13-10-2026, 04:39 PM
अमन की आँखें सुबह की रोशनी के साथ खुलीं। शरीर अभी भी भारी था, लेकिन कल जितनी थकान नहीं रह गई थी। लंड में हल्का दर्द बाकी था। उसने करवट ली, फिर उठकर बैठ गया। आज कॉलेज जाना जरूरी था।
नहा-धोकर तैयार हुआ। नाश्ता करके निकला। गली में राधा पहले से खड़ी थी। दोनों की निगाहें मिलीं। राधा ने हल्की मुस्कान दी।
“आज आ गए कॉलेज?” राधा ने धीमे स्वर में पूछा। “कल छुट्टी मार ली थी।”
अमन मुस्कुराया। “थोड़ा आराम चाहिए था। तबीयत ठीक नहीं लग रही थी।”
दोनों साथ-साथ कॉलेज की तरफ चलने लगे। बातें हल्की रहीं—पढ़ाई, मौसम, छोटी-मोटी बातें। राधा के चेहरे पर राहत थी कि अमन फिर सामान्य व्यवहार कर रहा है। कक्षा में पहुँचते ही अमन ने देखा कि राजिया आज आ गई थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी। निगाहें अमन पर गईं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। राजिया ने बहुत हल्के से सिर हिलाया।
ब्रेक में राजिया मौका देखकर अमन के पास आई। आसपास भीड़ थी, लेकिन उसने धीमी आवाज में पूछा, “घर कब आओगे?”
अमन ने चारों तरफ देखा। राधा अपनी सहेलियों के साथ बात कर रही थी, उनकी तरफ पीठ किए हुए। अमन ने राजिया की तरफ झुककर बहुत धीमे स्वर में कहा, “जल्द। सब्र करो मेरी जान।”
राजिया के गाल हल्के लाल हो गए। उसने कुछ नहीं कहा, बस नज़रें झुकाकर वहाँ से चली गई। अमन ने राधा की तरफ देखा—वह कुछ नहीं देख पाई थी।
कॉलेज खत्म होने के बाद अमन घर पहुँचा। लंड में दर्द अभी भी हल्का-हल्का हो रहा था। उसने माँ से कहा, “माँ, पिताजी की बाइक दे दो। शहर जाकर एक दवाई लेनी है। डॉक्टर ने बताई थी।”
माँ ने अनुमति दे दी। अमन ने बाइक निकाली और पास के शहर की तरफ निकल पड़ा। हवा चेहरे पर लग रही थी। कई दिनों बाद शहर का रास्ता अच्छा लग रहा था। दिमाग थोड़ा हल्का हो रहा था।
शहर पहुँचकर उसने एक केमिस्ट की दुकान ढूँढी। रेणु ने जो नाम बताया था, वही ट्यूब खरीद ली। दवाई लेकर वह थोड़ा और आगे गया। नज़र एक साफ-सुथरी कॉफी शॉप पर पड़ी। मन किया थोड़ी देर रुकने का। बाइक साइड में लगाई और अंदर चला गया।
कॉफी शॉप आधुनिक थी। हल्की संगीत की आवाज आ रही थी। अमन ने एक कोने में बैठकर चाय का ऑर्डर दिया। थोड़ी देर बाद एक लड़की ट्रे लेकर आई।
अमन ने सिर उठाया… और बस देखता रह गया।
लड़की बिल्कुल किसी फिल्मी हीरोइन जैसी लग रही थी। गोरी रंगत, लंबे बाल, तेज फीचर्स। जेह्नवी कपूर जैसी अदाएँ। आधुनिक कपड़ों में थी—फिट जींस और हल्के रंग की टॉप। चलने का अंदाज भी शहर जैसा था। वह मुस्कुराते हुए अमन के टेबल के पास आई।
“सर, योर टी,” उसने अंग्रेजी में कहा। आवाज साफ और मीठी थी।
अमन जैसे सपने से जागा। “हाँ… थैंक यू।”
लड़की ने कप टेबल पर रखा, एक बार मुस्कुराई और दूसरी टेबल की तरफ चली गई। अमन उसकी पीठ देखता रह गया। मन में एक अजीब सा खिंचाव पैदा हो गया। इतनी आधुनिक और खूबसूरत लड़की… गाँव के लड़के के लिए बिल्कुल अलग दुनिया जैसी लग रही थी।
उसने चाय पी। लेकिन मन नहीं भरा। उसने एक वेटर को बुलाया। पाँच सौ का नोट देते हुए धीमे स्वर में पूछा, “वो जो लड़की थी… चाय देने वाली… वो कौन है?”
वेटर ने नोट लिया और मुस्कुराते हुए बताया, “वो इस कॉफी शॉप की मालकिन हैं सर। सोनाल जी। खुद संभालती हैं सब कुछ।”
अमन ने सिर हिलाया। सोनाल। नाम भी कानों में अच्छा लगा। वह उससे बात करना चाहता था, लेकिन जल्दबाजी नहीं करनी थी। आज पहली मुलाकात थी। बस देखने में ही सब कुछ कह गया था।
चाय खत्म करके वह उठा। बाइक की तरफ बढ़ा। शहर की हलचल छोड़कर गाँव की तरफ निकल पड़ा। दिमाग में सोनाल का चेहरा बार-बार आ रहा था—उसकी मुस्कान, उसकी आवाज, उसका आधुनिक अंदाज।
गाँव के करीब पहुँचते-पहुँचते सूरज ढलने लगा था। और रस्ते में आगे कुछ और इंतजार कर रहा था।
गाँव के बाहरी रास्ते पर अमन बाइक धीमी कर रहा था कि अचानक एक परिचित आवाज आई।
“अरे बाबूजी के बेटे!”
अमन ने बाइक रोक दी। रुक्साना सड़क के किनारे खड़ी थीं। काले सूट में। बाल खुले हुए। उन्होंने अमन को देखते ही मुस्कुरा दिया और पास आ गईं।
“कहाँ चले गए थे इतनी देर?” रुक्साना ने पूछा। आवाज में हल्की शिकायत और शरारत दोनों थी। “मैं तो सोच रही थी कहीं खो तो नहीं गए।”
अमन बाइक पर बैठे-बैठे मुस्कुराया। “शहर गया था काकी। दवाई लेने।”
रुक्साना और करीब आ गईं। उन्होंने बाइक के हैंडल पर हाथ रख दिया। उंगलियाँ अमन की उंगलियों के बहुत पास थीं। “दवाई… या कोई और चीज?” उन्होंने आँखें सिकोड़ते हुए कहा। “चेहरा देखकर लग रहा है मन कहीं और उलझा हुआ है।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। रुक्साना की निगाह साफ चुनौती दे रही थी। उन्होंने अपना पल्लू ठीक करते हुए और धीमी आवाज में कहा, “कभी हमारे बगीचे में भी आ जाया करो। आम तो अब बहुत मीठे हो गए हैं… और कुछ चीजें तो छूने से भी मीठी लगती हैं।”
अमन के मन में ख्याल आया—“एक बार रेणु दीदी से पूछकर इसका भी काम खत्म कर दूँ। वैसे भी इसकी मोटी गाँड का ख्याल कई दिनों से दिमाग में है।” उसने हल्की मुस्कान दी। “जल्द ही आऊँगा काकी। वादा।”
रुक्साना ने उसका हाथ हल्के से दबाया। “वादा याद रखना। ज्यादा देर मत लगाना।” फिर वे मुस्कुराते हुए एक तरफ हो गईं। अमन ने बाइक स्टार्ट की और घर की तरफ बढ़ा।
घर पहुँचते ही आँगन में कमला चाची खड़ी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही आवाज लगाई।
“कहाँ खो गए थे इतनी देर? बाइक लेकर निकले थे तो लगा कहीं भाग ही गए।”
अमन पास गया। चारों तरफ देखा। आँगन खाली था। माँ अंदर थीं। उसने हल्की शरारत भरी आवाज में कहा, “चाची, आपकी याद आ रही थी इसलिए जल्दी लौट आया।”
कमला चाची की आँखों में चमक आ गई। अमन ने एक बार फिर आसपास देखा, फिर साड़ी के पल्लू के अंदर हाथ सरका दिया। उंगलियाँ सीधे उनकी चूत पर जा लगीं। कपड़ों के ऊपर से ही। बहुत गरम और थोड़ी नम थी।
कमला चाची की कमर हल्की सी काँप गई। “आह्ह… शैतान… यहाँ… कोई देख लेगा…” लेकिन उन्होंने अमन का हाथ नहीं हटाया। बल्कि एक पल के लिए और सट गईं।
अमन ने उंगलियों से हल्का दबाव डाला, फिर हाथ निकाल लिया। “बाद में मिलते हैं चाची।” इतना कहकर वह मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ भाग गया। पीछे कमला चाची खड़ी मचलती रह गईं।
कमरे में आकर अमन ने तुरंत पैंट का नाड़ा खोला। रेणु वाली ट्यूब निकाली और लंड पर धीरे-धीरे लगाने लगा। ठंडी क्रिम लगते ही हल्का आराम मिला। दर्द कुछ कम हुआ। वह बिस्तर पर लेट गया।
दिमाग में पहले कॉफी शॉप वाली सोनाल का चेहरा आया। इतनी आधुनिक, इतनी अलग। “क्या मैं उसे पटा सकता हूँ? वह शहर की मालकिन है… मैं गाँव का लड़का…” फिर रुक्साना का ख्याल आया। उसकी मोटी गाँड, उसकी बेशर्म निगाहें। “आज रात रेणु दीदी से पूछता हूँ। रुक्साना बहुत तंग कर रही है। इसे भी लंड का सबक सिखाना होगा।”
इन्हीं ख्यालों में उसकी आँखें बंद हो गईं। नींद आ गई।
रात के लगभग बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु अंदर आईं। लालटेन लेकर। उन्होंने अमन को हल्के से जगाया। अमन उठकर बैठ गया।
“सब बताओ,” रेणु ने सीधे कहा।
अमन ने दिन की हर बात विस्तार से बताई—राजिया वाली छोटी बात, शहर जाकर दवाई लेना, कॉफी शॉप में सोनाल से मुलाकात, फिर रास्ते में रुक्साना का फ्लर्ट, और घर आकर कमला चाची के साथ किया गया छोटा सा शरारती स्पर्श।
रेणु ने ध्यान से सुना। रुक्साना वाली बात पर उन्होंने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन ध्यान से करना। वह राजिया की माँ है। कोई गलती हुई तो उलझ सकता है।”
फिर सोनाल वाली बात पर रेणु मुस्कुराईं। “अगर तुम चाहो तो कोई भी लड़की पट सकती हो। तुम्हें बस बातें बनानी आनी चाहिए… और वह तो अब अच्छी आती हैं। इतना टेंशन मत लो।”
अमन ने रेणु का हाथ पकड़ लिया। “दीदी… आपके साथ सुहागरात कब मना सकता हूँ?”
रेणु का चेहरा फिर से हल्का लाल हो गया। उन्होंने अमन की तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा, “ज्यादा शैतान हो गया है तू। सब कुछ तो दे चुकी हूँ तुझे… बस थोड़े दिन और रुक जा।”
फिर उन्होंने अमन के होंठों पर एक नरम लेकिन गहरा चुंबन कर दिया। कुछ पल तक होंठ जुड़े रहे। उसके बाद रेणु उठ खड़ी हुईं।
“सो जाओ। आराम करो।”
वे मुस्कुराते हुए कमरे से निकल गईं।
अमन बिस्तर पर लेटा रहा। रेणु के चुंबन की गर्माहट होंठों पर बाकी थी। लेकिन दिमाग में एक नाम घूम रहा था।
अगला टारगेट—रुक्साना।
वह करवट लेकर सो गया।
अगले दिन अमन ने सामान्य दिनचर्या से कॉलेज गया।
सुबह राधा गली में मिली। दोनों साथ-साथ चले। बातें हल्की रहीं—पढ़ाई, आने वाले टेस्ट, छोटी-मोटी बातें। राधा के चेहरे पर मुस्कान थी। अमन ने जानबूझकर उसके करीब रहकर बात की ताकि वह सहज महसूस करे।
कॉलेज में राजिया ने ब्रेक के समय फिर से मौका निकाला। अमन के पास आकर बहुत धीमे स्वर में पूछा, “कल छुट्टी है न?”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ।”
राजिया ने और कुछ नहीं पूछा। बस एक बार देखा और चली गई। उसकी आँखों में इंतजार साफ था, लेकिन अमन ने कोई वादा नहीं किया।
कॉलेज खत्म होने के बाद अमन घर की तरफ चल पड़ा। गाँव के बाहरी रास्ते पर रुक्साना फिर से मिलीं। वे जैसे जानबूझकर वहीं खड़ी थीं।
“आज भी शहर नहीं गए?” रुक्साना ने मुस्कुराते हुए पूछा।
अमन ने बाइक रोक दी। “नहीं काकी। कल छुट्टी है… रविवार। सोचा था कल आपके बगीचे में आ जाऊँ। आम खाने।”
रुक्साना की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने एक कदम करीब आकर कहा, “दो बजे आना। उस समय खेत में कोई नहीं होता। बिल्कुल अकेले रहेंगे।”
अमन ने सिर हिलाया। “ठीक है काकी। दो बजे।”
रुक्साना मुस्कुरा दीं। “इंतजार रहेगा।”
अमन घर पहुँचा। आँगन में उसकी छोटी बहन कविता कपड़े सुखा रही थी। अमन उसके पास गया।
“आज अकेली काम कर रही हो दीदी?” उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
कविता ने सिर उठाया। “तू आ गया? माँ अंदर हैं।”
अमन ने उसके पास जाकर कहा, “अकेले में कितनी प्यारी लगती हो। रोज नहीं दिखती ऐसी।”
कविता के गाल हल्के लाल हो गए। उसने पल्लू ठीक करते हुए कहा, “बातें मत बना… जा हाथ-मुँह धो ले।” लेकिन आवाज में गुस्सा नहीं था। बल्कि हल्की शर्म थी। अमन मुस्कुराते हुए अंदर चला गया। कविता उसकी पीठ देखती रह गई।
रात का खाना खाकर अमन अपने कमरे में आ गया। आज रेणु नहीं आईं। कमरा शांत था। वह बिस्तर पर लेट गया। दिमाग में कल का दो बजे का समय घूम रहा था—रुक्साना, बगीचा, अकेला खेत।
आँखें बंद करते ही नींद आ गई।
रात बिना किसी दस्तक के गुजर गई।
रविवार की सुबह अमन देर तक सोया रहा। छुट्टी का दिन था। जब उठा तो घर में हल्की-हल्की हलचल थी। आँगन में उसकी दोनों बहनें—कविता और मीना—बैठी बातें कर रही थीं। अमन उनके पास जाकर बैठ गया।
“आज छुट्टी है न,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “तुम दोनों घर में कितना बोर होती होगीं। सोच रहा हूँ… आज तुम्हें फिल्म दिखा लाऊँ?”
दोनों बहनें एक साथ उसकी तरफ देखती रह गईं। मीना ने पूछा, “सच में?”
“हाँ। माँ से पूछ लेता हूँ।” अमन उठा और अंदर गया। माँ से अनुमति ली। माँ ने पहले थोड़ा मना किया, लेकिन अमन के जिद करने पर मान गईं। “जल्दी लौटना। और ध्यान रखना दोनों का।”
अमन ने दोनों बहनों को तैयार होने को कहा। थोड़ी देर में तीनों बाइक पर बैठकर शहर की तरफ निकल गए। अमन बीच में था, दोनों बहनें बारी-बारी से पीछे बैठीं। हवा में उनके बाल उड़ रहे थे। तीनों हँस रहे थे।
शहर पहुँचकर पहले अमन ने उन्हें एक अच्छे शोरूम में ले जाकर नए कपड़े दिलवाए। आधुनिक, हल्के रंग के सूट और टॉप्स। दोनों बहनों ने वहीं ट्रायल रूम में पहनकर दिखाए। अमन देखकर मुस्कुरा दिया।
“लग रही हो दोनों बिल्कुल परियाँ,” उसने कहा। “पहना रहो आज। फिल्म में इसी में जाना है।”
कविता और मीना शर्माते हुए हँस पड़ीं। अमन ने अपने लिए भी एक फिट जींस और काली टी-शर्ट ले ली। पहनकर देखा तो शरीर पर अच्छी लग रही थी। साथ में एक स्टाइलिश चश्मा भी खरीद लिया। तीनों बदलकर बाहर निकले तो लोग भी देख रहे थे।
इसके बाद आइसक्रीम पार्लर में ले जाकर उन्हें उनकी पसंदीदा आइसक्रीम खिलाई। फिर सिनेमा हॉल। फिल्म रोमांटिक कॉमेडी थी। अँधेरे हॉल में अमन बीच में बैठा था। दोनों बहनों के साथ हल्की-फुल्की शरारतें करता रहा—कभी कविता का हाथ पकड़ लेता, कभी मीना के बाल हल्के से खींच देता। दोनों शर्मातीं लेकिन मना नहीं करतीं। फिल्म के दौरान तीनों खूब हँसे।
फिल्म खत्म होने तक बारह बज रहे थे। लौटते समय अमन ने उसी कॉफी शॉप के सामने बाइक रोकी। “थोड़ी कॉफी पी लेते हैं।”
अंदर गए। टेबल लिया। ऑर्डर दिया। थोड़ी देर बाद वही लड़की—सोनाल—ट्रे लेकर आई। लेकिन आज उसका व्यवहार अलग था। चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। थोड़ा गुस्सा और अजीब सा भाव था। उसने कप टेबल पर रखे और बिना ज्यादा बोले चली गई।
मीना ने धीमे स्वर में पूछा, “भैया, ये दीदी इतना गुस्सा क्यों लग रही हैं?”
अमन ने कंधे उचकाए। “मुझे क्या पता। शायद मूड खराब हो।”
कॉफी पीकर तीनों घर की तरफ निकल पड़े। अमन के दिमाग में सोनाल का गुस्सा भरा चेहरा घूम रहा था, लेकिन उसने ज्यादा नहीं सोचा।
घर पहुँचे तो दोपहर हो रही थी। अमन ने सबको आँगन में बुलाया। माँ, सरला चाची, कमला चाची, कविता, मीना—सब आ गईं। अमन ने एक-एक करके पैकेट निकाले। हर एक के लिए नई साड़ी थी। अच्छी, रंग-बिरंगी।
“ये लो… सबके लिए छोटा सा गिफ्ट,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
महिलाएँ हैरान रह गईं। माँ की आँखों में आँसू आ गए। सरला चाची ने अमन के गाल पर चुंबन कर दिया। कमला चाची ने भी मुस्कुराते हुए गाल पर हल्का सा चुंबन किया। कविता और मीना ने एक साथ कहा, “हमारे भैया बेस्ट हैं!”
माँ ने अमन को अपने गले से लगा लिया। आँसू रोक नहीं पा रही थीं। “मेरा बेटा… इतना सोचता है सबका।” धीरे-धीरे बाकी महिलाएँ भी आ गईं। सबने मिलकर अमन को गले लगा लिया। अमन हँसते हुए बोला, “इतना मत दबाओ… मेरी साँसें रुक जाएँगी!”
माँ ने हल्के से उसकी पीठ थपथपाई। “पगले… ऐसा नहीं बोलते। मेरे बेटे को मेरी भी उम्र लग जाए।”
सब हँस पड़े। घर में एक अच्छी सी गर्माहट फैल गई थी। अमन ने सबकी खुशी देखी, फिर धीरे से अपने कमरे की तरफ बढ़ा।
कमरे में आकर उसने घड़ी देखी। डेढ़ बज रहे थे।
अब सिर्फ आधा घंटा बाकी था।
दो बजे… रुक्साना… बगीचा।
वह खिड़की के पास बैठकर इंतजार करने लगा।
दो बजने में दस मिनट बाकी थे।
अमन ने काली टी-शर्ट और जींस में ही रहने का फैसला किया। शहर वाले कपड़े अभी भी पहने हुए थे। चश्मा भी लगा रखा था। घर से निकलते समय माँ ने पूछा तो बस इतना कहा, “थोड़ी देर घूमकर आता हूँ।”
खेतों की पगडंडी पर चलते हुए उसके दिल की धड़कन तेज हो रही थी। दोपहर की धूप थी, लेकिन पेड़ों की छाँव में रास्ता ठंडा लग रहा था। बगीचे के पास पहुँचते ही उसने रुक्साना को देखा।
रुक्साना एक बड़े आम के पेड़ के नीचे खड़ी थीं। आज उन्होंने गहरा लाल रंग का सूट पहना था। सूट टाइट था। उनके भारी स्तन और मोटी गाँड साफ उभर रहे थे। बाल खुले थे और हवा में हिल रहे थे। उन्होंने अमन को देखते ही मुस्कुरा दिया।
“समय पर आ गए,” रुक्साना ने कहा। आवाज में संतुष्टि थी। “सोचा था कहीं भूल तो नहीं गए।”
अमन पास गया। “कैसे भूल सकता हूँ काकी। वादा किया था।”
रुक्साना ने उसे सिर से लेकर पैर तक देखा। “आज तो शहर वाले लग रहे हो। ये कपड़े… ये चश्मा… लग रहा है कोई नया लड़का खड़ा है सामने।”
अमन हल्का मुस्कुराया। “पसंद आए?”
“बहुत,” रुक्साना ने एक कदम करीब आकर कहा। “पहले भी अच्छे लगते थे… अब तो और खतरनाक लग रहे हो।”
दोनों पेड़ की घनी छाँव में खड़े थे। चारों तरफ सन्नाटा था। दूर तक कोई मजदूर या आदमी नहीं दिख रहा था। सिर्फ पत्तों की हल्की सरसराहट।
रुक्साना ने एक आम तोड़कर अमन की तरफ बढ़ाया। “लो… पहले आम खा लो। मीठे हैं।”
अमन ने आम लिया। रुक्साना ने खुद भी एक तोड़ा। दोनों खड़े-खड़े आम खाने लगे। रस उनके हाथों और होठों पर लग रहा था। रुक्साना ने अपना अंगूठा मुँह में लेकर चाटा। अमन की निगाह उनकी तरफ चली गई।
“रस ज्यादा लग गया,” रुक्साना ने हँसते हुए कहा। फिर अचानक गंभीर हो गईं। “अमन… तुम सच में सिर्फ आम खाने आए हो?”
अमन ने आम का शेष हिस्सा एक तरफ फेंका। उनकी आँखों में देखा। “आप क्या सोचती हैं काकी?”
रुक्साना ने एक कदम और बढ़ाया। अब दोनों के बीच बहुत कम दूरी रह गई थी। उनके स्तन अमन की छाती से लगभग छू रहे थे। “मैं सोचती हूँ कि तुम बहुत चालाक हो गए हो। और मैं… मैं तुम्हें देख-देखकर पागल हो रही हूँ।”
अमन ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया। “तो फिर पागल होने दीजिए काकी।”
रुक्साना की साँस तेज हो गई। उन्होंने अमन का हाथ अपनी कमर पर रख दिया। “यहाँ कोई नहीं है… दो बजे के बाद तो बिल्कुल नहीं आता कोई।”
अमन ने उनकी कमर पर हाथ फेरा। सूट के ऊपर से ही उनकी गर्माहट महसूस हो रही थी। “काकी… आप पक्का चाहती हैं?”
रुक्साना ने जवाब में अमन की टी-शर्ट पकड़कर अपनी तरफ खींच लिया। “इतने दिन से तंग कर रही हूँ… अब भी पूछ रहा है? आज तो मुझे ले ले अमन… जैसे चाहे।”
अमन ने चारों तरफ एक नजर दौड़ाई। सच में कोई नहीं था। पेड़ों की घनी पंक्तियों ने उन्हें पूरी तरह छुपा रखा था। उसने रुक्साना की ठुड्डी हल्के से ऊपर उठाई और उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
पहले हल्का चुंबन। फिर गहरा। रुक्साना ने तुरंत जवाब दिया। उनके हाथ अमन के बालों में चले गए। दोनों के शरीर एक-दूसरे से सट गए। अमन का हाथ उनकी मोटी गाँड पर चला गया। सूट के ऊपर से ही मसलने लगा।
“आह्ह… अमन…” रुक्साना ने चुंबन के बीच में सिसकारी ली। “यहाँ… पेड़ के पीछे ले चल… जमीन पर…”
अमन ने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें और अंदर, घने पेड़ों के बीच ले गया। जहाँ बाहर से बिल्कुल नहीं दिख सकता था। जमीन पर सूखे पत्ते बिछे हुए थे। रुक्साना ने खुद अपना दुपट्टा बिछा दिया।
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। साँसें तेज चल रही थीं। अमन ने रुक्साना के सूट का जिपर धीरे से नीचे किया।
अब बगीचे की सुनसान दोपहर में एक नया खेल शुरू होने वाला था।
अमन ने रुक्साना के सूट का जिपर पूरी तरह नीचे कर दिया। कपड़ा ढीला हो गया। रुक्साना ने खुद अपने कंधों से सूट को सरकाया। अंदर उन्होंने कोई ब्रा नहीं पहनी थी। उनके भारी, गोरे स्तन बाहर आ गए। निप्पल धूप की हल्की किरणों में सख्त दिख रहे थे।
अमन की साँसें भारी हो गईं। “काकी… आपने अंदर कुछ नहीं पहना?”
रुक्साना हल्की मुस्कुराईं। आवाज में हवस साफ थी। “आते समय सोचा… आज क्या जरूरत है। तुम ही तो हो।”
अमन ने दोनों हाथों से उनके स्तन थाम लिए। वजन महसूस किया। उंगलियों से निप्पलों को हल्के से मरोड़ा। रुक्साना की कमर काँप गई।
“आह्ह… अमन… हाथों में अच्छे लग रहे हैं न मेरे दूध?”
“बहुत… बड़े और नरम,” अमन ने कहा और झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया। जोर से चूसने लगा। रुक्साना का हाथ उसके सिर पर चला गया। वे अमन का सिर अपने सीने से और लगाती रहीं।
“हाँ… चूस… जोर से चूस मेरे बेटे… आआह्ह…”
अमन ने दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसा। दाँतों से हल्के निशान बनाए। रुक्साना की सिसकारियाँ पेड़ों के बीच गूँजने लगीं। थोड़ी देर बाद अमन ने नीचे घुटने टेक दिए। रुक्साना के सूट को पूरी तरह नीचे खींच लिया। अब वे सिर्फ एक छोटी पैंटी में थीं। पैंटी बीच से पहले से ही थोड़ी गीली थी।
अमन ने पैंटी के दोनों तरफ से पकड़कर एक झटके में नीचे कर दी। रुक्साना की चूत सामने आ गई—गीली, थोड़ी घनी और चमक रही थी। अमन ने दोनों हाथों से उनकी जाँघें फैलाईं और मुँह लगा दिया।
“आआआह्ह्ह… अमन…!” रुक्साना की कमर झटके से काँपी। उन्होंने अमन के बाल पकड़ लिए।
अमन ने जीभ से उनकी चूत को चाटना शुरू किया। धीरे-धीरे, फिर तेज। घुंडी को चूसने लगा। रुक्साना का एक पैर उसके कंधे पर चढ़ गया। वे खड़े-खड़े ही अपने आप को अमन के मुँह पर दबाने लगीं।
“आह्ह… जीभ… अंदर ले जा… हाँ… ऐसे… आआह्ह… मेरी चूत चूस… बेटे…”
अमन ने जीभ अंदर तक डाल दी। चूसने की आवाज आने लगी। रुक्साना की जाँघें काँप रही थीं। थोड़ी देर में वे जोर से काँपीं और उनका पहला पानी अमन के मुँह पर छूट गया। अमन ने सब चाट लिया।
रुक्साना हांफते हुए बोलीं, “अब… अब तू ले ले मुझे… खड़ा मत रख… जमीन पर लिटा दे…”
अमन उठा। उसने अपनी जींस और अंडरवियर एक साथ नीचे कर दिए। उसका लंड पूरी तरह खड़ा था। रुक्साना ने उसे हाथ में लिया। आँखें बड़ी हो गईं।
“इतना मोटा… राजिया ने सही कहा था… आज तो मेरी चूत फाड़ देगा ये।”
अमन ने उन्हें धीरे से दुपट्टे पर लिटा दिया। उनके ऊपर आ गया। लंड का सिर उनकी गीली चूत पर लगाया। आँखों में आँखें डालकर पूछा, “काकी… डालूँ?”
रुक्साना ने दोनों पैर फैला दिए। “डाल… पूरा डाल… आज अपनी काकी को चोद… जैसे चाहे चोद…”
अमन ने कमर आगे बढ़ाई। लंड धीरे-धीरे अंदर जाने लगा। रुक्साना की चूत टाइट थी। वे दर्द और मजे से आँखें बंद कर लीं।
“आआआह्ह्ह… धीरे… बहुत मोटा है… आआह्ह…”
अमन ने एक लंबा धक्का मारा। पूरा लंड जड़ तक अंदर चला गया। दोनों एक साथ रुक गए। रुक्साना के नाखून अमन की पीठ पर गड़ गए।
“अब… अब हिल… चोद अपनी काकी को…”
अमन ने धक्के शुरू कर दिए। पहले धीमे, फिर तेज। पेड़ों के नीचे सिर्फ उनकी साँसें, सिसकारियाँ और शरीर की टकराने की आवाज गूँज रही थी। रुक्साना हर धक्के के साथ अमन को और कसकर पकड़ रही थीं।
“आह्ह… अमन… जोर से… हाँ… मेरी चूत में गहरा… आआह्ह… काकी की चूत पसंद आ रही है?”
अमन हांफते हुए बोला, “बहुत… बहुत गिली और गरम है काकी…”
वह और तेज हो गया। रुक्साना की चीखें अब दबाने के बावजूद निकल रही थीं। दोपहर का बगीचा उनकी गंदी पुकार से भर रहा था।
अमन की रफ्तार अब तेज हो चुकी थी। वह रुक्साना की दोनों टाँगों को अपने कंधों पर उठाए हुए जोर-जोर से धक्के मार रहा था। हर धक्के के साथ रुक्साना की भारी गाँड जमीन पर पट-पट की आवाज कर रही थी। उनके स्तन भी जोर-जोर से उछल रहे थे।
“आआआह्ह्ह… अमन… इतना जोर से… आआह्ह… मेरी चूत फट जाएगी…!” रुक्साना चिल्ला रही थीं। आँखें बंद थीं, मुँह खुला हुआ था।
अमन ने झुककर उनका एक स्तन मुँह में ले लिया और जोर से चूसते हुए धक्के और तेज कर दिए। “चिल्लाना मत काकी… कोई सुन लेगा… बस मजे लो…”
“आह्ह… कैसे न चिल्लाऊँ… तेरा लंड इतना मोटा है… आआह्ह… गर्भ तक जा रहा है… अमन… और तेज… चोद अपनी काकी को…!”
अमन ने उनके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए। अब वह पूरी तरह उनके शरीर पर हावी था। धक्के इतने गहरे थे कि रुक्साना की साँसें अटकने लगीं। वे अमन के मुँह में अपनी उंगलियाँ डालकर चीख दबाने की कोशिश कर रही थीं।
थोड़ी देर बाद अमन ने अचानक लंड बाहर निकाल लिया। रुक्साना कराह उठीं। “क्यों निकाल लिया… अंदर रख…!”
अमन ने उन्हें पलट दिया। “गाँड ऊँची करो काकी।”
रुक्साना तुरंत घुटनों और हाथों के बल हो गईं। उनकी मोटी, गोल गाँड हवा में उठ गई। अमन ने दोनों हाथों से गाँड फैलाई और एक ही झटके में फिर से पूरा लंड उनकी चूत में धंसा दिया।
“आआआआह्ह्ह्ह…!” रुक्साना की लंबी चीख निकल गई।
अब अमन ने उनकी कमर पकड़कर जानवरों वाली रफ्तार से चोदना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ उनकी गाँड उसके पेट से जोर से टकरा रही थी। थप्पड़ की आवाज पेड़ों में गूँज रही थी। अमन बीच-बीच में उनकी गाँड पर जोरदार थप्पड़ भी मार रहा था।
“ले… ले काकी… इतनी मोटी गाँड… कितने दिनों से मारने का मन था…!” अमन हांफते हुए बोला।
“आह्ह… मार… थप्पड़ मार… आआह्ह… चोद… जोर से चोद… मैं तेरी रंडी हूँ आज… आआह्ह…!” रुक्साना बिल्कुल बेकाबू हो चुकी थीं। उनके मुँह से गालियाँ और सिसकारियाँ एक साथ निकल रही थीं। “साले… इतना जोर से… मेरी चूत का पानी निकाल दे… आआह्ह…!”
अमन ने एक हाथ आगे बढ़ाकर उनके स्तन मसलने शुरू कर दिए। दूसरे हाथ से उनकी गाँड पर थप्पड़ मारता रहा। धक्के इतने तेज थे कि रुक्साना का शरीर बार-बार आगे को खिसक जाता। वे दुपट्टे को मुँह में दबाकर चीख रही थीं।
“आआआह्ह… अमन… मैं जा रही हूँ… फिर से… आआह्ह… पकड़ मुझे…!”
उनका शरीर अकड़ गया। जाँघें काँपने लगीं। एक लंबी सिसकारी के साथ उनका पानी अमन के लंड पर छूट गया। लेकिन अमन रुका नहीं। वह उसी रफ्तार से चोदता रहा। रुक्साना की चूत अब और भी गीली हो चुकी थी। पानी की आवाज साफ आ रही थी।
अमन ने अचानक लंड निकाला। रुक्साना हांफते हुए बोलीं, “क्यों रोका… अंदर ही छोड़…!”
अमन ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब गाँड में डालूँ काकी?”
रुक्साना ने पीछे मुड़कर देखा। आँखों में थोड़ा डर और बहुत सारी हवस थी। “धीरे से… बहुत मोटा है तेरा… फट जाएगी…”
अमन ने लंड पर उनका ही पानी लगा लिया। फिर उनकी गाँड की छेद पर सिर टिकाया। धीरे-धीरे दबाव देने लगा। रुक्साना की मांसपेशियाँ तन गईं।
“आआआह्ह… दर्द… अमन… धीरे… आआह्ह…!”
अमन ने एक हाथ उनकी कमर पर रखा और धीरे-धीरे लेकिन लगातार अंदर धकेलता गया। आधा लंड घुसने पर रुक्साना ने जोर से चीख ली। अमन थोड़ा रुका, फिर बाकी का भी अंदर कर दिया। पूरा लंड उनकी गाँड में समा गया।
“आआआआह्ह्ह्ह… बाप रे… निकल… बहुत दर्द… आआह्ह…!” रुक्साना की आँखों से आँसू निकल आए।
अमन ने उनकी पीठ सहलाते हुए कहा, “सह लो काकी… अभी अच्छा लगेगा…” फिर उसने बहुत धीमे धक्के शुरू किए। पहले छोटे-छोटे। जब रुक्साना की गाँड थोड़ी ढीली पड़ी तो रफ्तार बढ़ा दी।
“आह्ह… अब… अब ठीक है… आआह्ह… चोद… धीरे-धीरे चोद मेरी गाँड…!” रुक्साना की आवाज अब दर्द से मजे में बदलने लगी थी।
अमन ने दोनों हाथों से उनकी गाँड फैलाए रखी और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। गाँड की चुदाई की आवाज चूत वाली से भी ज्यादा गंदी और तेज थी। रुक्साना अब फिर से गालियाँ बकने लगीं।
“आआह्ह… साले… गाँड फाड़ रहा है… आआह्ह… चोद… और जोर से… मेरी गाँड चोद… हरामी… आआह्ह…!”
अमन की साँसें भी उखड़ने लगी थीं। उसने रुक्साना की चूत में उंगलियाँ डाल दीं और गाँड में लंड ठेलते हुए उनकी घुंडी रगड़ने लगा। रुक्साना पागल हो गईं।
“आआआह्ह… दोनों जगह… आआह्ह… मैं मर गई… अमन… छोड़… नहीं… मत छोड़… चोद… आआआह्ह्ह…!”
उनका शरीर एक बार फिर जोर से काँपा। पानी की एक और धारा उनकी उंगलियों पर छूट गई। अमन ने महसूस किया कि वह भी अब ज्यादा देर नहीं रोक सकता। उसने कुछ गहरे, भारी धक्के लगाए और रुक्साना की गाँड के अंदर ही अपना पूरा पानी छोड़ दिया। गरम लिक्विड उनकी आँतों में भरता गया।
“आआआह्ह… भर दी… साले… गाँड में भर दी तूने… आआह्ह…!” रुक्साना की आखिरी चीख निकली। उनका शरीर ढीला पड़ गया।
अमन कुछ देर तक अंदर ही पड़ा रहा। दोनों के शरीर पसीने से नहाए हुए थे। आम के पेड़ों की छाँव में सिर्फ उनकी तेज साँसें चल रही थीं। दूर कहीं पक्षी की आवाज आ रही थी। बाकी सब शांत था।
अमन ने धीरे से लंड बाहर निकाला। रुक्साना की गाँड से उसका पानी रिसने लगा। वह उनके पास लेट गया। दोनों आँखें बंद किए पड़े रहे।
दो बजे वाली अकेली दोपहर अब पूरी तरह बदल चुकी थी।
अमन और रुक्साना दोनों पेड़ों की छाँव में पड़े हुए थे। शरीर अभी भी पसीने से चमक रहे थे। रुक्साना की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। अमन ने उनकी पीठ पर हाथ फेरा।
“काकी… ठीक तो हो?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
रुक्साना ने आँखें खोलीं। चेहरे पर थकान और संतुष्टि दोनों साफ थीं। वे हल्की मुस्कुराईं। “पागल… पूछ रहा है ठीक हूँ या नहीं। तूने तो मेरी हड्डियाँ ही गला दीं।”
अमन हल्का मुस्कुराया। उसने अपना अंडरवियर और जींस पहन ली। फिर रुक्साना के सूट को उठाकर उनके पास रख दिया। रुक्साना धीरे-धीरे उठीं। शरीर में दर्द साफ झलक रहा था। वे थोड़ा लंगड़ाते हुए खड़ी हुईं। अमन ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“दर्द हो रहा है?”
“गाँड में… बहुत,” रुक्साना ने ईमानदारी से कहा। “तेरा लंड सामान्य नहीं है अमन। राजिया सही कहती थी।” उन्होंने अपना सूट पहना। पैंटी में अभी भी गीलापन था, लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। दुपट्टा झाड़कर कंधे पर डाल लिया।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। आम के पेड़ों के बीच अजीब सी चुप्पी छा गई थी। रुक्साना ने अमन का हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा। उसके माथे पर एक हल्का चुंबन किया।
“आज के बाद… तुम सिर्फ बाबूजी के बेटे नहीं रहे मेरे लिए,” उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा। “अब तुम… कुछ और हो।”
अमन ने कुछ जवाब नहीं दिया। बस उनका हाथ दबाया। रुक्साना ने अपने बाल ठीक किए। “अब जा। देर हो रही है। कोई देख ले तो अच्छा नहीं होगा।”
अमन ने सिर हिलाया। “आप संभल के जाना काकी।”
रुक्साना मुस्कुराईं। “तू संभल के रहना। और हाँ… फिर आना। अगली बार और देर तक रखूँगी तुझे।”
अमन ने एक आखिरी बार उनकी तरफ देखा। फिर घने पेड़ों के बीच से निकलकर पगडंडी पर आ गया। बाइक वहीं खड़ी थी। उसने हेलमेट पहना और स्टार्ट कर दी। दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था। शरीर पर रुक्साना की खुशबू और पसीने की महक बाकी थी।
घर पहुँचते हुए सूरज ढलने लगा था। आँगन में माँ और सरला चाची बैठी थीं। अमन ने सामान्य चेहरा बनाया। बाइक साइड में लगाई।
“कहाँ चले गए थे इतनी देर?” माँ ने पूछा।
“घूम रहा था माँ। शहर वाले कपड़े पहन रखे थे तो मन कर गया थोड़ा और घूमने का।” अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
सरला चाची ने उसे गौर से देखा। “चेहरा थोड़ा थका लग रहा है। आराम कर लो।”
अमन ने सिर हिलाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। कमरे में जाकर उसने तुरंत नहाने का मन बनाया। आईने के सामने खड़ा होकर देखा—गर्दन पर हल्के नाखून के निशान थे। उसने टी-शर्ट का कॉलर ऊपर कर लिया।
नहाते समय पानी के नीचे खड़े होकर उसने दिन की पूरी घटना दोहराई। रुक्साना की चीखें, उसकी मोटी गाँड, दोनों छेदों में की गई चुदाई… सब कुछ दिमाग में ताजा था। लंड फिर से हल्का भारी हो गया, लेकिन उसने नज़रअंदाज कर दिया।
रात का खाना परिवार के साथ खाया। कमला चाची की निगाहें बार-बार उससे मिल रही थीं। कविता और मीना उसके नए कपड़ों की तारीफ कर रही थीं। सब सामान्य लग रहा था। लेकिन अमन के अंदर एक नया राज और जुड़ चुका था।
खाना खत्म करके वह अपने कमरे में आ गया। बिस्तर पर लेटते ही थकान ने घेर लिया। आज रेणु के आने का इंतजार था। उसे सब बताना था—रुक्साना वाली पूरी बात।
वह खिड़की की तरफ देखता रहा। रात गहरी हो रही थी।
और बगीचे में… रुक्साना अभी भी अपने शरीर के दर्द को महसूस करते हुए मुस्कुरा रही थीं।
नहा-धोकर तैयार हुआ। नाश्ता करके निकला। गली में राधा पहले से खड़ी थी। दोनों की निगाहें मिलीं। राधा ने हल्की मुस्कान दी।
“आज आ गए कॉलेज?” राधा ने धीमे स्वर में पूछा। “कल छुट्टी मार ली थी।”
अमन मुस्कुराया। “थोड़ा आराम चाहिए था। तबीयत ठीक नहीं लग रही थी।”
दोनों साथ-साथ कॉलेज की तरफ चलने लगे। बातें हल्की रहीं—पढ़ाई, मौसम, छोटी-मोटी बातें। राधा के चेहरे पर राहत थी कि अमन फिर सामान्य व्यवहार कर रहा है। कक्षा में पहुँचते ही अमन ने देखा कि राजिया आज आ गई थी। वह अपनी जगह पर बैठी थी। निगाहें अमन पर गईं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। राजिया ने बहुत हल्के से सिर हिलाया।
ब्रेक में राजिया मौका देखकर अमन के पास आई। आसपास भीड़ थी, लेकिन उसने धीमी आवाज में पूछा, “घर कब आओगे?”
अमन ने चारों तरफ देखा। राधा अपनी सहेलियों के साथ बात कर रही थी, उनकी तरफ पीठ किए हुए। अमन ने राजिया की तरफ झुककर बहुत धीमे स्वर में कहा, “जल्द। सब्र करो मेरी जान।”
राजिया के गाल हल्के लाल हो गए। उसने कुछ नहीं कहा, बस नज़रें झुकाकर वहाँ से चली गई। अमन ने राधा की तरफ देखा—वह कुछ नहीं देख पाई थी।
कॉलेज खत्म होने के बाद अमन घर पहुँचा। लंड में दर्द अभी भी हल्का-हल्का हो रहा था। उसने माँ से कहा, “माँ, पिताजी की बाइक दे दो। शहर जाकर एक दवाई लेनी है। डॉक्टर ने बताई थी।”
माँ ने अनुमति दे दी। अमन ने बाइक निकाली और पास के शहर की तरफ निकल पड़ा। हवा चेहरे पर लग रही थी। कई दिनों बाद शहर का रास्ता अच्छा लग रहा था। दिमाग थोड़ा हल्का हो रहा था।
शहर पहुँचकर उसने एक केमिस्ट की दुकान ढूँढी। रेणु ने जो नाम बताया था, वही ट्यूब खरीद ली। दवाई लेकर वह थोड़ा और आगे गया। नज़र एक साफ-सुथरी कॉफी शॉप पर पड़ी। मन किया थोड़ी देर रुकने का। बाइक साइड में लगाई और अंदर चला गया।
कॉफी शॉप आधुनिक थी। हल्की संगीत की आवाज आ रही थी। अमन ने एक कोने में बैठकर चाय का ऑर्डर दिया। थोड़ी देर बाद एक लड़की ट्रे लेकर आई।
अमन ने सिर उठाया… और बस देखता रह गया।
लड़की बिल्कुल किसी फिल्मी हीरोइन जैसी लग रही थी। गोरी रंगत, लंबे बाल, तेज फीचर्स। जेह्नवी कपूर जैसी अदाएँ। आधुनिक कपड़ों में थी—फिट जींस और हल्के रंग की टॉप। चलने का अंदाज भी शहर जैसा था। वह मुस्कुराते हुए अमन के टेबल के पास आई।
“सर, योर टी,” उसने अंग्रेजी में कहा। आवाज साफ और मीठी थी।
अमन जैसे सपने से जागा। “हाँ… थैंक यू।”
लड़की ने कप टेबल पर रखा, एक बार मुस्कुराई और दूसरी टेबल की तरफ चली गई। अमन उसकी पीठ देखता रह गया। मन में एक अजीब सा खिंचाव पैदा हो गया। इतनी आधुनिक और खूबसूरत लड़की… गाँव के लड़के के लिए बिल्कुल अलग दुनिया जैसी लग रही थी।
उसने चाय पी। लेकिन मन नहीं भरा। उसने एक वेटर को बुलाया। पाँच सौ का नोट देते हुए धीमे स्वर में पूछा, “वो जो लड़की थी… चाय देने वाली… वो कौन है?”
वेटर ने नोट लिया और मुस्कुराते हुए बताया, “वो इस कॉफी शॉप की मालकिन हैं सर। सोनाल जी। खुद संभालती हैं सब कुछ।”
अमन ने सिर हिलाया। सोनाल। नाम भी कानों में अच्छा लगा। वह उससे बात करना चाहता था, लेकिन जल्दबाजी नहीं करनी थी। आज पहली मुलाकात थी। बस देखने में ही सब कुछ कह गया था।
चाय खत्म करके वह उठा। बाइक की तरफ बढ़ा। शहर की हलचल छोड़कर गाँव की तरफ निकल पड़ा। दिमाग में सोनाल का चेहरा बार-बार आ रहा था—उसकी मुस्कान, उसकी आवाज, उसका आधुनिक अंदाज।
गाँव के करीब पहुँचते-पहुँचते सूरज ढलने लगा था। और रस्ते में आगे कुछ और इंतजार कर रहा था।
गाँव के बाहरी रास्ते पर अमन बाइक धीमी कर रहा था कि अचानक एक परिचित आवाज आई।
“अरे बाबूजी के बेटे!”
अमन ने बाइक रोक दी। रुक्साना सड़क के किनारे खड़ी थीं। काले सूट में। बाल खुले हुए। उन्होंने अमन को देखते ही मुस्कुरा दिया और पास आ गईं।
“कहाँ चले गए थे इतनी देर?” रुक्साना ने पूछा। आवाज में हल्की शिकायत और शरारत दोनों थी। “मैं तो सोच रही थी कहीं खो तो नहीं गए।”
अमन बाइक पर बैठे-बैठे मुस्कुराया। “शहर गया था काकी। दवाई लेने।”
रुक्साना और करीब आ गईं। उन्होंने बाइक के हैंडल पर हाथ रख दिया। उंगलियाँ अमन की उंगलियों के बहुत पास थीं। “दवाई… या कोई और चीज?” उन्होंने आँखें सिकोड़ते हुए कहा। “चेहरा देखकर लग रहा है मन कहीं और उलझा हुआ है।”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। रुक्साना की निगाह साफ चुनौती दे रही थी। उन्होंने अपना पल्लू ठीक करते हुए और धीमी आवाज में कहा, “कभी हमारे बगीचे में भी आ जाया करो। आम तो अब बहुत मीठे हो गए हैं… और कुछ चीजें तो छूने से भी मीठी लगती हैं।”
अमन के मन में ख्याल आया—“एक बार रेणु दीदी से पूछकर इसका भी काम खत्म कर दूँ। वैसे भी इसकी मोटी गाँड का ख्याल कई दिनों से दिमाग में है।” उसने हल्की मुस्कान दी। “जल्द ही आऊँगा काकी। वादा।”
रुक्साना ने उसका हाथ हल्के से दबाया। “वादा याद रखना। ज्यादा देर मत लगाना।” फिर वे मुस्कुराते हुए एक तरफ हो गईं। अमन ने बाइक स्टार्ट की और घर की तरफ बढ़ा।
घर पहुँचते ही आँगन में कमला चाची खड़ी थीं। उन्होंने अमन को देखते ही आवाज लगाई।
“कहाँ खो गए थे इतनी देर? बाइक लेकर निकले थे तो लगा कहीं भाग ही गए।”
अमन पास गया। चारों तरफ देखा। आँगन खाली था। माँ अंदर थीं। उसने हल्की शरारत भरी आवाज में कहा, “चाची, आपकी याद आ रही थी इसलिए जल्दी लौट आया।”
कमला चाची की आँखों में चमक आ गई। अमन ने एक बार फिर आसपास देखा, फिर साड़ी के पल्लू के अंदर हाथ सरका दिया। उंगलियाँ सीधे उनकी चूत पर जा लगीं। कपड़ों के ऊपर से ही। बहुत गरम और थोड़ी नम थी।
कमला चाची की कमर हल्की सी काँप गई। “आह्ह… शैतान… यहाँ… कोई देख लेगा…” लेकिन उन्होंने अमन का हाथ नहीं हटाया। बल्कि एक पल के लिए और सट गईं।
अमन ने उंगलियों से हल्का दबाव डाला, फिर हाथ निकाल लिया। “बाद में मिलते हैं चाची।” इतना कहकर वह मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ भाग गया। पीछे कमला चाची खड़ी मचलती रह गईं।
कमरे में आकर अमन ने तुरंत पैंट का नाड़ा खोला। रेणु वाली ट्यूब निकाली और लंड पर धीरे-धीरे लगाने लगा। ठंडी क्रिम लगते ही हल्का आराम मिला। दर्द कुछ कम हुआ। वह बिस्तर पर लेट गया।
दिमाग में पहले कॉफी शॉप वाली सोनाल का चेहरा आया। इतनी आधुनिक, इतनी अलग। “क्या मैं उसे पटा सकता हूँ? वह शहर की मालकिन है… मैं गाँव का लड़का…” फिर रुक्साना का ख्याल आया। उसकी मोटी गाँड, उसकी बेशर्म निगाहें। “आज रात रेणु दीदी से पूछता हूँ। रुक्साना बहुत तंग कर रही है। इसे भी लंड का सबक सिखाना होगा।”
इन्हीं ख्यालों में उसकी आँखें बंद हो गईं। नींद आ गई।
रात के लगभग बारह बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु अंदर आईं। लालटेन लेकर। उन्होंने अमन को हल्के से जगाया। अमन उठकर बैठ गया।
“सब बताओ,” रेणु ने सीधे कहा।
अमन ने दिन की हर बात विस्तार से बताई—राजिया वाली छोटी बात, शहर जाकर दवाई लेना, कॉफी शॉप में सोनाल से मुलाकात, फिर रास्ते में रुक्साना का फ्लर्ट, और घर आकर कमला चाची के साथ किया गया छोटा सा शरारती स्पर्श।
रेणु ने ध्यान से सुना। रुक्साना वाली बात पर उन्होंने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन ध्यान से करना। वह राजिया की माँ है। कोई गलती हुई तो उलझ सकता है।”
फिर सोनाल वाली बात पर रेणु मुस्कुराईं। “अगर तुम चाहो तो कोई भी लड़की पट सकती हो। तुम्हें बस बातें बनानी आनी चाहिए… और वह तो अब अच्छी आती हैं। इतना टेंशन मत लो।”
अमन ने रेणु का हाथ पकड़ लिया। “दीदी… आपके साथ सुहागरात कब मना सकता हूँ?”
रेणु का चेहरा फिर से हल्का लाल हो गया। उन्होंने अमन की तरफ देखा और धीमे स्वर में कहा, “ज्यादा शैतान हो गया है तू। सब कुछ तो दे चुकी हूँ तुझे… बस थोड़े दिन और रुक जा।”
फिर उन्होंने अमन के होंठों पर एक नरम लेकिन गहरा चुंबन कर दिया। कुछ पल तक होंठ जुड़े रहे। उसके बाद रेणु उठ खड़ी हुईं।
“सो जाओ। आराम करो।”
वे मुस्कुराते हुए कमरे से निकल गईं।
अमन बिस्तर पर लेटा रहा। रेणु के चुंबन की गर्माहट होंठों पर बाकी थी। लेकिन दिमाग में एक नाम घूम रहा था।
अगला टारगेट—रुक्साना।
वह करवट लेकर सो गया।
अगले दिन अमन ने सामान्य दिनचर्या से कॉलेज गया।
सुबह राधा गली में मिली। दोनों साथ-साथ चले। बातें हल्की रहीं—पढ़ाई, आने वाले टेस्ट, छोटी-मोटी बातें। राधा के चेहरे पर मुस्कान थी। अमन ने जानबूझकर उसके करीब रहकर बात की ताकि वह सहज महसूस करे।
कॉलेज में राजिया ने ब्रेक के समय फिर से मौका निकाला। अमन के पास आकर बहुत धीमे स्वर में पूछा, “कल छुट्टी है न?”
अमन ने सिर हिलाया। “हाँ।”
राजिया ने और कुछ नहीं पूछा। बस एक बार देखा और चली गई। उसकी आँखों में इंतजार साफ था, लेकिन अमन ने कोई वादा नहीं किया।
कॉलेज खत्म होने के बाद अमन घर की तरफ चल पड़ा। गाँव के बाहरी रास्ते पर रुक्साना फिर से मिलीं। वे जैसे जानबूझकर वहीं खड़ी थीं।
“आज भी शहर नहीं गए?” रुक्साना ने मुस्कुराते हुए पूछा।
अमन ने बाइक रोक दी। “नहीं काकी। कल छुट्टी है… रविवार। सोचा था कल आपके बगीचे में आ जाऊँ। आम खाने।”
रुक्साना की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने एक कदम करीब आकर कहा, “दो बजे आना। उस समय खेत में कोई नहीं होता। बिल्कुल अकेले रहेंगे।”
अमन ने सिर हिलाया। “ठीक है काकी। दो बजे।”
रुक्साना मुस्कुरा दीं। “इंतजार रहेगा।”
अमन घर पहुँचा। आँगन में उसकी छोटी बहन कविता कपड़े सुखा रही थी। अमन उसके पास गया।
“आज अकेली काम कर रही हो दीदी?” उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा।
कविता ने सिर उठाया। “तू आ गया? माँ अंदर हैं।”
अमन ने उसके पास जाकर कहा, “अकेले में कितनी प्यारी लगती हो। रोज नहीं दिखती ऐसी।”
कविता के गाल हल्के लाल हो गए। उसने पल्लू ठीक करते हुए कहा, “बातें मत बना… जा हाथ-मुँह धो ले।” लेकिन आवाज में गुस्सा नहीं था। बल्कि हल्की शर्म थी। अमन मुस्कुराते हुए अंदर चला गया। कविता उसकी पीठ देखती रह गई।
रात का खाना खाकर अमन अपने कमरे में आ गया। आज रेणु नहीं आईं। कमरा शांत था। वह बिस्तर पर लेट गया। दिमाग में कल का दो बजे का समय घूम रहा था—रुक्साना, बगीचा, अकेला खेत।
आँखें बंद करते ही नींद आ गई।
रात बिना किसी दस्तक के गुजर गई।
रविवार की सुबह अमन देर तक सोया रहा। छुट्टी का दिन था। जब उठा तो घर में हल्की-हल्की हलचल थी। आँगन में उसकी दोनों बहनें—कविता और मीना—बैठी बातें कर रही थीं। अमन उनके पास जाकर बैठ गया।
“आज छुट्टी है न,” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “तुम दोनों घर में कितना बोर होती होगीं। सोच रहा हूँ… आज तुम्हें फिल्म दिखा लाऊँ?”
दोनों बहनें एक साथ उसकी तरफ देखती रह गईं। मीना ने पूछा, “सच में?”
“हाँ। माँ से पूछ लेता हूँ।” अमन उठा और अंदर गया। माँ से अनुमति ली। माँ ने पहले थोड़ा मना किया, लेकिन अमन के जिद करने पर मान गईं। “जल्दी लौटना। और ध्यान रखना दोनों का।”
अमन ने दोनों बहनों को तैयार होने को कहा। थोड़ी देर में तीनों बाइक पर बैठकर शहर की तरफ निकल गए। अमन बीच में था, दोनों बहनें बारी-बारी से पीछे बैठीं। हवा में उनके बाल उड़ रहे थे। तीनों हँस रहे थे।
शहर पहुँचकर पहले अमन ने उन्हें एक अच्छे शोरूम में ले जाकर नए कपड़े दिलवाए। आधुनिक, हल्के रंग के सूट और टॉप्स। दोनों बहनों ने वहीं ट्रायल रूम में पहनकर दिखाए। अमन देखकर मुस्कुरा दिया।
“लग रही हो दोनों बिल्कुल परियाँ,” उसने कहा। “पहना रहो आज। फिल्म में इसी में जाना है।”
कविता और मीना शर्माते हुए हँस पड़ीं। अमन ने अपने लिए भी एक फिट जींस और काली टी-शर्ट ले ली। पहनकर देखा तो शरीर पर अच्छी लग रही थी। साथ में एक स्टाइलिश चश्मा भी खरीद लिया। तीनों बदलकर बाहर निकले तो लोग भी देख रहे थे।
इसके बाद आइसक्रीम पार्लर में ले जाकर उन्हें उनकी पसंदीदा आइसक्रीम खिलाई। फिर सिनेमा हॉल। फिल्म रोमांटिक कॉमेडी थी। अँधेरे हॉल में अमन बीच में बैठा था। दोनों बहनों के साथ हल्की-फुल्की शरारतें करता रहा—कभी कविता का हाथ पकड़ लेता, कभी मीना के बाल हल्के से खींच देता। दोनों शर्मातीं लेकिन मना नहीं करतीं। फिल्म के दौरान तीनों खूब हँसे।
फिल्म खत्म होने तक बारह बज रहे थे। लौटते समय अमन ने उसी कॉफी शॉप के सामने बाइक रोकी। “थोड़ी कॉफी पी लेते हैं।”
अंदर गए। टेबल लिया। ऑर्डर दिया। थोड़ी देर बाद वही लड़की—सोनाल—ट्रे लेकर आई। लेकिन आज उसका व्यवहार अलग था। चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। थोड़ा गुस्सा और अजीब सा भाव था। उसने कप टेबल पर रखे और बिना ज्यादा बोले चली गई।
मीना ने धीमे स्वर में पूछा, “भैया, ये दीदी इतना गुस्सा क्यों लग रही हैं?”
अमन ने कंधे उचकाए। “मुझे क्या पता। शायद मूड खराब हो।”
कॉफी पीकर तीनों घर की तरफ निकल पड़े। अमन के दिमाग में सोनाल का गुस्सा भरा चेहरा घूम रहा था, लेकिन उसने ज्यादा नहीं सोचा।
घर पहुँचे तो दोपहर हो रही थी। अमन ने सबको आँगन में बुलाया। माँ, सरला चाची, कमला चाची, कविता, मीना—सब आ गईं। अमन ने एक-एक करके पैकेट निकाले। हर एक के लिए नई साड़ी थी। अच्छी, रंग-बिरंगी।
“ये लो… सबके लिए छोटा सा गिफ्ट,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
महिलाएँ हैरान रह गईं। माँ की आँखों में आँसू आ गए। सरला चाची ने अमन के गाल पर चुंबन कर दिया। कमला चाची ने भी मुस्कुराते हुए गाल पर हल्का सा चुंबन किया। कविता और मीना ने एक साथ कहा, “हमारे भैया बेस्ट हैं!”
माँ ने अमन को अपने गले से लगा लिया। आँसू रोक नहीं पा रही थीं। “मेरा बेटा… इतना सोचता है सबका।” धीरे-धीरे बाकी महिलाएँ भी आ गईं। सबने मिलकर अमन को गले लगा लिया। अमन हँसते हुए बोला, “इतना मत दबाओ… मेरी साँसें रुक जाएँगी!”
माँ ने हल्के से उसकी पीठ थपथपाई। “पगले… ऐसा नहीं बोलते। मेरे बेटे को मेरी भी उम्र लग जाए।”
सब हँस पड़े। घर में एक अच्छी सी गर्माहट फैल गई थी। अमन ने सबकी खुशी देखी, फिर धीरे से अपने कमरे की तरफ बढ़ा।
कमरे में आकर उसने घड़ी देखी। डेढ़ बज रहे थे।
अब सिर्फ आधा घंटा बाकी था।
दो बजे… रुक्साना… बगीचा।
वह खिड़की के पास बैठकर इंतजार करने लगा।
दो बजने में दस मिनट बाकी थे।
अमन ने काली टी-शर्ट और जींस में ही रहने का फैसला किया। शहर वाले कपड़े अभी भी पहने हुए थे। चश्मा भी लगा रखा था। घर से निकलते समय माँ ने पूछा तो बस इतना कहा, “थोड़ी देर घूमकर आता हूँ।”
खेतों की पगडंडी पर चलते हुए उसके दिल की धड़कन तेज हो रही थी। दोपहर की धूप थी, लेकिन पेड़ों की छाँव में रास्ता ठंडा लग रहा था। बगीचे के पास पहुँचते ही उसने रुक्साना को देखा।
रुक्साना एक बड़े आम के पेड़ के नीचे खड़ी थीं। आज उन्होंने गहरा लाल रंग का सूट पहना था। सूट टाइट था। उनके भारी स्तन और मोटी गाँड साफ उभर रहे थे। बाल खुले थे और हवा में हिल रहे थे। उन्होंने अमन को देखते ही मुस्कुरा दिया।
“समय पर आ गए,” रुक्साना ने कहा। आवाज में संतुष्टि थी। “सोचा था कहीं भूल तो नहीं गए।”
अमन पास गया। “कैसे भूल सकता हूँ काकी। वादा किया था।”
रुक्साना ने उसे सिर से लेकर पैर तक देखा। “आज तो शहर वाले लग रहे हो। ये कपड़े… ये चश्मा… लग रहा है कोई नया लड़का खड़ा है सामने।”
अमन हल्का मुस्कुराया। “पसंद आए?”
“बहुत,” रुक्साना ने एक कदम करीब आकर कहा। “पहले भी अच्छे लगते थे… अब तो और खतरनाक लग रहे हो।”
दोनों पेड़ की घनी छाँव में खड़े थे। चारों तरफ सन्नाटा था। दूर तक कोई मजदूर या आदमी नहीं दिख रहा था। सिर्फ पत्तों की हल्की सरसराहट।
रुक्साना ने एक आम तोड़कर अमन की तरफ बढ़ाया। “लो… पहले आम खा लो। मीठे हैं।”
अमन ने आम लिया। रुक्साना ने खुद भी एक तोड़ा। दोनों खड़े-खड़े आम खाने लगे। रस उनके हाथों और होठों पर लग रहा था। रुक्साना ने अपना अंगूठा मुँह में लेकर चाटा। अमन की निगाह उनकी तरफ चली गई।
“रस ज्यादा लग गया,” रुक्साना ने हँसते हुए कहा। फिर अचानक गंभीर हो गईं। “अमन… तुम सच में सिर्फ आम खाने आए हो?”
अमन ने आम का शेष हिस्सा एक तरफ फेंका। उनकी आँखों में देखा। “आप क्या सोचती हैं काकी?”
रुक्साना ने एक कदम और बढ़ाया। अब दोनों के बीच बहुत कम दूरी रह गई थी। उनके स्तन अमन की छाती से लगभग छू रहे थे। “मैं सोचती हूँ कि तुम बहुत चालाक हो गए हो। और मैं… मैं तुम्हें देख-देखकर पागल हो रही हूँ।”
अमन ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया। “तो फिर पागल होने दीजिए काकी।”
रुक्साना की साँस तेज हो गई। उन्होंने अमन का हाथ अपनी कमर पर रख दिया। “यहाँ कोई नहीं है… दो बजे के बाद तो बिल्कुल नहीं आता कोई।”
अमन ने उनकी कमर पर हाथ फेरा। सूट के ऊपर से ही उनकी गर्माहट महसूस हो रही थी। “काकी… आप पक्का चाहती हैं?”
रुक्साना ने जवाब में अमन की टी-शर्ट पकड़कर अपनी तरफ खींच लिया। “इतने दिन से तंग कर रही हूँ… अब भी पूछ रहा है? आज तो मुझे ले ले अमन… जैसे चाहे।”
अमन ने चारों तरफ एक नजर दौड़ाई। सच में कोई नहीं था। पेड़ों की घनी पंक्तियों ने उन्हें पूरी तरह छुपा रखा था। उसने रुक्साना की ठुड्डी हल्के से ऊपर उठाई और उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।
पहले हल्का चुंबन। फिर गहरा। रुक्साना ने तुरंत जवाब दिया। उनके हाथ अमन के बालों में चले गए। दोनों के शरीर एक-दूसरे से सट गए। अमन का हाथ उनकी मोटी गाँड पर चला गया। सूट के ऊपर से ही मसलने लगा।
“आह्ह… अमन…” रुक्साना ने चुंबन के बीच में सिसकारी ली। “यहाँ… पेड़ के पीछे ले चल… जमीन पर…”
अमन ने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें और अंदर, घने पेड़ों के बीच ले गया। जहाँ बाहर से बिल्कुल नहीं दिख सकता था। जमीन पर सूखे पत्ते बिछे हुए थे। रुक्साना ने खुद अपना दुपट्टा बिछा दिया।
दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। साँसें तेज चल रही थीं। अमन ने रुक्साना के सूट का जिपर धीरे से नीचे किया।
अब बगीचे की सुनसान दोपहर में एक नया खेल शुरू होने वाला था।
अमन ने रुक्साना के सूट का जिपर पूरी तरह नीचे कर दिया। कपड़ा ढीला हो गया। रुक्साना ने खुद अपने कंधों से सूट को सरकाया। अंदर उन्होंने कोई ब्रा नहीं पहनी थी। उनके भारी, गोरे स्तन बाहर आ गए। निप्पल धूप की हल्की किरणों में सख्त दिख रहे थे।
अमन की साँसें भारी हो गईं। “काकी… आपने अंदर कुछ नहीं पहना?”
रुक्साना हल्की मुस्कुराईं। आवाज में हवस साफ थी। “आते समय सोचा… आज क्या जरूरत है। तुम ही तो हो।”
अमन ने दोनों हाथों से उनके स्तन थाम लिए। वजन महसूस किया। उंगलियों से निप्पलों को हल्के से मरोड़ा। रुक्साना की कमर काँप गई।
“आह्ह… अमन… हाथों में अच्छे लग रहे हैं न मेरे दूध?”
“बहुत… बड़े और नरम,” अमन ने कहा और झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया। जोर से चूसने लगा। रुक्साना का हाथ उसके सिर पर चला गया। वे अमन का सिर अपने सीने से और लगाती रहीं।
“हाँ… चूस… जोर से चूस मेरे बेटे… आआह्ह…”
अमन ने दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसा। दाँतों से हल्के निशान बनाए। रुक्साना की सिसकारियाँ पेड़ों के बीच गूँजने लगीं। थोड़ी देर बाद अमन ने नीचे घुटने टेक दिए। रुक्साना के सूट को पूरी तरह नीचे खींच लिया। अब वे सिर्फ एक छोटी पैंटी में थीं। पैंटी बीच से पहले से ही थोड़ी गीली थी।
अमन ने पैंटी के दोनों तरफ से पकड़कर एक झटके में नीचे कर दी। रुक्साना की चूत सामने आ गई—गीली, थोड़ी घनी और चमक रही थी। अमन ने दोनों हाथों से उनकी जाँघें फैलाईं और मुँह लगा दिया।
“आआआह्ह्ह… अमन…!” रुक्साना की कमर झटके से काँपी। उन्होंने अमन के बाल पकड़ लिए।
अमन ने जीभ से उनकी चूत को चाटना शुरू किया। धीरे-धीरे, फिर तेज। घुंडी को चूसने लगा। रुक्साना का एक पैर उसके कंधे पर चढ़ गया। वे खड़े-खड़े ही अपने आप को अमन के मुँह पर दबाने लगीं।
“आह्ह… जीभ… अंदर ले जा… हाँ… ऐसे… आआह्ह… मेरी चूत चूस… बेटे…”
अमन ने जीभ अंदर तक डाल दी। चूसने की आवाज आने लगी। रुक्साना की जाँघें काँप रही थीं। थोड़ी देर में वे जोर से काँपीं और उनका पहला पानी अमन के मुँह पर छूट गया। अमन ने सब चाट लिया।
रुक्साना हांफते हुए बोलीं, “अब… अब तू ले ले मुझे… खड़ा मत रख… जमीन पर लिटा दे…”
अमन उठा। उसने अपनी जींस और अंडरवियर एक साथ नीचे कर दिए। उसका लंड पूरी तरह खड़ा था। रुक्साना ने उसे हाथ में लिया। आँखें बड़ी हो गईं।
“इतना मोटा… राजिया ने सही कहा था… आज तो मेरी चूत फाड़ देगा ये।”
अमन ने उन्हें धीरे से दुपट्टे पर लिटा दिया। उनके ऊपर आ गया। लंड का सिर उनकी गीली चूत पर लगाया। आँखों में आँखें डालकर पूछा, “काकी… डालूँ?”
रुक्साना ने दोनों पैर फैला दिए। “डाल… पूरा डाल… आज अपनी काकी को चोद… जैसे चाहे चोद…”
अमन ने कमर आगे बढ़ाई। लंड धीरे-धीरे अंदर जाने लगा। रुक्साना की चूत टाइट थी। वे दर्द और मजे से आँखें बंद कर लीं।
“आआआह्ह्ह… धीरे… बहुत मोटा है… आआह्ह…”
अमन ने एक लंबा धक्का मारा। पूरा लंड जड़ तक अंदर चला गया। दोनों एक साथ रुक गए। रुक्साना के नाखून अमन की पीठ पर गड़ गए।
“अब… अब हिल… चोद अपनी काकी को…”
अमन ने धक्के शुरू कर दिए। पहले धीमे, फिर तेज। पेड़ों के नीचे सिर्फ उनकी साँसें, सिसकारियाँ और शरीर की टकराने की आवाज गूँज रही थी। रुक्साना हर धक्के के साथ अमन को और कसकर पकड़ रही थीं।
“आह्ह… अमन… जोर से… हाँ… मेरी चूत में गहरा… आआह्ह… काकी की चूत पसंद आ रही है?”
अमन हांफते हुए बोला, “बहुत… बहुत गिली और गरम है काकी…”
वह और तेज हो गया। रुक्साना की चीखें अब दबाने के बावजूद निकल रही थीं। दोपहर का बगीचा उनकी गंदी पुकार से भर रहा था।
अमन की रफ्तार अब तेज हो चुकी थी। वह रुक्साना की दोनों टाँगों को अपने कंधों पर उठाए हुए जोर-जोर से धक्के मार रहा था। हर धक्के के साथ रुक्साना की भारी गाँड जमीन पर पट-पट की आवाज कर रही थी। उनके स्तन भी जोर-जोर से उछल रहे थे।
“आआआह्ह्ह… अमन… इतना जोर से… आआह्ह… मेरी चूत फट जाएगी…!” रुक्साना चिल्ला रही थीं। आँखें बंद थीं, मुँह खुला हुआ था।
अमन ने झुककर उनका एक स्तन मुँह में ले लिया और जोर से चूसते हुए धक्के और तेज कर दिए। “चिल्लाना मत काकी… कोई सुन लेगा… बस मजे लो…”
“आह्ह… कैसे न चिल्लाऊँ… तेरा लंड इतना मोटा है… आआह्ह… गर्भ तक जा रहा है… अमन… और तेज… चोद अपनी काकी को…!”
अमन ने उनके दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर दबा दिए। अब वह पूरी तरह उनके शरीर पर हावी था। धक्के इतने गहरे थे कि रुक्साना की साँसें अटकने लगीं। वे अमन के मुँह में अपनी उंगलियाँ डालकर चीख दबाने की कोशिश कर रही थीं।
थोड़ी देर बाद अमन ने अचानक लंड बाहर निकाल लिया। रुक्साना कराह उठीं। “क्यों निकाल लिया… अंदर रख…!”
अमन ने उन्हें पलट दिया। “गाँड ऊँची करो काकी।”
रुक्साना तुरंत घुटनों और हाथों के बल हो गईं। उनकी मोटी, गोल गाँड हवा में उठ गई। अमन ने दोनों हाथों से गाँड फैलाई और एक ही झटके में फिर से पूरा लंड उनकी चूत में धंसा दिया।
“आआआआह्ह्ह्ह…!” रुक्साना की लंबी चीख निकल गई।
अब अमन ने उनकी कमर पकड़कर जानवरों वाली रफ्तार से चोदना शुरू कर दिया। हर धक्के के साथ उनकी गाँड उसके पेट से जोर से टकरा रही थी। थप्पड़ की आवाज पेड़ों में गूँज रही थी। अमन बीच-बीच में उनकी गाँड पर जोरदार थप्पड़ भी मार रहा था।
“ले… ले काकी… इतनी मोटी गाँड… कितने दिनों से मारने का मन था…!” अमन हांफते हुए बोला।
“आह्ह… मार… थप्पड़ मार… आआह्ह… चोद… जोर से चोद… मैं तेरी रंडी हूँ आज… आआह्ह…!” रुक्साना बिल्कुल बेकाबू हो चुकी थीं। उनके मुँह से गालियाँ और सिसकारियाँ एक साथ निकल रही थीं। “साले… इतना जोर से… मेरी चूत का पानी निकाल दे… आआह्ह…!”
अमन ने एक हाथ आगे बढ़ाकर उनके स्तन मसलने शुरू कर दिए। दूसरे हाथ से उनकी गाँड पर थप्पड़ मारता रहा। धक्के इतने तेज थे कि रुक्साना का शरीर बार-बार आगे को खिसक जाता। वे दुपट्टे को मुँह में दबाकर चीख रही थीं।
“आआआह्ह… अमन… मैं जा रही हूँ… फिर से… आआह्ह… पकड़ मुझे…!”
उनका शरीर अकड़ गया। जाँघें काँपने लगीं। एक लंबी सिसकारी के साथ उनका पानी अमन के लंड पर छूट गया। लेकिन अमन रुका नहीं। वह उसी रफ्तार से चोदता रहा। रुक्साना की चूत अब और भी गीली हो चुकी थी। पानी की आवाज साफ आ रही थी।
अमन ने अचानक लंड निकाला। रुक्साना हांफते हुए बोलीं, “क्यों रोका… अंदर ही छोड़…!”
अमन ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब गाँड में डालूँ काकी?”
रुक्साना ने पीछे मुड़कर देखा। आँखों में थोड़ा डर और बहुत सारी हवस थी। “धीरे से… बहुत मोटा है तेरा… फट जाएगी…”
अमन ने लंड पर उनका ही पानी लगा लिया। फिर उनकी गाँड की छेद पर सिर टिकाया। धीरे-धीरे दबाव देने लगा। रुक्साना की मांसपेशियाँ तन गईं।
“आआआह्ह… दर्द… अमन… धीरे… आआह्ह…!”
अमन ने एक हाथ उनकी कमर पर रखा और धीरे-धीरे लेकिन लगातार अंदर धकेलता गया। आधा लंड घुसने पर रुक्साना ने जोर से चीख ली। अमन थोड़ा रुका, फिर बाकी का भी अंदर कर दिया। पूरा लंड उनकी गाँड में समा गया।
“आआआआह्ह्ह्ह… बाप रे… निकल… बहुत दर्द… आआह्ह…!” रुक्साना की आँखों से आँसू निकल आए।
अमन ने उनकी पीठ सहलाते हुए कहा, “सह लो काकी… अभी अच्छा लगेगा…” फिर उसने बहुत धीमे धक्के शुरू किए। पहले छोटे-छोटे। जब रुक्साना की गाँड थोड़ी ढीली पड़ी तो रफ्तार बढ़ा दी।
“आह्ह… अब… अब ठीक है… आआह्ह… चोद… धीरे-धीरे चोद मेरी गाँड…!” रुक्साना की आवाज अब दर्द से मजे में बदलने लगी थी।
अमन ने दोनों हाथों से उनकी गाँड फैलाए रखी और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। गाँड की चुदाई की आवाज चूत वाली से भी ज्यादा गंदी और तेज थी। रुक्साना अब फिर से गालियाँ बकने लगीं।
“आआह्ह… साले… गाँड फाड़ रहा है… आआह्ह… चोद… और जोर से… मेरी गाँड चोद… हरामी… आआह्ह…!”
अमन की साँसें भी उखड़ने लगी थीं। उसने रुक्साना की चूत में उंगलियाँ डाल दीं और गाँड में लंड ठेलते हुए उनकी घुंडी रगड़ने लगा। रुक्साना पागल हो गईं।
“आआआह्ह… दोनों जगह… आआह्ह… मैं मर गई… अमन… छोड़… नहीं… मत छोड़… चोद… आआआह्ह्ह…!”
उनका शरीर एक बार फिर जोर से काँपा। पानी की एक और धारा उनकी उंगलियों पर छूट गई। अमन ने महसूस किया कि वह भी अब ज्यादा देर नहीं रोक सकता। उसने कुछ गहरे, भारी धक्के लगाए और रुक्साना की गाँड के अंदर ही अपना पूरा पानी छोड़ दिया। गरम लिक्विड उनकी आँतों में भरता गया।
“आआआह्ह… भर दी… साले… गाँड में भर दी तूने… आआह्ह…!” रुक्साना की आखिरी चीख निकली। उनका शरीर ढीला पड़ गया।
अमन कुछ देर तक अंदर ही पड़ा रहा। दोनों के शरीर पसीने से नहाए हुए थे। आम के पेड़ों की छाँव में सिर्फ उनकी तेज साँसें चल रही थीं। दूर कहीं पक्षी की आवाज आ रही थी। बाकी सब शांत था।
अमन ने धीरे से लंड बाहर निकाला। रुक्साना की गाँड से उसका पानी रिसने लगा। वह उनके पास लेट गया। दोनों आँखें बंद किए पड़े रहे।
दो बजे वाली अकेली दोपहर अब पूरी तरह बदल चुकी थी।
अमन और रुक्साना दोनों पेड़ों की छाँव में पड़े हुए थे। शरीर अभी भी पसीने से चमक रहे थे। रुक्साना की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। अमन ने उनकी पीठ पर हाथ फेरा।
“काकी… ठीक तो हो?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
रुक्साना ने आँखें खोलीं। चेहरे पर थकान और संतुष्टि दोनों साफ थीं। वे हल्की मुस्कुराईं। “पागल… पूछ रहा है ठीक हूँ या नहीं। तूने तो मेरी हड्डियाँ ही गला दीं।”
अमन हल्का मुस्कुराया। उसने अपना अंडरवियर और जींस पहन ली। फिर रुक्साना के सूट को उठाकर उनके पास रख दिया। रुक्साना धीरे-धीरे उठीं। शरीर में दर्द साफ झलक रहा था। वे थोड़ा लंगड़ाते हुए खड़ी हुईं। अमन ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“दर्द हो रहा है?”
“गाँड में… बहुत,” रुक्साना ने ईमानदारी से कहा। “तेरा लंड सामान्य नहीं है अमन। राजिया सही कहती थी।” उन्होंने अपना सूट पहना। पैंटी में अभी भी गीलापन था, लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। दुपट्टा झाड़कर कंधे पर डाल लिया।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। आम के पेड़ों के बीच अजीब सी चुप्पी छा गई थी। रुक्साना ने अमन का हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा। उसके माथे पर एक हल्का चुंबन किया।
“आज के बाद… तुम सिर्फ बाबूजी के बेटे नहीं रहे मेरे लिए,” उन्होंने बहुत धीमी आवाज में कहा। “अब तुम… कुछ और हो।”
अमन ने कुछ जवाब नहीं दिया। बस उनका हाथ दबाया। रुक्साना ने अपने बाल ठीक किए। “अब जा। देर हो रही है। कोई देख ले तो अच्छा नहीं होगा।”
अमन ने सिर हिलाया। “आप संभल के जाना काकी।”
रुक्साना मुस्कुराईं। “तू संभल के रहना। और हाँ… फिर आना। अगली बार और देर तक रखूँगी तुझे।”
अमन ने एक आखिरी बार उनकी तरफ देखा। फिर घने पेड़ों के बीच से निकलकर पगडंडी पर आ गया। बाइक वहीं खड़ी थी। उसने हेलमेट पहना और स्टार्ट कर दी। दिल अभी भी जोर से धड़क रहा था। शरीर पर रुक्साना की खुशबू और पसीने की महक बाकी थी।
घर पहुँचते हुए सूरज ढलने लगा था। आँगन में माँ और सरला चाची बैठी थीं। अमन ने सामान्य चेहरा बनाया। बाइक साइड में लगाई।
“कहाँ चले गए थे इतनी देर?” माँ ने पूछा।
“घूम रहा था माँ। शहर वाले कपड़े पहन रखे थे तो मन कर गया थोड़ा और घूमने का।” अमन ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
सरला चाची ने उसे गौर से देखा। “चेहरा थोड़ा थका लग रहा है। आराम कर लो।”
अमन ने सिर हिलाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। कमरे में जाकर उसने तुरंत नहाने का मन बनाया। आईने के सामने खड़ा होकर देखा—गर्दन पर हल्के नाखून के निशान थे। उसने टी-शर्ट का कॉलर ऊपर कर लिया।
नहाते समय पानी के नीचे खड़े होकर उसने दिन की पूरी घटना दोहराई। रुक्साना की चीखें, उसकी मोटी गाँड, दोनों छेदों में की गई चुदाई… सब कुछ दिमाग में ताजा था। लंड फिर से हल्का भारी हो गया, लेकिन उसने नज़रअंदाज कर दिया।
रात का खाना परिवार के साथ खाया। कमला चाची की निगाहें बार-बार उससे मिल रही थीं। कविता और मीना उसके नए कपड़ों की तारीफ कर रही थीं। सब सामान्य लग रहा था। लेकिन अमन के अंदर एक नया राज और जुड़ चुका था।
खाना खत्म करके वह अपने कमरे में आ गया। बिस्तर पर लेटते ही थकान ने घेर लिया। आज रेणु के आने का इंतजार था। उसे सब बताना था—रुक्साना वाली पूरी बात।
वह खिड़की की तरफ देखता रहा। रात गहरी हो रही थी।
और बगीचे में… रुक्साना अभी भी अपने शरीर के दर्द को महसूस करते हुए मुस्कुरा रही थीं।
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