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Adultery Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej
#36
==devnagari==

अध्याय 36: भोर की धुलाई और रसोई का सुलह

हैदराबाद के उस होटल के कमरे में, मैंने कांपती उंगलियों से स्पेसबार दबाकर वीडियो को पॉज कर दिया।

स्क्रीन पर काव्या का वॉशरूम की तरफ जाता हुआ थका, लड़खड़ाता साया जम गया था।

मैंने अपनी पैंट की जेब से सिगरेट की डिब्बी निकाली और एक सिगरेट सुलगा ली।

गहरा कश खींचकर मैंने धुएं को होटल की ठंडी, एयर कंडीशंड हवा में छोड़ दिया। मेरा पूरा बदन पसीने से भीगा हुआ था, और दिल किसी धौंकनी की तरह धड़क रहा था।

जो कुछ मैंने अभी अभी अपनी आंखों से देखा था... उसने मेरे भीतर के सारे वजूद को हिलाकर रख दिया था।

एक तरफ, मेरे मन के किसी कोने में एक हल्की सी मायूसी थी एक विकृत, छिछोरी चाहत कि काश बात उस आखिरी हद तक पहुंच जाती, काश ताऊजी का वो साढ़े आठ इंच का दानव काव्या के भीतर उतर जाता।

लेकिन दूसरी तरफ... मेरे कलेजे पर जैसे किसी ने बर्फ की ठंडी सिल्ली रख दी थी।

एक बेपनाह, नशीली राहत!

काव्या ने मुझे धोखा नहीं दिया था। उसने मेरे हक को, हमारे सात फेरों की मर्यादा को अपने सीने से लगाकर बचा लिया था। उसने ताऊजी के उस बेकाबू तूफान के आगे अपना जिस्म जरूर परोस दिया, लेकिन उस आखिरी दरवाजे पर उसने ताला जड़ दिया था।

और ताऊजी... वो छप्पन साल का विशालकाय पहलवान, जिसने अपनी पूरी जिंदगी मेरे नाम कर दी थी, आज अपनी ढलती उम्र में उस अनजानी भूख से राहत पा चुका था।

काव्या ने बिल्कुल सच कहा था जब तक ये बात इस घर की चारदीवारी में दफन है, और जब तक ये बात मुझ तक नहीं पहुंचती, तब तक इस गुप्त समझौते ने इस परिवार को टूटने से बचा लिया था। बाहर किसी गैर मर्द के चक्कर में पड़ने से लाख गुना बेहतर था कि काव्या की शारीरिक भूख और ताऊजी की तड़प घर के भीतर ही, बिना मर्यादा तोड़े शांत हो जाए।

मेरी योजना... अनजाने में ही सही, लेकिन एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी थी जिसकी मैंने कभी उम्मीद भी नहीं की थी।

मैंने सिगरेट को ऐशट्रे में मसला, और दोबारा स्पेसबार दबाकर वीडियो प्ले कर दिया।

स्क्रीन पर समय तड़के के ३:३० बज रहे थे।

काव्या वॉशरूम से नहा धोकर बाहर निकली थी। उसके बाल गीले थे और उसने एक सादी, सूती नाइटी पहन रखी थी।

वो बेडरूम में आई, और कुछ पल तक बिस्तर के किनारे खड़े होकर उस हरी चादर को एकटक देखती रही।

चादर के बीचों बीच, ताऊजी के वीर्य और उसके अपने काम रस के बड़े बड़े, चिपचिपे सफेद धब्बे सूखने लगे थे।

काव्या के कांपते हाथों ने चादर के कोनों को गद्दे के नीचे से खींचना शुरू किया।

उसकी उंगलियां थरथरा रही थीं।

अचानक... उसके बिखरे गीले बालों के बीच से, आंसुओं की दो मोटी बूंदें टूटकर सीधे उस गंदी चादर पर गिरीं।

चरम सुख का वो नशा उतरते ही, काव्या का होश में आया मन आत्मग्लानि और अपराधबोध के बोझ तले दब चुका था। भले ही उसने पेनेट्रेशन नहीं होने दिया था, लेकिन जो कुछ हुआ था, वो एक संस्कारी भारतीय बहू के लिए किसी भयानक पाप से कम नहीं था।

वो चादर समेटते हुए सुबक रही थी।

आम तौर पर जिस चादर को बदलने में दो मिनट लगते हैं, उसे समेटने में काव्या को पंद्रह मिनट लग गए।

उसने उस भारी, वीर्य से लथपथ सूती चादर को अपनी बाहों में समेटा, और दबे पांव बेडरूम से निकलकर फ्लैट की यूटिलिटी बालकनी की तरफ बढ़ गई।

कैमरे के नाइट विजन में मैंने देखा

रात के सन्नाटे में, बालकनी के नल से ठंडा पानी बह रहा था।

काव्या ने चादर को टब में डाला और उस पर खुशबूदार सर्फ और साबुन रगड़ने लगी। वो अपने दोनों हाथों से उस हिस्से को बार बार मल रही थी जहाँ ताऊजी का वीर्य गिरा था।

वो जितनी तेजी से उस दाग को धो रही थी, उतनी ही तेजी से उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। मानो वो सिर्फ उस कपड़े को नहीं, बल्कि अपने दामन पर लगे उस गुप्त दाग को भी धोकर मिटा देना चाहती थी।

सुबह का सूरज निकलने से पहले, उस सबूत को पूरी तरह मिटा देना जरूरी था।

कपड़े को अच्छी तरह निचोड़कर, उसने उसे बालकनी की सूखने वाली रस्सी पर फैला दिया।

जब वो वापस बेडरूम में आई, तो उसने अलमारी से एक बिल्कुल नई, सफेद चादर निकाली और उसे गद्दे पर सलीके से बिछा दिया।

कमरा अब बिल्कुल साफ था... लेकिन काव्या के चेहरे का रंग उड़ चुका था।

वो बिस्तर के किनारे बैठी, टिशू से अपनी बहती नाक और आंसू पोंछती रही। उसका रोना थमने का नाम नहीं ले रहा था। उसके गोरे कंधे हिचकियों से कांप रहे थे।

स्क्रीन पर अपनी पत्नी की उस बेबसी को देखकर, हैदराबाद के उस होटल में मेरा दिल भी तड़प उठा।

क्या मैंने ये सब करके सही किया? क्या मेरी इस हवस ने मेरी मासूम काव्या की आत्मा को हमेशा के लिए घायल कर दिया?

मैंने अनजाने में ही अपना हाथ लैपटॉप की स्क्रीन पर बढ़ा दिया, काव्या के आंसुओं को पोंछने के लिए... लेकिन वहां सिर्फ कांच की ठंडी सतह थी।

काव्या कुछ देर रोती रही। फिर उसकी नजर साइड टेबल पर रखे हमारे शादी के फ्रेम पर पड़ी।

वो उठी। उसने बहुत ही भीगे, कांपते हाथों से कांच के फ्रेम में मुस्कुराते हुए मेरे चेहरे को छुआ।

उसकी आंखों में बेइंतहा प्यार, पश्चाताप और एक गहरा, असहनीय दर्द था। मानो वो उस तस्वीर से माफी मांग रही हो:

राजेश... मुझे माफ कर देना...

तस्वीर को अपने सीने से लगाकर कुछ पल रोने के बाद, काव्या ने उसे वापस टेबल पर रखा।

वो निढाल होकर बिस्तर पर लेट गई।

वो उस तरफ खिसक गई जहाँ मैं सोया करता था। उसने उस खाली तकिए पर अपना सिर रखा, और मेरी खाली जगह को अपनी बाहों में समेट लिया। अपने पति की उस काल्पनिक मौजूदगी में, वो धीरे धीरे सिसकते सिसकते सो गई।

नींद में भी उसके होंठ कभी कभी फड़क रहे थे।

उधर गेस्ट रूम में, ताऊजी की हालत भी कुछ अलग नहीं थी।

वे बिस्तर पर करवटें बदल रहे थे, अपनी आंखें भींचे, बार बार एक भारी, ठंडी सांस छोड़ते हुए। उनके चेहरे पर वही आत्मग्लानि थी जो किसी सच्चे, नेक इंसान के चेहरे पर अनजाने में हुए गुनाह के बाद होती है।

उस रात फ्लैट ९०३ में कोई नहीं सोया था।

सुबह के आठ बज रहे थे।

काव्या उठी। उसकी आंखें रोने की वजह से सूज चुकी थीं, और चेहरे पर एक अजीब सी बेरुखी थी।

उसने चुपचाप अपना नित्य कर्म निपटाया, हल्का सा मेकअप किया ताकि आंखों की सूजन छुप सके, और अपनी बुटीक जाने के लिए तैयार हो गई।

तैयार होने के बाद, उसने अपना फोन निकाला।

उसकी उंगलियां स्क्रीन पर मेरे नाम के हरे डायल बटन पर जाकर ठहर गईं।

वो मुझे फोन करना चाहती थी... मेरी आवाज सुनकर अपने दिल का बोझ हल्का करना चाहती थी। लेकिन उसका हाथ कांप रहा था। वो बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई।

उसने एक लंबी, टूटी सांस भरी, फोन को अपने हैंडबैग में डाला और कमरे से बाहर निकली।

मुख्य दरवाजे पर अपने सैंडल पहनते वक्त, उसकी नजरें अनायास ही गेस्ट रूम के उस बंद दरवाजे पर टिक गईं।

उसकी नजरों में डर था, संकोच था, और एक अजीब सी अनकही उलझन थी।

वो बिना कोई आवाज किए फ्लैट का दरवाजा खोलकर बाहर निकल गई।

आम दिनों में ताऊजी सुबह उठकर बालकनी में बैठते थे, लेकिन आज वे कमरे से बाहर नहीं निकले थे। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि अपनी बहू का सामना कैसे करें।

जब मुख्य दरवाजे के बंद होने की आवाज आई, तब जाकर ताऊजी का कमरा खुला। वे बाहर निकले, लेकिन उनके कंधे झुके हुए थे और चेहरे पर एक गहरा सन्नाटा था।

शाम के ५:०० बज चुके थे।

आम तौर पर काव्या शाम पांच बजे तक घर लौट आती थी। लेकिन स्क्रीन पर घड़ी पांच से आगे खिसकती जा रही थी, और फ्लैट का दरवाजा नहीं खुला था।

लिविंग रूम में बैठे ताऊजी बेहद बेचैन थे। वे बार बार दीवार घड़ी की तरफ देखते, फिर मुख्य दरवाजे की तरफ। उनके चेहरे पर घबराहट और एक अनजाना खौफ साफ दिख रहा था कहीं काव्या ने खुद को कोई नुकसान तो नहीं पहुंचा लिया? कहीं वो हमेशा के लिए तो नहीं चली गई?

समय ५:४० पर पहुंचा।

तभी... मुख्य दरवाजे के ताले में चाबी घूमने की धीमी सी आवाज आई।

हैदराबाद में बैठा मैं, और फ्लैट के सोफे पर बैठे ताऊजी दोनों की नजरें एक साथ उस दरवाजे पर जम गईं!

ताऊजी का पूरा कसरती जिस्म एक झटके में तन गया। उनके हाथ घुटनों पर कांपने लगे।

दरवाजा खुला।

काव्या अंदर दाखिल हुई। उसने एक सादे, हल्के हरे रंग का सूट पहन रखा था। उसका चेहरा दिन भर की थकान और भीतरी तनाव से उतरा हुआ था।

अंदर आते ही उसने अपनी नजरें झुका लीं। उसने ताऊजी की तरफ बिल्कुल नहीं देखा।

ताऊजी भी घबराकर दूसरी तरफ देखने का नाटक करने लगे, जैसे वे दीवार पर टंगी किसी पेंटिंग को बहुत ध्यान से देख रहे हों। लेकिन उनकी कांपती सांसें बता रही थीं कि उनका पूरा ध्यान सिर्फ काव्या पर था।

कमरे का सन्नाटा इतना भारी था कि किसी की भी सांस घुट जाए।

काव्या ने अपने सैंडल उतारे, अपना बैग शू रैक पर रखा, और नजरें झुकाए सीधे अपने बेडरूम की तरफ कदम बढ़ा दिए।

वो उस सन्नाटे से, उस असहज माहौल से भागना चाहती थी।

लेकिन...

जैसे ही वो अपने बेडरूम के दरवाजे पर पहुंची, उसके कदम अचानक थम गए।

उसने दरवाजे के हैंडल पर हाथ रखा। उसने एक गहरी, लड़खड़ाती सांस भीतर खींची।

और फिर... उसने अपना मुंह दरवाजे की तरफ ही रखे रखे, बिना ताऊजी की तरफ मुड़े, बहुत ही धीमी, थकी हुई लेकिन अपनापन भरी आवाज में कहा:

"ताऊजी..."

ताऊजी का पूरा बदन उस एक पुकार पर बिजली के झटके की तरह सीधा हो गया। उन्होंने झटके से मुड़कर काव्या की पीठ की तरफ देखा।

काव्या ने भरे गले से, बहुत सहजता से कहा:

"आज बुटीक में बहुत ज्यादा भागदौड़ थी... कमर और पैर बिल्कुल टूट रहे हैं। मुझसे आज रात खाना नहीं बन पाएगा..."

काव्या ने कुछ पल रुककर अपनी सांस को संभाला, फिर बहुत आहिस्ता से बोली:

"आप... आप अपने हाथ से वो गरमा गरम मूंग दाल की खिचड़ी बना देंगे क्या? थोड़ा देसी घी का तड़का लगाकर... बहुत दिन हो गए आपके हाथ का खाना खाए।"

काव्या के मुंह से निकले उन चंद शब्दों ने जैसे उस पूरे फ्लैट में छाई बर्फ को एक झटके में पिघला दिया!

वो मुड़ी नहीं। अपनी बात खत्म करते ही उसने तेजी से दरवाजा खोला और बेडरूम के भीतर चली गई।

उधर लिविंग रूम में, ताऊजी उस बंद दरवाजे को फटी आंखों से देखते रह गए।

कुछ सेकंड तक वे अवाक खड़े रहे... और फिर, उनके झुर्रियों भरे, सांवले चेहरे पर एक ऐसी स्वर्गीय, बेपनाह राहत और खुशी की मुस्कान खिल उठी जिसे बयां करना नामुमकिन था!

काव्या ने उनसे नफरत नहीं की थी।

काव्या ने उन्हें कोई अछूत, कोई घिनौना मुजरिम नहीं समझा था।

उस एक छोटी सी मांग ने 'आपके हाथ की खिचड़ी खानी है' उन दोनों के बीच के उस भयानक तनाव और शर्म की दीवार को हमेशा के लिए तोड़ दिया था। ये एक बहू का अपने ससुर के साथ अनकहा, पवित्र सुलहनामा था!

ताऊजी के चेहरे पर छाई मायूसी पल भर में गायब हो गई।

वे फुर्ती से उठे और लगभग दौड़ते हुए रसोई की तरफ बढ़ गए। उन्होंने डिब्बे से मूंग दाल और चावल निकाले, कुकर चढ़ाया, और पूरे उत्साह से अपनी बहू के लिए खाना बनाने में जुट गए।

और उधर बेडरूम के भीतर...

काव्या बंद दरवाजे से पीठ टिकाए खड़ी थी। उसकी छाती तेजी से ऊपर नीचे हो रही थी, और उसके गाल शर्म की लाली से दहक रहे थे।

उसने बहुत हिम्मत जुटाकर वो पहल की थी।

और जब रसोई से कुकर की सीटी की जानी पहचानी आवाज और हींग जीरे के तड़के की महक पूरे घर में फैलने लगी...

तो काव्या के आंसुओं से भीगे चेहरे पर भी एक बहुत ही हल्की, सुकून भरी और मीठी मुस्कान खिल उठी।

हैदराबाद के उस होटल में, लैपटॉप की स्क्रीन देखते हुए मैंने राहत की एक ठंडी सांस ली।

दरार भर चुकी थी... और उस दरार के भरने के साथ ही, उस घर में एक नए रिश्ते की नींव हमेशा के लिए मजबूत हो चुकी थी।

---to be continued---
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RE: Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej - by wofeloh916 - 1 hour ago



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