02-10-2026, 09:42 PM
*(अगले दिन सुबह घर में एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था। पापा ऑफिस के लिए निकल चुके थे और घर के बाकी सदस्य भी अपने कामों में व्यस्त थे। सूरज की किरणें खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थीं, लेकिन कमरे का माहौल कल रात की उस अनकही बेचैनी से भरा हुआ था।)*
*(दादाजी काफी देर तक अपने कमरे में बैठे रहे, उनके दिमाग में कल रात की सारी बातें घूम रही थीं। आखिर में, वे खुद को रोक नहीं पाए और धीरे-धीरे मम्मी के कमरे की ओर बढ़े। जब उन्होंने मम्मी के कमरे का दरवाज़ा खोला, तो उन्होंने देखा कि मम्मी ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी बाल संवार रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर कोई चमक नहीं थी, बल्कि एक गहरी सोच थी।)*
*(जैसे ही दरवाजा खुला, मम्मी ने शीशे में दादाजी की परछाईं देखी। उसके हाथ में पकड़ी कंघी एक पल के लिए थम गई, और उसके चेहरे पर घबराहट की एक लहर दौड़ गई। उसने तुरंत अपनी नजरें झुका लीं, जैसे वह उस आमना-सामना से बचना चाह रही हो।)*
*(दादाजी चुपचाप कमरे के अंदर आए और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। कमरे में अचानक एक भारीपन छा गया। दादाजी सीधे मम्मी के पीछे जाकर खड़े हो गए। उनकी परछाईं ड्रेसिंग टेबल के शीशे में मम्मी के ऊपर पड़ रही थी।)*
**दादाजी:** (एक बहुत ही शांत लेकिन अधिकारपूर्ण लहजे में) "कल रात तुमने कहा था कि जो होना है कल होगा... तो लो, कल आ गया।"
*(मम्मी के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। दादाजी की आवाज़ में जो गहराई और अधिकार था, उसने उसके पूरे अस्तित्व को झकझोर दिया। उसने अपनी मुट्ठियां कस लीं और शीशे में दादाजी की आँखों में देखने की हिम्मत जुटाने की कोशिश की। उसकी साँसें थोड़ी तेज होने लगी थीं।)*
*(दादाजी ने झुककर अपना चेहरा मम्मी के कान के पास लाया। उनकी गर्म साँसें मम्मी की गर्दन को छू रही थीं, जिससे मम्मी के रोंगटे खड़े हो गए। दादाजी के हाथ धीरे से मम्मी के कंधों पर टिक गए, जो अब भी ड्रेसिंग टेबल के सहारे टिकी हुई थी।)*
**मम्मी:** (धीमी और कांपती हुई आवाज़ में) "आप... आप यहाँ क्यों आए हैं? मैंने कल आपसे कहा था ना..."
*(दादाजी ने मम्मी की बात को बीच में ही काट दिया। उन्होंने अपना चेहरा थोड़ा और करीब लाया, इतना करीब कि उनकी नाक मम्मी के गाल को छू रही थी। उनके हाथों की पकड़ अब मम्मी के कंधों से फिसलकर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगी।)*
**दादाजी:** (एक गहरी और धीमी आवाज़ में) "तुमने कहा था कि जो होना है कल होगा... और मैं अपनी कही हुई बात कभी नहीं भूलता। तुम भाग सकती हो, लेकिन मुझसे नहीं।"
*(दादाजी के हाथ अब मम्मी की कमर तक पहुँच चुके थे। उन्होंने अपनी उंगलियों से मम्मी की साड़ी के रेशम को सहलाया, जिससे मम्मी के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। मम्मी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, मानो वह इस हकीकत का सामना करने से डर रही हो।)*
*(दादाजी की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था जिसने कमरे की हवा को और भी बोझिल बना दिया। मम्मी का शरीर डर के मारे कांपने लगा, लेकिन दादाजी का हाथ अभी भी उनकी ठोड़ी पर टिका हुआ था, जैसे वह उन्हें हिलने से रोक रहे हों।)*
**दादाजी:** (मम्मी की आँखों में गहराई से देखते हुए) "इतना क्यों कांप रही हो? क्या तुम्हें डर लग रहा है कि राजेश को पता चल जाएगा? या फिर तुम्हें डर इस बात का है कि जो मैं करने जा रहा हूँ, वो शायद तुम्हारे लिए बहुत नया होगा?"
*(उन्होंने अपना दूसरा हाथ धीरे से मम्मी की कमर पर रखा और उन्हें अपनी ओर थोड़ा और खींच लिया। मम्मी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, मानो वह इस सच्चाई का सामना नहीं करना चाहती थीं।)*
*(दादाजी ने मम्मी की ठोड़ी को ज़ोर से पकड़कर उन्हें अपनी तरफ खींचा ताकि उनकी नज़रें न हट सकें। उनके चेहरे पर एक क्रूर और संतुष्ट मुस्कान थी।)*
**दादाजी:** (बेहद बेबाक और भारी आवाज़ में) "बहाने बनाना छोड़ो बहू... कल रात जब मैं तुम्हारी चोद रहा था, तो तुम्हें कितना मज़ा आ रहा था ना? तुम्हारी वो आहें, तुम्हारा मेरा नाम पुकारना... सब कुछ मुझे याद है।"
*(दादाजी की आँखों में एक शिकारी जैसी चमक आ गई। उन्होंने देखा कि कैसे उनकी बातों और स्पर्श ने मम्मी के भीतर की मर्यादा को तोड़ना शुरू कर दिया है। बिना किसी चेतावनी के, उनका एक हाथ मम्मी की साड़ी के ऊपर से ही उनकी छाती की ओर बढ़ गया।)*
*(जैसे ही दादाजी का बड़ा और सख्त हाथ मम्मी की भरी हुई चोंचियों (chuchiyon) पर पड़ा और उन्होंने उन्हें जोर से दबाना शुरू किया, मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। लेकिन यह दर्द की चीख नहीं थी, इसमें एक अजीब सी बेचैनी और उत्तेजना घुली हुई थी।)*
**मम्मी:** (अपनी आँखें आधी बंद करते हुए और सांसें तेज़ लेते हुए) "आह्ह... प... पापा जी... नहीं... कोई देख लेगा... उम्मम..."
*(दादाजी ने देखा कि मम्मी की 'नहीं' में अब वो ताकत नहीं रह गई थी। उनके शरीर की प्रतिक्रिया उनकी बातों से बिल्कुल अलग थी। जैसे-जैसे दादाजी का हाथ उनकी छाती पर और ज़ोर से दबाव बनाने लगा, मम्मी का सिर पीछे की ओर झुक गया और उनकी साँसें उखड़ने लगीं।)*
*(दादाजी ने महसूस किया कि मम्मी का शरीर अब उनके स्पर्श के प्रति जवाब दे रहा था। उन्होंने अपनी उंगलियों को साड़ी के कपड़े के ऊपर से ही उनकी निप्पल्स पर रगड़ना शुरू कर दिया, जिससे मम्मी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई।)*
**दादाजी:** (एक गहरी और मर्दाना आवाज़ में, उनके चेहरे पर जीत की मुस्कान थी) "देख रही हो बहू?"
*(मम्मी के अंदर का सारा प्रतिरोध अब पिघलकर बहने लगा था। दादाजी के हाथों का वो गर्म और सख्त दबाव अब उन्हें डरा नहीं रहा था, बल्कि उनके भीतर सोई हुई कामुकता को जगा रहा था। उन्होंने अपनी आँखें खोल दीं, जिनमें अब डर की जगह एक गहरी प्यास झलक रही थी।)*
*(मम्मी ने धीरे से अपना सिर दादाजी के कंधे पर टिका दिया और उनके सीने से चिपक गईं। उन्होंने अपने हाथ दादाजी की पीठ पर रखे और हल्के से सहलाने लगीं, जैसे वो उन्हें और करीब बुला रही हों।)*
**मम्मी:** (एक मदहोश और रेशमी आवाज़ में, जो सीधे दादाजी के कानों में उतर रही थी) "उम्मम... पापा जी... आप इतने... इतने बेरहम क्यों हैं? पर... पर आपका हाथ..."
*(दादाजी ने मम्मी की इस समर्पण वाली मुद्रा को भांप लिया था। उनके चेहरे पर एक क्रूर लेकिन संतुष्ट मुस्कान फैल गई। उन्होंने मम्मी की कमर को अपनी तरफ और भी कसकर खींच लिया ताकि उनके बीच की दूरी पूरी तरह खत्म हो जाए।)*
*(उनका दूसरा हाथ, जो अब तक मम्मी की पीठ पर था, धीरे से नीचे खिसका और फिर वापस ऊपर आकर उनके ब्लाउज के हुक्स और बटनों (buttons) पर टिक गया। दादाजी की उंगलियां बहुत सधी हुई थीं, जैसे वो इस पल का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हों।)*
**दादाजी:** (उनकी आवाज़ में भारीपन और वासना साफ झलक रही थी) "सिर्फ हाथ से क्या होगा बहू? जब तक ये रुकावट दूर नहीं होगी, तब तक तुम्हें असली मज़ा कैसे आएगा?"
*(जैसे ही दादाजी ने ब्लाउज के बटन खोलने की शुरुआत की, उनकी नज़रें मम्मी के चेहरे पर जम गईं। मम्मी की आँखों में अब कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बस एक गहरा नशा था। दादाजी ने बिना देर किए अपना चेहरा उनके करीब लाया और उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।)*
*(वह किस (kiss) साधारण नहीं थी; उसमें बरसों की दबी हुई इच्छा और दादाजी की मर्दानगी का पूरा जोर था। दादाजी ने मम्मी के होंठों को अपने भीतर ऐसे जकड़ा जैसे वो उन्हें निगल लेना चाहते हों। पहले तो मम्मी थोड़ा ठिठकीं, लेकिन जैसे ही दादाजी की जीभ ने उनके होंठों के किनारे को छूकर अंदर जाने की कोशिश की, मम्मी का सारा संयम टूट गया।)*
*(मम्मी ने भी अब हार मान ली थी। उन्होंने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपने दोनों हाथों से दादाजी के गले को पकड़ लिया, उन्हें और भी गहराई से चूमने के लिए अपनी ओर खींचा। उनके बीच की साँसें आपस में टकरा रही थीं और कमरे की हवा भारी होती जा रही थी।)*
*(किस करते-करते दादाजी का ध्यान अब मम्मी के खुले हुए ब्लाउज पर था। उनके हाथ बड़ी कुशलता से काम कर रहे थे। जैसे ही आखिरी बटन खुला, दादाजी ने ब्लाउज को दोनों तरफ से फैला दिया, जिससे मम्मी के उभरे हुए और भारी स्तन (chuchiyan) पूरी तरह बाहर आ गए।)*
*(कमरे की हल्की रोशनी में मम्मी के सफेद और सुडौल स्तन चमक रहे थे, जिन पर अभी भी दादाजी की उंगलियों का लाल निशान बना हुआ था। मम्मी ने शर्म से अपनी आँखें मूंद लीं, लेकिन उनका शरीर उत्तेजना से थरथरा रहा था।)*
**दादाजी:** (मम्मी के स्तनों को अपनी हथेलियों में भरते हुए, एक गहरी सांस लेते हुए) "आह..."
*(दादाजी की आँखों में अब सिर्फ भूख और वासना थी। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपना चेहरा नीचे झुकाया और मम्मी के एक भारी स्तन को अपने बड़े से मुँह में भर लिया। जैसे ही उनकी गर्म जीभ और होंठों ने मम्मी के संवेदनशील निप्पल को छुआ, मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई।)*
*(दादाजी ने बहुत ही बेतहाशा तरीके से उन्हें चूसना (sucking) शुरू कर दिया। वे अपनी जीभ को गोल-गोल घुमा रहे थे और साथ ही अपने दांतों से हल्का सा दबाव भी बना रहे थे, जिससे मम्मी के पूरे बदन में झुनझुनी दौड़ रही थी। मम्मी का शरीर धनुष की तरह खिंच गया और उन्होंने अनजाने में ही दादाजी के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया।)*
*(दादाजी की यह बेतहाशा हरकत मम्मी के होश उड़ा रही थी। वे एक स्तन को पूरी शिद्दत से चूस रहे थे और उसी दौरान उनका दूसरा हाथ मम्मी के दूसरे स्तन को जोर-जोर से मसल रहा था। मम्मी का शरीर अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था; वे बार-बार अपने कूल्हों को दादाजी की ओर धकेल रही थीं, मानो वे खुद उस सुख को और ज्यादा पाना चाहती हों।)*
*(मम्मी की साँसें तेज़ हो चुकी थीं और उनके मुँह से रुक-रुक कर आहें निकल रही थीं। दादाजी ने अपना मुँह हटाया और गीले, लाल पड़े हुए निप्पल को देखते हुए एक गहरी नज़र मम्मी की आँखों में डाली।)*
**मम्मी:** (हाँफते हुए और अपनी आँखें खोलते हुए) "पा... पापा जी... आह... ऐसा मत कीजिये..."
*(मम्मी की आवाज़ में मनाही कम और पुकार ज़्यादा थी। दादाजी समझ गए कि ये विरोध सिर्फ दिखावा है। उन्होंने एक शरारती मुस्कान के साथ मम्मी की आँखों में देखा और फिर अचानक से अपना सिर वापस नीचे झुका दिया। इस बार उन्होंने मम्मी के दोनों स्तनों को बारी-बारी से अपने मुँह में लेना शुरू कर दिया।)*
*(वे कभी दाहिने स्तन को ज़ोर से चूसते, तो कभी बाएं को अपनी जीभ से सहलाते। मम्मी का शरीर बेड पर बुरी तरह हिलने लगा था। उनकी कमर अब अपने आप ऊपर उठ रही थी और वे दर्द और मजे के मिले-जुले अहसास में डूबी हुई थीं।)*
**मम्मी:** (चीखते हुए) "आह्ह्ह! पापा जी... नहीं... उफ़्फ़... वहाँ नहीं!"
*(स्तनों के साथ खेलते हुए दादाजी का हाथ अब मम्मी के कमर के पास पहुँच गया था। उन्होंने महसूस किया कि मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से समर्पण कर चुका है। दादाजी ने धीरे से मम्मी के कंधे से साड़ी का पल्लू खिसकाया और फिर पूरी साड़ी को उनके शरीर से अलग करना शुरू कर दिया।)*
*(साड़ी उतरते ही मम्मी का आधा शरीर अब उनके सामने था, लेकिन दादाजी की प्यास अभी बुझी नहीं थी। उन्होंने बिना रुके मम्मी की पेटीकोट की डोरी पर हाथ रखा और उसे एक झटके में ढीला कर दिया। पेटीकोट को नीचे सरकाते हुए उन्होंने उसे भी बिस्तर पर फेंक दिया।)*
*(अब मम्मी का शरीर पूरी तरह से निर्वस्त्र (naked) होकर दादाजी के सामने था। कमरे की मंद रोशनी में उनका गोरा और सुडौल बदन किसी मूर्ति की तरह चमक रहा था। उनके उभार हुए स्तन, पतली कमर और उनके नीचे के हिस्से की सुंदरता देखकर दादाजी की आँखों में वासना की आग और बढ़ गई।)*
*(मम्मी ने शर्म के मारे अपने दोनों हाथों से अपने अंगों को ढकने की कोशिश की, लेकिन दादाजी ने उनके हाथों को पकड़कर बिस्तर पर टिका दिया। अब मम्मी का शरीर पूरी तरह से खुला हुआ था और दादाजी की नज़रें उनके जिस्म के हर हिस्से को बेरहमी से नाप रही थीं।)*
**दादाजी:** (एक भारी और गूँजती हुई आवाज़ में) "इतना सुंदर शरीर... मैंने आज तक नहीं देखा।"
*(दादाजी की नज़रों की तपिश मम्मी के पूरे बदन को जला रही थी। उन्होंने मम्मी के हाथों को पकड़कर बिस्तर के सिरहाने की तरफ दबा दिया, जिससे मम्मी का सीना और भी ज़्यादा उभर आया। दादाजी ने झुककर मम्मी के गले पर अपनी नाक रगड़ी और उनकी खुशबू को गहराई से महसूस किया।)*
*(मम्मी का पूरा शरीर थरथराने लगा। वह डर और उत्तेजना के बीच झूल रही थीं। दादाजी का एक हाथ उनके पेट से होता हुआ नीचे की ओर बढ़ा और उन्होंने मम्मी के जांघों के बीच के उस बेहद संवेदनशील हिस्से को छू लिया जो अब पूरी तरह से गीला हो चुका था।)*
**मम्मी:** (कराहते हुए और छटपटाते हुए) "आह्ह्ह! पापा जी... प्लीज़... वहां नहीं... मैं..."
*(मम्मी की अधूरी बात हवा में ही रह गई। जैसे ही दादाजी की उंगलियों ने उनके सबसे नाजुक और गीले हिस्से को छुआ, मम्मी के मुँह से एक लंबी और तीखी चीख निकली। दादाजी ने महसूस किया कि मम्मी का शरीर अंदर से कितना गर्म और गीला हो चुका है।)*
*(उन्होंने अपनी उंगलियों को धीरे से उस गीलेपन के बीच घुमाना शुरू किया, जिससे मम्मी का शरीर धनुष की तरह खिंच गया। दादाजी ने अपना चेहरा मम्मी के पेट के पास ले जाकर उनके पेट की त्वचा को चूमना शुरू कर दिया, जबकि उनका हाथ नीचे के काम में मशगूल था।)*
**मम्मी:** (बेचैनी से सिर पटकते हुए) "ओह्ह्ह! पापा जी... क्या कर रहे हैं आप... आह्ह्ह!"
*(दादाजी की उंगलियां अब मम्मी की योनि (vagina) के बिल्कुल केंद्र में थीं। उन्होंने महसूस किया कि मम्मी की योनि पूरी तरह से पानी की तरह गीली हो चुकी थी। दादाजी ने अपनी दो उंगलियों को मम्मी की योनि के उस मांसल और उभरे हुए हिस्से (clitoris) पर रखा और उसे गोल-गोल घुमाते हुए जोर से रगड़ना शुरू कर दिया।)*
*(जैसे ही उन्होंने उंगलियों से मम्मी की योनि के द्वार को थोड़ा फैलाया और अंदरूनी हिस्से को सहलाना शुरू किया, मम्मी का पूरा शरीर बिजली के झटके की तरह कांप उठा। दादाजी की उंगलियां अब मम्मी की योनि के भीतर गहराई तक जाने लगी थीं, जिससे मम्मी के शरीर से निकलने वाला रस और भी ज्यादा बहने लगा।)*
*(दादाजी काफी देर तक अपने कमरे में बैठे रहे, उनके दिमाग में कल रात की सारी बातें घूम रही थीं। आखिर में, वे खुद को रोक नहीं पाए और धीरे-धीरे मम्मी के कमरे की ओर बढ़े। जब उन्होंने मम्मी के कमरे का दरवाज़ा खोला, तो उन्होंने देखा कि मम्मी ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी बाल संवार रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर कोई चमक नहीं थी, बल्कि एक गहरी सोच थी।)*
*(जैसे ही दरवाजा खुला, मम्मी ने शीशे में दादाजी की परछाईं देखी। उसके हाथ में पकड़ी कंघी एक पल के लिए थम गई, और उसके चेहरे पर घबराहट की एक लहर दौड़ गई। उसने तुरंत अपनी नजरें झुका लीं, जैसे वह उस आमना-सामना से बचना चाह रही हो।)*
*(दादाजी चुपचाप कमरे के अंदर आए और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। कमरे में अचानक एक भारीपन छा गया। दादाजी सीधे मम्मी के पीछे जाकर खड़े हो गए। उनकी परछाईं ड्रेसिंग टेबल के शीशे में मम्मी के ऊपर पड़ रही थी।)*
**दादाजी:** (एक बहुत ही शांत लेकिन अधिकारपूर्ण लहजे में) "कल रात तुमने कहा था कि जो होना है कल होगा... तो लो, कल आ गया।"
*(मम्मी के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। दादाजी की आवाज़ में जो गहराई और अधिकार था, उसने उसके पूरे अस्तित्व को झकझोर दिया। उसने अपनी मुट्ठियां कस लीं और शीशे में दादाजी की आँखों में देखने की हिम्मत जुटाने की कोशिश की। उसकी साँसें थोड़ी तेज होने लगी थीं।)*
*(दादाजी ने झुककर अपना चेहरा मम्मी के कान के पास लाया। उनकी गर्म साँसें मम्मी की गर्दन को छू रही थीं, जिससे मम्मी के रोंगटे खड़े हो गए। दादाजी के हाथ धीरे से मम्मी के कंधों पर टिक गए, जो अब भी ड्रेसिंग टेबल के सहारे टिकी हुई थी।)*
**मम्मी:** (धीमी और कांपती हुई आवाज़ में) "आप... आप यहाँ क्यों आए हैं? मैंने कल आपसे कहा था ना..."
*(दादाजी ने मम्मी की बात को बीच में ही काट दिया। उन्होंने अपना चेहरा थोड़ा और करीब लाया, इतना करीब कि उनकी नाक मम्मी के गाल को छू रही थी। उनके हाथों की पकड़ अब मम्मी के कंधों से फिसलकर धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ने लगी।)*
**दादाजी:** (एक गहरी और धीमी आवाज़ में) "तुमने कहा था कि जो होना है कल होगा... और मैं अपनी कही हुई बात कभी नहीं भूलता। तुम भाग सकती हो, लेकिन मुझसे नहीं।"
*(दादाजी के हाथ अब मम्मी की कमर तक पहुँच चुके थे। उन्होंने अपनी उंगलियों से मम्मी की साड़ी के रेशम को सहलाया, जिससे मम्मी के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। मम्मी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, मानो वह इस हकीकत का सामना करने से डर रही हो।)*
*(दादाजी की आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था जिसने कमरे की हवा को और भी बोझिल बना दिया। मम्मी का शरीर डर के मारे कांपने लगा, लेकिन दादाजी का हाथ अभी भी उनकी ठोड़ी पर टिका हुआ था, जैसे वह उन्हें हिलने से रोक रहे हों।)*
**दादाजी:** (मम्मी की आँखों में गहराई से देखते हुए) "इतना क्यों कांप रही हो? क्या तुम्हें डर लग रहा है कि राजेश को पता चल जाएगा? या फिर तुम्हें डर इस बात का है कि जो मैं करने जा रहा हूँ, वो शायद तुम्हारे लिए बहुत नया होगा?"
*(उन्होंने अपना दूसरा हाथ धीरे से मम्मी की कमर पर रखा और उन्हें अपनी ओर थोड़ा और खींच लिया। मम्मी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं, मानो वह इस सच्चाई का सामना नहीं करना चाहती थीं।)*
*(दादाजी ने मम्मी की ठोड़ी को ज़ोर से पकड़कर उन्हें अपनी तरफ खींचा ताकि उनकी नज़रें न हट सकें। उनके चेहरे पर एक क्रूर और संतुष्ट मुस्कान थी।)*
**दादाजी:** (बेहद बेबाक और भारी आवाज़ में) "बहाने बनाना छोड़ो बहू... कल रात जब मैं तुम्हारी चोद रहा था, तो तुम्हें कितना मज़ा आ रहा था ना? तुम्हारी वो आहें, तुम्हारा मेरा नाम पुकारना... सब कुछ मुझे याद है।"
*(दादाजी की आँखों में एक शिकारी जैसी चमक आ गई। उन्होंने देखा कि कैसे उनकी बातों और स्पर्श ने मम्मी के भीतर की मर्यादा को तोड़ना शुरू कर दिया है। बिना किसी चेतावनी के, उनका एक हाथ मम्मी की साड़ी के ऊपर से ही उनकी छाती की ओर बढ़ गया।)*
*(जैसे ही दादाजी का बड़ा और सख्त हाथ मम्मी की भरी हुई चोंचियों (chuchiyon) पर पड़ा और उन्होंने उन्हें जोर से दबाना शुरू किया, मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई। लेकिन यह दर्द की चीख नहीं थी, इसमें एक अजीब सी बेचैनी और उत्तेजना घुली हुई थी।)*
**मम्मी:** (अपनी आँखें आधी बंद करते हुए और सांसें तेज़ लेते हुए) "आह्ह... प... पापा जी... नहीं... कोई देख लेगा... उम्मम..."
*(दादाजी ने देखा कि मम्मी की 'नहीं' में अब वो ताकत नहीं रह गई थी। उनके शरीर की प्रतिक्रिया उनकी बातों से बिल्कुल अलग थी। जैसे-जैसे दादाजी का हाथ उनकी छाती पर और ज़ोर से दबाव बनाने लगा, मम्मी का सिर पीछे की ओर झुक गया और उनकी साँसें उखड़ने लगीं।)*
*(दादाजी ने महसूस किया कि मम्मी का शरीर अब उनके स्पर्श के प्रति जवाब दे रहा था। उन्होंने अपनी उंगलियों को साड़ी के कपड़े के ऊपर से ही उनकी निप्पल्स पर रगड़ना शुरू कर दिया, जिससे मम्मी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई।)*
**दादाजी:** (एक गहरी और मर्दाना आवाज़ में, उनके चेहरे पर जीत की मुस्कान थी) "देख रही हो बहू?"
*(मम्मी के अंदर का सारा प्रतिरोध अब पिघलकर बहने लगा था। दादाजी के हाथों का वो गर्म और सख्त दबाव अब उन्हें डरा नहीं रहा था, बल्कि उनके भीतर सोई हुई कामुकता को जगा रहा था। उन्होंने अपनी आँखें खोल दीं, जिनमें अब डर की जगह एक गहरी प्यास झलक रही थी।)*
*(मम्मी ने धीरे से अपना सिर दादाजी के कंधे पर टिका दिया और उनके सीने से चिपक गईं। उन्होंने अपने हाथ दादाजी की पीठ पर रखे और हल्के से सहलाने लगीं, जैसे वो उन्हें और करीब बुला रही हों।)*
**मम्मी:** (एक मदहोश और रेशमी आवाज़ में, जो सीधे दादाजी के कानों में उतर रही थी) "उम्मम... पापा जी... आप इतने... इतने बेरहम क्यों हैं? पर... पर आपका हाथ..."
*(दादाजी ने मम्मी की इस समर्पण वाली मुद्रा को भांप लिया था। उनके चेहरे पर एक क्रूर लेकिन संतुष्ट मुस्कान फैल गई। उन्होंने मम्मी की कमर को अपनी तरफ और भी कसकर खींच लिया ताकि उनके बीच की दूरी पूरी तरह खत्म हो जाए।)*
*(उनका दूसरा हाथ, जो अब तक मम्मी की पीठ पर था, धीरे से नीचे खिसका और फिर वापस ऊपर आकर उनके ब्लाउज के हुक्स और बटनों (buttons) पर टिक गया। दादाजी की उंगलियां बहुत सधी हुई थीं, जैसे वो इस पल का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हों।)*
**दादाजी:** (उनकी आवाज़ में भारीपन और वासना साफ झलक रही थी) "सिर्फ हाथ से क्या होगा बहू? जब तक ये रुकावट दूर नहीं होगी, तब तक तुम्हें असली मज़ा कैसे आएगा?"
*(जैसे ही दादाजी ने ब्लाउज के बटन खोलने की शुरुआत की, उनकी नज़रें मम्मी के चेहरे पर जम गईं। मम्मी की आँखों में अब कोई हिचकिचाहट नहीं थी, बस एक गहरा नशा था। दादाजी ने बिना देर किए अपना चेहरा उनके करीब लाया और उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए।)*
*(वह किस (kiss) साधारण नहीं थी; उसमें बरसों की दबी हुई इच्छा और दादाजी की मर्दानगी का पूरा जोर था। दादाजी ने मम्मी के होंठों को अपने भीतर ऐसे जकड़ा जैसे वो उन्हें निगल लेना चाहते हों। पहले तो मम्मी थोड़ा ठिठकीं, लेकिन जैसे ही दादाजी की जीभ ने उनके होंठों के किनारे को छूकर अंदर जाने की कोशिश की, मम्मी का सारा संयम टूट गया।)*
*(मम्मी ने भी अब हार मान ली थी। उन्होंने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपने दोनों हाथों से दादाजी के गले को पकड़ लिया, उन्हें और भी गहराई से चूमने के लिए अपनी ओर खींचा। उनके बीच की साँसें आपस में टकरा रही थीं और कमरे की हवा भारी होती जा रही थी।)*
*(किस करते-करते दादाजी का ध्यान अब मम्मी के खुले हुए ब्लाउज पर था। उनके हाथ बड़ी कुशलता से काम कर रहे थे। जैसे ही आखिरी बटन खुला, दादाजी ने ब्लाउज को दोनों तरफ से फैला दिया, जिससे मम्मी के उभरे हुए और भारी स्तन (chuchiyan) पूरी तरह बाहर आ गए।)*
*(कमरे की हल्की रोशनी में मम्मी के सफेद और सुडौल स्तन चमक रहे थे, जिन पर अभी भी दादाजी की उंगलियों का लाल निशान बना हुआ था। मम्मी ने शर्म से अपनी आँखें मूंद लीं, लेकिन उनका शरीर उत्तेजना से थरथरा रहा था।)*
**दादाजी:** (मम्मी के स्तनों को अपनी हथेलियों में भरते हुए, एक गहरी सांस लेते हुए) "आह..."
*(दादाजी की आँखों में अब सिर्फ भूख और वासना थी। उन्होंने बिना एक पल गंवाए अपना चेहरा नीचे झुकाया और मम्मी के एक भारी स्तन को अपने बड़े से मुँह में भर लिया। जैसे ही उनकी गर्म जीभ और होंठों ने मम्मी के संवेदनशील निप्पल को छुआ, मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई।)*
*(दादाजी ने बहुत ही बेतहाशा तरीके से उन्हें चूसना (sucking) शुरू कर दिया। वे अपनी जीभ को गोल-गोल घुमा रहे थे और साथ ही अपने दांतों से हल्का सा दबाव भी बना रहे थे, जिससे मम्मी के पूरे बदन में झुनझुनी दौड़ रही थी। मम्मी का शरीर धनुष की तरह खिंच गया और उन्होंने अनजाने में ही दादाजी के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया।)*
*(दादाजी की यह बेतहाशा हरकत मम्मी के होश उड़ा रही थी। वे एक स्तन को पूरी शिद्दत से चूस रहे थे और उसी दौरान उनका दूसरा हाथ मम्मी के दूसरे स्तन को जोर-जोर से मसल रहा था। मम्मी का शरीर अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था; वे बार-बार अपने कूल्हों को दादाजी की ओर धकेल रही थीं, मानो वे खुद उस सुख को और ज्यादा पाना चाहती हों।)*
*(मम्मी की साँसें तेज़ हो चुकी थीं और उनके मुँह से रुक-रुक कर आहें निकल रही थीं। दादाजी ने अपना मुँह हटाया और गीले, लाल पड़े हुए निप्पल को देखते हुए एक गहरी नज़र मम्मी की आँखों में डाली।)*
**मम्मी:** (हाँफते हुए और अपनी आँखें खोलते हुए) "पा... पापा जी... आह... ऐसा मत कीजिये..."
*(मम्मी की आवाज़ में मनाही कम और पुकार ज़्यादा थी। दादाजी समझ गए कि ये विरोध सिर्फ दिखावा है। उन्होंने एक शरारती मुस्कान के साथ मम्मी की आँखों में देखा और फिर अचानक से अपना सिर वापस नीचे झुका दिया। इस बार उन्होंने मम्मी के दोनों स्तनों को बारी-बारी से अपने मुँह में लेना शुरू कर दिया।)*
*(वे कभी दाहिने स्तन को ज़ोर से चूसते, तो कभी बाएं को अपनी जीभ से सहलाते। मम्मी का शरीर बेड पर बुरी तरह हिलने लगा था। उनकी कमर अब अपने आप ऊपर उठ रही थी और वे दर्द और मजे के मिले-जुले अहसास में डूबी हुई थीं।)*
**मम्मी:** (चीखते हुए) "आह्ह्ह! पापा जी... नहीं... उफ़्फ़... वहाँ नहीं!"
*(स्तनों के साथ खेलते हुए दादाजी का हाथ अब मम्मी के कमर के पास पहुँच गया था। उन्होंने महसूस किया कि मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से समर्पण कर चुका है। दादाजी ने धीरे से मम्मी के कंधे से साड़ी का पल्लू खिसकाया और फिर पूरी साड़ी को उनके शरीर से अलग करना शुरू कर दिया।)*
*(साड़ी उतरते ही मम्मी का आधा शरीर अब उनके सामने था, लेकिन दादाजी की प्यास अभी बुझी नहीं थी। उन्होंने बिना रुके मम्मी की पेटीकोट की डोरी पर हाथ रखा और उसे एक झटके में ढीला कर दिया। पेटीकोट को नीचे सरकाते हुए उन्होंने उसे भी बिस्तर पर फेंक दिया।)*
*(अब मम्मी का शरीर पूरी तरह से निर्वस्त्र (naked) होकर दादाजी के सामने था। कमरे की मंद रोशनी में उनका गोरा और सुडौल बदन किसी मूर्ति की तरह चमक रहा था। उनके उभार हुए स्तन, पतली कमर और उनके नीचे के हिस्से की सुंदरता देखकर दादाजी की आँखों में वासना की आग और बढ़ गई।)*
*(मम्मी ने शर्म के मारे अपने दोनों हाथों से अपने अंगों को ढकने की कोशिश की, लेकिन दादाजी ने उनके हाथों को पकड़कर बिस्तर पर टिका दिया। अब मम्मी का शरीर पूरी तरह से खुला हुआ था और दादाजी की नज़रें उनके जिस्म के हर हिस्से को बेरहमी से नाप रही थीं।)*
**दादाजी:** (एक भारी और गूँजती हुई आवाज़ में) "इतना सुंदर शरीर... मैंने आज तक नहीं देखा।"
*(दादाजी की नज़रों की तपिश मम्मी के पूरे बदन को जला रही थी। उन्होंने मम्मी के हाथों को पकड़कर बिस्तर के सिरहाने की तरफ दबा दिया, जिससे मम्मी का सीना और भी ज़्यादा उभर आया। दादाजी ने झुककर मम्मी के गले पर अपनी नाक रगड़ी और उनकी खुशबू को गहराई से महसूस किया।)*
*(मम्मी का पूरा शरीर थरथराने लगा। वह डर और उत्तेजना के बीच झूल रही थीं। दादाजी का एक हाथ उनके पेट से होता हुआ नीचे की ओर बढ़ा और उन्होंने मम्मी के जांघों के बीच के उस बेहद संवेदनशील हिस्से को छू लिया जो अब पूरी तरह से गीला हो चुका था।)*
**मम्मी:** (कराहते हुए और छटपटाते हुए) "आह्ह्ह! पापा जी... प्लीज़... वहां नहीं... मैं..."
*(मम्मी की अधूरी बात हवा में ही रह गई। जैसे ही दादाजी की उंगलियों ने उनके सबसे नाजुक और गीले हिस्से को छुआ, मम्मी के मुँह से एक लंबी और तीखी चीख निकली। दादाजी ने महसूस किया कि मम्मी का शरीर अंदर से कितना गर्म और गीला हो चुका है।)*
*(उन्होंने अपनी उंगलियों को धीरे से उस गीलेपन के बीच घुमाना शुरू किया, जिससे मम्मी का शरीर धनुष की तरह खिंच गया। दादाजी ने अपना चेहरा मम्मी के पेट के पास ले जाकर उनके पेट की त्वचा को चूमना शुरू कर दिया, जबकि उनका हाथ नीचे के काम में मशगूल था।)*
**मम्मी:** (बेचैनी से सिर पटकते हुए) "ओह्ह्ह! पापा जी... क्या कर रहे हैं आप... आह्ह्ह!"
*(दादाजी की उंगलियां अब मम्मी की योनि (vagina) के बिल्कुल केंद्र में थीं। उन्होंने महसूस किया कि मम्मी की योनि पूरी तरह से पानी की तरह गीली हो चुकी थी। दादाजी ने अपनी दो उंगलियों को मम्मी की योनि के उस मांसल और उभरे हुए हिस्से (clitoris) पर रखा और उसे गोल-गोल घुमाते हुए जोर से रगड़ना शुरू कर दिया।)*
*(जैसे ही उन्होंने उंगलियों से मम्मी की योनि के द्वार को थोड़ा फैलाया और अंदरूनी हिस्से को सहलाना शुरू किया, मम्मी का पूरा शरीर बिजली के झटके की तरह कांप उठा। दादाजी की उंगलियां अब मम्मी की योनि के भीतर गहराई तक जाने लगी थीं, जिससे मम्मी के शरीर से निकलने वाला रस और भी ज्यादा बहने लगा।)*


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