Yesterday, 05:21 PM
पूजा बाबाजी के मुँह से अपने स्तनों को चुसवाने के चरम आनंद में थी। उसकी चूत पूरी तरह गीली और फड़क रही थी। ठीक उसी पल जब बाबाजी का लंड उसकी चूत में घुसने वाला था, तभी दरवाजे पर जोरदार दस्तक हुई।
अब आगे.....
पूजा एकदम से चोंककर सीधी बैठ गई। उसका चेहरा गुस्से और निराशा से लाल हो गया। मन ही मन वह गाली देने लगी –
“बहनचोद… इस वक्त भी किसी को आना था? साली चूत में आग लगी हुई थी, लंड महाराज घुसने वाले थे… और ये कौन साला चुतिया टपक पड़ा?”
तभी बाहर से मीठी-सी आवाज आई –
“बाबाजी जी… मैं ऋचा हूँ… दरवाजा खोलिए…”
बाबाजी ने तुरंत पूजा के कान में फुसफुसाकर बताया,
“ये वही लड़की है जिसे तुम आज से ट्यूशन पढ़ाने वाली हो।”
पूजा के गर्म शरीर पर जैसे ठंडा पानी पड़ गया। उसकी चूत तुरंत सिकुड़ गई। उत्तेजना का सारा जोश एक पल में ठंडा पड़ गया। वह बेबस होकर बाबाजी की तरफ देखने लगी। बाबाजी ने उसके कपड़े उसके हाथ में थमा दिए और धीरे से कहा,
“बाथरूम में जाकर में पहन लो। जब तक मैं न बुलाऊँ, बाहर मत निकलना।”
पूजा ने मन मारकर कपड़े लेकर बाथरूम में चली गई। जाते वक्त उसके कदम भारी थे और चूत अभी भी भूखी-भूखी सी तड़प रही थी। मैत्री पटेल की प्रस्तुति।
बाबाजी ने अपने खड़े लंड को धोती के अंदर दबाया, गहरी साँस ली और दरवाजा खोल दिया।
सामने ऋचा खड़ी थी - उम्र करीब 18 साल, गोरी, नाजुक, और बेहद क्यूट। सफेद टाइट टी-शर्ट और घुटनों तक की स्कर्ट पहने हुए। लेकिन उसकी टी-शर्ट का दायाँ हिस्सा पूरी तरह भीगा हुआ था। भीगे कपड़े से उसकी दायीं चूची का पूरा आकार साफ नजर आ रहा था। अंदर हल्की शमीज के बावजूद उसकी छोटी-सी गोल, कसी हुई ब्रेस्ट और उसका लाल-गुलाबी निप्पल स्पष्ट दिख रहा था।
बाबाजी की नजरें तुरंत वहीं अटक गईं।
“अरे ऋचा… आओ अंदर… ये क्या हालत है? तुम भीगी हुई क्यों हो?”
कहते हुए बाबाजी ने अपनी लंबी उँगली सीधे उसकी भीगी छाती की तरफ इशारा करते हुए पूछा - और इशारा करते हुए जानबूझकर उँगली को उसके निप्पल पर हल्का सा छुआ भी दिया।
ऋचा पहले से ही घबराई हुई थी। बाबाजी की उँगली के स्पर्श से वह हड़बड़ा गई। उसका शरीर काँप गया और वह बाबाजी के शरीर से रगड़ खाती हुई अंदर आ गई।
रुंवासी स्वर में रोते हुए बोली,
“देखिए ना बाबाजी जी… होली आने में अभी दो दिन बाकी हैं, फिर भी गली के लड़के आज से ही होली खेलने लग गए। घर से निकलते ही दो लड़के मेरे पीछे पड़ गए। मैं बचती-बचाती आई, लेकिन एक कमीने ने गुब्बारा मार ही दिया… यहाँ…” कहते हुए उसने अपनी दायीं ब्रेस्ट के ऊपर इशारा किया और फफक-फफक कर रोने लगी।
बाबाजी ने सहानुभूति दिखाते हुए आगे बढ़े और उसके कंधे पर हाथ रख दिया। उनकी नजरें अब और करीब से उसकी भीगी, उभरी हुई चूची को देख रही थीं।
“अरे अरे… रो मत बच्ची… गुब्बारा ही तो मारा है। लगा तो नहीं ज्यादा जोर से?”
बाबाजी का हाथ उसके कंधे से धीरे-धीरे नीचे सरक रहा था। उनकी आँखें उसकी निप्पल पर टिकी हुई थीं, जो ठंड और शर्म से सख्त होकर खड़ा हो गया था।
बाबाजी ने अपना गमछा उतारकर उसे दिया और बोले,
“ले, इससे अपने आप को पोंछ लो।” सहायिका सौनी पटेल।
ऋचा ने बिना किसी शक के बाबाजी के सामने ही गमछा अपनी छाती पर रखा और मसलने लगी। जैसे-जैसे वह अपनी गुदाज, नरम चूचियों को दबा-दबाकर पोंछ रही थी, टी-शर्ट और भी चिपक गई। उसके स्तन दबते वक्त ऊपर की तरफ उठ रहे थे, जैसे बाहर निकलने को बेताब हों।
बाबाजी चुपचाप खड़े-खड़े इस नजारे का मजा ले रहे थे। मन ही मन सोच रहे थे –
“काश मैं गमछे की जगह होता… इन नाजुक, कोमल चूचियों को रगड़ने का मौका मिलता…कभी कभी चूस भी लेता...”
ऋचा अभी भी रो रही थी, लेकिन उसके निप्पल अब और सख्त हो चुके थे। टी-शर्ट के भीगे कपड़े से साफ दिख रहे थे।
******************************************.
जुड़े रहिये दोस्तों।
मैत्री पटेल की रचना।
अब आगे.....
पूजा एकदम से चोंककर सीधी बैठ गई। उसका चेहरा गुस्से और निराशा से लाल हो गया। मन ही मन वह गाली देने लगी –
“बहनचोद… इस वक्त भी किसी को आना था? साली चूत में आग लगी हुई थी, लंड महाराज घुसने वाले थे… और ये कौन साला चुतिया टपक पड़ा?”
तभी बाहर से मीठी-सी आवाज आई –
“बाबाजी जी… मैं ऋचा हूँ… दरवाजा खोलिए…”
बाबाजी ने तुरंत पूजा के कान में फुसफुसाकर बताया,
“ये वही लड़की है जिसे तुम आज से ट्यूशन पढ़ाने वाली हो।”
पूजा के गर्म शरीर पर जैसे ठंडा पानी पड़ गया। उसकी चूत तुरंत सिकुड़ गई। उत्तेजना का सारा जोश एक पल में ठंडा पड़ गया। वह बेबस होकर बाबाजी की तरफ देखने लगी। बाबाजी ने उसके कपड़े उसके हाथ में थमा दिए और धीरे से कहा,
“बाथरूम में जाकर में पहन लो। जब तक मैं न बुलाऊँ, बाहर मत निकलना।”
पूजा ने मन मारकर कपड़े लेकर बाथरूम में चली गई। जाते वक्त उसके कदम भारी थे और चूत अभी भी भूखी-भूखी सी तड़प रही थी। मैत्री पटेल की प्रस्तुति।
बाबाजी ने अपने खड़े लंड को धोती के अंदर दबाया, गहरी साँस ली और दरवाजा खोल दिया।
सामने ऋचा खड़ी थी - उम्र करीब 18 साल, गोरी, नाजुक, और बेहद क्यूट। सफेद टाइट टी-शर्ट और घुटनों तक की स्कर्ट पहने हुए। लेकिन उसकी टी-शर्ट का दायाँ हिस्सा पूरी तरह भीगा हुआ था। भीगे कपड़े से उसकी दायीं चूची का पूरा आकार साफ नजर आ रहा था। अंदर हल्की शमीज के बावजूद उसकी छोटी-सी गोल, कसी हुई ब्रेस्ट और उसका लाल-गुलाबी निप्पल स्पष्ट दिख रहा था।
बाबाजी की नजरें तुरंत वहीं अटक गईं।
“अरे ऋचा… आओ अंदर… ये क्या हालत है? तुम भीगी हुई क्यों हो?”
कहते हुए बाबाजी ने अपनी लंबी उँगली सीधे उसकी भीगी छाती की तरफ इशारा करते हुए पूछा - और इशारा करते हुए जानबूझकर उँगली को उसके निप्पल पर हल्का सा छुआ भी दिया।
ऋचा पहले से ही घबराई हुई थी। बाबाजी की उँगली के स्पर्श से वह हड़बड़ा गई। उसका शरीर काँप गया और वह बाबाजी के शरीर से रगड़ खाती हुई अंदर आ गई।
रुंवासी स्वर में रोते हुए बोली,
“देखिए ना बाबाजी जी… होली आने में अभी दो दिन बाकी हैं, फिर भी गली के लड़के आज से ही होली खेलने लग गए। घर से निकलते ही दो लड़के मेरे पीछे पड़ गए। मैं बचती-बचाती आई, लेकिन एक कमीने ने गुब्बारा मार ही दिया… यहाँ…” कहते हुए उसने अपनी दायीं ब्रेस्ट के ऊपर इशारा किया और फफक-फफक कर रोने लगी।
बाबाजी ने सहानुभूति दिखाते हुए आगे बढ़े और उसके कंधे पर हाथ रख दिया। उनकी नजरें अब और करीब से उसकी भीगी, उभरी हुई चूची को देख रही थीं।
“अरे अरे… रो मत बच्ची… गुब्बारा ही तो मारा है। लगा तो नहीं ज्यादा जोर से?”
बाबाजी का हाथ उसके कंधे से धीरे-धीरे नीचे सरक रहा था। उनकी आँखें उसकी निप्पल पर टिकी हुई थीं, जो ठंड और शर्म से सख्त होकर खड़ा हो गया था।
बाबाजी ने अपना गमछा उतारकर उसे दिया और बोले,
“ले, इससे अपने आप को पोंछ लो।” सहायिका सौनी पटेल।
ऋचा ने बिना किसी शक के बाबाजी के सामने ही गमछा अपनी छाती पर रखा और मसलने लगी। जैसे-जैसे वह अपनी गुदाज, नरम चूचियों को दबा-दबाकर पोंछ रही थी, टी-शर्ट और भी चिपक गई। उसके स्तन दबते वक्त ऊपर की तरफ उठ रहे थे, जैसे बाहर निकलने को बेताब हों।
बाबाजी चुपचाप खड़े-खड़े इस नजारे का मजा ले रहे थे। मन ही मन सोच रहे थे –
“काश मैं गमछे की जगह होता… इन नाजुक, कोमल चूचियों को रगड़ने का मौका मिलता…कभी कभी चूस भी लेता...”
ऋचा अभी भी रो रही थी, लेकिन उसके निप्पल अब और सख्त हो चुके थे। टी-शर्ट के भीगे कपड़े से साफ दिख रहे थे।
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मैत्री पटेल की रचना।



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