22-09-2026, 01:54 PM
बाबाजी ने अपनी उँगलियों को धीरे-धीरे मयूरी के भरे-भरे कलशों पर फेरा। पीले सूट के पतले कपड़े के ऊपर से भी उसके स्तनों की नरमाई और गर्माहट साफ महसूस हो रही थी। उसकी उँगलियों के स्पर्श से मयूरी के निप्पल तुरंत सख्त होकर उभर आए और लाल रंग के छोटे-छोटे पहाड़ियों की तरह कपड़े को अंदर से ठेलने लगे। आज उसने ब्रा भी नहीं पहनी थी, इसलिए बाबाजी को हर उभार और हर कंपन बिना किसी रोक-टोक के महसूस हो रहा था। मैत्री की तरफ से।
मयूरी की साँसें भारी हो चुकी थीं। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी और बाबाजी की उँगलियों के हर स्पर्श पर उसके शरीर में एक मीठी-सी लहर दौड़ जाती।
बाबाजी ने कामुक मुस्कान के साथ कहा, “बोलो न मयूरी… कोई अच्छा सा नाम दे दो अपने मन से… मेरे इस घोड़े को।”
मयूरी कुछ पल तक शर्म से सिर झुकाए रही। उसके गाल लाल हो चुके थे। फिर उसने बहुत धीरे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, “घोड़ा…वैसे तो यह घोड़े के लंड जैसा ही है। इसलिए मैंने यह नाम चुना। आपको कोई प्रॉब्लम तो नहीं?”
बाबाजी जी को ये नाम सुनकर हल्की-सी हंसी छूट गई। उन्होंने मयूरी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए पूछा,
“घोड़ा? अच्छा है… लेकिन घोड़ा ही क्यों?”
मयूरी अब थोड़ी हिम्मत करके उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “देखो ना… ये घोड़े जैसा ही है। लंबा… मोटा… और मुझे देखकर जैसे हिनहिना रहा है… फड़क रहा है।”
उसकी बात सुनकर बाबाजी जी की आँखों में शरारत और वासना दोनों चमक उठीं। मयूरी अब धीरे-धीरे खुल रही थी, और यही वे चाहते थे।
बाबाजी ने अपनी आवाज को और गहरी, कामुक बनाते हुए कहा,
“अच्छा… तो अब तुमने मेरे घोड़े को अस्तबल से बाहर निकाल ही दिया है… तो इसका चारा भी खिला दो ना… मेरी शर्मीली मयूरी।” कहते हुए बाबाजी का हाथ ऊपर उठा और उनके मोटी, गर्म उँगलियाँ मयूरी के गीले, फड़कते होंठों पर थिरकने लगीं। इशारा साफ था।
मयूरी ने पल भर उनकी आँखों में देखा। शर्म, डर और तीव्र उत्तेजना का मिश्रण था उसकी नजर में। फिर उसने धीरे से होंठ खोले। उसके मोती जैसे सफेद दाँतों के बीच से लाल-गुलाबी जीभ बाहर निकली।
उसने बाबाजी के मोटे, नसों वाले घोड़े के आगे वाले हिस्से को अपने नरम, गर्म होंठों में लिया। पहले सिर्फ सिर को… बहुत धीरे-धीरे। फिर अपनी जीभ की नोक से उसके छोटे-छोटे छेद को कुरेदने लगी। लेखिका मैत्री,सौनी और फनलवर है।
“अह्ह्ह्ह…” बाबाजी के मुंह से एक गहरी आह निकली।
मयूरी ने दोनों हाथों से उनके घोड़े को मजबूती से पकड़ रखा था। उसकी उँगलियाँ उसके मोटेपन को महसूस कर रही थीं। वह धीरे-धीरे सिर आगे-पीछे करने लगी। उसके होंठ अब और ज्यादा खुल चुके थे। गीली जीभ लंड के चारों ओर लिपट रही थी, चूस रही थी, सहला रही थी। चमड़ी के अन्दर उसकी जीभ घूम रही थी ताकि सुपारा अपने आप बाहर आ जाये।
बाबाजी ने आँखें बंद कर लीं और सिर को पीछे टिका दिया। उनके चेहरे पर आनंद के भाव साफ दिख रहे थे।
“बहुत अच्छा… बस ऐसे ही… धीरे-धीरे चूसो मयूरी… तुम्हारे मुंह में बहुत गर्मी है…और मेरे घोड़े को तुम्हारे मुंह की गर्मी से गर्माहट मिल रही है।” उन्हों ने मयूरी के सिर को पकड़ा और अपने लंड की और थोडा सा धकेला। मयूरी भी इसी आमंत्रण की राह देख रही थी। बिना विरोध किया उसने अपना मुंह कुछ ज्यादा खोला ताकि अब उसके प्रेमी घोड़े को ज्यादा गर्माहट दे सके।
कुछ देर बाद बाबाजी ने आँखें खोलीं और मयूरी के बालों को सहलाते हुए बोले,
“तुमने तो मेरे लंड का नाम घोड़ा रख दिया… अब मैं भी तुम्हारी चूत का नाम रखना चाहता हूँ…”
मयूरी ने उनके घोड़े को चूसते हुए ही ऊपर देखा। उसकी आँखें नम और भरी हुई थीं। आँखों ही आँखों में पूछा - क्या नाम?
बाबाजी मुस्कुराए और बोले, “बिल्ली…”
मयूरी के मुंह से एक हल्की-सी हंसी निकल गई, लेकिन घोड़े को मुंह से निकाला नहीं। वह चूसती रही। फिर बीच-बीच में रुककर बोली,
“बिल्ली? बिल्ली ही क्यों?”
बाबाजी ने उसके बालों को हल्का सा खींचकर उसे और गहराई में ले जाने की कोशिश करते हुए कहा,
“क्योंकि मुझे पता है… जिस तरह तुम मेरे घोड़े को अभी चूस रही हो… लपलपा रही हो… ठीक उसी तरह तुम्हारी बिल्ली भी एक दिन मेरे घोड़े को चाटेगी… नोचेगी… और उसका पूरा दूध पी जाएगी…”
ये बात सुनते ही मयूरी के शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई। उसकी चूत अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसने और जोश से बाबाजी के घोड़े को मुंह में ले लिया। बाबाजी का लंड नसों से फुला हुआ था फिर भी मयूरी ने कोशिश की और घोडा उसके मुंह में समां गया।
बाबाजी का हाथ अब उसके सिर के पीछे आ गया। उन्होंने धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया। मयूरी तैयार नहीं थी। अचानक बाबाजी का मोटा घोड़ा उसके गले तक चला गया।
“ग्ग्ग्ह्ह्ह…” मयूरी के गले से एक दबी हुई आवाज निकली। उसकी आँखों में पानी आ गया। खांसी आने लगी, लेकिन उसने घोड़े को मुंह से नहीं निकाला।
बाबाजी ने प्यार से उसके बाल सहलाते हुए कहा,
“शांत… आराम से… सांस लो… तुम मेरी अच्छी लड़की हो… गुरु जो सिखा रहा है, उसे सीखो… धीरे-धीरे सब आ जाएगा…” बाबाजी अब मौके को छोड़ना नहीं चाहते थे। कल उसे छोड़ दिया था, आज उसे पाने का मौका था और वह अब सामने से मुंह को बाबाजी के लंड के नाम खोल दिया था। मैत्री, सौनी, फनलवर।
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जुड़े रहे दोस्तों....................
Maitri Patel की रचना।
मयूरी की साँसें भारी हो चुकी थीं। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी और बाबाजी की उँगलियों के हर स्पर्श पर उसके शरीर में एक मीठी-सी लहर दौड़ जाती।
बाबाजी ने कामुक मुस्कान के साथ कहा, “बोलो न मयूरी… कोई अच्छा सा नाम दे दो अपने मन से… मेरे इस घोड़े को।”
मयूरी कुछ पल तक शर्म से सिर झुकाए रही। उसके गाल लाल हो चुके थे। फिर उसने बहुत धीरे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, “घोड़ा…वैसे तो यह घोड़े के लंड जैसा ही है। इसलिए मैंने यह नाम चुना। आपको कोई प्रॉब्लम तो नहीं?”
बाबाजी जी को ये नाम सुनकर हल्की-सी हंसी छूट गई। उन्होंने मयूरी के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए पूछा,
“घोड़ा? अच्छा है… लेकिन घोड़ा ही क्यों?”
मयूरी अब थोड़ी हिम्मत करके उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “देखो ना… ये घोड़े जैसा ही है। लंबा… मोटा… और मुझे देखकर जैसे हिनहिना रहा है… फड़क रहा है।”
उसकी बात सुनकर बाबाजी जी की आँखों में शरारत और वासना दोनों चमक उठीं। मयूरी अब धीरे-धीरे खुल रही थी, और यही वे चाहते थे।
बाबाजी ने अपनी आवाज को और गहरी, कामुक बनाते हुए कहा,
“अच्छा… तो अब तुमने मेरे घोड़े को अस्तबल से बाहर निकाल ही दिया है… तो इसका चारा भी खिला दो ना… मेरी शर्मीली मयूरी।” कहते हुए बाबाजी का हाथ ऊपर उठा और उनके मोटी, गर्म उँगलियाँ मयूरी के गीले, फड़कते होंठों पर थिरकने लगीं। इशारा साफ था।
मयूरी ने पल भर उनकी आँखों में देखा। शर्म, डर और तीव्र उत्तेजना का मिश्रण था उसकी नजर में। फिर उसने धीरे से होंठ खोले। उसके मोती जैसे सफेद दाँतों के बीच से लाल-गुलाबी जीभ बाहर निकली।
उसने बाबाजी के मोटे, नसों वाले घोड़े के आगे वाले हिस्से को अपने नरम, गर्म होंठों में लिया। पहले सिर्फ सिर को… बहुत धीरे-धीरे। फिर अपनी जीभ की नोक से उसके छोटे-छोटे छेद को कुरेदने लगी। लेखिका मैत्री,सौनी और फनलवर है।
“अह्ह्ह्ह…” बाबाजी के मुंह से एक गहरी आह निकली।
मयूरी ने दोनों हाथों से उनके घोड़े को मजबूती से पकड़ रखा था। उसकी उँगलियाँ उसके मोटेपन को महसूस कर रही थीं। वह धीरे-धीरे सिर आगे-पीछे करने लगी। उसके होंठ अब और ज्यादा खुल चुके थे। गीली जीभ लंड के चारों ओर लिपट रही थी, चूस रही थी, सहला रही थी। चमड़ी के अन्दर उसकी जीभ घूम रही थी ताकि सुपारा अपने आप बाहर आ जाये।
बाबाजी ने आँखें बंद कर लीं और सिर को पीछे टिका दिया। उनके चेहरे पर आनंद के भाव साफ दिख रहे थे।
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कुछ देर बाद बाबाजी ने आँखें खोलीं और मयूरी के बालों को सहलाते हुए बोले,
“तुमने तो मेरे लंड का नाम घोड़ा रख दिया… अब मैं भी तुम्हारी चूत का नाम रखना चाहता हूँ…”
मयूरी ने उनके घोड़े को चूसते हुए ही ऊपर देखा। उसकी आँखें नम और भरी हुई थीं। आँखों ही आँखों में पूछा - क्या नाम?
बाबाजी मुस्कुराए और बोले, “बिल्ली…”
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“बिल्ली? बिल्ली ही क्यों?”
बाबाजी ने उसके बालों को हल्का सा खींचकर उसे और गहराई में ले जाने की कोशिश करते हुए कहा,
“क्योंकि मुझे पता है… जिस तरह तुम मेरे घोड़े को अभी चूस रही हो… लपलपा रही हो… ठीक उसी तरह तुम्हारी बिल्ली भी एक दिन मेरे घोड़े को चाटेगी… नोचेगी… और उसका पूरा दूध पी जाएगी…”
ये बात सुनते ही मयूरी के शरीर में एक झुरझुरी दौड़ गई। उसकी चूत अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी। उसने और जोश से बाबाजी के घोड़े को मुंह में ले लिया। बाबाजी का लंड नसों से फुला हुआ था फिर भी मयूरी ने कोशिश की और घोडा उसके मुंह में समां गया।
बाबाजी का हाथ अब उसके सिर के पीछे आ गया। उन्होंने धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया। मयूरी तैयार नहीं थी। अचानक बाबाजी का मोटा घोड़ा उसके गले तक चला गया।
“ग्ग्ग्ह्ह्ह…” मयूरी के गले से एक दबी हुई आवाज निकली। उसकी आँखों में पानी आ गया। खांसी आने लगी, लेकिन उसने घोड़े को मुंह से नहीं निकाला।
बाबाजी ने प्यार से उसके बाल सहलाते हुए कहा,
“शांत… आराम से… सांस लो… तुम मेरी अच्छी लड़की हो… गुरु जो सिखा रहा है, उसे सीखो… धीरे-धीरे सब आ जाएगा…” बाबाजी अब मौके को छोड़ना नहीं चाहते थे। कल उसे छोड़ दिया था, आज उसे पाने का मौका था और वह अब सामने से मुंह को बाबाजी के लंड के नाम खोल दिया था। मैत्री, सौनी, फनलवर।
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