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Adultery SASUR AUR BAHU KE KAMUK KISSE SHORT GIF (LUND TIGHT)
#8
दोपहर का समय, घर का एक शांत कमरा। बाहर की गर्मी से बचने के लिए पर्दे गिरे हुए हैं और कमरे में हल्की सी ठंडक है। दादा जी सोफे पर बैठे हैं और मम्मी पास ही बैठी हैं।**

**दादा जी:** (मम्मी की तरफ देखते हुए, उनकी आँखों में एक गहरी चाहत है) "आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो..."
**मम्मी:** (थोड़ा शर्माते हुए और अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए) "जी? क्या हुआ? आप आज कुछ ज्यादा ही तारीफ कर रहे हैं..."

**दादा जी:** (धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर मम्मी के घुटने पर रखते हैं) "तारीफ नहीं कर रहा हूँ, सच कह रहा हूँ। इस उम्र में भी तुम्हारी ये चमक देखकर मेरा दिल धड़कने लगता है।"

*(दादा जी का हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ता है, जिससे मम्मी के शरीर में एक सिहरन दौड़ जाती है। वह अपनी नज़रें झुका लेती हैं लेकिन उनके चेहरे पर एक मुस्कान है।)*

**मम्मी:** (धीमी आवाज़ में) "आप भी न... अब तो हम दोनों बूढ़े हो गए हैं। पर आपकी बातें सुनकर मुझे फिर से वही पुरानी वाली महसूस होने लगती है।"

**दादा जी:** (उनकी आवाज़ थोड़ी भारी हो जाती है और वे मम्मी के कान के पास झुककर फुसफुसाते हैं) "बूढ़े तो सिर्फ शरीर होते हैं, जान तो अभी भी जवान है। और जब मैं तुम्हें देखता हूँ, तो मुझे लगता है कि मेरी पूरी दुनिया बस तुम ही हो।"

*(दादा जी का हाथ अब मम्मी की जांघों को छूते हुए थोड़ा और ऊपर बढ़ जाता है। मम्मी की सांसें तेज़ होने लगती हैं और वे अपनी आँखें बंद कर लेती हैं।)*

**मम्मी:** (एक लंबी आह भरते हुए) "आह... आपके हाथों का स्पर्श... कितना गर्म है। ऐसा लग रहा है जैसे बिजली दौड़ गई हो पूरे बदन में।"

**दादा जी:** (मम्मी के गले पर अपने होंठ रखते हुए) "तो फिर इस बिजली को महसूस करने दो..."
**मम्मी:** (हल्का सा पीछे हटते हुए, चेहरे पर एक बनावटी सख्ती लाते हुए) "अरे... अरे... ये क्या कर रहे हैं आप? कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा? छोड़िए मुझे..."

*(लेकिन उनके शब्दों में कोई असली गुस्सा नहीं है, बल्कि एक शरारती लहजा है जो दादा जी को और भी उत्तेजित कर देता है।)*

**दादा जी:** (मुस्कुराते हुए और उन्हें और करीब खींचते हुए) "देखने दो कौन देखता है। इस वक्त मुझे सिर्फ तुम चाहिए। और ये तुम्हारा विरोध करना... मुझे पता है ये सब नाटक है।"

**मम्मी:** (अपनी पलकें झपकाते हुए और थोड़ा सा मुंह बनाते हुए) "नाटक नहीं है! आप बिल्कुल नहीं समझते। अगर किसी ने देख लिया तो कितनी शर्म आएगी..."

**दादा जी:** (उनका हाथ अब मम्मी की कमर के नीचे से अंदर जाते हुए उनकी मुलायम त्वचा को छूता है) "शर्म कैसी? इस घर में हमारे अलावा और कौन है? और वैसे भी, तुम्हारी ये धड़कती हुई साँसें बता रही हैं कि तुम मना नहीं कर रही हो।"

*(दादा जी धीरे से मम्मी के ब्लाउज के हुक खोलने लगते हैं। मम्मी का शरीर थरथराने लगता है और वो हल्का सा विरोध करने के लिए उनका हाथ पकड़ती हैं, पर उनकी पकड़ में कोई ताकत नहीं है।)*

**मम्मी:** (हाँफते हुए और चेहरा घुमाते हुए) "नहीं... रुकिए... अभी नहीं... उफ़्फ़... आप बहुत जिद्दी हो गए हैं..."
**दादा जी:** (उनके चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आती है और वे मम्मी के कान के पास धीरे से काटते हैं) "जिद्दी तो मैं तब होता हूँ जब तुम मना करती हो, अभी तो तुम खुद चाहती हो कि मैं तुम्हें प्यार करूँ।"

*(जैसे ही ब्लाउज के आखिरी हुक खुलते हैं, मम्मी के उभरे हुए सफेद चूचियां (breasts) हवा के संपर्क में आते ही ठंडी हवा से सिहर उठती हैं। दादा जी की नज़रें उन पर टिक जाती हैं।)*

**मम्मी:** (अपना हाथ छाती पर रखकर ढंकने की कोशिश करते हुए, लेकिन उनकी आवाज़ में अब समर्पण है) "ओह... दादा जी... ये क्या कर रहे हैं आप...... कोई देख लेगा तो..."



**दादा जी:** (मम्मी के खुले हुए ब्लाउज के अंदर हाथ डालते हुए, उनकी मखमली और भारी चूचियों को अपनी हथेलियों में भर लेते हैं) "अब देखो... कोई नहीं देख रहा। ये चूचियाँ कितनी नरम और गरम हैं... इन्हें सहलाने का मन कर रहा है।"

*(दादा जी की उंगलियां मम्मी की गुलाबी निप्पल्स को हल्के से दबाती हैं, जिससे मम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकलती है।)*

**मम्मी:** (अपने चेहरे को हाथों से छुपाते हुए और जोर-जोर से हाँफते हुए) "आह्ह... उफ़्फ़..."
**मम्मी:** (हाथों से अपना चेहरा छुपाए हुए, लेकिन उनके शरीर की हरकतें कुछ और ही कह रही हैं) "उफ़्फ़... दादा जी... आप कितने गंदे हो गए हैं... इतनी हिम्मत कैसे हुई आपकी..."

*(मम्मी के शब्द भले ही शिकायत कर रहे हों, लेकिन उनकी आँखों में शर्म और खुशी का मिला-जुला भाव है। वे अपनी आँखें सिकोड़ लेती हैं जब दादा जी की उंगलियाँ उनकी निप्पल्स को ज़ोर से दबाती हैं।)*

**दादा जी:** (मम्मी के कान के पास फुसफुसाते हुए, उनकी चूचियों को अपनी उंगलियों से गोल-गोल घुमाते हुए) "गंदा? मैं तो बस वही कर रहा हूँ जो तुम्हारी ये चूचियाँ मुझसे करवाना चाहती हैं। देखो, कितनी सख्त हो गई हैं ये..."
**मम्मी:** (अपनी गर्दन पीछे की ओर झुकाते हुए और गहरी साँस लेते हुए) "आह्ह... नहीं... मत कीजिए... इतना ज़ोर से मत दबाइए... उफ़्फ़!"

*(मम्मी का पूरा शरीर अब कांप रहा है। वे अपने हाथ दादा जी के कंधों पर टिका देती हैं, मानो खुद को गिरने से बचा रही हों। उनकी शर्म अब धीरे-धीरे कामुकता में बदल रही है।)*

**दादा जी:** (मम्मी की चूचियों को अपनी हथेलियों के बीच रगड़ते हुए और उनके निप्पल्स को अपने अंगूठे से मसलते हुए) "ये देखो... तुम्हारे निप्पल्स कितने कड़े हो गए हैं। ये चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि तुम्हें और ज़्यादा चाहिए।"
**मम्मी:** (अपनी आँखें कसकर बंद कर लेती हैं और उनके मुँह से एक धीमी सी कराह निकलती है) "आह्ह... दादा जी... आप... आप बहुत बेकाबू हो रहे हैं... उफ़्फ़!"

*(मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से दादा जी के नियंत्रण में है। उनकी चूचियाँ दादा जी की हथेलियों के बीच पिचक रही हैं और हर दबाव के साथ मम्मी के शरीर में एक लहर सी दौड़ जाती है।)*

**दादा जी:** (मम्मी के गले के नीचे उतरते हुए और उनकी कॉलर बोन को चूमते हुए) "बेकाबू तो होना ही पड़ेगा... जब सामने इतनी खूबसूरत औरत खड़ी हो। तुम्हारी ये चूचियाँ... इनका स्वाद लेने के लिए मैं पागल हो रहा हूँ।"
**मम्मी:** (अपनी कमर को थोड़ा ऊपर की ओर मोड़ते हुए, जैसे दादा जी के स्पर्श को और करीब खींचना चाह रही हों) "आह्ह... दादा जी... वहाँ नहीं... उफ़्फ़, आपकी जुबान... बहुत गर्म है..."

*(दादा जी अब सीधे मम्मी की एक भारी और लटकती हुई चूची के पास पहुँच जाते हैं। वे उसे अपनी हथेलियों में पकड़कर उठाते हैं और उसके गुलाबी निप्पल को अपनी जीभ से हल्का सा चाटते हैं।)*

**मम्मी:** (एक तेज़ चीख मारते हुए और अपने नाखून दादा जी की पीठ में चुभाते हुए) "आह्ह्ह! नहीं... दादा जी... ऐसा मत कीजिए... उफ़्फ़, मेरे पेट में गुदगुदी हो रही है... आह्ह!"
**दादा जी:** (मम्मी की चीख सुनकर और भी उत्तेजित हो जाते हैं। वे उनकी चूची को अपने मुँह में भर लेते हैं और पूरे जोश के साथ उसके निप्पल को अपने दाँतों से हल्का सा चबाते हैं) "तुम्हारे पेट में गुदगुदी हो रही है? ये तो बस शुरुआत है... अभी तो मैंने तुम्हारी इन चूचियों का असली मजा लेना शुरू भी नहीं किया।"

*(वे दूसरी चूची को भी अपने मुँह में ले लेते हैं, दोनों भारी चूचियाँ उनके मुँह के बीच में दबी हुई हैं। मम्मी का पूरा शरीर थरथराने लगता है और वे बेड की चादर को मजबूती से पकड़ लेती हैं।)*

**मम्मी:** (अपनी आँखें ऊपर की ओर चढ़ाते हुए और पूरी तरह से बेकाबू होते हुए) "आह्ह्ह... पापा जी! रुकिए... उफ़्फ़! आप... आप तो बिल्कुल पागल हो गए हैं... आह्ह!"

*(मम्मी का शरीर अब पूरी तरह से समर्पण कर चुका है। वे 'पापा जी' पुकारते हुए उनके सिर को अपनी चूचियों के और करीब धकेल देती हैं, जैसे वे खुद उन्हें और गहराई से महसूस कराना चाहती हों।)*

**दादा जी:** (मम्मी की चूचियों को अपने मुँह में दबाए हुए, थोड़े भारी स्वर में) "पागल तो मैं हूँ ही, बहू... जब से तुम्हें इस घर में आया है, मेरा चैन छीन लिया है तुमने। तुम्हारी ये चूचियाँ... ये मुझे दीवाना बना देती हैं।"
**मम्मी:** (साँस फूलते हुए और अपना चेहरा दर्द और सुख के मिले-जुले अहसास से सिकोड़ते हुए) "आह्ह... पापा जी... आप क्या बोल रहे हैं... उफ़्फ़! मेरी... मेरी हालत खराब कर दी आपने... आह्ह!"

*(मम्मी का शरीर अब पसीने से तर-बतर होने लगा है। दादा जी की जीभ और उनके दाँतों का खेल मम्मी के दिमाग को सुन्न कर रहा है। वे बार-बार अपनी कमर को झटका दे रही हैं, जिससे उनकी भारी चूचियाँ दादा जी के चेहरे पर और जोर से टकरा रही हैं।)*

**दादा जी:** (मम्मी की एक चूची को अपने मुँह से बाहर निकालते हुए, जो अब पूरी तरह गीली और सूजी हुई लग रही है) "हालत खराब क्यों नहीं होगी बहू?"
**दादा जी:** (मम्मी की उस सूजी हुई और गीली चूची को अपनी आँखों के सामने देखते हुए, जिनकी लालिमा अब साफ दिख रही है) "जब तुम्हारी ये रसीली चूचियाँ इस तरह तड़प रही हों, तो किसी का भी खून खौल जाए। तुम जानती हो न कि तुम कितनी हसीन लग रही हो इस हालत में?"

*(दादा जी अपनी एक हाथ से मम्मी की कमर को कसकर पकड़ लेते हैं और दूसरे हाथ से उनकी दूसरी चूची को जोर से मरोड़ने लगते हैं।)*

**मम्मी:** (दर्द और चरम सुख के मिश्रण से कराहते हुए) "आह्ह्ह! पापा जी... नहीं... उफ़्फ़! इतना जोर से मत मरोड़िए... आह्ह! मेरी... मेरी छाती फट जाएगी..."
**दादा जी:** (मम्मी की कराह सुन कर और भी ज्यादा उग्र हो जाते हैं। वे उनकी कमर को अपनी तरफ खींचते हैं ताकि उनका शरीर उनसे एकदम सट जाए) "फटने दो बहू... फटने दो! अगर आज ये छाती फट गई, तो समझूँगा कि मेरा मकसद पूरा हुआ। तुम्हारी ये तड़प ही तो मुझे और प्यासा बना रही है।"

*(दादा जी अचानक मम्मी की साड़ी के पल्लू को झटके से नीचे खींच देते हैं, जिससे उनका पूरा ऊपरी शरीर और भारी वक्ष पूरी तरह से उजागर हो जाता है। कमरे की हल्की रोशनी में उनकी सफेद और भरी हुई चूचियाँ चमक रही हैं।)*

**मम्मी:** (शर्म से अपनी आँखें मूंद लेती हैं लेकिन उनके शरीर की हरकतें कुछ और ही कह रही हैं) "आह्ह... पापा जी..."
**मम्मी:** (अपने हाथों से दादा जी के कंधों को धीरे से धक्का देने की कोशिश करते हुए, उनकी आवाज़ में शर्म और घबराहट साफ झलक रही है) "नहीं... पापा जी... नहीं... ऐसा मत कीजिए... कोई देख लेगा... उफ़्फ़! प्लीज... रुक जाइए..."

*(लेकिन उनके ये छोटे-छोटे प्रतिरोध सिर्फ एक दिखावा मात्र रह गए हैं। जैसे ही दादा जी उनके शरीर को छूते हैं, मम्मी का शरीर खुद-ब-खुद उनकी ओर झुकने लगता है। वे उन्हें रोकने की कोशिश तो कर रही हैं, लेकिन उनके हाथ दादा जी को दूर करने के बजाय अनजाने में उनके कपड़ों को और कसकर पकड़ रहे हैं।)*

**दादा जी:** (एक शरारती मुस्कान के साथ, उनकी नाकाम कोशिशों को भांपते हुए) "कोई नहीं देख रहा बहू..."
**दादा जी:** (मम्मी के उन कमजोर प्रतिरोधों को देखकर मुस्कुराते हैं और उनके कान के पास जाकर फुसफुसाते हैं) "झूठ मत बोलो बहू... तुम्हारा शरीर तो कुछ और ही कह रहा है। तुम्हारे ये हाथ मुझे दूर करने के लिए नहीं, बल्कि मुझे और करीब बुलाने के लिए कांप रहे हैं।"

*(दादा जी अचानक अपना हाथ मम्मी की कमर से हटाकर उनकी जांघों की ओर ले जाते हैं और बहुत ही अधिकार के साथ उन्हें सहलाने लगते हैं।)*

**मम्मी:** (एक लंबी और गहरी साँस छोड़ते हुए, उनके गले से एक धीमी सी आह निकलती है) "आह्ह... पापा जी... आप... आप बहुत बदतमीज हो गए हैं... उफ़्फ़! मेरे पैर... मेरे पैर कांप रहे हैं..."
**दादा जी:** (उनकी कांपती हुई टांगों को महसूस करते हुए, उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती है) "कांप रहे हैं? इसका मतलब है कि तुम्हें भी वही महसूस हो रहा है जो मैं कर रहा हूँ। तुम्हारी ये बेबसी... ये कमजोरी... यही तो मुझे पागल बना रही है।"

*(दादा जी बिना वक्त गंवाए, मम्मी के चेहरे को अपने हाथों में भर लेते हैं और बहुत ही गहराई से उनके होंठों को चूमना शुरू कर देते हैं। यह चुंबन धीमा नहीं, बल्कि बहुत ही भूखा और आक्रामक है।)*

**मम्मी:** (शुरुआत में चौंककर उनकी आँखों में देखती हैं, लेकिन दादा जी के आक्रामक चुंबन के आगे उनका सारा विरोध पिघलने लगता है। वे अपनी आँखें बंद कर लेती हैं और अनजाने में ही दादा जी के गले में अपनी बाहें लपेट लेती हैं, मानो उन्हें और करीब खींच रही हों) "म्म्मम... उँह्ह... पापा जी..."

*(उनके मुँह से निकलने वाली दबी हुई आवाज़ें अब केवल समर्पण का संकेत दे रही हैं। दादा जी का हाथ अब उनकी पीठ के निचले हिस्से पर फिसलते हुए उनकी साड़ी के अंदर चला जाता है, जहाँ उनकी त्वचा गर्म और पसीने से तर है।)*

**दादा जी:** (चुंबन तोड़ते हुए, उनकी गर्दन पर अपनी नाक रगड़ते हुए) "अब देखो..."
**दादा जी:** (मम्मी की गर्दन पर अपनी नाक रगड़ते हुए और उनकी खुशबू को गहराई से महसूस करते हुए) "तुम्हारी ये महक... ये मदहोश कर देने वाली खुशबू... इसने तो मुझे दीवाना बना दिया है। अब और इंतज़ार नहीं होता!"

*(दादा जी अचानक अपने हाथ को उनकी साड़ी के अंदर से और गहराई तक ले जाते हैं और सीधे उनकी गीली और गर्म जांघों के बीच पहुँच जाते हैं। वे अपनी उंगलियों से वहां की नमी को महसूस करते हैं और एक गहरी, भारी सांस लेते हैं।)*

**मम्मी:** (अचानक उनके स्पर्श से उनके पूरे शरीर में बिजली जैसी लहर दौड़ जाती है। वे झटके से पीछे की ओर झुक जाती हैं और उनकी आवाज़ चीख जैसी निकलती है) "आह्ह्ह! पापा जी... वहाँ... नहीं... उफ़्फ़!"
**दादा जी:** (उनकी इस चीख और उत्तेजना को देखकर उनकी आँखों में वासना और बढ़ जाती है। वे उनकी गीली जगह पर अपनी उंगलियों से दबाव बनाना शुरू कर देते हैं, जिससे मम्मी का पूरा शरीर थरथराने लगता है) "क्यों नहीं? यहाँ तो तुम सबसे ज्यादा गीली हो... और ये गर्मी... ये बता रही है कि तुम कब से मेरा इंतज़ार कर रही थी।"

*(दादा जी की उंगलियां अब और भी तेज़ी और लय के साथ काम करने लगती हैं, जिससे मम्मी के शरीर से एक अजीब सी छटपटाहट निकलने लगती है।)*

**मम्मी:** (अपनी आँखें पूरी तरह बंद कर लेती हैं, उनका सिर पीछे की ओर झुक जाता है और वे कमरे की दीवार को मजबूती से पकड़ लेती हैं ताकि गिर न जाएं) "उँह्ह... आह्ह... पापा जी... बस..."


**दादा जी:** (उनकी बेबसी और उस गीलेपन को महसूस करते हुए, उनकी उंगलियों की गति और बढ़ा देते हैं) "बस क्या? अभी तो शुरुआत है... तुम्हारी ये तड़प मुझे और भी पागल बना रही है।"

*(वे अपनी उंगलियों को थोड़ा और अंदर ले जाते हैं, जिससे मम्मी के मुंह से एक लंबी और गहरी सिसकी निकलती है।)*


**दादा जी:** (उनकी बेबसी और उस गीलेपन को महसूस करते हुए, अपनी उंगलियों को उनकी चूत के अंदर और गहराई तक उतार देते हैं) "क्यों नहीं? तुम्हारी ये चूत तो पानी की तरह बह रही है... इतनी गीली हो चुकी है कि मेरी उंगलियाँ फिसल रही हैं। सच बताओ, कब से इस प्यास में जल रही थी?"

*(दादा जी की उंगलियां अब उनकी चूत के अंदर बहुत तेज़ी और बेरहमी से हरकत करने लगती हैं, जिससे मम्मी का पूरा निचला हिस्सा थरथराने लगता है।)*
**मम्मी:** (उनकी चूत के अंदर उंगलियों की तेज़ हलचल से उनका दिमाग सुन्न होने लगता है। वे अपनी कमर को बार-बार दादा जी के हाथों की तरफ धकेल रही हैं, जैसे और ज़्यादा चाहती हों) "आह्ह्ह... उूँह्ह... पापा जी... आपकी उंगलियाँ... बहुत अच्छी लग रही हैं... आह्ह! मेरी चूत... मज़ा आ रहा है... उफ़्फ़!"

*(मम्मी की सिसकियां अब और भी ऊंची और बेकाबू होती जा रही हैं। उनकी साड़ी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुकी है और उनकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही है।)*

**दादा जी:** (उनकी आवाज़ में भारीपन और हवस साफ झलक रही है। वे उनकी चूत के भीतर अपनी उंगलियों को और भी जोर से रगड़ते हैं, जिससे गीलापन और भी बढ़ने लगता है) "तो फिर और क्यों मांग रही हो? देखो कैसे अपनी चूत को मेरे हाथों पर मल रही हो... कितनी बेताब हो तुम!"

*(वे अचानक अपनी उंगली बाहर निकालते हैं और फिर झटके से उसे वापस उनकी चूत के छेद में घुसा देते हैं।)*

**मम्मी:** (झटके से उनका शरीर धनुष की तरह तन जाता है और वे ज़ोर से चिल्ला उठती हैं) "आह्ह्ह्ह! पापा जी... उफ़्फ़! ऐसा मत कीजिये... आह्ह! मेरी चूत... बहुत ज़्यादा हो रहा है... उँह्ह!"
**दादा जी:** (उनके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान आती है। वे देखते हैं कि कैसे उनकी उंगलियों के जाने से मम्मी की चूत का द्वार फैल रहा है और वहां से सफेद गाढ़ा तरल रिसकर बाहर आ रहा है) "ये देख... तेरी चूत का रस मेरी उंगलियों पर चढ़ रहा है। तू कितनी गंदी और कामुक हो गई है... बोल, क्या तुझे और चाहिए?"

*(वे अपनी उंगलियों को अब चूत के अंदर घुमाते हुए उसके संवेदनशील हिस्से यानी क्लिटोरिस को जोर-जोर से रगड़ने लगते हैं।)*

**मम्मी:** (उनका पूरा शरीर नियंत्रण खोने लगता है। वे अपने हाथ से दीवार को इतना कसकर पकड़ लेती हैं कि उनके नाखून दीवार में धंसने लगते हैं) "आह्ह्ह! नहीं... पापा जी... वहाँ... उूँह्ह!"
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RE: SASUR AUR BAHU KE KAMUK KISSE SHORT GIF (LUND TIGHT) - by rajusethzee - 28-09-2026, 07:26 PM



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