09-10-2026, 08:25 PM
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राजिया ने कागज को फिर से खोला। भाई की मोटी, जल्दबाजी में लिखी हुई लिखावट बार-बार आँखों के सामने घूम रही थी—
“अगर मेरे साथ कुछ हुआ… तो अमन से पूछना।”
कमरे में दीये की लौ अब बहुत छोटी रह गई थी। तेल लगभग खत्म हो चुका था। अँधेरा कोनों से सरककर बीच तक आ पहुँचा था। राजिया की उंगलियाँ कागज के किनारे पर इतनी कस गई थीं कि कागज की धार हथेली में गड़ने लगी थी। लेकिन दर्द उसे महसूस नहीं हो रहा था।
उसने कागज को धीरे से मोड़ा और अपनी कुर्ती की अंदर वाली जेब में रख लिया। फिर भाई के तकिये को दोनों हाथों से पकड़कर सीने से लगा लिया। महक अभी भी बाकी थी—सस्ते साबुन और पसीने की। आँखें बंद करते ही भाई का चेहरा आ गया। फिर वह रात जब मंकी कैप पहने आदमी ने उसे रात भर जिया था। और अब यह नोट।
“तू जानता था…” उसने बहुत धीमी आवाज में कहा। “तू जानता था कि कुछ होने वाला है।”
बाहर आँगन में सन्नाटा था। लेकिन राजिया को लगा जैसे दीवार के उस पार कोई साँस ले रहा हो। उसने खिड़की की तरफ देखा। कुछ नहीं दिखा। फिर भी शरीर में एक ठंडी धारा दौड़ गई। उसने दीया बुझा दिया और अँधेरे में लेट गई। आँखें खुली थीं। नींद कहीं दूर थी।
सुबह जब रुक्साना उठीं तो राजिया पहले से चूल्हे के पास बैठी चाय बना रही थी। आँखें सूजी हुई थीं, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं था। रुक्साना ने कुछ नहीं पूछा। दोनों ने चुपचाप चाय पी। घर में भाई की खाली चारपाई अभी भी वैसे ही पड़ी थी। किसी ने उसे हटाया नहीं था।
कॉलेज जाते समय राजिया ने काले रंग का सूट पहना। बाल कसकर बाँधे। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। वह अब पहले जैसी चंचल लड़की नहीं लग रही थी। गली से निकलते समय उसकी निगाह चौधरी हवेली की तरफ चली गई। आँगन में अमन बैग लेकर निकल रहा था। दोनों की निगाहें एक पल के लिए मिलीं। राजिया ने नजर नहीं फेरी। अमन ने भी नहीं। बस दोनों ने एक-दूसरे को देखा और फिर अपने-अपने रास्ते चल दिए।
कॉलेज में माहौल सामान्य लग रहा था, लेकिन राजिया के चारों तरफ एक अदृश्य घेरा सा बन गया था। लड़के उससे बात करने से कतराते। लड़कियाँ फुसफुसातीं। राधा ने दूर से ही सिर हिलाया, लेकिन पास नहीं आई। अमन अपनी जगह पर बैठा किताब देख रहा था। राजिया ने पूरी क्लास में सिर्फ एक बार उसकी तरफ देखा—लंबा और ठंडा। अमन ने महसूस किया, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं दी।
ब्रेक में राजिया अकेली पानी की टंकी के पास खड़ी थी। अमन दूर से देख रहा था। रेणु की सलाह उसके दिमाग में घूम रही थी—“न ज्यादा बचो, न ज्यादा पास जाओ। बस सामान्य।” इसलिए वह गया नहीं। लेकिन राजिया की निगाह बार-बार उसकी तरफ लौट रही थी। जैसे वह कुछ तलाश रही हो।
शाम को घर लौटते समय अमन ने महसूस किया कि कोई उसका पीछा कर रहा है। गली के मोड़ पर रुककर पीछे मुड़ा तो कोई नहीं दिखा। लेकिन वह अहसास बना रहा। घर पहुँचकर उसने सामान्य व्यवहार रखा। माँ ने पूछा तो कहा कि कॉलेज थका देने वाला था। बाबा ने सिर पर हाथ रखा। सरला चाची ने मिठाई दी। कमला चाची ने दूर से ही एक निगाह डाली—वह पुरानी चमक अभी भी आँखों में थी, लेकिन आज उन्होंने कुछ नहीं कहा।
रात के खाने के बाद अमन अपने कमरे में आया। दिमाग में राजिया की वह लंबी निगाह और भाई वाली घटना घूम रही थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। रेणु अंदर आईं। लालटेन की रोशनी कम थी। उन्होंने दरवाजा बंद किया और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
“आज राजिया कॉलेज आई थी,” अमन ने पहले ही बता दिया। “मुझे घूरा। बहुत देर तक।”
रेणु ने गंभीर होकर सुना। “अब वह सक्रिय हो गई है। सिर्फ शोक में नहीं है। कुछ सोच रही है।”
अमन ने सिर हिलाया। “मुझे भी लगा। जैसे वह कुछ ढूँढ रही हो।”
रेणु ने उसका हाथ पकड़ा। “अब तुम्हें और सावधान रहना होगा। राधा के साथ भी अभी दूरी बनाए रखना। कोई नई नजदीकी मत बढ़ाना। और कमला चाची… वे इंतजार कर रही हैं। लेकिन अभी उनका समय नहीं है।”
अमन चुप रहा। रेणु ने उसकी आँखों में देखा।
“तुम थके हुए लग रहे हो। आज शरीर की शिक्षा नहीं होगी। आज सिर्फ बात होगी।”
अमन ने हैरानी से देखा। रेणु ने हल्की मुस्कान दी।
“हर रात शरीर नहीं सिखाना होता। कभी-कभी दिमाग को भी आराम देना पड़ता है। तुम एक साथ बहुत सारी आग संभाल रहे हो। अगर नियंत्रण खो दिया तो सब जल जाएगा।”
उसने अमन के बालों में हाथ फेरा। “सो जाओ। और राजिया की निगाहों को अपने दिमाग में ज्यादा मत घुमाओ। वह तुम्हें डरा नहीं सकती जब तक तुम खुद न डरो।”
रेणु चली गईं। अमन अकेला रह गया। पहली बार कई रातों बाद रेणु ने सिर्फ बात की थी। कोई स्पर्श नहीं, कोई शिक्षा नहीं। सिर्फ चेतावनी और समझ। अमन ने महसूस किया कि यह भी एक तरह की शिक्षा थी—रुकना सीखना।
उसी रात राजिया अपने कमरे में बैठी थी। भाई का नोट फिर से निकाला। बार-बार पढ़ा। फिर उसने एक छोटा सा डायरी निकालकर उसमें लिखना शुरू किया।
“आज अमन ने मेरी निगाह को सहन किया। पहले वह नजरें बचाता था। अब नहीं। या तो वह निर्दोष है… या बहुत चालाक।”
उसने पेन रोक लिया। बाहर हवा चल रही थी। खिड़की की दरार से ठंडी हवा आ रही थी। राजिया ने अचानक खिड़की की तरफ देखा। कुछ नहीं था। लेकिन मन में वही अहसास लौट आया जो पिछली रात हुआ था—जैसे कोई बाहर खड़ा हो।
उसने डायरी बंद की और दीया बुझा दिया। अँधेरे में लेटकर उसने फुसफुसाकर कहा,
“मैं इंतजार करूँगी। तू गलती करेगा। और जब करेगा… तो मैं वहीं हूँगी।”
गाँव सोया हुआ था। लेकिन दो घरों में नींद नहीं आ रही थी। एक में शक की आग जल रही थी। दूसरे में सावधानी का कवच कसता जा रहा था।
और इन दोनों के बीच राधा थी—जो कुछ भी नहीं जानती थी, लेकिन महसूस कर रही थी कि अमन के आसपास कुछ बदल रहा है।
अगली सुबह जब अमन कॉलेज गया तो राधा गली में मिली। उसने हल्की मुस्कान दी, लेकिन आँखों में सवाल था।
“तुम इन दिनों… थोड़े दूर लग रहे हो,” उसने बहुत धीमे स्वर में कहा।
अमन ने उसकी आँखों में देखा। रेणु की सलाह याद आई। उसने नरम स्वर में जवाब दिया,
“थोड़ा पढ़ाई का दबाव है। तुम परेशान मत होना।”
राधा ने कुछ और कहना चाहा, लेकिन अमन ने बात बदल दी। दोनों कॉलेज तक साथ चले, लेकिन वह पुरानी आसानी अब नहीं थी। राधा को लगा जैसे उनके बीच कोई अदृश्य दीवार खड़ी हो गई हो।
कॉलेज में राजिया फिर से अपनी जगह पर बैठी थी। आज उसकी निगाह अमन पर पहले से ज्यादा देर तक टिकी रही। अमन ने सामान्य व्यवहार रखा। लेकिन अंदर ही अंदर वह महसूस कर रहा था कि घेरा धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है।
दोपहर में जब अमन घर लौटा तो आँगन में कमला चाची अकेली बैठी थीं। उन्होंने उसे देखते ही बुलाया।
“इधर आ।”
अमन पास गया। कमला चाची ने उसका हाथ पकड़ा। उंगलियाँ कलाई पर घूमीं।
“तुम इन दिनों बहुत संभलकर चल रहे हो,” उन्होंने धीमी आवाज में कहा। “डर लग रहा है क्या?”
अमन ने उनकी आँखों में देखा। “डर नहीं चाची। बस सावधानी।”
कमला चाची हल्की मुस्कुराईं। “सावधानी अच्छी चीज है। लेकिन ज्यादा सावधानी से मौके भी निकल जाते हैं।”
अमन ने कुछ नहीं कहा। कमला चाची ने उसका हाथ छोड़ दिया। लेकिन आँखों में वह चुनौती बाकी थी।
रात को रेणु फिर आईं। इस बार उन्होंने अमन का चेहरा देखते ही समझ लिया कि दिन भारी रहा है।
“बताओ,” उन्होंने कहा।
अमन ने सब बताया—राधा की बात, राजिया की निगाहें, कमला चाची का इशारा। रेणु अंत तक चुपचाप सुनती रहीं। फिर बोलीं,
“अब तुम्हें एक फैसला करना होगा। या तो तुम इन सारी आगों के बीच से निकलोगे, या जल जाओगे। मैं तुम्हें शरीर सिखा सकती हूँ, नियंत्रण सिखा सकती हूँ। लेकिन फैसला तुम्हें खुद करना होगा।”
अमन ने सिर हिलाया। रेणु ने उसका हाथ पकड़ा।
“आज मैं तुम्हें कुछ नहीं सिखाऊँगी। सिर्फ इतना याद रखना—जो छुपा है वह हमेशा छुपा नहीं रहता। और जो दिखता है वह हमेशा सच नहीं होता।”
वह चली गईं।
अमन खिड़की के पास जाकर बाहर देखा। अँधेरा गाढ़ा था। कहीं दूर कुत्ते की आवाज आई। मन में एक सवाल घूम रहा था—
राजिया कितनी दूर तक जाएगी?
और क्या वह सच में अकेली है… या उसके पीछे भी कोई है?
रात गहरी होती गई। हवेली के अंदर कई साँसें चल रही थीं। और गाँव के किनारे वाले छोटे से घर में एक लड़की डायरी में लिख रही थी—
“कल मैं उसके करीब जाऊँगी। देखूँगी कि वह कितना संभल सकता है।”
कहानी अब एक नए मोड़ पर खड़ी थी। जहाँ शरीर की भूख से ज्यादा खतरनाक था—शक का धीरे-धीरे बढ़ता जाल।
अगली सुबह अमन ने रेणु की सलाह को गंभीरता से लिया।
वह खेतों वाले छोटे रास्ते से नहीं गया। मुख्य सड़क से कॉलेज पहुँचा। राधा गली में नहीं मिली। शायद वह भी जानबूझकर अलग रास्ता चुन रही थी। कॉलेज पहुँचकर अमन ने अपनी जगह पर बैठते ही महसूस किया कि राजिया की निगाह फिर से उसकी पीठ पर है। लेकिन आज उसने मुड़कर नहीं देखा। किताब खोली और ध्यान पढ़ाई पर लगाने की कोशिश की।
ब्रेक में अमन ने पानी की टंकी की तरफ जाने के बजाय कक्षा में ही रहना पसंद किया। राधा बाहर गई थी। राजिया भी गई। दोनों की अनुपस्थिति में अमन को थोड़ी राहत मिली। लेकिन वह राहत ज्यादा देर नहीं टिकी।
दोपहर की छुट्टी के बाद जब वह घर की तरफ लौट रहा था तो गली के मोड़ पर राजिया खड़ी मिली। अकेली। जैसे वह जानबूझकर उसका इंतजार कर रही हो।
अमन की चाल एक पल के लिए धीमी पड़ी, लेकिन उसने रुकने के बजाय सामान्य गति बनाए रखी। राजिया ने उसका रास्ता नहीं रोका। बस इतना कहा,
“अमन।”
अमन रुक गया। दोनों के बीच थोड़ी दूरी थी। आसपास लोग आ-जा रहे थे, इसलिए राजिया ने आवाज बहुत ऊँची नहीं की।
“मैंने सोचा था तुम आज भी उसी रास्ते से जाओगे,” उसने कहा। आवाज में कोई आरोप नहीं था, सिर्फ एक अजीब सी शांति।
अमन ने जवाब दिया, “आज मन नहीं था।”
राजिया ने सिर हिलाया। “अच्छा। तो फिर कल मिलते हैं।”
वह मुड़कर चली गई। अमन वहीं खड़ा रह गया। “कल मिलते हैं” वाली बात उसके दिमाग में गूँजती रही। राजिया अब सिर्फ सवाल नहीं पूछ रही थी। वह मुलाकातों का पैटर्न भी बना रही थी।
घर पहुँचकर अमन ने सीधा अपने कमरे में जाने की कोशिश की, लेकिन आँगन में कमला चाची फिर से बैठी थीं। उन्होंने इस बार नहीं बुलाया। सिर्फ उसकी तरफ देखा। लंबी, समझदार निगाह से। अमन ने नमस्ते कहा और अंदर चला गया। कमला चाची की चुप्पी आज उनके स्पर्श से भी ज्यादा भारी लग रही थी।
शाम को राधा ने पहली बार खुद अमन को नोटिस करने की कोशिश की। कॉलेज के बाहर वह थोड़ी देर खड़ी रही। अमन जब निकला तो उसने धीमे स्वर में कहा,
“तुम इन दिनों सच में बदल गए हो।”
अमन ने उसकी तरफ देखा। राधा की आँखों में नाराजगी नहीं थी। बल्कि एक हल्की सी चिंता और थकान थी।
“पढ़ाई का दबाव है,” अमन ने वही पुराना जवाब दिया।
राधा ने सिर हिलाया। “अगर कभी बात करनी हो… तो कहना।”
वह और कुछ नहीं बोली। बस इतना कहकर चली गई। अमन ने उसका पीठ देखता रहा। दीवार और मोटी हो चुकी थी, लेकिन राधा अभी भी दरवाजा बंद नहीं कर रही थी। वह इंतजार कर रही थी—कि अमन खुद आए।
रात को जब रेणु आईं तो अमन ने दिन की हर छोटी बात बताई। राजिया का गली में इंतजार करना, कमला चाची की चुप निगाह, और राधा का वह छोटा सा वाक्य।
रेणु ने इस बार काफी देर तक कुछ नहीं कहा। लालटेन की लौ उनके चेहरे पर काँप रही थी। आखिरकार उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“राजिया अब तुम्हें अपने तरीके से घेर रही है। वह तुम्हें डरा नहीं रही। वह तुम्हें आदत डाल रही है—कि तुम उसकी मौजूदगी को सामान्य समझने लगो। यह सबसे खतरनाक तरीका है।”
अमन चुप रहा।
“और राधा…” रेणु ने गहरी साँस ली। “वह अभी भी तुम्हारा इंतजार कर रही है। लेकिन अगर तुम ज्यादा देर तक दीवार बनाए रखा तो वह खुद दीवार बन जाएगी। फिर तोड़ना मुश्किल हो जाएगा।”
अमन ने धीमे स्वर में पूछा, “तो मैं क्या करूँ दीदी?”
रेणु ने उसकी आँखों में देखा। “कुछ दिन और सब्र करो। राजिया को अपनी चाल चलने दो। तुम सिर्फ अपनी जगह पर बने रहो। कोई नया कदम मत उठाना। न उसके करीब जाना, न राधा से पूरी तरह दूर होना। संतुलन बनाए रखना।”
बात खत्म होने के बाद रेणु ने अमन के बालों में हाथ फेरा। इस बार उनका स्पर्श सिर्फ आश्वासन देने वाला था। कोई शिक्षा नहीं, कोई शरीर की बात नहीं। सिर्फ एक बड़ी बहन का सहारा।
रेणु के जाने के बाद अमन खिड़की के पास बैठ गया। बाहर अँधेरा गाढ़ा था। मन में राजिया की आवाज घूम रही थी—“तो फिर कल मिलते हैं।”
उसी समय गाँव के किनारे वाले छोटे घर में राजिया डायरी खोल रही थी। उसने आज की बात लिखी—
“आज वह मुख्य सड़क से गया। मतलब मेरी बात उसके दिमाग में है। वह बच रहा है। लेकिन बचने वाला आदमी हमेशा निर्दोष नहीं होता। कभी-कभी सबसे चालाक आदमी ही सबसे ज्यादा बचता है।”
उसने पेन रोका। फिर एक नई लाइन जोड़ी—
“कल मैं उसकी दिनचर्या का पहला पन्ना भरूँगी। कहाँ जाता है, कितनी देर लगता है, किससे बात करता है। भाई ने कहा था अमन से पूछना… तो मैं पूछूँगी। लेकिन अपने तरीके से। धीरे-धीरे।”
डायरी बंद करके उसने दीया बुझा दिया। अँधेरे में लेटकर वह सोचती रही। शक अभी भी वहाँ था। लेकिन शक के नीचे एक और भावना भी हिलोरें ले रही थी—जिसे वह अभी नाम नहीं दे पा रही थी।
रात गहरी होती गई।
हवेली के अंदर अमन सोने की कोशिश कर रहा था। आँखें बंद करता तो राजिया की ठंडी निगाहें आ जातीं। कभी राधा का थका हुआ चेहरा। कभी कमला चाची की चुप चेतावनी।
और गाँव के दूसरे छोर पर राजिया आँखें खोले अँधेरे को घूर रही थी।
दोनों के बीच की दूरी अब सिर्फ गलियों और खेतों की नहीं रह गई थी। वह दूरी अब एक अदृश्य खेल में बदल चुकी थी—जहाँ एक बच रहा था और दूसरी घेर रही थी।
कल नया दिन आने वाला था। और उस दिन राजिया अपना अगला कदम बढ़ाने वाली थी।
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