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Incest परिवार के गंदे राज़
#64
अगली सुबह अमन ने अपनी दिनचर्या और संकुचित कर ली।
वह घर से निकला तो मुख्य सड़क से ही गया। खेतों वाला छोटा रास्ता उसने पूरी तरह छोड़ दिया था। कॉलेज पहुँचकर उसने अपनी जगह पर बैठते ही किताब खोल ली। आज उसने ब्रेक में भी कक्षा से बाहर कदम नहीं रखा। पानी की जरूरत पड़ने पर भी वह आखिरी समय पर गया और जल्दी लौट आया। राजिया की निगाहें उसे कई बार महसूस हुईं, लेकिन उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा।
कॉलेज के बाद अमन तुरंत घर की तरफ निकल पड़ा। वह नहीं जानता था कि उसके पीछे लगभग पचास कदम की दूरी पर राजिया चल रही थी। वह पेड़ों और दीवारों की आड़ लेकर आ रही थी। न ज्यादा करीब, न इतनी दूर कि खो जाए। उसकी निगाह अमन के हर कदम पर थी—कहाँ रुकता है, किससे बात करता है, कितनी तेजी से चलता है।
अमन गली के मोड़ पर एक बार रुका। उसे लगा जैसे कोई देख रहा हो। उसने पीछे मुड़कर देखा। सड़क खाली थी। सिर्फ दूर एक कुत्ता सड़क पार कर रहा था। वह सिर हिलाकर आगे बढ़ गया। लेकिन वह अहसास उसके साथ घर तक गया।
घर पहुँचते ही सरला चाची ने उसे रोक लिया।
“आज चेहरा और थका लग रहा है,” उन्होंने चिंतित स्वर में कहा। “कुछ खाकर जाओ।”
अमन ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। “थकान है चाची। आराम कर लूँगा।”
सरला चाची ने उसके बालों में हाथ फेरा। उनकी निगाह में माँ जैसी चिंता साफ थी। कमला चाची आँगन के दूसरे कोने में बैठी थीं। उन्होंने इस बार कुछ नहीं कहा। सिर्फ अमन को देखा। लंबी, चुप निगाह से। वह निगाह अमन के पीठ पर तब तक बनी रही जब तक वह अपने कमरे में गायब नहीं हो गया।
शाम को राधा कॉलेज के बाहर नहीं मिली। अमन ने थोड़ी देर इंतजार किया, लेकिन वह दिखाई नहीं दी। घर लौटकर उसने सोचा कि शायद राधा अब सच में दूरी बना रही है। यह ख्याल उसके अंदर एक हल्की सी टीस छोड़ गया।
रात के खाने के बाद रेणु आईं। लालटेन की रोशनी कम रखी हुई थी। उन्होंने दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
अमन ने दिन की बातें बतानी शुरू कीं। राजिया का पीछा करने का अहसास, सरला चाची की चिंता, कमला चाची की चुप्पी, और राधा का न मिलना।
रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रहीं। फिर धीमे स्वर में बोलीं,
“अब वह सिर्फ सवाल नहीं पूछ रही। वह तुम्हें पढ़ रही है। तुम्हारी आदतें, तुम्हारे रास्ते, तुम्हारा समय। यह निगरानी का चरण है। अगर तुमने इन दिनों कोई गलती की—कोई अलग रास्ता, कोई अलग मुलाकात—तो वह नोट कर लेगी।”
अमन ने सिर हिलाया। “मुझे लग रहा था कोई पीछे है। लेकिन दिखा कुछ नहीं।”
“दिखाई नहीं देगी,” रेणु ने कहा। “चालाक औरत कभी सामने से नहीं आती। वह पीछे से घेरती है।”
रेणु ने अमन का हाथ पकड़ा। “कुछ दिन और सब्र करो। राधा को भी समय दो। अगर तुम अभी उसके पास गए और कुछ अधूरा जवाब दिया तो वह और दूर चली जाएगी। उसे लगना चाहिए कि तुम खुद उसके पास लौट रहे हो—मजबूरी में नहीं।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसके माथे पर हल्का हाथ फेरा।
“सो जाओ। और खिड़की के बाहर बार-बार मत झाँको। वह तुम्हें वहाँ भी नाप रही होगी।”
रेणु चली गईं। अमन अकेला रह गया। उसने खिड़की की तरफ देखा, लेकिन पास नहीं गया। बस अँधेरे को दूर से निहारता रहा।
उसी समय गाँव के किनारे वाले घर में राजिया डायरी खोल रही थी। आज का पन्ना उसने बड़े ध्यान से भरा—
“आज उसने मुख्य सड़क चुनी। कॉलेज के बाद सीधे घर गया। बीच में एक बार रुका, पीछे मुड़ा। मतलब उसे अहसास हो रहा है। लेकिन पकड़ नहीं पा रहा।
समय: घर से निकला 7:40
कॉलेज पहुँचा 8:05
वापसी 2:20
घर पहुँचा 2:45
कोई मुलाकात नहीं। राधा नहीं मिली। कमला चाची ने सिर्फ देखा।
कल फिर से पीछा करूँगी। अगर वह एक भी दिन अलग रास्ता अपनाता है तो समझ जाऊँगी कि वह कुछ छुपा रहा है।”
उसने पेन रोका। फिर आखिरी लाइन लिखी—
“भाई ने कहा था अमन से पूछना। मैं पूछ रही हूँ। अपने तरीके से। अब सब्र की बारी मेरी है।”
डायरी बंद करके उसने दीया बुझा दिया। अँधेरे में लेटकर वह सोचती रही। शक अभी भी वहाँ था। लेकिन शक के साथ एक और चीज भी बढ़ रही थी—एक अजीब सा आकर्षण। वह अमन को जितना पढ़ रही थी, उतना ही वह उसके दिमाग में बैठता जा रहा था।
रात गहरी होती गई।
हवेली के अंदर अमन आँखें खोले लेटा रहा। उसे नींद नहीं आ रही थी। हर छोटी आवाज पर उसका ध्यान चला जाता। कभी लगता कोई गलियारे में चल रहा है, कभी लगता खिड़की के बाहर कोई खड़ा है।
और गाँव के दूसरे छोर पर राजिया शांत भाव से सोने की कोशिश कर रही थी। उसके होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी—जैसे वह कोई खेल खेल रही हो जिसमें अगला मोहरिया उसी के हाथ में हो।
कल फिर से वही दिनचर्या दोहराने वाली थी।
लेकिन दोनों में से एक अब और करीब आ चुका था।
और दूसरा… और सतर्क।


राजिया की नज़र से…
रात का अँधेरा मेरे कमरे में घना हो चुका था। दीये की लौ बहुत पहले बुझ चुकी थी। मैं चारपाई पर लेटी हुई थी, लेकिन नींद कहीं दूर थी। भाई का तकिया अभी भी मेरे सीने से लगा हुआ था। उसकी हल्की महक अब लगभग खत्म हो चुकी थी, लेकिन मैं उसे छोड़ नहीं पा रही थी।
डायरी मेरे तकिये के नीचे थी। आज का पन्ना मैंने ध्यान से भरा था। अमन की दिनचर्या—समय, रास्ते, रुकने की जगहें। सब कुछ। वह बच रहा था। साफ बच रहा था। मुख्य सड़क, सीधा घर, कोई额外 मुलाकात नहीं। राधा से भी दूरी। कमला चाची की निगाहों से भी बचाव।
“तू बहुत संभल रहा है अमन…” मैंने अँधेरे में फुसफुसाकर कहा। “इतना संभलना निर्दोष आदमी का काम नहीं होता।”
मेरी आँखों के सामने वह दृश्य बार-बार आ रहा था जब मैंने उससे पहली बार सीधा सवाल पूछा था। पानी की टंकी के पास। उसकी आँखें नहीं डगमगाई थीं। न कोई घबराहट, न कोई जल्दबाजी। वह शांत रहा। बहुत शांत। वही शांति मुझे सबसे ज्यादा खटक रही थी।
भाई की आवाज मेरे कानों में गूँज उठी—“अगर मेरे साथ कुछ हुआ… तो अमन से पूछना।”
मैंने कागज को जेब से निकाला। अँधेरे में भी उंगलियों के नीचे उसकी बनावट महसूस हो रही थी। भाई ने यह नोट कब लिखा होगा? क्यों लिखा होगा? क्या वह जानता था कि अमन खतरनाक है? या फिर वह खुद किसी खेल में उलझा हुआ था?
मेरा दिमाग थक चुका था, लेकिन रुक नहीं रहा था।
अमन… राधा… मूवी वाला दिन… भाई की मौत। सब कुछ एक लकीर में बँधता जा रहा था। लेकिन लकीर अभी अधूरी थी। सबूत नहीं था। सिर्फ अहसास था। और अहसास कभी अदालत में नहीं चलता।
मैंने करवट बदली। चारपाई की रस्सी ने हल्की आवाज की। माँ दूसरे कमरे में सो रही थीं। उनकी साँसें भारी थीं। रोने के बाद की थकी हुई साँसें। मैंने उन्हें जगाए बिना धीरे से उठा। खिड़की के पास गई। बाहर अँधेरा था। हवेली की तरफ का रास्ता दिख नहीं रहा था, लेकिन मैं जानती थी कि वह दिशा में अमन सो रहा होगा। शायद खिड़की के पास बैठा सोच रहा होगा कि कोई उसका पीछा तो नहीं कर रहा।
“पीछा तो कर ही रही हूँ,” मैंने अपने आप से कहा। “और अब और करीब आऊँगी।”
मैंने डायरी फिर निकाली। अँधेरे में लिखना मुश्किल था, लेकिन मुझे लिखना था। उंगलियों के स्पर्श से कागज की सतह पहचानते हुए मैंने लिखा—
“वह डरता नहीं। वह संभलता है। दोनों में फर्क है। डरने वाला आदमी गलती करता है। संभलने वाला आदमी गलती छुपाता है।
कल मैं उसका पीछा फिर करूँगी। इस बार थोड़ा और करीब से। अगर वह एक भी बार अलग रास्ता अपनाता है… तो समझ जाऊँगी कि वह कुछ छुपा रहा है।
और अगर वह निर्दोष निकला… तो भी मैं उसे छोड़ने वाली नहीं। भाई के बाद मेरे पास कुछ अपना होना चाहिए। अमन… तू अब मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। चाहे शक के रूप में, चाहे और किसी रूप में।”
मैंने डायरी बंद की। कागज को फिर से जेब में रखा। खिड़की से दूर जाकर चारपाई पर लेट गई। भाई का तकिया फिर से सीने से लगा लिया।
आँखें बंद कीं तो अमन का चेहरा आ गया—शांत, संभला हुआ, और कुछ छुपाता हुआ। फिर भाई का चेहरा। फिर वह खाली चारपाई।
नींद बहुत देर से आई। जब आई तो टूटी-फूटी थी। सपने में मैं अमन के पीछे चल रही थी। वह मुड़-मुड़कर देख रहा था, लेकिन मुझे पकड़ नहीं पा रहा था। और मैं मुस्कुरा रही थी।
सुबह जब आँख खुली तो माँ चूल्हे के पास बैठी चाय बना रही थीं। मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। कुछ नहीं पूछा। हम दोनों जानते थे कि सवालों का कोई जवाब नहीं है।
कॉलेज जाते समय मैंने काला सूट पहना। बाल कसकर बाँधे। चेहरे पर कोई भाव नहीं रखा। गली से निकलते समय मेरी निगाह हवेली की तरफ चली गई। आँगन खाली था। अमन अभी निकला नहीं था।
मैंने अपनी चाल सामान्य रखी। लेकिन मन में हिसाब चल रहा था। आज मैं उसका पीछा और करीब से करूँगी। आज मैं देखूँगी कि वह कितना संभल सकता है।
क्योंकि अब यह सिर्फ भाई का शक नहीं रह गया था।
अब यह मेरा खेल बन चुका था।
और मैं हारने वाली नहीं थी।
Fuckuguy
albertprince547;
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RE: परिवार के गंदे राज़ - by Fuckuguy - 09-10-2026, 08:40 PM



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