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Adultery Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej
#34
==devnagari==
अध्याय 35: पराकाष्ठा और गैर पेनेट्रेटिव संगम
कमरे के सन्नाटे में सिर्फ दो जिस्मों के टकराने और भारी होती सांसों की आवाज गूंज रही थी।
काव्या अपनी आंखें अधखुली किए, अपनी भीगी हुई जांघों के बीच ताऊजी के साढ़े आठ इंच के भारी, गर्म औजार की रगड़ से पैदा होने वाले उस स्वर्गीय सुख में डूबी हुई थी। उसकी दोनों रानों पर मला हुआ उसका अपना गाढ़ा काम रस और ताऊजी के लंड से टपकता लुआब मिलकर उस रगड़ को इतना मक्खन जैसा चिकना बना चुके थे कि ताऊजी का हर धक्का काव्या की रीढ़ में बिजली दौड़ा रहा था।
ताऊजी की कमर एक सधी हुई, मदमस्त लय में चल रही थी।
लेकिन उस बेपनाह नशे के बवंडर में, ताऊजी के दोनों भारी, खुरदुरे हाथ काव्या के सफेद चूतड़ों से ऊपर सरकने लगे थे।
नाईट लैंप की पीली रोशनी और खिड़की से छनकर आती चांदनी में, काव्या की नजर अचानक सामने सफेद चादर पर पड़ी।
चादर पर एक गहरा साया आगे बढ़ रहा था ताऊजी के भारी, कांपते हाथों की परछाई, जो उसकी पतली कमर से ऊपर उठकर सीधे उसकी नाइटी के खुले गले की तरफ बढ़ रही थी।
काव्या की आंखें एक झटके में पूरी खुल गईं!
उसने तेजी से अपनी गर्दन पीछे मोड़ी। उसने देखा कि ताऊजी के वे बड़े, कसरती हाथ उसकी आसमानी नाइटी के भीतर झूलते उन गोरे ३४डी स्तनों को अपनी मुट्ठियों में भींचने के लिए बिल्कुल तैयार थे।
काव्या के भीतर की मर्यादा एक पल के लिए थरथरा उठी।
ठीक उसी सेकंड, जब ताऊजी की उंगलियां उसकी नाइटी के कपड़े को छूकर उसके गर्म उभारों को पकड़ने ही वाली थीं...
काव्या का नाजुक, गोरा हाथ बिजली की तरह आगे बढ़ा।
उसकी चूड़ियों से सजी उंगलियों ने ताऊजी की भारी, रोएंदार कलाई को हवा में ही दबोच लिया!
ताऊजी के बेकाबू हाथ वहीं थम गए।
काव्या के उस अचानक विरोध से ताऊजी की मदहोश, लाल आंखों में छाई हवस की धुंध थोड़ी छंटी। उनकी नजरों में एक गहरी उलझन और मायूसी कौंध गई, और उनकी कमर के धक्के भी एक पल के लिए रुक गए।
वे दोनों एक दूसरे की आंखों में देखते रहे।
कमरे में कुछ सेकंड के लिए सांसों की सनसनाहट के सिवा कुछ नहीं था।
काव्या ने ताऊजी की कलाई को कसकर पकड़े हुए, बहुत आहिस्ता से अपने सिर को 'ना' में हिलाया। उसकी नजरों का पैगाम बिल्कुल साफ था उसकी छाती को छूने की इजाजत किसी हाल में नहीं थी।
काव्या की आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें एक ऐसी अटूट, पवित्र मर्यादा थी जिसे कोई लांघ नहीं सकता था:
"ताऊजी... प्लीज... ऊपर हाथ मत लगाइए।"
काव्या ने एक कांपती हुई सांस भरी, उसकी आंखों में शर्म और बेबसी के आंसू फिर तैरने लगे:
"मैं नहीं जानती क्यों... लेकिन राजेश के सिवा मेरे सीने को आज तक किसी मर्द ने नहीं छुआ है। मुझे अपने दिल में थोड़ी सी तो मर्यादा, थोड़ा सा तो मान बाकी रखने दीजिए ताऊजी... अगर ये भी खो दिया ना मैंने, तो मैं अपनी ही नजरों में मर जाऊँगी। खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊँगी।"
ताऊजी के चेहरे पर मायूसी और एक बूढ़े मर्द की अधूरी हसरत की छाया साफ दिखाई दी। उनके झुके हुए चेहरे को देखकर काव्या का दिल पसीज गया।
उसने बहुत नरमी से, अपनी आवाज में एक दिलासा घोलते हुए कहा:
"नीचे... उस आखिरी सीमा को छोड़कर... आप जैसा चाहें, वैसा सुख ले लीजिए। बिना पेनेट्रेशन के, मैं आपको पूरा सुख दूंगी... लेकिन यहाँ नहीं ताऊजी। प्लीज..."
काव्या के उन शब्दों ने ताऊजी के दिल में छा रही मायूसी को पल भर में शांत कर दिया। अपनी जवान बहू की इस साफ, अटल मर्यादा और उसके साथ दी गई इस बेपनाह छूट ने उस छप्पन साल के पहलवान के दिल में उसके लिए सम्मान और ज्यादा बढ़ा दिया।
ताऊजी ने बिना एक शब्द कहे, अपनी भारी कलाई को धीरे से काव्या की पकड़ से छुड़ाया।
उन्होंने अपने दोनों हाथ पीछे खींचे और दोबारा काव्या के उन संगमरमर जैसे गोरे, भारी चूतड़ों पर मजबूती से जमा दिए।
ताऊजी के हाथ नीचे आते ही काव्या ने राहत की एक लंबी सांस ली। उसने अपनी गर्दन वापस बिस्तर की तरफ मोड़ ली और अपनी आंखें मूंद लीं।
लेकिन शायद काव्या के उस इनकार ने ताऊजी के भीतर के सोए हुए मर्द को एक अनजानी चुनौती दे दी थी।
ताऊजी ने एक गहरी, तूफानी सांस खींची।
और फिर... उन्होंने अपनी फौलादी कमर की पूरी ताकत समेटकर, काव्या की भींची हुई जांघों के बीच एक ऐसा जोरदार, गहरा झटका मारा कि पूरी खाट चरमराहट के साथ कांप उठी!
थप... थप... थप...!
ये झटका पहले से कहीं ज्यादा तेज, उग्र और आक्रामक था!
मानो ताऊजी अपनी छाती न छू पाने की उस अधूरी भूख का सारा बदला काव्या की जांघों और उसके चूतड़ों से वसूल कर रहे हों!
हर धक्के के साथ, ताऊजी का वो साढ़े आठ इंच लंबा, लोहे की छड़ जैसा कड़क लंड काव्या की दोनों नंगी जांघों के बीच सरसराता हुआ आगे धंसता था। उनकी भारी जांघें काव्या के गोरे चूतड़ों के मांस से पूरी ताकत से टकराती थीं। मांस से मांस की वो तीखी, भीगी हुई टक्कर उस सन्नाटे में बार बार गूंज रही थी।
और सबसे ज्यादा जानलेवा बात ये थी कि हर धक्के के अंतिम सिरे पर, ताऊजी के लंड की वो चौड़ी, खौलती हुई सुपारी काव्या की भीगी हुई गुलाबी पेंटी के पतले रेशम को मसलती हुई सीधे उसकी चूत के दहकते मुहाने और उसके अति संवेदनशील दाने पर रगड़ खाती थी!
उफ्फफ...!
काव्या के मुंह से दबी हुई एक तीखी, कटी फटी सिसकारी फूट पड़ी। उसने अपने दोनों हाथों से नीचे बिछी हरी चादर को मुट्ठियों में जकड़ लिया।
उसने अपने निचले होंठ को अपने दांतों से इतनी जोर से दबा रखा था कि शायद खून निकल आता, लेकिन उस रगड़ से उठने वाली सुख की लहरें इतनी प्रचंड थीं कि उसकी सारी सहनशक्ति टूट गई।
उसके होंठ खुल गए:
"आह्ह... उफ्फ... ताऊजी..."
काव्या की उस मदहोश कराह ने ताऊजी के भीतर आग का दरिया बहा दिया।
उनकी रफ्तार और बढ़ गई। उनका चेहरा पसीने से नहा चुका था, दाढ़ी के बाल काव्या की कमर पर रगड़ खा रहे थे। काव्या के माथे की लटें भी पसीने से उसके गोरे माथे पर चिपक चुकी थीं।
कमरे में एक ऐसा मादक, स्वर्गीय संगीत गूंज रहा था जो किसी भी मर्द को पागल कर दे बिस्तर की चरमराती स्प्रिंग, जांघों के टकराने की थप थप आवाज, और उन दोनों की हांफती हुई, टूटी टूटी सांसें!
हैदराबाद के उस बंद कमरे में, स्क्रीन के सामने बैठा मैं कांप रहा था।
ये वही आवाजें थीं... वही सिसकारियां और वही जांघों की टक्कर थी, जिसे मैंने कल रात लिविंग रूम के माइक पर सुना था और समझा था कि वे दोनों संभोग कर रहे हैं!
लेकिन आज... इस कैमरे के साफ वीडियो ने उस हकीकत का पर्दाफाश कर दिया था।
वो कोई सामान्य संभोग नहीं था... वो मर्यादा की बारीक तलवार पर चलते हुए, मेरी जवान, खूबसूरत पत्नी द्वारा मेरे ही छप्पन साल के पहलवान ताऊजी को अपनी रानों की मखमली गुफा में दिया जाने वाला चरम सुख था!
वहां स्क्रीन पर, ताऊजी के धक्के अब उन्माद की हद तक पहुंच चुके थे।
काव्या के दूधिया चूतड़ों पर ताऊजी की उंगलियों के लाल निशान छप चुके थे। ताऊजी अपनी पूरी ताकत से काव्या के जिस्म को आगे धकेल रहे थे, और काव्या भी अपनी जांघों को पूरी जान से भींचकर, अपनी कमर को पीछे उछालकर हर रगड़ का जवाब दे रही थी।
कुछ और मिनटों की उस भयानक, तूफानी टक्कर के बाद...
अचानक, ताऊजी की रफ्तार बिल्कुल थम गई।
कमरे में एक खौफनाक सन्नाटा छा गया तूफान से ठीक पहले का सन्नाटा!
ताऊजी ने काव्या के दोनों चूतड़ों को अपनी भारी हथेलियों में ऐसी ताकत से भींचा कि काव्या के मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई।
ताऊजी की सफेद बालों वाली गर्दन पीछे की तरफ तन गई। उनका मुंह पूरा खुल गया, आंखें पथरा सी गईं, लेकिन हलक से कोई आवाज नहीं निकली। उनका चेहरा ऐसा भयानक और रौद्र दिख रहा था मानो वे अपनी जिंदगी के सबसे ऊंचे, सबसे भयानक सुख के शिखर पर पहुंच चुके हों!
और ठीक उसी सेकंड...
ताऊजी के लंड के नीचे लटकते उनके दोनों भारी अंडकोष पागलों की तरह ऊपर नीचे सिकुड़ने लगे!
अंदर सालों से जमा हुआ वीर्य का वो खौलता हुआ लावा बाहर फूटने के लिए मचल उठा था।
फच... फचच...!
ताऊजी के हलक से एक तड़पती हुई, धीमी गुर्राहट निकली, और उनके साढ़े आठ इंच के विशाल औजार के मुहाने से गाढ़े, सफेद, खौलते हुए वीर्य की पहली पिचकारी पूरी ताकत से छूट पड़ी!
ताऊजी का वो गाढ़ा, गर्म वीर्य काव्या की दोनों नंगी जांघों के बीच, उसकी भीगी हुई गुलाबी पेंटी पर और उसकी चूत की दरार के ऊपर एक गर्म सैलाब की तरह बिखरने लगा!
और उस खौलते हुए वीर्य की गरमाहट जैसे ही काव्या की जांघों और उसकी चूत के मुहाने पर फैली...
काव्या के पूरे बदन में एक भयानक करंट दौड़ गया!
उसकी गर्दन तकिए से ऊपर उछल गई। उसने अपने लंबे, काले बालों को झटके से पीछे फेंका, और उसके कांपते, रसीले होंठों से चरम सुख की एक ऐसी तीखी, सुरीली चीख निकली जिसने कमरे की दीवारों को कंपा दिया:
"आह्ह्हह... ताऊजी...!"
काव्या का पूरा जिस्म थर थर कांपने लगा। उसकी जांघें ताऊजी के अंग के इर्द गिर्द पागलों की तरह फड़कने लगीं।
वे दोनों एक ही लय में, एक ही रफ्तार से चरम सुख के उस स्वर्गीय झूले में झूल रहे थे।
ताऊजी का वीर्य रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पिचकारी के बाद पिचकारी छूट रही थी... गाढ़ा, सफेद, चिपचिपा वीर्य काव्या की दोनों गोरी रानों को पूरी तरह नहला चुका था। उसकी पेंटी का कपड़ा उस वीर्य से इतना तर हो चुका था कि वो सफेद द्रव छनकर काव्या की चूत की दोनों गुलाबी फांकों के भीतर तक समा रहा था।
और फिर... वो वीर्य काव्या की जांघों से नीचे फिसलकर, हमारी उस पन्ना हरी (emerald green) सूती चादर पर टपकने लगा!
हैदराबाद के उस कमरे में बैठे हुए, मुझे लगा जैसे मेरे सिर पर उसी हरी चादर के रंग की एक भारी टोपी हमेशा के लिए सज गई थी...
काफी देर तक दोनों उसी तरह एक दूसरे से चिपके, बेसुध पड़े रहे। कमरे में सिर्फ उस गाढ़े वीर्य के आहिस्ता आहिस्ता चादर पर बहने की धीमी सरसराहट थी।
आखिरकार, जब ताऊजी का वीर्य पूरी तरह खाली हो गया, तो उन्होंने बहुत आहिस्ता से काव्या के चूतड़ों को दो बार सहलाया।
फिर उन्होंने अपना वो वीर्य और रस से लथपथ, आधा ढीला हो चुका औजार काव्या की जांघों के बीच से धीरे धीरे बाहर खींच लिया।
चांदनी की रोशनी में, ताऊजी का वो लंड वीर्य और काम रस की चमक से किसी चमचमाती कटार की तरह चमक रहा था।
चरम सुख के उस तूफ़ान के शांत होने के बाद, काव्या ने अपने कांपते हुए जिस्म को संभाला।
उसने अपना हाथ बढ़ाकर साइड टेबल पर रखे टिशू बॉक्स से कुछ टिशू खींचे।
वे वही टिशू थे, जो मैंने और काव्या ने हमारे अपने मिलन के बाद साफ सफाई के लिए वहां रखे थे... लेकिन आज उन पर मेरे ताऊजी का हक हो चुका था।
काव्या ने कुछ टिशू अपनी दोनों जांघों के बीच लगा लिए, ताकि बहता हुआ वीर्य फर्श पर न गिरे। और फिर, उसने अपनी दूसरी हथेली से कुछ टिशू आगे बढ़ाकर ताऊजी की तरफ कर दिए बिल्कुल किसी संस्कारी, पतिव्रता पत्नी की तरह अपने मर्द की सेवा करते हुए!
ताऊजी ने शून्य नजरों से वे टिशू थाम लिए। लेकिन उन्होंने अपने अंग को पोंछा नहीं।
वे बिस्तर के किनारे खड़े रहे, उनकी आंखों में एक गहरा पश्चाताप, शर्म और आत्मग्लानि दोबारा लौट आई थी। वे किसी अपराधी की तरह सिर झुकाए खड़े थे।
काव्या ने ताऊजी के उस उदास, टूटे हुए चेहरे को देखा।
वो बिस्तर पर थोड़ा सीधी हुई, और उसने बहुत ही अपनेपन और धीमे स्वर में कहा:
"ताऊजी... जो हुआ, उसे लेकर अपने मन में कोई बोझ मत रखिए। हमने कोई पाप नहीं किया है... हमारी कोई मर्यादा नहीं टूटी। इसे बस ये समझिए कि आपकी इस बहू ने आपकी थोड़ी सी सेवा कर दी, आपकी तकलीफ दूर कर दी। जब तक ये बात सिर्फ हमारे बीच है और राजेश को इसकी भनक नहीं लगती... तब तक इससे इस परिवार का भला ही होगा, कोई नुकसान नहीं। अब आप जाइए... हाथ मुँह धोकर आराम कीजिए। बहुत रात हो चुकी है।"
काव्या के चेहरे पर इस वक्त एक अजीब सा तृप्त सुकून था, लेकिन साथ ही एक गहरा, अनजाना दर्द भी। वो ताऊजी को दिलासा दे रही थी, लेकिन शायद उस दिलासे के जरिए वो खुद अपने ही दिल को समझा रही थी।
ताऊजी ने अपनी लड़खड़ाती जुबान से कुछ बुदबुदाया:
"बहू... तू बहुत अच्छी है... मैं... मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या कहूँ... भगवान तेरा सुहाग सलामत रखे।"
ताऊजी ने एक गहरी, ठंडी सांस भरी। वे टिशू हाथ में दबाए, बहुत भारी कदमों से मुड़े और कमरे का दरवाजा खोलकर चुपचाप बाहर निकल गए।
कमरे में अब सिर्फ काव्या अकेली थी।
काव्या बिस्तर पर बैठी रही, अपनी दोनों जांघों के बीच टिशू दबाए, ताऊजी के दूर जाते कदमों की आहट सुनती रही।
उसने अपनी नजरें नीचे कीं...
उसने देखा, उसकी दोनों जांघें ताऊजी के वीर्य से लथपथ थीं, उसकी पेंटी सफेद द्रव से सनी थी, और नीचे हरी चादर पर एक बड़ा सा सफेद, बदबूदार और चिपचिपा धब्बा फैल चुका था।
काव्या के होंठों पर एक बहुत ही कड़वी, बेबस मुस्कान तैर गई। उसकी पलकों से दो मोटे आंसू टूटकर सीधे उस वीर्य से सनी चादर पर गिर पड़े।
उसने अपनी एक हथेली से अपने आंसुओं को पोंछा, धीरे से बिस्तर से नीचे पैर उतारे, अपनी जांघों के बीच टिशू को कसकर दबाया, और फिर बहुत लड़खड़ाते, भारी कदमों से वॉशरूम की तरफ बढ़ गई।
हैदराबाद के उस होटल में, लैपटॉप की नीली रोशनी के सामने बैठा मैं एक जिंदा लाश की तरह जम चुका था।
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RE: Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej - by wofeloh916 - 1 hour ago



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