44 minutes ago
करीम ने यह काली मोटरसाइकिल कोई इत्तेफाक से नहीं, बल्कि पूरी प्लानिंग के साथ चुनी थी। शंकर की यह मोटरसाइकिल करीम का पुराना और परखा हुआ हथियार थी।
इस मोटरसाइकिल की पीछे वाली सीट काफी ऊंची और आगे की तरफ ढलान वाली थी। इस बनावट की वजह से पीछे बैठने वाले इंसान का पूरा वजन अपने आप आगे की तरफ सरक आता था, जिससे वह चाहकर भी ड्राइवर की पीठ से चिपककर बैठने पर मजबूर हो जाता था।
करीम को जब भी किसी औरत को अपने साथ घुमाने ले जाना होता या अपनी नजदीकी बढ़ानी होती, तो वह हमेशा बहाना बनाकर शंकर से यही मोटरसाइकिल मांग कर लाता था।
इतना ही नहीं, इस मोटरसाइकिल के पिछले हिस्से पर पकड़ बनाने के लिए कोई हैंडल या सपोर्ट बार भी नहीं था। पीछे बैठने वाली सवारी के पास संतुलन बनाए रखने के लिए सिर्फ दो ही रास्ते बचते थे—या तो वह अपनी दोनों बाहें ड्राइवर की कमर में डालकर उसे कसकर जकड़ ले, या फिर अपने दोनों हाथ उसकी छाती या कंधों पर टिकाकर बिल्कुल उससे सटकर बैठी रहे।
करीम मन ही मन मुस्कुराया, यह सोचकर कि जब अनीता इस ऊंची सीट पर अपनी नंगी जांघों और छोटी स्कर्ट के साथ उसके पीछे बैठेगी, तो रफ्तार के हर झटके के साथ उसका पूरा नाजुक बदन उसकी पीठ पर किस कदर पिघलेगा।
शंकर से चाबी लेने के बाद करीम सीधे अपने नौकर वाले क्वार्टर में पहुंचा। उसके सिर पर आज एक अलग ही नशा सवार था। उसने जल्दी-जल्दी एक बढ़िया फव्वारे से स्नान किया और अपने दांतों को अच्छी तरह ब्रश किया ताकि मुँह से जरा सी भी बदबू न आए।
नहाने के बाद, करीम ने अपनी अलमारी के एक कोने से इत्र की एक महंगी शीशी निकाली—यह वही परफ्यूम था जो उसने कुछ दिन पहले राज साहब की वार्डरोब से चुपचाप चुराया था। करीम ने उस महंगे परफ्यूम को अपनी गर्दन, चौड़े सीने और बगलों पर दिल खोलकर छिड़का। परफ्यूम की तेज, मर्दाना और रईसाना खुशबू से उसका पूरा क्वार्टर महक उठा।
अपनी नंगी छाती पर हाथ फेरते हुए और परफ्यूम की शीशी को देखते हुए करीम के होंठों पर एक बहुत ही वहशी और अय्याश मुस्कान तैर गई।
करीम (मन ही मन हंसते हुए, बुदबुदाया): "वाह करीम भाई... क्या किस्मत पाई है! परफ्यूम भी राज सर का, बीवी भी राज साहब की... और ऐश इस काले करीम की!"
इसके बाद उसने अपनी अलमारी से अपनी सबसे बढ़िया वाली नीली जींस निकाली और उसे कसकर पहन लिया। लेकिन ऊपर पहनने के लिए उसने बहुत ही चालाकी से अपनी सबसे पतली टी-शर्ट चुनी। वह टी-शर्ट इतनी महीन थी कि शरीर से पूरी तरह चिपकी रहती थी।
करीम ने यह जान-बूझकर किया था; वह अच्छी तरह जानता था कि जब ऊंची सीट वाली मोटरसाइकिल पर रास्ते के झटकों के साथ अनीता उसके पीछे चिपकेगी, तो उस पतली टी-शर्ट के पार से उसकी पीठ पर अनीता के सुलगते और कसे हुए मम्मों का एक-एक उभार साफ महसूस होगा।
पूरी तरह तैयार होकर, अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, करीम बेहद ऐंठ और आत्मविश्वास के साथ बंगले की ओर बढ़ गया।
उधर कमरे में अनीता शीशे के सामने खड़ी होकर अपने इस रूप को देख-देखकर बेहद परेशान और शर्मिंदा हो रही थी। सफेद पतली शर्ट, जिसकी नाभि के ऊपर बंधी गाँठ से उसका पूरा गोरा पेट बेपर्दा था, और नीचे वह लाल रंग की बेहद छोटी मिनी स्कर्ट—इन कपड़ों में खुद को देखना भी उसके लिए दूभर हो रहा था। लेकिन अब उसके पास इस चक्रव्यूह से निकलने का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था।
तभी उसे ख्याल आया कि अगर राज ने अचानक घर पर फोन कर दिया और वह गायब मिली, तो बहुत बड़ा बवंडर खड़ा हो जाएगा। कांपते हाथों से उसने अपना मोबाइल उठाया और राज का नंबर मिलाया।
दूसरी तरफ से फोन उठते ही राज की प्यार भरी आवाज सुनाई दी, "हेलो अनीता! कैसी हो डार्लिंग? सब ठीक है न?"
अनीता ने अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू में करने की कोशिश की और भारी आवाज में बोली, "हाँ राज... सब ठीक है। मैं... मैं सोच रही थी कि जरा शहर जाकर कुछ शॉपिंग कर आऊं। घर में बैठे-बैठे बहुत बोरियत हो रही थी।"
"अच्छा? यह तो बहुत अच्छी बात है अनीता। तुम्हें थोड़ा बाहर घूम भी आना चाहिए," राज ने बहुत ही सहज और बेफिक्र अंदाज में कहा। "लेकिन तुम जाओगी कैसे? "
अनीता का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। झूठ बोलते वक्त उसकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगी, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, "मैं... मैं करीम को साथ ले जा रही हूँ। हम बाहर से ऑटो कर लेंगे। वो साथ रहेगा तो सामान उठाने में भी मदद हो जाएगी।"
"हाहा, बिल्कुल ठीक सोचा तुमने डार्लिंग!" राज हंसते हुए बोला। "करीम साथ तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। आराम से शॉपिंग करो और हां... अपने लिए कुछ बढ़िया सा ड्रेस जरूर ले लेना। और कोई चिंता मत करना, ठीक है?"
"थैंक यू राज... अपना ध्यान रखना," अनीता ने बेहद धीमी आवाज में कहा।
"तुम भी डार्लिंग, बाय!" कहकर राज ने फोन काट दिया।
फोन डिस्कनेक्ट होते ही अनीता ने अपनी छाती पर हाथ रख लिया। उसका दिल अपराधबोध से बुरी तरह बैठा जा रहा था।
राज उस पर कितना अंधा भरोसा करता था, उसे करीम जैसे नौकर के साथ बेफिक्र होकर भेजने को तैयार हो गया था... और यहाँ वह उसी राज से इतना बड़ा झूठ बोल रही थी।
अपनी नग्नता और इस धोखे के अहसास से अनीता की आँखों में ग्लानि के आँसू छलक आए, लेकिन वक्त की टिक-टिक उसे याद दिला रही थी कि अब करीम किसी भी पल आने ही वाला है।
उधर अपने क्वार्टर में बैठा शंकर लगातार बीड़ी के कस खींचते हुए गहराई से कुछ सोच रहा था। उसके दिमाग में करीम के चेहरे का वो जोश और बेताबी बार-बार घूम रही थी।
यह पहली बार था जब करीम ने उससे कोई बात छुपाने की नाकाम कोशिश की थी। वरना दोनों के बीच कभी कोई पर्दा नहीं रहा। शहर की तंग गलियों से लेकर गांव की पगडंडियों तक, दोनों ने न जाने कितनी रसीली औरतों का एक साथ शिकार किया था। कई बार करीम की फंसाई हुई गरम औरतों को शंकर ने चखा था, तो कभी शंकर की पटाई हुई जिस्मों पर करीम ने अपना पानी बहाया था। दोनों का यह घिनौना और नंगा हिसाब-किताब बरसों पुराना था।
शंकर ने अंगूठे से बीड़ी की राख झाड़ी और मन ही मन बुदबुदाया, "साले करीम की चाल ही बदल गई है आज... ज़रूर किसी बहुत बड़े और भारी माल पर हाथ मारा है इसने! वरना इतनी ऐंठ में चाबी झपटकर नहीं भागता। मामला बहुत गरम है।"
सोचते-सोचते शंकर के पेट में चुल मचने लगी। उसके भीतर का हरामीपन और हवस उफान मारने लगी। उसने अपनी पुरानी ऑटो-रिक्शा निकाली, उसमें किक मारी और धीरे-धीरे उस बड़े बंगले की तरफ बढ़ा जहाँ करीम केयरटेकर का काम करता था।
बंगले से थोड़ी दूर पहले ही, एक घने पेड़ की छांव में उसने ऑटो इस तरह खड़ा किया कि सड़क से कोई उसे पहचान न पाए।
ड्राइविंग सीट पर बैठकर, बीड़ी का बचा हुआ गुट्ठा होंठों में दबाए, शंकर पुरानी बातें टटोलने लगा। अभी हफ़्ते-दस दिन पहले की तो बात है, जब करीम दारू के पैग खींचते हुए बता रहा था कि बंगले के गेस्ट हाउस में कोई बहुत ही कयामत चीज़ रहने आई है—एकदम गोरी-चिट्टी, कसी हुई और रईस मैडम, जो अपने साहब के साथ वहाँ ठहरी हुई थी।
शंकर के दिमाग में अचानक एक बिजली सी कौंधी, "अबे कहीं साले करीम ने उस रईस मैडम को तो नहीं पटा लिया?? नहीं-नहीं... ! यह कैसे हो सकता है? कहाँ हम जैसे फटेहाल, नंगे-भूखे गरीब और कहाँ वो साहब की खूबसूरत मालकिन!"
लेकिन फिर शंकर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई, "पर करीम साला चीज़ बहुत चालू है... अगर उसने सच में मैडम पर हाथ साफ़ कर दिया होगा, तो आज मुझे भी उस गरम माल का जलवा देखना ही पड़ेगा।"
शंकर ऑटो की सीट पर थोड़ा आगे होकर, अपनी नज़रों को सीधे बंगले के मुख्य गेट पर टिकाकर करीम के बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगा।
इस मोटरसाइकिल की पीछे वाली सीट काफी ऊंची और आगे की तरफ ढलान वाली थी। इस बनावट की वजह से पीछे बैठने वाले इंसान का पूरा वजन अपने आप आगे की तरफ सरक आता था, जिससे वह चाहकर भी ड्राइवर की पीठ से चिपककर बैठने पर मजबूर हो जाता था।
करीम को जब भी किसी औरत को अपने साथ घुमाने ले जाना होता या अपनी नजदीकी बढ़ानी होती, तो वह हमेशा बहाना बनाकर शंकर से यही मोटरसाइकिल मांग कर लाता था।
इतना ही नहीं, इस मोटरसाइकिल के पिछले हिस्से पर पकड़ बनाने के लिए कोई हैंडल या सपोर्ट बार भी नहीं था। पीछे बैठने वाली सवारी के पास संतुलन बनाए रखने के लिए सिर्फ दो ही रास्ते बचते थे—या तो वह अपनी दोनों बाहें ड्राइवर की कमर में डालकर उसे कसकर जकड़ ले, या फिर अपने दोनों हाथ उसकी छाती या कंधों पर टिकाकर बिल्कुल उससे सटकर बैठी रहे।
करीम मन ही मन मुस्कुराया, यह सोचकर कि जब अनीता इस ऊंची सीट पर अपनी नंगी जांघों और छोटी स्कर्ट के साथ उसके पीछे बैठेगी, तो रफ्तार के हर झटके के साथ उसका पूरा नाजुक बदन उसकी पीठ पर किस कदर पिघलेगा।
शंकर से चाबी लेने के बाद करीम सीधे अपने नौकर वाले क्वार्टर में पहुंचा। उसके सिर पर आज एक अलग ही नशा सवार था। उसने जल्दी-जल्दी एक बढ़िया फव्वारे से स्नान किया और अपने दांतों को अच्छी तरह ब्रश किया ताकि मुँह से जरा सी भी बदबू न आए।
नहाने के बाद, करीम ने अपनी अलमारी के एक कोने से इत्र की एक महंगी शीशी निकाली—यह वही परफ्यूम था जो उसने कुछ दिन पहले राज साहब की वार्डरोब से चुपचाप चुराया था। करीम ने उस महंगे परफ्यूम को अपनी गर्दन, चौड़े सीने और बगलों पर दिल खोलकर छिड़का। परफ्यूम की तेज, मर्दाना और रईसाना खुशबू से उसका पूरा क्वार्टर महक उठा।
अपनी नंगी छाती पर हाथ फेरते हुए और परफ्यूम की शीशी को देखते हुए करीम के होंठों पर एक बहुत ही वहशी और अय्याश मुस्कान तैर गई।
करीम (मन ही मन हंसते हुए, बुदबुदाया): "वाह करीम भाई... क्या किस्मत पाई है! परफ्यूम भी राज सर का, बीवी भी राज साहब की... और ऐश इस काले करीम की!"
इसके बाद उसने अपनी अलमारी से अपनी सबसे बढ़िया वाली नीली जींस निकाली और उसे कसकर पहन लिया। लेकिन ऊपर पहनने के लिए उसने बहुत ही चालाकी से अपनी सबसे पतली टी-शर्ट चुनी। वह टी-शर्ट इतनी महीन थी कि शरीर से पूरी तरह चिपकी रहती थी।
करीम ने यह जान-बूझकर किया था; वह अच्छी तरह जानता था कि जब ऊंची सीट वाली मोटरसाइकिल पर रास्ते के झटकों के साथ अनीता उसके पीछे चिपकेगी, तो उस पतली टी-शर्ट के पार से उसकी पीठ पर अनीता के सुलगते और कसे हुए मम्मों का एक-एक उभार साफ महसूस होगा।
पूरी तरह तैयार होकर, अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, करीम बेहद ऐंठ और आत्मविश्वास के साथ बंगले की ओर बढ़ गया।
उधर कमरे में अनीता शीशे के सामने खड़ी होकर अपने इस रूप को देख-देखकर बेहद परेशान और शर्मिंदा हो रही थी। सफेद पतली शर्ट, जिसकी नाभि के ऊपर बंधी गाँठ से उसका पूरा गोरा पेट बेपर्दा था, और नीचे वह लाल रंग की बेहद छोटी मिनी स्कर्ट—इन कपड़ों में खुद को देखना भी उसके लिए दूभर हो रहा था। लेकिन अब उसके पास इस चक्रव्यूह से निकलने का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं था।
तभी उसे ख्याल आया कि अगर राज ने अचानक घर पर फोन कर दिया और वह गायब मिली, तो बहुत बड़ा बवंडर खड़ा हो जाएगा। कांपते हाथों से उसने अपना मोबाइल उठाया और राज का नंबर मिलाया।
दूसरी तरफ से फोन उठते ही राज की प्यार भरी आवाज सुनाई दी, "हेलो अनीता! कैसी हो डार्लिंग? सब ठीक है न?"
अनीता ने अपनी उखड़ी हुई सांसों को काबू में करने की कोशिश की और भारी आवाज में बोली, "हाँ राज... सब ठीक है। मैं... मैं सोच रही थी कि जरा शहर जाकर कुछ शॉपिंग कर आऊं। घर में बैठे-बैठे बहुत बोरियत हो रही थी।"
"अच्छा? यह तो बहुत अच्छी बात है अनीता। तुम्हें थोड़ा बाहर घूम भी आना चाहिए," राज ने बहुत ही सहज और बेफिक्र अंदाज में कहा। "लेकिन तुम जाओगी कैसे? "
अनीता का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। झूठ बोलते वक्त उसकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगी, लेकिन उसने खुद को संभालते हुए कहा, "मैं... मैं करीम को साथ ले जा रही हूँ। हम बाहर से ऑटो कर लेंगे। वो साथ रहेगा तो सामान उठाने में भी मदद हो जाएगी।"
"हाहा, बिल्कुल ठीक सोचा तुमने डार्लिंग!" राज हंसते हुए बोला। "करीम साथ तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। आराम से शॉपिंग करो और हां... अपने लिए कुछ बढ़िया सा ड्रेस जरूर ले लेना। और कोई चिंता मत करना, ठीक है?"
"थैंक यू राज... अपना ध्यान रखना," अनीता ने बेहद धीमी आवाज में कहा।
"तुम भी डार्लिंग, बाय!" कहकर राज ने फोन काट दिया।
फोन डिस्कनेक्ट होते ही अनीता ने अपनी छाती पर हाथ रख लिया। उसका दिल अपराधबोध से बुरी तरह बैठा जा रहा था।
राज उस पर कितना अंधा भरोसा करता था, उसे करीम जैसे नौकर के साथ बेफिक्र होकर भेजने को तैयार हो गया था... और यहाँ वह उसी राज से इतना बड़ा झूठ बोल रही थी।
अपनी नग्नता और इस धोखे के अहसास से अनीता की आँखों में ग्लानि के आँसू छलक आए, लेकिन वक्त की टिक-टिक उसे याद दिला रही थी कि अब करीम किसी भी पल आने ही वाला है।
उधर अपने क्वार्टर में बैठा शंकर लगातार बीड़ी के कस खींचते हुए गहराई से कुछ सोच रहा था। उसके दिमाग में करीम के चेहरे का वो जोश और बेताबी बार-बार घूम रही थी।
यह पहली बार था जब करीम ने उससे कोई बात छुपाने की नाकाम कोशिश की थी। वरना दोनों के बीच कभी कोई पर्दा नहीं रहा। शहर की तंग गलियों से लेकर गांव की पगडंडियों तक, दोनों ने न जाने कितनी रसीली औरतों का एक साथ शिकार किया था। कई बार करीम की फंसाई हुई गरम औरतों को शंकर ने चखा था, तो कभी शंकर की पटाई हुई जिस्मों पर करीम ने अपना पानी बहाया था। दोनों का यह घिनौना और नंगा हिसाब-किताब बरसों पुराना था।
शंकर ने अंगूठे से बीड़ी की राख झाड़ी और मन ही मन बुदबुदाया, "साले करीम की चाल ही बदल गई है आज... ज़रूर किसी बहुत बड़े और भारी माल पर हाथ मारा है इसने! वरना इतनी ऐंठ में चाबी झपटकर नहीं भागता। मामला बहुत गरम है।"
सोचते-सोचते शंकर के पेट में चुल मचने लगी। उसके भीतर का हरामीपन और हवस उफान मारने लगी। उसने अपनी पुरानी ऑटो-रिक्शा निकाली, उसमें किक मारी और धीरे-धीरे उस बड़े बंगले की तरफ बढ़ा जहाँ करीम केयरटेकर का काम करता था।
बंगले से थोड़ी दूर पहले ही, एक घने पेड़ की छांव में उसने ऑटो इस तरह खड़ा किया कि सड़क से कोई उसे पहचान न पाए।
ड्राइविंग सीट पर बैठकर, बीड़ी का बचा हुआ गुट्ठा होंठों में दबाए, शंकर पुरानी बातें टटोलने लगा। अभी हफ़्ते-दस दिन पहले की तो बात है, जब करीम दारू के पैग खींचते हुए बता रहा था कि बंगले के गेस्ट हाउस में कोई बहुत ही कयामत चीज़ रहने आई है—एकदम गोरी-चिट्टी, कसी हुई और रईस मैडम, जो अपने साहब के साथ वहाँ ठहरी हुई थी।
शंकर के दिमाग में अचानक एक बिजली सी कौंधी, "अबे कहीं साले करीम ने उस रईस मैडम को तो नहीं पटा लिया?? नहीं-नहीं... ! यह कैसे हो सकता है? कहाँ हम जैसे फटेहाल, नंगे-भूखे गरीब और कहाँ वो साहब की खूबसूरत मालकिन!"
लेकिन फिर शंकर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान फैल गई, "पर करीम साला चीज़ बहुत चालू है... अगर उसने सच में मैडम पर हाथ साफ़ कर दिया होगा, तो आज मुझे भी उस गरम माल का जलवा देखना ही पड़ेगा।"
शंकर ऑटो की सीट पर थोड़ा आगे होकर, अपनी नज़रों को सीधे बंगले के मुख्य गेट पर टिकाकर करीम के बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगा।
Deepak Kapoor
Author on amazon
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल
Author on amazon
- An Innocent Beauty Series ( 5 Books )
https://xossipy.com/thread-71793.html -- अनीता सिंह-
https://xossipy.com/thread-73166.html - अम्मी और अंकल



![[+]](https://xossipy.com/themes/sharepoint/collapse_collapsed.png)