04-10-2026, 06:09 PM
माँ रसोई में काम करती हुई भी पूजा की बातें सुन रही थी, लेकिन उसका दिमाग कहीं और चल रहा था। जब पूजा ने रात को मंदिर जाने की बात कही, तब माँ के मन में जो शंका उभरी थी, वह धीरे-धीरे साँप की तरह फन उठाकर बैठ गई।
कहीं वह बाबाजी के पास जा के पति की आत्मा की शांति के बहाने कुछ और तो नहीं कर रही? कुछ गुलछर्रे तो नहीं उडाती?
माँ ने आटा गूँथते हुए एक पल रुककर पूजा की तरफ देखा। बेटी की आँखें झुकी हुई थीं, गालों पर हल्की लालिमा थी। माँ ने देखा कि पूजा की साँस थोड़ी तेज चल रही है। वह सोचने लगी, दिन में भी तो जाती है, रोज जाती है। बाबाजी के पास बैठकर घंटों रहती है। पहले तो समझती थी कि विधवा बेटी को सांत्वना मिल रही है, गुरु की कृपा मिल रही है… लेकिन अब? और गुरु की कौनसी कृपा उसे मिल रही है और कहा?
क्या बाबाजी उसे चोदते तो नहीं है? सहायिका सौनी पटेल।
यह ख्याल आते ही माँ के हाथ रुक गए। आटे की लोई उसके हाथ में अधूरी रह गई। वह मन ही मन कल्पना करने लगी, बाबाजी का मोटा, काला लंड… पूजा की पतली कमर… बेटी की चूत जो इतनी जल्दी विधवा होने के बाद भी अभी तक तरस रही होगी। बाबाजी उस चूत में अपना लंड धकेलते होंगे, पूजा सिसकती होगी, फिर भी लेती होगी। गांड में भी डालते होंगे। मुँह में भरते होंगे। माँ की साँस एक पल के लिए अटक गई। वह अपनी बेटी को नंगी चारपाई पर लेटी हुई देख रही थी, टाँगें फैली हुई, बाबाजी उसके ऊपर, कमर हिलाते हुए, रस छोड़ते हुए। उसकी छुट से बाबाजी का लंड का प्रसाद रीसते हुए। माँ के दिल में एक भनक फ़ैल गई। साथ ही उसकी चूत भी जवाब दे गई। माँ को लगा की उनकी चूत भी निचे गीली हो रही है। लेकिन उनका ध्या अभी तो सिर्फ पूजा के पास ही था।
यह हर रोज पूजा वह जाती है… पता नहीं कब यह पूजा खत्म होगी?
दिन में तो सब ठीक लगता है। लोग देखते हैं तो सोचते हैं बेटी गुरु के पास जा रही है। लेकिन रात को… इतनी रात को अकेली… और फिर ग्यारह-बारह बजे घर लौटना। माँ की छाती में एक अजीब सी गर्मी फैल गई। उसकी धड़कने तेज हो रही थी। उनके विचार अब विपरीत दिशा में ह सोच रहे थे।
चुदवाके वापस तो नहीं आती होगी… क्या बाबाजी के लंड ने उसकी चूत और गांड की खबर ले राखी है? क्या पूजा खुद ही बाबाजी को अपने पैरो को फैला के अपनी चूत उसके लंड के सामने पेश करती होगी? ओ...बाप रे..... मैं भी क्या क्या सोच रही हूँ।
यह सोचते ही माँ के मन में और भी गंदी तस्वीरें घूमने लगीं। पूजा की चूत में बाबाजी का गाढ़ा वीर्य भरा हुआ, टपकता हुआ। उसकी गांड लाल और सूजी हुई। गांड का सुराग बाबाजी के लंड की साइज़ जितना होना.... मुँह के कोनों पर लंड का रस चिपका हुआ। माँ ने आँखें बंद कर लीं। वह अपनी बेटी को बाबाजी के नीचे कराहते हुए देख रही थी, चूत की गीली आवाज, बाबाजी के धक्के, पूजा की दबी हुई चीखें… “बाबाजी… और अंदर… पूरा डाल दो… मारो मेरी गांड बाबाजी अब यह तैयार है आपके लंड के मार खाने को....और ना जाने क्या ...क्या?” निर्देशिका फनलवर।
माँ का अपना शरीर भी हल्का गर्म हो चला था। वह अपने बारे में सोचने लगी। लेकिन तुरंत अपने विचारों की झटका के दूर कर दिया।
*****************************************.
कहानी अभी जारी है दोस्तों बने रहिये।
निर्मात्री मैत्री पटेल है।
कहीं वह बाबाजी के पास जा के पति की आत्मा की शांति के बहाने कुछ और तो नहीं कर रही? कुछ गुलछर्रे तो नहीं उडाती?
माँ ने आटा गूँथते हुए एक पल रुककर पूजा की तरफ देखा। बेटी की आँखें झुकी हुई थीं, गालों पर हल्की लालिमा थी। माँ ने देखा कि पूजा की साँस थोड़ी तेज चल रही है। वह सोचने लगी, दिन में भी तो जाती है, रोज जाती है। बाबाजी के पास बैठकर घंटों रहती है। पहले तो समझती थी कि विधवा बेटी को सांत्वना मिल रही है, गुरु की कृपा मिल रही है… लेकिन अब? और गुरु की कौनसी कृपा उसे मिल रही है और कहा?
क्या बाबाजी उसे चोदते तो नहीं है? सहायिका सौनी पटेल।
यह ख्याल आते ही माँ के हाथ रुक गए। आटे की लोई उसके हाथ में अधूरी रह गई। वह मन ही मन कल्पना करने लगी, बाबाजी का मोटा, काला लंड… पूजा की पतली कमर… बेटी की चूत जो इतनी जल्दी विधवा होने के बाद भी अभी तक तरस रही होगी। बाबाजी उस चूत में अपना लंड धकेलते होंगे, पूजा सिसकती होगी, फिर भी लेती होगी। गांड में भी डालते होंगे। मुँह में भरते होंगे। माँ की साँस एक पल के लिए अटक गई। वह अपनी बेटी को नंगी चारपाई पर लेटी हुई देख रही थी, टाँगें फैली हुई, बाबाजी उसके ऊपर, कमर हिलाते हुए, रस छोड़ते हुए। उसकी छुट से बाबाजी का लंड का प्रसाद रीसते हुए। माँ के दिल में एक भनक फ़ैल गई। साथ ही उसकी चूत भी जवाब दे गई। माँ को लगा की उनकी चूत भी निचे गीली हो रही है। लेकिन उनका ध्या अभी तो सिर्फ पूजा के पास ही था।
यह हर रोज पूजा वह जाती है… पता नहीं कब यह पूजा खत्म होगी?
दिन में तो सब ठीक लगता है। लोग देखते हैं तो सोचते हैं बेटी गुरु के पास जा रही है। लेकिन रात को… इतनी रात को अकेली… और फिर ग्यारह-बारह बजे घर लौटना। माँ की छाती में एक अजीब सी गर्मी फैल गई। उसकी धड़कने तेज हो रही थी। उनके विचार अब विपरीत दिशा में ह सोच रहे थे।
चुदवाके वापस तो नहीं आती होगी… क्या बाबाजी के लंड ने उसकी चूत और गांड की खबर ले राखी है? क्या पूजा खुद ही बाबाजी को अपने पैरो को फैला के अपनी चूत उसके लंड के सामने पेश करती होगी? ओ...बाप रे..... मैं भी क्या क्या सोच रही हूँ।
यह सोचते ही माँ के मन में और भी गंदी तस्वीरें घूमने लगीं। पूजा की चूत में बाबाजी का गाढ़ा वीर्य भरा हुआ, टपकता हुआ। उसकी गांड लाल और सूजी हुई। गांड का सुराग बाबाजी के लंड की साइज़ जितना होना.... मुँह के कोनों पर लंड का रस चिपका हुआ। माँ ने आँखें बंद कर लीं। वह अपनी बेटी को बाबाजी के नीचे कराहते हुए देख रही थी, चूत की गीली आवाज, बाबाजी के धक्के, पूजा की दबी हुई चीखें… “बाबाजी… और अंदर… पूरा डाल दो… मारो मेरी गांड बाबाजी अब यह तैयार है आपके लंड के मार खाने को....और ना जाने क्या ...क्या?” निर्देशिका फनलवर।
माँ का अपना शरीर भी हल्का गर्म हो चला था। वह अपने बारे में सोचने लगी। लेकिन तुरंत अपने विचारों की झटका के दूर कर दिया।
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कहानी अभी जारी है दोस्तों बने रहिये।
निर्मात्री मैत्री पटेल है।



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