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करीम का अधिकार
गरम पानी कब का ठंडा हो चुका था, लेकिन अनीता अब भी बाथटब के किनारों को जकड़े फर्श पर बैठी थी। पूरे बाथरूम में फैली तेल और साबुन की तीखी खुशबू अब उसका दम घोंट रही थी। करीम के जाने के बाद जो सन्नाटा वहां पसरा था, वह शावर की आवाजों से भी ज्यादा भयानक था।
उसने दीवार का सहारा लेकर उठने की कोशिश की, लेकिन पैर रखते ही उसकी जांघें थरथरा गईं। पिछले हिस्से में उठा वह तीखा, चीर देने वाला दर्द दिमाग तक पहुंचा, और वह एक सिसकी के साथ वापस ठंडी टाइलों पर ढह गई। वह ढंग से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी, चलना तो बहुत दूर की बात थी।
आईने में अपनी धुंधली परछाईं देखकर अनीता कांप गई।
उसकी गोरी गर्दन पर करीम के दांतों के नीले-काले निशान चमक रहे थे। उसके स्तनों पर उंगलियों की जकड़ के निशान थे, और पैरों के बीच से बहती वह चिपचिपी धार इस बात की गवाही दे रही थी कि पिछले दो घंटों में करीम ने उसकी इज्जत और मखमली शरीर को किस कदर अपने पैरों तले रौंद दिया था।
'मैं राज को क्या मुंह दिखाऊंगी?' यह सवाल उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था। 'अगर उन्होंने इन निशानों को देख लिया... अगर उन्हें जरा भी भनक लग गई...' यह सोच कर ही अनीता का दिल बैठ गया।
लेकिन सबसे ज्यादा जो बात अनीता को भीतर से पूरी तरह तोड़ रही थी, वह थी उसकी खुद की गद्दारी। वह बेबसी के आंसू रोते हुए भी इस सच से भाग नहीं पा रही थी कि जब करीम ने उस पर आख़िरी प्रहार किए थे, तो उसके अपने जिस्म ने बगावत कर दी थी।
उसका वह आखिरी आत्मसमर्पण, उसकी जुबान से निकले वे शब्द—"फिर कभी कर लेना, मैं मना नहीं करूंगी"—उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गूंज रहे थे।
उसने सिर्फ अपना बदन नहीं हारा था, उसने अपनी मर्जी, अपनी आजादी और अपना आत्मसम्मान हमेशा-हमेशा के लिए करीम के हाथों में सौंप दिया था।
अब वह राज की रईस पत्नी नहीं थी, वह इस घर के नौकर की एक बंधुआ 'मिल्कियत' बन चुकी थी, जो अब उसके कपड़े तय करने वाला था, उसे अपनी उंगलियों पर नचाने वाला था।
बाथरूम के आईने को देखते हुए अनीता सिसक-सिसक कर रो रही थी, जहां पानी और आंसुओं का फर्क मिट चुका था। वह पूरी तरह टूट चुकी थी, शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी।
उसे आज भी वह दिन याद आ रहा था, जहाँ से सब कुछ उसके हाथ से निकल गया। पति-पत्नी का वह मासूम रोल प्ले, जहाँ राज ने करीम का नाम लेकर उसके साथ सब किया था, अनीता के लिए एक भयानक अभिशाप बन गया।
करीम ने वह सब देख लिया था और फिर उसकी शातिर चालों को अनीता समझ ही नहीं पाई; कभी प्यार से तो कभी गिल्ट का फायदा उठाकर, वह उसके शरीर के साथ खेलता चला गया।
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करीम ने जब बाथरूम का भारी दरवाजा पीछे बंद किया, तो उसके चेहरे पर मुकम्मल कामयाबी की मुस्कान थी।
उसकी काली काया अभी भी पसीने से चमक रही थी और उसकी सांसों में अनीता के महंगे इत्र, बदन की खुशबू और उस मखमली रईसी का नशा घुला हुआ था। वह अपनी लुंगी को कसते हुए सीढ़ियों से नीचे उतरा, तो उसकी हर चाल में एक नया गुरूर था।
'तो आखिरकार मालकिन ने घुटने टेक ही दिए,' करीम ने मन ही मन सोचा।
आज, रईस राज की बेदाग और नाजुक पत्नी को उसने बाथरूम की टाइलों पर कूट-कूट कर अपनी मिल्कियत की ऐसी मोहर लगा दी थी जिसे वो चाहकर भी नहीं मिटा सकती थी।
अनीता के वे आखिरी शब्द—"फिर कभी कर लेना, मैं मना नहीं करूंगी"—करीम के कानों में किसी शाही एलान की तरह गूंज रहे थे। वह समझ गया था कि उसने सिर्फ अनीता का बदन नहीं जीता है, बल्कि उसके ऊंचे खानदान के घमंड को हमेशा के लिए चकनाचूर कर दिया है।
लेकिन करीम अब बंद कमरों का खिलाड़ी नहीं रहना चाहता था।
उसे असली मजा तो तब आने वाला था जब वह इस गोरी मेमसाहब को समाज के सामने, दुनिया की नजरों के ठीक नीचे अपनी रखैल और अपनी 'गर्लफ्रेंड' बनाकर घुमाए, जहां लोक-लाज का डर उसे अंदर ही अंदर खाए और वह चाहकर भी करीम का हाथ न झटक सके।
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अगली सुबह जब राज हमेशा की तरह तैयार होकर अपने ऑफिस के लिए निकला, तो आलीशान बंगले के भारी दरवाजों के बंद होने की आवाज अनीता के दिल की धड़कन बनकर धड़की। घर में सन्नाटा पसरते ही उसका बदन डर के मारे थरथराने लगा।
अभी आधा घंटा भी नहीं बीता था कि करीम ने बिना दस्तक दिए अनीता के बेडरूम का दरवाजा खोला। उसके हाथ में कपड़ों का एक पैकेट था। उसके चेहरे पर वही विजयी मुस्कान थी जो कल बाथरूम के फर्श पर थी।
करीम ने पैकेट को बेड पर रखते हुए कहा, "मालकिन, राज भैया तो चले गए। आज हम आपको अपनी प्रेमिका बनाकर पिक्चर दिखाने ले जा रहे हैं। अपनी इस अलमारी के महंगे कपड़े अंदर रखिए और आज इस गुलाम की पसंद पहनकर तैयार हो जाइए।"
अनीता ने कांपते हाथों से उस पैकेट को खोला, तो भीतर की चीजें देखकर उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं।
- लाल रंग की एक ब्रा, जिसके कप्स पर बीचों-बीच, जहां निप्पल होते हैं, छोटे-छोटे छेद बने हुए थे, जो किसी भी पतले कपड़े के आर-पार सब कुछ नुमायां करने के लिए काफी थे।
- लाल रंग की पैंटी, जो महज एक मामूली सी जी-स्ट्रिंग थी, जिसमें बदन ढकने के नाम पर सिर्फ पतले धागे थे।
- एक सफेद रंग का ब्लाउज और उसके साथ एक लाल रंग का स्कर्ट, जो मिनी स्कर्ट से तो थोड़ा लंबा था, लेकिन घुटनों से काफी ऊपर था। अनीता ने अपनी जिंदगी में कभी इतने छोटे और बेबाक कपड़े नहीं पहने थे।
अनीता ने उस तंग और हवस भरे अंतःवस्त्रों को देखा तो उसकी रूह कांप गई। वह रोने जैसी होकर बोली, "करीम... प्लीज... मैं यह सब पहनकर बाहर कैसे जाऊंगी? लोग क्या कहेंगे? राज को पता चल गया तो..."
"राज भैया को कुछ पता नहीं चलेगा मालकिन," करीम ने उसकी बात बीच में ही काटते हुए अपनी भारी और सख्त आवाज में कहा।
वह अनीता के करीब आया और उसकी ठुड्डी को उंगलियों से भींचते हुए बोला, "कल का वादा भूल गईं? अब आपकी मर्जी नहीं, इस करीम का हुक्म चलेगा।
सीधे-सीधे यह लाल जी-स्ट्रिंग और यह छेद वाली ब्रा चढ़ाइए अपने इस गोरे बदन पर। ऊपर से यह स्कर्ट और ब्लाउज पहनकर आधे घंटे में नीचे आइए। आज सिनेमाघर में इस करीम को अपनी गर्लफ्रेंड का यही रूप देखना है।
करीम इतना कहकर एक शैतानी हंसी हंसता हुआ कमरे से बाहर निकल गया, और अनीता बेड पर उन लाल और सफेद कपड़ों को देखकर अपनी बेबसी पर आंसू बहाने लगी।
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अनीता ने बंद कमरे में कांपते हाथों से उन कपड़ों को अपने बदन पर चढ़ाया।
जब उसने आईने में खुद को देखा, तो शर्म के मारे उसकी आंखें बंद हो गईं। वह पारदर्शी सफेद शर्ट और घुटनों से काफी ऊपर की वह लाल स्कर्ट उसके वजूद को पूरी तरह ढकने में नाकाम थे। भारी कदमों से, अपनी धड़कनों को थामे वह कमरे से बाहर आई, जहां करीम हॉल में सोफे पर पैर फैलाए उसका इंतजार कर रहा था।
जैसे ही अनीता सामने आकर खड़ी हुई, करीम की नजरें उसके गोरे बदन पर चिपक गईं। उसके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान उभर आई।
करीम अपनी जगह से उठा और हुक्मभरी आवाज में बोला, "हाथ ऊपर उठाइए मालकिन! जरा हम भी तो देखें कि हमारी चुनी हुई पोशाक इस बदन पर कैसी खिल रही है। पूरा मुआयना करेंगे आज।"
अनीता की आंखों से बेबसी का एक आंसू टपका, लेकिन अपने वादे के आगे मजबूर होकर उसने धीरे-धीरे अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। हाथ ऊपर उठते ही उसकी सफेद शर्ट ऊपर खिंच गई और उसका नंगा पेट नजर आने लगा।
करीम उसके बिल्कुल करीब आया। उसकी निगाह अनीता की शर्ट और मिनी स्कर्ट के बीच बिखरे उस नंगे पेट पर पड़ी।
"कितना गोरा है यह..." करीम के मुंह से बेबाक तारीफ निकली और उसने धीरे से अनीता के पेट पर अपना भारी हाथ टिका दिया।
अनीता की त्वचा इतनी चिकनी और मखमली थी कि करीम का खुरदरा हाथ उस पर मोम की तरह फिसल रहा था। करीम की उंगलियों की उस पहली धीमी और सहलाती हुई छुअन का अहसास अनीता के लिए बहुत ही अलग और अनोखा था।
अनीता को अपने उस नंगे पेट पर करीम के हाथ का स्पर्श हजार वाट के करंट की तरह महसूस हुआ। करीम की उंगलियों की सहलाती हुई छुअन का अहसास अनीता के लिए बहुत ही अनोखा था; उसका पूरा बदन उस सनसनी से कांप उठा।
उस अनचाहे और रेशमी अहसास के असर से अनीता के मुंह से अनजाने में ही एक दबी हुई, मदहोश कर देने वाली मर्मज्ञ सिसकी निकल गई—
"ओह गॉड... करीम, यह क्या कर रहे हो..."
करीम ने अनीता के पेट पर अपनी उंगलियों की पकड़ थोड़ी और बेबाक करते हुए उसके चेहरे की तरफ देखा।
करीम (अनीता के कान के पास अपनी गर्म और भारी सांसें छोड़ते हुए): "अपनी गर्लफ्रेंड को सहला रहा हूं डार्लिंग... अब कोई जल्दबाजी नहीं है। आज के बाद से आप ना तो कोई अनीता बेटी हैं, और ना ही इस घर की रईस अनीता मालकिन। आप बस मेरी अनीता हैं... सिर्फ और सिर्फ इस करीम की।"
करीम ने अपने दोनों हाथों से अनीता की सफेद शर्ट के निचले दोनों कोनों को पकड़ा और अनीता के ठीक नाभि के ऊपर एक टाइट गाँठ बाँध दी। शर्ट के ऊपर चढ़ते ही अनीता का गोरा, सुडौल और रेशमी पेट अब पूरी तरह बेपर्दा होकर निखर आया।
शर्ट की उस गाँठ और नीचे लाल स्कर्ट के बीच अनीता के नंगे पेट का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुला रह गया था। उसकी बेदाग, गोरी त्वचा और नाभि की गहराई रोशनी में साफ चमक रही थी।
अनीता अपनी इस खुली हुई नग्नता को देखकर झेंप गई और कांपते हाथों से उस नंगे हिस्से को ढकने की नाकाम कोशिश करने लगी, लेकिन करीम ने एक मुस्कान के साथ उसके हाथों को थाम लिया।
करीम ने अनीता के कांपते हाथों को थाम लिया और उन्हें उसकी नाभि से थोड़ा दूर करते हुए भारी आवाज में कहा, "मैं अपनी अनीता को ऐसे ही देखना चाहता हूं। अपने हाथ बीच में मत लाओ, अनीता डार्लिंग।"
अनीता का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। करीम का इस तरह सरेआम उसके बदन पर अपना पूरा हक जमाना और उसे बार-बार 'डार्लिंग' कहना उसे अंदर तक झकझोर रहा था।
फिर करीम की गहरी और हवस भरी निगाह अनीता की उस गोरी, बेदाग नाभि (धुनी) पर जाकर टिक गई। उस कसे हुए पेट के बीचों-बीच नाभि की वह सुडौल गहराई देखकर करीम के चेहरे पर एक चमक आ गई।
"क्या कयामत नज़ारा है..." करीम के मुँह से बेबाक तारीफ़ निकली।
इतना कहते ही करीम थोड़ा नीचे झुका और बिना किसी हिचकिचाहट के अनीता की नाभि पर अपनी गर्म और गीली ज़ुबान टिका दी। उसने बहुत ही इत्मीनान से अनीता की नाभि को चाटना और अपनी ज़ुबान की नोक से उसकी गहराई को खंगालना शुरू कर दिया।
ज़ुबान का वह अचानक, गीला और तीखा स्पर्श अनीता के नंगे पेट पर बिजली के कड़कने जैसा था। नाभि पर होती उस सनसनी ने उसके पूरे जिस्म की नसों में आग लगा दी। अनीता के मुँह से एक बेकाबू, मर्मज्ञ सिसकी फूट पड़ी—
"ओह गॉड..."
अनीता की टांगें कांपने लगीं और उसकी आँखें मदहोशी में बंद होने लगीं। बेबसी और उस अनचाही उत्तेजना के बवंडर में, अनीता के दोनों हाथ अनजाने में ही नीचे झुके करीम के सिर पर चले गए। उसकी उंगलियां खुद-ब-खुद करीम के घने और खुरदरे बालों में उलझकर उसके सिर को अपनी नाभि की ओर दबाने लगीं।
करीब दो मिनट तक करीम अनीता के उस गोरे और मखमली नंगे पेट पर अपनी गीली ज़ुबान फिराता रहा। उसकी ज़ुबान कभी नाभि की गहराई में घूमती तो कभी उसके सुडौल पेट के किनारों को चाटती हुई ऊपर शर्ट की गाँठ तक चली जाती।
उस तीखे और गीले स्पर्श की सनसनी अनीता के बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। उसकी आँखें मदहोशी और शर्म के मारे पूरी तरह बंद थीं, और उसके होंठों से लगातार मर्मज्ञ सिसकियाँ निकल रही थीं— "उह्ह... करीम... आह्ह..."
उसका पूरा बदन उस अनचाहे सुख और बेबसी की वजह से थरथरा रहा था। करीम के बालों में उलझी उसकी उंगलियाँ कभी उसे दूर धकेलने की नाकाम कोशिश करतीं, तो कभी उसी उत्तेजना में उसके सिर को और कसकर अपने पेट से सटा लेतीं।
फिर करीम ने अपना सिर उठाया तो उसकी नजरें उस पतली सफेद शर्ट के आर-पार साफ झलकती उस लाल ब्रा पर गईं।
शर्ट का कपड़ा इतना महीन था कि लाल रंग अंदर से पूरी तरह नुमायां हो रहा था। ब्रा के कप्स में बने उन छोटे छेदों की वजह से अनीता के दोनों निप्पल्स ब्रा से बाहर निकलकर सफेद शर्ट के पतले कपड़े को अंदर से ढकेल रहे थे। वे उत्तेजना की वजह से पूरी तरह कड़े हो गए थे।
वे उभरे हुए हिस्से साफ दिखाई दे रहे थे।
करीम (अनीता की आंखों में झांकते हुए, भारी और मदहोश आवाज में): "देखो अनीता... तुम्हारे ये निप्पल्स तरस रहे हैं मेरे पास आने के लिए। कपड़ा इनकी बेताबी छुप नहीं पा रही है।"
करीम ने एक गहरी सांस ली और अपनी उंगलियों से शर्ट के ऊपर से ही उन सुलगते हुए कड़े हिस्सों को अपनी चुटकी में पकड़ा और धीरे से सहला दिया।
उस अचानक और तीखे स्पर्श से अनीता का पूरा बदन सिर से पांव तक सिहर उठा और उसके कांपते होंठों से बेबसी भरी सिसकी निकली, "बस... करीम..."
इसके बाद करीम की नजरें नीचे उतरीं, जहां लाल स्कर्ट के नीचे अनीता की नंगी और गोरी जांघें पूरी तरह खुली हुई थीं। घुटनों से बहुत ऊपर तक दिखती उस बेदाग त्वचा को देखकर करीम की आंखों में हवस की आग और भड़क गई।
वह अनीता के और करीब सटा और अपने बड़े काले हाथों से उसकी लाल स्कर्ट को धीरे से ऊपर की ओर उठा दिया। स्कर्ट के ऊपर उठते ही अनीता का निचला हिस्सा लगभग पूरी तरह नग्न हो गया।
करीम की नजरें उसकी जांघों के बीच टिकीं, जहां वह लाल रंग की जी-स्ट्रिंग महज पतले धागों के सहारे उसके नितंबों और गुप्तांग के मुहाने को बमुश्किल छू रही थी। आगे का गोरा हिस्सा और पीछे के विशाल कूल्हे उस पतली पट्टी के बीच लगभग पूरी तरह बेपर्दा चमक रहे थे।
करीम ने स्कर्ट को वैसे ही उठाए रखा और एक वहशी हंसी हंसते हुए फुसफुसाया, "कसम खुदा की मालकिन... इस रूप में तो आप राज भैया की बीवी नहीं, बल्कि इस नौकर की रखैल लग रही हैं।"
"करीम... मत करो ऐसे। मैं इन कपड़ों में बाहर कैसे जाऊंगी, अगर किसी ने देख लिया तो?" अनीता की आवाज़ डर और बेबसी के मारे थरथरा रही थी, और उसकी आँखें आसूँओं से भर आई थीं।
करीम के चेहरे पर एक सख्त भाव आ गया। उसने अनीता की आंखों में झांकते हुए कहा, "पहले तो ये आंसू नहीं आने चाहिए तुम्हारे चेहरे पर। तभी मैं तुम्हारी बात पर गौर करूंगा।"
करीम का यह हुक्म सुनते ही अनीता जल्दी से अपने दोनों हाथों से गालों पर बहते आंसुओं को पोंछ लिया और करीम की तरफ अपनी बेबस नजरों से देखने लगी।
करीम ने अपनी दोनों बांहों को सीने पर बांधा और अपनी गर्दन को थोड़ा तिरछा करके अनीता को सिर से पांव तक देखा।
करीम (असंतोष भरे लहजे में): "नहीं मालकिन, मजा नहीं आया... अभी भी तुम्हारे चेहरे पर वही बेबसी और खौफ दिख रहा है। तुम कहीं से भी इस करीम की माशूका नहीं लग रही हो। और याद रखना, करीम सिर्फ अपनी माशूका की बात सुनता है, किसी रोती हुई मालकिन की नहीं।"
करीम के इन तीखे शब्दों का मतलब अनीता तुरंत समझ गई। उसे समझ आ गया कि अगर इस सार्वजनिक बेइज्जती से बचना है या करीम को किसी बात के लिए राजी करना है, तो उसे डर को दरकिनार करके करीम की प्रेमिका होने का नाटक ही नहीं, बल्कि वैसा बर्ताव भी करना पड़ेगा।
अनीता ने एक गहरी सांस ली। उसने अपने कांपते चेहरे पर जबरदस्ती एक कोमल, कातिलाना मुस्कान लाने की कोशिश की। उसने अपनी पलकों को हल्का सा झुकाया और अपने नाजुक कदम करीम की तरफ बढ़ाए। उसने अपने दोनों हाथों को करीम के चौड़े सीने पर रख दिया और अपनी कजरारी आंखों से उसकी आंखों में देखा।
अनीता (अपनी आवाज में एक बनावटी मिठास और नजाकत लाते हुए): "करीम... डार्लिंग, प्लीज मेरी बात सुनो ना। मैं बस इतना चाहती हूं कि हम दोनों के बीच जो कुछ भी चल रहा है, जो ये खास रिश्ता है... उसकी भनक किसी भी तरह राज को न लगे।"
करीम ने अनीता के अपने सीने पर रखे हाथों को महसूस किया और उसकी इस अचानक बदली अदा पर उसकी आंखें हवस और घमंड से चमक उठीं। उसने अनीता की पतली नंगी कमर में अपना भारी हाथ डालकर उसे और करीब खींच लिया।
करीम (अनीता के होंठों के बेहद करीब अपना चेहरा लाते हुए, भारी आवाज में): "अच्छा? तो हमारी माशूका को हमारी फिक्र कम और राज भैया का डर ज्यादा है? "
अनीता का दिल अंदर ही अंदर इस छुअन से घिना रहा था, लेकिन उसने अपने चेहरे की मुस्कान को फीका नहीं पड़ने दिया।
अनीता (करीम के कंधे पर अपना सिर हल्का सा टिकाते हुए, सहमी सी आवाज में): "तुम तो जानते ही हो करीम... "अगर राज ने या उनके किसी जानने वाले ने मुझे इन कपड़ों में बाहर देख लिया, तो सब बर्बाद हो जाएगा। तुम जो कहोगे मैं करूंगी, बस... बाहर के लिए मुझे कुछ ऐसा पहनने दो जिससे कोई पहचान न सके।"
करीम ने अनीता की ठोड़ी को अपनी दो उंगलियों से ऊपर उठाया और उसके लाल पड़ चुके होंठों को एक पल के लिए घूरकर देखा।
करीम (एक विजयी मुस्कान के साथ): "चलो, डार्लिंग कहा है तो तुम्हारी बात पर विचार करते हैं।"
करीम ने अनीता की नंगी कमर को अपने मजबूत हाथों से सहलाते हुए उसे झटके से अपनी बाहों में खींच लिया। उसका चौड़ा और तपता हुआ सीना अनीता के नाजुक बदन से पूरी तरह सट गया।
करीम (अनीता के चेहरे पर अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए, हवस भरी आवाज में): "अनीता डार्लिंग... अब जरा आगे बढ़ो और अपने इस करीम को एक गहरा किस करो। पिक्चर चलने से पहले मेरा दिल कर रहा है कि अपनी इस खूबसूरत माशूका के साथ थोड़ा प्यार कर लूं। उसके बाद ही मैं खुद तैयार होने जाऊंगा।"
अनीता ने करीम की भूखी आंखों में देखा और बिना किसी विरोध के अपने होंठ उसके काले और मोटे होंठों पर टिका दिए। शुरुआत में तो वह यह सब सिर्फ एक नाटक की तरह कर रही थी ताकि करीम उसकी बात मान ले, लेकिन करीम कोई नौसिखिया नहीं था।
जैसे ही उसने अनीता के नाज़ुक और रसीले होंठों को अपने ढीठ, खुरदरे और गर्म होंठों के बीच बेदर्दी से दबाया, उसकी गीली ज़ुबान अनीता के मुँह के हर कोने में बेहद महारत से चलने लगी। करीम की ज़ुबान अनीता की कोमल ज़ुबान से टकराई और उसे मथने लगी, जैसे किसी प्यासे ने पहली बार कोई मीठा शरबत चखा हो।
बेमन और सिर्फ एक नाटक से शुरू हुआ वह चुंबन अचानक एक बेकाबू, सुलगती हुई अनचाही उत्तेजना में बदलने लगा।
करीम ने एक वहशी मुस्कान के साथ उसके होंठों पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया। उसके मोटे होंठ कभी अनीता के रसीले होंठों को हल्के से चूसते, तो कभी एकदम से पूरे जोर के साथ उन पर हावी हो जाते, जैसे किसी भूखे शिकारी ने अपना शिकार दबोच लिया हो। अनीता के मुँह का रस पीते हुए करीम का यह अंदाज़ उसे पूरी तरह बेबस बना रहा था।
उसी पल उसका एक भारी हाथ अनीता की लाल स्कर्ट के नीचे, उसकी नंगी और तपती हुई जाँघों पर जा टिका। उसकी काली मोटी उँगलियाँ अनीता की मखमली, गोरी त्वचा पर धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगीं। करीम की उंगलियों की उस गर्म छुअन से अनीता के पूरे शरीर में एक तीखी, ठंडी सिहरन दौड़ गई और उसकी टांगें अनजाने में ही थोड़ी ढीली पड़ने लगीं।
करीम ने अनीता की नंगी जांघों पर अपनी खुरदरी उंगलियों का दबाव थोड़ा और बढ़ाते हुए उसके होंठों से अपने होंठ हटाए। उसकी भूखी और हवस भरी निगाहें अनीता की लाल स्कर्ट के नीचे उभरी गोरी रंगत पर टिकी थीं।
करीम (मदहोश और भारी आवाज़ में, अनीता के गालों से अपना चेहरा सटाते हुए): "मखन हैं आपकी जांघें... उंगली फिसल ही जाती है। कितनी कोमल है आपकी स्किन, कितनी गोरी..."
उसके इस बेबाक बयान और नंगी त्वचा पर रेंगती उसकी काली उंगलियों ने अनीता को शर्म से लाल कर दिया।
वहीं करीम का दूसरा हाथ अनीता की पतली सफेद शर्ट के ऊपर से ही उसके उभरे हुए सुडौल स्तन पर पहुँच गया। ब्रा के छेदों से बाहर निकले अनीता के कड़े निप्पल्स को उसने अपनी उँगलियों के बीच दबोचा और चुटकी काटते हुए उन्हें बेदर्दी से मसलने लगा।
उस तीखे स्पर्श और दर्द-मिश्रित सुख के अचानक मिले अहसास से अनीता का पूरा वजूद कांप उठा। उसके गले से एक तीखी, दबी हुई आह निकली, जो करीम के मुँह के भीतर ही घुटकर रह गई—
"अह्ह... धीरे करीम... दर्द होता है..." अनीता ने करीम के होंठों के बीच ही सिसकते हुए गुहार लगाई।
करीम का मुँह अनीता के कोमल होंठों को पूरी तरह से निगल चुका था। वह अनीता की नंगी कमर को अपनी ओर इतना कसता चला गया कि अनीता के उभरे हुए सीने और उसकी नंगी जांघों का हर हिस्सा करीम के कठोर और तपते जिस्म से सट गया।
अनीता का पूरा बदन उस छुअन के आगे समर्पण करने लगा था; उसके थरथराते हाथ अब खुद-ब-खुद करीम के चौड़े कंधों को जकड़ने लगे थे।
कुछ पलों तक अनीता को अपनी बाहों में इस कदर भींचने और उसकी सुध-बुध छीनने के बाद, करीम ने बड़ी मुश्किल से अपने होंठ पीछे हटाए। अनीता के होंठ उसकी उखड़ी हुई साँसों के साथ काँप रहे थे। करीम ने एक विजयी और मदहोश मुस्कान के साथ अनीता के बहके हुए गाल पर प्यार से हाथ फेरा और भारी आवाज़ में आगे बोला।
करीम (विजयी लहजे में): "और सुनो डार्लिंग, बाहर की फिक्र छोड़ दो। मैंने अपने एक दोस्त से बात कर ली है, हम उसकी मोटरसाइकिल पर सवार होकर पिक्चर देखने जाएंगे। तुम अपने चेहरे को स्कार्फ या रुमाल से अच्छी तरह ढक लेना... किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी कि यह रईस मालकिन इस काले करीम की मोटरसाइकिल पर पीछे सटकर बैठी है।"
यह सुनते ही अनीता के मन से राज के देख लेने का खौफ थोड़ा कम हुआ, लेकिन एक नौकर की मोटरसाइकिल पर इस छोटे स्कर्ट और तंग ब्रा में पीछे बैठकर जाने के अहसास ने उसके बदन में सिहरन पैदा कर दी।
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करीम ने अनीता को कमरे में उसी बहकी हुई हालत में छोड़ा, अपने कपड़े थोड़े ठीक किए और सीधे अपने जिगरी दोस्त शंकर के कमरे की तरफ बढ़ गया। शंकर उम्र में करीम के ही बराबर था और दोनों की आपस में काफी जमती थी।
सामने करीम को आता देख शंकर ने अपने हाथ में पकड़ी बीड़ी का एक लंबा सुट्टा खींचा और धुएं का गुबार छोड़ते हुए हंसकर बोला, "अबे करीम! आज किधर से सूरज निकल आया बे? बड़ी तेज चाल में आ रहा है, चेहरे पर तो अलग ही चमक बिखरी पड़ी है!"
करीम ने पास आकर शंकर के कंधे पर एक थपकी मारी और सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, "अबे चमक-वमक छोड़, तेरी मोटरसाइकिल की चाबी निकाल जरा। अर्जेंट काम आ गया है।"
शंकर ने अपनी आंखें मटकाते हुए चाबी अपनी जेब में कसकर पकड़ ली और चिढ़ाने वाले लहजे में बोला, "अबे-अबे, थम जा भाई! हवा में उड़ रहा है क्या? अचानक मोटरसाइकिल की क्या जरूरत पड़ गई? और वो भी इस टाइम? बात क्या है बे? कहीं कोई नई सैटिंग तो नहीं पटा ली?"
करीम ने हंसते हुए शंकर की बात को हवा में उड़ाया, "अबे तेरी तो सुई हमेशा वहीं जाके अटकती है! काम है जरा शहर की तरफ, एक जरूरी सामान लेकर आना है। दे चाबी चुपचाप, ज्यादा सीआईडी मत बन।"
"अच्छा बच्चा! मुझसे छुपाएगा?" शंकर ने नकली नाराजगी दिखाते हुए चाबी जेब से निकाली और उंगली में घुमाते हुए करीम के करीब आया, "देख भाई, मेरी काली घोड़ी की सवारी ऐसे ही मुफ़्त में नहीं मिलती। सच-सच बता, चक्कर क्या है? नहीं तो चाबी भूल जा।"
करीम ने झटके से शंकर के हाथ से चाबी लपक ली और आंख मारते हुए बोला, "अबे सब सच बता दूंगा तो नजर नहीं लग जाएगी तेरी? शाम को आऊंगा तो तेरी बीड़ी का बंडल और एक कटिंग चाय मेरी तरफ से पक्की। अब रास्ते से हट, मुझे देर हो रही है!"
शंकर ने हंसते हुए करीम की पीठ पर एक घूंसा मारा, "साले हरामी! काम निकलते ही भाग रहा है। जा ले जा, पर गाड़ी ध्यान से चलाना, मेरी जान बस्ती है उसमें!"
करीम ने चाबी जेब में डाली, काली मोटरसाइकिल को किक मारी और एक जोरदार धुआं छोड़ते हुए वापस अनीता के बंगले की तरफ मोड़ दिया।
Deepak Kapoor
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