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Incest परिवार के गंदे राज़
#88
सुबह
अमन की नींद अभी पूरी तरह नहीं टूटी थी कि माँ की नरम आवाज ने उसे जगाया।
“अमन… उठो बेटा। सूरज निकल आया है।”
माँ सुशीला बिस्तर के किनारे खड़ी थीं। उन्होंने धीरे से उसका कंधा दबाया। अमन ने आँखें खोलीं। माँ की साड़ी का हल्का गुलाबी रंग सुबह की रोशनी में चमक रहा था। पल्लू ठीक से बँधा था, लेकिन उनकी गर्दन और हल्की खुली हुई जूड़े की लटें अमन की नज़र में आ गईं। एक पल के लिए उसका मन उलझ गया। एक तरफ यह उसकी माँ थीं… वही माँ जिन्होंने उसे पाला-पोसा। दूसरी तरफ वह औरत जिसकी जोरदार चुदाई वह दो बार अपनी आँखों से देख चुका था—एक बार बाबा के साथ, एक बार खेत में। दोनों तस्वीरें एक साथ दिमाग में घूम गईं। उसने जल्दी से नज़रें नीचे कर लीं।
“हाँ माँ… उठ रहा हूँ,” उसने कहा। आवाज में अभी नींद बाकी थी।
माँ मुस्कुराईं। “आज कॉलेज से लौटकर सीधा शहर चले जाना। घर का कुछ सामान लाना है और एक दवाई भी। लिस्ट मैं बाद में दे दूँगी। अकेले ही चले जाना, मैं नहीं आ पाऊँगी।”
“ठीक है माँ।”
माँ उसके माथे पर हल्का हाथ फेरकर चली गईं। अमन उठकर बैठ गया। दिल की धड़कन थोड़ी तेज थी। माँ का चेहरा अभी भी आँखों के सामने था।
नाश्ते का समय था। आँगन वाली बड़ी मेज पर सभी औरतें जमा थीं—माँ, सरला चाची, कमला चाची, कविता और मीना। अमन अपनी जगह पर बैठा। कमला चाची ठीक उसके सामने थीं। नाश्ता शुरू हुआ। रोटी, सब्ज़ी, दही… सब सामान्य लग रहा था। तभी अमन ने महसूस किया—मेज के नीचे से कोई नरम और गर्म चीज़ उसकी जाँघ पर फिसल रही है।
कमला चाची ने माँ से सामान्य स्वर में बात करते हुए अपना दायाँ पैर आगे बढ़ाया। उनकी एड़ी अमन की जाँघ के अंदरूनी हिस्से पर टिकी। फिर धीरे-धीरे ऊपर सरकने लगी। पैंट के ऊपर से ही उन्होंने अपने पैर की उंगलियों से अमन के लंड को दबाया। अमन का निवाला मुँह में ही रह गया। कमला चाची ने आँखें उठाकर उसकी तरफ देखा। आँखों में गहरी शरारत थी। उन्होंने पैर से लंड को सहलाना शुरू कर दिया—जड़ से लेकर सिर तक, धीरे-धीरे, दबाव बढ़ाते हुए।
अमन ने मेज के नीचे हाथ बढ़ाकर उनका पैर पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कमला चाची ने और सटा दिया। लंड पैंट के अंदर पूरी तरह सख्त हो चुका था। कमला चाची ने पैर की उंगलियों से उसके सिर को दबाना शुरू कर दिया। अमन की साँसें भारी हो गईं। वह रोटी तोड़ते-तोड़ते मुश्किल से निगल पा रहा था। नाश्ता खत्म होने तक उसकी हालत खराब हो चुकी थी। कमला चाची ने आखिर में एक जोरदार दबाव दिया और फिर पैर हटा लिया। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
कॉलेज में राधा गली में मिली। दोनों ने हल्की-फुल्की बातें कीं। राधा आज थोड़ी ज्यादा खुश लग रही थी। लेकिन राजिया की निगाहें अमन को कॉलेज में बार-बार चुभ रही थीं। वह अमन को इस तरह घूर रही थी जैसे वह उसके शरीर के अंदर तक देखना चाहती हो। कक्षा में, ब्रेक में, गलियारे में—हर जगह उसकी गहरी, भारी निगाहें अमन का पीछा कर रही थीं। अमन ने जानबूझकर उसकी तरफ पीठ किए रखी, लेकिन उसकी मौजूदगी महसूस हो रही थी।
कॉलेज खत्म होने के बाद अमन ने रुक्साना का इंतजार किया। खेतों वाले रास्ते पर थोड़ी देर रुका, लेकिन वे नहीं मिलीं। शायद कल की लंबी और जोरदार चुदाई की वजह से शरीर में दर्द हो रहा होगा। अमन ने राहत भरी साँस ली और घर की तरफ बढ़ गया।
घर पहुँचकर आँगन में कविता अकेली कपड़े सुखा रही थी। मीना अंदर थी। अमन उसके पास गया।
“आज अकेली काम कर रही हो दीदी?” उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
कविता ने सिर उठाया। पल्लू थोड़ा सा खिसका हुआ था। “हाँ। तू कॉलेज से आ गया? माँ तुझे शहर भेज रही हैं न?”
अमन चौकी पर उसके पास बैठ गया। “हाँ। तू इन दिनों और भी सुंदर लगने लगी है। पहले इतनी नहीं लगती थी।”
कविता के गाल हल्के गुलाबी हो गए। उसने पल्लू ठीक करते हुए कहा, “बातें मत बना… जा कपड़े बदल। माँ इंतजार कर रही होंगी।” लेकिन आवाज में मना करने वाला स्वर नहीं था। बल्कि हल्की शर्म और खुशी दोनों थीं। अमन मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया। कविता उसकी पीठ देखती रह गई।
अमन कमरे में टी-शर्ट बदल रहा था कि दरवाजा अचानक धक्का खाकर खुला। कमला चाची अंदर आ गईं। उन्होंने पीछे मुड़कर सिटकिनी लगा दी और सीधे अमन की तरफ बढ़ीं।
अमन चौंक गया। “चाची… अबही…?”
कमला चाची ने एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने अमन की टी-शर्ट पकड़कर अपनी तरफ खींचा और उसके होंठों पर जोर से अपने होंठ रख दिए। गहरा, गीला और भूखा चुंबन। जीभ अंदर तक चली गई। अमन पहले सहम गया, फिर उसकी कमर पकड़कर जवाब देने लगा। दोनों की साँसें तेज हो गईं। कमला चाची ने अमन की पैंट के नाड़े में हाथ डाल दिए।
चुंबन तोड़ते हुए वे हांफते हुए बोलीं, “मेरी चूत बहुत गरम हो चुकी है अमन… सुबह से तरस रही हूँ। इसका पानी कब निकालेगा?”
अमन ने उनकी कमर पकड़ी। “चाची… आज नहीं। माँ ने शहर भेजा है। सामान लाना है।”
कमला चाची ने उसका लंड पैंट के ऊपर से कसकर पकड़ लिया। “मैं मर जाऊँगी… थोड़ा सा ही सही… निकाल दे मेरा पानी। तेरा चाहे न निकले।”
अमन ने गहरी साँस ली। उनकी आँखों में असली बेचैनी थी। “अरे चाची… चलो ठीक है। एक बार तुम्हारा पानी निकाल देता हूँ।”
कमला चाची की आँखों में चमक आ गई। अमन ने उन्हें दीवार से सटा दिया। उनकी साड़ी का पल्लू एक झटके में ऊपर किया। साया उठाया। अंदर कोई पैंटी नहीं थी। चूत पूरी तरह नंगी, चमकदार और पहले से गीली थी। अमन ने थूक लगाकर अपनी उंगलियाँ गीली कीं और दो उंगलियाँ सीधे उनकी चूत में डाल दीं।
“आआआह्ह्ह… अमन…!” कमला चाची की लंबी सिसकारी निकली। उनके नाखून अमन की बाहों में गड़ गए।
अमन ने उंगलियाँ निकालकर अपना लंड बाहर निकाला। थूक से गीला किया और एक ही जोरदार धक्के में अंदर तक डाल दिया। कमला चाची की पीठ दीवार से लग गई। अमन ने उनकी एक टाँग अपनी कमर पर चढ़ाई और जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्के के साथ उनकी गाँड दीवार से टकरा रही थी।
“आह्ह… अमन… हाँ… ऐसे… आआह्ह… कल रात वाली बात याद आ रही है… जब तूने मुझे जानवर की तरह चोदा था… दोनों छेद… आआह्ह…!”
कमला चाची गंदी और दबी हुई सिसकारियाँ ले रही थीं। अमन लगभग दस-बारह मिनट तक उसी रफ्तार से चोदता रहा। कमला चाची की चूत से पानी की आवाज आने लगी। उनका शरीर काँपने लगा।
“आआआह्ह… निकल रहा है… अमन… जोर से… आआह्ह… माँ… मैं आ गई… आआआह्ह्ह…!”
उनका पानी जोर से अमन के लंड पर छूट गया। शरीर की लहरें काँपती रहीं। अमन ने कुछ और गहरे धक्के मारे, फिर लंड बाहर निकाल लिया। खुद का पानी नहीं गिराया। लंड अभी भी पूरी तरह सख्त और चमक रहा था।
कमला चाची दीवार से लगी हांफ रही थीं। अमन ने उनके चेहरे को दोनों हाथों में लिया और एक लंबा, गहरा चुंबन किया। जीभ फिर से मिल गई। चुंबन तोड़ने के बाद कमला चाची ने उसकी टी-शर्ट ठीक की और साया नीचे किया।
“शाम को बात करते हैं…,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। फिर सिटकिनी खोलकर चुपचाप निकल गईं।
अमन का लंड अभी भी तना हुआ दर्द कर रहा था। वह जल्दी से वॉशरूम गया। पेशाब किया। ठंडे पानी से बार-बार धोया। किसी तरह उसे शांत किया। थोड़ी देर बाद हालत काबू में आई।
वह बाहर आया और माँ के पास गया। माँ ने एक कागज की लिस्ट दी—घर का राशन, कुछ मसाले और एक दवाई का नाम।
“ये सब ले आना। दवाई जरूर लेना। और जल्दी लौटना,” माँ ने कहा।
अमन ने लिस्ट जेब में रखी। बाइक की चाबी ली और बाहर निकला।
अब शहर का रास्ता खुला था।


अमन बाइक पर शहर की सड़क पर निकल चुका था। दोपहर की धूप सिर पर जल रही थी, लेकिन बाइक की रफ्तार से आने वाली हवा राहत दे रही थी। उसने जेब से माँ की दी हुई लिस्ट निकाली। साफ लिखावट में राशन, मसाले, तेल, साबुन और आखिर में एक दवाई का नाम लिखा था।
पहले वह बड़े बाजार की तरफ मुड़ा। राशन की थोक दुकान पर रुककर चावल, दाल, चीनी और आटा ले लिया। फिर मसाले वाली दुकान में हल्दी, मिर्च, जीरा और गरम मसाला। हर दुकान पर थोड़ा मोल-भाव किया, पैसे दिए और सामान बाइक के दोनों साइड में रस्सी से बाँधता गया। लगभग पैंतालीस मिनट में लिस्ट का आधा हिस्सा पूरा हो गया।
इसके बाद उसका मन अपने लिए कुछ लेने का हुआ। पिछले कुछ दिनों से शहर वाले कपड़े पहनने का शौक बढ़ गया था। एक अच्छे शोरूम में घुसा। ट्रायल रूम में जाकर तीन-चार जींस और टी-शर्ट्स intercambi। आखिर में एक डार्क नेवी ब्लू स्ट्रेचेबल जींस, दो प्लेन ब्लैक और वाइट टी-शर्ट और एक हल्की स्काई ब्लू फॉर्मल शर्ट चुन ली। बिल देखा तो थोड़ा ज्यादा था, लेकिन उसने पैसे दे दिए। पैकेट बाइक पर रखे और आगे बढ़ा।
अब बारी थी दवाई की। बाजार के आखिरी छोर पर एक साफ-सुथरी केमिस्ट की दुकान थी। अंदर गया। लिस्ट दिखाते हुए बोला, “यह दवाई चाहिए।”
दुकानदार ने नाम पढ़ा, थोड़ा सा पीछे मुड़ा और एक छोटा सफेद पैकेट निकाला। अमन ने पैकेट हाथ में लिया। ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—Pregnancy Test Kit। नीचे छोटे अक्षरों में “Home Urine Pregnancy Test”।
अमन के हाथ काँप गए। पैकेट अचानक भारी लगने लगा। दिमाग में एक के बाद एक ख्याल आने लगे। क्या माँ प्रेग्नेंट हैं? बाबा वाली रात के बाद? या फिर कोई और…? उसने जल्दी से पैसे दिए, पैकेट को जेब में दबाया और दुकान से निकल आया। बाहर आकर बाइक पर बैठ गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मन में तय किया—रात को रेणु दीदी से जरूर पूछूँगा। आज ही।
सामान लदे बाइक को उसने उसी कॉफी शॉप की तरफ मोड़ दिया जहाँ पिछली बार सोनाल मिली थी। पार्किंग में बाइक लगाई। आईने में अपना चेहरा देखा—पसीना पोंछा, बाल ठीक किए। गहरी साँस ली और अंदर चला गया।
कॉफी शॉप में हल्की भीड़ थी। वह पुरानी वाली कोने की सीट पर जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद सोनाल खुद ट्रे लेकर निकली। आज उसने हल्के गुलाबी रंग की टॉप पहनी हुई थी। बाल खुले थे। वह अमन की टेबल के पास आई तो थोड़ा रुक गई।
“आप फिर आ गए,” उसने कहा। आवाज में न नाराजगी थी, न ज्यादा खुशी। बस हल्की सी थकान।


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अमन ने हिम्मत जुटाई। “हाँ। कॉफी अच्छी लगती है यहाँ की। एक कॉफी दे दीजिए।”
सोनाल ने सिर हिलाया और अंदर चली गई। दो मिनट बाद कॉफी लेकर आई। कप टेबल पर रखते हुए बोली, “शुगर अलग है।”
अमन ने अचानक कह दिया, “सोनाल जी… एक मिनट बैठ सकती हैं क्या?”
सोनाल ने उसकी तरफ देखा। कुछ पल सोचा, फिर सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। “बोलिए।”
अमन ने कॉफी की तरफ देखा, फिर उसकी तरफ। “मैं गाँव से हूँ। यहाँ कभी-कभी आता हूँ। आपकी शॉप शांत लगती है… इसलिए रुक जाता हूँ। पिछली बार आपका नाम वेटर से पूछ लिया था। माफ कीजिए अगर बुरा लगा हो।”
सोनाल ने हल्की भौंहें चढ़ाईं। “आपको मेरा नाम जानने की क्या जरूरत पड़ी?”
“कोई जरूरत नहीं,” अमन ने ईमानदारी से कहा। “बस… अच्छा लगा आपसे। इसलिए।”
सोनाल कुछ देर चुप रही। फिर धीरे से बोली, “मैं ज्यादा बातें नहीं करती अजनबियों से।”
“मैं अजनबी नहीं रहना चाहता,” अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। “कभी-कभी जब आऊँ तो नमस्ते कर लूँ… इतना तो चल जाएगा न?”
सोनाल के होंठों पर हल्की सी मुस्कान तैर गई। बहुत हल्की। “नमस्ते करने में कोई बुराई नहीं। लेकिन ज्यादा उम्मीद मत रखना।”
अमन ने सिर हिलाया। “ठीक है।”
सोनाल उठ गई। “कॉफी ठंडी हो जाएगी।” इतना कहकर वह दूसरी टेबल की तरफ चली गई। अमन ने कॉफी धीरे-धीरे पी। दिल के अंदर एक हल्की सी गर्माहट फैल गई थी। पहली बार उसने उससे सीधी बात की थी। और वह भाग नहीं थी।
कॉफी खत्म करके वह उठा। बाइक की तरफ बढ़ा। सामान चेक किया। जेब में प्रेग्नेंसी टेस्ट किट का पैकेट अभी भी चुभ रहा था। दिमाग में एक तरफ सोनाल की हल्की मुस्कान थी, दूसरी तरफ वह सफेद पैकेट।
वह बाइक स्टार्ट करके गाँव की तरफ निकल पड़ा। सूरज ढलने लगा था।
शहर पीछे छूट रहा था… लेकिन कई सवाल उसके साथ चल रहे थे।


अमन जब गाँव पहुँचा तो शाम के लगभग साढ़े छह बज रहे थे। बाइक के दोनों साइड में सामान बँधा था। उसने आँगन में बाइक रोकी और धीरे-धीरे सामान उतारने लगा। माँ रसोई से निकलकर आ गईं।
“आ गए? ले आए सब?” माँ ने पूछा।
“हाँ माँ। सब ले आया।” अमन ने राशन और बाकी पैकेट उनके हाथों में दिए। आखिर में जेब से वह छोटा सफेद पैकेट निकाला और माँ की तरफ बढ़ा दिया। माँ ने पैकेट लिया, बस एक बार देखा और बिना कुछ बोले अपने पल्लू में छुपा लिया। अमन ने जानबूझकर कोई सवाल नहीं किया।
थकान और दिमाग के उथल-पुथल ने उसे जल्दी कमरे में धकेल दिया। उसने बस हाथ-मुँह धोया, टी-शर्ट बदली और बिस्तर पर गिर गया। आँखें बंद करते ही नींद आ गई। शरीर थका हुआ था, लेकिन मन अभी भी उस सफेद पैकेट और सोनाल की हल्की मुस्कान के बीच झूल रहा था।
रात के लगभग एक बज रहे थे। घर पूरी तरह शांत हो चुका था। अमन की नींद अचानक टूटी जब दरवाजे पर बहुत हल्की दस्तक हुई। रेणु अंदर आईं। लालटेन की लौ कम रखी हुई थी। उन्होंने दरवाजा बंद किया, सिटकिनी लगाई और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
अमन उठकर बैठ गया। चेहरे पर नींद और बेचैनी दोनों थीं।
“दीदी…” उसने धीमी आवाज में कहा, “वह दवाई… प्रेग्नेंसी टेस्ट किट थी। क्या माँ…?”
रेणु ने सिर हिलाया। “नहीं। वह दवाई सरला चाची के लिए थी।”
अमन की आँखें थोड़ी चौड़ी हो गईं। “सरला चाची? लेकिन…?”
रेणु ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। “अब तुम ध्यान से सुनो। और बीच में कोई सवाल मत पूछना। पूरा सुन लेना।”
अमन ने होंठ भींचकर सिर हिलाया।
रेणु ने गहरी साँस ली। आवाज बहुत धीमी लेकिन साफ थी।
“सरला चाची और तुम्हारे चाचा बहुत सालों से बच्चे की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन हो नहीं पा रहा। मैंने उन्हें समझा-समझाकर टेस्ट करवाए। रिपोर्ट आई तो पता चला कि कमी किसी में नहीं है… सिर्फ तुम्हारे चाचा में है। वे बच्चा पैदा नहीं कर सकते। यह बात वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। उनका मर्दाना अभिमान उन्हें ऐसा करने नहीं देगा। अगर एक साल और गुजर गया और कुछ नहीं हुआ तो चाचा दूसरी शादी कर सकते हैं। घर में दूसरी औरत आएगी… सरला चाची का क्या होगा?”
रेणु थोड़ा रुकीं। अमन की आँखों में आँखें डालकर बोलीं,
“मैंने सरला चाची से कई रातें बात की। बहुत रोईं वे। बहुत मना किया। लेकिन आखिर में मैंने उनसे साफ कहा—अगर तुम्हें बच्चा चाहिए और घर बचाना है तो सिर्फ एक ही रास्ता है। किसी ऐसे मर्द से संबंध बनाओ जो तुम्हें सच में गर्भ धारण करा सके। पहले तो उन्होंने मेरा हाथ तक नहीं छूने दिया। कहा कि वे ऐसा पाप नहीं करेंगी। लेकिन धीरे-धीरे… हफ्तों की बातों के बाद… वे मान गईं।”
रेणु ने अमन का हाथ पकड़ लिया। उनकी हथेली ठंडी थी।
“अब मैं तुमसे एक बात पूछती हूँ अमन। और तुम सोच-समझकर जवाब देना। क्या तुम अपनी सरला चाची को माँ बनने का सुख दे सकते हो?”
अमन जैसे किसी ने पत्थर से मार दिया हो। शरीर की हर नस तन गई। साँसें उथली हो गईं। सरला चाची… जो उसे बचपन से अपने बेटे की तरह पालती थीं। जो उसके माथे पर हाथ रखती थीं जब वह बीमार होता था। जो उसके लिए मिठाई छुपाकर रखती थीं। वही सरला चाची…?
दिमाग में एक के बाद एक ख्याल दौड़ने लगे। अगर उसने मना कर दिया तो? सरला चाची किसी और के पास जाएँगी। कोई गलत आदमी मिल गया तो? कोई बीमारी फैल गई तो? घर का राज खुल गया तो? चाचा ने दूसरी शादी कर ली तो सरला चाची का क्या होगा?
अमन ने आँखें बंद कर लीं। माथा दोनों हाथों से पकड़ लिया। कमरे में सिर्फ उसकी भारी साँसें सुनाई दे रही थीं। बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोला। रेणु भी चुपचाप उसका हाथ पकड़े बैठी रहीं।
आखिरकार अमन ने आँखें खोलीं। आवाज बहुत धीमी और भारी थी।
“हाँ दीदी… मैं हाँ कहता हूँ।”
रेणु ने उसकी आँखों में झाँका। “पक्का? बाद में पीछे तो नहीं हटोगे?”
अमन ने सिर हिलाया। “नहीं। मैं करूँगा। लेकिन… सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं नहीं चाहता कि वे किसी और के पास जाएँ।”
रेणु ने उसका हाथ जोर से दबाया। उनकी आँखों में हल्की नमी थी। उन्होंने अमन के माथे पर बहुत हल्का सा होंठ रखा।
“तुम बड़े हो गए हो अमन,” उन्होंने फुसफुसाकर कहा। “अब सो जाओ। बाकी बातें बाद में करेंगे।”
रेणु उठ खड़ी हुईं। लालटेन उठाई और दरवाजे तक गईं। एक बार पीछे मुड़कर अमन को देखा—वह अभी भी पत्थर की तरह बैठा था। फिर वे चुपचाप निकल गईं।
अमन अँधेरे में अकेला रह गया। सरला चाची का चेहरा आँखों के सामने घूम रहा था। बचपन की यादें, उनकी मुस्कान, उनका स्पर्श… और अब यह नया, भारी सच।
वह धीरे से लेट गया। आँखें खुली की खुली रह गईं।
रात बहुत गहरी थी।
और अमन के कंधों पर एक ऐसा बोझ आ चुका था जिसे उतारना अब आसान नहीं था।
Fuckuguy
albertprince547;
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RE: परिवार के गंदे राज़ - by Fuckuguy - Today, 07:56 AM



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