप?" काव्या ने बहुत ही मीठे, खनकते लहजे में पूछा, "इस सास बहू के ड्रामे में आपको क्या समझ आ रहा है?"
ताऊजी का मुंह खुला का खुला रह गया।
वे हकलाने लगे:
"अ... अरे कुछ नहीं बहू, बस ऐसे ही चैनल बदल रहा था... रिमोट की समझ नहीं आ रही थी मुझे।"
काव्या के होंठों पर एक बहुत ही प्यारी, नटखट मुस्कान खिल उठी।
"दीजिए मुझे रिमोट," काव्या ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
ताऊजी ने संकोच से रिमोट उसकी हथेली पर रख दिया। जब रिमोट बदला, तो काव्या की उंगलियों ने जानबूझकर ताऊजी के अंगूठे को बहुत हल्के से छुआ। ताऊजी के बदन में फिर एक हल्की सी सिहरन दौड़ी, लेकिन इस बार वे पीछे नहीं हटे।
काव्या ने चैनल बदलकर एक पुरानी हिंदी कॉमेडी फिल्म लगा दी।
अगले एक घंटे तक... फ्लैट ९०३ के लिविंग रूम का नज़ारा ऐसा था जिसकी मैंने अपने सबसे जंगली सपनों में भी उम्मीद नहीं की थी।
वे दोनों साथ बैठकर टीवी देख रहे थे।
शुरुआत में ताऊजी थोड़े झिझक रहे थे, लेकिन जब फिल्म का कोई मज़ाकिया सीन आया और काव्या खिलखिलाकर हंस पड़ी, तो ताऊजी की मूंछों के नीचे भी एक चौड़ी, बेपरवाह हंसी फूट पड़ी।
हंसते हंसते जब ताऊजी ने गांव के किसी पुराने किस्से का ज़िक्र करते हुए काव्या को छेड़ा, तो काव्या ने बिना किसी संकोच के, बड़े लाड़ और अधिकार से अपनी नाज़ुक हथेली से ताऊजी के उस फौलादी, रोएंदार बाइसेप पर एक हल्की सी चपत मार दी:
"धत्त ताऊजी! आप भी ना... कुछ भी बोलते हैं!"
उस एक चपत ने...
उस एक स्पर्श ने उस घर की सारी सदियों पुरानी मर्यादाओं को एक मखमली चादर में लपेटकर किनारे रख दिया था!
ससुर और बहू के बीच की वो औपचारिक, ठंडी और डरावनी दीवार हमेशा के लिए ढह चुकी थी। अब उनके बीच कोई डर नहीं था। अब उनके बीच एक ऐसा अनकहा, मीठा और घरेलू रिश्ता पनप चुका था जिसमें हवस भी थी, अपनापन भी था, और एक दूसरे के जिस्म की भूख का गहरा, मौन इक़रार भी!
हैदराबाद के उस होटल में, लैपटॉप की नीली स्क्रीन के सामने बैठा मैं अपनी उंगलियों से अपनी दाढ़ी सहला रहा था।
मेरे होंठों पर एक बहुत ही शातिर, संतुष्ट मुस्कान तैर गई।
शिकार जाल से बाहर नहीं गया था... वो तो बस जाल के धागों को और मजबूत कर रहा था!
ताऊजी ने भले ही खुद को रोक लिया था, लेकिन काव्या अब उस दहलीज को पार कर चुकी थी जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है। उसने ताऊजी के दिल में अपनी जगह बना ली थी। और एक बार जब किसी औरत का मन किसी मर्द के आगे खुल जाता है... तो उसके जिस्म के दरवाज़े खुलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता!
रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे।
फिल्म खत्म हुई।
ताऊजी सोफे से उठे। उन्होंने एक लंबी, सुकून भरी अंगड़ाई ली।
"चल बहू... बहुत रात हो गई है। तू भी सो जा, दिन भर की थकी है।" ताऊजी ने बहुत ही अपनेपन और गर्मजोशी से कहा। उनकी आंखों में अब वो पुराना अपराधबोध नहीं था... एक गहरा, पिता समान दुलार और एक मर्द का अनकहा आकर्षण साफ चमक रहा था।
"जी ताऊजी... शुभ रात्रि। आप भी आराम कीजिए," काव्या ने उठकर बहुत सलीके से कहा।
दोनों अपने अपने कमरों की तरफ बढ़ गए।
ताऊजी ने अपने गेस्ट रूम का दरवाज़ा बंद कर लिया, और काव्या अपने मास्टर बेडरूम में दाखिल हो गई।
लेकिन...
कमरे के भीतर आते ही सन्नाटे ने दोबारा उन दोनों को अपनी गिरफ्त में ले लिया।
कैमरे की नाइट विज़न स्क्रीन पर, मैंने देखा
ताऊजी अपनी खाट पर लेटे थे। उन्होंने अपनी बनियान उतार दी थी। उनका वो विशाल, रोएंदार सीना भारी भारी सांसों के साथ ऊपर नीचे हो रहा था। वे बार बार करवटें बदल रहे थे, अपनी आंखें छत पर गड़ाए हुए, अपनी हथेलियों को बार बार भींच रहे थे।
और उधर मास्टर बेडरूम में...
काव्या अपनी नई, सफेद सूती चादर पर लेटी थी।
वो भी सो नहीं पा रही थी।
उसकी दोनों जांघें चादर के भीतर बार बार आपस में रगड़ खा रही थीं। कल रात का वो नशा... वो साढ़े आठ इंच का फौलादी औजार... वो वीर्य का खौलता हुआ लावा... और आज किचन के सिंक पर वो गीला स्पर्श...
सब कुछ काव्या के दिमाग में किसी बवंडर की तरह घूम रहा था।
उसका बदन उस ठंडे बिस्तर पर प्यास से तप रहा था।
अचानक...
काव्या बिस्तर पर उठकर बैठ गई।
उसने साइड टेबल से अपना एंड्रॉइड टैबलेट उठाया।
उसने स्क्रीन अनलॉक की। उसकी उंगलियां बहुत तेजी से ब्राउज़र की तरफ बढ़ीं, और उसने उस गुप्त फोरम पर अपना वही पुराना एकाउंट खोल लिया:
@pinklily_confessions
हैदराबाद के होटल में, मेरे लैपटॉप के प्रॉक्सी कंसोल पर एक हरी बत्ती अचानक ब्लिंक करने लगी!
काव्या ने अपनी तीसरी पोस्ट लिखनी शुरू कर दी थी!
मैंने बदहवास होकर अपने सिगरेट का कश खींचा, अपनी स्क्रीन को फुल साइज़ किया, और काव्या के उस गुप्त डिजिटल कबूलनामे के पन्नों में झांकने के लिए आगे झुक गया...
Chapter 37: शादी की तस्वीर और अनकहा सुलह
हैदराबाद के उस वीरान होटल के कमरे में, एयर कंडीशनर की लगातार सनसनाती आवाज़ के बीच, मैं लैपटॉप की स्क्रीन से एक पल के लिए भी अपनी नज़रें नहीं हटा पा रहा था।
स्क्रीन पर समय शाम के ठीक ६:०५ बजे का था।
फ्लैट ९०३ के बेडरूम के दरवाज़े पर खड़े होकर ताऊजी से गरमा गरम मूंग दाल की खिचड़ी की वो छोटी सी फरमाइश करने के बाद, काव्या ने जैसे ही दरवाज़ा अंदर से बंद किया, उसके पूरे बदन से एक बहुत गहरी, थकी हुई सांस बाहर निकली।
वो कुछ देर तक उसी बंद दरवाज़े की लकड़ी से अपनी पीठ टिकाए खड़ी रही।
उसकी छाती तेज़ तेज़ धड़क रही थी और उसके गोरे गालों पर दिन भर की थकान के बावजूद एक अजीब सी लालिमा तैर रही थी। वो पहल... वो ससुर के सामने झुककर अपनी भूख और मजबूरी का वो इज़हार... काव्या के लिए कोई आसान काम नहीं था। लेकिन उस एक कदम ने घर के भीतर जमी बर्फ की उस मोटी चादर को पिघला दिया था।
रसोई से अब प्रेशर कुकर की पहली सीटी की तीखी, जानी पहचानी आवाज़ गूंजी। साथ ही, देसी घी में कड़कती हींग और जीरे के बघार की सोंधी खुशबू पूरे फ्लैट में तैरने लगी।
काव्या ने अपनी आंखें धीरे से खोलीं।
कमरे के भीतर शाम का हल्का धुंधलका गहराने लगा था। बालकनी की तरफ वाली बड़ी कांच की खिड़की से दूर शहर की ऊंची इमारतों पर जलती पीली नीली बत्तियां चमक रही थीं। काव्या ने अपने दोनों हाथों से अपना बैग ड्रेसिंग टेबल पर रखा, अपने गले का पल्लू ढीला किया और बहुत भारी, लड़खड़ाते कदमों से डबल बेड के सिरहाने की तरफ बढ़ गई।
वो बिस्तर पर बैठने ही वाली थी कि उसकी नज़र अचानक साइड टेबल पर रखे उस चांदी के नक्काशीदार फ्रेम पर पड़ गई।
हमारी शादी की तस्वीर।
काव्या के कदम वहीं के वहीं जम गए।
उसकी सांस हलक में ही अटक कर रह गई।
काव्या ने बहुत धीमी, कांपती उंगलियों से उस फ्रेम को उठाया।
तस्वीर में आठ साल पहले का मैं चेहरे पर भरी जवानी का गुरूर, मूंछों पर ताव और सूट बूट में संवरा हुआ राजेश खिलखिलाकर मुस्कुरा रहा था। और मेरे बगल में, लाल बनारसी सिल्क की भारी साड़ी में सजी, मांग में गहरा सिंदूर भरे और झुकी हुई पलकों के साथ शरमाती हुई बीस साल की काव्या खड़ी थी।
काव्या की उंगलियां उस कांच की ठंडी सतह पर फिसलने लगीं। वो तस्वीर में मुस्कुराते हुए मेरे चेहरे को ऐसे सहला रही थी जैसे कोई मां अपने बिछड़े हुए बच्चे के निशान ढूंढ रही हो।
और फिर...
काव्या की बड़ी बड़ी, कजरारी आंखों के कोरों से आंसुओं की दो मोटी बूंदें अचानक टूटकर सीधे उस फ्रेम के कांच पर गिर पड़ीं।
चरम सुख का वो नशा, जांघों के बीच की वो आग, और ताऊजी के उस विशाल अंग से निकला वो गाढ़ा वीर्य... भले ही वो सब कुछ कल रात मर्यादा की पतली तलवार पर चलकर हुआ था, लेकिन उस संस्कारी, ऊंचे खानदान की बहू के लिए अपनी शादी की तस्वीर का सामना करना मौत की सजा जैसा लग रहा था।
उस तस्वीर में हंसते हुए मेरे मासूम चेहरे को देखकर, काव्या के सीने में अपराधबोध का ऐसा भयानक खंजर घोंप उठा कि उसकी सुबकी निकल गई।
उसने फ्रेम को दोनों हाथों से अपनी छाती से चिपका लिया। उसकी गर्दन झुकी, और उसके सूखे होंठों से एक बहुत ही बेबस, रुआंसी फुसफुसाहट निकली:
"राजेश... मुझे माफ कर देना... हे भगवान, मैं क्या कर बैठी..."
काव्या काफी देर तक उस तस्वीर को सीने से लगाए सिसकती रही।
फिर, जैसे किसी डूबते हुए इंसान को अचानक तिनके का सहारा याद आ जाए, काव्या ने झटके से अपनी आंखें पोंछीं। उसने कांपते हाथों से साइड टेबल पर रखा अपना फोन उठाया।
उसने एक लंबी, गहरी सांस ली, अपनी लड़खड़ाती सांसों को काबू में करने की भरपूर कोशिश की, और फिर स्क्रीन पर मेरे नंबर के डायल बटन पर अपनी उंगली दबा दी।
स्क्रीन पर ये दृश्य देखकर, हैदराबाद के होटल में मेरी छाती का खून बर्फ की तरह जम गया!
तो ये था उस फोन कॉल का सच!
कल रात जब मैं हैदराबाद के होटल में बैठा था और काव्या का वो अजीब, रुआंसा और लड़खड़ाता हुआ फोन आया था... जब उसने मुझसे पूछा था कि क्या मैंने खाना खा लिया, जब उसकी आवाज़ में एक अजीब सा खालीपन था, और जब उसने अचानक फोन पर किस मांगकर झटके से लाइन काट दी थी...
उस वक्त मैं सोच रहा था कि काव्या शराब के नशे में बहक रही थी।
लेकिन आज... इस कैमरे की रिकॉर्डिंग ने उस फोन कॉल की असली, दहला देने वाली हकीकत मेरे सामने खोलकर रख दी थी!
वो फोन कॉल किसी हवस या नशे का नहीं था... वो एक टूटी हुई, पश्चाताप की आग में जलती हुई पतिव्रता पत्नी की वो आखिरी, बेबस चीख थी जो अपने पति की आवाज़ सुनकर अपने भीतर के पाप को मिटा देना चाहती थी!
वीडियो में, काव्या फोन को कान से सटाए खड़ी थी।
"हेलो... राजेश?" काव्या की आवाज़ में वही कांपती हुई, भीगी मिठास थी जिसे मैंने कल रात फोन पर सुना था।
"हाँ राजेश... आपने खाना खा लिया? आपकी तबियत तो ठीक है ना?"
काव्या बात करते करते अपनी दूसरी हथेली से अपने गालों पर बहते आंसुओं को पोंछ रही थी। वो अपनी आवाज़ में बनावटी खिलखिलाहट भरने की पूरी कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी सांसों की टूटन और पलकों की कंपकंपी साफ बता रही थी कि उसका दिल अंदर से चीत्कार कर रहा था।
"मुझे... मुझे बस आपकी आवाज़ सुननी थी राजेश... आप बहुत याद आ रहे हैं..."
काव्या ने भरे गले से कहा था, और फिर बहुत ही शर्मीले, रोते हुए अंदाज़ में उसने मुझसे एक वर्चुअल किस मांगी थी:
"एक बार... एक बार फोन पर मुझे वो किस दे दीजिए ना..."
और उधर हैदराबाद में बैठे मैंने फोन पर एक लंबी किस की आवाज़ निकाली थी।
लेकिन ठीक उसी सेकंड
स्क्रीन पर, मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा अचानक हल्के से खुला!
"बहू..."
ताऊजी की भारी, खुरदरी और गंभीर आवाज़ कमरे के सन्नाटे में गूंजी। ताऊजी अपनी सफेद सूती बनियान और घुटनों तक बंधी धोती में चौखट पर खड़े थे। उनके हाथ में एक साफ किचन नैपकिन था जिससे वे अपने हाथ पोंछ रहे थे:
"बहू, खिचड़ी तैयार हो गई है... गरमा गरम है, बाहर आकर खा ले।"
ताऊजी की आवाज़ सुनते ही, बिस्तर के पास खड़ी काव्या के पूरे बदन में करंट दौड़ गया!
उसका चेहरा खौफ और घबराहट से एक पल में सफेद पड़ गया।
उसने बिना एक सेकंड की देरी किए, बदहवास होकर अपने फोन की लाल स्क्रीन पर उंगली दबा दी और कॉल झटके से काट दिया!
हैदराबाद के होटल में बैठा मैं अवाक रह गया।
तो इस वजह से काव्या ने वो कॉल काटा था!
मैं कल रात सोच रहा था कि काव्या ने मुझे कोई संकेत दिया था, या शायद नेटवर्क चला गया था... लेकिन असलियत ये थी कि ऐन वक्त पर ताऊजी के कमरे में दाखिल होने से वो ऐसी घबरा गई थी जैसे कोई चोर रंगे हाथों पकड़ा गया हो!
काव्या ने बिजली की फुर्ती से अपना फोन तकिए के नीचे छिपाया। उसने झटके से अपनी पीठ ताऊजी की तरफ मोड़ी और अपनी दोनों हथेलियों से अपने आंसुओं को बेरहमी से रगड़कर पोंछ डाला।
उसने अपनी साड़ी के पल्लू को सलीके से अपने सीने पर लपेटा, एक गहरी सांस भरकर खुद को संभाला, और फिर बहुत सहज बनने का नाटक करते हुए मुड़ी:
"हाँ... हाँ ताऊजी, बस आ ही रही थी। हाथ मुँह धो रही थी।"
काव्या की आवाज़ में अभी भी एक हल्की सी कंपकंपी थी, लेकिन ताऊजी ने शायद उस पर ध्यान नहीं दिया या फिर उन्होंने देखकर भी अनदेखा कर दिया।
ताऊजी ने अपनी नज़रें बहुत अदब से ज़मीन पर झुका रखी थीं।
"चल, ठंडी हो जाएगी तो स्वाद नहीं रहेगा।" ताऊजी ने धीमी आवाज़ में कहा, और मुड़कर डाइनिंग एरिया की तरफ बढ़ गए।
काव्या ने एक पल के लिए उस खाली चौखट को देखा, अपनी साड़ी की सिलवटें ठीक कीं, और फिर दबे पाँव कमरे से बाहर निकल आई।
डाइनिंग टेबल पर पसरा हुआ वो सन्नाटा किसी भारी, दमघोंटू कोहरे की तरह था।
हॉल में सिर्फ छत के पंखे की मद्धम, घरघराती आवाज़ गूंज रही थी और टेबल के ऊपर लटके वॉर्म व्हाइट पेंडेंट लैंप का पीला उजाला दोनों की थालियों पर पड़ रहा था।
टेबल पर दो भारी पीतल की थालियां सजी थीं।
थालियों के बीचों बीच, भाप उड़ाती हुई सुनहरी मूंग दाल की पतली खिचड़ी परोसी हुई थी, जिसके ऊपर ताऊजी ने गांव के शुद्ध देसी घी का एक एक बड़ा चम्मच पिघलाकर डाला था। घी की वो तीखी, सोंधी महक पूरे कमरे में फैली हुई थी। बगल में घर का बना आम का तीखा अचार और तवे पर सेके हुए दो पापड़ रखे थे।
काव्या और ताऊजी आमने सामने की कुर्सियों पर बैठे थे।
शुरुआत के दस मिनट तक, पूरे कमरे में सिर्फ चम्मचों के पीतल की थाली से टकराने की हल्की सी खनक और खिचड़ी के घूंट भरने की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं था।
काव्या अपनी नज़रें पूरी तरह अपनी थाली पर गड़ाए बैठी थी। उसने दिन भर से कुछ नहीं खाया था, लेकिन हर निवाला उसके गले में कांटे की तरह अटक रहा था। वो चम्मच को बहुत धीमे धीमे चला रही थी, जैसे सिर्फ खाने का नाटक कर रही हो।
और उधर सामने बैठे ताऊजी की हालत भी कुछ अलग नहीं थी।
वे ५६ साल के फौलादी पहलवान, जो आम तौर पर चार चार रोटियां एक सांस में निगल जाते थे, आज खिचड़ी के छोटे छोटे टुकड़े अपनी उंगलियों से ऐसे तोड़ रहे थे मानो कोई मुजरिम अपनी आखिरी खुराक ले रहा हो।
ताऊजी बार बार अपनी भारी पलकें उठाते, काव्या के झुके हुए, मुरझाए चेहरे को एकटक देखते, और फिर एक गहरी सांस भरकर अपनी नज़रें वापस थाली पर टिका लेते।
उनके चेहरे पर एक भयानक कशमकश, एक अनकही बेचैनी साफ झलक रही थी। वे कुछ बोलना चाहते थे... उनके सूखे होंठ दो बार हिले, लेकिन आवाज़ गले में ही घुटकर रह गई।
आखिरकार, जब काव्या की थाली आधी खाली हो चुकी थी, तो ताऊजी से रहा नहीं गया।
ताऊजी ने बहुत आहिस्ता से अपनी चम्मच थाली के किनारे टिका दी।
उन्होंने एक गहरा घूंट भरा। अपनी भारी, खुरदरी हथेलियों को टेबल के किनारे पर जमाया, और फिर बहुत ही रुंधे हुए, भरभराए गले से बोले:
"बहू..."
वो एक पुकार...
डाइनिंग टेबल के उस सन्नाटे में जैसे कोई गहरा सन्नाटा और खिंच गया।
काव्या के हाथ में पकड़ी चम्मच वहीं की वहीं हवा में ठहर गई।
काव्या ने अपनी पलकें नहीं उठाईं। उसकी सांसें तेज़ हो गईं, और उसके कान शर्म और घबराहट की लाली से तपने लगे।
ताऊजी ने अपनी नज़रें काव्या की झुकी हुई पलकों पर टिकाईं। उनकी सांवली, झुर्रियों भरी आंखों में एक ऐसा गहरा, सच्चा दर्द और पश्चाताप तैर रहा था जिसे देखकर किसी भी इंसान का कलेजा पसीज जाए:
"बहू... कल रात जो कुछ भी हुआ... मैं हाथ जोड़कर तुझसे माफी मांगता हूँ।"
ताऊजी की भारी, मर्दाना आवाज़ में इतनी थरथराहट थी कि ऐसा लग रहा था मानो वो बूढ़ा शेर अपने ही आंसुओं के बोझ तले दबकर टूट चुका हो।
"कल रात... शराब के नशे में मुझसे बहुत भारी भूल हो गई बहू। मुझे अपनी मर्यादा, अपनी उम्र और अपने रिश्ते का ज़रा भी होश नहीं रहा। तू... तू उस बात को अपने दिल पर बोझ मत बनाना। उसे बस एक बहुत बुरा सपना समझकर भूल जाना मेरी बच्ची। भगवान साक्षी है... तेरा ये ताऊ अपनी इस मनहूस देह को आगे कभी तेरी तरफ नहीं बढ़ाएगा। ऐसी हरकत मैं अपनी ज़िंदगी में दोबारा कभी नहीं करूँगा..."
ताऊजी के मुंह से निकले उन एक एक लफ्जों ने काव्या के सीने में जैसे किसी ने खौलता हुआ तेल उड़ेल दिया हो!
काव्या का पूरा बदन थर थर कांप उठा।
उसने एक झटके में अपनी चम्मच थाली में छोड़ दी। चम्मच के गिरने से पीतल पर एक तीखी झनझनाहट हुई।
काव्या ने अपनी बड़ी बड़ी, भीगी हुई कजरारी आंखें उठाईं और सीधे ताऊजी के चेहरे में देखा। उसकी आंखों में कोई गुस्सा नहीं था... एक ऐसी अंधी, तड़पती हुई बेबसी और अपनापन था जिसने उस कमरे की हवा को और ज्यादा भारी बना दिया।
"ताऊजी... आप... आप ये कैसी बातें कर रहे हैं?!" काव्या की आवाज़ रुआंसी हो गई, उसके होंठ बुरी तरह कांप रहे थे।
"मैंने... मैंने कब आपको दोषी ठहराया ताऊजी? कल रात बिस्तर पर... क्या हमारी बात नहीं हुई थी? क्या मैंने आपके आगे हाथ नहीं जोड़े थे कि आप खुद को पापी मत समझिए?"
काव्या ने एक लंबी, लड़खड़ाती सांस खींची, उसकी आंखों से दो आंसू छलक कर उसके गालों पर बह निकले:
"सच तो ये है ताऊजी... कि कसूरवार आप नहीं हैं। कसूर हमारा है। मैंने और राजेश ने कभी आपकी उस खामोशी को, आपके उस अकेलेपन को समझने की कोशिश ही नहीं की। जब से माँ जी का देहांत हुआ... आपने अपने अनाथ भतीजे को पालने के लिए अपनी पूरी जवानी कुंवारे रहकर होम कर दी। कभी अपनी कोई ख्वाहिश ज़ाहिर नहीं की, कभी एक पैसे का लालच नहीं किया। और हम... हम अपनी दुनिया में, अपने बुटीक और दफ्तर के कामों में इतने मशगूल रहे कि हमें अंदाज़ा ही नहीं हुआ कि इस बुढ़ापे में एक भरे पूरे मर्द का दिल अंदर से कितना सूना और तन्हा होता है!"
काव्या ने अपनी दोनों हथेलियां टेबल पर आगे बढ़ाईं, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा रूहानी खिंचाव था:
"कल रात जो हुआ... वो कोई पाप नहीं था ताऊजी। मैं कोई गैर औरत नहीं हूँ, आपकी अपनी बहू हूँ। अगर मेरी वजह से आपकी उस ढलती उम्र की थोड़ी सी तकलीफ दूर हो गई, अगर आपके सीने का वो बोझ थोड़ा हल्का हो गया... तो इसमें कौन सा अनर्थ हो गया? मैंने कल भी कहा था और आज भी कह रही हूँ... आगे भी जब कभी आपको ज़रूरत महसूस हो, आपकी ये बहू बिना किसी झिझक के आपकी सेवा के लिए हाज़िर रहेगी..."
काव्या के होंठों से निकले उन शब्दों को सुनकर
ताऊजी का चेहरा अविश्वास, दर्द और एक गहरी आत्मग्लानि से भर गया।
उन्होंने बहुत आहिस्ता से अपने दोनों हाथ उठाए, और काव्या के सामने जोड़ लिए:
"नहीं बहू... ऐसा मत कह। तू बहुत भली है, बहुत नेक दिल है... पर मैं जानता हूँ कि तू अपने दिल पर कितना बड़ा पत्थर रखकर ये सब कह रही है।"
ताऊजी की आंखों से आंसुओं की दो मोटी धारें निकलकर उनकी सफेद दाढ़ी में गुम होने लगीं:
"मैंने दिन भर... उस खाली कमरे में बैठकर सिर्फ और सिर्फ इसी बात के बारे में सोचा है बहू। जब तक कोई बहुत बड़ा अनर्थ नहीं हुआ है... जब तक वो आखिरी मर्यादा बची हुई है... तब तक इस भूल को सुधारा जा सकता है।"
ताऊजी ने रुककर एक गहरी सांस भरी, उनकी आवाज़ में एक पिता का बेइंतहा दर्द छलक उठा:
"और अभी... जब मैं तुझे खाने के लिए बुलाने तेरे बेडरूम में आया था ना बहू... तो मैंने तुझे उस शादी की तस्वीर को सीने से लगाकर रोते देखा था।"
ताऊजी के मुंह से ये बात निकलते ही
काव्या का चेहरा एक पल में बिल्कुल सुन्न पड़ गया!
उसकी सांसें जहां की तहां थम गईं। वो फटी आंखों से ताऊजी को देखने लगी।
"मेरा कलेजा अंदर तक फट गया बहू," ताऊजी ने भरभराए गले से कहा, "जब मैंने तुझे राजेश की तस्वीर के आगे रोते देखा... तो मुझे समझ आ गया कि मैं क्या करने जा रहा था। मैं अपने उस अनाथ बच्चे के सुहाग पर डाका डालने चला था जिसने मुझे भगवान से बढ़कर माना है! मैं नहीं चाहता बहू कि मेरी इस बूढ़ी हवस की वजह से तेरी ये पवित्र मांग सूनी हो जाए, या तेरे चेहरे की ये मुस्कान हमेशा के लिए छिन जाए। मैं ऐसा पाप अपने सिर लेकर मरना नहीं चाहता!"
ताऊजी ने टेबल पर अपना सिर थोड़ा झुका लिया:
"राजेश मेरा बच्चा है बहू। वो जैसा भी है, लाचार है, बीमार है... पर वो तेरा सुहाग है। और तू इस घर की इज़्ज़त है। जो कुछ कल रात हुआ, उसे हम दोनों यहीं दफन कर देंगे। हम दोबारा उसी तरह रहेंगे जैसे पहले रहते थे एक ससुर और एक संस्कारी बहू की तरह। तू बस... तू बस मुझे माफ कर देना मेरी बच्ची।"
ताऊजी के उस एकतरफा, अटल फैसले ने
हैदराबाद के उस होटल के कमरे में बैठे मेरे पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया!
मेरी रीढ़ की हड्डी में बर्फ की एक ठंडी सनसनाहट दौड़ गई।
नहीं! ऐसा नहीं हो सकता!
मेरे दिमाग की नसें पागलों की तरह फड़कने लगीं। मेरी हथेलियों में पसीना छूट गया।
अगर ताऊजी इस तरह पीछे हट गए... अगर उन्होंने मर्यादा का ये ढोंग दोबारा ओढ़ लिया... तो मेरी ये सारी साज़िश, मेरी महीनों की मेहनत और मेरी वो वहशी वोयूरिस्टिक भूख एक झटके में खाक में मिल जाएगी!
मैं अपनी कुर्सी पर आगे झुक गया। स्क्रीन पर ताऊजी का वो झुका हुआ सिर मुझे किसी मुजरिम का नहीं, बल्कि मेरे अपने खेल को बिगाड़ने वाले एक दुश्मन का लग रहा था!
और उधर स्क्रीन पर...
काव्या ने ताऊजी के उस दर्द भरे इक़रार को सुना।
उसकी आंखों में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। उसकी पलकों के कोनों में एक बहुत बारीक, अनकही मायूसी की हल्की सी परछाईं कौंधी वो मायूसी जो किसी औरत के चेहरे पर तब आती है जब उसे मिलने वाली वो पहली, अंधी संतुष्टि अचानक उससे दोबारा छीन ली जाती है।
लेकिन साथ ही... उसके दिल के किसी कोने में एक हल्की सी राहत भी थी। उसके पति का हक, उसकी मर्यादा बच गई थी।
काव्या ने कुछ पल तक अपनी कांपती उंगलियों को देखा, फिर अपनी भीगी पलकें उठाकर बहुत ही धीमी, आज्ञाकारी आवाज़ में कहा:
"ठीक है ताऊजी... जैसा आप ठीक समझें। अगर आपको इसी में सुकून मिलता है... तो मैं आपकी बात मानूंगी। बस... आप इस बात को लेकर अपनी सेहत मत बिगाड़िए। खाना ठंडा हो रहा है, खा लीजिए।"
ताऊजी ने एक बहुत ही भारी, ठंडी सांस भरी। उनके चेहरे पर छाई वो भयानक बेचैनी थोड़ी शांत हुई। उन्होंने अपनी चम्मच दोबारा उठाई और बहुत धीरे धीरे खिचड़ी खाने लगे।
कमरे में दोबारा वही सन्नाटा छा गया... लेकिन इस बार, उस सन्नाटे में कल रात वाली कड़वाहट नहीं थी।
उसमें एक अनकहा, गहरा और पवित्र सुलहनामा था।
रात के करीब पौने नौ बज रहे थे।
डिनर खत्म हो चुका था। दोनों ने मिलकर डाइनिंग टेबल से खाली थालियां और कटोरियां समेटीं।
काव्या थालियां लेकर रसोई की तरफ बढ़ी, लेकिन तभी ताऊजी भी उसके पीछे पीछे किचन में आ गए।
"बहू, तू हट... तू बुटीक में थकी है। बर्तन मैं धो देता हूँ," ताऊजी ने बड़े अधिकार से कहा और सिंक की तरफ हाथ बढ़ाया।
"अरे नहीं ताऊजी! कैसी बातें करते हैं आप?" काव्या ने चौंककर थालियां सिंक में रखीं और ताऊजी के आगे आ गई, "ससुर होकर आप मेरे जूठे बर्तन धोएंगे? मुझे पाप का भागीदार मत बनाइए। आप जाइए, हॉल में आराम कीजिए।"
"तू भी तो मेरी बेटी जैसी है बहू, इसमें पाप कैसा?" ताऊजी ने हंसने की नाकाम कोशिश की और विम बार का साबुन उठाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
काव्या ने भी उसी पल साबुन उठाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया
और ठीक उसी सेकंड...
किचन के उस तंग, चिकने स्लैब पर... सिंक के बहते नल के ठीक नीचे...
काव्या की गोरी, मुलायम और लोशन से महकती उंगलियां सीधे ताऊजी की उस विशाल, खुरदरी और अखाड़े की मिट्टी से पकी गर्म हथेली से टकरा गईं!
सरर्र...!
एक बिजली का भयानक, नशीला झटका दोनों के जिस्मों में एक साथ दौड़ा!
पानी की ठंडी धार उन दोनों के जुड़े हुए हाथों पर गिर रही थी, लेकिन उस छुअन में जो आग थी, उसने पानी की ठंडक को एक सेकंड में भाप बना दिया!
दोनों के हाथ वहीं के वहीं जम गए।
न काव्या ने अपना हाथ पीछे खींचा, और न ही ताऊजी अपनी हथेली हटा पाए।
काव्या की सांसें एक झटके में उखड़ गईं। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर नीचे होने लगी, और उसकी गर्दन से लेकर उसके कानों तक एक गहरा, धधकता हुआ सिंदूरी रंग फैल गया। उसने अपनी पलकें झुका लीं, लेकिन उसकी उंगलियों में जो कंपकंपी थी, वो ताऊजी की पकड़ में साफ महसूस हो रही थी।
और ताऊजी...
उस छप्पन साल के पहलवान की सांसें भी धौंकनी की तरह चलने लगीं।
उनकी जो उंगलियां अभी टेबल पर संन्यास लेने की कसमें खा रही थीं... वे उंगलियां काव्या के उस मखमली, नाजुक मांस के स्पर्श पर बेकाबू होकर हल्की सी भींच उठीं! उन्होंने एक सेकंड के लिए काव्या की उस गोरी हथेली को अपनी मुट्ठी में दबाया मानो वे उस छुअन के जादू को हमेशा के लिए अपनी नसों में कैद कर लेना चाहते हों।
कमरे में सिर्फ नल से गिरते पानी की छप छप आवाज़ गूंज रही थी।
कुछ सेकंड तक दोनों उसी तरह बुत बने खड़े रहे।
फिर, ताऊजी को जैसे अचानक अपनी मर्यादा का होश आया। उन्होंने बहुत ही घबराकर, लगभग झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया।
ताऊजी ने अपनी मुट्ठी को अपनी जांघ पर कसकर दबाया, जैसे वे अपनी ही हथेली से उठती उस आग को दबाने की कोशिश कर रहे हों। उनका चेहरा शर्म से लाल पड़ चुका था।
"त... तू ही धो ले बहू। मैं... मैं बाहर हॉल में हूँ," ताऊजी ने लड़खड़ाती जुबान से कहा।
वे एक पल भी वहां नहीं रुके। वे तेज़ी से मुड़े और लंबे लंबे कदम भरते हुए किचन से बाहर निकलकर सीधे लिविंग रूम के सोफे पर जाकर बैठ गए।
उधर किचन में, काव्या सिंक के सहारे खड़ी हांफ रही थी।
उसकी हथेली अभी भी उसी जगह से तप रही थी जहां ताऊजी की खुरदरी त्वचा ने उसे छुआ था।
काव्या के होंठों पर एक बहुत ही धीमी, कांपती हुई मुस्कान बिखर गई।
ताऊजी चाहे जितना भी खुद को रोक लें... लेकिन इस जिस्म की प्यास अब किसी उसूल की मोहताज नहीं रही थी।
काव्या ने नल बंद किया, साबुन लगाया और बहुत तसल्ली से बर्तनों को धोकर स्टैंड पर सजा दिया।
बर्तन धोने के बाद, आम तौर पर काव्या का नियम था कि वो सीधे अपने मास्टर बेडरूम में चली जाती थी, दरवाज़ा बंद करके अपने टैबलेट में खो जाती थी या सो जाती थी।
लेकिन आज...
रसोई की लाइट बंद करके जब काव्या बाहर निकली, तो वो बेडरूम की तरफ नहीं गई।
वो धीरे धीरे कदमों से चलकर सीधे लिविंग रूम में आई।
सोफे पर ताऊजी बैठे थे। उनके हाथ में टीवी का रिमोट था और स्क्रीन पर कोई पुराना हिंदी पारिवारिक धारावाहिक चल रहा था। ताऊजी टीवी की स्क्रीन को ऐसे घूर रहे थे जैसे बहुत ध्यान से देख रहे हों, लेकिन उनकी खिंची हुई भौहें और माथे की लकीरें साफ बता रही थीं कि उनका ध्यान कहीं और ही भटका हुआ था।
काव्या ने कुछ पल तक ताऊजी के उस विशाल, गठीले साए को देखा।
फिर, बिना किसी झिझक के, काव्या आगे बढ़ी और ताऊजी जिस बड़े एल शेप सोफे पर बैठे थे, उसी सोफे के दूसरे कोने पर उनसे बमुश्किल दो फीट की दूरी पर आकर बैठ गई!
काव्या के बैठते ही सोफे का गद्देदार स्पंज हल्का सा दबा।
ताऊजी का पूरा बदन एक झटके में सतर्क होकर सीधा हो गया। उन्होंने चौंककर अपनी गर्दन मोड़ी।
काव्या ने पल्लू को बहुत सलीके से अपनी गोद में समेट रखा था। उसके चेहरे पर अब न कोई खौफ था, न कोई घबराहट। उसकी बड़ी बड़ी आंखों में एक ऐसी घरेलू सहजता और अपनापन था जो पिछले आठ सालों में कभी देखने को नहीं मिला था।
"ताऊजी... ये क्या देख रहे हैं आप?" काव्या ने बहुत ही मीठे, खनकते लहजे में पूछा, "इस सास बहू के ड्रामे में आपको क्या समझ आ रहा है?"
ताऊजी का मुंह खुला का खुला रह गया।
वे हकलाने लगे:
"अ... अरे कुछ नहीं बहू, बस ऐसे ही चैनल बदल रहा था... रिमोट की समझ नहीं आ रही थी मुझे।"
काव्या के होंठों पर एक बहुत ही प्यारी, नटखट मुस्कान खिल उठी।
"दीजिए मुझे रिमोट," काव्या ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
ताऊजी ने संकोच से रिमोट उसकी हथेली पर रख दिया। जब रिमोट बदला, तो काव्या की उंगलियों ने जानबूझकर ताऊजी के अंगूठे को बहुत हल्के से छुआ। ताऊजी के बदन में फिर एक हल्की सी सिहरन दौड़ी, लेकिन इस बार वे पीछे नहीं हटे।
काव्या ने चैनल बदलकर एक पुरानी हिंदी कॉमेडी फिल्म लगा दी।
अगले एक घंटे तक... फ्लैट ९०३ के लिविंग रूम का नज़ारा ऐसा था जिसकी मैंने अपने सबसे जंगली सपनों में भी उम्मीद नहीं की थी।
वे दोनों साथ बैठकर टीवी देख रहे थे।
शुरुआत में ताऊजी थोड़े झिझक रहे थे, लेकिन जब फिल्म का कोई मज़ाकिया सीन आया और काव्या खिलखिलाकर हंस पड़ी, तो ताऊजी की मूंछों के नीचे भी एक चौड़ी, बेपरवाह हंसी फूट पड़ी।
हंसते हंसते जब ताऊजी ने गांव के किसी पुराने किस्से का ज़िक्र करते हुए काव्या को छेड़ा, तो काव्या ने बिना किसी संकोच के, बड़े लाड़ और अधिकार से अपनी नाज़ुक हथेली से ताऊजी के उस फौलादी, रोएंदार बाइसेप पर एक हल्की सी चपत मार दी:
"धत्त ताऊजी! आप भी ना... कुछ भी बोलते हैं!"
उस एक चपत ने...
उस एक स्पर्श ने उस घर की सारी सदियों पुरानी मर्यादाओं को एक मखमली चादर में लपेटकर किनारे रख दिया था!
ससुर और बहू के बीच की वो औपचारिक, ठंडी और डरावनी दीवार हमेशा के लिए ढह चुकी थी। अब उनके बीच कोई डर नहीं था। अब उनके बीच एक ऐसा अनकहा, मीठा और घरेलू रिश्ता पनप चुका था जिसमें हवस भी थी, अपनापन भी था, और एक दूसरे के जिस्म की भूख का गहरा, मौन इक़रार भी!
हैदराबाद के उस होटल में, लैपटॉप की नीली स्क्रीन के सामने बैठा मैं अपनी उंगलियों से अपनी दाढ़ी सहला रहा था।
मेरे होंठों पर एक बहुत ही शातिर, संतुष्ट मुस्कान तैर गई।
शिकार जाल से बाहर नहीं गया था... वो तो बस जाल के धागों को और मजबूत कर रहा था!
ताऊजी ने भले ही खुद को रोक लिया था, लेकिन काव्या अब उस दहलीज को पार कर चुकी थी जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है। उसने ताऊजी के दिल में अपनी जगह बना ली थी। और एक बार जब किसी औरत का मन किसी मर्द के आगे खुल जाता है... तो उसके जिस्म के दरवाज़े खुलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता!
रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे।
फिल्म खत्म हुई।
ताऊजी सोफे से उठे। उन्होंने एक लंबी, सुकून भरी अंगड़ाई ली।
"चल बहू... बहुत रात हो गई है। तू भी सो जा, दिन भर की थकी है।" ताऊजी ने बहुत ही अपनेपन और गर्मजोशी से कहा। उनकी आंखों में अब वो पुराना अपराधबोध नहीं था... एक गहरा, पिता समान दुलार और एक मर्द का अनकहा आकर्षण साफ चमक रहा था।
"जी ताऊजी... शुभ रात्रि। आप भी आराम कीजिए," काव्या ने उठकर बहुत सलीके से कहा।
दोनों अपने अपने कमरों की तरफ बढ़ गए।
ताऊजी ने अपने गेस्ट रूम का दरवाज़ा बंद कर लिया, और काव्या अपने मास्टर बेडरूम में दाखिल हो गई।
लेकिन...
कमरे के भीतर आते ही सन्नाटे ने दोबारा उन दोनों को अपनी गिरफ्त में ले लिया।
कैमरे की नाइट विज़न स्क्रीन पर, मैंने देखा
ताऊजी अपनी खाट पर लेटे थे। उन्होंने अपनी बनियान उतार दी थी। उनका वो विशाल, रोएंदार सीना भारी भारी सांसों के साथ ऊपर नीचे हो रहा था। वे बार बार करवटें बदल रहे थे, अपनी आंखें छत पर गड़ाए हुए, अपनी हथेलियों को बार बार भींच रहे थे।
और उधर मास्टर बेडरूम में...
काव्या अपनी नई, सफेद सूती चादर पर लेटी थी।
वो भी सो नहीं पा रही थी।
उसकी दोनों जांघें चादर के भीतर बार बार आपस में रगड़ खा रही थीं। कल रात का वो नशा... वो साढ़े आठ इंच का फौलादी औजार... वो वीर्य का खौलता हुआ लावा... और आज किचन के सिंक पर वो गीला स्पर्श...
सब कुछ काव्या के दिमाग में किसी बवंडर की तरह घूम रहा था।
उसका बदन उस ठंडे बिस्तर पर प्यास से तप रहा था।
अचानक...
काव्या बिस्तर पर उठकर बैठ गई।
उसने साइड टेबल से अपना एंड्रॉइड टैबलेट उठाया।
उसने स्क्रीन अनलॉक की। उसकी उंगलियां बहुत तेजी से ब्राउज़र की तरफ बढ़ीं, और उसने उस गुप्त फोरम पर अपना वही पुराना एकाउंट खोल लिया:
@pinklily_confessions
हैदराबाद के होटल में, मेरे लैपटॉप के प्रॉक्सी कंसोल पर एक हरी बत्ती अचानक ब्लिंक करने लगी!
काव्या ने अपनी तीसरी पोस्ट लिखनी शुरू कर दी थी!
मैंने बदहवास होकर अपने सिगरेट का कश खींचा, अपनी स्क्रीन को फुल साइज़ किया, और काव्या के उस गुप्त डिजिटल कबूलनामे के पन्नों में झांकने के लिए आगे झुक गया...



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