03-10-2026, 12:36 AM
लगभग दो घंटे बीत चुके थे। हरीश ने विवेक से कहा की अब उसे निकलना चाहिए। विवेक ने आखिरी बार चैताली के शरीर को निहारा और विदा ली।
"मजा आ गया भाई! शुक्रिया!" विवेक ने जाते हुए कहा।
हरीश ने चैताली को आदेश दिया, "जाओ, फ्रेश हो जाओ और अपने कपड़े पहन लो।"
चैताली ने खुद को साफ कीया और अपने नीले सलवार-कमीज में वापस आ गई। हरीश उसे अपनी मोटरसाइकील पर बैठाकर उसी मार्केट में ले गया जहाँ उसकी कार खड़ी थी।
जैसे ही वे कार के पास पहुँचे, हरीश ने उसकी आँखों में देखा और अपनी उँगलियों से एक जोरदार 'चुटकी' बजाई।
चैताली अचानक होश में आई। वह चौंक गई और इधर-उधर देखने लगी।
"तुम... तुम यहाँ कैसे? मैं यहाँ कैसे पहुँची?" उसने घबराते हुए पूछा।
हरीश ने मासूमियत से कहा, "अरे, आप तो कॉफी पीकर थोड़ी देर के लिए सो गई थीं। मैंने सोचा आपको आपके ऑफिस के पास छोड़ दूँ।"
चैताली पूरी तरह भ्रमित थी। उसका सिर भारी था और उसे कुछ याद नहीं आ रहा था। "ओह... शायद मैं बहुत थक गई थी। शुक्रिया हरीश।"
वह अपनी कार में बैठी और ऑफिस की ओर चल दी। वह पूरी तरह से सामान्य महसूस कर रही थी, लेकीन उसके शरीर के अंदर एक अजीब सी भारीपन और गीलापन था जिसे वह समझ नहीं पा रही थी।
शाम को जब वह अपने ऑफिस की डेस्क पर बैठी, तो उसने महसूस कीया की उसके गले में कुछ कमी है। उसने अपनी गर्दन छुई। उसका ऑफिस आईडी कार्ड गायब था। वह गहरी सोच में पड़ गई कि उसने अपना आईडी कार्ड कहाँ रख दिया होगा।
उसने अपना बैग देखा, अपनी कार की सीटें चेक कीं, लेकीन कार्ड कहीं नहीं मिला। उसे याद नहीं आ रहा था की उसने कार्ड कहाँ खोया। वह परेशान थी, लेकीन उसे यह नहीं पता था की वह कार्ड अब कहाँ और किसके पास पहुँच गया है ।


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