10-10-2026, 05:24 PM
ऋचा ने गमछा वापस करते हुए शर्माते हुए कहा,
“धन्यवाद बाबाजी जी… ये लीजिए आपका गमछा। और वो आंटी अभी तक नहीं आईं, जिन्होंने मुझे ट्यूशन पढ़ाना था?”
बाबाजी को तुरंत बाथरूम में छुपी हुई पूजा का ध्यान आ गया। उनके दिमाग में तेजी से तरकीब घूमने लगी। उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“वो आती ही होगी। पर तुम्हारा कॉलेज बैग कहाँ है?” निर्देशिका फनलवर है।
ऋचा ने मासूमियत से जवाब दिया,
“ओह… वो तो बाहर ही रह गया। मैं भीग गई थी न, इसलिए मंदिर के बाहर रख दिया था। रुकिए, मैं अभी लेकर आती हूँ।”
जैसे ही ऋचा बाहर गई, बाबाजी ने राहत की साँस ली। वे तेजी से बाथरूम की तरफ गए, दरवाजा खोला और पूजा को इशारा किया। पूजा का चेहरा अभी भी गुस्से और अधूरी वासना से तमतमा रहा था। बाबाजी ने उसे जल्दी-जल्दी पीछे के दरवाजे से बाहर निकाला और कान में फुसफुसाया,
“पीछे से घूमकर मुख्य दरवाजे से अंदर आ जाना। जैसे कुछ हुआ ही न हो।” उन्हों ने पूजा के बोबले को ऊपर से ही दबाते हुए कहा।
कुछ ही मिनट बाद ऋचा बैग लेकर वापस आई। ठीक उसी समय पीछे के दरवाजे पर दस्तक हुई। बाबाजी ने जाकर पूजा को अंदर लिया, जैसे वह अभी-अभी आई हो।
बाबाजी ने मुस्कुराते हुए ऋचा से कहा,
“ये रही वो आंटी। इनका नाम पूजा है। ये तुम्हें ट्यूशन पढ़ाएंगी।”
ऋचा ने पूजा को नमस्ते किया। पूजा ने भी जबरन मुस्कान चढ़ाकर जवाब दिया, लेकिन उसका मन अभी भी बाबाजी के बिस्तर पर अधूरी चुदाई की याद में अटका हुआ था। उसकी चूत अभी भी गीली और तड़प रही थी।
पूजा नीचे फर्श पर ऋचा के सामने बैठ गई और पढ़ाना शुरू कर दिया। उसकी पीठ बाबाजी की तरफ थी। बाबाजी बेड पर आराम से बैठे हुए दोनों को देख रहे थे।
उनकी नजरों के सामने पूजा की नंगी, चिकनी पीठ थी - ब्लाउज के पतले कपड़े से उसकी ब्रा की डोरी और कमर की गहराई साफ दिख रही थी। और सामने ऋचा की भीगी टी-शर्ट से सटी हुई गोल-गोल चूचियाँ, जिनके निप्पल अभी भी सख्त दिख रहे थे।
अचानक पूजा को अपनी पीठ पर ठंडी उँगलियों का स्पर्श महसूस हुआ। बाबाजी ने अपनी उँगलियाँ धीरे-धीरे उसकी गर्दन के नीचे, पीठ की हड्डी पर घुमानी शुरू कर दीं। पूजा का पूरा शरीर सिहर गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए। वह पढ़ाते-पढ़ाते कसमसा उठी, लेकिन कुछ बोल नहीं सकी।
बाबाजी उदासीनतापूर्वक (nonchalantly) ऋचा से पूछ रहे थे,
“तुम्हारे एग्जाम कब तक हैं बेटा?”
ऋचा: “जी, अगले हफ्ते तक… बस तभी तक की जरूरत है मुझे। उसके बाद तो अगली क्लास में चली जाऊंगी।”
बाबाजी मन ही मन मुस्कुराए। उनके दिमाग में एक खतरनाक विचार आया –
‘सिर्फ एक हफ्ता… इस नाजुक, अबोध लड़की की चुदाई के लिए सिर्फ सात दिन। काफी है… बहुत कुछ कर सकते हैं।’
एक घंटे बाद बाबाजी ने पूजा से कहा,
“आज के लिए इतना काफी है। कल फिर आना। और रात को वो विशेष पूजा के समय जरूर आ जाना।”
पूजा ने बाबाजी को प्रणाम किया, लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा और अधूरी भूख साफ दिख रही थी। वह चुपचाप उठकर चली गई। सौनी पटेल सहलेखिका है।
अब कमरे में सिर्फ बाबाजी और ऋचा रह गए थे। ऋचा अपनी बुक्स बैग में डाल रही थी। बाबाजी ने धीरे से पूछा,
“ऋचा… पढ़ाई के अलावा और क्या रुचियाँ हैं तुम्हारी?”
ऋचा ने मासूमियत से जवाब दिया,
“बाबाजी जी… मैं घर पर माँ का हाथ बंटाती हूँ, सहेलियों के साथ खेलती हूँ, टीवी देखती हूँ… बस।”
बाबाजी मुस्कुराए और थोड़ी शैतानी से बोले,
“तुम्हारी सिर्फ सहेलियाँ ही हैं? कोई लड़का दोस्त नहीं है?”
ऋचा यह सुनकर चौंक गई। उसने आश्चर्य से बाबाजी के चेहरे की तरफ देखा। उसके गालों पर हल्की लाली छा गई।
बाबाजी हल्के से हँसे और बोले,
“अरे… ऐसे क्या देख रही हो? तुम सुंदर हो, जवानी की देहलीज पर खड़ी हो। ऐसी उम्र में कोई लड़का दोस्त न हो, ये तो हो ही नहीं सकता।”
ऋचा शर्म से सिर झुका लेती है, लेकिन बाबाजी की नजरें अब उसकी भीगी टी-शर्ट पर टिकी हुई थीं। उसकी छोटी-सी गुदाज चूचियाँ साँस लेते वक्त हल्के-हल्के ऊपर-नीचे हो रही थीं।
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मैत्री पटेल लिखित।
“धन्यवाद बाबाजी जी… ये लीजिए आपका गमछा। और वो आंटी अभी तक नहीं आईं, जिन्होंने मुझे ट्यूशन पढ़ाना था?”
बाबाजी को तुरंत बाथरूम में छुपी हुई पूजा का ध्यान आ गया। उनके दिमाग में तेजी से तरकीब घूमने लगी। उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“वो आती ही होगी। पर तुम्हारा कॉलेज बैग कहाँ है?” निर्देशिका फनलवर है।
ऋचा ने मासूमियत से जवाब दिया,
“ओह… वो तो बाहर ही रह गया। मैं भीग गई थी न, इसलिए मंदिर के बाहर रख दिया था। रुकिए, मैं अभी लेकर आती हूँ।”
जैसे ही ऋचा बाहर गई, बाबाजी ने राहत की साँस ली। वे तेजी से बाथरूम की तरफ गए, दरवाजा खोला और पूजा को इशारा किया। पूजा का चेहरा अभी भी गुस्से और अधूरी वासना से तमतमा रहा था। बाबाजी ने उसे जल्दी-जल्दी पीछे के दरवाजे से बाहर निकाला और कान में फुसफुसाया,
“पीछे से घूमकर मुख्य दरवाजे से अंदर आ जाना। जैसे कुछ हुआ ही न हो।” उन्हों ने पूजा के बोबले को ऊपर से ही दबाते हुए कहा।
कुछ ही मिनट बाद ऋचा बैग लेकर वापस आई। ठीक उसी समय पीछे के दरवाजे पर दस्तक हुई। बाबाजी ने जाकर पूजा को अंदर लिया, जैसे वह अभी-अभी आई हो।
बाबाजी ने मुस्कुराते हुए ऋचा से कहा,
“ये रही वो आंटी। इनका नाम पूजा है। ये तुम्हें ट्यूशन पढ़ाएंगी।”
ऋचा ने पूजा को नमस्ते किया। पूजा ने भी जबरन मुस्कान चढ़ाकर जवाब दिया, लेकिन उसका मन अभी भी बाबाजी के बिस्तर पर अधूरी चुदाई की याद में अटका हुआ था। उसकी चूत अभी भी गीली और तड़प रही थी।
पूजा नीचे फर्श पर ऋचा के सामने बैठ गई और पढ़ाना शुरू कर दिया। उसकी पीठ बाबाजी की तरफ थी। बाबाजी बेड पर आराम से बैठे हुए दोनों को देख रहे थे।
उनकी नजरों के सामने पूजा की नंगी, चिकनी पीठ थी - ब्लाउज के पतले कपड़े से उसकी ब्रा की डोरी और कमर की गहराई साफ दिख रही थी। और सामने ऋचा की भीगी टी-शर्ट से सटी हुई गोल-गोल चूचियाँ, जिनके निप्पल अभी भी सख्त दिख रहे थे।
अचानक पूजा को अपनी पीठ पर ठंडी उँगलियों का स्पर्श महसूस हुआ। बाबाजी ने अपनी उँगलियाँ धीरे-धीरे उसकी गर्दन के नीचे, पीठ की हड्डी पर घुमानी शुरू कर दीं। पूजा का पूरा शरीर सिहर गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए। वह पढ़ाते-पढ़ाते कसमसा उठी, लेकिन कुछ बोल नहीं सकी।
बाबाजी उदासीनतापूर्वक (nonchalantly) ऋचा से पूछ रहे थे,
“तुम्हारे एग्जाम कब तक हैं बेटा?”
ऋचा: “जी, अगले हफ्ते तक… बस तभी तक की जरूरत है मुझे। उसके बाद तो अगली क्लास में चली जाऊंगी।”
बाबाजी मन ही मन मुस्कुराए। उनके दिमाग में एक खतरनाक विचार आया –
‘सिर्फ एक हफ्ता… इस नाजुक, अबोध लड़की की चुदाई के लिए सिर्फ सात दिन। काफी है… बहुत कुछ कर सकते हैं।’
एक घंटे बाद बाबाजी ने पूजा से कहा,
“आज के लिए इतना काफी है। कल फिर आना। और रात को वो विशेष पूजा के समय जरूर आ जाना।”
पूजा ने बाबाजी को प्रणाम किया, लेकिन उसकी आँखों में गुस्सा और अधूरी भूख साफ दिख रही थी। वह चुपचाप उठकर चली गई। सौनी पटेल सहलेखिका है।
अब कमरे में सिर्फ बाबाजी और ऋचा रह गए थे। ऋचा अपनी बुक्स बैग में डाल रही थी। बाबाजी ने धीरे से पूछा,
“ऋचा… पढ़ाई के अलावा और क्या रुचियाँ हैं तुम्हारी?”
ऋचा ने मासूमियत से जवाब दिया,
“बाबाजी जी… मैं घर पर माँ का हाथ बंटाती हूँ, सहेलियों के साथ खेलती हूँ, टीवी देखती हूँ… बस।”
बाबाजी मुस्कुराए और थोड़ी शैतानी से बोले,
“तुम्हारी सिर्फ सहेलियाँ ही हैं? कोई लड़का दोस्त नहीं है?”
ऋचा यह सुनकर चौंक गई। उसने आश्चर्य से बाबाजी के चेहरे की तरफ देखा। उसके गालों पर हल्की लाली छा गई।
बाबाजी हल्के से हँसे और बोले,
“अरे… ऐसे क्या देख रही हो? तुम सुंदर हो, जवानी की देहलीज पर खड़ी हो। ऐसी उम्र में कोई लड़का दोस्त न हो, ये तो हो ही नहीं सकता।”
ऋचा शर्म से सिर झुका लेती है, लेकिन बाबाजी की नजरें अब उसकी भीगी टी-शर्ट पर टिकी हुई थीं। उसकी छोटी-सी गुदाज चूचियाँ साँस लेते वक्त हल्के-हल्के ऊपर-नीचे हो रही थीं।
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मैत्री पटेल लिखित।



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