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Adultery Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej
#32
--Devanagari--

अध्याय 34: मर्यादा का वचन और जांघों का आलिंगन

कमरे का सन्नाटा इतना भारी हो चुका था कि उसमें सांस लेना भी दूभर था।

स्क्रीन पर, ताऊजी अपनी भारी गर्दन झुकाए, आंसुओं से भीगी दाढ़ी पोंछते हुए फर्श से उठ खड़े हुए थे। वे मुड़कर उस बंद दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाने ही वाले थे हमेशा के लिए इस घर को, अपने अनाथ भतीजे को और अपनी इस लाचार बहू को छोड़कर चले जाने के लिए।

लेकिन तभी...

बिस्तर पर एक बहुत हल्की सी सरसराहट हुई।

काव्या का कांपता हुआ, गोरा हाथ आगे बढ़ा।

उसकी नाजुक, चूड़ियों से सजी उंगलियों ने ताऊजी की उस भारी, खुरदरी कलाई को बहुत आहिस्ता से थाम लिया।

ताऊजी के भारी कदम वहीं के वहीं जम गए।

स्क्रीन पर वो दृश्य देखकर हैदराबाद में मेरी सांसें हलक में अटक गईं।

ताऊजी ने चौंककर अपनी गर्दन मोड़ी। उनकी लाल, आंसुओं से धुंधलाई आंखों में बेइंतहा उलझन और अविश्वास था।

सामने बिस्तर पर बैठी मेरी पत्नी की आंखों में आंसू भरे हुए थे। उसके बिखरे बालों की लटें उसके भीगे गालों पर चिपकी थीं। उस टूटे हुए, मदहोश और रोते हुए चेहरे पर एक ऐसा सम्मोहन था जो किसी भी मर्द के कलेजे को चीर कर रख दे।

काव्या ने अपनी उंगलियों की पकड़ को थोड़ा और मजबूत किया। उसने ताऊजी के भारी हाथ को बहुत धीरे से अपनी तरफ खींचा।

उस एक खिंचाव के आगे, वो छप्पन साल का विशालकाय पहलवान किसी अबोध बालक की तरह खिंचता चला आया। वे दोबारा बिस्तर के किनारे आकर खड़े हो गए। शर्म और आत्मग्लानि के बोझ तले उनका वो भारी, सांवला लंड अब भी पूरी तरह ढीला होकर बेजान सा उनकी जांघों के बीच लटक रहा था।

काव्या ने अपना सिर थोड़ा झुका लिया। उसने अपनी दूसरी हथेली से अपनी पलकों पर ठहरे आंसुओं को पोंछा।

कमरे में सिर्फ पंखे की मद्धम सरसराहट थी।

काव्या ने कुछ सेकंड तक अपने भीतर के तूफ़ान को समेटा, फिर अपनी भीगी हुई, कजरारी आंखें उठाकर सीधे ताऊजी के चेहरे में देखा।

उसकी आवाज बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें एक ऐसी रूहानी गहराई, दर्द और अपनापन था जो पत्थर को भी पिघला दे:

"ताऊजी... हाथ मत जोड़िए मेरे आगे, भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए..." काव्या की आवाज आंसुओं से भीगी थी, "आज जो कुछ हुआ... मेरा कलेजा अंदर तक कांप रहा है। इतनी शर्म आ रही है कि धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊं।"

काव्या ने एक लंबी, लड़खड़ाती सांस भरी:

"लेकिन... लेकिन मैं आपका अहसान कैसे भूल सकती हूँ ताऊजी? आपने राजेश को अपनी छाती से लगाकर पाला है... अपनी पूरी जवानी, अपनी जिंदगी की सारी खुशियां आपने इस परिवार पर न्योछावर कर दीं। आपने अभी जो कहा... वो झूठ नहीं था। राजेश की कमजोरी मुझसे छुपी नहीं है... उस सर्जरी के बाद से हमारा बिस्तर महीनों से ठंडा पड़ा है। और मैं भी तो हाड़ मांस की बनी एक औरत ही हूँ ना ताऊजी? मेरा भी दिल करता है, मेरा भी शरीर भूख से तड़पता है... लेकिन ईश्वर साक्षी है, मैंने कभी सपने में भी किसी गैर मर्द के बारे में नहीं सोचा। उस रात खाट पर... वो तो बस एक बेकाबू हादसा था..."

काव्या की आंखों से दो बूंदें और फिसलकर उसकी नाइटी पर गिर पड़ीं।

उसने ताऊजी की भारी हथेली को अपने दोनों नाजुक हाथों के बीच समेट लिया:

"अगर आप इस तरह आधी रात को घर छोड़कर चले गए... तो सोचिए राजेश का क्या होगा? वो अनाथ बच्चा आपके बिना एक दिन भी नहीं जी पाएगा ताऊजी, जीते जी मर जाएगा वो! और मेरी रूह... मेरी रूह मुझे जिंदगी भर कोसती रहेगी कि मेरी वजह से इस घर का सबसे बड़ा सहारा सड़क पर आ गया।"

ताऊजी के होंठ कांपने लगे, उनकी आंखों में पानी फिर उमड़ आया।

काव्या ने अपनी नजरें थोड़ी नीची कीं, उसके चेहरे पर एक गहरा, गंभीर और पवित्र संकल्प चमक उठा:

"राजेश मेरे पति हैं ताऊजी। सात फेरे लिए हैं मैंने उनके साथ, अग्नि को साक्षी मानकर उनके नाम का सिंदूर अपनी मांग में भरा है। उस मर्यादा को, उस आखिरी हक को मैं जीते जी कभी किसी को नहीं छूने दूंगी। हमारे बीच वो... वो अंतिम सीमा कभी पार नहीं होगी। आप कभी मेरे भीतर दाखिल नहीं होंगे..."

काव्या की सांसें तेज हो गईं, कान शर्म की लाली से तपने लगे, फिर भी उसने नजरें उठाकर भरे गले से कहा:

"लेकिन उस एक हद को छोड़कर... बिना उस पवित्र मर्यादा को तोड़े... मैं आपकी हर तकलीफ, इस ढलती उम्र की हर तड़प को शांत करूंगी। आप... आप उस ठंडे कमरे में अकेले खुद को इस तरह मत घोंटा कीजिए। जब भी राजेश शहर से बाहर होंगे... मैं खुद आपकी मदद करूंगी। आपकी हर प्यास बुझाऊंगी..."

काव्या ने नजरें झुकाकर अपनी नाइटी का कोना भींच लिया, उसकी सुबकी निकल गई:

"बस... अपने दिल में मुझे कोई कुलटा, कोई बदचलन औरत मत समझना ताऊजी..."

काव्या के होंठों से निकले उन शब्दों ने जैसे उस पूरे बेडरूम के सन्नाटे में धमाका कर दिया!

हैदराबाद के उस होटल में मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।

यह क्या कह रही थी काव्या?!

उसने ताऊजी को ठुकराया नहीं था... उसने तो मर्यादा की आड़ में एक ऐसा गुप्त, अटूट और खौफनाक घरेलू समझौता कर लिया था जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी!

और उधर स्क्रीन पर, ताऊजी का चेहरा अविश्वास, दहशत और एक बेपनाह, नशीली राहत से खिल उठा। उनकी बूढ़ी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी।

वे हकलाने लगे:

"ब... बहू? तू... तू ये क्या कह रही है? नहीं बेटी... ऐसा मत कह... मैं तो पापी हूँ, मुझे तो नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी... तू इतनी बड़ी बात..."

ताऊजी आगे कुछ बोल पाते, इससे पहले ही काव्या ने अपना दूसरा हाथ उठाया।

उसकी नाजुक, चंदन जैसी महकती दो उंगलियां सीधे ताऊजी के खुरदुरे होंठों पर टिक गईं।

"शशश..." काव्या ने धीमी सी सिसकारी में कहा, "अब एक शब्द भी मत बोलिए ताऊजी।"

ताऊजी की जुबान वहीं बंद हो गई। वे फटी आंखों से अपनी उस जवान बहू को देखते रहे।

और फिर...

चांदनी और नाइट लैंप के पीले उजाले में, काव्या ने वो किया जिसने मेरी रीढ़ की हड्डी में आग लगा दी।

काव्या ने अपनी नजरें नीचे झुकाईं।

उसने अपना नाजुक, गोरा हाथ ताऊजी की जांघों के बीच बढ़ाया।

और उसने ताऊजी के उस ढीले, बेजान पड़े विशाल लंड को अपनी मुट्ठी में थाम लिया!

आह...!

उस अप्रत्याशित, मखमली स्पर्श के होते ही ताऊजी के पूरे कसरती बदन में एक भयानक सिहरन दौड़ गई। उनका सांवला जिस्म झटके से पीछे हटना चाहा, लेकिन काव्या की पकड़ में एक ऐसा अधिकार था कि वे एक इंच भी पीछे नहीं हट पाए।

काव्या ने बहुत शर्माते हुए, अपनी पलकें झुकाए झुकाए, अपनी रेशमी मुट्ठी को उस ढीले अंग पर धीरे धीरे आगे पीछे सहलाना शुरू किया।

उसका स्पर्श किसी नवविवाहिता की तरह धीमा और कोमल था।

शुरुआत में, शराब के नशे और अचानक बदले इस माहौल की वजह से वो अंग बिल्कुल सुन्न पड़ा रहा। ताऊजी दोनों हाथ किनारे लटकाए, किसी अनजान मुजरिम की तरह खड़े रहे। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि अपने हाथ कहाँ रखें।

लेकिन जैसे ही काव्या उस अंग को सहलाने के लिए थोड़ा आगे झुकी...

उसकी आसमानी नाइटी का ढीला गला पूरी तरह आगे की तरफ झूल गया!

उसकी नाइटी के खुले गले के भीतर से, उसकी सफेद लेस वाली डिजाइनर ब्रा के उभार और उसकी ३४डी साइज की दोनों भारी, दूधिया सफेद छातियों की गहरी, पसीने से चमचमाती घाटी सीधे ताऊजी की आंखों के सामने खुल गई!

ताऊजी की नजरें उस खुली घाटी पर जम गईं।

उनका सारा संकोच, सारी हिचकिचाहट उस एक सेकंड में धुएं की तरह उड़ गई। वे किसी भूखे बाज की तरह अपनी बहू के उन खुले, उछलते हुए वक्षों को एकटक घूरने लगे।

काव्या ने भी ताऊजी की उस वहशी नजर को और अपने खुले गले को महसूस किया।

लेकिन इस बार... उसने अपना पल्लू नहीं खींचा। उसने अपनी ब्रा को नहीं छुपाया। उसने सिर्फ शर्म से अपने गालों को लाल होने दिया, और ताऊजी को अपनी जवानी के उस सबसे हसीन खजाने का दीदार करने की पूरी छूट दे दी!

और उस जादुई दृश्य का असर ताऊजी के जिस्म पर किसी चमत्कार की तरह हुआ।

काव्या की हथेली के भीतर... वो मरा हुआ दानव अचानक जीवित होने लगा!

उस ढीली चमड़ी के भीतर खौलता हुआ गर्म खून तेजी से भरने लगा। वो अंग मोटा होने लगा, फैलने लगा, सीधा तनने लगा... और देखते ही देखते, वो दोबारा साढ़े आठ इंच लंबा, लोहे की भारी छड़ जैसा कड़क होकर काव्या की मुट्ठी से बाहर झांकने लगा!

उस फौलादी तनाव को अपनी मुट्ठी में महसूस करके काव्या की भी सांसें उखड़ गईं। उसकी आंखों में भी वही पुराना, नशीला काम ज्वर दोबारा सुलग उठा।

ताऊजी के लंड की भारी सुपारी से दोबारा काम रस की एक चमकीली, लुआबदार बूंद रिसकर काव्या की हथेली पर बिखर गई। उस मर्दानी गंध ने कमरे की हवा को और ज्यादा जहरीला बना दिया।

काव्या ने कुछ देर तक उसे मुट्ठी से सहलाया...

लेकिन उस दानवी आकार के औजार के लिए सिर्फ एक नाजुक हाथ की रगड़ काफी नहीं थी। ताऊजी की सांसें तो तेज हो रही थीं, लेकिन वे चरम सुख से अभी मीलों दूर थे।

और खुद काव्या के भीतर भी जो आग सुलग चुकी थी, वो सिर्फ हाथ हिलाने से शांत होने वाली नहीं थी।

काव्या ने एक गहरा फैसला लिया।

उसने ताऊजी के लंड से अपनी पकड़ ढीली की और उसे छोड़ दिया।

ताऊजी ने एक सवालिया नजर से उसे देखा।

काव्या ने अपने दांतों से अपने निचले होंठ को काटा। वो बिस्तर पर एक तरफ खिसकी, और अपने घुटनों को मोड़कर बिस्तर पर एक करवट लेट गई उसका मुंह अंदर की तरफ था और उसकी भारी, सुडौल पीठ ताऊजी की तरफ!

उसने अपने दोनों हाथों से अपनी नाइटी को पकड़ा और उसे धीरे धीरे अपनी पतली कमर तक ऊपर चढ़ा दिया।

काव्या के वे भारी, संगमरमरी गोरे चूतड़ और उनकी गहराई के बीच फंसी उसकी गुलाबी लेस वाली भीगी पेंटी दोबारा ताऊजी की आंखों के सामने पूरी तरह नग्न हो गई!

और फिर...

काव्या ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया।

उसने अपनी उंगलियों को अपनी उस भीगी हुई पेंटी के भीतर डाला।

उसने अपनी चूत की दहकती हुई, रसभरी फांकों के बीच अपनी दो उंगलियां उतारीं। उसकी चूत उस वक्त इतनी ज्यादा गीली और काम रस से भरी थी कि उंगलियों के चलते ही एक धीमी सी छप छप आवाज हुई।

काव्या ने अपनी उंगलियों को अपनी चूत के उस गाढ़े, चिपचिपे पानी से पूरी तरह लथपथ कर लिया।

फिर उसने अपना हाथ बाहर निकाला।

चांदनी की रोशनी में, काव्या की उंगलियां उसके अपने गर्म काम रस से चमक रही थीं!

काव्या ने उन भीगी उंगलियों को अपनी दोनों नंगी, गोरी जांघों के अंदरूनी हिस्से पर फेरना शुरू किया। उसने अपनी दोनों चिकनी रानों के बीच उस चिकनाहट को अच्छी तरह मल दिया, ताकि वहां एक फिसलन भरी, चिकनी घाटी तैयार हो जाए।

ताऊजी यह सब देखकर अवाक खड़े थे। उनकी सांसें अटक चुकी थीं।

काव्या ने अपनी गर्दन को पीछे मोड़ा।

उसकी आंखों में हवस और समर्पण का ऐसा नशा था जिसने उस बूढ़े पहलवान के होश उड़ा दिए।

काव्या ने अपना हाथ पीछे बढ़ाया और ताऊजी के उस दहकते हुए लंड को दोबारा पकड़ लिया।

उसने बहुत धीमे से, ताऊजी के उस विशाल अंग को खींचा और अपनी दोनों नंगी जांघों के बीच ठीक उस जगह जहां उसने अपना काम रस मला था टिका दिया!

और फिर... काव्या ने अपनी दोनों गोरी, भरी पूरी जांघों को पूरी ताकत से आपस में भींच लिया!

उफ्फफ...!

ताऊजी के हलक से एक तड़पती हुई, मदहोश गुर्राहट निकली!

काव्या की उन दो गर्म, मखमली और पसीने से भीगी गोरी रानों ने ताऊजी के उस साढ़े आठ इंच के भारी हथियार को अपने शिकंजे में ऐसा कसा जैसे कोई रेशमी अजगर किसी शिकार को जकड़ लेता है!

ताऊजी को समझ आ गया था।

यह कोई पेनेट्रेशन नहीं था... यह मर्यादा की उस रेखा को छुए बिना, एक जवान बहू द्वारा अपने ससुर के पौरुष को अपनी जांघों की मखमली गुफा में समर्पित करने का स्वर्गीय खेल था!

ताऊजी ने अपनी दोनों भारी हथेलियां काव्या के उन नंगे, संगमरमरी चूतड़ों पर जमा दीं।

उन्होंने अपनी कमर को पीछे खींचा... और फिर एक सधे हुए, गहरे झटके के साथ अपने लंड को काव्या की भींची हुई जांघों के बीच आगे धकेल दिया!

सरर्र... छपाक!

काव्या के रस की चिकनाहट और ताऊजी के लंड के काम रस ने मिलकर उस रगड़ को इतना फिसलन भरा बना दिया था कि ताऊजी का वो भारी औजार मक्खन की तरह काव्या की दोनों रानों के बीच आगे पीछे फिसलने लगा!

हर धक्के के साथ, ताऊजी के लंड की वो चौड़ी, गर्म सुपारी काव्या की पेंटी के पतले कपड़े के ऊपर से सीधे उसकी चूत के मुहाने और उसके दाने से घिसटती हुई गुजरती थी!

काव्या के हलक से एक तीखी, कटी फटी सिसकारी फूट पड़ी:

"आह्ह... उफ्फ... ताऊजी..."

ताऊजी ने अपनी रफ्तार बढ़ा दी।

वे किसी मतवाले सांड की तरह अपनी कमर को आगे पीछे चला रहे थे। उनके दोनों हाथ काव्या के गोरे चूतड़ों के मांस को अपनी उंगलियों में भींच रहे थे, उन्हें गूंथ रहे थे।

कमरे के सन्नाटे में एक लयबद्ध, मदहोश कर देने वाली आवाज गूंजने लगी

थप... थप... थप...!

ताऊजी की भारी जांघें हर धक्के के साथ काव्या के बर्फ जैसे सफेद चूतड़ों से टकरा रही थीं। मांस से मांस की वो टक्कर, बिस्तरों की चरमराहट और उन दोनों की हांफती हुई सांसें...

हैदराबाद के उस होटल में, लैपटॉप के सामने बैठा मैं अपने पसीने में नहा चुका था।

मेरी आंखें उस स्क्रीन से हट नहीं पा रही थीं। स्क्रीन पर जो कुछ दिख रहा था, वो किसी भी कोण से सामान्य संभोग से कम नहीं था... फर्क सिर्फ इतना था कि वो औजार चूत के भीतर नहीं, चूत के बिल्कुल मुहाने पर दो गोरी जांघों के बीच पिस रहा था!

ताऊजी की सांसें अब किसी जंगली जानवर की तरह उखड़ रही थीं। उनका चेहरा लाल पड़ चुका था।

काव्या भी अपनी जांघों को और कसकर भींच रही थी, अपनी कमर को पीछे उछालकर ताऊजी के हर धक्के का स्वागत कर रही थी।

और फिर...

उस बेपनाह सुख की आंधी में, ताऊजी का नियंत्रण टूटने लगा।

उन्होंने अपने दोनों हाथों को काव्या के चूतड़ों से हटाया...

और उनके वे खुरदरे, भारी हाथ धीरे धीरे काव्या की कमर से ऊपर सरकते हुए... उसकी नाइटी के भीतर झूलते उन मदमस्त ३४डी स्तनों की तरफ बढ़ने लगे!
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RE: Maryada Ki Dararein: Jab Pati Ne Hi Rachi Apni Sanskari Biwi Ki Sej - by wofeloh916 - 1 hour ago



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